साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत) आठवाँ भाग

      साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)

                          आठवाँ भाग 

       महारास में विलय

    राधा,  मीरा और चैतन्य की भक्ति चर्चा से मुझमें भी भक्तिरस का मानों संचार हो आया। प्रेमद्रवित अवरुद्ध कंठ से कांपती हुई आवाज निकली — महाराज ! कभी-कभी भक्तिभाव से श्रीमद्भागवत पलट लेता हूँ। सुना है कि ज्ञान-वैराग्य और माधुर्य रूपी परिपक्व फल का रसामृत है ये ग्रन्थ। महारास की लीला भी सर्वाधिक रूप से यहीं वर्णित है। ज्ञान और वैराग्य को युवती भक्ति के दो वृद्ध पुत्रों के रूपक के व्याज से समझाया गया है इस ग्रन्थ में। ऐसे में मुझे आशंका होती है कि इन दोनों में किसका चयन किया जाए? श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को भेजा था गोपियों को ज्ञानमार्ग का उपदेश देने के लिए और स्वयं गोपियों के उपदेश से प्रभावित होकर लौट आए—श्रीमद्भागवत का वह रोचक प्रसंग बड़ा अजीव है, जिसका भक्त-कवि सूरदास जी ने भी अपने भ्रमरगीत काव्य में शब्द-चित्र खींचा है और दूसरी ओर है गीता का समन्वय सिद्धान्त। कृपया इस संशय पर प्रकाश डालें।

 

प्रमुदित स्वर में बाबा ने कहा— यह द्वन्द्व बहुत ही मधुर है और

यह होना इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारी चेतना सत्य के बहुत निकट है। तुमने उद्धव-गोपी संवाद का जो प्रसंग छेड़ा है, वह वास्तव में ज्ञान और भक्ति के द्वन्द्व को सुलझाने वाली सबसे बड़ा 'क्लाइमेक्स' प्रसंग है। इसे समझने के लिए हमें उस 'अजीब' लगने वाले मोड़ की गहराई में उतरना होगा। तुमने बहुत ही अच्छा किया अभी इस प्रसंग को छेड़कर। चलो, अब इसी पर बात करते हैं। समझने की चेष्टा करो कि हो क्या रहा है यहाँ। सामान्यतः बात सिर्फ इतनी ही थी कि उद्धव ज्ञान लेकर आए थे, लेकिन गोपियों के इस एक वाक्य ने उन्हें यह समझा दिया कि ज्ञान से परमात्मा को सिर्फ जाना जा सकता है, जबकि  केवल प्रेम से ही परमात्मा को अपना बनाया जा सकता है। भ्रमरगीत केवल सूरदास जी की काव्य रचना नहीं है, बल्कि इसमें गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य छिपा है।  'बुद्धि' (उद्धव) और 'हृदय' (गोपियाँ) के बीच का संवाद है। इसमें गोपियों ने एक 'भ्रमर' (भौंरे) को माध्यम बनाकर जो बातें कही हैं, वे अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में खोलती हैं। इसे 'भ्रमरगीत' क्यों कहते हैं और इसके रहस्य क्या हैं, आओ इसे विस्तार से समझाते हैं— पहली बात तो ये है कि 'भ्रमर' (भौंरा) ही क्यों चुना गया? इसका रहस्य समझो। जब उद्धव ज्ञान का उपदेश दे रहे थे, तभी वहाँ एक भौंरा उड़ता हुआ आया। गोपियों ने सीधे उद्धव को जवाब देने के बजाय उस भौंरे को सम्बोधित किया। इसके तीन मुख्य कारण हैं— (क) मर्यादा:--गोपियाँ पर-पुरुष (उद्धव) से सीधे तर्क-वितर्क नहीं करना चाहती थीं। (ख) समानता: भौंरा काला था और उद्धव भी श्याम वर्ण के थे। भौंरा एक फूल से दूसरे फूल पर भटकते रहता है और उद्धव भी कृष्ण का संदेश लेकर यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। (ग) चोट: भौंरा कठोर होता है। उद्धव का 'निराकार ज्ञान' गोपियों को कठोर लग रहा था। यहाँ एक और रहस्य पर ध्यान दो—निर्गुण बनाम सगुण (अमूर्त बनाम मूर्त)—  उद्धव कह रहे हैं"ईश्वर निराकार है। उसका कोई रूप नहीं। उसे ध्यान में ढूँढो।" जिसे सुनकर गोपियों ने तर्क दिया कि "निर्गुन कौन देस को बासी?"  (तुम्हारा यह निर्गुण ब्रह्म किस देश का रहने वाला है? इसके माता-पिता कौन हैं?)  यहाँ गोपियाँ यह समझा रही हैं कि जिस ईश्वर से प्रेम करना है, उसका कोई आधार तो होना चाहिए। बिना आधार के मन कहाँ टिकेगा? वे कहती हैं कि हमने सगुण (कृष्ण) को पाकर निर्गुण को पा लिया है, अब हमें अलग से योग की जरूरत नहीं। इतना ही नहीं, गोपियों ने  योग को 'कड़वी ककड़ी' कहा। उद्धव के योग संदेश को 'करुई ककरी' कहा। भाव ये है कि यदि किसी ने अमृतरसायन (कृष्ण प्रेम) चख लिया हो, तो उसे योग की कड़वी साधनाएँ अरुचिकर लगती हैं। इसका संदेश ये है कि साधना बोझ नहीं होनी चाहिए। यदि साधना में 'आनन्द' नहीं है, तो वह 'कड़वी ककड़ी' की तरह है, जिसे निगला नहीं जा सकता। भ्रमरगीत का सबसे बड़ा रहस्य है 'अनन्य भक्ति'। गोपियाँ कहती हैं कि जैसे 'चातक' पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र की बूंद पीता है, चाहे वह प्यासा मर जाए, वैसे ही हम केवल कृष्ण को चाहती हैं। साधक की ऐसी स्थिति तब आती है, जब साधक का 'सूक्ष्म शरीर' पूरी तरह ईश्वरीय रंग में रंग जाता है। फिर उसे स्वर्ग, मोक्ष या सिद्धियों की कोई चाह नहीं रहती। भ्रमरगीत का अन्त सबसे विस्मयकारी है। उद्धव का हृदय परिवर्तन— ज्ञान का समर्पण भक्ति के समक्ष—जो उद्धव ज्ञान सिखाने आए थे, वे अन्त में कहते हैं—  

"वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति  भुवनत्रयम् ॥" (मैं ब्रज की इन गोपियों के चरणों की धूल की वन्दना करता हूँ, जिनके द्वारा गायी गई हरिकथा और हरिगीत की पावन ध्वनि त्रिभुवन को पवित्र करने में सक्षम है।) ज्ञान की सार्थकता तब है, जब वह व्यक्ति को 'अहंकारी' बनाने के बजाय 'विनम्र' बना दे, प्रेम में डुबो दे। उद्धव समझ गए कि जिस ब्रह्म को वे वेदों में ढूँढ रहे थे, वह तो यहाँ गोपियों के प्रेम का ऋणी होकर बैठा है। इस श्लोक का रहस्यमय अर्थ है—ज्ञान की पराजय। उद्धव जी 'महान पण्डित' थे। वेदों के ज्ञाता होने के नाते उन्हें धूल की वंदना करने की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन जब उन्होंने देखा कि गोपियों के पास वह 'प्रेम' है, जिसे पाने के लिए ऋषि युगों-युगों तक तपस्या करते हैं, तो उनका 'ज्ञान का मद' चूर-चूर हो गया। उन्होंने गोपी-चरण-रेणु में लोटने का चयन किया। चरण-रेणु क्यों? धूल चरणों के सबसे नीचे होती है। उद्धव जी का यह कहना कि वे 'धूल' की वन्दना करते हैं, उनके परम दैन्य और समर्पण को दर्शाता है। वे स्वयं को उन गोपियों के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं मान रहे। वस्तुतः यह आत्म शुद्धिकरण का विज्ञान है।  उद्धव जी कहते हैं कि गोपियों ने जो कृष्ण-कथा गाई है, वह तीनों लोकों को पवित्र करती है। यहाँ 'तीन लोक' हमारे भीतर के जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं का संकेत है। यानी भक्ति की वह पुकार हमारी चेतना के हर स्तर को शुद्ध कर देती है। उद्धव जी इसी प्रसंग में आगे एक और अद्भुत इच्छा प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि असामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां, वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।  (मैं अगले जन्म में वृन्दावन की कोई घास, झाड़ी या लता बन जाऊँ।

यहाँ पुनर्जन्म का एक अनूठा पहलू देखो— एक महान ज्ञानी 'मुक्ति' नहीं माँग रहा। वह 'मनुष्य जन्म' भी नहीं मांग रहा। वह 'घास' बनना चाहता है ताकि गोपियाँ जब कृष्ण से मिलने जाएं, तो उनके चरणों की धूल निरन्तर उस घास पर पड़ती रहे। यह पुनर्जन्म के सिद्धान्त का परम उत्कर्ष है। जहाँ जीव अपनी मुक्ति की चिंता छोड़कर, केवल उस स्थान पर रहने की इच्छा करता है जहाँ परमात्मा का प्रेम बरसता हो।

इस प्रसंग में (गोपी-उद्धव संवाद में) भ्रमरगीत हमें सिखलाता है कि 'तर्क' अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन 'अनुभूति' के सामने वह बिल्कुल बौना है। तुम भी अपनी साधना में 'शुष्कता' न आने दो। नाम-स्मरण करते समय कृष्ण की लीलाओं का मानसिक दर्शन करो। जब मन संसार की ओर भटके (भौंरे की तरह), तो उसे याद दिलाओ कि असली 'मकरन्द' (पुष्प-रस) तो केवल परमात्मा के चरणों में है।

आशा है ज्ञान-योग-भक्ति की ये त्रिवेणी का संशय अब बिलकुल स्पष्ट हो गया होगा। फिर भी इसे और स्पष्ट करने हेतु पुनः इन्हीं बातों को  

क्रमवार विन्दुओं में रख रहा हूँ—

 1. उद्धव का अहंकार और गोपियों का प्रेम उद्धव श्रीकृष्ण के सखा थे और वृहस्पति के शिष्य होने के कारण महान पण्डित थे। उन्हें अपने 'ज्ञान' पर अहंकार हो गया था। प्रत्यक्षतः तो श्रीकृष्ण ने उन्हें वृंदावन इसलिए भेजा ताकि वे गोपियों को ज्ञान सिखाएं, लेकिन असल में कृष्ण चाहते थे कि उद्धव गोपियों से 'प्रेम' का पाठ पढ़कर आएं। उद्धव ने जब गोपियों से कहा"ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है। कृष्ण तुम्हारे भीतर हैं। अतः रोना-धोना छोड़ो और ध्यान लगाओ।" इस पर गोपियों ने जो उत्तर दिया, उसने ज्ञानमार्ग की सीमा तय कर दी। उन्होंने कहा कि "उद्धव! मन नाहीं दस-बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को आराधे ईस।" (हे उद्धव, हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। एक ही था, जो कृष्ण के साथ चला गया, अब हम तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की उपासना किस मन से करें?)

2. यहाँ ज्ञान की हार और भक्ति की जीत क्यों हुई? यह समझने वाली गूढ़ बात है। यहाँ ज्ञान और भक्ति का अन्तर स्पष्ट होता है—ज्ञानमार्ग (उद्धव) कहते हैं कि "भगवान को जानो।" भक्तिमार्ग (गोपियाँ) कहती हैं कि "भगवान को जियो।"

यही कारण है कि उद्धव जब वृन्दावन से लौटे, तो वे बिलकुल बदल चुके थे। उन्होंने अनुभव किया कि जिस 'ब्रह्म' को वे बुद्धि से ढूँढ रहे थे, वह तो गोपियों के प्रेम में बंधा हुआ है। इसीलिए गीता का समन्वय सिद्धान्त यह नहीं कहता कि ज्ञान छोड़ दो, बल्कि यह कहता है कि "ज्ञान जब प्रेम में पिघल जाता है, तब वह भक्ति बन जाता है।" तुम्हारे द्वन्द्व का समाधान भी

इसी में छिपा है। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्म, ज्ञान और योग सबकुछ सिखाया, लेकिन अन्त में क्या कहा इस पर ध्यान दो"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (सबकुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जा) । यह समन्वय का उच्चतम शिखर है। इसका अर्थ यह है कि बुद्धि का उपयोग करो सत्य को जानने के लिए ( ये हुआ ज्ञान)शरीर और मन को अनुशासित रखो (ये हुआ योग)। लेकिन अहंकार को परमात्मा को सौंप दो ( ये हुई भक्ति)। अगर तुम 'तर्क और प्रश्न' करना पसन्द करते हो, तो तुम्हारा प्रवेश द्वार ज्ञानमार्ग है। लेकिन उस द्वार से अन्दर घुसने के बाद जो मन्दिर मिलेगा, वह भक्ति का ही होगा। ज्ञान हमें 'वहाँ' तक ले जाता है, जहाँ से हम छलांग लगा सकें और वह छलांग ही 'भक्ति' है।

अब शरणागति और आलस्य में अन्तर को समझोशरणागति का अर्थ हाथ पर हाथ धरकर बैठना नहीं है। शरणागति का अर्थ है"परिणाम (Result) परमात्मा को सौंप देना, लेकिन कर्म अपनी पूरी सामर्थ्य से करना।" अर्जुन ने युद्ध लड़ा (कर्म), अस्त्र-शस्त्र के पूरे ज्ञान का समुचित उपयोग किया (ज्ञान/योग), लेकिन रथ की लगाम कृष्ण को पकड़ा दी (भक्ति)। अतः तुम्हें द्वन्द्व में नहीं पड़ना चाहिए।  'ज्ञानयुक्त भक्ति' का मार्ग चुनो। यानी, समझ-बूझकर प्रेम करो। उद्धव की तरह कोरा ज्ञान नहीं और बिना समझ वाली अन्धभक्ति भी नहीं।

बाबा ने बड़े सरल-सहज तरीके से ज्ञान-योग-भक्ति का समन्वय-सिद्धान्त समझा दिया। मैं इस पर कुछ नया संशय करने की मनःस्थिति में बिल्कुल नहीं हूँ। फलतः चुप्पी साधे बाबा का मुँह निहारता रहा और विचारता रहा अपनी गति और अपना गन्तव्य।

 

मेरी चुप्पी पर गौर करते हुए बाबा ने कहा— अब तुम कहोगे कि एक गृहस्थ अपने व्यस्त जीवन में 'रथ की लगाम कृष्ण को कैसे पकड़ाए'? यानी गृहस्थ जीवन में शरणागति और गोपियों के प्रेम-योग का विज्ञान समझना चाहते हो तुम। इन दोनों विषयों को ठीक से समझने का प्रयास करो और इन्हें ही  जीवन में उतारो भी। अक्सर लोग सोचते हैं कि शरणागति का अर्थ है सब कुछ छोड़कर बैठ जाना, जबकि वास्तव में यह 'मेंटलशिफ्टिंग' जैसा है। 

