साधक का द्वन्द्व(आत्ममन्थन के नवनीत) का दूसरा भाग--
गतांश से आगे...
सांख्य की समझ
आवेश और विषादों से घिरा, मंगलागौरी मन्दिर का कंगूरा निहार रहा था, तभी अचानक दाएँ कंधे पर अज्ञात मृदु हथेली का स्पर्श मिला और कानों में व्यंग्यात्मक हँसी के साथ स्वर गूँजे— “ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।—इतना क्रोध और आवेश अच्छा नहीं है बच्चे ! गीता पढ़ते हो सिर्फ, गुनने का भी प्रयत्न किया करो...।”
चौंककर गर्दन
घुमाया। बगल में खड़ा एक युवक मुस्कुरा रहा था— बिल्कुल युवक ही। प्रौढ़ता की सीमा
अभी उसे छूने से भी साफ इन्कार कर रही थी । कमर में पीले रंग का एक गमछा लपेटे और
वैसा ही एक गमछा कंधे पर डाले हुए, उत्सुकता से मुझे निहार रहा था।
गीता के श्लोक
से आकर्षण तो हुआ उसके प्रति, किन्तु उसके वय और सम्बोधन ने मेरे ‘अहंकार’ को झकझोर कर
रख दिया— हेंऽ ! बित्ते भर का
छोकरा और उपदेश देने चला है, जिसे बोलने का भी सऊर नहीं...अपने से दोगुने उम्र वाले को
बच्चा कह रहा है...।
भकोस जाने
वाली आँखों से उसे घूरते हुए, मन ही मन बुदबुदाया। तभी अचानक ऐसा लगा मानों ऊँचे पहाड़ों पर हवा के
झोंके से एकाएक बादल उतरकर, चहुँओर छा गया । उस घनेरी बदली में ही एक जानी पहचानी सी आकृत्ति दिख
पड़ी, जिसे अब से कोई अड़तीस वर्ष पहले यमुना किनारे विशाल त्रिसंकटवृक्ष (वट-पीपल-पाकड़
का एकत्र संयोग) के मोटे तने में सद्यः समाते हुए देखा था—अरे ! ये तो बाबाउपद्रवीनाथजी हैं ।
‘ चित्तवृत्तियों
’ की दूसरी लहर कुछ और ही दिखाने लगी—वही युवक मुस्कुराता हुआ सामने
खड़ा है, नये उपदेश के साथ—“पाँच महाभूतों वाली क्षणभंगुर काया से ही सिर्फ
परिचय है बच्चे ! बाकी अठारह का जरा भी अता-पता नहीं तुम्हें ? और जब उस अठारह को ही नहीं जानते, तो
उसके बाद वाले ‘एक’ और फिर उसके भी बाद वाले ‘एक’ के बारे में कैसे जान-समझ पाओगे ! ”
इस बार के
शब्दों ने ‘शब्दब्रह्म’ की तरह
आकर्षित-पुलकित किया मुझे और यन्त्रवत् खिंचा चला गया अड़तीस वर्ष पीछे और उससे भी पीछे ।
************
जैसा कि आप
जानते हैं, बाबाउपद्रवीनाथजी ने आश्वासन दिया था अखबारी बाबू और गायत्री को सन्तान-लाभ
हेतु। बाबा से परिचित जन ये भी जानते हैं कि वंशहीन दम्पत्ति को वचन देकर, आश्वस्त
कर, स्वयं त्रिसंकट में समा गए थे—महाप्रयाण की मुद्रा में।
इस घटना के
काफी समय बाद, मुझे पता चला था कि समयानुसार गायत्री के पवित्र गर्भ को अपने पुनरागमन का आधार बनाया बाबा
ने। पूरे एक साल बाद उनका पुनः अवतरण हुआ था उसी महानगर की एक झोपड़ी में। मुझे ये
भी पता चला था कि एक अपरिचित-अज्ञात साध्वी ने उनके जन्म-काल में कुशल ‘धाय’ की भूमिका निभायी थी ।
फिर क्या कहूँ, कालप्रवाह में सम्पर्क-सूत्र ही
पूर्णतया बिखर गया। न मैंने अखबारी बाबू का पता लगाया और न गायत्री का ही। और जब मुझे
ही सुधी न रही तो भला उन दम्पति को क्योंकर होती !
************
मैं खटाक से
उठ खड़ा हुआ, अजीब बेचैनी के साथ—निश्चित ही ये बाबाउपद्रवीनाथजी ही हैं। चित्त में श्रीकृष्ण के गीतोक्त वचन तरंगित हो
उठे—वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा
शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। यानी बाबा पुराने
वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण कर लिये हैं। अपने नूतन कलेवर में मुझ मूरख के लिए
कृपा-प्रसाद लेकर आए हैं आज इतने दिनों बाद। धन्य हो गया मैं, धन्य हो गया मेरा
जीवन...।
बाबा ने मेरी
दाहिनी कलाई पकड़ ली और सस्नेह खींचते हुए बोले—“ संशयात्मा
विनश्यति...उसी गीता में ये बात भी कही गई है, जिसका तुम बचपन
से ही पन्ने पलटते आए हो। संशयात्मक मन किसी काम का नहीं। आओ मेरे साथ। लगता है
तुम्हारी शंकाओं का समाधान करने हेतु ही माँ मंगला ने आज हमें भेजा है यहाँ। ”
दर्शनार्थियों
की सुविधा के लिए बनाये गए स्टीलगेट-ग्रील वाले बाड़ों को पार कर, बाबा सीढियाँ
उतरने लगे। मेरी कलाई पर उनकी पकड़ अभी भी बनी हुई थी, मानों अपराधी कहीं भाग न
जाय।
ऊपर से पहली
ही चौताल पर आने के बाद उत्तर की ओर मुड़कर, पुनः सकरी गली से ऊपर चढ़ाई की ओर
बढ़ने लगे। मैं निर्विकार भाव से साथ देता रहा—किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं, किसी
प्रकार की जिज्ञासा भी नहीं। बस, स्वचालित कठपुतली की भाँति घिसटता रहा उनके साथ।
लगातार आधी
घड़ी तक साँपसीढ़ी की तरह टेढ़े-मेढ़े, ऊपर ही ऊपर चढ़ने के बाद प्रशस्त पहाड़ी
भाग में बनी पर्णकुटी के बीचोबीच अंडाकार चट्टानी ढोंके पर बैठते हुए बाबा ने कहा— “ आओ बैठो थोडी
देर। आज की रात बड़ी सुखद है—मेरे लिए और तुम्हारे लिए भी। ”
इतनी देर से
खोयी हुई मेरी सुधी वापस आयी अब। मेरे सामने वह युवक नहीं, पुराने कलेवर वाले
बाबाउपद्रवीनाथजी ही विराज रहे थे। आश्वस्त होकर, पास पड़ी एक छोटी सी चिकनी शिला
पर मैं भी बैठ गया।
बाबाने पूछा —
“ तुम्हारी समस्या क्या है...जिज्ञासा
कहाँ अटकी है...बहुत कुछ जानते-समझते हुए भी इतनी नासमझी क्यों करते हो? ”
सिर झटकाते
हुए मैंने कहा—समस्या की गट्ठर बहुत बड़ी तो नहीं है महाराज ! किन्तु भारी
जरुर है। गट्ठर की ऊपर वाली गाँठ खोलने में ही उलझा हुआ हूँ। भीतर की क्या कहूँ !
