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साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत) आठवाँ भाग

      साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)                           आठवाँ भाग         महारास में विलय      राधा,  मीरा और चैतन्य की भक्ति चर्चा से मुझमें भी भक्तिरस का मानों संचार हो आया। प्रेमद्रवित अवरुद्ध कंठ से कांपती हुई आवाज निकली — महाराज ! कभी-कभी भक्तिभाव से श्रीमद्भागवत पलट लेता हूँ। सुना है कि ज्ञान-वैराग्य और माधुर्य रूपी परिपक्व फल का रसामृत है ये ग्रन्थ। महारास की लीला भी सर्वाधिक रूप से यहीं वर्णित है। ज्ञान और वैराग्य को युवती भक्ति के दो वृद्ध पुत्रों के रूपक के व्याज से समझाया गया है इस ग्रन्थ में। ऐसे में मुझे आशंका होती है कि इन दोनों में किसका चयन किया जाए ? श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को भेजा था गोपियों को ज्ञानमार्ग का उपदेश देने के लिए और स्वयं गोपियों के उपदेश से प्रभावित होकर लौट आए—श्रीमद्भागवत का वह रोचक प्रसंग बड़ा अजीव है, जिसका भक्त-कवि सूरदास जी ने भी अपने ‘ भ्रमरगीत ’ काव्य में शब्द-चित्र खींचा है और दूसरी ओर है गीता का समन्व...