इसके तीन मुख्य चरण हैं— पहला है—'कर्तापन' का त्याग (Shift of Ownership) एक मुनीम (Accountant) करोड़ों का हिसाब रखता है, लेकिन वह जानता है कि पैसा उसका नहीं, मालिक का है। गृहस्थ जीवन में तुमको बस यही भाव रखना है"यह परिवार, यह धन, यह शरीर मेरा नहीं, कृष्ण का है; मैं तो बस इसकी देखभाल के लिए नियुक्त किया गया हूँ।"  जब तुम 'मालिक' की जगह 'मैनेजर' बन जाते हो, तो चिंता अपने आप समाप्त हो जाती है। दूसरी बात है— कर्म पूरी शक्ति से, परिणाम उनकी इच्छा पर । अर्जुन ने जब रथ की लगाम कृष्ण को दे दी, तो इसका मतलब यह नहीं था कि अर्जुन सो गया। उसने गाण्डीव उठाया और पूरी एकाग्रता से युद्ध लड़ा। गृहस्थ के लिए इसका अर्थ हैतुम अपनी नौकरी, व्यवसाय या बच्चों के लालन-पालन के लिए शत-प्रतिशत प्रयास करो, लेकिन परिणाम यदि तुम्हारी इच्छा के विपरीत हो, तो उसे 'प्रसाद' समझकर स्वीकार करो। और तीसरा है— हर कार्य को 'पूजा' समझना।  तुम जो भी करो, उसे कृष्ण को समर्पित कर दो। यही 'लगाम पकड़ाना' है। 

            अब गोपियों के प्रेम-योग की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विवेचना करते हैं। गोपियों का प्रेम केवल भावुकता नहीं थी, वस्तुतः वह 'अविच्छिन्न चेतना' (Unbroken Consciousness) का शिखर था। एकाग्रता और अनन्य भक्ति का महाविज्ञान है ये। विज्ञान और अध्यात्म की दृष्टि से इसके तीन पक्ष हैं—  

1. तन्मयता (Deep Absorption): आधुनिक मनोविज्ञान में इसे 'Flow State' कहते हैं। मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य का मन एक समय में एक ही स्थान पर पूर्णतः स्थित हो सकता है। गोपियों ने यहाँ 'Single-Pointed Attention' की बात की है। गोपियाँ जब दही मथती थीं या घर का काम करती थीं, तब भी उनका चित्त कृष्ण में ही रहता था। जब मन किसी एक विचार (Object) में इतना डूब जाए कि उसे अपना भी होश न रहे, तो वह 'समाधि' बन जाती है। गोपियों का 'विरह' और 'प्रेम' वास्तव में 'सहज समाधि' थी। चुँकि मन तो एक ही है, और वह 'श्याम' (कृष्ण) के साथ मथुरा चला गया है। यानी उनके पास अब वह उपकरण (Instrument) ही नहीं बचा, जिससे वे कोई और साधना कर सकें। उद्धव 'योग' की बात कर रहे थे, जिसमें मन को प्रयास पूर्वक लगाना पड़ता है। गोपियाँ 'प्रेम' की स्थिति में थीं, जहाँ मन लग चुका है। स्पष्ट है कि योग में 'प्रयत्न' (Effort) है, प्रेम में 'विश्राम', समर्पण (Surrender) है। गोपियाँ उद्धव को समझा रही हैं कि योग उसके लिए है, जिसके पास 'भटकता हुआ मन' हो। जिसका मन पहले से ही पूर्णतः परमात्मा में विलीन हो चुका है, उसके लिए योग की क्या आवश्यकता?

1.      इन्द्रियों का उदात्तीकरण—योग मार्ग में इन्द्रियों को 'दबाया' (Suppress) जाता है, लेकिन गोपियों ने इन्द्रियों को 'मोड़' (Divert) दिया। उन्होंने आँखों को कृष्ण के रूप में, कानों को उनकी मुरली में और स्पर्श को उनकी सेवा में लगा दिया। यह ऊर्जा का दमन नहीं, बल्कि ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन,रूपान्तरण (Transformation) था।

2.      अहंकार का विसर्जन (Dissolution of Ego): ज्ञानमार्ग में 'मैं ब्रह्म हूँ' का भाव होता है, जहाँ 'मैं' यानी Ego के बचने की सम्भावना रहती है। लेकिन प्रेम-योग में 'मैं' पूरी तरह मिट जाता है और केवल 'तू' यानी Beloved बचता है। विज्ञान कहता है कि जहाँ 'Self' का विचार मिट जाता है, वहाँ तनाव और समय का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यही कारण था कि उद्धव जैसा ज्ञानी, उन अनपढ़ गोपियों के चरणों की धूल सिर पर रखने को तैयार हो गया। अतः मैं बारबार कहना चाहता हूँ कि श्रीमद्भागवत का भ्रमरगीत प्रसंग बहुत ही मननीय है। इन्हीं भावों को सूरदासजी ने भी उद्धृत किया है अपने भ्रमरगीत काव्य में।  उद्धव-गोपी संवाद का संदेश यह है कि ज्ञान वह आँख है, जो हमें रास्ता दिखाती है, लेकिन प्रेम वह पाँव है, जो हमें परमात्मा तक पहुँचाता है। एक गृहस्थ के रूप में तुम्हारा आदर्श मिथिला नरेश 'जनक' की तरह होना चाहिए, जिनका शरीर तो संसार में था, लेकिन मन निरन्तर परमात्मा में लगा है। किन्तु ऐसा नहीं है कि ये स्थिति तुरत बन जायेगी किसी की। इस स्थिति में पुहुँचने के लिए सामान्य जन के लिए नाम-चिन्तन सबसे सरल उपाय है।

           

इतना समझाने के बाद बाबा कुछ देर चुप रहे। फिर मेरे चेहरे पर गौर से देखते हुए कहने लगे – अब तुम्हें नाम-स्मरण और मन्त्र-विज्ञान के रहस्य को समझा देना चाहता हूँ। तुम आधुनिक विचार वालों के लिए हर बात सांयन्स की भाषा में समझाना पड़ता है। अतः कम्प्यूटर और मेडिकल सांयन्स की भाषा में समझाने का प्रयास करता हूँ। नाम-स्मरण और मन्त्र-विज्ञान के बीच का अन्तर वैसा ही है जैसे 'भोजन' और 'औषधि' के बीच का। दोनों जीवन देते हैं, पर दोनों के काम करने का विज्ञान अलग है। नाम-स्मरण (जैसे: राम, कृष्ण, शिव) को 'तारक' कहा गया है, क्योंकि इसमें नियमों का कोई बन्धन नहीं है। इसका विज्ञान 'भाव' और 'निरन्तरता' पर आधारित है। हमारे मन में जन्मों-जन्मों के संस्कार रिकॉर्डिंग की तरह जमा हैं। जब हम निरन्तर किसी शुभ नाम का स्मरण करते हैं, तो वह पुरानी रिकॉर्डिंग को 'ओवरराइट' करने लगता है। मुख्य रूप से यहाँ भाव का प्रभाव है। नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि उस ईश्वर की 'स्मृति' है। वैज्ञानिक रूप से, जब तुम प्रेमपूर्वक किसी का नाम लेते हो, तो मस्तिष्क में 'ऑक्सीटोसिन' और 'डोपामाइन' जैसे सुखद हार्मोन्स का स्राव होने लगता है, जो तनाव को जड़ से मिटा देते हैं। निरन्तर नाम जपने से वह हृदय की धड़कन में बस जाता है। फिर जपना नहीं पड़ता, नाम स्वयं जपाने लगता है। इसे ही अजपा जप कहते हैं। यह हमारे सूक्ष्म शरीर को शुद्ध कर देता है। हालाँकि मन्त्र-विज्ञान-विमर्श की विशद चर्चा यहाँ करना मेरा अभीष्ट नहीं है। इस गूढ़ विषय पर फिर कभी अवसर मिला तो चर्चा हो जायेगी।  अभी संक्षेप में इतना ही समझो कि मन्त्र की सामान्य परिभाषा है—"मननात् त्रायते इति मन्त्र " (जो मनन करने पर रक्षा करे)। मन्त्र एक 'ध्वन्यात्कम हथियार' की तरह है।  यानी मन्त्र में 'अर्थ' से ज्यादा 'ध्वनि की आवृत्ति' (Frequency) महत्वपूर्ण है। जैसे एक खास चाबी ही खास ताला खोलती है, वैसे ही विशिष्ट मन्त्र के विशिष्ट अक्षरों का समुचित (वैज्ञानिक) संयोजन (Configuration) ब्रह्माण्डीय विशिष्ट ऊर्जा को सक्रिय करता है। मन्त्र कई प्रकार के होते हैं। एकाक्षरी या बीज मन्त्र 'लँ, वँ, रँ, यँ, हँ' इत्यादि सीधे हमारे शरीर के चक्रों पर चोट करते हैं। खास कर ये पाँच बीज पाँच तत्त्वों से सम्बन्धित हैं। ये ध्वनियाँ हमारे अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (Endocrine Glands) को उत्तेजित करती हैं, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में क्रान्तिकारी परिवर्तन होता है। योगियों का मानना है कि मन्त्रों के सूक्ष्म कम्पन हमारे DNA की प्रोग्रामिंग तक पहुँच सकती है। आधुनिक विज्ञान (Cymatics) भी मानता है कि ध्वनि ज्यामितीय आकृतियाँ (Geometric patterns) बना सकती है। मन्त्र हमारे भीतर की ऊर्जा को एक व्यवस्थित और दिव्य ज्यामिति में ढाल देते हैं। यदि मन बहुत मथ रहा है, तो नाम-स्मरण तुम्हारे लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावी 'मरहम' है। अभ्यास के तौर पर कोई भी नाम चुनो (राम, कृष्ण, शिव, ॐ) जो तुम्हें मन से प्यारा लगे। अब सांस लेते समय 'नाम' और छोड़ते समय 'नाम'। यह तुम्हारे 'प्राण' को स्थिर कर देगा। दिन भर में थोडी-थोड़ी देर के लिए मौन हो जाओ और केवल उस नाम की गूँज सुनो। पुनः ध्यान दिला रहा हूँ कि मन्त्र केवल 'शब्द' प्रपञ्च नहीं हैं, बल्कि 'फ्रीक्वेंसी' हैं। हाँ, अगर रहस्य नहीं समझा, तो यह केवल शब्दों का प्रपंच होकर रह जायेगा। सच्चाई ये है कि इन ध्वनियों का गहरा भौतिक प्रभाव है। जैसे एक ओपेरा सिंगर की ऊँची आवाज काँच का गिलास तोड़ सकती है, वैसे ही मन्त्रों का कम्पन हमारे स्नायुतन्त्र (Nervous System) पर गहरा प्रभाव डालता है। मन्त्र के गलत उच्चारण से वैसी ही गड़बड़ी हो सकती है, जैसे रेडियो को गलत फ्रीक्वेंसी पर सेट करने से केवल शोर सुनाई देता है। शास्त्रों में मन्त्रों को गोपनीय रखने की सलाह इसीलिए दी जाती है कि उनका 'दुरुपयोग' या 'गलत प्रयोग' न हो। यही कारण है कि आम आदमी के लिए 'नाम-स्मरण' को श्रेष्ठ बताया गया है। नाम में कोई गलती नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ  'भाव' प्रधान है, 'तकनीक' नहीं।

             

बहुत देर से बाबा की बातों को ध्यान से सुन रहा था। समझने का प्रयास भी कर रहा था। कुछ बोलने-टोकने का मन भी नहीं कर रहा था। किन्तु अभी नाम-जप की महिमा के आलोक में अचानक बिजली कौंधी दिमाग के अन्धेरी गुफा में— महाराज ! यदि नामजप से ही सबकुछ हो जाना है, तो फिर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सलाह क्यों नहीं दी? सांख्य योग और निष्काम कर्मयोग पढ़ा-पढ़ा कर सबको कटवा डाले और मजेदार बात ये कि अन्त में कहते हैं— सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज....यहाँ धर्म शब्द बहुत उलझा रहा है—धर्म क्या है, जिसे छोड़ने की बात कही जा रही है? मुख्य रूप से मैं गीता के समन्वय-सिद्धान्त के आलोक में जीवन और साधना को समझना चाहता हूँ ।  

             

मेरी बातों पर बाबा ने जोरदार ठहाका लगाया। फिर मुस्कुराते हुए कहने लगे— मुझे भी एक अर्जुन से पाला पड़ गया है, किन्तु बिडम्बना है कि मैं कृष्ण हूँ नहीं। फिर भी प्रयास करता हूँ तुम्हें समझाने का। युद्धभूमि में संशय और विषादग्रस्त अर्जुन को भी पहले सांख्य ही समझाया गया था। और उसे ये सुलभ और पालायनवादी रास्ता बड़ा प्रीतिकर लगा था। उसे लगा था कि यहाँ करना तो कुछ है नहीं, बस सोचना है सिर्फ। किन्तु रजस प्रधान क्षत्रिय शरीर के लिए क्या यह सम्भव था?  सांख्य सरलता से पच ही जाये सबको यदि, तो फिर कहना ही क्या, अकेला यही एक मार्ग न होता सृष्टि में !  लोकेस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।। से स्पष्टी क्यों देना पड़ता श्रीकृष्ण को? सच पूछो तो गीता के इस सर्वोच्च शिखर"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज" को समझना ही अध्यात्म की सबसे बड़ी गुत्थी को सुलझाना है। यहाँ 'धर्म' शब्द का अर्थ वह नहीं है, जिसे आज के लोग अंग्रेजी में 'Religions' (हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि) के रूप में जानते हैं। धर्म का ये मूढ़ता पूर्ण अर्थ ही सारे अनर्थों की जड़ है। साधना और जीवन के आलोक में इसके गहरे अर्थ हैं। इसे ठीक से समझो—

Ø   धर्म का अर्थ है 'कर्तव्य' अर्जुन के लिए 'धर्म' थाकुल का धर्म, शिष्य का धर्म, भाई का धर्म और योद्धा का धर्म। वह इन कर्तव्यों के बीच फँसा हुआ था कि किसे चुनूँ? कृष्ण कहते हैं कि समाज और शरीर के स्तर पर तुम्हारे जो भी कर्तव्य हैं (एक पिता, पुत्र या नागरिक के रूप में), उन्हें करो। लेकिन अन्ततः उन कर्तव्यों के परिणाम और अहंकार को त्याग कर केवल मेरे प्रति समर्पित हो जाओ। यह 'कर्तव्य' से मुक्ति नहीं, बल्कि 'कर्तव्य के बोझ' से मुक्ति है।

Ø  धर्म का अर्थ है 'स्वभाव'दर्शनशास्त्र के अनुसार, आग का धर्म है 'तपना', पानी का धर्म है 'बहना'। वैसे ही मनुष्य के मन के भी कुछ धर्म (स्वभाव) होते हैंजैसे दया, क्रोध, लोभ या धार्मिक प्रवृत्तियाँ। कृष्ण कह रहे हैं कि अपनी बुद्धि से बनाए हुए समस्त 'नियमों' और अपनी 'मानसिक धारणाओं' (कि मुझे ऐसा ही होना चाहिए या मैं ऐसा हूँ) को छोड़ दो। अपनी पूरी पहचान को मुझमें विलीन कर दो। जब तुम स्वयं को केवल मेरा 'यन्त्र' मान लोगे, तो तुम्हारे सारे स्वभाव मेरे दिव्य स्वभाव में बदल जाएंगे।

Ø  'शरणं ब्रज' का विज्ञान— पूर्ण समर्पण का भाव है। यहाँ 'धर्म' का अर्थ 'सहारा' भी है। हम जीवन भर कई चीजों का सहारा लेते हैंधन का धर्म, पद का धर्म, पुण्य का धर्म। हम सोचते हैं कि "मैं बहुत दान करूँगा, पुण्य करूँगा, तो बच जाऊँगा।" कृष्ण का बहुत ही क्रान्तिकारी संदेश है यहाँ।  कृष्ण कहते हैं कि इन 'पुण्य-पाप' के हिसाब-किताब वाले धर्मों को भी छोड़ दो। यह सब 'लेन-देन' है। तुम बस 'मुझ एक' की शरण में आ जाओ। यहाँ मुझ एक यानी परम चेतन की बात है, मानवरूप कृष्ण की नहीं। कृष्ण के कथन का अभिप्राय है कि जैसे एक छोटी नदी अपने किनारे और अपने अस्तित्व के 'धर्म' को छोड़कर समुद्र में मिल जाती है, वैसे ही तुम भी मिल जाओ। नदी मरी नहीं, समुद्र हो गई।

