Wednesday, 2 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-146

गतांश से आगे...अध्याय 23 भाग 20

अग्निस्थापन,कुशकण्डिका,ब्रह्मास्थापन,प्रोक्षणी-प्रणीतादि स्थापन,होमकर्म-तर्पणमार्जन,विविध बलिकर्म,त्रायुष ग्रहणादि— उक्त सभी पूजन कर्म की समाप्ति के पश्चात् अब पूर्व निर्मित- सुसज्जित हवन वेदी के समीप आकर आगे का कार्यारम्भ करेंगे।हवन हेतु कुण्ड वा वेदी का निर्माण किया जाता है।कुण्ड की अपेक्षा वेदी सुविधाजनक और निरापद भी है।वेदी का चित्र पद्धति के प्रारम्भ में दिया जा चुका है।वेदी-व्यवस्था का ही प्रधान अंग है- ब्रह्मास्थापन,प्रोक्षणी,प्रणीता,कुशकण्डिका दि। ब्रह्मा के स्थान के सम्बन्ध में भी मतान्तर है।प्रायः लोग इन्हें ईशान में रख देते हैं- जैसा कि वास्तुमंडल में ईशान और पूर्व में स्थान है।तो कुछ लोग अग्नि कोण में,कुछ सीधे दक्षिण में।अतः प्रसंगवश इसका भ्रमनिवारण अत्यावश्यक प्रतीत हो रहा है।वास्तु मंडल,दिक्पालमंडल, वा ग्रहमंडल में ब्रह्मा का स्थान निर्विवाद रुप से ईशान-पूर्व मध्य में ही है;किन्तु अग्निवेदी के साथ यह नियम मान्य नहीं है।अतः,प्रश्न उठता है कि क्या इसे अग्निकोण में रखें, जैसा कि सूक्ष्मपरख के अभाव में लोग रख दिया करते हैं,या कि दक्षिण में ? इस सम्बन्ध में भारतीय विवाह पद्धति में एक प्रश्नोत्तर है,जिसे यहाँ उद्धृत किया जा रहा है—
प्रश्न—उत्तरे सर्वतीर्थानि,उत्तरे सर्व देवता,उत्तरे प्रोक्षणी-प्रोक्ता,किमर्थं ब्रह्म दक्षिणे?
उत्तर— दक्षिणे दानवा प्रोक्ता,पिशाचाश्चैव राक्षसाः। तेषां संरक्षणार्थाय ब्रह्मस्थाप्य तु दक्षिणे।। यानी सभी तीर्थ,देवादि,प्रोक्षणी-प्रणीता जब उत्तर में है,तो ब्रह्मा को दक्षिण में क्यों? तदुत्तर में कहा गया कि दक्षिण में दानव,राक्षस,पिशाचादि वास करते हैं,अतः यज्ञ में इनसे रक्षार्थ ब्रह्मा को यहीं स्थान देना चाहिए।
उक्त प्रश्नोत्तर का थोड़ा और विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि अग्नि कोण में अग्निदेव का स्थान है,साथ ही ग्रहों में शुक्र का स्थान भी यहीं है।ये महाशय ही दानवादि के प्रिय गुरु हैं। आदरणीय यज्ञ-रक्षक पितामह ब्रह्माजी को इनके समीप ही कहीं स्थान देना उचित है,इस बात का ध्यान रखते हुए कि अग्नि और शुक्र दोनों का सामीप्य भी मिले,तथा यम के क्षेत्र में अतिक्रमण भी न हो।इस प्रकार सुनिश्चित स्थान पर चावल-हल्दीचूर्ण,कुमकुमादि से अष्टदल कमल बना कर,उस पर पीतरंजित चावल से परिपूर्ण एक कलश की स्थापना करे। इस ब्रह्मकलश के आकार और चावल की मात्रा के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश है कि यजमान की मुट्ठी से दोसौछप्पन मुट्ठी चावल होना चाहिए,जो कि करीब साढ़ेबारह किलो होता है।अज्ञान या अभाव में लोग एक छोटा सा कलश मात्र रख देते हैं। इस विशेष कलश पर पूर्णपात्र रखने का विधान नहीं है, प्रत्युत कुशा में गांठबांध कर(मानवाकृतिस्वरुप) ऊपर से खोंस देना चाहिए।
ब्रह्मावरणः- अब,द्रव्यअक्षतपुष्पादि लेकर,सुविधानुसार,पूर्व पूजित ब्राह्मणों में से किसी को ब्रह्मा नियुक्त करे—यथा चतुर्मुखो ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः। तथा त्वं मम यज्ञेऽस्मिन् ब्रह्मा भव द्विजोत्तम ! एवं,उक्त ब्रह्माकलश के समीप आसन देकर,गायत्र्यादि जप हेतु निवेदन करे।  

