श्रीश्री फ्रॉडाचार्चजी जैसा कि आप जानते ही हैं कि हमारे यहाँ धूर्त, मक्कार, फ़रेबी की बिलकुल किल्लत नहीं है। इनके लिए ‘ इम्पोर्ड ड्यूटी ’ की फिज़ूलखर्ची भी नहीं करनी पड़ती, क्योंकि अपने यहाँ ही प्रोडक्शन भरपूर है। इनकी बेरोजगारी की भी चिन्ता नहीं है, क्योंकि ज्यादातर बहालियाँ संसद-परिषद में ही हो जाती हैं। उससे बचे-खुचे काबिल थोड़े निचले स्तर पर गुँजायश बना लेते हैं—निगमों, पंचायतों में। वो भी नहीं, तो सरकारी-गैरसरकारी योजनाओं की दलाली के धन्धे से भला कौन रोक सकता है ऐसे काबिल लोगों को ! श्रीश्री फ्रॉडाचार्चजी से सोढ़नदासजी की मुलाकात लगभग सत्तर के दशक में स्वनामधन्य झूठेश्वरनाथजी ने करायी थी, जब वे ‘ ब्राण्डन्यू ’ कॉलेजिया रंगरूट थे। हाल में ही ग्रैजूयेशन की डिग्री मिली थी और लगे हाथ ही वैवाहिक बन्धन में बाँधकर दुनियादारी की मंझधार में ऊबजूब होने के लिए जबरन छोड़ दिए गए थे अभिभावकों द्वारा। चुँकि उन दिनों ‘ पहले कैरियर बनाओ, फिर जोड़ी बनाओ ’ वाली बीमारी इक्कशवीं सदी की तरह ‘ ...
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