Friday, 2 February 2018

राशिफलःसम्वत 2075(2018-2019 ई.)

सम्वत् २०७५ का साम्वत्सरिक राशिफल 
एवं कुछ अन्य खास बातें   :-----

         सम्वत् २०७५ का नया पञ्चांग १८ मार्च २०१८ से लागू होने वाला है, जो आगामी ५ अप्रैल २०१९ तक जारी रहेगा । ध्यातव्य है कि इस वर्ष ज्येष्ठ मास में अधिकमास हो रहा है। इस कारण से कैलेंडर के हिसाब से समय कुछ अधिक प्रतीत हो रहा है। वस्तुतः ये सम्वत बारह के वजाय तेरह महीनों का हो गया।
        आंग्ल नववर्ष (कैलेन्डर इयर) प्रारम्भ होने के बाद कई बन्धुओं ने आग्रह किया था राशिफल पोस्टिंग के लिये, किन्तु पुराने सम्पर्की बन्धु जानते हैं कि मैं साम्वत्सरिक राशिफल ही पोस्ट करता हूँ। हर वर्ष की भांति इस बार भी वार्षिक (साम्वत्सरिक) राशिफल प्रस्तुत किया जा रहा है। किन्तु इससे पूर्व नये सम्वत् के सम्बन्ध में कुछ खास बातें जानने योग्य हैं, जिन्हें यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।
वर्ष के प्रारम्भ में  विरोधकृत नामक सम्वत्सर रहेगा, किन्तु शुद्धज्येष्ठकृष्ण अमावस्या, मंगलवार, दिनांक १५ मई २०१८ को (गया समयानुसार) दिन में १२ बजकर २९ मिनट से ‘परिघावी’ नामक सम्वत्सर का प्रवेश हो जायेगा, परन्तु वर्ष पर्यन्त संकल्पादि में विरोधकृत नामक सम्वत्सर का ही प्रयोग करना चाहिए, क्यों कि नियम है कि वर्षप्रवेश में जो नामधारी है, वही आगे भी संकल्पित होना चाहिए। ऐसा प्रायः हर वर्ष ही होता है।
इस सम्वत् २०७५ के प्रवेश के साथ-साथ कलियुग का ५११९ वर्ष व्यतीत हो जायेगा। प्रत्येक सम्वत्सर के एक राजा और मन्त्री हुआ करते हैं, जिनके स्वभावानुसार प्रजाजन सुख-दुःखादि भोग करती है। इस सम्वत्सर के राजा सूर्य और मन्त्री शनि हैं । भले ही पिता-पुत्र का सम्बन्ध है इन दोनों में, किन्तु ग्रहमैत्रीचक्रानुसार परस्पर शत्रुभाव है,परिणामतः शासकों में भी परस्पर विरोधी स्थिति देखी जा सकती है। जगल्लग्न के अनुसार लग्नेश बुध दशम स्थान में देवगुरु से दृष्ट होकर विराजमान हैं, जो कि वैश्विक स्तर पर राष्ट्र की प्रतिष्ठा और वर्चश्व का संकेत है। यदाकदा किंचित पड़ोसी राष्ट्रों से तनावपूर्ण वातावरण भी बना रह सकता है। राष्ट्र का उत्तरोत्तर विकास दीख रहा है। प्रशासनिक व्यवस्था पहले की अपेक्षा चुश्तदुरुस्त होने के आसार हैं। विदेशी राजनयिकों की भारत यात्रा की सम्भावना में वृद्धि होगी। सैन्य-शक्ति का भी विकास होगा। अन्तरिक्षीय अनुसंधान कार्य में आशातीत प्रगति होने की सम्भावना है। वर्षलग्नानुसार बुध की सप्तमभाव में स्थिति आन्तरिक एवं सीमा सुरक्षा की सुदृढ़ता का संकेत दे रहा है। अन्य व्यावसायिक विकास के साथ-साथ पर्यटन और विदेशी व्यापार की भी प्रगति प्रतीत हो रही है। वर्षा-विचार के अनुसार एक ओर उत्तम वृष्टि-योग दीख रहा है,तो दूसरी ओर जलप्लावन और कहीं-कहीं सुखाड़ जैसी स्थिति भी हो सकती है। खरीफ की फसल पूर्व की अपेक्षा अच्छी होगी,किन्तु रबी का उत्पादन किंचित न्यून हो सकता है। किंचित प्राकृतिक आपदायें भी देश को झेलनी पड़ सकती हैं।
सम्वत् २०७५ में विश्व में कुल पांच ग्रहण होंगे- तीन सूर्यग्रहण एवं दो चन्द्र ग्रहण,जिसमें भारतवर्ष में मात्र एक चन्द्रग्रहण ही दृश्य होगा। ये खग्रास चन्द्रग्रहण आषाढ़ पूर्णिमा २७ जुलाई २०१८ को उत्तराषाढ़ नक्षत्र यानी मकर राशि पर लगेगा,जिसका मानक समय गया समयानुसार रात्रि ग्यारह बजकर छियालिस मिनट से रात्रि तीन बजकर इकतालीस मिनट तक होगा।
अब यहां आगे क्रमशः मेषादि बारहों राशि के जातकों के लिए संक्षिप्त राशिफल प्रस्तुत किया जा रहा है। आमतौर पर सीधे अपनी राशि जानकर फल देख लेने की परम्परा है; किन्तु इस सम्बन्ध में मैंने पिछली बार भी कहा था,पुनः स्मरण दिला रहा हूँ— फल-विचार सिर्फ राशि से न करके, लग्न से भी करें। जैसे - मेरी राशि कुम्भ है और लग्न सिंह । सटीक फल विचार के लिए राशिफल-विवरण में दिए गये दोनों फलों का विचार करके निश्चय करना चाहिए । मान लिया कुम्भ राशि का फल उत्तम है, किन्तु सिंह लग्न का फल प्रतिकूल है । ऐसी स्थिति में निश्चयात्मक परिणाम मध्यम होगा ।
          दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि आपके नाम का प्रभाव भी सामान्य जीवन में काफी हद तक पड़ता है। हमारे यहां विधिवत नामकरण-संस्कार की परम्परा थी । नाम सार्थक हुआ करते थे, उनका निहितार्थ हुआ करता था; किन्तु अब तो इंगलैंड-अमेरिका के कुत्ते-विल्लयों का नाम हम अपने बेटे-बेटियों का रखकर गौरवान्वित होते हैं । नियमतः नाम के प्रथमाक्षर के अनुसार बनने वाली राशि के फल का भी विचार कर लेना चाहिए । इस प्रकार त्रिकोणीय दृष्टि से राशिफल-विचार करना सर्वोचित है ।
          एक और,सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य, जिसे लोग प्रायः नजरअंदाज कर देते हैं— व्योम-मण्डल में सत्ताइस नक्षत्र और बारह राशियों के परिक्रमा-पथ पर विचरण करते हुए सूर्यादि नवग्रह (ध्यातव्य है कि अरुण, वरुण, यम को प्राचीन भारतीय ज्योतिष में स्थान नहीं है) भूमण्डलीय समस्त पद-पदार्थों को प्रभावित (नियन्त्रित) कर रहे हैं। विश्व की आबादी सात अरब से भी अधिक की है। इन्हें मात्र बारह भागों में विभाजित करके किसी ठोस फलविचार / निर्णय पर पहुँचना कितना बचकाना (नादानी) हो सकता है? सिर्फ राशि वा लग्न के आधार पर मनुष्य मात्र को बांट देना क्या सही और समुचित नियम हो सकता है? आपका उत्तर भी ‘कदापि नहीं’ ही होगा। आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, शारीरिक,मानसिक आदि कई मापदण्ड होंगे इन्हें प्रभावित करने हेतु । इसके साथ ही अलग-अलग व्यक्तियों के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति, तथा वर्तमान (गोचर) स्थिति आदि कई बातों पर किसी व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य आधृत होता है । राशि तो मात्र जन्मकालिक चन्द्रमा की स्थिति को ईंगित करता है और लग्न जन्मकालिक कक्षों (भावों) की सांख्यिकी मात्र है। अतः फलविचार कितना सार्थक-कितना निरर्थक हो सकता है,आप स्वयं समझ सकते हैं। पुनः यह कहना आवश्यक नहीं रह जाता कि राशिफल के आधार पर अपने जीवन को आशा-निराशा,प्रसन्नता-अप्रसन्नता के झूले में हिचकोले खाने से बचावें और अपना तात्कालिक कर्म यथोचित रीति से करने का प्रयास करें। अस्तु।
          सुविधा के लिए ‘अबकहा चक्र-सारणी’ भी राशिफल के साथ प्रस्तुत है । इससे उन लोगों को भी लाभ होगा, जिन्हें अपनी राशि और जन्म-समय आदि की सही जानकारी नहीं है।
                         