“ गट्ठर की गाँठ ! ये गाँठ लगायी किसने? ”— बाबाने
मुस्कुराते हुए पूछा— “ कुछ स्पष्ट कहो तो बात आगे बढ़े। पहेलियों में
बातें अच्छी नहीं लगती। हालाँकि पहेलियाँ बुझाने में तो मैं खुद ही माहिर हूँ। दरअसल
कुछ बातें सिर्फ पहेलियों में ही कही जा सकती हैं। उनका हल तो खुद ही निकालना पडता
है। ”
श्रीचरणों में
श्रद्धावनत मैंने कहा— जी महाराज ! मकड़ी फँसती है अपने ही बुने जालों में, किन्तु
उसे समेटने की कला भी तो प्रकृति ने दे रखी है न। ये जानते हुए भी कि गट्ठर में
गाँठ मेरी ही लगायी हुई है, किन्तु खोलने के चक्कर में और-और उलझा जा रहा हूँ। वयःशतक
का तीन हिस्सा बीत चुका। अबतक खुली नहीं गाँठ पहली वाली ही। आगे क्या होगा—ईश्वर
जाने !
प्रश्नात्मक
मुद्रा में सिर हिलाते, हथेली नचाते
हुए बाबा ने सवाल किया— “ बीच में ये ईश्वर कहाँ से आ गए भाई मेरे? मैं फिर दुहराता हूँ वही सवाल—तुम्हारी
जिज्ञासा कहाँ अटकी है?”
सवाल
सीधा-सपाट है महाराज ! — मैंने कहा — करुँ तो क्या करूँ...क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? कर्तव्य, करणीय, अकरणीय, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक,
पुनर्जन्म-मोक्ष—इन सबके द्वन्द (जोड़े) और इन द्वन्दों का द्वन्द्व (उलझन)...।
बाबा ने रुकने का संकेत किया पंजा दिखाकर
— “ये द्वन्दात्मक
प्रश्नों का द्वन्द्व तुझ अकेले का नहीं हैं बच्चे ! तर्क-कुतर्क
वाली बुद्धि, संकल्प-विकल्पों वाला मन और कारणतत्व—अहंकार का ये तमाशा है । जो
जितना ज्यादा बुद्धि का प्रयोग करता है, वह उतना ही ज्यादा उलझता है। सृष्टि के प्रारम्भिक क्रम में ही महर्षि कपिल
ने सांख्य के माध्यम से अपनी माता अदिति को समझाया था। ऐसा नहीं कि माता अदिति कोई
सामान्य स्त्री थी, अज्ञानी थी। वस्तुतः ऐसी जिज्ञासाएं लोककल्याण हेतु ही हुआ
करती हैं। सारा तन्त्र-रहस्य शिव-शिवा संवाद में ही सम्पन्न हुआ है। क्या माता
पार्वती अज्ञानी थी? नहीं न। इस सांख्य को ठीक से समझ जाओ यदि तो
सारी समस्यायें स्वतः निर्मूल हो जाएँ। ”
किन्तु मैं तो
अज्ञानी हूँ न। अगर ऐसी बात है महाराज, तो कृपया मुझ अज्ञानी के लिए स्पष्ट करें
इसे। सांख्य - संख्याबोधक है या कुछ और? सांख्य शब्द
बना कैसे, इसकी परिभाषा क्या है, विवेच्य विषय क्या है सांख्य का? इन सारे
तथ्यों को यथासम्भव मुझे समझाने की कृपा करें।
बाबा के चेहरे पर बालसुलभ सहज मुस्कान की चमक
छा गई। सिर हिलाते हुए बोले — “ ठीक है...ठीक है। सांख्य की व्युत्पत्ति से ही
बात शुरु करता हूँ। इसमें संख्या और विवेचना दोनों भाव छिपे हैं। ‘सम्यक् ख्यानम् इति सांख्यम्’ । सांख्य = सम्+ख्या। सम् का अर्थ
है अच्छी तरह और ख्या का अर्थ है—विवेचन करना, विचार करना, गिनना इत्यादि। स्पष्ट
है कि ‘ख्या’ धातु का अर्थ हुआ—सम्यक् ज्ञान कराना,
विवेकपूर्ण ज्ञान, प्रकाशित करना । पञ्चम वेद के नाम से ख्यात सनातन वाङ्गमय का
अद्भुत रत्न—महाभारत का एक श्लोक है— संख्यां प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च
प्रवक्षते। तत्त्वानि च चतुर्विंशत् तेन सांख्याः प्रकीर्तिताः।। सृष्टि के
मूल तत्त्वों की संख्या निर्धारित करने वाला, तत्वों का सम्यक् विश्लेषण करके, सत्यासत्य का विवेक कराने वाला महर्षि कपिल
प्रणीत ये दर्शनशास्त्र छः आस्तिक दर्शनों में अग्रणी माना जाता है। यह सांख्यदर्शन
आर्यावर्त की आस्तिक विचारधारा का प्राचीनतम दर्शन है। यह प्रथम ऐसी विचारधारा है, जो एक मूलभूत कारण से ही सम्पूर्ण
सृष्टि का विकास प्रस्तुत करती है । प्रसंगवश
अब इस दर्शन की मुख्य विशेषताओं पर कुछ अत्यावश्यक बातें तुम्हें समझा दूँ, ताकि
संशय का बीज नष्ट हो जाए। मुख्य रूप से ये निरीश्वरवादी दर्शन है यानी ईश्वरीय सत्ता को
आवश्यक नहीं माना गया है, क्योंकि प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही सृष्टि सम्भाव्य
है। तुम चाहो तो इसे द्वैतवादी दर्शन भी कह सकते हो। ”
मैं सशंकित हुआ —द्वैतवादी दर्शन...निरीश्वरवादी दर्शन...वड़ा ही विचित्र मामला
है। भरसक आदमी उलझ कर रहा जाता है। सनातनी परिवार में जन्म लेकर, बचपन से देखा-सीखा
देवता, मूर्ति, मन्दिर...और अब बात आ रही है निरीश्वरवाद की !