हवनवेदीसंस्कारः- अब,कुशा लेकर वेदी का झाड़न संस्कार करे, थोड़ा सा कपूर जलाकर, हवनवेदी पर अंगार भ्रमण की क्रिया भी करे। तत्पश्चात् गोमय मिश्रित जल का वेदी पर प्रोक्षण करे।अब,दाहिने हाथ में एक कुशा लेकर,बायें हाथ की हथेली को फैलाकर,वेदी पर दक्षिणोत्तर क्रम से तीन बार रखते हुए,पश्चिम से पूर्व की ओर तीन रेखायें खींचे,तथा तीनों रेखाओं पर से (अंगूठा और अनामिका के सहारे) चुटकी भर वालु/मिट्टी उठा कर वेदी के उत्तर दिशा में फेंक दे, तथा शुद्ध जल का छिड़काव कर दे।तत्पश्चात् वेदी के उत्तर दिशा में, क्रमशः दो कुश खण्डों पर दो पात्र प्रोक्षणी और प्रणीता के निमित्त स्थापित करें।इन दोनों में जल भर कर, अलग-अलग कुशा से ढक दे। आगे अग्नि-वेदी-व्यवस्था को एक  चित्र के माध्यम से स्पष्ट किया गया है।


                                                                          


अब,वेदी के पूरब में उत्तराभिमुख,दक्षिण में पूर्वाभिमुख,पश्चिम में उत्तराभिमुख,एवं उत्तर में पूर्वाभिमुख एक-एक कुशा रखे,तथा अग्निवेदी से प्रणीता तक,एवं वेदी से ब्रह्मा तक भी एक-एक कुशा रखदें।तत्पश्चात् नवीन कांसे(फूल)की थाली में किसी बालिका से अग्नि मंगवाकर, अग्निवेदी के मध्य में स्थापित करे।ध्यातव्य है कि अग्निस्थाली को सम्मुख रखते हुए वेदी पर अंगार उझले,तथा वायीं ओर रिक्त अग्निस्थाली को रख कर,उसमें पुष्पाक्षत सहित कुछ द्रव्य भी छोड़ दे।इस थाली सहित द्रव्य का अधिकारी विप्रवालिकायें ही हुआ करती हैं।
अब,आम्र के डंठल में आम्रपत्र को मौली के सहारे बांध कर होमार्थ स्रुवा बनावे,और उसे वेदी पर स्थापित अग्नि में किंचित तपावे।
अग्निस्थापनः- ॐ मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक तथा। पितृणां च नमस्तुभ्यं विष्णवे पावकात्मने।। रक्तमाल्याम्बरधरं रक्तपद्मासनस्थितम्। रौद्रवागीश्वरीरुपं वह्निमावाहयायहम्।। ॐ अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्। सुवर्ण वर्णममलमनन्तं विश्वतो मुखम्।। सर्वतः पाणिपादश्च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। विश्वरुपो महानग्निः प्रणीतः सर्वकर्मसु।। ॐ अग्ने शाण्डिल्यगोत्राय मेषध्वज मम सम्मुखो भव। प्रसन्नो भव। वरदा भव। ॐ पावकाग्नये नमः।।
अब, ॐ पावकाग्नये नमः मन्त्रोच्चारण पूर्वक आवाहित अग्नि का पंचोपचार पूजन करे। तत्पश्चात् निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक सिर्फ घी से पांच आहुतियां प्रदान करें। प्रत्येक आहुति के बाद स्रुवा में शेष घी को उत्तर की ओर रखे पात्रों में झाड़ता जाये— ॐ प्रजापतये स्वाहा,इदं प्रजापतये न मम। ॐ भूः स्वाहा,इदमग्नये न मम।  ॐ भुवः स्वाहा,इदं वायवे, न मम। ॐ वं स्वाहा,इदं सुपर्णाय न मम। ॐ अग्नये स्वाहा,इदमग्नये न मम। 
तथाच, एक और घृताहुति इस मन्त्र से प्रदान करें—यथावाणप्रहाराणां कवचं भवति वारकम्। तथा दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिणा। ॐ प्रजापतये स्वाहा,इदं प्रजापतये न मम।।    तत्पश्चात् पुनः आचार्य महोदय इसी मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान पर जल छिड़क दें।