                   विक्रम सम्वत् २०७,शकाब्द १९४०,
                            खृष्टाब्द २०१८-२०१९
   { १८मार्च २०१८ से ५ अप्रैल २०१९  तक का राशिफल }
            बारह राशियों का क्रमानुसार फल-विचार

१.मेष राशि- (चू,चे,चो,ला,ली,लू,ले,लो,अ) - मेष राशि वाले लोगों के लिए यह वर्ष (संवत्) सामान्यतया शुभदायक रहेगा । अध्ययन-अध्यापन में किंचत बाधायें आ सकती हैं। बालवृन्द को शारीरिक कष्ट की आशंका रहेगी। माता-पिता का स्वास्थ्य वाधित रह सकता है। नौकरी पेशा लोगों को अपने विभागीय अधिकारियों से विवाद झेलने पड़ सकते हैं। भूमि-भवनादि सम्बन्धी न्यायिक विवादों में राहत मिलने की सम्भावना है। कार्यक्षेत्र में परिवर्तन या कि स्थानान्तरण के योग भी बन सकते हैं। परिवारिक शान्ति-सद्भावना सहित पर्यटन का संयोग भी बन सकता है। दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा।   निर्माण कार्यों में सफलता मिलेगी। प्रवासी जीवन भी व्यतीत हो सकता है। वर्ष के चौथे,आठवें और बारहवें मास अनिष्टकर होने की आशंका है। अतः इन महीनों में कोई नवीन योजना न बनावें। ध्यातव्य है कि महीनों की गणना हिन्दी चान्द्रमास यानी चैत्र,वैशाख आदि करें। न कि जनवरी-फरवरी। मेष राशि और मेष लग्न वाले लोगों के लिए लाल चन्दन का तिलक लगाना लाभ दायक होगा। अपने आराध्यदेव की उपासना नियमित करते रहें। इससे ग्रहजनित बाधाओं में शान्ति मिलेगी। साथ ही जन्म कुण्डली के अनुसार भी महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि पूर्ण सफलता लब्ध हो सके। अस्तु।
२.वृष राशि- (ई,उ,ए,ओ,वा,वी,वू,वे,वो)- वृष राशि वालों के लिए यह संवत् सामान्यतया शुभदायक रहेगा। ध्यातव्य है कि शनि की लघुकल्याणी(अढ़ैया)का प्रभाव शुरु हो गया है,इसके फलस्वरुप व्यर्थ की चिन्ता,भागदौड़,परेशानी,आर्थिक क्षति,पारिवारिक कलह-विवाद,मित्रों से वैर आदि का सामना करना पड़ सकता है। । अध्ययन-अध्यापन में किंचत बाधायें आ सकती हैं। बालवृन्द को शारीरिक कष्ट की आशंका रहेगी। विरोधियों का शमन होगा। शत्रु पराजित होंगे। किन्तु दूसरी ओर अकारण मित्रों से विरोध भी हो सकता है। नेत्र विकार जनित परेशानी का विशेष सामना करना पड़ सकता है। व्यापार के क्षेत्र में कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। नौकरीपेशा लोगों को किंचित अतिरिक्त भार बहन करना पड़ सकता है। शेयर,सट्टे आदि से जुड़े लोगों को सावधानी पूर्वक निर्णय लेने की आवश्यकता है। वाहन चालकों को जरा सावधान रहना चाहिए। दुर्घटना होने की आशंका अधिक है। पूर्वार्द्ध की अपेक्षा वर्ष का उत्तरार्द्ध अधिक उलझन पूर्ण हो सकता है। वर्ष की तीन, सात,ग्यारह यानी ज्येष्ठ,आश्विन और माघ महीना कष्टप्रद होगा। अशुभ फलदायी होने के कारण इन महीनों में किसी तरह की नयी योजना न बनायें। शिव की आराधना से विशेष लाभ होगा। शनि की प्रसन्नता हेतु यथासम्भव सामान्य आराधना(दीपदान,पीपल-दर्शन,जल दानादि) शनिवार को अवश्य करें। शनिस्तोत्र का पाठ करना लाभदायक होगा। संस्कृत का जिन्हें अभ्यास नहीं है, वे लोग शनि-चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। अभिमन्त्रित किया हुआ छतिवन की जड़ या छाल ताबीज में भर कर धारण करें। तत्काल शान्ति मिलेगी। साथ ही अपने आराध्यदेव की उपासना नियमित रुप से करते रहें। इससे ग्रह जनित बाधाओं में शान्ति मिलेगी। जन्म कुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके। अस्तु।

