Tuesday, 18 July 2017

शाकद्वीपीय ब्राह्मणःलघुशोध--पुण्यार्कमगदीपिका भाग छः

गतांश से आगे...

           ६.सृष्टि-संरचना और पौराणिक भूगोल

   सृष्टि की रचना के सम्बन्ध में कई प्रकार के मत प्रचलित हैं। आधुनिक मत (डारविन का विकासवाद) यह  है कि पहले एककोशीय जीव, फिर बहुकोशीय जीव के विकासक्रम से जलजन्तु और फिर पशु-पक्षियों की उत्पत्ति हुयी, और बन्दर, वनमानुष आदि के बाद विकास क्रम में मनुष्य बना । इतना ही नहीं इस मनुष्य का भी निरंतर विकास हो रहा है । ऐसा नहीं कि पूर्व में जो मानवी संरचना थी वही आज भी है।  
   कोई मत सीधे यह स्वीकार लेता है कि अनुसंधान का विषय है - सृष्टि-परम्परा । सही शोध पर कोई पहुंचा ही नहीं है। अनुसंधान निरंतर हो रहे हैं । किन्तु भारतीय वेद-पुराणादि जरा भी संशय में नहीं है । यहां सर्वमत से सृष्टि-संरचना स्पष्ट है – विशन्ति प्राणिनोह्यस्मिन्निति विश्वः स एव हि । 
दिव्य-भौम तथाऽमर्त्यमर्त्य रुपेण च द्विधा ।। 
इसी भांति आगे देखें—
सोऽकामयत् । एकोऽहं बहुस्याम् । प्रजायेयम् । (तैतरीयोपनिषद २-६) अव्यक्त ब्रह्म ने अपने को अनेक रुप में व्यक्त करने की इच्छा की। तब उसने काल,मास,वर्ष,दिन,रात्रि आदि तथा उत्पत्ति-पालन-संहार आदि, एवं निर्गुण-सगुण, अन्धकार-प्रकाश,अव्यक्त आदि गुणों को स्वभावतः यानी बिना किसी अन्य की प्रेरणा के, अपने निरीह-निश्चेच्ट आदि भावों को छोड़कर,ईहा चेष्टा आदि रुपा माया को उत्पन्न होने की भावना से स्वीकार किया। वस्तुतः उसकी माया एक होते हुए भी लोहित,शुक्ल,कृष्णादि(लक्ष्मी,सरस्वती,काली) (सृष्टि, पालन, संहारादि) त्रिरुपा है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरुपाः ।। (श्वेता.उप.४-५) एक अजा—अनादि प्रकृति- सत्त्वादि तीन गुणों वाली,अपने समान रुप वाली बहुत सी प्रजाओं को उत्पन्न कर रही है।
   ऐसा ही पल-पल का क्रम और सिद्धान्त बिलकुल स्पष्ट है । इसके रहस्य को जान कर प्रबुद्ध मनुष्य अभिभूत हो जाता है । भले ही रहस्य तक नहीं पहुंच पाने वाले लोग आलोचना करें, और कपोलकल्पना कह कर निश्चिन्त हो जायें ।
 प्रारम्भ में सम्पूर्ण जगत शून्यमय,निर्जन्तुमय,अन्धकारमय था । न वृक्ष न पर्वत न नदी न, न जल न वायु न अग्नि न आकाश न पृथ्वी—कुछ भी नहीं,जरा कल्पना करें कैसा होगा वो काल ! किन्तु काल भी तो नहीं था न, फिर क्या होगा- ओह ! बिलकुल अकल्पनीय है न यह स्थिति—ऐसा ही तो कहता है हमारा वैदिक नास्दीय सूक्त ।
 इन्हीं भावों को महर्षि व्यास के शब्दों में देखें—        नाहर्नरात्रिर्न नभो न भूमिः । 
नासोत्तमो ज्योतिरभूच्च नान्यत् । 
श्रोत्रादि बुध्याऽनुपलभ्यमेकम् । 
प्रधानिकं ब्रह्म पुमांस्तदासीन् ।।  (विष्णुपुराण १-२-२३)