(नोट- 1.तरल पदार्थ घृतादि की आहुति स्रुवा से तथा ठोस पदार्थों की आहुति बिना स्रुवा के प्रदान करे।यथा- द्रवद्रव्यं स्रुवेणैव पाणिना कठिनं हविः। स्रुवहोमे सदा त्याज्यः प्रोक्षणीपात्र मध्यतः।।

2.आहुति की मात्रा न बिलकुल कम हो,और न बहुत अधिक- तर्जनी,कनिष्ठा को हटाकर,यानी मध्यमा,अनामिका और अंगुष्ठ के सहारे जितनी मात्रा उठायी जा सके- यही उचित मात्रा है,एवं आहुति प्रदान करने की विहित मुद्रा भी। मुद्रा के सम्बन्ध में शास्त्र निर्देश है- होमे मुद्राः स्मृतास्तिस्रो मृगी हंसी च सूकरी। मुद्रां बिना कृतो होमः सर्वो भवति निष्फलः।। शान्तिके तु मृगी ज्ञेया हंसी पौष्टिक कर्मणि। सूकरी त्वभिचारेषु कार्या मन्त्रविदुत्तमैः।। सूकरी करसंकोची हंसी मुक्तकनिष्ठिका। कनिष्ठा तर्जनी युक्ता मृगीमुद्रा प्रकीर्तिता।।

3. आचार्य मन्त्रोच्चारण करें,यजमान आहुति डाले,साथ ही स्वयं भी स्वाहा बोलते रहे।आहुति के प्रत्येक खंड के पश्चात् वेदी पर—प्रज्वलित अग्नि से बाहर— जल गिरा दिया करे।)

गौरीगणेशार्थ होमः- ॐ गणपतये नमः स्वाहा। ॐ गौर्यै नमः स्वाहा। (घृत वा शाकल से)

समस्तमात्रिकादि होमः-(घृत वा शाकल से सत्रह आहुति गणेशसहित षोडशमात्रिकाओं के लिए,तथा सात आहुति श्रियादिसप्तघृतमात्रिकाओं के लिए एवं चौंसठ आहुति ६४ योगिनियों के निमित्त प्रदान करें)
 ॐ गौर्यादिषोडशमात्रिकेभ्यो नमः स्वाहा।- (१६ आहुति)।
 ॐ श्रियादिसप्तघृतमात्रिकेभ्यो नमः स्वाहा।- (७ आहुति)।
 ॐ दिव्ययोगादिचतुषष्टियोगिनीमात्रिकेभ्यो नमः स्वाहा।-(६४ आहुति)।