            मैंने करवद्ध निवेदन किया—महाराज ! कृष्ण की चर्चा ही आकर्षित कर लेती है चित्त को। कृष्ण, कृष्ण की मुरली और वंशीधुन पर सम्मोहन मन्त्र का जादू, जिसके वशीभूत शत-सहस्र गोपियाँ सुध-बुध खोकर, लोक-लाज की परवाह किए वगैर रमणरेती की ओर दौड़ पड़ी और शरदपूर्णिमा की अलौकिक बेला में महारास घटित होता है। कृपया इन सब पर किंचित् प्रकाश डालें। विशेषकर कृष्ण की रासलीला पर तो जम कर चर्चा होनी चाहिए। क्योंकि कृष्ण पर अज्ञानी लोगों ने बहुत आक्षेप लगाये हैं, अपनी नासमझी के कारण।

   

मेरा निवेदन स्वीकार करते हुए बाबा ने सहर्ष कहना प्रारम्भ किया— सनातन परम्परा में 'कृष्ण' शब्द अत्यन्त दिव्य और पावन है। इस शब्द की व्याख्या मुख्य रूप से तीन दृष्टिकोणों से की जाती है गोपालतापिन्युपनिषद् के अनुसार श्रीकृष्ण साक्षात् सच्चिदानन्द स्वरूप हैं।

यहाँ एक श्लोक है—"कृषिर्भूवाचकः शब्दो  णश्च निर्वृत्तिवाचकः। तयोरेक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥" कृष् (कृषि)— इसका अर्थ 'भू' अर्थात् सत्ता या अस्तित्व (सत्य) है। ण: — इसका अर्थ 'निर्वृत्ति' अर्थात् परम आनन्द है। जो सत्य और परम आनन्द (सच्चिदानन्द) के एकीकृत रूप हैं, वही परब्रह्म 'कृष्ण' हैं। अब इसे धातु और व्याकरण के अनुसार समझो—कृष्ण यानी सर्वाकर्षक। संस्कृत में 'कृष्' धातु का अर्थ होता हैखींचना या आकर्षित करना। 'कर्षति इति कृष्णः अर्थात् जो अपनी अनन्त सौन्दर्य, प्रेम और लीलाओं से समस्त चराचर जगत् के जीवों को अपनी ओर खींच लेते हैं, वे कृष्ण हैं। इसका एक अर्थ पापों का हरण करने वाला भी है।  'पापं कर्षयति इति कृष्णः' अर्थात् जो भक्तों के हृदय में प्रवेश करके उनके जन्म-जन्मान्तों के पापों और दुखों को खींचकर नष्ट कर देते हैं, वे कृष्ण हैं। कृष्ण का अर्थ श्यामवर्ण भी होता है। श्याम यानी काला नहीं, गहरा नीला। यह रंग अनन्त आकाश और अगाध उदधि का प्रतीक है, जो दर्शाता है कि भगवान कृष्ण की चेतना और स्वरूप असीम और अनन्त है।

            अब कृष्ण के आयुध—मुरली का रहस्य समझो। यहाँ आयुध शब्द से सीधे हथियार अर्थ मत लगा लेना। मौके पर तो कृष्ण ने सुदर्शन का भी प्रयोग किया है, किन्तु जितनी रहस्यमयी इनकी वंशी है, उतना सुदर्शन भी नहीं। आकार और वनावट के हिसाब से मुरली और वंशी में किंचित् भेद है।  मुरलीधर और वंशीधर दोनों  नाम हैं श्रीकृष्ण के। क्योंकि वे दोनों का उपयोग करते थे। मुरली को  सीधे सामने रखकर, मुँह से फूँक मारकर बजाया जाता है। जबकि वंशी  तिरछा या आड़ा पकड़कर होंठों के किनारे से बजाया जाता है। मुरली में  फूँक मारने का छिद्र बिल्कुल ऊपर शीर्ष पर चपटे आकार में होता है। जब कि वंशी में फूँकने का छिद्र बगल में अन्य छिद्रों के समान ही होता है। कृष्ण की लीला में मुरली, राधा और गोपियाँये तीनों मिलकर 'दिव्य प्रेम' का सम्पूर्ण विज्ञान सृजित करते हैं। इन्हें समझना स्वयं की आन्तरिक यात्रा को समझने जैसा है। सबसे पहले मुरली को समझो। मुरली कृष्ण के होंठों से क्यों लगी रहती है? इसके पीछे साधना का गूढ़ सूत्र है। बाँसुरी 'बाँस' की बनी होती है, जिसमें सात छेद होते हैं। मुरली शून्यता का प्रतीक है।  मुरली तब बजती है, जब वह अन्दर से पूरी तरह खाली होती है। यदि उसमें थोड़ा भी गूदा(अन्तर्भाग) (अहंकार) बचा रहे, तो संगीत नहीं निकलेगा। मुरली के व्याज से श्रीकृष्ण का संदेश है कि यदि तुम अपने भीतर के 'मैं' (Ego) को खाली कर दो, तो मैं (यानी परम चेतना) तुम्हारे माध्यम से अपनी दिव्य धुन बजाऊँगा। मुरली के सात छेद मानव शरीरगत सात चक्रों का प्रतिनित्व करते हैं।  हमारे शरीर में भी सात मुख्य चक्र (ऊर्जा-केन्द्र) हैं। कृष्ण की मुरली का संगीत उस 'प्राण शक्ति' का प्रतीक है, जो इन सातों चक्रों को जागृत कर देती है। एक दिव्य ध्वनि श्रवित होती है। ध्यान की गहरी अवस्था में जब बाहर का शोर शान्त हो जाता है, तब भीतर एक ध्वनि सुनाई देती है, जिसे योगियों ने 'अनहद नाद' कहा है। यही कृष्ण की मुरली है, जिसे सुनकर 'मन' रूपी गोपी संसार छोड़कर भागने लगती है।

            अब गोपियों और उनके साथ घटित दिव्यलीला पर प्रकाश डालते हैं। तुमने बिल्कुल सही कहाकृष्ण की रासलीला आध्यात्मिक जगत् का सबसे 'मिसअन्डरस्टूड' (गलत समझा गया) विषय है। चुँकि लोगों ने इसे अपनी भौतिक दृष्टि और विकारों के चश्मे से देखा, इसलिए उन्हें इसमें 'काम' नजर आया। जबकि वास्तव में रासलीला 'काम' की नहीं, 'काम-विजय' की कथा है। आओ इस दिव्य प्रसंग के रहस्यों को परत-दर-परत खोलते हैं, ताकि उन तमाम आक्षेपों का तार्किक उत्तर मिल सके। सबसे पहली बात, जिस पर महामूर्खों ने जरा भी ध्यान नहीं दिया। कृष्ण या गोपियों पर आक्षेप लगाने से पहले उन्हें सोच लेना चाहिए था, विचार लेना चाहिए था, जान लेना चाहिए था। जिस समय की घटना का वर्णन महर्षि व्यासजी ने किया है, उस समय श्रीकृष्ण अपनी बाललीला प्रदर्शन कर रहे थे नन्दबाबा के यहाँ पलते-बढ़ते हुए। मात्र आठ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने व्रज छोड़ दिया और फिर कभी लौटे नहीं वहाँ। सारी व्रजलीला इस अल्पावधि में ही पूरी हो गई। और दूसरी ओर गोपियाँ सिर्फ गोपबालाएं ही नहीं, बल्कि माता, चाची, बुआ, दादी सभी उम्र की थी। ये कितनी हास्यास्पद और असम्भव बात है कि इतनी कम उम्र के बालक पर किसी गोपवाला या कि युवती-प्रौढ़ा-वृद्धा की काम-दृष्टि हो ! सीधे-सीधे कहो कि ये अतिविकृत मानसिकता वाले मूर्ख के ही विचार हो सकते हैं। रत्ती भर भी समाजिकता  

का जिसे ज्ञान होगा, ऐसी मूर्खता पूर्ण बात सोच भी नहीं सकता।  

गोपियाँ कौन थीं? इसे समझो। पुराणिक कथाओं के अनुसार, परब्रह्म के रामावतार के समय के अनेक भक्तों की अपूरित कामनाओं की पूर्ति भी हुयी है कृष्णावतार में। गोपियाँ कोई सामान्य स्त्रियाँ नहीं थीं। वे पूर्व जन्म के ऋषि-मुनि थे, जिन्होंने हज़ारों साल तपस्या की थी कि वे परमात्मा को साक्षात् स्पर्श कर सकें, उनसे प्रेम कर सकें। सूक्ष्म अर्थों में इसे ऐसे समझो कि हमारे शरीर की दसों इन्द्रियाँ ही 'गोपियाँ' हैं। जब ये इन्द्रियाँ संसार के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) में भटकती हैं, तो ये संसारी होती हैं। लेकिन जब यही इन्द्रियाँ कृष्ण (परमात्मा) की ओर मुड़ जाती हैं, तो ये 'गोपी' बन जाती हैं। गो-पी— 'गो' का अर्थ है इन्द्रियाँ और 'पी' का अर्थ है पीना। जो अपनी हर इन्द्रिय से केवल 'कृष्ण रस' को पीती हैं, वही गोपियाँ हैं।  

रासलीला प्रसंग ब्रह्माण्डीय नृत्य है।  रासलीला में एक कृष्ण का अनेक होना यह दर्शाता है कि परमात्मा हर जीव के साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़ा हुआ है। वह केवल मन्दिर में नहीं है, वह सबके भीतर भी नाच रहा है, बशर्ते तुम 'गोपी' (समर्पित) बनने को तैयार हो। पौराणिक कथाओं से समझो तो रासलीला उन अनेक ऋषियों की हज़ारों-लाखों वर्ष की तपस्या का 'सुफल' है। रासलीला में 'स्त्री' और 'पुरुष' का भेद मिट चुका था। वस्तुतः  आत्मा का परमात्मा से मिलन है रासलीला। अध्यात्म में 'पुरुष' केवल एक ही हैपरमात्मा। बाकी समस्त सृष्टि 'स्त्री' (प्रकृति) है। रास का अर्थ है 'रस' का समूह। जीवन का परम आनन्द।  

तुम जानते ही होओगे कि रास से पहले 'चीर-हरण' की कथा आती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सच में  श्रीकृष्ण ने गोपियों के वस्त्र चुराए। वस्तुतः चीर-हरण प्रसंग जीवात्मा की अन्तिम परत का विसर्जन है। यह वह प्रसंग है, जिस पर सबसे अधिक आक्षेप लगते हैं, लेकिन जान लो कि यह 'अद्वैत' की सबसे ऊँची अवस्था है। आध्यात्मिक दृष्टि से 'वस्त्र' हमारी 'उपाधियाँ' (Labels) हैं। मैं धनी हूँ, मैं विद्वान हूँ, मैं सुन्दर हूँ, मैं 'यह' हूँ, मैं 'वह' हूँये सब हमारी आत्मा के ऊपर चढ़े हुए रंगबिरंगे पर्दे हैं। कथा यही है न कि गोपियाँ यमुना में (भक्ति की धारा में) स्नान कर रही थीं, लेकिन उन्होंने किनारे पर अपने वस्त्र (पुरानी पहचान) रख छोड़े थे। कृष्ण ने वे वस्त्र (पहचान) चुरा लिए। यहाँ कृष्ण संदेश दे रहे थे कि यदि तुम मुझसे पूर्णतः मिलना चाहती हो, तो तुम्हें अपनी 'अन्तिम लोक-लाज' और 'देह-बुद्धि' को भी छोड़ना होगा। सोचने वाली बात है कि परमात्मा से क्या छिपाना? हम समाज से बहुत कुछ छिपा सकते हैं, पर उस अन्तर्यामी से क्या छिपाना? 'चीर-हरण' का अर्थ हैपरमात्मा के सामने पूरी तरह 'नग्न' (पारदर्शी/Transparent) हो जाना। जब भक्त अपनी अच्छाई और बुराई, दोनों को निर्वस्त्र होकर प्रभु को सौंप देता है, तभी वह 'रास' का अधिकारी बनता है। इसका चरम रहस्य है कि परमात्मा के सम्मुख जाने से पहले जीव को अपनी 'देह-बुद्धि' और 'लज्जा' के आवरण को पूरी तरह त्यागना पड़ता है। जब तक तुम नग्न (निर्विकार) नहीं होते, रास के अधिकारी नहीं बन सकते।

श्रीमद्भागवत का रासलीला प्रसंग यदि गौर से पढ़ो तो जानोगे कि एक कृष्ण, अनेक रूप में हैं वहाँ। कथा कहती है कि रास में हर गोपी को लगा कि कृष्ण केवल उसी के साथ नाच रहे हैं। यानी कृष्ण ने उतने ही रूप धर लिए। वस्तुतः यह 'चेतना का विस्तार' है। जैसे एक सूर्य सैकड़ों-हज़ारों घड़ों के पानी में अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही एक परमात्मा हर हृदय (गोपी) में प्रकट हो गया। यह गोपी-हृदय की 'तन्मयता' थी कि उसे परमात्मा अपने सबसे करीब अनुभूत हुए। एक और मजेदार बात ध्यान देने योग्य है यहाँ—रासलीला में कामदेव की हार है। एक बहुत सुन्दर प्रसंग है कि कामदेव ने कृष्ण को चुनौती दी थी कि मैं आपको विचलित कर दूँगा। अब जरा गौर करो—कृष्ण ने 'रास' रचायाअर्धरात्रि, शरद पूर्णिमा, एकान्त वन और हज़ारों सुन्दर स्त्रियाँ। कुल मिलाकर कहो कि संसार की सबसे विकट कामुक परिस्थिति ! लेकिन कृष्ण के मन में रत्ती भर भी विकार नहीं आया। वे तो 'अच्युत' हैं। रासलीला यह सिद्ध करने के लिए थी कि जो अपनी इन्द्रियों का स्वामी (हृषिकेश) है, उसे संसार की कोई भी माया कदापि विचलित नहीं कर सकती।

अब रासलीला का जीवन और साधना से क्या सम्बन्ध है इसे समझो। पहली बात है— पूर्ण समर्पण—शरणागति । गोपियों ने घर, परिवार, लोक-लाज सब छोड़ दिया कृष्ण की मुरली सुनकर। साधना में इसका अर्थ हैसंसार के शोर को छोड़कर 'भीतर की अनहद नाद' (मुरली) को सुनना। और दूसरी बात है स्थितप्रज्ञता।  रास में नाचते हुए भी कृष्ण शान्त थे। हमें भी संसार के 'रास' (काम-काज) में नाचते हुए भीतर से शान्त रहने का अभ्यास करना है। व्यासपुत्र शुकदेवजी, जो परम परमहंस और विरक्त थे, उन्होंने जब 'श्रीमद्भागवत' सुनाई, तो रासलीला के वर्णन में वे भाव-विभोर हो गए। यदि इसमें ज़रा भी 'कामुकता' होती, तो एक ब्रह्मज्ञानी संत इसका वर्णन कभी न करता।