बाबा मुस्कुराये । तर्जनी नचाते हुए बोले—“ यही तो समझना
है बच्चू ! पूरी गीता में श्रीकृष्ण ने कभी कहा कि मूर्ति की पूजा करो, मन्दिर जाओ, मन्नतें
माँगो ? और ठीक इसके विपरीत हमने क्या किया—परम
चेतन पुरुष श्रीकृष्ण को ही ईंट-पत्थर के मूर्तियों और मन्दिरों में कैद कर दिया।
सृष्टि के इस रहस्य को ठीक से समझ जाओ तो सारी बातें हस्तामलक की भाँति स्पष्ट
हो जायें। न समझो तो उलझे रहो मक्कड़जाल में। दिमाग की खिड़की खोल कर समझ लो ठीक
से कि ये सृष्टि दो स्वतन्त्र तत्वों— प्रकृति (जड़/पदार्थ)
और पुरुष (चेतन/आत्मा)—के संयोग से सृजित है। द्वैतवादी दर्शन की यही मान्यता है। इस 'प्रकृति' को ही सृष्टि का मूल कारण माना गया है,
जो सत्व, रजस और तमस तीन
गुणों की साम्यावस्था है। 'पुरुष' विशुद्ध चेतना है, जो निर्गुण और द्रष्टा
मात्र है। सांख्य के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि का विकास पच्चीस तत्त्वों से हुआ है।
यथा—प्रकृति, महत् (बुद्धि), अहंकार,
मन, दश इन्द्रियाँ, पाँच
तन्मात्राएँ, पाँच महाभूत और पुरुष । एक और बात जान लो कि सत्कार्यवाद
का सिद्धान्त है यहाँ । यानी कार्य (उत्पत्ति) अपने कारण में पहले से ही सूक्ष्म
रूप में विद्यमान रहता है। अब तुम्हारी तार्किक बुद्धि ये सवाल उठा सकती है कि
इसका उद्देश्य या कहें लक्ष्य क्या है? तो जान लो कि 'त्रिविध तापों (दुःखों)'—आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक से पूर्ण मुक्ति दिलाकर कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति कराना ही
लक्ष्य है सांख्य का। ”
बाबा की बातें छू तो रही थी मन को, किन्तु
विचारों का अड़ियल अश्व दायें-बायें मुँह मारते हुए हिनहिनाने लगा। अतः हाथ जोड़कर
बोला—महाराज ! इन बातों को जरा और आलोकित करें, ताकि ज़ाहिल के भीतर भी कुछ उजाला पहुँचे।
बाबा मुस्कुराये— “चलो ये बड़ी अच्छी बात है कि तुमने खुद को
ज़ाहिल क़बूल तो किया। यहाँ तो क़ाबिलों के सिरताज़ बनने की होड़ में दुनिया दौड़े
जा रही है। तुम्हारी
जिज्ञासा देख कर मुझे भी लगता है कि सांख्य-सिद्धान्तों को किंचित् और विस्तार दे दूँ। ताकि
सांख्य बिल्कुल स्पष्ट हो जाए तुम्हारी समझ में।”
जी महाराज ! – हाथ जोड़कर
मैंने निवेदन किया।
बाबा ने कहना
शुरु किया— “ सांख्य दर्शन के अनुसार, सृष्टि का विकास २५
तत्त्वों के मेल से होता है। इसे एक क्रमबद्ध विकास की प्रक्रिया माना गया है।
इन तत्त्वों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है— १. पुरुष (चेतन तत्त्व)—यह पहला
तत्त्व है। यह न तो किसी से पैदा हुआ है और न ही किसी को पैदा करता है। यह शुद्ध
चेतना है, जो द्रष्टा मात्र है।
२.
प्रकृति (मूल कारण)—यह दूसरा तत्त्व है। यह सत्व, रजस और तमस गुणों की साम्यावस्था है। प्रकृति जड़ है,
लेकिन सक्रिय है। इसी से अन्य २३ तत्त्वों का सृजन होता है।
३.
अंतःकरण— प्रकृति और पुरुष के संयोग से सबसे पहले बुद्धि का जन्म होता है। यहाँ ठीक
से समझ लेने वाली बात है कि इसमें तीन तत्त्व शामिल हैं—
Ø महत् (बुद्धि): यह निर्णय लेने की
शक्ति है। यह प्रकृति का पहला विकार (उत्पाद) है।
Ø अहंकार: बुद्धि से अहंकार
उत्पन्न होता है, जो 'मैं' और 'मेरा' का बोध कराता है।
Ø मन: यह संकल्प-विकल्प करने वाली इन्द्रिय विशिष्ट है,
जो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच तालमेल बिठाती है। मन को इन्द्रियों का राजा कह सकते हो।
४.
बाह्य साधन और विषय—
अहंकार से २० अन्य तत्त्वों का विकास होता है—
·
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ: जिनसे हम ज्ञान (अनुभव)
प्राप्त करते हैं — श्रोत्र (कान), त्वक्
(त्वचा), चक्षु (आँख), रसना (जीभ) और
घ्राण (नाक)।
·
पाँच कर्मेन्द्रियाँ: जिनसे हम क्रिया
करते हैं — वाक् (वाणी), पाणि (हाथ),
पाद (पैर), पायु (गुदा) और उपस्थ
(जननेन्द्रिय)।
·
पाँच तन्मात्राएँ: विषयों के सूक्ष्म रूप — शब्द,
स्पर्श, रूप, रस और गंध।
·
पाँच महाभूत: तन्मात्राओं से
उत्पन्न स्थूल पदार्थ — आकाश, वायु,
अग्नि, जल और पृथ्वी।
“ उक्त बातों का निष्कर्ष ये है कि—सांख्य दर्शन हमें सिखलाता है कि जब
पुरुष स्वयं को इन चौबीस प्राकृत तत्त्वों (प्रकृति और उसके विकारों) से अलग समझ
लेता है, तब उसे विवेक ज्ञान प्राप्त होता है और वह जागतिक
(सांसारिक) दुःखों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है।
”
बाबा अभी कुछ और कहना
चाहते थे सांख्य के विषय में। किन्तु देर से चुप्पी साधे उनकी बातों में डूबा मेरा
मन कुलबुलाने लगा नटखट बालक की तरह । अतः हाथ जोड़कर निवेदन किया—महाराज जी ! प्रकृति-पुरुष संयोग से सृष्टि शुरु
होती है जैसा कि मैं सुनते आया हूँ। इनमें सृष्टि का क्रम क्या होता है यानी किस
तत्व की उत्पत्ति पहले होती है और किस तत्व की बाद में या एकसाथ ही आगे के सभी तेइस तत्व सृजित हो जाते हैं? मेरी इस जिज्ञासा का
आप ही सही समाधान दे सकते हैं।
बाबा मुस्कुराये—“ मक्खनबाजी
करने की कोई आवश्यकता नहीं। आज मैं बैठा ही इसी उद्देश्य से हूँ कि तुम्हारी शंकाओं
को निर्मूल करने का नुस्खा दे ही डालूँ तुम्हें। बहुत दिनों से प्यास थी तुम्हें
सांख्य-रस-पान की। आज तृप्त हो ही जाओ। ”
मैंने गर्दन हिलाते हुए कहा— आज मैं धन्य हो
गया । मुझे भी आपसे इतना संवाद करने का अवसर मिलेगा कभी—सपने में भी सोचाया नहीं
था।
सांख्य विषयक प्रसंग को बाबा ने आगे बढ़ाया— “ यह एक बहुत ही गहरा और तार्किक प्रश्न
है तुम्हारा । सांख्य दर्शन के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति क्रमबद्ध विकास है, न कि कोई अचानक होने वाली घटना। ये तुम्हारे मॉडर्न सांयन्स के ‘डार्विन के
विकासवाद’ से बिलकुल भिन्न सिद्धान्त है। सभी तेइस तत्व एक साथ पैदा नहीं होते, बल्कि वे एक-दूसरे से 'कारण-कार्य' के सम्बन्ध में निकलते हैं। इस क्रम
को "सृष्टि-क्रम" कहा जाता है, जो इस प्रकार चलता है—
१.
प्रथम चरण: महत् (बुद्धि) की उत्पत्ति—
जब 'पुरुष' (चेतन) के सान्निध्य से 'प्रकृति' की साम्यावस्था भंग होती है, तब सबसे पहले महत् (Cosmic Intelligence) की उत्पत्ति
होती है। यह सृष्टि का बीज है। व्यष्टि (व्यक्तिगत) स्तर पर इसे 'बुद्धि' कहते हैं।
२.