नवग्रहहोमः-अब,नवग्रहों की समिधा (घृतयुक्त) से बारी-बारी से मन्त्र बोलते हुए क्रमशः नौ आहुतियाँ प्रदान करें- ॐ सूर्याय  नमः स्वाहा। ॐ  चन्द्राय नमः स्वाहा। ॐ भौमाय नमः स्वाहा।   ॐ बुधाय नमः स्वाहा। ॐ बृहस्पतये नमः स्वाहा। ॐ शुक्राय नमः स्वाहा। ॐ शनैश्चराय  नमः स्वाहा। ॐ राहवे नमः स्वाहा। ॐ केतवे नमः स्वाहा।

(नोटः-अकवन,पलाश,खैर,चिड़चिड़ी,पीपल,गूलर,शमी,दूर्वा,और कुश ये नवग्रहों की क्रमशः समिधायें हैं- अर्कःपलाशः खदिरोऽह्यपामार्गोऽथ पिप्पलः।उदुम्बरः शमी दूर्वाः कुशाश्च समिधः क्रमात्।।)

अब,वेदी पर,अग्नि से बाहर थोड़ा जल गिरा दें;और आगे की आहुतियाँ तिलादिमिश्रित शाकल से प्रारम्भ करें।

अधिदेवताप्रत्यधिदेवताहोमः-(ईश्वरादि अधिदेवों के लिए नौ आहुतियाँ,और अग्यादिप्रत्यधिदेवों के भी नौ आहुतियां प्रदान करें)-
ॐ ईश्वरादिऽधिदेवताभ्यो नमः स्वाहा।                  
ॐ अग्यादिप्रत्यधिभ्यो  नमः स्वाहा।

पंचलोकपालहोमः-  (पांच आहुति पंचलोकपालों के लिए दें)
ॐ  गणपत्यादिपंचलोकपालेभ्यो नमः स्वाहा।

दशदिक्कपालहोमः- (दस आहुति दिक्कपालों के लिए दें)-
ॐ  इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः स्वाहा।

एकादशरुद्रहोमः- ॐ  रुद्राय नमः स्वाहा। (ग्यारह आहुति रुद्र के लिए दें)
क्षेत्रपालहोमः- ॐ अजरादिसहितपञ्चाशत्क्षेत्रपालदेवेभ्यो नमः स्वाहा। (५० आहुति दें)
{{ कश्चितमतानुसार  पुनः गणपत्यादिहोम- ॐ गणपतये नमः स्वाहा। ॐ दुर्गायै नमः स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे नमः स्वाहा। ॐ सोमाय नमः स्वाहा। ॐ ईशानाय नमः स्वाहा। ॐ इन्द्राय नमः स्वाहा। ॐ अग्नये  नमः स्वाहा। ॐ यमाय  नमः स्वाहा। ॐ निर्ऋतये नमः स्वाहा। ॐ वरुणाय नमः स्वाहा। ॐ वायवे नमः स्वाहा। ॐ ध्रुवाय नमः स्वाहा। ॐ अनिलाय नमः स्वाहा। ॐ नलाय नमः स्वाहा। ॐ प्रभाशाय नमः स्वाहा। ॐ त्र्यम्बकाय  नमः स्वाहा। ॐ सुरेश्वराय नमः स्वाहा। ॐ  विष्णवे नमः स्वाहा। ॐ सत्याय नमः स्वाहा।  }}