३.मिथुन राशि- (का,की,कु,घ,ङ,छ,के,को,हा)- मिथुन राशि वालों के लिए यह संवत्सर अपेक्षाकृत शुभदायक रहेगा। अध्ययन-अध्यापन में किंचत बाधायें आ सकती हैं। बालवृन्द को शारीरिक कष्ट की आशंका रहेगी। परिवार में मागलिक कार्य- विवाहादि की योजना बन सकती है। तीर्थयात्रा के भी संयोग दीख रहे हैं। धार्मिक कृत्यों में भाग लेने के अवसर भी बनेंगे। व्यापारी वर्ग को पूर्व की अपेक्षा अधिक लाभ होने की सम्भावना है। विद्यार्थियों के लिए ये वर्ष उत्तम प्रतीत हो रहा है। वैंकिंग,बीमा,फाइनेंन्स,प्रचारकार्यादि के क्षेत्रों में किंचित न्यूनता रहेगी। फलतः उनलोगों में असन्तोष व्याप्त रहेगा। वर्ष के चौथे,आठवें और बारहवें यानी आषाढ़.कार्तिक एवं फाल्गुन महीने अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में कोई नयी कार्ययोजना बनाने,और उस पर पहल करने से परहेज करें। कटहल का पका हुआ फल मौसम में उपलब्ध हो तो एक-दो बार अवश्य खा लें। कटहल की पत्तियों पर लड्डुगोपाल की मूर्ति को स्थापित कर नित्य पूजन करें। आशातीत लाभ होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।