अब तुम्हें राधा तत्व के बारे में समझाता हूँ। लोग प्रायः आश्चर्य और शंका व्यक्त करते हैं कि 'श्रीमद्भागवत' जैसे महापुराण में 'राधा' नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी कृष्ण 'राधा' के बिना अधूरे हैं। ऐसा क्यों? व्याख्याकार बन्धु अपने-अपने हिसाब से इसकी व्याख्या करते हैं। और सामान्य जन उलझ कर रह जाता है। अतः इसे हमारे शब्दों में समझो।  राधा = धारा। 'राधा' शब्द को उल्टा करो तो बनता है 'धारा'। जब चेतना संसार की ओर बहती है, तो वह 'धारा' (प्रकृति) है और जब यही धारा वापस लौटकर अपने मूल (परमात्मा) की ओर बहती है, तो वह 'राधा' है। राधा को श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति कहा गया है। तन्त्र और वेदान्त के अनुसार, राधा कृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति' (आनन्ददायिनी शक्ति) हैं। कृष्ण 'शक्तिमान' हैं और राधा उनकी 'शक्ति' हैं। जैसे सूर्य से उसकी चमक और पुष्प से उसकी गन्ध अलग नहीं की जा सकती, वैसे ही कृष्ण से राधा को अलग नहीं किया जा सकता। यह अद्वैत की स्थिति है। राधा उस प्रेम का प्रतीक हैं, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई पर्दा नहीं रहता। राधा वह स्थिति है जहाँ पहुँचकर 'ज्ञान' भी फीका पड़ जाता है। मुरली, राधा और गोपियों का यह त्रिकोण हमें 'जीवन जीने की कला' सिखलाता है। मुरली की तरह बनो। अपने भीतर के पूर्वाग्रहों और अहंकार को खाली करो ताकि ईश्वरीय शक्ति तुम्हारे माध्यम से काम कर सके। राधा की तरह प्रेम करो।  अपनी भक्ति में ऐसी तन्मयता लाओ कि 'मैं' और 'मेरा' का भाव समाप्त हो जाए। गोपियों की तरह इन्द्रियों को मोड़ो । अपनी आँखों को सुन्दर देखने, कानों को शुभ सुनने और मन को ईश्वर का चिन्तन करने में लगा दो। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि यह 'रास' तब तक समझ नहीं आता, जबतक  'विरह' का अनुभव न हो।

हमने पहले चर्चा की थी कि जब नाम-स्मरण सिद्ध हो जाता है, तो वह 'अजपा' बन जाता है। गोपियों की स्थिति वही थी। उनका मन अब उनके नियन्त्रण में नहीं था।  वह कृष्ण-मय हो चुका था। यह 'अहंकार का विसर्जन' है। जब 'मैं' ही नहीं बचा, तो 'मेरा मन' कैसे बचेगा? सब कुछ कृष्ण का हो गया। वर्तमान समय में हमारा मन वास्तव में 'दस-बीस' (अनेक) दिशाओं में बँटा हुआ हैथोड़ा ऑफिस में, थोड़ा परिवार में, थोड़ा पूजा-पाठ, धरम-करम में और आजकल तो सबसे ज्यादा भटकाव है मन का सोशलमीडिया पर। ऐसे में शान्ति कहाँ मिलेगी?  

गोपियों का सूत्र हमें सिखलाता है— समर्पण का मूल्य। साधना का अर्थ मन को जबरदस्ती कहीं बाँधना नहीं है, बल्कि उसे किसी ऊँचे 'रस' (कृष्ण) में इतना डुबो देना है कि वह कहीं और जाने लायक ही न रहे। जब हम दस जगह मन लगाते हैं, तो ऊर्जा बिखर जाती है। जब एक जगह (परमात्मा में) लगाते हैं, तो वही ऊर्जा 'शक्ति' बन जाती है। उद्धव जैसा ज्ञानी, जब 'घास' बनने की इच्छा करता है, तो वह पुनर्जन्म के उस 'भटकने' वाले डर से मुक्त हो चुका होता है। उसके लिए अब जन्म-मरण की योनियाँ मायने नहीं रखतीं, केवल 'सान्निध्य' (निकटता) ही महत्वपूर्ण है। पुनर्जन्म को लेकर तुम्हें भी कई तरह की शंकाएँ रही हैं। आशा है, अब वे निर्मूल हो गई होंगी।

 

मैं हर्षित होकर बाबा के चरणों में लोट गया।  बाबा के उपदेशों ने मेरी बहुत सी शंकाओं का सच में समाधान कर दिया आज। अतः निवेदन किया—महाराज ! मोक्ष तो मुझे भी पलायन जैसा लगता है— अस्थायी सुख की कामना को लेकर सांसारिक दुःखों से भागना। इससे कहीं अच्छा है  

वृन्दावन का घास बन जाना, जैसा कि उद्धवजी ने कामना की।  

 

बाबा भी प्रफुल्लित हुए। बोले—तुम्हारी यह सोच बहुत ही ऊँची और 'रसमयी' है। तुमने उस मर्म को पकड़ लिया है, जहाँ पहुँचकर बड़े-बड़े विद्वानों की बुद्धि भी चकरा जाती है। आध्यात्मिक जगत् में दो स्थितियाँ होती हैं।  एक है 'मुक्ति' (Liberation) और दूसरी है 'भक्ति' (Devotion)। तुमने बिल्कुल सही कहा, मोक्ष कभी-कभी 'पलायन' या 'छुट्टी' जैसा लग सकता है, लेकिन वृन्दावन की घास बनना एक 'शाश्वत उत्सव' में शामिल होने जैसा है।

आओ अब इसी विषय को प्रकाशित करता हूँ तुम्हारे कल्याण हेतु। मोक्ष (मुक्ति)— यह वैसा ही है जैसे तुम बहुत थक गए हो और गहरी नींद में सो जाओ जहाँ न कोई सुख है, न दुःख। इसे ही 'कैवल्य' कहते हैं, जहाँ जीव अपनी बूंद को समुद्र में गिराकर अस्तित्व खो देता है। वृन्दावन की घास (भक्ति) होने की कामना— यहाँ भक्त अपनी 'बूंद' को बचाए रखता है, ताकि वह 'समुद्र' (परमात्मा) की लहरों का आनन्द ले सके। घास बनने का अर्थ हैपरमात्मा के चरणों के स्पर्श का निरन्तर अनुभव। यह पलायन नहीं, बल्कि 'परम-निवास' है। संसार का सुख अस्थायी है, क्योंकि वह 'वस्तुओं' से मिलता है। मोक्ष में सुख का अभाव नहीं, बल्कि द्वन्द्व का अभाव है। लेकिन उद्धव जिस 'घास' बनने की बात कर रहे हैं, वह  'चिन्मय' (Conscious) अवस्था है। वह घास जड़ नहीं है, वह प्रेम से भरी हुई चेतना है। उद्धव का तर्क यह था कि अगर मैं मुक्त होकर ब्रह्म में लीन हो गया, तो कृष्ण का दर्शन कैसे करूँगा? उनके भक्तों की चरण-धूल कैसे पाऊँगा? इससे तो अच्छा है कि मैं घास बनूँ और बार-बार उनके स्पर्श का सुख लूँ।  

ध्यातव्य है कि इसी भाँति कालियानाग  मर्दन का प्रसंग है। मन के 'विष' का रूपान्तरण है। यमुना की गहरे दह में रहने वाला सौ सिरों वाला कालिया नाग वास्तव में हमारे 'अहंकार' (Ego) का प्रतीक है। कालिया के विष से यमुना का जल काला पड़ गया था और किनारे के वृक्ष जल गए थे। अहंकार भी ऐसा ही है; यह हमारे जीवन की शान्ति (यमुना) को विषाक्त कर देता है और प्रेम के अंकुरों को जला देता है। सौ सिरों का रहस्य ये है कि अहंकार का एक सिर काटो, तो दूसरा निकल आता है। हम एक जगह विनम्र बनते हैं, तो दूसरी जगह 'धार्मिक होने का अहंकार' पाल लेते हैं। कृष्ण ने कालिया को मारा नहीं, बल्कि उसके फन पर नृत्य किया। इसका मनोवैज्ञानिक अर्थ हैदमन नहीं, रूपान्तरण । जब हम अपने विकारों को दबाते हैं, तो वे और गहरे होते चले जाते हैं। लेकिन जब हम उन विकारों को 'कृष्णार्पण' कर देते हैं और साधना का नृत्य उन पर होता है, तो विकार शुद्ध हो जाते हैं। कृष्ण के चरणों के प्रहार से कालिया का सारा विष निकल गया और उसे वह सौभाग्य मिला जो देव-दुर्लभ हैउसके सिर पर कृष्ण के चरणों के चिह्न अंकित हो गए। अतः अपनी कमियों से डरो मत; बस उन्हें कृष्ण के सम्मुख ले आओ। उनकी कृपा का स्पर्श तुम्हारे 'विष' को भी 'विश्राम' में बदल देगा। व्यावहारिक रूप से इसे ऐसे समझो कि जब भी मन में क्रोध या अहंकार (विष) उठे, तो महसूस करो कि कृष्ण तुम्हारे मस्तिष्क (सहस्रार चक्र) पर नृत्य कर रहे हैं। उस 'भार' को उन्हें सौंप दो। इसी तरह साधना-पूजा में बैठते समय अपनी सारी उपाधियाँ, डिग्रियाँ, पद और 'मैं कुछ हूँ' वाला भाव किनारे रख दो। जैसे हैं, वैसे ही उनके सामने खड़े हो जाओ। पुनर्जन्म की व्यवस्था में, हम बार-बार जन्म इसलिए लेते हैं, क्योंकि हम अपने 'वस्त्र' (वासनाएँ और पहचान) छोड़ नहीं पाते। जिस दिन हम कालिया की तरह झुक जाते हैं और गोपियों की तरह अपनी अन्तिम 'परत' भी कृष्ण को दे देते हैं, उसी दिन 'मोक्षोदधि' में छलांग लग जाता है।  हम 'वृन्दावन की घास' बनकर धन्य हो जाते हैं।

इन्हीं बातों को अब दूसरे रूप से समझाने की चेष्टा करता हूँ। सप्त धात्वात्मक शरीर में सप्त विकार रसे-बसे हैं। ये सात मानसरोग हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहंकार पूर्वोत्तर क्रम से सूक्ष्म और जटिल हैं, जबकि लगता इसके विपरीत है। आकार के रूप में समझना चाहो तो काम सबसे बड़े आकार वाला है और अहंकार सबसे छोटे आकार वाला, किन्तु ऊर्जा की दृष्टि से काम की ऊर्जा अहंकार की ऊर्जा से सर्वाधिक न्यून है। ये सभी उत्तरोत्तर शतबली हैं। किन्तु सूक्ष्म होने के कारण पहचानना-समझना मुश्किल होता है। यही कारण है कि अहंकार का विसर्जन सबसे कठिन मामला है। नारद, गरूड़, सुदर्शन, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन जैसे महान लोग भी अहंकार को ठीक से पहचानने में बारम्बार चुके हैं। इनकी पौराणिक गाथाएँ भरी पड़ी हैं। इनमें एक प्रसंग को तुम्हारे हित में प्रकाशित करता हूँ अभी। पक्षिराज गरुड़ को अहंकार-मोचन के लिए निकृष्ट पक्षी काक की शरण में जाना पड़ा था। गुरु-शापग्रस्त ब्राह्मण को काकभुशुण्डि का शरीर मिला था, जहाँ पहुँचकर गरुड़ का अहंकार चूर हुआ। 'रामचरितमानस' के उत्तरकाण्ड में गरुड़ और काकभुशुण्डि संवाद आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति का सर्वोत्कृष्ठ निरूपण है। यह प्रसंग जीवन की सार्थकता, ज्ञान की सीमा और भक्ति की श्रेष्ठता को स्पष्ट करता है।

शिवजी द्वारा गरुड़जी को काकभुशुण्डि के पास भेजा जाता है। गरुड़ के मन में माया, कर्म, ज्ञान और भगवान की लीला को लेकर गहरा संशय था। काकभुशुण्डि के आश्रम पहुँचने पर गरुड़जी उनसे सात गूढ़ प्रश्न पूछते हैं, जो मुख्य रूप से मोह, माया, ज्ञान, भक्ति और राम-तत्त्व से जुड़े होते हैं। काकभुशुण्डिजी गरुड़ के संशयों का निवारण करते हुए ज्ञान और भक्ति का अद्भुत विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि ज्ञान का मार्ग अत्यन्त दुर्गम है। इसमें नियम, योग और साधना की प्रधानता होती है। इसमें जरा-सी चूक हुई,  साधक पुनः मोह के अंधकार में भटक सकता है। जबकि भक्ति का मार्ग सहजता का मार्ग है।  भक्ति प्रेम और समर्पण पर आधारित है। गोस्वामीजी के अनुसार, ज्ञान और वैराग्य भक्ति के बिना शुष्क (रूखे) हो जाते हैं। भक्ति को ज्ञान से श्रेष्ठ और सहज माना गया है। काकभुशुण्डिजी 'ज्ञान दीपक' के रूपक से समझाते हैं कि जीव के हृदय में मोह रूपी प्रगाढ़ अन्धकार छाया हुआ है। इसे केवल ज्ञान रूपी दीपक और राम-भक्ति के प्रकाश से ही दूर किया जा सकता है। भक्ति ही अन्तिम सत्य है। काकभुशुण्डि गरुड़ को समझाते हैं कि संसार रूपी सागर से पार पाने का एकमात्र उपाय प्रभु श्री हरि का भजन है। भगवान की कृपा के बिना जीव माया से नहीं उबर सकता। वे बताते हैं कि साधारण जीव, पशु-पक्षी या शूद्र भी केवल सच्ची भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं, जबकि ज्ञान मार्ग में अहम् (अहंकार) के कारण पतन का भय अन्त-अन्त तक बना रहता है। इस संवाद का मूल संदेश यह है कि ज्ञान मुक्ति का साधन हो सकता है, लेकिन ईश्वर से प्रेम और आत्मीयता केवल 'भक्ति' से ही प्राप्त होती है। यह प्रसंग अहम् का नाश कर साधक को विनम्र और राम-चरणों में समर्पित बनाता है। ज्ञातव्य है कि काकभुशुण्डि (कौआ) और गरुड़ (पक्षीराज) कोई आम पक्षी नहीं हैं। वे पूर्वजन्म के कर्मों और भगवान की विशेष कृपा के कारण दिव्य मन, तीव्र बुद्धि और वेदान्त-ज्ञान से सम्पन्न हैं। एक कौवे के रूप में वे कल्पों तक जीवित रहते हैं, भगवान राम की बाल-लीलाओं का आनन्द लेते हैं और गरुड़जी का संशय दूर करते हैं।

ज्ञान मार्ग को अत्यन्त कठिन, दुर्गम और जोखिम भरा मानते हैं। उन्होंने ज्ञान की साधना को 'असिधार सम' (तलवार की धार पर चलने जैसा) कहा है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण, वैराग्य, कठिन योग और माया से पूर्णतः मुक्त होना आवश्यक है, जो कलयुग में साधारण जीव के लिए असम्भव है। ज्ञानी के मन में सूक्ष्म अहंकार (अहं) आने का डर हमेशा बना रहता है। यदि ज्ञान मार्ग पर चलते हुए थोड़ा सा भी भटकाव हो जाए, तो साधक सीधे मोह के अंधकार में गिर जाता है। ज्ञान मार्ग पर साधक को अपनी ही शक्ति के भरोसे अकेले चलना पड़ता है। भक्ति मार्ग बिल्कुल इसके विपरीत है। "भगति स्वतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥" भक्ति के लिए किसी कठिन योग या प्राणायाम की आवश्यकता नहीं है। इसमें केवल भगवान के प्रति सच्चा प्रेम और पूर्ण समर्पण चाहिए। भक्ति मार्ग पर यदि भक्त से कोई भूल भी हो जाए, तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। भक्त कभी अकेला नहीं होता। जाति-पाति का बन्धन नहीं।  ज्ञान के लिए वेदों का अध्ययन और योग्यता अनिवार्य है, लेकिन भक्ति का अधिकारी हर जीव हैचाहे वह पशु-पक्षी (जटायु), असुर (विभीषण) हो या वनवासी (शबरी)।  