वास्तुमण्डलदेवताहोमः-(अब ६४ आहुति वास्तुमंडलदेवों के लिए दें)—
१.      ॐ  शिखिन्यै नमः स्वाहा।
२.    ॐ  पर्जन्याय नमः स्वाहा।
३.    ॐ जयन्ताय नमः स्वाहा।       
४.    ॐ इन्द्राय  नमः स्वाहा।
५.   ॐ सूर्याय नमः स्वाहा।
६.     ॐ सत्याय नमः स्वाहा।
७.   ॐ  भृशाय नमः स्वाहा।
८.    ॐ  अन्तरिक्षाय नमः स्वाहा।
९.     ॐ अनिलाय नमः स्वाहा।
१०. ॐ  पूष्णे नमः स्वाहा।
११.  ॐ  वितथाय नमः स्वाहा।
१२.ॐ  वृहक्षताय नमः स्वाहा।
१३.ॐ  यमाय नमः स्वाहा।
१४.   ॐ  गन्धर्वाय नमः स्वाहा।
१५.   ॐ  भृंगराजाय नमः स्वाहा।
१६.  ॐ  मृगायै नमः स्वाहा।
१७.  ॐ  पितृभ्यो नमः स्वाहा।
१८. ॐ  दौवारिकाय नमः स्वाहा।
१९. ॐ  सुग्रीवाय नमः स्वाहा।
२०.  ॐ  कुसुमदन्ताय नमः स्वाहा।
२१. ॐ  वरुणाय नमः स्वाहा।
२२.   ॐ  असुराय नमः स्वाहा।
२३.   ॐ  शोषाय नमः स्वाहा।
२४. ॐ  पापयक्षमाय नमः स्वाहा।
२५. ॐ  रोगाय नमः स्वाहा।
२६.  ॐ  नागाय नमः स्वाहा।
२७. ॐ  मुख्यै नमः स्वाहा।
२८.   ॐ  भल्लाटाय नमः स्वाहा।
२९.   ॐ  सोमाय नमः स्वाहा।
३०.   ॐ भुजगाय नमः स्वाहा।
३१.ॐ  अदित्यै नमः स्वाहा।
३२.  ॐ  दित्यै नमः स्वाहा।
३३.  ॐ  आपाय नमः स्वाहा।
३४. ॐ  सावित्राय नमः स्वाहा।
३५. ॐ  जयाय नमः स्वाहा।
३६.  ॐ  रुद्राय नमः स्वाहा।
३७. ॐ  अर्यम्णे नमः स्वाहा।
३८.  ॐ  सवित्रे नमः स्वाहा।
३९.  ॐ विवस्वते नमः स्वाहा।
४०.  ॐ  इन्द्राय नमः स्वाहा।
४१.   ॐ  मित्राय नमः स्वाहा।
४२. ॐ  राजयक्षम्णे नमः स्वाहा।
४३.  ॐ  पृथ्वीधराय नमः स्वाहा।
४४. ॐ  आपवत्साय नमः स्वाहा।
४५.ॐ  ब्रह्मणे नमः स्वाहा।
४६.  ॐ  चरक्यै नमः स्वाहा।
४७.ॐ विदार्यै नमः स्वाहा।
४८. ॐ  पूतनायै नमः स्वाहा।
४९.  ॐ  पापराक्षस्यै नमः स्वाहा।
५०. ॐ  स्कन्दाय नमः स्वाहा।
५१.  ॐ  जृम्भकाय नमः स्वाहा।
५२.  ॐ  पिलिपिच्छाय नमः स्वाहा।
५३. ॐ  इन्द्राय नमः स्वाहा।
५४.ॐ  अग्नये नमः स्वाहा।
५५.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       ॐ  ॐ यमाय नमः स्वाहा।
५६. ॐ  नैर्ऋतये नमः स्वाहा।
५७.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        ॐ वरुणाय नमः स्वाहा।
५८. ॐ  वायवे नमः स्वाहा।
५९. ॐ  कुबेराय नमः स्वाहा।
६०.   ॐ  ईशानाय नमः स्वाहा।
६१. ॐ  ब्रह्मण्ये नमः स्वाहा।
६२.  ॐ  अनन्ताय नमः स्वाहा।
६३.  ॐ  पृथिव्यै नमः स्वाहा।
६४.                       ॐविष्णवेनमःस्वाहा।