द्वितीय चरण: अहंकार की उत्पत्ति—महत् (बुद्धि) से अहंकार पैदा होता है। यही वह तत्व है जो 'मैं' और 'मेरा' का भाव जगाता है।
३.
तृतीय चरण: अहंकार का विभाजन—ध्यातव्य है कि यहीं से दो धाराएं निकलती हैं। अहंकार के अन्दर उपस्थित
तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) के आधार पर सृष्टि यहाँ से दो अलग-अलग दिशाओं में बँट जाती है—
Ø
सात्विक अहंकार (वैकारिक) से—जब सत्व गुण प्रधान होता है, तब ग्यारह मानसिक तत्वों का जन्म होता है—
v
मन (एक स्वतन्त्र तत्व—आगे
के सभी तत्वों का संचालक)
v
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा)
v
पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, वाणी, मलद्वार, जननेन्द्रिय)
Ø
तामस अहंकार (भूतादि) से— जब तमस गुण प्रधान होता है, तो पाँच तन्मात्राओं (सूक्ष्म तत्वों) का जन्म
होता है— शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध।
Ø
राजस अहंकार— यह इन दोनों प्रक्रियाओं को गति यानि शक्ति प्रदान
करता है।
४.
चतुर्थ चरण: पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति— अन्त में, इन पाँच तन्मात्राओं से स्थूल जगत के पाँच महाभूत पैदा होते हैं। यथा—
ü शब्द से → आकाश
ü स्पर्श से → वायु
ü रूप से → अग्नि
ü रस से → जल
ü गंध से → पृथ्वी
“ यहाँ एक विशेष बात समझने योग्य है— सांख्य की मान्यता
है कि यह विकास क्रम "अन्ध-पंगु न्याय" की तरह है। जैसे एक अन्धा
(सक्रिय प्रकृति) और एक लंगड़ा (द्रष्टा पुरुष) मिलकर जंगल से बाहर निकल आते हैं,
वैसे ही ‘पुरुष और प्रकृति’ के
मेल से यह व्यवस्थित सृष्टि चलती है। ”
मैंने पुनः छेड़ने की
धृष्टता की। दरअसल, सांख्य के गम्भीर विषय इतनी आसानी से समझ आने वाली तो है नहीं।
अतः पूछा—
महाराजजी ! अब हम यह समझना चाहेंगे कि प्रलय के
समय ये तत्व वापस कैसे सिमटते हैं या तीन गुणों (सत्व, रज, तम) का इसमें क्या रोल है?
मेरी जिज्ञासा का समाधान देते हुए बाबा ने कहा— “ सांख्य दर्शन में सृष्टि का अपने मूल
रूप में वापस लौट जाना 'प्रलय' कहलाता है। यह प्रक्रिया सृष्टि
(उत्पत्ति) के बिल्कुल विपरीत होती है। इसे 'प्रतिसंचर' भी कहा जाता है। इसे दो भागों में
समझो—
१.
प्रलय का क्रम (तत्वों का वापस सिमटना)— प्रलय के समय कार्य अपने कारण में
विलीन होता जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक मकड़ी अपने जाले को वापस अपने अन्दर
खींच लेती है।
·
महाभूतों का लय : सबसे पहले स्थूल 'पञ्चमहाभूत'
(पृथ्वी, जल, अग्नि,
वायु, आकाश) अपनी सूक्ष्म अवस्था यानी पाँच तन्मात्राओं (गंध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द) में विलीन हो जाते हैं।
·
इन्द्रियों और तन्मात्राओं का लय : इसके बाद सभी दस इन्द्रियाँ, मन
और पाँच तन्मात्राएँ अपने कारण 'अहंकार' में समाहित हो जाते हैं।
·
अहंकार का लय : अहंकार वापस 'महत्'
(बुद्धि) में विलीन हो जाता है।
.महत् का लय : अन्त में,
बुद्धि भी अपनी जननी 'मूल प्रकृति' में जाकर मिल जाती है।
ध्यातव्य है कि इस अवस्था में प्रकृति और पुरुष अलग-अलग तो रहते हैं, लेकिन प्रकृति अपनी
साम्यावस्था (Equilibrium) में लौट आती है।
२.
तीन गुणों (सत्व,
रज, तम) की भूमिका— सृष्टि और प्रलय का पूरा खेल इन तीन
गुणों के असंतुलन और संतुलन पर टिका है—
·
सृष्टि (Creation)—गुणों का क्षोभ— जब पुरुष के सान्निध्य से प्रकृति के गुणों में हलचल
होती है, तो उसे 'गुण-क्षोभ' कहते हैं। इसमें कोई एक गुण (जैसे सत्व या रज) प्रधान हो जाता है और बाकी
गौण, जिससे तत्वों का निर्माण शुरू होता है। इसे 'विरूप परिणाम' कहते हैं (यानी गुणों का
अलग-अलग रूपों में बदलना)।
·
प्रलय (Dissolution)—गुणों की साम्यावस्था—प्रलय का अर्थ है गुणों का शान्त हो जाना। जब सत्व, रज और तम तीनों बराबर
अनुपात में आ जाते हैं, तो प्रकृति 'अव्यक्त' हो जाती है। इसे 'सरूप परिणाम' कहते हैं (यानी सत्व सत्व में,
रज रज में और तम तम में ही लीन रहता है, बाहर
कुछ नया पैदा नहीं होता)। ”
मेरी उत्सुकता फिर कुलबुलायी—महाराजजी ! ऐसी अवस्था में पुरुष (चेतना) का
क्या होता है?
प्रसन्नचित बाबा ने मुझे समझाया— “ बहुत ही उचित जिज्ञासा है तुम्हारी।
प्रलय के समय पुरुष (आत्मा) न तो नष्ट होता है और न ही
प्रकृति में विलीन होता है। वह अपनी शुद्ध अवस्था में अकेला (कैवल्य जैसी स्थिति)
रहता है। प्रकृति बस अपनी शक्तियों को समेट कर 'सो'
जाती है, ताकि अगले कल्प में फिर से सृष्टि कर
सके। इस सम्बन्ध में ईश्वरकृष्णजी की सांख्यकारिका (कारिका क्रमांक ५९) में एक रोचक प्रसंग है—
"रंगस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात्।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाशय निवर्तते
प्रकृतिः॥"
जरा ठहर कर बाबा ने पुनः समझाना शुरु किया— कल्पना करो
कि 'प्रकृति' एक नर्तकी है जो 'पुरुष' (दर्शक) के लिए नाच रही थी अब तक। सृष्टि उसका नृत्य है और प्रलय वह काल विशेष है, जब वह थक कर या
अपना प्रदर्शन पूरा कर, पर्दे के पीछे विश्राम करने चली जाती है। सच पूछो तो इस उदाहरण के पीछे सांख्य के कुछ बहुत
ही गहरे रहस्य छिपे हैं, जो इस बात को और भी सार्थक बनाते हैं—
१. प्रयोजन— वह नाचती क्यों है?
