सूर्यांशियों का दीप्तिमान मुकुट
प्रिय आत्मन् !
हम
‘सूर्यांशी’ हैं,
‘सूर्यवंशी’ नहीं
। हम ‘शाकद्वीपीय’
हैं, ‘शकदीपी’ या ‘सकलदीपी’ नहीं। ‘शकों’ से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं । हम ‘भोजक’ हैं,
भोजवंश से कुछ लेना-देना नहीं है। हम ‘दिव्यदेव’
हैं, ‘भूदेव’ नहीं। भूदेव कहलाना हमारा अवमूल्यन है।
ज्ञातव्य
और ध्यातव्य है कि हम
चिकित्सक, कर्मकाण्डी वा ज्योतिषी बन कर नहीं आए थे। हम यहाँ पौरोहित्य जैसा निन्दक
कर्म करने हेतु भी नहीं आए थे। हम साम्ब के कुष्ठरोग का निवारण करने नहीं आए
थे। उनका कुष्ठरोग तो सूर्याराधन और
सूर्यदर्शन से ही ठीक हो चुका था।
ध्यातव्य है कि हम इन विद्याओं के विशेषज्ञ अवश्य रहे
हैं। क्योंकि ये सब के सब लौकिक तुच्छ विद्याएँ हमारी घुट्टी में मिली हुई थी। हमारे
रग-रग में रसी-बसी हुई थी। भालू का बच्चा बिना रोंएँ का नहीं हो सकता,उसी भाँति हम
सूर्यांशियों में ये सभी रहस्यमयी विद्याएँ सुप्तावस्था में सुरक्षित पड़ी हुई
हैं। समय पर सजग होकर, सचेष्ट होकर, हमें इन्हें सिर्फ चैतन्य कर लेने की आवश्यकता
है। नाली में गिर रहे हीरे के कणों को धो-पोंछ कर सहेज लेने की जरुरत है।
अस्तु, अज्ञानियों, धूर्तों, चाटुकारों और दरबारी इतिहासकारों के
भ्रमजाल से सर्वथा मुक्त हो जाएँ मेरे दिव्यात्मन् !
उक्त
नई लग रही बातों (क्योंकि आपने सही बात जानी नहीं। जानने का प्रयास भी नहीं
किया मूल ग्रन्थों को पलट कर।) को सुनकर आपके शंकालु-विस्फारित नेत्र मुझसे सवाल
कर सकते हैं कि आँखिर हम आए किसलिए !
मेरे
प्यारे सूर्यांशियों !
कान
कुरेद कर, धूर्तों-मूर्खों द्वारा भरे गए कचरे को साफकर, कृपया ध्यान से सुने-गुने।
इन बातों को गहराई से समझें। भ्रामक
युग्मकों को ठीक से परखें।
श्रीमद्भगवद्गीता
चतुर्थ अध्याय के प्रथम श्लोक में श्रीकृष्ण ने संशयग्रस्त सखा अर्जुन से कहा है—
इमं
विवस्ते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। (अयम् इमम् अव्ययम्
योगम् विवस्वते प्रोक्तवान्)
अभिप्राय
यह है कि रहस्यमयी ब्रह्मविद्या का प्रथम उपदेश परम चेतन श्रीकृष्ण ने
सर्वप्रथम सृष्टि के आदिदेव—आदित्य—सूर्यदेव को दिया था। यह गुह्य ब्रह्मविद्या
“सूर्यतन्त्र”
के नाम से अभिहित है।
चुँकि हम सूर्यांशी हैं, अतः यह रहस्यमय
सूर्यतन्त्र हमारे पास अनादिकाल से सुरक्षित है। इसी ब्रह्मविद्या के बीज—सूर्यतन्त्र
की पुनर्स्थापना हेतु हम यहाँ जम्बूद्वीप में लाए गए थे, क्योंकि महर्षि गौतम
शापित, भूलोकीय भूदेव ‘ब्रह्मविद्याविहीन’
हो गए थे। जम्बूद्वीप से सूर्यतन्त्र लुप्त हो गया था।
आइये,
सबसे पहले ‘अंशी’- ‘वंशी’ का भ्रम दूर करें। ‘वंश’ से
‘वंशी’
बना और ‘अंश’ से ‘अंशी’ यानी अंशी-वंशी में ‘नन