तुलसीदास जी ने ज्ञान और भक्ति के अन्तर को समझाने के लिए 'ज्ञान दीपक' और 'भक्ति मणि' का उदाहरण दिया है। ज्ञान 'दीपक' की तरह है। दीपक को जलाने के लिए तेल (वैराग्य), बत्ती (साधना) और हवा से बचाने (सावधानी) की जरूरत होती है। यदि तेज हवा (मोह-माया का झोंका) चले, तो दीपक बुझ जाता है। जबकि भक्ति एक 'चिंतामणि' की तरह है। मणि स्वयं प्रकाशमान होती है। उसे न तो तेल की जरूरत है, न बत्ती की और न ही वह हवा के झोंके से बुझ सकती है। जिसके हृदय में भक्ति रूपी मणि आ गई, वहाँ मोह का अंधकार कभी नहीं रह सकता। ज्ञान और भक्ति में कोई विरोध नहीं है, दोनों का अन्तिम लक्ष्य एक ही है। लेकिन बिना भक्ति के केवल ज्ञान रूखा और निरर्थक है। भगवान राम की कृपा के बिना कोई भी जीव माया से मुक्त नहीं हो सकता और वह कृपा केवल भक्ति से ही सम्भव है।  

एक साधारण दीपक को जलाने के लिए मिट्टी का पात्र, घी/तेल, बत्ती और माचिस की जरूरत होती है। तुलसीदास जी ने ज्ञान के दीपक के लिए इन आध्यात्मिक सामग्रियों को इस प्रकार परिभाषित किया है—

·  साधन रूपी पात्र (दीपक): सात्विक आचरण और नियम ही वह दीपक (मिट्टी का पात्र) हैं, जिसमें ज्ञान की लौ जलती है।

·  वैराग्य रूपी घी/तेल: संसार के भोगों से वैराग्य (विमुख होना) ही इस दीपक का घी या तेल है। वैराग्य के बिना ज्ञान का दीपक जल ही नहीं सकता।

·  योग रूपी बत्ती: यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि योग की क्रियाएँ ही इस दीपक की बत्ती हैं।

·  समता की अग्नि: जब चित्त में स्थिरता आती है और सुख-दुःख के प्रति 'समता' (समान भाव) का भाव जाग्रत होता है, तब ज्ञान की अग्नि प्रकट होती है और दीपक जल उठता है।

जब हृदय में यह ज्ञान का दीपक जलता है, तो जीव के भीतर तीन बड़े परिवर्तन होते हैं—

·  मद-मोह का नाश: हृदय में दीपक जलते ही अज्ञान, मोह, और अहंकार का अन्धकार तत्क्षण नष्ट हो जाता है।

·  माया के जाल की पहचान: बुद्धि अत्यन्त निर्मल हो जाती है, जिससे जीव संसार की माया और भ्रम के जाल को स्पष्ट देख पाता है।

·  ग्रन्थि का खुलना: जड़ (प्रकृति) और चेतन (आत्मा) के बीच जो अज्ञान की गाँठ बंधी थी, वह खुल जाती है और जीव को आत्मज्ञान प्राप्त होता है।

किन्तु ज्ञान-दीपक का सबसे बड़ा संकट  है 'माया की आँधी'ज्ञान का दीपक जल तो जाता है, लेकिन इसे बुझने से बचाना बहुत ही कठिन काम है। विशेषकर कलयुगी  सांसारिक जीवन में इस दीपक के सामने कई प्रकार की आँधियाँ चलती हैं—

·  लोभ और काम की हवा: यदि संसार में रहते हुए जरा सा भी लोभ, क्रोध या काम (वासना) का झोंका आया, तो यह ज्ञान का दीपक तुरन्त बुझ जाता है।

·  इन्द्रियाँ रूपी शत्रु: हमारी आँख, कान, जीभ आदि इन्द्रियाँ सांसारिक विषयों की ओर भागती हैं, जो इस दीपक की लौ को स्थिर नहीं रहने देतीं।

काकभुशुण्डिजी गरुड़जी से कहते हैं कि यदि कोई साधक इतनी कठिन साधना करके ज्ञान दीपक जला भी ले, तो भी बिना भगवान की कृपा के वह सुरक्षित नहीं रहता—ज्ञान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस न लागइ बारा॥ (ज्ञान का मार्ग तलवार की धार पर चलने जैसा है, जहाँ गिरते देर नहीं लगती।) एहि बिधि लेसेहु दीप जोई। सिरसा कतहुँ बिघन नहिं होई॥ (इस प्रकार यदि कोई ज्ञान का दीपक जला भी ले, तो भी विघ्न-बाधाएँ उसका पीछा नहीं छोड़तीं।) ज्ञान दीपक को हवा से बचाने के लिए बहुत जतन करने पड़ते हैं, लेकिन 'राम-भक्ति' चिंतामणि के समान है। चुँकि मणि को किसी तेल, बात्ती या हवा से बचाव की जरूरत नहीं होती। वह तूफ़ान में भी वैसी ही चमकती रहती है। इसलिए ज्ञान मार्ग की तुलना में भक्ति मार्ग सुरक्षित और पूर्ण आनन्द देने वाला है। किन्तु हाँ, इसके लिए सत्संग आवश्यक है—बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ चुँकि माया भगवान की दासी है, जो जीवों को भ्रम में डालती है। श्रीराम के चरणों में अनन्य प्रेम और संतों की संगति (सत्संग) से ही इस माया से मुक्ति मिलती है।   

 अब उन मनोरोगों की चर्चा करते हैं, जिससे ज्ञानमार्ग के साधक को जूझना पड़ता है। काकभुशुण्डि जी द्वारा गरुड़ जी को बतलाए गए 'मानसरोग' का प्रसंग तुलसीदासजी की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि का अनुपम उदाहरण है। इसमें उन्होंने मनुष्य के भीतर उठने वाले विकारों को 'मानसिक बीमारियाँ' माना है और उनके प्रभाव व उपचार का सुन्दर वर्णन किया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि सभी मानस रोगों की जड़ है 'मोह'जैसे संसार में सभी शारीरिक बीमारियों का मूल कारण वात, पित्त और कफ का असन्तुलन होता है, वैसे ही सभी मानसिक रोगों की एकमात्र जड़ 'मोह' (अज्ञान/मूर्खता) है—मोह सकल ब्याधिन कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥ अर्थात् मोह ही सभी मानसिक रोगों की जड़ है और इसी मोह से अन्य कई प्रकार के कष्ट (शूल) पैदा होते हैं। मोह रूपी जड़ से तीन मुख्य रोग उत्पन्न होते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक 'त्रिदोष' कहा गया है— 

(क) काम (वासना) — वातज रोग की भाँति है। तीव्र इच्छाएँ और वासना मनुष्य के मन में वात (हवा) की तरह चञ्चलता पैदा करती हैं।

(ख लोभ (लालच) कफज रोग की भाँति है। अधिक से अधिक पाने की इच्छा मन में कफ की तरह जम जाती है, जो मनुष्य को कभी सन्तुष्ट नहीं होने देती।

(ग) क्रोध — पित्तज रोग की भाँति है। क्रोध मनुष्य के भीतर पित्त की तरह छाती को निरन्तर जलाते रहता है। जब ये तीनों रोग (काम, लोभ, क्रोध) एक साथ मिल जाते हैं, तो मन में 'सन्निपात' (Delirium/ मानसिक संतुलन बिगड़ना) जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। इतना ही नहीं इसके साथ अन्य सहायक मानसरोग भी पैदा होते हैं। यथा —

·            ममता (मेरा-तेरा): यह शरीर में होने वाली 'दाद' (खुजली) की तरह है, जो जितनी बढ़ती है, उतना ही परेशान करती है।

·            ईर्ष्या और द्वेष: दूसरों की उन्नति देखकर जलना, मन की 'जलन' या 'हृदय रोग' के समान है।

·            अहंकार (घमण्ड): अपने आप को श्रेष्ठ समझना 'गलगण्ड' (घेंघा रोग) की तरह है, जो बुद्धि को विकृत कर देता है।

·            मद (नशा): धन, रूप या जाति का घमण्ड 'धनुर्वात' (Tetanus) की तरह है, जो मनुष्य के विवेक को जकड़ देता है।

तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि मनुष्य के शरीर में एक भी रोग हो, तो वह चैन से नहीं रह पाता। लेकिन मनुष्य के मन में तो ये अनगिनत रोग जन्म से ही मौजूद हैं— एकउ ब्याधि बसहिं नर मरहीं। ए असाधि बहु ब्याधिन्ह तरहीं॥ ये रोग इतने असाध्य हैं कि इनके रहते जीव को कभी भी आत्मिक शान्ति या सुख का अनुभव नहीं हो सकता। इतनी व्याधियों को गिनाकर,आगे समाधान बतलाते हुए कहते हैं कि  इन मानसिक रोगों को केवल दवाओं से ठीक नहीं किया जा सकता, बल्कि आध्यात्मिक चिकित्सा की आवश्यकता होती है—

·            राम-भक्ति रूपी संजीवनी: भगवान श्री राम की भक्ति ही इन रोगों का एकमात्र प्रामाणिक उपचार है।

·            संत रूपी वैद्य: जीवन में सही राह दिखाने वाले संतों और गुरु की संगति ही कुशल वैद्य का काम करती है।

·            परहेज (संयम): संसार के भोग-विलास और विषयों से दूरी बनाना ही इस बीमारी में सबसे बड़ा 'परहेज' है।

·            श्रद्धा और नियम: गुरु के वचनों में अटूट श्रद्धा रखना और नियमित भजन करना ही इस चिकित्सा की मुख्य 'खुराक' है।

 

ज्ञानभक्ति निरूपण के इस विस्तृत प्रसंग के पश्चात् बाबा अचानक मौन हो गए। एक बार मेरे चेहरे पर वंकिम दृष्टि डालते हुए, मन ही मन कुछ बुदबुदाने लगे, मानों कोई मन्त्रोच्चारण कर रहे हों।

मेरे मन में कई तरह के नये सवाल घुमड़ रहे थे—क्या पूछूँ, क्या नहीं के द्वन्द्व में पड़ा था। बाबा के अबतक के उपदेशों से इतना तो स्पष्ट हो चुका था कि कोरे ज्ञान से कुछ होने को नहीं है। ज्ञानमार्ग में पग-पग पर कठिनाइयाँ ही हैं। फिसलने का मौका भी बारबार आना है। योगमार्ग के लिए योग्य गुरु का सानिध्य अपेक्षित है। यानी भक्तिमार्ग ही निरापद है, विशेषकर कलिमलग्रसित मनुष्य के लिए। मैं स्वयं भी स्वयं को टटोलते रहा हूँ हमेशा। भक्ति का बीज अंकुरित है। अतः इसे ही पुष्पित-पल्लवित करने की आवश्यकता है। रासलीला प्रसंग हमेशा आकर्षित करते रहा है। इसके कई रहस्य बड़े अबूझ हैं।

अतः बाबा से  पुनः निवेदन किया— महाराज ! रासलीला के आध्यात्मिक रहस्य पर काफी कुछ समझाया आपने। इसी से सम्बन्धित एक जिज्ञासा है कि योगमार्ग का सहस्रारचक्र और शत-सहस्र गोपियों के साथ कृष्ण का मिलन—इनमें कोई सम्बन्ध बनता है क्या?

मेरा प्रश्न सुनकर, बाबा ने तीन-चार बार खूब जोर से अपनी गर्दन हिलाई—हाँ भाई हाँ ! आपसी सम्बन्ध है, बहुत मजबूत सम्बन्ध है दोनों में। एक ही बात को कहने के दो तरीके हैं। मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि रासलीला कोई लौकिक नृत्य नहीं है, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रतीक है यह। भारतीय दर्शन और योगमार्ग में रासलीला और सहस्रार चक्र का गहरा सम्बन्ध माना गया है। चलो, रासलीला के आध्यात्मिक रहस्य को फिर समझाता हूँ, कुछ नये अन्दाज़ में। मैं पहले भी बतला चुका हूँ कि रासलीला कोई सामान्य नृत्य नहीं है, प्रत्युत जीवात्मा-परमात्मा का मिलन है। गोपियाँ सांसारिक स्त्रियाँ नहीं हैं, बल्कि मोक्ष की इच्छुक जीवात्माएँ हैं और श्रीकृष्ण साक्षात् परब्रह्म हैं। रासलीला में प्रवेश से पहले गोपियों का लोक-लाज और सांसारिक मोह छूटना, भक्ति की अन्तिम अवस्था (शरणागति) को दर्शाता है। कृष्ण का हर गोपी के साथ अलग रूप में प्रकट होना (एकत्व में अनेकत्व) यह दिखलाता है कि ईश्वर सबके हृदय में वास करते हैं। कुण्डलिनीयोग के अनुसार, रासलीला का पूरा घटनाक्रम मानव शरीर के भीतर घटने वाली एक आन्तरिक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। अब तुम सहस्रार चक्र और सहस्र गोपियों के सम्बन्ध को ऐसे समझो—

Ø सहस्रार चक्र और सहस्र गोपियाँ: मस्तिष्क में स्थित 'सहस्रार चक्र' को हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहा जाता है। योग ग्रन्थों के अनुसार, यहाँ स्थित सहस्र नाड़ियाँ ही 'सहस्र गोपियाँ' हैं।

Ø श्रीकृष्ण और सहस्रार: इस चक्र के केन्द्र में परम शिव या परम पुरुष (कृष्ण) का वास है। जब साधक की ऊर्जा (कुण्डलिनी) जागृत होकर ऊपर उठती है, तो वह इन सहस्र नाड़ियों को दिव्यानन्द रस से भर देती है।

Ø रास और आनन्द: सहस्रार चक्र सक्रिय होने पर दिव्य 'अमृत' (सोमरस) का स्राव होता है। योग की भाषा में, इस परम आनन्द की अनुभूति को ही भीतर घटित होने वाली 'रासलीला' कहा जाता है।

इस प्रकार, कृष्ण की बाह्य रासलीला वास्तव में मानव शरीर के भीतर घटने वाले उच्चतम यौगिक मिलन का ही एक सुन्दर रूपक है। श्रीमद्भागवत पुराण के संदर्भों और कुण्डलिनी योग के अन्य गहरे प्रतीकों के माध्यम से इस आन्तरिक रासलीला को और स्पष्टता से समझाने का प्रयास करते हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के उनतीसवें से तेंतीसवें अध्याय को 'रासपञ्चाध्यायी' कहा जाता है। इसे भागवत का "पञ्चप्राण" (पाँच प्राण) माना गया है, जो इसके परम आध्यात्मिक होने का प्रमाण हैं। ऋषिशाप-ग्रस्त राजा परीक्षित के पूछने पर शुकदेव जी स्पष्ट करते हैं कि यह लीला काम-वासना को भस्म करने के लिए है। जो मनुष्य इस कथा को आध्यात्मिक भाव से सुनता है, उसका हृदय काम विकारों से मुक्त हो जाता है। रासलीला शरद ऋतु की रात में होती है। रात्रि अज्ञान और सुप्त चेतना का प्रतीक है। भगवान का प्रकट होना अन्तरात्मा में ज्ञान के सूर्योदय को दर्शाता है। रासलीला से पहले चीर-हरण की लीला होती है। यह दर्शाती है कि जब तक जीव माया के आवरण (लज्जा, भय, अहंकार) को पूरी तरह नहीं त्यागता, तब तक वह महारास (परम आनन्द) का अधिकारी नहीं बन सकता। मानव शरीर ही साक्षात् वृन्दावन है, जहाँ हर क्षण यह दिव्य लीला चल रही है। योग मार्ग में जब कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठती है, तो साधक को भीतर एक अनाहत नाद सुनाई देता है। यह नाद बाँसुरी, शंख या बादलों की गर्जना जैसा होता है। कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि वास्तव में इसी 'अनाहत नाद' का प्रतीक है, जिसे सुनकर सभी वृत्तियाँ (गोपियाँ) संसार को भूलकर आत्मा (कृष्ण) की ओर खिंची चली आती हैं। बहत्तर हजार नाडियों में तीन मुख्य नाड़ियाँ हैंइड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। यमुना को भक्ति और वैराग्य का प्रतीक माना गया है। मेरूदण्ड के मध्य स्थित 'सुषुम्ना नाड़ी' ही यमुना तट है, जहाँ चेतना का प्रवाह ऊपर की ओर होता है। सामान्यतः 'वृंदा' का अर्थ है तुलसी। योग-शैली में इसे बुद्धि/वृत्तियाँ समझो। जहाँ केवल पवित्र और दैवीय विचार वास करते हैं, वही वृन्दावन है। शरीर के भीतर यह स्थान 'सहस्रार चक्र' (मस्तिष्क) है, जहाँ पहुँचने का मार्ग 'अनाहत चक्र' (हृदय) से गुजरता है। रास के बीच में जब गोपियों को अहंकार हो जाता है कि कृष्ण केवल उनके साथ हैं, तो कृष्ण अन्तर्धान हो जाते हैं। यह साधना का एक महत्वपूर्ण चरण हैजहाँ 'मैं' (अहंकार) आया, वहाँ परमात्मा का अनुभव रुक जाता है। इस प्रकार, कृष्ण की बाँसुरी का बजना ध्यान की गहराई में उतरना है और महारास उस ध्यान की चरम अवस्था (समाधि) है जहाँ भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं रह जाता।