      कुछ ऐसे ही भावों को व्यक्त करते हैं श्रीमद्भगवत्गीता में श्री कृष्ण —
सहस्रयुगपर्यन्तमर्हयद्ब्रह्मणो विदुः । 
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ।।
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । 
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ।। 
                            (अ.८ श्लोक १७,१८)                    
यानी सहस्र चतुर्युगी अवधिवाले ब्रह्मा के दिन और रात्रि के रहस्य को जो पुरुष तत्त्वतः जानता है, वही ज्ञानी काल के तत्त्व को या कहें सृष्टि के रहस्य को समझ सकता है। ध्यायत्व है कि ब्रह्मा का एक दिन मानवी गणनानुसार चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों(,३२,००,००,०००) का हुआ करता है और पुनः उनकी रात्रि भी इतने ही अवधि वाली होती है। दिन के प्रारम्भ में सारी सृष्टि सक्रिय होती है और रात्रि के प्रारम्भ के साथ-साथ सारी सृष्टि उसी काल के गर्भ में समा जाती है । इसी अध्याय के सोलहवें श्लोक में बता चुके हैं कि आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । यानी ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक पुनरावर्ती ही हैं, यानी आवागमन(जन्म-मृत्यु)वाले हैं ।
   महर्षि पाणिनि ने चौदह माहेश्वरसूत्र प्राप्त किया – अइउण् । ऋलृक् । एओङ् । ऐऔच् । हयवरट् । लण् । ञमङणनम् । झभञ् । षढधष् । जवगडदश् । खफछठथटतव् । कपय् । शषसर् । हल् ।।
 वस्तुतः ये पाणिनि और शिव के बीच हुआ कोई सीधा संवाद नहीं है,प्रत्युत डमरु से निस्सृत ध्वनियाँ हैं,जिन्हें आम जानकार व्याकरण के सूत्र मात्र समझते-रटते रहते  हैं, जबकि इन्हीं चौदह सूत्रों में चौदह भुवनों का या कहें सम्पूर्ण सृष्टि का रहस्य छिपा है, जिसे आगे चल कर महर्षि पतञ्जलि ने व्याख्यायित किया- महाभाष्य के रुप में। ज्ञातव्य है कि ये ही पतञ्जलि योगसूत्र के भी रचयिता हैं और आयुर्वेद पर भी समानाधिकार है। कहा भी गया है—योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन । योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां  पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ।। क्यों कि महर्षि ने त्रिविध कल्याणार्थ मार्गदर्शन किया है।    
 मूलतः परब्रह्मपरमात्मा निर्गुण-निराकार हैं, किन्तु सृष्टि-लीला के लिए समयानुसार सगुण-साकार हुआ करता है। एक बात हृदयंगम कर लेने योग्य है कि जो सगुण-साकार होगा, वो सदा नश्वर ही होगा। अनश्वर कदापि हो ही नहीं सकता । सगुण-साकार सदा काल के वशीभूत हुआ करता है । और जो काल के वशीभूत है, वो अक्षर-अविनाशी कैसे हो सकता है !
मनुष्य गुण-दोषयुक्त है । आकार वाला है । अतः सीधे-सीधे निर्गुण-निराकार की आवधारणा सही ढंग से कर भी नहीं पाता । यही कारण है कि सगुण-साकार ईश्वर की कल्पना करके क्रमशः आगे बढ़ने का प्रयास करता है । ताकि काल-पाश से मुक्त हो सके ।