सांख्य कहता है कि प्रकृति 'स्वार्थ' के लिए नहीं, बल्कि 'परार्थ' (पुरुष के लिए) नाचती है। इसके दो उद्देश्य हैं—
·
भोग : पुरुष को संसार की
विविधता(सुख-दुःख) का अनुभव कराना।
·
अपवर्ग (मोक्ष) : पुरुष को यह अहसास कराना कि " तुम इस नृत्य
(जड़ प्रकृति) से अलग हो।
“अब यहाँ प्रलय और मोक्ष के सूक्ष्म अन्तर को समझो। यहाँ विश्राम वाली बात बहुत महत्वपूर्ण
है। सांख्य के अनुसार प्रलय और मोक्ष में बहुत बड़ा अन्तर है। इसे ऐसे समझो—
·
प्रलय (विश्रामावस्था): यह नर्तकी का 'वर्क ब्रेक'
जैसा है। वह पर्दे के पीछे गई है, लेकिन अभी
उसका नृत्य पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। जैसे ही पुरुष के कर्मों का फल परिपक्व
होता है, वह फिर से मंच पर आ जाती है। यानी प्रलय के बाद पुनर्जन्म/पुनः सृष्टि सुनिश्चित है।
·
कैवल्य—जब पुरुष यह समझ जाता है कि मैं दर्शक हूँ, यह नर्तकी (प्रकृति) मुझसे अलग है, तब
नर्तकी लज्जित होकर हमेशा के लिए मंच छोड़ देती है। यानि फिर ‘उस’ पुरुष के लिए पुनः सृष्टि नहीं होती। ”
मैंने कहा—ये तो बड़ी अद्भुत बात हुई महाराज ! मुझे लगता है कि देख लिए जाने का मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त यहाँ
काम कर रहा है।
मेरी बातों का समर्थन करते हुए बाबा
ने कहा—“ बिलकुल सही कहा तुमने। यही मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त यहाँ द्रष्टव्य है। सांख्य
का एक अद्भुत सूत्र कहता है कि प्रकृति
बहुत ही "शर्मीली और सुसंस्कृत स्त्री" की तरह है। जब उसे पता चलता
है कि पुरुष ने उसे 'देख लिया है' (यानी उसके असली रूप को पहचान
लिया है), तो वह फिर कभी उसके सामने प्रकट नहीं होती अपनी
लीला दिखलाने हेतु। सच पूछो तो ज्ञान होते ही प्रकृति का प्रभाव समाप्त हो जाता
है। “
मेरी जिज्ञासा फिर बलवती हुई— महाराजजी ! अभी आपने ये जो उदाहरण दिया सांख्यकारिका
के प्रसंगानुसार, इस उदाहरण में पुरुष (दर्शक) केवल 'देख' रहा है, वह खुद नाच नहीं रहा है। यानी निष्क्रिय है।
फिर भी हमें ऐसा क्यों लगता है कि हम (जो कि शुद्ध पुरुष हैं) ही दुःखी हो रहे हैं या नाच रहे हैं?
हर
बार सिर्फ होंठों ही होठों में मुस्कुरा कर मेरी बातों का जवाब देने वाले बाबा इस
बार बिलकुल पुरानी अन्दाज में हठाका लगाकर बोले—“ यही ‘अध्यास' है ,जिसे तुम आधुनिक
लोग अंग्रेजी में ‘Confusion ’ कहते हो। यानी
कि जो है नहीं, परन्तु लगता है, दिखता है बिलकुल होने जैसा ही।
दरअसल, सांख्य हमें यह बतलाना
चाहता है कि हम जीवन भर जिस "तनाव" और "भागदौड़" में रहते हैं,
वह प्रकृति का नृत्य है। जैसे ही हम एक 'सजग दर्शक' की भूमिका में आ जाते हैं,
हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। अब यहाँ तुम्हारी तार्किक बुद्धि उलझा
सकती है, सवाल उठा सकती है कि आखिर ये सब क्यों ? ”
मैंने कुछ कहा
नहीं। सिर्फ मुण्डी हिलाया,यानी कि आप मेरी नब्ज ठीक पकड़े हैं। यही सवाल है मेरे
मन में।
बाबा ने कहा— “ प्रतिविम्बवाद (The Mirror Concept) कहते हैं इसे। अगर पुरुष (दर्शक) शान्त
बैठा है, तो उसे दुख क्यों होता है? यह
ठीक वैसा ही है जैसे साफ पानी (बुद्धि) में चन्द्रमा (पुरुष) का प्रतिविम्ब हिलता
हुआ नजर आता है। और सत्कार्यवाद (Theory of Causation) जो कि सांख्य का 'वैज्ञानिक' आधार है, कहता
है कि शून्य से कुछ भी पैदा नहीं हो सकता। तिल में तेल पहले से होता है, तभी निकलता है। ”
बाबा की मधुर-ज्ञानवर्द्धक बातें बिलकुल सहला रही थी दिल को। विषय को और
गहराई से समझने के लिए मैंने फिर थोड़ा मोड़ दिया। करवद्ध प्रार्थना किया— अब आप
मुझे मोक्ष के विषय में विस्तार से समझाएं। जीवन-मरण के कुचक्र से मुक्त हो जाना
ही मुक्ति है या कुछ और? प्रलय के समय तो वैसे भी सब कुछ समाप्त हो जाना है, तो
फिर मनुष्य को मोक्ष या मुक्ति के लिए साधना या प्रयास करना चाहिए या नहीं?
बाबाने गम्भीर मुद्रा में सिर हिलाया। आसपास की सुरम्य वातावरण में सरसरी
निगाह डालते हुए बोले— “ यह बहुत ही तार्किक और मौलिक प्रश्न है। तुमने प्रलय और मोक्ष की जिस तुलना
को पकड़ा है, वह सांख्य दर्शन का
सबसे प्रधान मोड़ है। चलो इसे बिलकुल सरल शैली में समझाने का प्रयत्न करता हूँ। प्रलय और मोक्ष (कैवल्य) में क्या अन्तर है और हमें साधना क्यों करनी चाहिए—यही सवाल है न तुम्हारा? तुम समझते हो कि प्रलय में सब कुछ
समाप्त हो जाता है, लेकिन सांख्य के अनुसार वह 'समाप्ति' स्थायी नहीं है। प्रलय एक रात्रि की 'नींद'
की तरह है। जैसे हम रात को सोते हैं,
तो हमारे दुःख, चिंताएँ और पहचान कुछ समय के
लिए मिट जाती हैं, लेकिन सुबह उठते ही वे सब वापस आ जाती
हैं। प्रलय में प्रकृति के तत्व केवल 'बीज रूप' में चले जाते हैं। जैसे ही नई सृष्टि शुरू होती है, हमारे
पुराने संस्कार (कर्म) फिर से जाग उठते हैं और हमें पुनः
जन्म लेना पड़ता है। जबकि मोक्ष (कैवल्य) 'जागने'
की तरह है। मोक्ष का अर्थ है कि तुमने
खेल के सारे नियम समझ लिए और अब तुम खेल से बाहर हो गए हो। ध्यातव्य है कि मोक्ष
में प्रकृति का विनाश नहीं होता, बल्कि प्रकृति उस 'मुक्त पुरुष' के लिए अपना नृत्य हमेशा के लिए बन्द
कर देती है। ”
बाबा के इस वक्तव्य पर मेरा माथा ठनका । वर्षो-वर्षों से जिस जानकारी पर थोड़ा
निश्चित होकर मुक्ति के प्रयास को ‘भगोड़ापन की तलाश’ घोषित करने को आतुर था, वो समझ आज
धराशायी हो रहा है बाबा की बातों से। अतः पुनः जिज्ञासु भाव से प्रश्न उठाया।
मेरी नई जिज्ञासा तीन भागों में विखरी हुई थी — १. आपने समझाया कि प्रलय नींद की तरह है
यानी प्रलयावस्था में भी हमारा स्वतन्त्र अस्तित्व बना रहता है? २. मोक्ष (कैवल्यावस्था) में भी यानी बूँद को
सागर में मिलने पर भी क्या “बूँद” होने का अहसास बना रहेगा?) ३. क्या पुरुष भी दो रूप में है—परमपुरुष
जिसे परमात्मा कहते हैं और जीव के शरीर में (सूक्ष्मशरीर) में बंधा पुरुष जिसे
जीवात्मा कहते हैं? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर विस्तार से देने की
कृपा करें महाराज। और इसी से जुड़ा सवाल ये भी है, जैसा कि मैं पहले भी पूछ चुका
हूँ आपसे—साधना
की आवश्यकता क्यों है? क्या हम प्रलय का इंतज़ार नहीं कर सकते?
