सूर्यांशियों का दीप्तिमान मुकुट प्रिय आत्मन् ! हम ‘ सूर्यांशी ’ हैं, ‘ सूर्यवंशी ’ नहीं । हम ‘ शाकद्वीपीय ’ हैं, ‘ शकदीपी ’ या ‘ सकलदीपी ’ नहीं। ‘ शकों ’ से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं । हम ‘ भोजक ’ हैं, भोजवंश से कुछ लेना-देना नहीं है। हम ‘ दिव्यदेव ’ हैं, ‘ भूदेव ’ नहीं। भूदेव कहलाना हमारा अवमूल्यन है। ज्ञातव्य और ध्यातव्य है कि हम चिकित्सक, कर्मकाण्डी वा ज्योतिषी बन कर नहीं आए थे। हम यहाँ पौरोहित्य जैसा निन्दक कर्म करने हेतु भी नहीं आए थे। हम साम्ब के कुष्ठरोग का निवारण करने नहीं आए थे। उनका कुष्ठरोग तो सूर्याराधन और सूर्यदर्शन से ही ठीक हो चुका था। ध्यातव्य है कि हम इन विद्याओं के विशेषज्ञ अवश्य रहे हैं। क्योंकि ये सब के सब लौकिक तुच्छ विद्याएँ हमारी घुट्टी में मिली हुई थी। हमारे रग-रग में रसी-बसी हुई थी। भालू का बच्चा बिना रोंएँ का नहीं हो सकता,उसी भाँति हम सूर्यांशियों में ये सभी रहस्यमयी विद्याएँ सुप्तावस्था में सुरक्षित पड़ी हुई हैं। समय पर सजग होकर, सचेष्ट होकर, हमें इन्हें सिर्फ चैतन्य कर लेने की आवश्यकता है। ना...
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