बायोलॉज़िकल’ और ‘बायोलॉजिकल’
वाला फ़र्क है ।
ज्ञातव्य है कि सृष्टि के मुख्य तीन स्वरूप हैं—दैवी,
मानसी और मैथुनी। जिनमें प्रथम दो—दैवी और मानसी आधुनिक शब्दावली में ‘नन
बायोलॉज़िकल’ हैं एवं
मैथुनी को ‘बायोलॉज़िकल’ जाने।
मैथुनी का भी दो स्वरूप है—‘योनिभोग’ और ‘दृष्टिभोग’।
ध्यातव्य है कि विशेष परिस्थितियों में ‘अंशी’ को
भी ‘वंशी’ की गरिमा मिल जाती हैं, जबकि ‘वंशी’ को ‘अंशी’
कदापि नहीं स्वीकारा गया है।
सनातन
का अवतार-सिद्धान्त शत-प्रतिशत ‘नन बायोलॉज़िकल’ ही
है, किन्तु राम, कृष्ण, वामन, परशुरामादि को वंशी कहलाने की गरिमा मिली है। यथा—
श्री रघुवंशी राम सूर्यवंशी कहे गए, श्रीकृष्ण चन्द्रवंशी एवं यदुवंशी
कहलाए।
अयोनिजा’-‘याज्ञसेनी’
द्रौपदी, धृष्टद्युम्न, कर्णादि पाण्डव और इनसे पूर्व धृतराष्ट्र, पाण्डु,
विदुरादि सबके सब ‘नन बायोलॉज़िकल’ एवं
‘दृष्टिभोग’ श्रेणी
के ही हैं।
अंशी-वंशी की सीमा और मर्यादा के परस्पर संघर्ष के अनेक प्रसंग
पुराणों में मिलते हैं, जिसे ‘मेकाले
ब्रान्ड चश्में’ से पढ़कर आधुनिक अध्येता और विचारक स्वयं भ्रमित होकर, अन्यान्यों
को भ्रमजाल में धकेलते रहे हैं।
अज्ञानता, धूर्तता और प्रचण्ड मूर्खतावहुल वर्तमान,
उक्त दोनों मूल क्षत्रिय वंशियों के बेतुके घालमेल से पटा पड़ा है।
नियम-कानून-संविधान ने सनासन-सिद्धान्त और सत्य की पूर्णाहुति दे डाली है। किन्तु,
यहाँ इसपर गहन विचार करना भी विषयान्तरित होने जैसा होगा। इन बातों के विशद
विस्तार में आलेख का मुख्य उद्देश्य बाधित होगा, अतः मूल विषय पर आते हैं।
शाकद्वीपीय
सूर्यांशियों की उत्पत्ति दक्ष-पुत्री संज्ञा की विरहवेदना के निवारण स्वरूप हुई। असह्य
सूर्य-तेज-पीड़िता संज्ञा की समस्या- निवारण हेतु विश्वकर्मा ने सूर्य-तेज
को खरादकर, किंचित् न्यून करने का लोककल्याणकारी प्रयास किया।
‘भ्रमीयन्त्र’ से छिटकी उक्त चिंगारियों (सूर्यांश)
से ही दिव्यविप्रों (सूर्यांशियों) का उद्भव हुआ, जिन्हें सुदूर शाकद्वीप में
स्थान दिया गया।
कालान्तर
में महर्षि गौतम शापित जम्बूद्वीपीय ब्राह्मणों (भूलोकीय देव—भूदेव—पंच द्रविड़, पंचगौड़ादि)
के निस्तेज (तेजहीन) हो जाने के परिणामस्वरूप जम्बूद्वीपीय व्यवस्था चरमराने लगी। फलतः
लोक कल्याणकारी लीलाएँ रची गई—जाम्बवतीनन्दन साम्ब कुष्ट-व्याधि ग्रस्त हुए
श्रीकृष्ण शापित होकर, देवर्षि नारद सूत्रधार बने और विष्णु-वाहन गरुड़ मगविप्र
सूर्यांशियों के भारवाहक बनकर गौरवान्वित हुए।
सुदूर
शाकद्वीप से जम्बूद्वीप में अठारह कुल (परिवार सहित) सूर्यांशियों का आगमन हुआ
गरुड़वाही होकर और इस प्रकार साम्ब के व्याज से समस्त जम्बूद्वीपियों का उद्धार हो
गया। ब्रह्मविद्या (सूर्यतन्त्र) पुनर्स्थापित हुआ भूलोक में।
किन्तु
दुर्भाग्य !
