लोकतन्त्र में ठगविद्या का योगदान आप जानते ही हैं कि हमारे यहाँ पारम्परिक रूप से अनेकानेक विद्याओं का प्रचलन है। आपको ये जानकर हैरानी हो सकती है कि आजकल के वाट्सऐप ग्रूप की तरह ‘ तन्त्र-शास्त्र ’ में भी विद्याओं का एक ‘ ग्रूप ’ है, जिसे सिर्फ देवियाँ ही ‘ ऑपरेट ’ करती हैं। देवताओं को न तो ‘ ग्रूप एडमिन ’ ही बनाया गया है और न उन्हें ‘ चैटिंग ’ का ही अधिकार मिला है। इस अनोखे ’ तन्त्र-ग्रूप ’ को ‘ महाविद्या ’ कहा जाता है। अलग-अलग मन्तानुसार, अलग-अगल तन्त्र-ग्रन्थों में कहीं वारह, कहीं सोलह, तो कहीं बत्तीस महाविद्याओं की चर्चाएं मिलती है । किन्तु हमारे सोढ़नदासजी इस बात को लेकर बहुत दुःखी और चिन्तित हैं, क्योंकि किसी मतावलम्बी ने अपनी ‘ महाविद्या-सूची ’ में इस महासंकटमोचक ‘ ठगविद्या ’ को शामिल नहीं किया है। हालाँकि सोढ़नदासजी समाज अध्ययन के विद्यार्थी नहीं हैं और नहीं होने का कारण, उनकी मूर्खता नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता है। उनका कहना है कि समाज-अध्ययन को जब से ‘ सोशल-सांयन्स ’ मान लिया गया है, तब से उन्हें इस विषय के प्रति वितृष्...
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