४.कर्क राशि - (ही,हू,हे,हो,डा,डी,डू,डे,डो)- कर्क राशि के जातकों के लिए यह संवत् सामान्य शुभदायक रहेगा। नौकरीपेशा वाले लोगों को स्थानान्तरण मिल सकता है। आर्थिक दृष्टि से लाभकारी स्थिति बनेगी,फिर भी असन्तोष और किंचित परेशानी बनी रह सकती है। पदोन्नति के भी आसार हैं। युग्मविपरीत यानी पति को पत्नी का एवं पत्नी को पति के स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों के कारण कष्ट उठाना पड़ सकता है। कामकाजी महिलाओं और गृहणियों पर अतिरिक्त बोझ आयेंगे। सोने-चांदी आदि से जुड़े व्यापारी वर्ग को विशेष लाभ हो सकता है। कर्कराशि के जातकों को नेत्रपीड़ा भी सता सकती है। सुख-संसाधनों की व्यवस्था हेतु विशेष कठिनाइयां उठानी पड़ेंगी। न्यायिक कार्यों में अकारण अवरोध दीखेगा। मनोनुकूल निर्णय-प्राप्ति में भी संदेश है। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। वर्ष के दूसरे,चौथे और नवें महीनें यानी वैशाख,आषाढ़ और अगहन अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में कोई नयी कार्ययोजना बनाने और उस पर पहल करने से परहेज करें। पलाश के चार बीज लाल कपड़े में वेष्ठित(बांध कर) ताबीज की तरह धारण करें। पलाश की लकड़ी और गोघृत से सोमवार की रात्रि में विधिवत हवन करें। इन उपचारों से बड़ी शान्ति मिलेगी और सामयिक संकटों का निवारण भी होगा। सम्प्रति जारी उभय दशापतिग्रहों की शान्ति पर भी ध्यान देना चाहिए। अस्तु।
५.सिंह राशि - (मा,मी,मू,मे,मो,टा,टी,टू,टे)- सिंह राशि वालों के लिए यह संवत्सर सामान्य शुभदायक रहेगा। विद्यार्थियों के लिए ये वर्ष विशेष शुभकारी है। वौद्धिक कार्यों में भी सफलता मिलेगी। माता-पिता,पति-पत्नी का स्वास्थ्य प्रायः अनुकूल रहेगा। भाइयों को कष्ट हो सकता है। धार्मिक कार्यों में रुकावट आ सकती है। शत्रु पराजित होंगे। योजनावद्ध विकास में सफलता मिलेगी। दाम्पत्य सुखलाभ होगा। व्यर्थ की यात्रायें भी हो सकती हैं। व्यापारी तथा कृषक वर्ग को लाभ होंगे। वर्ष के पूर्वार्द्ध में चोट-चपेट की आशंका है,अतः सावधान रहने की आवश्यकता है। वर्ष का पहला,पांचवां और आठवां यानी चैत्र,श्रावण और कार्तिक किंचित अशुभ फलदायी है। अतः अच्छा होगा कि इन महीनों में कोई नयी योजना पर अमल न करें। विविध कष्टों के निवारण के लिए शिव एवं हनुमद् आराधना शान्तिदायक होगी। वटवृक्ष का वरोह(ऊपर से नीचे की ओर लटकती जड़ें) जल में घिस कर तिलक लगायें। वरोह का छोटा टुकड़ा ताबीज में भर कर धारण करना भी लाभदायक होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।
६.कन्या राशि- (टो,पा,पी,पू,ष,ण,ठ,पे,पो)- कन्या राशि वालों के लिए यह संवत्सर मानसिक चिन्ता तथा पारिवारिक विवादों वाला होगा, क्यों कि शनि की अढ़ैया का प्रबल प्रभाव है। अनावश्यक दौड़-धूप करना पड़ेगा। किसी कार्य में पर्याप्त मेहनत के वावजूद असफलता अधिक मिलेगी। मित्रों और प्रियजनों से अकारण विवाद हो सकता है। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में वाधायें आयेंगी। बाल-बच्चों को शारीरिक पीड़ा हो सकती है। उनके स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना होगा। समाज-सेवियों के लिए ये वर्ष अधिक संघर्ष-पूर्ण होगा। वर्ष के पहले,चौथे,सातवें और दसवें यानी चैत्र,आषाढ,आश्विन और पौष महीने अधिक प्रतिकूल हो सकते हैं। अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें। शनि की आराधना यथा सम्भव करना लाभदायक होगा। आम के कच्चे और पके फलों को ब्राह्मण,भिखारियों और आत्मीय जनों में बांट कर, सबसे अन्त में स्वयं भी खा लें। अद्भुत लाभ होगा। सम्भव हो तो आम के वृक्ष में नियमित जल डालें। यह भी आपके लिए लाभदायक होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।
७.तुला राशि- (रा,री,रु,रे,रो,ता,ती,तू,ते)- तुला राशि वालों के लिए यह सम्वत् सामान्य शुभदायक रहेगा। पूर्व से बन रही योजनायें सफल होंगी। वर्ष के प्रारम्भ में चोट-चपेट का सामना करना पड़ सकता है। माता-पिता को शारीरिक कष्ठ हो सकते हैं। पति / पत्नी का स्वास्थ्य वाधित रह सकता है। व्ययाधिक्य के कारण चिन्ता बनी रह सकती है। विशेषकर रोग बीमारियों पर अधिक व्यय होने की आशंका है। सरकारी नौकरी पेशा वालों की व्यस्तता बढ़ सकती है। विद्यार्थियों और प्रतियोगिता में लगे छात्रों को सामान्य लाभ मिलेगा। परिवार में खासकर कर बच्चों और पति / पत्नी के बीच आपसी विवाद अकारण उत्पन्न हो सकता है। वर्ष के दूसरे,छठे और नवें महीने यानी वैशाख,भादो और अगहन महीने किंचित कष्टप्रद होंगे।  अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें।  मौलश्री(बकुल) के पुष्प उपलब्ध हों तो उन्हें भगवान विष्णु (राम,कृष्णादि किसी विग्रह) पर अर्पित करें। मौलश्री की छाल को चूर्ण बनाकर ताबीज में भरकर धारण करें। विशेष लाभ होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।