हमारा
तेजोदीप्त मुकुट ही कालान्तर में हमारे बहुवर्गीय ईर्ष्यालु विरोधियों को उद्बेलित
कर दिया। हमारा देदीप्यमान मुकुट ही हमारा शत्रु बन गया। फलतः हमारे विरुद्ध
तरह-तरह के षड़यन्त्र रचे जाने लगे। कोई हमें वर्णसंकर, तो कोई हमें विदेशी
(प्रवासी) कहकर, उद्वासित करने की योजनाएँ बनाने लगा।
मजे
की बात ये है कि हमने उनकी बातों का प्रतिकार कम, स्वीकार ज्यादा किया। वे कहते गए
और हम सुनते रहे, मौन साधे रहे। हमारा मौन उन्हें बल देता रहा। हमारी तटस्थता
उन्हें उत्साहित करता रहा। हम अपनी तेजस्विता की चकाचौंध में खोए रहे और वे अपनी कुटिलता
के मसालची बने रहे ।
सर्वाधिक
दुःखद और चिन्तनीय बात ये है कि हमारे हाथ सक्रिय तो सदा रहे, किन्तु किसी गिरते
को उठाने हेतु कम, किसी उठते को गिराने हेतु ज्यादा। हम पैर छूने के लिए यदाकदा
झुके, पैर खींचने के लिए ज्यादा तत्पर रहे—सौ साल पहले भी और आज भी।
वस्तुतः,
जम्बूद्वीपीय सभ्यता में—यहाँ के गुण-दोषों में लिप्त होकर, शनैःशनैः हम अपनी
मौलिकता खोते गए। वर्तमान स्थिति यह है कि शापित भूदेवों और हम दिव्यदेवों में तेजहीनता
की स्थिति समान हो गई है या कहें उनसे भी कहीं अधिक तेजहीन हो चुके हैं हम, क्योंकि
वे अपनी दयनीयता को समझते हुए, शापमुक्ति हेतु प्रयत्नशील रहे और हम अपनी दिव्यता
के मद में, ‘गरुड़वाही’ के
‘गुरुर’
में निरन्तर तेजहीन होते चले गए।
फूँकमार कर चूल्हा जलाने वाली मातृशक्तियों और हवनकुण्ड
की होमाग्नि प्रज्वलित करने वाले याज्ञिकों को अब माचिस और लाइटर का सहारा लेना
पड़ रहा है।
त्रिलोकी के भगवान (श्रीकृष्ण) सूर्यांशियों के यजमान तो
बने, किन्तु इस गरिमामय पौरोहित्य के दीप्तिमान मुकुट की चकाचौंध ने हमें ‘प्रज्ञाचक्षु’ विहीन
कर दिया । कदापि दक्षिणा नहीं लेने वाला सूर्यांशी, परान्नभक्षण का सर्वदा निषेधी
भोजक “जिह्वा दग्धा परान्नेन हस्तौ
दग्धौ परिग्रहात् । परस्त्रिभिर्मनोदग्धं मन्त्रसिद्धिः कथं भवेत् ।। ” को चरितार्थ करते हुए, रसातल
में औंधे मुँह गिरते रहे । यजमान के सुस्वादु भोज्य पदार्थों ने हमारी जिह्वा को
निस्तेज कर दिया है। दान-दक्षिणा की प्रतीक्षा में पसरे हाथों में वह शक्ति नहीं
रह गई, जिसके संकेतमात्र से सूर्यरथ भी ठहर जाता था। गौ, गीता, गायत्री, गंगा सब विसर गए। तिरोहित हो
गए। प्रवाहमयी उल्टी गायत्री उच्चारण करने वाला सूर्यांशी कायदे से सीधी गायत्री
भी नहीं उच्चरित कर पाता। करता भी है तो विशुद्ध बम्बईया स्वर में—फिल्मीस्टाइल
में। ‘आदित्य के हृदय’ को
हृदय में धारण करने वाला, सूर्यमण्डल को नाभिमण्डल में स्थापित किए रहने वाला ‘मगविप्र’ अपने नाभि के स्पन्दन को भी नहीं समझ पाता—इससे बड़ा
दुर्भाग्य और क्या हो सकता है !