सृष्टि के इस रहस्य को जरा संक्षेप में समझने का प्रयास किया जाये— निर्गुण-निराकार ब्रह्म जब ऐष्णा करता है, तब सगुण-साकार रुप ग्रहण कर लेता है । वह रुप एक विशालकाय-अपरिमित अण्डे  सा हुआ करता है । श्रीमद्भागवतकार ने इस स्थिति का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है— कालं कर्मस्वभावं च मायेशो मायया स्वया । आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विवुभूपुरुषाददे ।। (भा.पु.स्क.२ अ. ५ श्लोक २१ से ४२ तक इस विषय का विशद वर्णन है । साथ ही आगे इसी स्कन्ध के छठे अध्याय में भी ऐसे ही प्रसंग हैं।)
मयापति ने एकोऽहं बहुस्याम्... की इच्छा शक्ति से यानी मैं अनेक हो जाऊँ की कामना से त्रिगुणात्मक क्षोभ उत्पन्न किया । इस कर्म ने महतत्त्व को जन्म दिया, जिसमें रजोगुण और तमोगुण की वृद्धि होने पर महतत्त्व के विकार से ज्ञान-क्रिया-द्रव्य रुप तमःप्रधान विकार हुआ, जो अहंकार के नाम से ख्यात हुआ । यही अहंकार विकारी होकर तीन भागों में बंट गया—वैकारिक,तैजस और तामस । इसे ही क्रमशः सात्विक, राजस और तामस भी कहा जाता है ।  ये तीनों क्रमशः ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और द्रव्यशक्ति प्रधान हैं । इसी तामस अहंकार से पंचमहाभूत (क्रमशः- आकाश,वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) की उत्पत्ति हुयी। किन्तु सीधे-सीधे यूं ही नहीं।
इसे ऐसा समझें— पंचमहाभूतों के कारण स्वरुप तामस अहंकार में विकार होने से आकाश महाभूत की उत्पत्ति हुयी । आकाश की तन्मात्रा और गुण है शब्द । इस शब्द के द्वारा ही द्रष्टा और दृष्य का बोध होता है, यानी ये न हो तो बोध भी न हो । आगे उक्त आकाश में विकार उत्पन्न हुआ,जिससे वायु की उत्पत्ति हुयी । इसका गुण है स्पर्श । ध्यातव्य है कि अपने कारण(आकाश)का गुण भी इसमें समाहित है, यानी वायु का मूल गुण तो स्पर्श है ही,फिर भी शब्दगुण युक्त भी है । इन्द्रियों में स्फूर्ति,शरीर में जीवनी शक्ति,ओज-बल-वीर्यादि सब इसीके रुप हैं । आगे क्रमशः काल-कर्म-स्वभाववश वायु में भी विकार उत्पन्न हुआ,जिससे तेज (अग्नि) की उत्पत्ति हुयी । अग्नि की तन्मात्रा है रुप । ध्यातव्य है कि मूल गुण रुप के साथ-साथ पूर्व भूत (आकाश और वायु) के क्रमशः गुण(शब्द और स्पर्श) भी इसमें विद्यमान हैं । आगे तेज के विकार से जल की उत्पत्ति हुयी, जिसका गुण है रस। पूर्व की भांति ये भी अपने पूर्व के तत्त्वों (आकाश,वायु,अग्नि) के गुण शब्द, स्पर्श, रुपादि से युक्त है। आगे जल के विकार से पृथ्वी की उत्पत्ति हुयी, जिसका गुण है गन्ध । पूर्व के तत्त्वों (आकाश, वायु, अग्नि और जल) के गुण क्रमशः शब्द, स्पर्श, रुप और रस भी