८.वृश्चिक राशि- (तो,ना,नी,नू,ने,नो,या,यी,यू)- वृश्चिक राशि वालों के लिए यह वर्ष प्रायः  कष्ट और चिन्तायुक्त ही रहने की आशंका है। हालाकि लम्बे समय से चली  आ रही शनि की साढ़ेसाती का उतरता हुआ दौर अब प्रारम्भ हो चुका है,यानी शनि महाराज वृश्चिक राशि वालों के पैर की ओर उतर आये हैं। इस कारण पहले की अपेक्षा काफी राहत महसूस होगी। लम्बित कार्यों और स्थितियों में यत्किंचित सुधार प्रतीत होगा। फिर भी आर्थिक कष्ट, पारिवारिक कलल, अशान्ति, विवाद,मित्रवैर,प्रियजन वियोग, भाईयों को चोट-चपेट,दुर्घटना आदि की आशंका बनी रह सकती है। किन्तु इन सबके बावजूद सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ साथ प्रभावशाली कार्यों को करने का अवसर भी मिलेगा,जिससे सुख-शान्ति मिलेगी। निरर्थक दौड़-धूप और अकारण उलझनों का सामना भी करना पड़ सकता है। पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद के कारण तनाव-पूर्ण स्थिति रह सकती है। आर्थिक स्थिति में किंचित उतार-चढ़ाव बना रहेगा लगभग पूरे वर्ष में । न्यायिक कार्यों में उलझकर व्यर्थ के दौड़-धूप भी करने पड़ सकते हैं। नये व्यापार की योजना भी बन सकती है। नौकरीपेशा वालों की व्यस्तता बढ़ेगी और नयी उलझनें भी खड़ी हो सकती है। किसी प्रियजन का वियोग भी झेलना पड़ सकता है। वर्ष के तीसरे,सातवें और ग्यारहवें यानी ज्येष्ठ,आश्विन और माघ महीना किंचित कष्टकर हो सकता है। इन महीनों में कोई नयी योजना पर कार्यान्वयन न करें। शनि की साढ़ेसाती का समुचित शमन करके उचित लाभ प्राप्ति हेतु शनि की यथोचित आराधना- जप,हवन,पाठ आदि करते रहना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि जिनकी जन्म कुंडली में शनि उच्च के होकर शुभस्थानों में बैठें हों उन्हें शनि की शान्ति हेतु हनुमान जी की आराधना नहीं करनी चाहिए,वल्कि सीधे शनि की आराधना ही श्रेयस्कर है।  ध्यातव्य है कि वर्ष के अन्दर शनि की  वक्री-मार्गी गति परिवर्तन के कारण साढ़ेसाती का प्रभाव किंचित बढ़ेगा और घटेगा भी,किन्तु इससे विशेष चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अपना सामान्य प्रयास जारी रखें। शान्ति-लाभ होगा। खैर की लकड़ी और घी से मंगलवार को दोपहर में यथोचित हवन करें। पान यदि खाते हों तो कत्था अधिक खायें। इन उपचारों से यथोचित लाभ मिलेगा। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।
९.धनु राशि - (ये,यो,भा,भी,भू,ध,फ,ढ,भे)- धनु राशि वालों के लिए यह  संवत्सर प्रायः कष्ट और चिन्ताओं से घिरा हो सकता है। शनि के संचरण से साढ़ेसाती का प्रभाव जारी रहेगा, क्यों कि शनि का मध्य पाद इस राशि पर पूर्व की भांति ही  है। यानी धनुराशि वालों के हृदय स्थल पर शनि का प्रकोप है। वर्ष के अन्दर इनका वक्री-मार्गी संचरण भी होगा, जिसके कारण परेशानियां कमोवेश होती प्रतीत होंगी। फिर भी कुल मिलाकर शनि का गहरा दुष्प्रभाव बना ही रहेगा। निरर्थक दौड़धूप,मानसिक तनाव,परेशानी,सन्ताप, उद्विग्नता, आर्थिक-शारीरिक क्लेश आदि प्रायः वर्ष पर्यन्त झेलने पड़ेंगे। विशेष कर उदर व्याधि की आशंका है। आर्थिक कठिनाई, स्वजनों से अकारण वैर-विरोध,पारिवारिक अशान्ति का वातावरण बना रहेगा। अर्थ व्यवस्था के लिए कठोर संघर्ष करना पडेगा। स्वास्थ्य के प्रति विशेष सचेष्ट रहने की आवश्यकता है। लम्बे समय से रुके हुए कुछ कार्य सम्पादित हो सकते हैं। जेवरादि व्यापार से जुड़े लोगों को लाभ मिलने की आशा है। सन्तान पक्ष से किंचित चिन्ता की स्थिति बन सकती है। उनके स्वास्थ्य को लेकर विशेष रुप से परेशानी पड़ सकती है। नये कार्यों का भी अवसर मिल सकता है। किन्तु सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। रोग-व्याधि में धन का अपव्यय होगा। शत्रुपक्ष की प्रबलता भी दीखेगी। वर्ष के पांचवें,नौवें और बारहवें माह यानी श्रावण,अगहन और फाल्गुन महीने विशेष कष्टप्रद हो सकते हैं। अतः अच्छा होगा कि इन महीनों में कोई नयी कार्य-योजना न बनायें।  मुख्य रुप से शनि की आराधना पर ध्यान देना जरुरी है। साथ ही अन्य उपाय भी करने चाहिए। तात्कालिक महादशा और अन्तर्दशापतियों की यथोचित शान्ति का उपाय भी करना चाहिए। हल्दी का तिलक (स्त्रियों के लिए  पीला सिन्दूर का व्यवहार) लाभदायक होगा। अपने प्रिय देवता की आराधना करते रहें। विशेष कष्ट का निवारण अवश्य होगा। पीपल की लकड़ी और घी से प्रत्येक गुरुवार को यथोचित होम किया करें। इससे काफी राहत मिलेगी। जन्म कुंडली के तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ-साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।
