Posted by kamlesh punyark
punyarkkriti.blogspot.com
साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत) पाँचवाँ भाग --- - गतांश से आगे पृ.105 से 145तक योग की साधना पितामहेश्वर घाट, अपने डेरे के ठीक सामने बीचो बीच फल्गु की सूनी-प्यासी रेत पर पेट के बल उकड़ू लेटे आँसू बहा रहा हूँ । ऐसा लगता है मानों आज सीताशापित फल्गु को जलप्लावित करके ही छोड़ूँगा। जहाँ तक मुझे याद है, इतने आँसू पहले कभी नहीं बहे होंगे। इन आँसुओं को कैसे परिभाषित करुँ ये भी नहीं कह सकता। खिन्न हूँ, पर दुःखी तो नहीं। आँसू खुशी के होते है, पर वो भी तो नहीं। फिर ये धाराप्रवाह अश्रुपात क्यों ? तभी अचानक, बेहद बदबू का भभाका कहीं से आकर जबरन घुसने लगा नथुनों में और इसके साथ ही किसी ने पीछे से धकियाआ। विचारों का प्रवाह भंग हो गया। पीछे मुड़ कर देखा—मलावृत मलभोजी विशालकाय जन्तु मेरे गुदामार्ग पर थुथुना रहा है। मन एकदम भिन्ना उठा। नाक पर हथेली रखे सोचने लगा—क्या करूँ, कैसे भगाऊँ इस धृष्ट जानवर को, तभी वह उछलकर सामने आ गया, गुर्राते-घूरते हुए। आमतौर पर पितामहेश्वर घाट के ईर्द-ग...
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