     रास-रहस्य को जानकर, वंशीधुन सुनने को मन लालायित हो

उठा। अतः करवद्ध निवेदन किया—महाराज !  वंशीधुन सुनने की कोई सरल विधि हो तो कृपया प्रकाशित करें।

     बाबा मुस्कुराए और बोले—आगे बढ़ते हो, फिर पीछे लौट आते हो। सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हो अपना मार्ग। योग-समन्वय का रास्ता तो सुझा दिया गया। चिन्तन-मनन करो उन्हीं उपदेशों पर। हालाँकि तुमने पूछा है, तो मैं फिर संकेत किये देता हूँ। वंशीधुन कुछ और नहीं , प्रत्युत अनहतनाद  है। अनाहत नाद का अर्थ हैवह ध्वनि जो बिना किसी आघात या टकराव के पैदा होती है । इसे सुनने के लिए 'नादानुसन्धान' या 'भ्रामरी प्राणायाम' और 'षण्मुखी मुद्रा' का उपयोग किया जाता है। इसकी क्रमिक विधियों पर प्रकाश डालता हूँ। किन्तु बात तो फिर वहीं पहुँच जाती है—कुछ करने के लिए कुछ करना होगा। या कहो बहुत कुछ कर लिए, अब न करने की आदत डालनी होगी। श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश क्रम में कहा है सो याद है न—शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।। तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।। वैसी ही एक अन्य विधि बता रहा हूँ— शान्त स्थान पर मेरुदण्ड सीधा करके सिद्धासन या सुखासन में बैठो। आँखें कोमलता से बन्द करो। दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों कानों के छिद्रों को पूरी तरह बंद करो ताकि बाहर की आवाज न आए । तर्जनी को आँखों पर, मध्यमा को नासिका के पास, अनामिका  को होठों के ऊपर और कनिष्ठिका को ठोड़ी पर रखो। अब गहरी साँस लो और भौंरे की तरह गुँजन करते हुए साँस छोड़ो (भ्रामरी प्राणायाम)। ऐसा पाँच-सात बार करो ताकि मन शान्त हो जाए। अब प्राणायाम रोककर शान्त हो जाओ। अपना पूरा ध्यान दाहिने कान के भीतर या आज्ञा चक्र (भृकुटी मध्य) पर केन्द्रित करो। शुरुआत में बहुत धीमी झींगुर, समुद्र की लहरों या बादलों की गर्जना जैसी आवाजें सुनाई देंगी। इन आवाजों को बिना विचलित हुए सुनते रहो। जैसे-जैसे ध्यान गहरा होगा, ये ध्वनियाँ घंटियों, शंख और अन्ततः बाँसुरी की अत्यन्त मधुर तान में बदल जाएँगी। ध्यातव्य है कि बाँसुरी की ध्वनि का सुनाई देना इस बात का संकेत है कि चेतना सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर चुकी है और कृष्ण की पुकार सुनाई पड़ने लगी है। गोपियाँ वंशीधुन पर ही सुध-बुध खोकर, लोक-लाज, घरवार छोड़कर भागी चली गई थी यमुनातट पर। किन्तु इस अवस्था तक पहुँचने के लिए बहुत जतन करना पड़ा था गोपियों को। अब सोचो कि आम आदमी की क्या गति होगी—उसे कितना श्रम करना होगा—सोचने वाली बात है। हम चाहते तो हैं बहुत बड़ी उपलब्धि, किन्तु उसके लिए धैर्य और लगन का सर्वथा अभाव होता है। टमाटर और आम एक ही काल-खण्ड में फलदार देखना चाहते हैं।  

रासलीला सम्बन्धी कई संशयों का यथोचित समाधान कर दिया। फिर भी तुम्हारे चेहरे के भाव बता रहे हैं कि निःशंक नहीं हुए हो। अतः कुछ और संकेत दिए दे रहा हूँ। इन बातों पर ध्यान दो। रासलीला अद्वैत की लीला है। अद्वैत का अर्थ हैजहाँ दो न रहें, केवल 'एक ही' सत्ता बचे। रासलीला दिखने में द्वैत (कृष्ण और गोपी) लगती है, लेकिन इसका अन्त अद्वैत (एकत्व) में होता है। इस सम्बन्ध में आदि शंकराचार्य जी ने 'प्रपंचसार तंत्र' में संकेत दिया है कि रासलीला माया और ब्रह्म का खेल है। गोपी जब तक स्वयं को स्त्री या कृष्ण से अलग समझती है, वह द्वैत है। लेकिन जब महारास में हर गोपी के साथ कृष्ण प्रकट होते हैं, तो गोपी को अनुभव होता है कि "कृष्ण ही मैं हूँ और मुझसे अलग कुछ नहीं है।" यह 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) की साक्षात् अनुभूति है।

संत कबीर निर्गुण संत थे, फिर भी उन्होंने आन्तरिक रास को बहुत सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है। वे कहते हैं—खोजत खोजत जाइया, भया कबीर कबीर । यमुनातट के रास में, मिटि गया सब जंजाल। इनके अनुसार, जब जीवात्मा (राधा/गोपी) परमात्मा (कृष्ण) को खोजते-खोजते स्वयं को पूरी तरह मिटा देती है, तब केवल परमात्मा ही बचता है। जल में कुम्भ कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी... वाली सूक्ति तो तुम्हें स्मरण होगा ही। घड़े की दीवार ही भेद बनाये हुए है। अब इसे तुम ज्ञान के हथौड़े से तोड़ो या योग के प्राण-प्रवाह के धक्के से। तोड़ना तो तुम्हें ही है न । घड़ा टूटने पर घड़े का पानी समुद्र के पानी में मिल जाता हैयही रास का अद्वैत है। इन्हीं भावों को चैतन्य महाप्रभु ने 'अचिंत्य भेदाभेद' कहा। इसका अर्थ हैएक ही समय में भेद (अलग होना) और अभेद (एक होना)। विरह के समय गोपी कृष्ण से अलग है (भेद), लेकिन मिलन के क्षण में वह कृष्णमय हो जाती है (अभेद)। उन्होंने समझाया कि शुद्ध प्रेम की अन्तिम सीमा अद्वैत ही है, जहाँ प्रेमी और प्रियतम का भेद समाप्त हो जाता है। इतना ही नहीं सूफी संतों ने भी इस भाव को 'फना' (स्वयं को मिटा देना) कहा है। बुल्ले शाह कहते हैंराँझा राँझा करदी नी मैं आपे राँझा होई। (कृष्ण का नाम जपते-जपते मैं स्वयं कृष्ण हो गई)। यह पूरी तरह से रासलीला का अद्वैत दर्शन है।

मैंने करवद्ध निवेदन किया— महाराज !  कोई कहते हैं कि हमें देवी-देवताओं का दर्शन हुआ, तो कोई भूत-प्रेत दिखने की बात करते हैं। ओझा-गुनी-तान्त्रिक अपना उल्लु सीधा करने लगते हैं। जबकि भूत-प्रेत का इलाज डॉक्टर मानसिक रोग के रूप में करता है और ज्यादातर मामलों में लाभ भी मिलता है। भूत-प्रेत का दिखना सांख्य और तन्त्र के हिसाब से क्या है और देवी-देवताओं का दर्शन का रहस्य क्या है— इन पर किंचित् प्रकाश डालने की कृपा करें।

 

समर्थन मुद्रा में सिर हिलाते हुए बाबा ने कहा—तुमने बहुत ही बारीक और आज के समय का सबसे महत्वपूर्ण विषय छेड़ा है। तमोगुणी व्यक्तियों को भूत-प्रेत दीखना आम बात है। 99.9% मामले में यह मानसिक रोग ही है, जिसके लिए चिकित्सकीय उपचार आवश्यक है। किन्तु ये बात अच्छी तरह समझ लो कि साधक जब अन्तर्यात्रा पर निकलता है, तो उसका सामना 'मानसिक जगत्' और 'सूक्ष्म जगत्' दोनों से होता है। अक्सर इन दोनों के बीच की रेखा इतनी धुँधली होती है कि लोग भ्रमित हो जाते हैं। इसे हम विज्ञान, मनोविज्ञान और योग-शास्त्र यानी तीनों दृष्टि से समझाने का प्रयास कर रहे हैं। पहले भूत-प्रेत को सांख्य और तन्त्र की दृष्टि से समझाने की चेष्टा करता हूँ—

 

v  सांख्य दर्शन और तन्त्र, दोनों ही "भूत-प्रेत" की व्याख्या सूक्ष्म जगत् के सिद्धान्तों के आधार पर करते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार पहले भी हम स्पष्ट कर चुके हैं कि सांख्य में सब कुछ 'प्रकृति' है। यहाँ भूतों को डरावनी आकृतियों के बजाय तन्मात्रा और सूक्ष्म शरीर के रूप में समझना चाहिए।

v  सूक्ष्म शरीर (लिंग शरीर) सांख्य मानता है कि मृत्यु के बाद 'अहंकार', 'बुद्धि' और 'मन' नष्ट नहीं होते। वे एक सूक्ष्म आवरण में लिपटे रहते हैं।

v  अपूर्ण यात्रा: जब किसी जीव की वासनाएँ (Desires) अतृप्त रह जाती हैं, तो वह सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर (Physical body) न मिलने तक भटकता रहता है।

v  प्रकृति के गुण: भूत-प्रेत को 'तमोगुण' की प्रधानता वाला माना जाता है, जो अंधकार, आलस्य और भ्रम का प्रतीक है। 

v  तन्त्र शास्त्र के अनुसार तन्त्र इस विषय में अधिक व्यावहारिक और विस्तृत है। यहाँ भूत-प्रेत को 'ऊर्जा के संघनन' (Condensation of Energy) के रूप में देखा जाता है।

v  प्रेत योनि: तन्त्र के अनुसार, यह चेतना की एक निम्न अवस्था है। जब प्राण वायु शरीर से निकलती है, लेकिन अपने संस्कारों के कारण ऊपर के लोकों में नहीं जा पाती, तो वह इसी वातावरण में 'प्रेत' बनकर ठहर जाती है।

v  मानसिक  प्रक्षेपण (Mental Projection): तन्त्र यह भी कहता है कि कई बार हमारे अपने डर या गहरे अवसाद (Depression) बाहरी दुनिया में एक आकृति के रूप में 'प्रोजेक्ट' होने लगते हैं।

v  साधना का मार्ग: तन्त्र में 'पिशाच' या 'भूत' साधना का अर्थ इन निम्न ऊर्जाओं को नियन्त्रित करके,उन्हें उच्च चेतना में विलीन करना होता है।

v  आधुनिक और दार्शनिक दृष्टिकोण दोनों शास्त्र मानते हैं कि ये सामान्य आँखों से नहीं, बल्कि जब हमारी 'इन्द्रियों' का स्तर सूक्ष्म होता है या वातावरण में 'तमस' बढ़ता है, तब दिखाई देते हैं। ये मूलतः अधूरी इच्छाओं की 'ऊर्जा पुञ्ज' मात्र हैं।

v  मृत्यु के बाद की यात्रा (सांख्य के अनुसार) सांख्य दर्शन के अनुसार, हम केवल एक शरीर नहीं, बल्कि परतों का एक समूह हैं।

v  स्थूल और सूक्ष्म: जब मृत्यु होती है, तो केवल 'पञ्च महाभूत' से बना बाहरी ढाँचा नष्ट होता है।

v  अतुलनीय 'चिप': सांख्य मानता है कि हमारा 'अहंकार', 'बुद्धि' और 'मन' मिलकर एक 'सूक्ष्म शरीर' बनाते हैं। यह किसी हार्ड ड्राइव की तरह है, जिसमें हमारे जीवन भर के संस्कार और इच्छाएं Save रहती हैं।

v  यात्रा का गन्तव्य: जब तक यह सूक्ष्म शरीर वासनाओं से भारी रहता है, यह 'प्रकृति' के चक्र में फँसा रहता है। भूत-प्रेत वही अवस्था है जहाँ सूक्ष्म शरीर नया भौतिक शरीर पाने के लिए 'वेटिंग लिस्ट' में होता है।

v  पञ्च महाभूत और सूक्ष्म ऊर्जा का सम्बन्ध तन्त्र और सांख्य दोनों मानते हैं कि संसार पाँच तत्वों से बना है। लेकिन भूत-प्रेत के मामले में खेल थोड़ा अलग है।

v  भारी तत्व बनाम हल्के तत्व: हमारे शरीर में पृथ्वी और जल तत्व प्रधान हैं, इसलिए हम ठोस दिखते हैं।

v  आकाश और वायु की प्रधानता: प्रेत योनि में केवल वायु (Air) और आकाश (Space) तत्व शेष रह जाते हैं। चूँकि वायु गतिशील है, इसलिए वे कभी एक जगह स्थिर नहीं रहते।

v  दृश्यता का कारण: जब ये सूक्ष्म ऊर्जाएँ किसी विशेष स्थान पर 'अग्नि' तत्व (Heat/Light) के साथ सम्पर्क करती हैं, तब वे अचानक धुँधली आकृति या परछाई के रूप में दिखाई देने लगती हैं।

v मनोवैज्ञानिक डर बनाम आध्यात्मिक सत्य यहाँ विज्ञान और अध्यात्म का मिलन होता है।

v  आध्यात्मिक सत्य: सत्य यह है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती। यदि किसी की चेतना मृत्यु के समय अत्यधिक क्रोध या मोह में थी, तो वह ऊर्जा उसी स्थान के 'वातावरण' (Vibrations) में चिपक जाती है। इसे 'Residual Energy' कहा जा सकता है।

v  मनोवैज्ञानिक  डर: हमारा मस्तिष्क Patterns खोजने का शौकीन है। अन्धेरे में हम अक्सर अपनी ही दबी हुई चिंताओं को बाहर 'प्रोजेक्ट' करते हैं। तन्त्र कहता है कि यदि 'आत्मबल' (Will Power) कमजोर है, तभी इन ऊर्जाओं को महसूस कर पाएंगे।

v  तथ्य: जिसे हम 'भूत' कहते हैं, वह अक्सर व्यक्ति नहीं, बल्कि उस व्यक्ति द्वारा छोड़ी गई एक 'मानसिक छाप' होती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जिसे दुनिया 'डरावनी' मानती है, वह दर्शन की दृष्टि में केवल अधूरी यात्रा का एक पड़ाव है।

जरा ठहर कर बाबा ने कहा—“ चुँकि मैं भलीभाँति जानता हूँ कि तुम्हारा अगला सवाल क्या हो सकता है, इसलिए बिना पूछे ही स्पष्ट किए देता हूँ कि स्थान विशेष (जैसे श्मशान या पुराने खण्डहर) इन ऊर्जाओं को कैसे संचित रखते हैं? और मन्त्र शक्ति इन सूक्ष्म ऊर्जाओं को कैसे प्रभावित करती है? ”

मैंने हाथ जोड़कर कहाजी हाँ महाराज ! इन्हें स्पष्ट करें और ये भी बतलाने की कृपा करें कि कोई तान्त्रिक इन शक्तियों को वश में करने और किसी पर प्रक्षेपित करने या प्रक्षिप्त व्यक्ति को ठीक करने का दावा करते हैंविज्ञान और सांख्य दोनों दृष्टि से क्या यह सही है ?