१०.मकर राशि- (भो,जा,जी,खी,खू,खे,खो,गा,गी)- मकर राशि वालों के लिए यह संवत्सर प्रायः कष्ट और चिन्ताओं से घिरा हो सकता है। शनि के संचरण से साढ़ेसाती का प्रभाव जारी रहेगा, क्यों कि शनि का अग्र पाद इस राशि पर आरुढ़ हो चुका है। इस प्रकार मकर राशि वालों का शिरोभाग शनि के चपेट में आया हुआ है। वर्ष के अन्दर इनका वक्री-मार्गी संचरण भी होगा, जिसके कारण परेशानियां कमोवेश होती प्रतीत होंगी। फिर भी कुल मिलाकर शनि का गहरा दुष्प्रभाव बना ही रहेगा। निरर्थक दौड़धूप, मानसिक तनाव,परेशानी, सन्ताप, उद्विग्नता, आर्थिक-शारीरिक क्लेश आदि प्रायः वर्ष पर्यन्त झेलने पड़ेंगे। विशेषकर मानसिक संताप अधिक झेलना पड़ सकता है। किसी बात में अनिर्णय की स्थिति बनी रह सकती है। हालाकि कोई निर्णय बहुत सोच-विचार कर और अनुभवियों की राय से ही करनी चाहिए। क्यों कि शनि के प्रभाव से गलत निर्णय (गलत कदम) की अधिक आशंका है। नौकरी पेशा वालों को समय पर वेतन आदि न मिलने के कारण आर्थिक संकट झेलना पड़ सकता है। व्यापारी वर्ग के लिए भी ये वर्ष आर्थिक रुप से सुखद नहीं कहा जा सकता । साझेदारी के कार्यों में वाधायें आयेगी। ऑपरेशन की स्थिति भी बन सकती है। वर्ष के चौथे,आठवें और बारहवें महीने प्रायः अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में किसी प्रकार की नयी योजना बनाने से बचें। शीशम(विशेष कर काला शीशम) के फूल शीशे के पात्र में भर कर घर में सुविधानुसार किसी ऐसे स्थान पर  रखे दें जहां नित्य उन पर दृष्टि पड़ सके। सड़ने से पहले उसे विसर्जित कर दूसरा फूल रख दें। अद्भुत लाभ होगा। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ-साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।
११.कुम्भ राशि- (गू,गे,गो,सा,सी,सू,से,सो,दा)- कुम्भ राशि वालों के लिए यह सम्वत्सर सामान्य रहने की आशा है। भाग-दौड़ की जिन्दगी गुजर सकती है। कार्य-व्यापार का विस्तार हो सकता है। नयी सम्भावनायें बन सकती है। किन्तु सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए। भवन-निर्माण के कार्य पूरे होने के आसार दीख रहे हैं। अन्यान्य अवरुद्ध कार्य में भी प्रगति आयेगी। वाहन दुर्घटना की आशंका है। चोट-चपेट,ऑपरेशन आदि की भी आशंका है। वर्ष के उत्तरार्द्ध में परिवार में मांगलिक कार्य सम्पन्न हो सकते हैं। आकस्मिक धन-लाभ की भी सम्भावना है। वर्ष के पहले,पांचवें और नौवें यानी चैत्र,श्रावण और आगहन महीने प्रायः अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में किसी प्रकार की नयी योजना बनाने से बचें। सम्भव हो तो घर के पश्चिम दिशा में शमी का पौधा स्थापित करें और उसकी पत्तियां भगवान भोलेनाथ को नित्य अर्पित करें। शमी का फूल उपलब्ध हो तो उसे भी शिवार्पण करना चाहिए। शमी की लकड़ी और घी से शनिवार को संध्या समय हवन करने से विशेष लाभ होगा। शिव की आराधना लाभदायक होगी। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।
१२.मीन राशि-(दी,दू,थ,झ,ञ,दे,दो,चा,ची) - मीन राशि वाले लोगों के लिए यह संवत्सर प्रायः शुभदायक रहेगा। शारीरिक सुख के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी होगी। आर्थिक रुप से किंचित सुदृढ़ता आयेगी। आय के नये स्रोत बन सकते हैं। कारोबार में विस्तार के भी योग दीख रहे हैं। नौकरीपेशा लोगों पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है। स्थानान्तरण के योग बन सकते हैं। परिवार में मांगलिक कार्य की भी सम्भावना है। सुखद सूचनायें भी मिलेंगी। भाइयों से विरोध की स्थिति बन सकती है। राजनैतिक क्षेत्र में स्थिति चुनौतीपूर्ण रहेगी। वर्ष के मध्य में आकस्मिक धन-लाभ होने की सम्भावना है। वर्ष के दूसरे,छठे,दसवें और बारहवें महीने किंचित कष्टप्रद होंगे। अतः उन महीनों में कोई नवीन कार्य की योजना न बनावें और न पहल करें।  नित्य वटवृक्ष में जल डालना,परिक्रमा करना,तथा वरोह वा वट-पत्र को तकिये में डाल कर सोने से चमत्कारी लाभ होगा। तात्कालिक महादशा, अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।

