साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)
नौंवा और अन्तिम भाग (गतांश से आगे पृ.225 से 228)
उपसंहार
त्रिगुणात्मिका सृष्टि जटिल तो नहीं , किन्तु अबूझ जैसी अवश्य है। आम आदमी इसमें उलझने की ज़हमत भी नहीं लेना चाहता। हजारों-लाखों में विरले कोई एक जो समझने-जानने की चेष्टा करते हैं, वो पार पाने के वजाय उलझकर रह जाते हैं। प्राचीन से अधुनातन पर्यन्त सारस्वत-साधना के अकूत वाङ्गमय पटे पड़े हैं। किन्तु सबके सब किसी न किसी एक कोण विशेष के विम्ब से ही परिचय करा पाते हैं और सौभाग्य से जो समग्र का साक्षात्कार करते हैं, वे मौन हो जाते हैं। मौन हो जाना उनकी गलती नहीं है, बल्कि विवशता है। आँखिरकार वे समग्र को शब्दों में समेटें तो कैसे ! अनिर्वचनीय को वचनीय बनायें कैसे ! वेद ‘नेति-नेति’ कहकर आगे निकल जाते हैं। जिज्ञासु ठिठका रह जाता है।
रास्ता हर अकेले को ढूँढ़ना है। किसी और के ढ़ूढ़े हुए रास्ते पर झाँका जा
सकता है, जाया नहीं जा सकता। जाने वाला रास्ता, पहुँचाने वाला रास्ता, तो निहायत
अकेला ही होगा। किन्तु समस्या तब होती है, जब कोई पथिक स्वयं को सर्वश्रेष्ठ धावक
मान बैठता है और औरों को भी सिर्फ और सिर्फ उसी पगडंडी पर पीछे-पीछे आने के लिए
जोर-जबरदस्ती करने लगता है। नाना पंथ-सम्प्रदाय, जिसे तथाकथित धर्म की संज्ञा दे
दी गई है, सद्धर्म से उतने ही दूर है, जितना धरती से आकाश। मंजिल तो तभी प्राप्त हो सकती है, जब हम कृष्ण
का अन्तिम उपदेश शिरोधार्य कर लें—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज...।
“साधक का
द्वन्द्व”—“आत्ममन्थन का नवनीत”
आम जिज्ञासु के भीतर अनवरत उठने वाले तूफानों का शब्दचित्र है। मैंने
जो कुछ जाना, सुना, पढ़ा, समझा, पाया, अनुभव किया, उन सबको पूरी तन्मयता और
ईमानदारी के साथ प्रस्तुत संग्रह में संजोने का यथासम्भव प्रयास किया है। कुछ ऐसी
अनुभूतियाँ, जिन्हें अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ, सम्यक् अभिव्यक्ति दी भी नहीं जा
सकती, उनके लिए पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ।
संक्षेप में सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि “सांख्य की समझ” आवश्यक है। इससे कंटकाकीर्ण प्रतीत
होने वाला साधन-मार्ग सहज सुगम्य हो जाता है। “योग की साधना” शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनं को सुदृढ़ बनाता है। “भक्ति की ज्योति”
मणि-कांचन संयोग जुटाती है, ताकि सांसारिक विसंगतियाँ विशेष रूप से बाधित
न कर सकें। और हाँ, अन्त के बारे में क्या कहना, अन्त तो “महारास में विलय” ही है, चाहे जिस रास्ते से आएँ।
कौन सी सृष्टि ! कहाँ संसार !!
नींद खुली, स्वप्न
भंग हुआ, बोध हो गया—बातें समाप्त।
न अथ न इति।
‘दार्शनिक आधार’, ‘आत्मिक स्थिति’ और ‘प्राप्ति-प्रक्रिया’ भेद से, आप अब इसे जो नाम देना चाहें,
दे लें — मोक्ष, कैवल्य, निर्वाण...।
।। हरि ऊँ तत्सत् ।। हरि ऊँ तत्सत्।।
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