विद्यमान हैं इसमें । इस प्रकार हम पाते हैं कि पूर्व की अपेक्षा बाद वाले तत्त्व पूर्व तत्त्वों के गुण को भी समाहित किये हुए हैं। एक बात और ध्यान देने की है कि उत्तरोत्तर स्थूल स्वरुप भी है इन पांचों का । यानी पृथ्वी सर्वाधिक स्थूल है, और आकाश सर्वाधिक सूक्ष्म । दूसरे शब्दों में स्पष्ट करें तो कह सकते हैं कि सृष्टि-क्रम में तत्त्व सूक्ष्म से स्थूल होते गए हैं और संहार क्रम में(विपरीत क्रम में) स्थूल से सूक्ष्म। कार्य-कारण न्याय के  अनुसार इनमें पूर्वोत्तर गुण भी विद्यमान हैं । यहां तक हुआ महतत्त्व के विकार तामस अहंकार की सृष्टि । अब आगे महतत्त्व के विकार सात्विक (वैकारिक) अहंकार की सृष्टि में मन और दस इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता—दिशा,वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति हुए । और उससे आगे तैजस (राजस)अहंकार के विकार के पांच ज्ञानेन्द्रियां (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा,घ्राण)  और पांच कर्मेन्द्रियां (वाक्,हस्त, पाद,गुदा और जननेन्द्रिय) उत्पन्न हुयी। इनके साथ ही ज्ञानशक्ति स्वरुपा बुद्धि और क्रियाशक्ति स्वरुपा प्राण भी तैजस(राजस) अहंकार से ही उत्पन्न हुए।
          इतना कुछ होने पर भी सृष्टि की क्रिया आगे नहीं बढ़ी, क्यों कि यह सब कार्यभाव था । मायापति की कृपा से जब ये सब कारणभाव स्वीकार किये,तब जाकर व्यष्टि और समष्टि रुप पिण्ड और ब्रह्माण्ड की रचना हुयी ।  किन्तु ये ब्रह्माण्ड भी सहस्र वर्षों तक निर्जीव-सा (निष्क्रिय) पड़ा रहा । फिर काल-कर्म-स्वभाव को स्वीकार करने वाले निर्गुण-निराकार परमात्मा की कृपा से उस अण्ड में विस्फोट हुआ,जिसके परिणाम स्वरुप विराटपुरुष की उत्पत्ति हुयी । यह विराट् ही वास्तव में  ब्रह्माण्ड है । ध्यातव्य है योगेश्वरेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने रोम-रोम में ब्रह्माण्ड होने की बात कही है। वस्तुतः यह सृष्टि अनादि-अनन्त,अपरिमेय है । योगीगण ध्यानावस्था में इसकी अनुभूति भले कर लें, किन्तु सामान्य मानवी बुद्धि में इसकी समग्र कल्पना भी असम्भव है।
           उस अद्भुत विराट् पुरुष की कमर के ऊपर के अंगों में स्वर्गादि सप्तलोकों की कल्पना की जाती है, तथा कमर से नीचे के अंगों में सातो पाताल की । पैरों से कटि पर्यन्त सप्त पाताल क्रम में ही हमारा भूलोक भी है । उसके नीचे क्रमशः कटि में अतल, जांघों में वितल,घुटनों में सुतल,जानु में तलातल,एड़ी के ऊपर की गांठों में महातल,पादपंजों में रसातल और तलुए में पाताल हुए । ऊपर नाभि में भुवर्लोक,हृदय में स्वर्लोक,वक्ष में महर्लोक,ग्रीवा में जनलोक,दोनों स्तनों में तपलोक और मस्तक में सत्यलोक है ।  इस प्रकार सात+सात चौदह भुवन कहे गए हैं। अस्तु।