हास्यास्पद है कि जिस प्रकार लोकचक्षु
ही नहीं, विवेकचक्षुहीन धृतराष्ट्र ने हस्तिनापुर के संदिग्ध राजमुकुट को कर्तव्य
विहीन होकर, सदा सम्भाले रहने के चक्कर में कुल ही नहीं, राष्ट्र का विध्वंस करा
दिया, उसी प्रकार हम भी अपने गौरवपूर्व दीप्तिमान पौरोहित्य-मुकुट को जकड़े-पकड़े
बैठे हैं कर्तव्यहीन होकर।
मेरे दादाजी के दादाजी के
दादाजी के पास सौ हाथी थे, जो एक-एक कर मरते गए। पाँच कट्ठे की हवेली में पिताजी ने सबका सांकल बड़े यत्न से
सम्भाल रखा था—ऐतिहासिक साक्ष्य स्वरूप और समय-समय पर चौराहे पर खड़े होकर झनझनाया करते थे कि मेरे खानदान में
सौ हाथी थे। मेरे पास अब वह सांकल भी नहीं बचा है, क्योंकि आधुनिकता की चकाचौंध
में हमने हवेली के साथ-साथ सांकल को भी कवाड़ में बेंच दिया और 1 BHK का
प्लैट अमेरिका में ले लिया। चुँकि कमरा एक ही है, इसलिए माता-पिता को यहीं, वृद्धाश्रम
में भर्ती करा दिया। दरअसल हम आधुनिक हो गए हैं न, इसलिए आधुनिकता के राह में आड़े
आने वाली हर चीजों का हमें तहेदिल से वहिष्कार करना है।
मेरी
दृष्टि बदल गई है। मेरे विचार बदल गए हैं। मेरा आहार बदल गया है। मेरा व्यवहार वदल
गया है। मेरा संस्कार बदल गया है।
संस्कृत
पढ़ा नहीं। भूले-विसरे कभी, अपनी संस्कृति से परिचय भी कराया तो हिन्दी-अंग्रेजी
अनुवादों ने। ‘अज्ञेयजी’ के शब्दों में कहें तो – ‘ अनुवाद यानी प्राणहीन शरीर ’।
अरे भाई मेरे !
गौरवपूर्ण
इतिहास को हस्तिनापुर के राजमुकुट की भाँति सिर पर धारण किए, पैंतरा भाँजते रहोगे,
तो कुछ उपलब्ध नहीं होने वाला है। क्योंकि उसकी चकाचौंध में कुछ देख-सुन-समझ ही
नहीं पाओगे।
मैं
ये नहीं कहता कि इतिहास तथ्यहीन है, झूठ है, बेकार है।
मेरे
कथन का अभिप्राय यह है कि इतिहास कोई राजमुकुट नहीं है। जिसे वंशानुगत आगे सरकाते
रहा जाए। इतिहास को सीढ़ी की तरह प्रयोग करो। सीढ़ियाँ चढ़कर, ऊपर- नीचे,
दाएँ-बाएँ देखो-निहारो-समझो-बूझो। भूत से वर्तमान तक सम्यक् दृष्टिपात करो।
तदनुसार भविष्य की योजना (कर्तव्य) निर्धारित करो।
धूर्तो,
मक्कारों और मूर्खों के चक्कर में, प्रगतिशीलता-आधुनिकता का मदिरापान कर, बजबजाती
नाली में औंधेमुँह गिरने को बेताब न होओ मेरे भाई !
मेकाले
की शिक्षा, बड़े संस्थानों की बड़ी डिग्रियाँ बड़े-बड़े पैकेज़ वाला रोबोटिक
नौकर बना सकती हैं तुम्हें; किन्तु
मनुष्य कदापि नहीं बना सकती । फलतः या तो तुम बिना सींग-पुच्छ वाला जानवर बने
रहोगे या रोबोटिक यन्त्र।
इस
भ्रम में न रहो मेरे भाई ! कि पन्द्रह से पचास
लाख के पैकेज वाला विदेश प्रवासी बेटा तुम्हारी अर्थी उठाने और पिण्डदान करने हेतु
पन्द्रह दिनों की छुट्टी ग्रान्ट करा ही लेगा। दिमाग के रोशनदान से समझदारी की
रौशनी आने दो। जान लो, समझ लो कि समय पर या तो उसे छुट्टी नहीं मिलेगी या फ्लाइट
कैन्सल रहेगा। तुम्हारी अर्थी नगरनिगम की बदबूदार गाड़ी पर लदेगी और सनातन
विरुद्ध विद्युतशवदाह गृह में पल भर में फूँक दिए जाओगे, क्यों कि जिसके बेटे
को फुरस्त नहीं, उसके लिए पड़ोसी अपना समय क्यों बरबाद करेंगे !
