श्री ढकोशलानन्दजी की तन्त्र-साधना गाँववालों को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि श्री ढकोशलानन्दजी आजकल तन्त्र-साधना में तल्लीन हैं। मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेशन, सम्मोहन, वशीकरण सबकुछ साधने की कई विधियाँ हस्तगत हो गई हैं। यानी कि इनमें कुछ भी सिद्ध हो जाए तो पौ-बारह। प्रायः नवसिखुए तान्त्रिकों का पहला झुकाव या कहें खिंचाव वशीकरण—विशेषकर नारी सम्मोहन की ओर ही होता है, क्योंकि भोगवाद की परम और चरम सीमा यही मानते हैं लोग। कुछ लोग सीधे मारण-क्रिया से ही तन्त्र-साधना का श्रीगणेश करना करते हैं, क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया शत्रु ही नज़र आती है। देखते हैं ढकोलानन्दजी क्या करते हैं। “ गाँव-जेवार को दिखा देना है तन्त्र-मन्त्र का कमाल और लगे हाथ अपना भी काम साध लेना है। बीसियों चेलियाँ तो चुटकी बजाते बस में हो ही जायेंगी, किन्तु पहले अपनी विगड़ैल बीबी पर ही आज़माईश़ करनी है और इतना ही नहीं, इस बीबी से नहीं तो दूसरी बीबी से ही सही, मुखाग्नि देने वाला बेटा तो पैदा करके ही रहना है...। ” — कुछ ऐसा ही ख्याली पुलाव पकाने लगे थे ढकोशलानन्दजी महाराज। पिछले ही साल प्याजी पत्तियों की पकौड़ी क...
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