पौराणिक भूगोल—      
अब आगे सिर्फ भूलोक की विशेष चर्चा करते हैं। जो आधुनिक भूगोल से बिलकुल अलग हट कर या कहें अधिक गहराई में जाकर, पौराणिक भूगोक  है । यहां यह अति प्रासंगिक भी है।  विद्वानों के लिए भले ही यह प्रसंग उबाऊ हो सकता है, किन्तु नयी पीढ़ी के लिए वैचारिक दीपिका साबित होगी—ऐसा मेरा विश्वास है।
समूचा भूगोल ५० करोड़ योजन विस्तार वाला है । और उसके बाद उससे
चौथाई (साढ़ेबारह करोड़ योजन) विस्तार वाला लोकालोक पर्वत है। एतावाँलोकविन्यासो मानलक्षणसंस्थामिर्विचिन्ति तः कविभिः स तु पञ्चासत्कोटिगणितस्य भूगोलस्योत्तरीय भागोऽयं लोकालोकाचलः।।  (भा.पु.५-२०-३८) ध्यातव्य है कि यह सिर्फ एक ब्रह्माण्ड का परिमाण कहा जा रहा है । जब कि ब्रह्माण्ड अगनित हैं।  
  अति पूर्वकाल में स्वायम्भुव मनु के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद।  इन्हीं उत्तानपाद के पुत्र विष्णु-भक्त ध्रुव हैं, जो ध्रुवतारे के रुप में अपने लोक में प्रतिष्ठित हैं । प्रियव्रत के दस पुत्र हुए,जिनमें तीन तो पूर्ण वैरागी हो गये,शेष सात के लिए राजर्षि ने सप्तमहाद्वीपों की योजना बनायी। ये हैं क्रमशः- जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप । ध्यातव्य है कि विभिन्न पुराणों में मन्वन्तर वैभिन्य से इनके क्रम में किंचित भेद भी है, पर नाम में नहीं । हां, प्लक्ष का एक नाम गोमेद भी है ।
पृथ्वी के मध्य में जम्बूद्वीप स्थित है, जिसका विस्तार एकलाख योजन (योजन=चार कोस=आठ मील यानी कि बारह किलोमीटर लगभग) है। इसकी आकृत्ति सूर्यमंडल की तरह है । पूरे भूमण्डल को हम एक विशालकाय कमलपुष्प मानते हुए कह सकते हैं कि ऊपर कहे गए सात द्वीप उसके कोश-स्थान में हैं । उन सात में सबसे भीतर का कोश है हमारा जम्बूद्वीप ।
  पुनः उस जम्बूद्वीप को नौ-नौ हजार योजन विस्तार वाले नौ खण्ड किये गये, जो नववर्ष के नाम से ख्यात हुए । यथा—भद्राश्ववर्ष,केतुमालवर्ष,भारतवर्ष,हरिवर्ष, किंपुरुषवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष, उत्तरकुरुवर्ष, पूर्व/ दक्षिण कुरुवर्ष ।  शेष भाग में यानी सबके मध्य में एक अलग दसवां वर्ष भी है, जो इलावृतवर्ष के नाम से जाना जाता है । इस इलावृतवर्ष के मध्य में समस्त पर्वतों का राजा मेरुपर्वत है, जिसे भूमण्डल रुपी कमलपुष्प की कर्णिका कह सकते हैं ।  इलावृतवर्ष के उत्तर में क्रमशः रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और कुरुवर्ष हैं,तथा दक्षिण की ओर हरिवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष है । पूर्व और पश्चिम में क्रमशः भद्राश्ववर्ष और केतुमाल वर्ष हैं। (भा.पु.पंचम स्कन्ध,भुवनकोश वर्णन)
ध्यातव्य है कि उक्त भारतवर्ष को भी कई खंड और उप खंडों में विभाजित किया गया है । इसके प्रमाण स्वरुप हम किसी कार्य में किए जाने वाले संकल्प-वाक्य पर ध्यान दें—  ॐ विष्णुर्विष्णुविष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे द्वितीययामे तृतीयमुहूर्ते  श्रीश्वेतवारहकल्पे  सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तरगते बौद्धावतारे प्रभवादि षष्टिसंवत्सराणां मध्ये, वैक्रमाब्दे...इत्यादि।
 पुराण कहते हैं कि ये भारतवर्ष ही सिर्फ कर्मभूमि है । शेष सभी वर्ष भोगभूमि हैं, जहां स्वर्गादिलोकों का  अवशेष पुण्य फलादि भोगने हेतु प्राणी पहुँचता है । इसे यूं समझें—  मान लिया कि स्वर्गलोक-भोग हेतु पुण्यमान १० से १०० तक का चाहिए। अब  १० से नीचे वाले को कहां भेजेंगे—क्षीणे पुण्ये मृत्युलोके वसन्ति...में यह भाव भी छिपा हुआहै । यानी इतना पुण्य अब शेष नहीं रहा कि स्वर्गलोक में वास हो सके, किन्तु न वह नरकादि के योग्य है और न मुक्ति की स्थिति वाला ही । वैसी स्थिति में उन-उन वर्षों में जाना पड़ता है प्राणी को ध्यातव्य है भारतभूमि सिर्फ कर्मभूमि ही नहीं,प्रत्युत किंचित भोगभूमि भी है । यानी कि कर्म की प्रधानता है यहां।
 इस प्रकार उक्त पंक्तियों से ये स्पष्ट होता है जिसे आज हम भारतवर्ष(अंग्रेजों के शब्दों में इण्डिया)कहते हैं,वह पौराणिक-ऐतिहासिक सम्पूर्ण भारतवर्ष नहीं है। बल्कि उसका एक बहुत ही छोटा सा भाग है। वर्तमान में तो आ समुद्रा तु वा पूर्वा वा समुद्रातु पश्चिमा हिमयोर्विन्ध्ययोर्मध्ये आर्यावर्त विदुर्बुधाः – वाली सीमा मर्यादा भी नहीं रही है हमारे राष्ट्र की।