मेरी
बातें यदि सही लग रही हों तो चमकीले मुकुट को पैरों तले दबाकर, खड़े हो जाओ तनकर
और चहुँओर निहारते हुए, आगे का मार्ग प्रशस्त करो। स्वयं सम्भलो और भावी पीढ़ी को मार्गदर्शन कराओ।
और
नहीं तो मन ही मन बुदबुदा लो—बुढ़वा सठिया गया है... ज्ञान बाँटने चला है
महाज्ञानी समाज को...।
उच्चशिक्षा
के नाम पर दूर भेजकर, अपना अभिभावकत्व न खोओ। विदेश भागते बच्चों को सद्बुद्धि पूर्वक
रोको। अपने समाज से बाहर झाँकती जोड़ियों को बनने का अवसर ही न दो । समय पर (अधिकतम
चौबीस वर्ष) वैवाहिक बन्धन में जकड़ दो। घातक
‘लवेरिया
के मरीज़’ बनने से पहले ही ‘फैमिली
नर्सिंगहोम ’ में ‘कॉरेन्टाईन’ कर
दो।
कैरियर
के नाम पर ट्रैक्टर का डाला न बनने दो मेरे प्यारे मग बन्धुओं ! अन्यथा
महानगरीय कचरा ही लदकर घर आयेगा, कमल-कमलिनी का सुगन्ध नहीं। कुलबधु नहीं, कुलबोरनी उठा लायेगा बेटा। नाज़ो
से पाली गई बेटी मुँह पर कालिख पोत कर अपने ‘ब्वॉयफ्रैंड’
के साथ ‘लवज़िहाद’ कर बैठेगी और तुम ताकते ही रह जाओगे
बटेर की तरह।
और
इससे भी पहले, आठ से बारह वर्ष, अधिकतम सोलह वर्ष के भीतर बेटे का यज्ञोपवीत
संस्कार करके, सूर्यतन्त्र का बीज — संध्या-गायत्री का उपदेश देकर भावी
भटकाव से बचाओ। मूर्खतापूर्ण परम्परा का हवाला देकर, विवाह-समय उसके गले में यज्ञोवीत
के बासी धागे का बोझ न लटकाओ। विलम्ब से यज्ञोपवीती बनाने की धृष्टता करके,
अपने प्यारे पुत्र को “व्रात्यदोष” से
मुक्त नहीं कर पाओगे मेरे भाई !
मेरी
बातें कड़वी और बेतुकी लग रही होगी, किन्तु वर्तमान सामाजिक विसंगति, विखराव और
पतन के लिए नादान-नासमझ बच्चे कम दोषी हैं, असली दोष तो तुम्हारा ही है मेरे भाई !
हस्तिनापुर
की बरबादी में केवल दुर्योधन को क्यों दोष देना ? वह
अभागा मूरख तो धृष्टराष्ट्र की महत्त्वाकांक्षाओं का पुतला और शकुनी के चौसर का मोहरा
बनकर रह गया।
आँखें
खोलो मेरे भाई !
धृतराष्ट्र तुम हो नहीं और गाँधारी बनने की बेवकूफी भी न
करो।
सतत
सजग-सचेष्ट रहते हुए— सनातन षोडशसंकारों के मौलिक सिद्धान्तों के महत्व और औचित्य
पर अमल-पहल करो। क्योंकि यदि गर्भाधान ही असंस्कारित है, फिर अन्त्येष्ठि को
असंस्कारित होने से भला कौन रोक सकता है !
आहार-विहार-व्यवहार और
संस्कारों को सहेज लोगे यदि, तो तुम्हारा खोया हुआ दीप्तिमान सामाज्य पुनः यथावत प्राप्त हो जायेगा। क्योंकि तुम
मूलतः सूर्यांशी हो, सूर्यांशी बने रहोगे। यह कोई राजनैतिक-संवैधानिक व्यवस्था
नहीं, बल्कि यह तुम्हारा जन्म-सिद्ध मौलिक अधिकार है और पावन कर्तव्य भी ।
जयभास्कर।
#कमलेश
पुण्यार्क (गुरुजी), www.punyarkkritti.blogspot.com
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