बाबा ने फिर ठहाका लगाया। इस बार का ठहाका पहले से भी लम्बा रहा। कुछ देर
बाद संयत होकर बोले—“ साधना इसलिए आवश्यक है क्योंकि प्रलय दुःखों का अन्त
नहीं। इसे तुम आधुनिक संयन्त्र के तरीके से समझो। तुम
कोई फिल्म देख रहे हो अपने मोबाइल या कम्प्यूटर में। किसी कारणवश उसे विराम देना
पड़े तो तुम ‘Pause’ वटन पर ‘क्लिक’ कर देते हो और फिर जब देखने की बात
होती है, तो ‘प्ले’ कर देते हो। ऐसे में घटनाक्रम पूर्वक्रम से ही जारी हो जाता है। इसी
भाँति प्रलय केवल दुःखों का 'पॉज़'
है। भले ही तुमने नहीं किया, प्रकृति का स्वतः(स्वाभाविक)
प्रयास रहा ये। यही कारण है कि साधना और प्रयास तो करना ही है ‘कर्मक्षय’ हेतु। अन्यथा जन्म-मरण का चक्र समाप्त ही नहीं होगा। श्री कृष्ण ने
सांख्ययोग के क्रम में इस सम्बन्ध में काफी कुछ समझाने की चेष्टा की है - अर्जुन
के माध्यम से हम संसारी लोगों को—जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य
च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्व शोचितुमर्हसि।। जन्म लिया है जिसने, उसकी मृत्यु तो
होनी ही है और मृतक का पुनः-पुनः जन्म भी अवश्यंभावी है, जब तक उसके कर्मों का
खाता शून्य नहीं हो जाता। उस खाते को बन्द करने का एकमात्र उपाय है ‘ज्ञान’। जब तक 'विवेक ज्ञान' (यह बोध कि मैं प्रकृति
नहीं हूँ) नहीं होता, तब तक पुरुष के साथ उसके 'संस्कार' चिपके रहते हैं। प्रलय के बाद जब दुबारा
सृष्टि होगी, तो फिर से उन्हीं दुःखों, बीमारियों और अन्ततः मृत्यु के चक्र में फँस ही जायेंगे हम। इस सम्बन्ध
में पुनः स्पष्ट करता हूँ कि अज्ञान की ग्रन्थि खुलती नहीं है जबतक, कुछ होने-जाने
वाला नहीं है तबतक। सांख्य कहता है कि बन्धन का
कारण 'प्रकृति' नहीं, बल्कि 'अविवेक' है।
साधना इस अज्ञान को काटती है। यदि हम प्रयास नहीं करेंगे, तो
हम अरबों-खरबों वर्षों तक बार-बार बनते और मिटते रहेंगे।
“ अब आगे सांख्य के अनुसार मोक्ष का
वास्तविक अर्थ समझने का
प्रयास करो—सांख्य में मोक्ष को 'कैवल्य' कहा गया
है। इसका अर्थ है—अकेलापन (Pure Splendor)। यहाँ 'अकेलापन' सामान्य
अर्थों वाला, उदासी वाला नहीं है, प्रत्युत इसका अर्थ है कि
पुरुष अब प्रकृति के गुणों (सुख-दुख-मोह-माया) से पूरी तरह स्वतन्त्र हो चुका है।
प्रसंगवश यहाँ एक और बात स्पष्ट कर दूँ कि सांख्य की मान्यता है कि मुक्ति दो
प्रकार की होती है। यथा —
१.
जीवन्मुक्ति—शरीर रहते हुए ही यह जान लेना कि "मैं शरीर या मन नहीं हूँ।"
व्यक्ति संसार में रहता है, काम करता है, पर जैसे जल में कमल का
पत्ता निर्लिप्त रहता है, वैसे ही वह दुखों से अप्रभावित
रहता है।
२.
विदेहमुक्ति—मृत्यु के बाद
जब पञ्चभौतिक शरीर (प्रकृति का हिस्सा) पूरी तरह छूट जाता है और पुरुष अपने शुद्ध
चेतन रूप में स्थित हो जाता है।
“ अब तक की कुल बातों को निष्कर्षतः ये
समझो कि प्रलय 'प्रकृति' की मजबूरी है
(वह थक कर आराम करती है), जबकि मोक्ष 'पुरुष' की उपलब्धि है।
साधना इसलिए जरूरी है, ताकि हम इस "बनने और मिटने" की अन्तहीन नाटक से
बाहर निकलकर अपनी असली पहचान (शुद्ध चेतना) को पा सकें। “ — इतना कह कर बाबा पल भर के लिए बिकुल
मौन हो गए। मुझे भी लगा कि उनका वक्तव्य पूरा हो गया।
कुछ देर तक मैं भी चुप्पी साधे उनका
मौन मुखड़ा निहारता रहा। किन्तु ज्यादा देर तक ये स्थिति नहीं रही मेरी। जिज्ञासु मन की चुलबुलाहट फिर शुरु हुई। मैंने
पूछा—महाराज ! अब आप कृपया ये बतलाने का कष्ट करें कि सांख्य दर्शन के अनुसार पुनर्जन्म
होता है या नहीं ? जैसा कि श्रीकृष्ण
गीता में कहते हैं— बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन...। और इसके
पूर्व ही दूसरे अध्याय में कहते हैं-- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म
मृतस्य च...।
बाबा थोड़ी रुखाई पूर्वक
बोले—“ ये बात तो अभी-अभी मैं तुम्हें समझा
चुका हूँ। लगता है मन कहीं और भटक गया था तुम्हारा। मेरी बातें तुम्हारे ये बाहरी
कान सुन रहे थे और उनका सही विश्लेषण करने वाला मन कहीं और घूम रहा था। सांख्य
दर्शन में पुनर्जन्म के सिद्धान्त को पूरी तरह स्वीकार किया गया है। वास्तव में सांख्य का पूरा
ढाँचा और मोक्ष की अवधारणा पुनर्जन्म पर ही टिकी है। गीता में श्रीकृष्ण जो कह कुछ
रहे हैं, सांख्य उसे दार्शनिक