अब जम्बूद्वीप के बारे में कुछ बातों की चर्चा करें—

जम्बूद्वीप अपने समान आकार वाले खारे पानी के समुद्र से घिरा हुआ है। प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र इसके अधिपति कहे गए हैं । जम्बूद्वीप को विराट पुरुष का कटिभाग कहा गया है । इस प्रकार कटिप्रान्त से ऊर्ध्वगमन करते हुए,इससे छठे पड़ाव पर शाकद्वीप की स्थिति है । मेरुओं में प्रधान मेरु शाकद्वीप में ही है— देवर्षि गन्धर्व युतो प्रथमो मेरु रुच्यते (वायुपुराण अ.४९)। भूगोलार्द्ध का ऊपरी मुखभाग शाकद्वीप ही है। स्कन्दपुराण शाकद्वीप को जम्बूद्वीप और क्षार समुद्र के बाद, यानी दूसरे क्रम में ही मानता है, जब कि भागवतादि पुराणों में ऊपर वर्णित क्रम  है — शाकद्वीप का प्रारम्भ से छठा क्रम । तदनुसार विस्तार और आवृत्त (क्षारजल, सुस्वादुजल, धवलजल, सुरा, घृततुल्य, दधितुल्य, मधुरसादि) के क्रम में भी भेद है। शाकद्वीप में राजा प्रियव्रत के पुत्र मेधातिथि का आधिपत्य है। यहां ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्ण वास करते हैं । ये सभी द्वीप उत्तरोत्तर क्रम से दुगने विस्तार और आवृत वाले हैं।
इस प्रकार सप्तद्वीपा (स समुद्राः) सम्पूर्ण पृथ्वी का परिमाण दो करोड़, पचास लाख, तिरपन हजार योजन कहा गया है। ध्यातव्य है कि इस विस्तार से परे भी शत-सहस्र योजनों का अनन्त विस्तार है, और सृष्टि वहां भी समान्तर रुप से फलफूल रही है।
प्रसंगवश हम कह सकते हैं कि शाकद्वीपीय बन्धु इस विधा में सिद्धहस्त थे – इसमें कोई दो मत नहीं । भौतिक-अभौतिक सृष्टि के तात्त्विक भेद के कारण टाइम और स्पेस का प्राचीन सिद्धान्त आधुनिक भौतिक विज्ञानियों के समझ से बाहर की बात है। तब और भी- जब कि समझने का प्रयास ही न किया जाय ।  नव शोधकार जल के विविध स्वाद और रंग-भेद (क्षारीय,अम्लीय,फेनिल,मधुर,स्नेहिल,नील-पीतादि रंगों) के आधार पर पृथ्वी के विभिन्न समुद्रों,खाड़ियों से तुलना कर अपना सत्य प्रमाणित कर देते हैं, और काल गणना, जो उनके समझ से बिलकुल परे है, को ऋषि-परम्परा की कपोल-कल्पना या अतिशयोक्ति  कह कर वेशर्मी पूर्वक खिल्ली उड़ाते हैं । कुछ थोड़े से आधुनिक विज्ञानी जो समझने का सत्प्रयास किये हैं, भारतीय विद्या और कला के सामने नतमस्तक होकर,स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किए हैं।
 एक महत्त्वपूर्ण बात पर ध्यानाकर्षण जरुरी लग रहा है कि पौराणिक भूगोल और आधुनिक भूगोल में कोई तालमेल नहीं है । जानकार लोगों का एक वर्ग इसे सिरे से नकार देता है - कपोल-कल्पना या निरा झूठ कहकर, तो दूसरा वर्ग दिव्य-अलौकिक आदि शब्दों से महिमामंडित कर गौरवान्वित होता है । एक तीसरा वर्ग है, जो नितान्त एकान्त-सेवी, मनस्वी, योगाभ्यासी है और अपने साधना बल से सत्य की खोज करता है; किन्तु उसका सत्य गूंगे के गुड़ की तरह प्रायः होता है। एक चौथा वर्ग भी है, जो निरन्तर शोध में लगा होता है—सच्चाई को जांचने-परखने में अपना जीवन खपाता है। सच पूछें तो ऐसे ही खोजी व्यक्ति की आवश्यकता है, जो धर्मान्धता विकार रहित, गणितीय-तार्किक और निष्पक्ष विचार वाला हो । तभी किसी सही दिशा में बढ़ सकेगा समाज । इसे सम्यक् रुप से समझने हेतु सायन्स और योगा से भिन्न, योगविज्ञान, सूर्यतन्त्र  और सृष्टितन्त्र को नये सिरे से समझने की आवश्यकता है । अस्तु।

                  ---)ऊँ श्री मार्तण्याय नमः(---
क्रमशः... 

