Posted by kamlesh punyark
punyarkkriti.blogspot.com
साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत) सातवाँ भाग....गतांश से आगे......पृ.165 से 180 तक भक्ति की ज्योति हंसवाहिनी तो सिर्फ वीणापाणी सरस्वती हैं। मैं भला हंसारुढ़ कैसे हो सकता हूँ ! बाबा ने सपने तो दिखला दिए, किन्तु सपनों का राजमहल ताश के पत्तों की तरह क्षणभर में ही धराशायी हो गया। दो क्रमों में बाबा का सुदीर्घ सानिध्य, सुदीर्घ संवाद, सब सपने की तरह आँखें खुलते ही खत्म हो गए। काल का पहिया घनघनाकर घूमता रहा। पाँच-छः महीने किधर निकल गए, कुछ पता न चला। घर-घरनी-घराना की चक्की में पहले की भाँति ही पिसता रहा। मन में मलाल होता रहा कि समय बीता जा रहा है, कुछ हो नहीं रहा है, कुछ कर नहीं पा रहा हूँ। रोज रात को नई-नई प्लानिंग करता हूँ, सुबह होते ही, संसारिकता की प्लानिंक कुछ और ही करने को विवश कर देती है। सिद्धान्ततः तो भलीभाँति समझ गया कि जो कुछ है, प्रकृति का खेल है , प्र...
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