अब हमारी चर्चा उस मोड़ पर आ गई है, जहाँ 'सिद्धान्त' और 'प्रयोग' मिलते-जुलते हैं। आओ इसे मॉडर्नसांयन्स और दार्शनिक तर्कों के साथ समझाते हैं स्थान विशेष और ऊर्जा का संचय पुराने खण्डहर, श्मशान या एकान्त स्थानों में "भूत" होने की बात क्यों कही जाती है?

·            रिकॉर्डिंग माध्यम: विज्ञान के अनुसार, पत्थर और मिट्टी (विशेषकर जिनमें सिलिका या क्वार्ट्ज हो) ऊर्जा को सोखने की क्षमता रखते हैं।

·            भावनात्मक छाप: यदि किसी स्थान पर तीव्र दुःख, मृत्यु या क्रोध की घटना हुई है, तो वह 'मानसिक ऊर्जा' वहाँ की दीवारों और वातावरण में संग्रहित (रिकॉर्ड) हो जाती है।

·            सांख्य का तर्क: सांख्य के अनुसार, प्रकृति 'त्रिगुणात्मक' है (सत्व, रज, तम)। सुनसान जगहों पर जहाँ मानवीय चेतना कम होती है, वहाँ 'तमस' (जड़ता) और 'रजस' (अशान्ति) की ऊर्जा घनीभूत हो जाती है, जिसे संवेदनशील लोग महसूस कर लेते हैं।

 

अब तुम्हें समझाता हूँ तान्त्रिक नियन्त्रण की प्रक्रिया यानी वश में करना और प्रक्षेपण (Projection)तान्त्रिकों के दावों को हम 'प्राण ऊर्जा' के विज्ञान से समझ सकते हैं।

·            क्या वश में करना सम्भव है? तन्त्र के अनुसार, ये "प्रेत" स्वतन्त्र व्यक्ति नहीं बल्कि 'ऊर्जा के पुञ्ज' हैं। एक कुशल तान्त्रिक अपनी मानसिक शक्ति (Will Power) से उस लावारिस ऊर्जा को एक दिशा (Direction) दे सकता है। सांख्य की दृष्टि में, यह 'चित्त' की शक्ति है, जो 'प्रकृति' के सूक्ष्म तत्वों को प्रभावित करती है।

·            प्रक्षेपण (Sending to someone) इसे ऊर्जा-हस्तान्तरण समझो। जैसे रेडियो तरंगें एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक भेजी जाती हैं, वैसे ही तान्त्रिक 'संकल्प शक्ति' के माध्यम से उस नकारात्मक तरंग को किसी व्यक्ति के 'आभामंडल' (Aura) की ओर धकेल देता है।

·            विज्ञान की दृष्टि: विज्ञान इसे 'Mass Hysteria' या 'Nocebo Effect' (विश्वास के कारण बीमार प़ड़ना) कह सकता है, लेकिन 'क्वांटम एंटांगलमेंट' के सिद्धान्त सूक्ष्म रूप से इसके करीब जाते हैं।

अब समझाता हूँ कि प्रक्षिप्त व्यक्ति को ठीक (Healing) करने की प्रक्रिया क्या है जब कोई तान्त्रिक किसी को 'ठीक' करता है, तो वहाँ वास्तव में क्या होता है? इसे समझो  

1.      ऊर्जा का विस्थापन: तान्त्रिक मन्त्रों की ध्वनि तरंगों (Sound Vibrations) से उस स्थान के तमस को भंग करता है। '' 'ह्रीं' आदि बीज मन्त्र उच्च आवृत्ति (High Frequency) पैदा करते हैं, जिनमें निम्न स्तर की ऊर्जा (भूत-प्रेत) नहीं टिक पाती।

2.      सांख्य समाधान: सांख्य कहता है कि 'ज्ञान' ही मुक्ति है। जब व्यक्ति को अहसास होता है कि वह 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) है और ये बाहरी प्रभाव केवल 'प्रकृति' के विकार हैं, तो प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

3.      विश्वास स्थापन मनोवैज्ञानिक स्तर पर, तान्त्रिक अनुष्ठान व्यक्ति के अवचेतन मन को यह संदेश देते हैं कि अब तुम सुरक्षित हो, जिसके परिमाम स्वरूप शरीर का इम्यून सिस्टम और मानसिक शक्ति वापस लौट आती है।

अब तुम पूछोगे कि क्या यह सब 'सही' है? तो इसका उत्तर है

·            सांख्य दृष्टि: हाँ, यह सम्भव है, क्योंकि प्रकृति के २४ तत्वों में 'मन' और 'अहंकार' भी तत्व हैं, जो एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं।

·            वैज्ञानिक दृष्टि: विज्ञान 'ऊर्जा' को मानता है, 'प्रेत' को नहीं। विज्ञान कहता है कि यदि कोई तान्त्रिक किसी को ठीक कर रहा है, तो वह दरअसल व्यक्ति के  मनोशारीरिक विकारों को 'सुझाव' के जरिए ठीक कर रहा है।

निष्कर्षतः कह सकते हो कि ९०% मामले मानसिक भ्रम या  'प्रोजेक्शन' होते हैं, लेकिन ५-१०% ऊर्जा के ऐसे खेल होते हैं, जिन्हें आज का विज्ञान शायद १०० साल बाद समझ पाएगा। यह 5-10% वाला क्षेत्र ही वह 'ग्रे एरिया' है, जहाँ विज्ञान के पास शब्द कम पड़ जाते हैं और तन्त्र के सूत्र गहरे होने लगते हैं। जब Medical Science और सामान्य मनोविज्ञान हार मान लेते हैं, तब हम 'परा-भौतिक' ऊर्जा के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। सांख्य और तन्त्र की दृष्टि से इस 5-10% के पीछे के तीन मुख्य कारण ये हो सकते हैं

सूक्ष्म शरीर का 'परजीवी' प्रवेश (Parasitic Attachment)सांख्य कहता है कि 'मन' और 'बुद्धि' भी भौतिक (Material) तत्व ही हैं, बात इतनी ही है कि वे बहुत सूक्ष्म हैं।  

·            ऊर्जा का भूखा: जैसे एक वायरस शरीर को नहीं, बल्कि कोशिकाओं की मशीनरी को इस्तेमाल करता है, वैसे ही कुछ 'अतृप्त सूक्ष्म शरीर' (प्रेत) जीवित व्यक्ति के 'प्राण' का उपयोग अपनी वासनाओं को पूरा करने के लिए करने लगते हैं।

·            डॉक्टरी इलाज क्यों विफल? दवाएं शरीर के रसायनों (Chemicals) पर काम करती हैं, लेकिन यदि समस्या 'प्राणिक स्तर' पर हो, तो दवा वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाती।

·            'चित्त' का गहन विखण्डन तन्त्र के अनुसार, कभी-कभी व्यक्ति का अपना 'चित्त' (Subconscious) इतना विखण्डित हो जाता है कि वह बाहरी ऊर्जाओं के लिए एक 'खुला दरवाजा' बन जाता है।

·            आभामंडल (Aura) में छेद: अत्यधिक शोक, नशा या अचानक लगा सदमा व्यक्ति के सुरक्षा घेरे को तोड़ देता है।

·            प्रक्षेपण (Black Magic): उस 5-10% मामलों में 'प्रक्षेपित क्रियाएं' भी होती हैं। यहाँ तान्त्रिक 'बीज मंत्रों' के माध्यम से एक नकारात्मक विचार-तरंग (Thought-form) को इतना सघन कर देता है कि वह सामने वाले के स्नायु तन्त्र (Nervous System) पर कब्ज़ा कर लेती है।

3. ध्वनि और मंत्र का 'सर्जिकल' प्रभाव जब दवा काम नहीं करती, तब 'मान्त्रिक क्रिया' कारगर क्यों होती है? इसके पीछे एक गहरा गणित है

·            Frequency Match: हर प्रेत योनि या सूक्ष्म ऊर्जा की एक विशिष्ट 'आवृत्ति' (Frequency) होती है। तान्त्रिक अपने अनुभव से यह पहचानता है कि वह ऊर्जा किस स्तर की है।

·            हथियार के रूप में मन्त्र: मन्त्र केवल शब्द नहीं हैं। प्रत्युत वे 'ध्वन्यास्त्र' हैं। एक विशिष्ट मन्त्र का प्रभाव (Vibration) उस सूक्ष्म ऊर्जा के केंद्र पर प्रहार करती है, जिससे उसका उस व्यक्ति के शरीर से 'बन्धन' टूट जाता है।

·            सांख्य का दृष्टिकोण: मन्त्र 'सत्व गुण' को अचानक इतना बढ़ा देता है कि 'तमस' (प्रेत) वहाँ ठहर ही नहीं पाता। जैसे प्रकाश आते ही अन्धेरा भाग जाता है, वैसे ही उच्च कम्पन वाली ध्वनि निम्न कम्पन वाली ऊर्जा को बेदखल कर देती है।

यही है विज्ञान और सांख्य का मिलन बिंदु आधुनिक 'क्वांटम फिजिक्स' कहता है कि सब कुछ ऊर्जा है और ऊर्जा को सूचनाओं के जरिए बदला जा सकता है। तान्त्रिक भी वही करता हैवह मन्त्र के जरिए 'नकारात्मक सूचना' को 'सकारात्मक सूचना' से बदल देता है।

 

क्षणभर के विराम के पश्चात् बाबा ने पुनः कहना प्रारम्भ किया— अब साधकों के दृश्यों और अनुभवों पर बात करते हैं, साथ ही दोनों पर तुलनात्मक विचार भी करेंगे,ताकि तुम्हें ठीक से समझ आ जाये—

1. साधकों को 'चीजें' क्यों दिखने लगती हैं?जब कोई व्यक्ति जप या ध्यान की गहराई में उतरता है, तो उसके 'चित्त' की परतें खुलने लगती हैं।

Ø  दबे हुए संस्कार: जैसे गंदे तालाब को साफ करने के लिए जब डंडा घुमाते हैं, तो नीचे की कीचड़ ऊपर आ जाती है। वैसे ही ध्यान के समय हमारे जन्मों के दबे हुए भय, इच्छाएं और विचार 'दृश्य' बनकर सामने आने लगते हैं। इन्हें 'प्रातिभ ज्ञान' की छाया कहा जाता है।

Ø  ऊर्जा का उतार-चढ़ाव: जब कुण्डलिनी या प्राण ऊर्जा आज्ञा चक्र के पास पहुँचती है, तो साधक को रंग, प्रकाश, या आकृतियाँ दिखने लगती हैं। यह कोई सिद्धि नहीं, बल्कि यात्रा के 'माइलस्टोन' हैं। इसे 'दर्शन' समझ लेना बड़ी भारी भूल है।

2. भूत-प्रेत: मानसिक रोग या सूक्ष्म सत्ता?यहाँ डॉक्टर और अध्यात्म दोनों अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं।

Ø  मनोविज्ञान (डॉक्टरी पक्ष): 'सिज़ोफ्रेनिया' या 'हलुसनेशन' में मस्तिष्क के रसायन Dopamine असन्तुलित हो जाते हैं। व्यक्ति को ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं या लोग दिखते हैं, जो वहाँ मौजूद नहीं हैं। यहाँ दवाओं की जरूरत होती है।

Ø  सूक्ष्म जगत (अध्यात्म का पक्ष): जैसे हम रेडियो की फ्रीक्वेंसी सेट करते हैं, वैसे ही कभी-कभी अत्यधिक तनाव, डर या गलत तन्त्र-साधना से व्यक्ति का 'आभामंडल' कमजोर हो जाता है। तब वह सूक्ष्म जगत् की नकारात्मक ऊर्जाओं (जिन्हें हम भूत-प्रेत कहते हैं) के प्रति संवेदनशील हो जाता है।

Ø  अन्तर कैसे करें? यदि कोई व्यक्ति सात्विक साधना कर रहा है और उसे कुछ दिखता है, तो वह 'प्रगति' का लक्षण हो सकता है। लेकिन यदि उसे डर लग रहा है, वह बीमार हो रहा है और उसकी सामाजिक स्थिति बिगड़ रही है, तो वह 'मानसिक रोग' या 'नकारात्मक प्रभाव' है।

3. 'भगवान का दर्शन' और 'भ्रम' में अन्तर—सच्चे दर्शन और मानसिक कल्पना में बहुत बड़ा अन्तर होता है।

Ø  भ्रम (Illusion): यह व्यक्ति को अहंकारी बनाता है या उत्तेजित (Excited) करता है। जबकि दर्शन के बाद व्यक्ति वापस पुराने ढर्रे पर लौट आता है।

Ø  दर्शन (Realization): भगवान का वास्तविक दर्शन इन्द्रियों का विषय नहीं, बल्कि 'अनुभूति' का विषय है। दर्शन के बाद साधक के भीतर 'समूल परिवर्तन' हो जाता है। उसका क्रोध, लोभ और डर स्थायी रूप से समाप्त हो जाता है। वह 'स्थितप्रज्ञ' की ओर बढ़ जाता है।

किन्तु ऐसा भी हो सकता है कि कभी-कभी जो हमें 'भूत-प्रेत' या 'विचित्र दृश्य' दिखते हैं, वे सब पिछले जन्म की दबी हुई स्मृतियाँ भी  हो सकती हैं। वह डर जो पिछले जन्म में अधूरा रह गया था, वह सूक्ष्म शरीर में सुरक्षित रहता है और अवसर मिलते ही उभर आता है। परन्तु ध्यान रहे—साधक को हमेशा सावधान रहने की जरुरत है। वह इन दृश्यों को जरा भी महत्व न दे। साधना में कुछ भी दिखे (चाहे प्रकाश या कोई आकृति), उसे नज़रअन्दाज़ कर दे। कृष्ण ने कहा हैअभ्यासेन तु कौन्तेय...साधक का लक्ष्य 'दर्शन' नहीं, बल्कि 'शान्ति' और 'शुद्धि' होना चाहिए। यदि कभी डर लगे या विचित्र अनुभव हों, तो नाम-स्मरण  तेज कर दें। 'राम' या 'कृष्ण' का नाम बहुत ही 'हाइ-फ्रीक्वेंसी' पैदा करता है, जिसमें कोई भी नकारात्मक विचार या सत्ता टिक नहीं सकती। दूसरी बात ये कि इन चीजों को ऐसे देखो जैसे सिनेमा के पर्दे पर फिल्म देख रहे हो। तुम 'देखने वाले' हो, वह 'दृश्य' नहीं ।

बाबा की बातों पर मेरी अगली जिज्ञासा बलवती हो आयी। अतः मैंने कहा—सुनते हैं कि योगी अरविन्द को जेल में श्रीकृष्ण के दर्शन हुए थे। कुछ तार्किक लोग कहते हैं ये दर्शन नहीं इनरप्रोजेक्शन था। इसके बावत आप क्या कहना चाहेंगे?