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Tuesday, 30 January 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान - एपीसोड 57



स्वागत है यहां भी आप चाहे तो पधार सकते हैं। धन्यवाद।

Friday, 26 January 2018

हृदयरोग :-: ज्योतिषीय दृष्टि


हृदयरोग :-: ज्योतिषीय दृष्टि
आधुनिक विचार-धारा से ओतप्रोत व्यक्ति प्रायः अटकल लगा लेते हैं कि हृदयरोग आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान की खोज है। कुछ ऐसा ही अनुमान कैंसर-एड्स जैसी बीमारियों के बारे में भी  लगाया जाता है;किन्तु ये बात बिलकुल निराधार है और उन लोगों की सोच है, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय ग्रन्थों का अवलोकन नहीं किया है और सुनी-सुनायी बातों में आकर अपना आँख-कान-दिमाग सब पश्चिम की ओर मोड़ लिया है।  
अतिप्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से लेकर पुराण,वैद्यक,यहां तक कि ज्योतिषीय ग्रन्थों में भी हृदयरोग की पर्याप्त चर्चा मिलती है। चरक,सुश्रुत,वाग्भट्ट,माधव,शार्ङ्गधर से लेकर पराशर और वराहमिहिर तक ने हृदयरोग की चर्चा की है।
यहां हम हृदयरोग के ज्योतिषीय पक्ष पर एक नजर डालते हैं। ज्योतिषशास्त्र रोगोत्पत्ति के मूल में कर्म को स्वीकारता है। मुख्यरुप से कर्मज और दोषज दो प्रकार की व्याधियां कही गयी हैं। एक तीसरी भी है- आगन्तुज व्याधि। वस्तुतः ज्योतिष कालज्ञान का शास्त्र है और जिसका मूलाधार है ग्रह-नक्षत्रादि।
कालपुरुष के विभिन्न अंगों में स्थित ग्रह-नक्षत्र-राश्यादि और उनकी प्रकृति, धातु, रस, अंग, विन्यास,बलाबल के आधार पर रोगों का विनिश्चय(निदान) और फिर उनके उपचार-निर्देश  (वैदिक,तान्त्रिक,मान्त्रिक,भैषजीय आदि) विशद रुप से हमारे प्राचीन ग्रन्थों में उपलब्ध हैं।
श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कन्धान्तर्गत रासपंचाध्यायी प्रसंग में हृदयरोग- नाश हेतु भगवान भास्कर की आराधना की चर्चा मिलती है। वस्तुतः हृदयरोग से सूर्य का बड़ा ही सन्निकट सम्बन्ध है। वेदों में सूर्य को आत्मा कहा गया है और आत्मा का निवास हृदय-स्थल में स्वीकारा गया है। सूर्यपुत्र सौरि(शनैश्चर) और भूमिसुत मंगल तथा देवगुरु वृहस्पति का भी कारकत्व झलकता है   हृदयरोग में । राहु-केतु की युति,अवस्थिति वा दृष्टि को भी नकारा नहीं जा सकता । और सबके अन्त में चन्द्रमा मनसो जाता...को कैसे भूल सकते हैं। हृदय के साथ चन्द्रमा का जुड़ाव भी ध्यातव्य है।
हृदयरोग-कारक-ग्रहों में मुख्यरुप से चार प्रकार की स्थितियाँ लक्षित होती हैं— सूर्य-शनि, शनि-मंगल, मंगल-गुरु और शनि-मंगल-राहु। इनकी भावगत अवस्थिति,युति,दृष्टि आदि का प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणाम स्वरुप जातक हृदयरोग का न्यूनाधिक शिकार होता है। उक्त चार प्रकार के ग्रह-योगों के आधार पर चार प्रकार की हृदयरोग-स्थिति बनती है— .सामान्य हृदयरोग,.हृदयाधात,.हृच्छूल, .रक्तचाप ।
जन्मांकचक्र में चतुर्थभाव से हृदय सम्बन्धी विचार की बात की जाती है। किन्तु ये पर्याप्त नहीं है। चतुर्थभाव की प्रधानता है,किन्तु पंचम,षष्ठम,अष्टम,दशम और द्वादश भाव में उक्त ग्रहों की स्थिति का विचार भी गहन रुप से करना चाहिए।
कालपुरुष का हृदयस्थान कर्कराशि है और हृदय ही रक्तवहसंस्थान का मुख्य अवयव है। ग्रहों में मंगल का सीधा सम्बन्ध है रक्त से। हृदय में ताप और चाप का नियंत्रण तो सूर्यात्मज शनिदेव ही करेंगे न ! सूर्य की अपनी राशि है सिंह और सिंहराशि कालपुरुष के औदरिक अवयव और वायुतत्त्व का नियामक है।
यही कारण है कि जन्मांकचक्र के चतुर्थ और पंचम भाव में कर्क वा सिंह राशि की अवस्थिति कतिपय हृदयरोगों का संकेत देती है। किन्तु इसका अर्थ ये न समझ लिया जाये कि मेषलग्न के सभी जातकों को हृदयरोग हो ही जायेगा ।
दशम और द्वादश में भी कर्क वा सिंह राशि का होना हृदयरोगकारक कहा जाता है। स्थानों वा ग्रहयोगों का विचार सिर्फ जन्मांकचक्र से ही न करके,नवांश और त्रिशांश से भी करना विहित है- ऐसा आचार्य वराहमिहिर का कथन है।
हृदयरोगकारक कुछ अन्यान्य ग्रह-स्थितियां भी हैं। यथा— .आयुर्वेदग्रन्थ भावप्रकाश में कहा गया है कि राहु यदि द्वादशस्थ हो तो हृच्छूल हो सकता है। . आयुर्वेदग्रन्थ गदावली के अनुसार सिंहराशि के द्वितीय द्रेष्काण में यदि जन्म हो तो हृच्छूल हो सकता है। .इसी ग्रन्थ में ये भी कहा गया है कि चतुर्थेश चतुर्थभावगत ही हो और पापयुत वा दृष्ट हो तो भी हृच्छूल हो सकता है। .जन्मांकचक्र में सूर्य मकर,वृष,वृश्चिक वा सिंह राशिगत हो तो हृदयरोग हो सकता है। .निर्बल,विरामसन्धिगत वा सुप्त शनि की स्थिति  हृदयरोगकारक बन सकती है। तथा अष्टमभावगत शनि भी हृदयरोग दे सकते हैं।. तृतीयेश यदि राहु वा केतु युत वा दृष्ट हों तो हृदयरोग हो सकता है। . चतुर्थभाव में कोई भी पापग्रह हों साथ ही चतुर्थेश पापयुत हों तो हृदयरोग हो सकता है। . सूर्य षष्ठेश बनकर चतुर्थभावगत स्थित हों तो भी हृदयरोग हो सकता है। . कुम्भराशिगत सूर्य धमन्यावरोध उत्पन्न करते हैं। १०.शुक्र मकरराशि के हों तो भी हृदयरोग हो सकता है। ११.जातक पारिजात एवं सारावली में कहा गया है कि  चन्द्रमा शत्रुक्षेत्री  हों तो हृदयरोग हो सकता है। ध्यातव्य है कि ग्रहमैत्रीचक्र में चन्द्रमा का कोई शत्रु नहीं कहा गया है। किन्तु हां चन्द्रमा से बुध,शुक्र और शनि को एकपक्षीय शत्रुता अवश्य है। तदनुसार पंचधामैत्रीचक्र में स्थिति का निश्चय कर लेना चाहिए।

ये तो हुयी हृदयरोग की स्थितियाँ। किन्तु ये प्रभावी कब होंगी ये विचारणीय विन्दु है। ध्यातव्य है कि कलिकाल में पराशर-मत की विशेष मान्यता है— कलौ पाराशरस्मृतिः। ये बात सिर्फ स्मृति के सन्दर्भ में ही मान्य न होकर ज्योतिष में भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महर्षि पराशर ने शुभाशुभग्रहों के प्रभाव-काल के लिए तत्तत पंचदशाओं (महा, अन्तर, प्रत्यन्तर, सूक्ष्म और प्राण) को ही माना है। और दशाओं में अनेकानेक मत होते हुए भी विंशोत्तरी को वरीय सूची में रखा गया है। अतः निर्विवाद रुप से कहा जा सकता है कि जन्मांकचक्र के साथ-साथ चलितांक,नवांश और त्रिशांश का गहन अवलोकन करते हुए, दशासाधन करके रोगोत्पत्ति वा प्रभाव-काल का निश्चय करना चाहिए , तथा कारक ग्रहों के बलाबल के अनुसार रोगस्थिति को भांपना चाहिए। इसके साथ ही उक्त कारकग्रहों के अतिरिक्त भी यदि कोई मारकेश की स्थिति बनती हो तो उसका भी सूक्ष्मता से विचार कर लेना चाहिए।