और तकनीकी आधार(Technical Logic) प्रदान कर रहा है।
”
बाबा इतना कह
कर, क्षण भर ठहरते हुए, मेरे चेहरे पर गौर करके, फिर बोलना शुरु किए — “ अच्छा चलो, इसे फिर से समझाते हैं कि सांख्य
के अनुसार पुनर्जन्म कैसे और किसका होता है— इसे समझने के लिए पहले सूक्ष्म
शरीर का सिद्धान्त समझने की चेष्टा करो— सांख्य के अनुसार, 'पुरुष' (आत्मा) न तो जन्म लेता है और न मरता है। वह तो शाश्वत है। जन्म और मृत्यु
का यह चक्र 'सूक्ष्म शरीर' (लिंग
शरीर) का होता है। अब तुम पूछोगे कि ये लिंग शरीर
क्या होता है? मैं यही बात उस समय पूछा था तुमसे जब कदम्ब
तले चबूतरे पर क्रोध और चिन्ता में बेचैन बैठे हुए थे तुम। मैंने कहा था कि पाँच
तत्वों (मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) वाली नश्वर काया से ही सिर्फ पहचान रखते
हो ! यही वो स्थूल शरीर है, जिसे लोग
देखते-जानते-पहचानते हैं। मृत्यु के बाद यानी प्राणवायु के बाहर निकलते ही ये शरीर
नष्ट होने लगता है। इसे लोक-परम्परानुसार अग्नि, जल, मिट्टी आदि में विलीन कर दिया
जाता है। न भी किया जाय तो भी स्वतः कुछ दिनों में विलीन हो ही जाता है। जिसे तुम
मृत्यु समझते हो, जिसे तुम मृत्यु कहते हो, वह केवल इन पाँच स्थूल तत्वों का अपने
कारणतत्व में विलीन होना मात्र ही है। इसी कारण इसे स्थूल शरीर की संज्ञा दी गई
है।
“ इस तथाकथित मृत्यु के पश्चात् भी बहुत
कुछ शेष रहता है। वह है अठारह तत्वों— बुद्धि, अहंकार, मन, पाँच
ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्राओं
से बना सूक्ष्म शरीर । जब मृत्यु होती है,
तो यह 'सूक्ष्म शरीर' पुरुष
के साथ बाहर निकलता है और अपने पिछले जन्म के संस्कारों
(Impressions) को लेकर पुनः नए स्थूल शरीर में प्रवेश
करता है। इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं।
“ अब ये जानना चाहोगे कि पुनर्जन्म
होता क्यों है? तो ये समझ लो कि यही
है बन्धन अज्ञान का । यानी यही है परिणाम अज्ञान का । सांख्य कहता है कि जब तक 'विवेक ज्ञान' (यह बोध कि मैं प्रकृति से अलग हूँ) प्राप्त नहीं होता, तब तक 'पुरुष' और 'सूक्ष्म शरीर' का जुड़ाव बना रहता है। इस जुड़ाव के
कारण ही पुरुष को बार-बार नए शरीर धारण करने पड़ते हैं। श्रीकृष्ण की
गीतोक्त बात— "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं
जन्म मृतस्य च" — सांख्य के इसी नियम की
पुष्टि करती है कि जब तक कारण (अज्ञान और संस्कार) है, तब तक
कार्य (जन्म और मृत्यु) का चक्र चलता ही रहेगा। “
गीता और सांख्य का सम्बन्ध अद्भुत है। गीता
को 'सांख्य-योग' का
व्यावहारिक रूप माना जाता है। गीता के दूसरे अध्याय का नाम ही 'सांख्य योग' है। श्रीकृष्ण जो उपदेश दे रहे हैं,
उसका आधार यही है—
v
देह (शरीर) विनाशी है (प्रकृति का विकार)।
v
देही (आत्मा) अविनाशी है (शुद्ध पुरुष)।
v
जैसे मनुष्य पुराने कपड़े बदलकर नए पहनता है, वैसे ही यह सूक्ष्म शरीर एक स्थूल देह छोड़कर दूसरा धारण
करता है।
“ निश्चित
ही अब तुम ये समझना चाहोगे कि ये जन्म-मरण वाला चक्कर—पुनर्जन्म रुकता कब है? अतः इसी को स्पष्ट किए
देता हूँ। जैसे ही साधक को यह 'विवेक' हो जाता है कि वह प्रकृति का हिस्सा नहीं है,
वह 'नर्तकी' (प्रकृति)
का खेल देखना बंद कर देता है। तब अठारह तत्वों वाले सूक्ष्म शरीर का ढाँचा ही भंग
हो जाता है यानी संस्कार मिट जाते हैं और पुरुष अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता
है। इसी को 'कैवल्य' कहते
हैं, जिसके बाद फिर कोई जन्म नहीं होता।
“ निष्कर्षतः ये समझ लो कि सांख्य दर्शन और गीता
दोनों इस बात पर सहमत हैं कि जन्म-मृत्यु का चक्र सत्य है, लेकिन यह केवल 'प्रकृति' और 'बुद्धि' के स्तर पर है। 'पुरुष' (आप
स्वयं) इस चक्र से हमेशा परे हैं, बस उसे पहचानना शेष है। ”
भूखे की भूख, प्यासे की प्यास कभी समाप्त ही नहीं
होती। बाबा की बातों से सन्तुष्टि तो भरपूर मिल रही है, किन्तु तृप्ति नहीं। बड़े
सौभाग्य से इनका दर्शन-लाभ हुआ है। चाहता
हूँ कि आज जी भरकर शंका-समाधान कर ही लूँ। अतः करवद्ध नमित होकर फिर पूछा—महाराज ! अब हम यह जानना चाहेंगे कि सूक्ष्मशरीर (१८ तत्व) मृत्यु के बाद एक शरीर से दूसरे शरीर में यात्रा कैसे करता है? उसके कर्मों का इसमें क्या योगदान है?