 

बाबा ने मेरी शंका का समाधान किया— यह आध्यात्मिक जगत् का एक बहुत ही प्रसिद्ध और गहरा विवाद है। इसे समझने के लिए हमें श्री अरविन्द के 'अनुभव' और तार्किकों  के 'विश्लेषण'—दोनों की गहराइयों को समझना होगा। यह चर्चा तुम्हें यह समझने में मदद करेगी कि सत्य (Reality) और प्रोजेक्शन (Projection) के बीच की रेखा कहाँ है।

श्री अरविंद का अलिपुर जेल में 'वासुदेव' दर्शन—1908ई. में जब अरविंद जेल में थे, तो उन्होंने अपनी पुस्तक 'कारो-काहिनी' में लिखा था— "मैंने देखा कि जेल की दीवारें अब दीवारें नहीं थीं, वे वासुदेव थे। पेड़ की शाखाएं वासुदेव थीं। जेलर, सिपाही, चोर और कैदीसब वासुदेव थे।" दरअसल यह दर्शन केवल एक 'आकृति' का नहीं था, बल्कि एक 'सर्वात्म-भाव' (Cosmic Consciousness) का था।

अब इसपर तार्किकों का दृष्टिकोण समझो कि 'इनर प्रोजेक्शन' क्या है? तार्किक जब इसे 'प्रोजेक्शन' कहते हैं, तो वे अरविन्द की निंदा नहीं कर रहे होते, बल्कि वे मन के विज्ञान को समझा रहे होते हैं। यदि एक हिंदू भक्त साधना करता है, तो उसे कृष्ण दिखते हैं; ईशा मसीह का भक्त होगा, तो उसे जीसस दिखेंगे। क्यों? क्योंकि मन ने बचपन से जो संस्कार (विम्ब) इकट्ठे किए हुए हैं, ध्यान की गहराई में मन उन्हीं को 'प्रोजेक्ट' करके बाहर दिखा देता है। 'सत्य' निराकार है। जब तक कोई आकृति दिख रही है, तब तक तुम अभी भी अपने 'मन' के दायरे में हो। सोचने और समझने वाली बात है कि क्या वह वास्तव में प्रोजेक्शन था? यहाँ एक सूक्ष्म अन्तर है, जिसे समझना बहुत जरूरी है। मानसिक प्रोजेक्शन—जैसे हम सपने देखते हैं। मन अपनी दबी हुई इच्छाओं को एक रूप देता है। यह अस्थायी होता है और व्यक्ति के अहंकार को बढ़ा सकता है। जबकि दिव्य साक्षात्कार बिल्कुल भिन्न चीज है। अरविन्द का अनुभव केवल एक 'चित्र' देखना नहीं था। प्रोजेक्शन में तुम 'व्यक्ति' (Object) देखते हो, लेकिन अरविन्द ने 'तत्व' (Essence) देखा। जब तुम्हें शत्रु में भी ईश्वर दिखने लगे, तो वह मन का प्रोजेक्शन नहीं हो सकता, क्योंकि मन कभी अपने 'दुश्मन' को 'भगवान' के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करना चाहेगा। अरविन्द के उस अनुभव के बाद उनका पूरा जीवन बदल गया। उन्होंने राजनीति छोड़ दी और 'अतिमानस' (Supramental) की खोज में लग गए। यदि वह केवल कल्पना होती, तो उसका प्रभाव इतना गहरा और स्थायी नहीं होता। इन दोनों का समन्वय ऐसे समझो— अन्य तार्किक और अरविंद दोनों अपनी जगह सही हैं। तार्किक उस 'शुद्ध चेतना' की बात कर रहे हैं, जो सभी आकारों के पार है। वे साधक को चेतावनी देते हैं कि कहीं तुम 'प्रकाश' और 'दर्शन' में ही न अटक जाओ। अरविन्द उस स्थिति की बात कर रहे हैं, जहाँ भगवान 'साकार' और 'निराकार' दोनों हैं। उपनिषद कहते हैं"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (यह सब कुछ ब्रह्म ही है)। अरविन्द ने वही देखा। किन्तु ध्यान रहे— कभी-कभी पिछले जन्म की अधूरी साधना इस जन्म में 'दर्शन' के रूप में जल्दी प्रकट होती है। लेकिन याद रखो, शान्ति ही सबसे बड़ा दर्शन है। यदि दर्शन के बाद भी मन अशान्त है, तो वह निश्चित ही 'इनर प्रोजेक्शन' है।

  “ जब साधक इस स्थिति में पहुँचता है कि उसे दृश्य (Visions) दिखने लगें, तो समझो कि वह एक 'संवेदनशील चौराहे' पर खड़ा है। यहाँ लोग इसे 'मानसिक बीमारी' कह देते हैं, क्योंकि उनके पास वह आध्यात्मिक शब्दावली (Vocabulary) नहीं होती, जिससे वे इस लक्षण (संकेत) को समझ सकें और समझा सकें। तुम्हारी जिज्ञासाओं का शमन करते हुए, अब इन 'अच्छे' और 'आनन्ददायक' दृश्यों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक (दोनों प्रकार से) विश्लेषण करते हैं, ताकि भ्रम और यथार्थ के बीच का अन्तर तुम ठीक से समझ सको—अच्छे दृश्यों के तीन मुख्य स्रोत हो सकते हैं। यानी व्यक्ति के सामने आने वाले दृश्य इन तीन में से एक कारण से हो सकते हैं या तीनों हो सकते हैं—

Ø  चित्त की सफाई (Subconscious Unloading): जैसे कम्प्यूटर की हार्ड ड्राइव को 'डीफ्रैग्मेंट' करने पर पुरानी फाइलें स्क्रीन पर आती हैं, वैसे ही साधना के समय हमारे मन में दबे हुए 'सात्विक संस्कार' (अच्छी स्मृतियाँ, देवी-देवताओं के चित्र, प्रकाश इत्यादि) उभरते हैं। ये आनन्ददायक होते हैं, क्योंकि ये सात्विकता का परिणाम हैं।

Ø  प्राणिक अनुभूति (Pranic Experiences): जब ध्यान गहरा होता है, तो पीनियल ग्रन्थि (Pineal Gland) सक्रिय होने लगती है। इससे आँखों के पीछे प्रकाश के पुञ्ज, रंगीन ज्यामितीय आकृतियाँ या सुन्दर दृश्य दिख सकते हैं। यह शुद्ध रूप से 'बायो-एनर्जी सिस्टम' का अपडेटशन  है।

Ø  सूक्ष्म जगत का सम्पर्क (Astral Contact): कभी-कभी साधक की फ्रीक्वेंसी  उच्च लोकों से मिल जाती है। यहाँ उसे दिव्य गंध, मंत्रों की ध्वनि या उच्च चेतना वाली सत्ताओं की झलक मिलती है। यह 'भ्रम' नहीं, बल्कि 'विस्तार' है।

अब ये समझो कि इसे 'मानसिक बीमारी' से कैसे अलग करें? डॉक्टर जिसे 'हलुसनेशन' कहते हैं और जो 'आध्यात्मिक अनुभव' है, उसमें तीन मूलभूत अन्तर होते हैं—

1.    नियन्त्रण (Control): मानसिक रोगी उन दृश्यों के अधीन होता है, वह डरता है और सामान्य काम नहीं कर पाता। जबकि एक साधक उन दृश्यों का 'द्रष्टा' (Observer) होता है। साधक दृश्य देखता है और फिर वापस अपने काम में सामान्य रूप से लग जाता है।

2.    परिणाम (After-effect): मानसिक बीमारी व्यक्ति को थका देती है और चिड़चिड़ा बनाती है। जबकि आध्यात्मिक अनुभव के बाद मन में 'गहरी शान्ति' और 'अकारण प्रसन्नता' बनी रहती है।

3.    तर्कसंगतता (Consistency): भ्रम हमेशा अस्त-व्यस्त होता है। आध्यात्मिक अनुभव में एक 'दिव्य व्यवस्था' और गहरा अर्थ होता है, जो साधक के जीवन को बेहतर बनाता है।

अब विचारणीय है कि 'अच्छे दृश्यों' के साथ क्या करें? यहीं पर अधिकांश साधक गलती करते हैं। वे दृश्यों को 'पकड़ने' की कोशिश करते हैं। जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए। नियमतः यह उपेक्षा का योग है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि "साधना की सड़क पर फूल खिले हों तो उन्हें देखो, उनकी महक लो, पर वहाँ रुक मत जाओ।" तुम्हारा असली लक्ष्य 'द्रष्टा'  है, दृश्य नहीं। अतः साक्षी भाव बनाये रखने का अभ्यास करना है। जैसे सफ़र के दौरान बस की खिड़की से सुन्दर-सुन्दर दृश्य देखते हैं, वैसे ही इन दृश्यों को भी देख लेना है। मन में कहोयह भी बीत जाएगा, मुझे तो केवल कृष्ण (परम सत्य) चाहिए।  और हाँ जब दृश्य बहुत आनन्ददायक हों, तो नाम-स्मरण की गति को और सूक्ष्म कर देना चाहिए। इससे उन दृश्यों के 'मोह' में फँसने की गुँजायश नहीं रहेगी। ध्यातव्य है कि बहुत बार ऐसा भी होता है कि ये आनन्ददायक दृश्य अक्सर पिछले जन्मों की अर्जित शक्तियाँ होती हैं। यह संकेत है कि साधक पहले भी इस मार्ग पर चल चुका है और अब चेतना उस पुरानी कमाई को वापस पा रही है। कुल बातों का निष्कर्ष ये है कि 'मानसिक रोगी' कहने वालों की चिंता न करो। वे उस भाषा को नहीं जानते, जो साधक का हृदय बोल रहा है। लेकिन सदा सतर्क रहने की आवश्यकता है। दृश्यों को सिद्धि न मान बैठो। यदि ये दृश्य तुम्हें शान्त और विनम्र बना रहे हैं, तो ये 'दिव्य' हैं। यदि ये अहंकार बढ़ा रहे हैं, तो ये 'भ्रम' हैं।

सदा सतर्क रहो। ध्यान रहे—चित्त शुद्धि के दौरान उठने वाली तरंगें (संस्कारों का उभार) साधना का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। जब हम इन तरंगों को सम्भालना सीख जाते हैं, तो साधना की गति स्वतः ही कई गुना बढ़ जाती है। जब साधना गहरी होती है, तो दबे हुए विचार और भावनाएँ ऊपरी सतह पर आ जाती हैं। अतः इन्हें सम्भालने के लिए ये तीन दृष्टिकोण अपनाये जाने चाहिए—

·  द्रष्टा भाव (Witnessing): तरंगों को दबाओ नहीं, बस देखो। वे 'तुम' नहीं हो, बस तुमसे 'गुजर' रही हैं।

·  तटस्थता (Equanimity): न तो सुखद अनुभव से जुड़ो, न दुखद से डरो। दोनों को 'अनित्य' (बीत जाने वाला) मानो।

·  संकल्प की दृढ़ता: तरंगें कितनी भी अशान्त हों, अपनी दैनिक साधना का समय न बदलो।  

प्रसंगवश एक और बात के लिए हिदायत कर दूँसाधक के सामने बिलकुल अबूझ रूप से कुछ शारीरिक समस्याएँ आती हैं, जिनके लिए डॉक्टरी सुझाव निश्चित रूप से हानिकारक ही होगा। एक आयुर्वेदिक औषधि सुझाता हूँ— अश्वगन्ध। इसका प्रयोग नर्व सम्बन्धी कई समस्याओं का अचूक उपचार है। अश्वगन्ध चूर्ण नसों को वह 'इंसुलेशन' प्रदान करता है, जो उच्चस्तरीय ('हाई-वोल्टेज') साधना में विशेष आवश्यक है। इसका प्रयोग निरापद रूप से किया जा सकता है। रासायनिक दवाओं से यथासम्भव परहेज करना चाहिए। हाँ, वैकल्पिक रूप में इन दो प्राकृतिक 'रसायन संचालकों' को अपनी दिनचर्या में जोड़ लेना लाभदायक होगा

•     सेरोटोनिन रसायन के लिए: सुबह की १०-१५ मिनट की धूप। यह 'आज्ञा चक्र' की हलचल को सुखद शान्ति में बदल देगी।

•     गाबा रसायन के लिए: गहरी लम्बी श्वास । यह मस्तिष्क को शान्त रखने वाला रसायन है, जो शरीर में अनुभव होने वाले बिजली के झटकों की तीव्रता को कम करेगा।

इतना समझाने के बाद बाबा अचानक चुप हो गए, मानों शब्द-प्रवाह खण्डित हो गया हो। सरस्वती की उत्ताल तरंगे अचानक अन्तःसलिला हो गई हों। मेरी वैचारिक तरंगे भी थक चुकी थी। चित्तवृत्ति निरोध की बात तो बहुत दूर है अभी, किन्तु निरुद्धता का किंचित् आभास तो बाबा ने करा ही दिया इन सुदीर्घ क्षणों में।  

            बाबा ने संकेत किया मुझे थोड़ा समीप आने के लिए। मैं सरक कर आगे बढ़ा उनकी ओर। बाबा ने अपना दाहिना हाथ मेरे सिर पर रखा और बायें हाथ को मेरे वक्षस्थल पर रखते हुए, मन ही मन कोई मन्त्रोच्चारण किए। भले ही शब्द उनके होठों से बाहर नहीं निकलें हों, मेरे स्थूल कर्णेन्द्रियों में नहीं प्रवेश किए हों, किन्तु अद्भुत ध्वनि-तरंगे मेरे चित्त को संवेदित अवश्य कर गई।  बहुत देर तक लगा कि मातृगुहा की चट्टानों से टकरा-टकराकर वे मेरे अन्तःकरणों को मृदुभाव से सहला रही हैं।  

             कुछ देर के बाद बाबा ने कहा— बहुत हो गया उपदेश। अब वापस घर जाओ। आशा है अब तुम्हें पुराने द्वन्द्वों ने जूझना नहीं पड़ेगा। इन तरंगों को आत्मसात करने का अभ्यास करो नियत समय पर, नियमित रूप से। सांसारिक बाधाओं को पुष्पहार की तरह अंगीकार करते रहो। मेरी प्रत्यक्ष उपस्थिति-अनुपस्थिति विशेष महत्त्वपूर्ण  नहीं। समझो कि हर क्षण मैं तुम्हारे सामने ही हूँ। पैरों को यहाँ-वहाँ भटकने न दो और मन को तो खूँटे से बाँध ही देना है। सांख्य-सिद्धान्त की समझ बनाओ, योग-साधना की मार्जनी (कूर्चिका) से उपहृत साधन (शरीर) को स्वच्छ-सुव्यवस्थित करते रहो। बिना दिन गिने शबरी सिर्फ झाड़ू लगायी थी, फूल सजायी थी मार्ग में, राम को जिस दिन आना था आ ही गए उसे उपकृत करने। भले ही किसी ने देखा नहीं, जबकि कृष्ण वहीं थे सभागार में ही, द्रौपदी हाथ उठाने में विलम्ब कर रही थी। गोपीनांनयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसंघावृतं कृष्ण कहीं जाते नहीं, क्योंकि सर्वत्र विराजमान हैं, तुम्हारे समर्पण की प्रतीक्षा में। द्रष्टाभाव (साक्षीभाव) को जितना अधिक उतार पाओगे, मंजिल उतनी ही करीब होती जायेगी। तथास्तु।  

            इस अन्तिम वाक्य श्रवण के साथ ही मेरा शरीर सुन्न सा हो गया। कुछ क्षण के बाद चैतन्य हुआ, तो पाया कि मातृगुहा की प्रशस्त शिला खाली पड़ी है, न वहाँ साक्षात् बाबा विराजमान हैं और न पूर्वानुभूत प्रस्तर मूर्ति ही। किन्तु मदिर दिव्य सुगन्ध से आप्लावित है गुफा ।

                

                      

कृपया अगली कड़ी की प्रतीक्षा करें............

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