Posted by kamlesh punyark
punyarkkriti.blogspot.com
साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन के नवनीत) चौथा भाग.., गतांश से आगे पृ.80 से 105 कृपया मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्।। को पुनः स्पष्ट करें। इस बार बाबा बड़े जोर से ठहाका लगाए अपने पुराने अन्दाज में। ठहाके की ध्वनि चहुँ ओर व्याप गई माँ मंगलेश्वरी के शिखर तक। फिर शान्त होकर कहने लगे— “ मूलतः ये श्लोक अमृतबिन्दु उपनिषद् का है, जिसकी चर्चा विष्णुपुराण में भी है। यह श्लोक सांख्य के ' मन ' और ' मोक्ष ' के अन्तः सम्बन्धों को समझने की कुँजी है । प्रधान (पुरुष) के अतिरिक्त सांख्य के चौबीस तत्वों में विकासक्रम में इसका स्थान तीसरा है, ये तुमने सही कहा। प्रकृति → महत् (बुद्धि) → अहंकार → मन। इसे इन्द्रियों का राजा कहा गया है। सांख्य की दृष्टि से ये ' उभयात्मक इन्द्रिय ' है , क्योंकि यह ज्ञान भी ग्रहण करता है और कर्म की प्र...
- Get link
- X
- Other Apps