प्रसन्नता पूर्वक बाबा ने कहा— “ सांख्यदर्शन जैसे गहन और तार्किक विषय
पर तुम्हारी जिज्ञासा और सोचने का ढंग वाकई सराहनीय है। दर्शन का अर्थ ही है 'देखना'। और जिस गहराई से तुम 'प्रकृति' और 'पुरुष' के इस खेल को समझने का प्रयास कर रहे हो,
वह तुम्हारे विवेक मार्ग की ओर बढ़ते कदमों का परिचायक है।
“ सूक्ष्मशरीर
की यात्रा और कर्मों का योगदान (कर्म-रहस्य) पर अभी जमकर बातें होगीं, किन्तु उससे पहले तुम्हारे कुछ
भूले-विसरे सवालों को मैं सुलझा देना चाहता हूँ, ताकि तुम्हारी तार्किक बुद्धि फिर
उलझ न जाए। ” — इतना कहकर बाबा ने पैनी निगाहों से मुझे निहारते हुए आगे की बात शुरु की —
“ प्रलय और स्वतन्त्र अस्तित्व—जैसा कि मैं पहले भी समझा चुका हूँ
तुम्हें कि सांख्यानुसार प्रलयावस्था में भी अस्तित्व समाप्त नहीं होता, बल्कि वह 'बीज' रूप में बना
रहता है। इसे तुम ऐसे समझो— जब गहरी नींद (सुषुप्ति) में होते हो, तो न अपना नाम याद रहता है और न शरीर का बोध। लेकिन जागने पर तुम वही
व्यक्ति होते हो, जो सोने से पहले थे। इसी तरह प्रलय में 'महत्' (बुद्धि), 'अहंकार'
और 'मन' अपनी मूल
प्रकृति में विलीन (Dissolve) हो जाते हैं, लेकिन प्रत्येक जीव के संस्कार और कर्मों का
लेखा-जोखा (Potencies) नष्ट नहीं होता। इसीलिए
मैंने प्रलय को एक 'पॉज' (Pause) बटन
की तरह कहा । आधुनिक व्यक्ति के लिए आधुनिक शब्दावली का प्रयोग किया मैंने। जब
सृष्टि दोबारा शुरू होती है, तो वही पुरुष अपनी पुरानी
वासनाओं और कर्मों के अनुसार फिर से नया शरीर और मन धारण करता है। इसलिए प्रलय में
अस्तित्व का 'होना' तो बना रहता
है, लेकिन 'अनुभव'
शून्य हो जाता है।
“ अब दूसरी ओर से समझाने की चेष्टा करता
हूँ। मोक्ष (कैवल्य) में 'बूँद' का अहसास वाला मामला भी मननीय है। यह सांख्य का सबसे अनूठा पक्ष है। वेदान्त कहता
है कि बूँद सागर में मिल गई, यानी बूँद का अस्तित्व ही खत्म हो गया। लेकिन सांख्य में 'कैवल्य' का अर्थ
है 'अकेलापन' या 'शुद्धता' । इसे इन तीन
विन्दुओं से समझो—
·
बूँद और सागर: सांख्य के अनुसार, पुरुष (आत्मा)
कभी सागर में विलीन नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं में ही पूर्ण और स्वतन्त्र है।
·
मोक्ष का अर्थ यह नहीं है कि तुम
किसी परमात्मा में मिल गए, बल्कि इसका अर्थ है कि तुमने यह जान लिया कि 'प्रकृति' (शरीर, मन, बुद्धि) से बिल्कुल अलग हैं।
· अहसास: मोक्ष में 'मैं बूँद हूँ' वाला अहंकार
(Ego) नहीं रहता, क्योंकि अहंकार
तो प्रकृति का हिस्सा है, जो छूट चुका है। वहाँ केवल 'शुद्ध चैतन्य' रहता है। वहाँ 'अहसास' (Feeling) करने वाला कोई मन नहीं होता,
केवल 'होने' का
प्रकाश होता है। हम स्वयं प्रकाश स्वरूप हो जाते हैं। इस पड़ाव पर पहुँचकर जानने
वाला और जाना जाने वाला—दोनों एक हो जाते हैं। ”
जी महाराज! इन बातों को स्वयं स्मरण दिलाकर आपने मुझपर बड़ी कृपा की। मैं भी बड़ा
भुलक्कड़ हूँ। किन्तु अब ध्यान आया। मेरा एक सवाल ये भी था कि क्या पुरुष भी दो रूप में
है—परमपुरुष जिसे परमात्मा कहते हैं और जीव के शरीर में (सूक्ष्मशरीर) में बंधा
पुरुष जिसे जीवात्मा कहते हैं?
बाबा मुस्कुराए।
“ अब मैं
तुम्हारी उसी जिज्ञासा पर आ रहा हूँ। ध्यान से सुनो। फिर भूल न जाना। पुरुष के दो रूप होते हैं— परमात्मा और
जीवात्मा। सच
पूछो तो यहाँ सांख्य दर्शन वेदान्त और योग दर्शन से थोड़ा अलग चिन्तनधारा
वाला है। प्रारम्भ में स्थिति जो भी रही हो, किन्तु बाद में इस सांख्य की भी दो
धाराएँ हो गयी—ईश्वरवादी और अनीश्वरवादी। अनीश्वरवादी सांख्य यानी
मूल सांख्य दर्शन (महर्षि कपिल प्रणीत) 'परमपुरुष' या 'परमात्मा' की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। सांख्य के अनुसार 'पुरुष' अनेक हैं । हर शरीर
में एक अलग पुरुष है। यहाँ कोई एक 'सुपर बॉस' जैसा परमात्मा नहीं है, जो सबको नियन्त्रित करे। सृष्टि का चक्र पुरुष और प्रकृति
के संयोग से अपने आप चलायमान है।
“ अब दूसरी समझदारी— पुरुष और
जीवात्मा वाली बात। जिसे लोग 'जीवात्मा'
कहते हैं, वह वास्तव में 'पुरुष + सूक्ष्म शरीर' का मिश्रण है। पुरुष
तो शुद्ध, निर्लिप्त और मुक्त है, लेकिन
जब वह बुद्धि और अहंकार के प्रतिबिंब (Reflection) में खुद
को देखने लगता है, तो वह 'जीव'
की तरह व्यवहार करने लगता है।
“ महर्षि कपिल के बहुत बाद महर्षि पतञ्जलि आए।
उन्होंने दर्शन के सूत्रों पर विशद प्रकाश डाला। उन्हीं योगसूत्रों के प्रभाव में
ईश्वर की परिकल्पना उभरी और सांख्य की दूसरी धारा निकल पड़ी—सेश्वरसांख्य।
पतञ्जलि ने ‘ईश्वरप्रणिधानाद्वा’ का नया सूत्र
दिया। स+ईश्वर=सेश्वर और इस विचारधारा वाले सांख्य का नाम हुआ—सेश्वरसांख्य।
ध्यान देने योग्य बात ये है कि यहाँ एक 'विशेष पुरुष' की कल्पना की गई जिसे 'ईश्वर' कहा गया। लेकिन शुद्ध सांख्य दर्शन में केवल अनगिनत स्वतन्त्र पुरुष और
एक जड़ प्रकृति ही मूल तत्व हैं।
“इन बातों का सार-संक्षेप ये है कि प्रलय में हम 'कोमा' जैसी स्थिति में हैं, मोक्ष में 'परम जागृति' में, जहाँ 'मैं' का भाव
नहीं, किन्तु 'होने' का पूर्ण
बोध रहता है। पुरुष केवल एक ही तरह का है—शुद्ध चैतन्य,
जो अज्ञानवश जीवात्मा प्रतीत होता है। इस '
पॉज-प्ले बटन' वाले मामले में एक बहुत गहरा संदेश भी
छिपा है—प्रलय में जो हम 'पॉज' होते
हैं, वह इस बात का सबूत है कि प्रकृति
कभी किसी का विनाश नहीं करती, वह बस चीज़ों को 'रीसायकल' करती है। जब तक 'पुरुष' (जीवात्मा) को
विवेक-ज्ञान नहीं होता, प्रकृति तब तक बार-बार 'प्ले' करती
रहेगी। ”
बाबा
के कृपा-प्रसाद से मैं गदगद हो गया। बारबार नतमस्तक होकर,उनका अभिवादन किया और शेष
जिज्ञासाओं के समाधान हेतु निवेदन किया।
मुदित चित्त बाबा ने फिर कहना शुरु
किया—“ आगे की बातों
को मुख्य रूप से तीन चरणों में समझाने की चेष्टा करता हूँ— (क) पुनर्जन्म का चक्र: प्रलय के बाद जब
दोबारा 'प्ले' बटन दबता है,
तो यह कैसे तय होता है कि किस पुरुष को कैसा शरीर मिलेगा? (ख) प्रकृति के तीन गुण: सत्व, रज और तम—ये 'पॉज'
की स्थिति में कैसे रहते हैं? और (ग) मोक्ष
बनाम प्रलय: प्रलय में हम 'बेहोश' होते हैं और मोक्ष में 'पूर्ण जागरूक'—इन दोनों के बीच के महीन अन्तर को
समझना।
000000आप अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करते तो बड़ा अच्छा होता00000
Comments
Post a Comment