ग्रहशान्ति एवं रोगनिवारण
१.       कारण का मारण—बहुश्रुत कथन है। रोग के कारक का सम्यक् ज्ञान करके समुचित उपचार करना चाहिए।
२.      सुविधा और स्थिति के अनुसार योग्य दैवज्ञ के संरक्षण में वैदिक,तान्त्रिक वा पौराणिक मन्त्रों द्वारा कारकग्रह की यथोचित शान्ति करानी चाहिए। ग्रहों का जप,होम,भेषजस्नान,दानादि शास्त्र सम्मत मार्ग कहे गए हैं।
३.      रत्न-धारण,यन्त्र-धारण,यन्त्र-पूजन आदि भी उपाय प्रशस्त हैं।
४.      महामृत्युञ्जय की क्रिया को प्रायः अमोघ मान लिया जाता है और सीधे उसी पर निर्भर होजाया जाता है,किन्तु ये नियम सर्वत्र लागू नहीं होना चाहिए। विभागीय कारवायी की असफलता के पश्चात ही इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।
५.     योग्य तान्त्रिक के निर्देशन में ललितादेवी की सम्यक् उपासना अति लाभकारी है।
६.      रासपंचाध्यायी तथा सूर्यसूक्त का पाठ भी शास्त्र-सम्मत है।
आयुर्वेदीय औषधियों पर यथोचित मान्त्रिक प्रयोग करके,प्रभावित व्यक्ति को कुछ समय तक खिलाना भी लाभदायक होता है।अस्तु।

Thursday, 18 January 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान - एपीसोड 51





स्वागत है आप सबका यहां। पधारने हेतु साधुवाद।

Tuesday, 16 January 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान - एपीसोड 50





आप सभी दर्शकों का स्वागत है। पधारने हेतु धन्यवाद।


Sunday, 14 January 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान - एपीसोड 48

         

प्रिय बन्धुओं, सप्रेम नमन।



जैसा कि आपको विदित है कि पुण्यार्ककृति ब्लॉग पर पिछले 43 खंडों में पुण्यार्कमगदीपिका की पोस्टिग की गयी। इसके साथ ही शाकद्वीपीय ब्राह्मणों पर आधारित ये लधुशोध का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ। फिलहाल जबतक कोई नया आलेख या पुस्तिका तैयार नहीं हो जाती तब तक ब्लॉग पर सीधे प्रकाशन का कार्य स्थगित ही रहेगा। अतः इस बीच आपको नियमित रुप से यूट्यूब चैनल पुण्यार्ककृति की गतिविधियों की सूचना ही शेयर करता रहूंगा।

जैसा कि आपको ज्ञात है यूट्यूब चैनल पर वास्तुज्योतिष शिक्षा और समाधान व्याख्यान- माला का प्रसंग जारी है। इसका मूल आधार है-- पुण्यार्कवास्तुमंजूषा नामक मेरा वृहद् शोधग्रन्थ,जिसका प्रकाशन इस ब्लॉग पर काफी पहले ही आप देख चुके हैं।  निकट भविष्य में चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी के सौजन्य से ये शोध-ग्रन्थ पुस्तकाकार रुप में भी आपके हाथों में हो सकता है।

आशा है आप मेरे साथ यानी मेरे ब्लॉग- पुण्यार्ककृति के साथ इसी भांति भविष्य में भी सम्बन्ध बनाये रखेंगे।

धन्यवाद।

Saturday, 13 January 2018

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःभाग 43(अन्तिम भाग)


गतांश से आगे...

                  १८.    उपसंहार  

       पिछले सत्रह अध्यायों में मगबन्धुओं के विषय में यथासम्भव जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया। पुस्तिका की अधिकांश सामग्री पत्र-पत्रिकाओं से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित हैं। यथोचित प्रमाणार्थ उपनिषद,पुराणादि का प्रचुर उपयोग भी किया गया है। बहुत से मगबन्धुओं से सीधे (मिलकर) या टेलीफोनिक सम्पर्क करके भी जानकारियाँ जुटायी गयी हैं, तथा प्राप्त जानकारी की पुष्टि करायी गयी है। जहां तक हो सका है, सतत प्रयत्नशील रहा हूँ कि जो कुछ भी वर्तमान और भावी पीढ़ी को हम समर्पित करने जा रहे हैं, वो पुष्ट और प्रमाणिक हो। फिर भी त्रुटियां तो सहज मानव स्वभाव है। हो सकता है, बारम्बार की चेष्टा के बावजूद यत्रतत्र गलतियाँ रह गयी हों। किसी पाठक बन्धु को ये दीख पड़े तो निःसंकोच सूचित करेंगे। इतना ही नहीं किसी प्रकार का सुझाव भी आपके पास हो तो स्वागत है। फिलहाल तुरत तो पुस्तकाकार रुप मिलने वाला नहीं है मेरे इस श्रम को, क्यों कि लेखन से कहीं बहुत अधिक कठिन होता है प्रकाशन-कार्य । अतः अपनी अन्यान्य रचनाओं की तरह पहले इसे भी अपने ब्लॉग एवं फेशबुकपेज पर डाल रहा हूँ। इस बीच प्रकाशन की पूरी कोशिश भी जारी रहेगी। और प्रकाशन में विलम्ब,आप पाठकों के सुझावों का भरपूर अवसर दे देगा।
             आशा है मेरी यह मगदीपिका आप मगबन्धुओं के लिए वस्तुतः दीपिका का कार्य करेगी। मेरे द्वारा दिए गए सुझावों पर आप अमल अवश्य करेंगे- ऐसा मुझे विश्वास भी है। हो सकता है, पुस्तिका के कुछ अंश आपको कठोर लगें । अव्यावहारिक भी लग सकता हैं। किन्तु उन-उन स्थलों पर जरा स्थिर चित्त, तटस्थ रुप से विचार करेंगे, तो कठोरता और अव्यावहारिकता का दोषारोपण सम्भवतः नहीं कर पायेंगे - ऐसा मेरा विश्वास है।
       आपके सुझावों के स्वागत के लिए अहर्निश इच्छुक हूँ।  

कमलेश पुण्यार्क,
हरिशयनी एकादशी,विक्रमाब्द २०७४
सम्पर्क- guruji.vastu@gmail.com,
           Mo.8986286163

                         ।।हरिऊँ ।।