प्रधानवास्तुहोमः- ये पांच आहुतियाँ घृतलेपित बिल्वफल,अभाव में बेल के बीजों से दी जाती हैः-
१.- ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो भवानः।यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषस्व शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।। ॐ वास्तुपुरुषाय स्वाहा।
२.- ॐ वास्तोष्पते प्रतरणो न एधि गयस्यानो गोभिरश्वेभिरिन्द्रोः। अजरासस्ते सख्यो स्याम पितेव पुत्रान् प्रतितन्नो जुषस्व स्वाहा।। ॐ वास्तोष्पतये स्वाहा।।
३.- ॐ वास्तोष्पते शग्मया सँ◌सदा ते सक्षीमहि रण्वया यातु मत्या। पाहि क्षेम उत योगे वरे नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः स्वाहा। ॐ वास्तोष्पतये स्वाहा।।
४.- ॐ अमीवहा वास्तोष्पते विश्वा रुपाण्याविशन् सखा सुशेष एधिः नः स्वाहा।। ॐ वास्तोष्पतये स्वाहा।।
५.- ॐ वास्तोष्पते ध्रुवा स्थूणा सत्रं सोम्यानाम्।द्रप्सो भेत्ता पुरा शश्वतीनामिन्द्रो मुनीनां सखा स्वाहा।। ॐ वास्तोष्पतये स्वाहा।।
पुनः मूल मन्त्र— ॐ वास्तोष्पतये स्वाहा- से १०८ आहुतियाँ प्रदान करें।

पुनः प्रासाददुर्गदेवायतन होमः- (ये दस आहुतियाँ तिलादिशाकल से प्रदान करें)—
ॐ  भीमरुपाय नमः स्वाहा। ॐ पुरारये नमः स्वाहा। ॐ अग्निजिह्वाय नमः स्वाहा। ॐ करालाय नमः स्वाहा। ॐ हेतुकाय नमः स्वाहा। ॐ अग्निवेतालाय  नमः स्वाहा। ॐ कालाय नमः स्वाहा। ॐ कुविदङ्गाय नमः स्वाहा। ॐ गन्धमाल्याय नमः स्वाहा। ॐ ज्वालाय  नमः स्वाहा।
पुनः विष्णुहोमः- ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पाँ◌सुरे स्वाहा।। ॐ विष्णवे स्वाहा।। (इस मन्त्र से विष्णु के निमित्त अष्टोत्तरशत(१०८)आहुतियाँ प्रदान करें)

अब,पुष्पाक्षतजलादि लेकर संकल्प बोले- ॐ अद्य कृतस्य होमस्य फलसाफल्यार्थं स्वाहा-स्वधा युतस्य वरदनामाग्नेः पूजनं करिष्ये— इस प्रकार संकल्प करके वरदनाम अग्नि का पंचोपचार पूजन करना चाहिए— ॐ स्वाहा-स्वधायुताग्नये वैश्वानराय नमः —इस मन्त्र से गन्धादि पूजन सामग्री अर्पित करने के पश्चात् हवन कार्य से शेष बचे शाकल,चरु आदि सामग्रियों को किसी पात्र में उठाकर बायें हाथ में लेलें,एवं दाहिने हाथ में होमार्थ स्रुआ में घी भर कर लेलें,और  ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा,इदमग्नये स्विष्टकृते न मम — बोलते हुए अग्नि में छोड़ दें।तथा पुनः सिर्फ घी से नौ आहुतियाँ प्रदान करें—
१.      ॐ  भूः स्वाहा। इदमग्ने न मम।
२.    ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम।
३.    ॐ  स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम।
४.    ॐ  त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाँ◌सि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा। इदं अग्निवरुणाभ्यां न मम।
५.   ॐ  स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ।अवयक्ष्व नो वरुणँ◌रराणो वीहिमृडीक◌सुहवो न एधि स्वाहा। इदं अग्निवरुणाभ्यां न मम।
६.     ॐ  अयाश्चाग्ने स्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्व मयाँऽअसि।अयानो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजँ  स्वाहा। इदमग्ने अयसे स्वाहा।
७.   ॐ ये ते शतं ये सहस्रं यज्ञिया पाशा वितता महान्तः। तेभिर्न्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः  स्वाहा। इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यश्च न मम।
८.    ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यममँ◌श्रथाय। अथावयमादित्य व्रते तवानागसोऽअदितये स्याम स्वाहा। इदं वरुणायादित्यायादितये न मम।

९.     ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।

क्रमशः....

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