Posted by kamlesh punyark
punyarkkriti.blogspot.com
साधक का द्वन्द्व(आत्ममन्थन के नवनीत) का दूसरा भाग-- गतांश से आगे... सांख्य की समझ आवेश और विषादों से घिरा, मंगलागौरी मन्दिर का कंगूरा निहार रहा था, तभी अचानक दाएँ कंधे पर अज्ञात मृदु हथेली का स्पर्श मिला और कानों में व्यंग्यात्मक हँसी के साथ स्वर गूँजे— “ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।— इतना क्रोध और आवेश अच्छा नहीं है बच्चे ! गीता पढ़ते हो सिर्फ, गुनने का भी प्रयत्न किया करो...। ” चौंककर गर्दन घुमाया। बगल में खड़ा एक युवक मुस्कुरा रहा था— बिल्कुल युवक ही। प्रौढ़ता की सीमा अभी उसे छूने से भी साफ इन्कार कर रही थी । कमर में पीले रंग का एक गमछा लपेटे और वैसा ही एक गमछा कंधे पर डाले हुए, उत्सुकता से मुझे निहार रहा था। गीता के श्लोक से आकर्षण तो हुआ उसके प्रति, किन्तु उसके वय और सम्बोधन ने मेरे ‘ अहंकार ’ को झकझोर कर रख दिया— हें ऽ ! बित्ते भर का छोकरा और उपदेश देने चला है, जिसे बोलने का भी सऊर नहीं...अप...
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