Sunday, 16 July 2017

शाकद्वीपीय ब्राह्मणःलघुशोध--पुण्यार्कमगदीपिका भाग पांच

गतांश से आगे...

५. देवर्षि नारद का प्रश्न और सुतनु ब्राह्मण वटुक का  तदुत्तर


प्रश्नः- .मातृकां को विजानाति,कतिधा कीदृशाक्षरम् मातृकाविद्या का ज्ञाता कोई है , अक्षर कितने हैं और उनका वैज्ञानिक स्वरुप क्या है ?
उत्तर- ऊँकारः प्रथमस्तस्य चतुर्दश स्वरास्तथा । वर्णाश्चैव त्रयस्त्रिंशदनुस्वारस्तथैव च ।।  विसर्जनीयश्च परो जिह्वा मूलीय एव च । उपध्मानीय एवापि द्विपञ्चाशदमीस्मृताः ।।  अकारः कथितो ब्रह्मा उकारो विष्णुरुच्यते । मकारश्च स्मृतो रुद्रस्त्रयश्चैते गुणाः स्मृताः ।। अर्द्धमात्रा च या मूर्ध्निं परमः स सदाशिवः।। 
(प्रथम मातृकावर्ण ऊँकार है, जो अ-उ-म् का संघटन है। अ- ब्रह्मा, उ-विष्णु, म्-रुद्र- त्रिगुणमय स्वरुप हैं। अनुस्वार स्वरुप अर्द्धमात्रा ही सदाशिव हैं।) अकार से औकार तक चौदह स्वर, ककारादि तैंतीस व्यंजन,अनुस्वार,विसर्ग,जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये कुल मिलाकर बावन मातृतावर्ण हैं। अकार से औकार पर्यन्त चौदह स्वर ही चौदह मनु हैं। इनके प्रसिद्ध नाम हैं— स्वायम्भुव,स्वारोचिष, औत्तम, रैवत,तामस, चाक्षुष,वैवश्वत,सावर्णि,ब्रह्मसावर्णि,रुद्रसावर्णि,दक्षसावर्णि, धर्मसावर्णि, रौच्य तथा भौत्य । श्वेत,पाण्डु, लोहित,ताम्र,पीत, कपिल, कृष्ण,श्याम,धूम्र, अतिपिंगल,अल्पपिंगल,त्रिरंग,बहुरंग एवं कवर — ये क्रमशः उक्त चौदह मनुओं के रंग हैं ।  क से ठ पर्यन्त बारह व्यंजन मूलतः द्वादशादित्य हैं । इन बारहों के क्रमशः प्रसिद्ध नाम हैं — धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंशु, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु । ड से ब पर्यन्त ग्यारह रुद्र हैं । ये हैं क्रमशः- कपाली, पिंगल, भीम,विरुपाक्ष,विलोहित, अजक, शासन, शास्ता, शम्भु, चण्ड और भव । भ से ष पर्यन्त आठ वसु हैं । यथा- ध्रुव,घोर,सोम, आप, नल, अनिल,प्रत्यूष तथा प्रभास । स और ह ये दोनों अश्विनीकुमार हैं । इस प्रकार ये तैंतीस देवता हुए । प्रकारन्तर में ये ही तैंतीस कोटि कहे गए । ध्यातव्य है कि यहां कोटि शब्द प्रकार बोधक है, न कि संख्या बोधक । अनुस्वार, विसर्ग,जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय —ये चार अक्षर ही क्रमशः जरायुज, अण्डज, पिण्डज और उद्भिज नामक चार प्रकार के जीव हैं सृष्टि में । अनुस्वारो विसर्गश्च जिह्वामूलीय एव च । उपध्मानीय इत्येते जरायुजास्तथाऽण्डजाः । स्वेदजाश्चोद्भिञ्जाश्चापि पितर्जीवाः प्रकीर्तिताः ।। (स्क.पु.कुमारिकाखंड ३-२५४)
आगे, विप्र कुमार सुतनु ने देवर्षि नारद को बतलाया कि जो पुरुष उक्त देवों का आश्रयी होकर निज कर्मानुष्ठान में सतत तत्पर रहते हैं वे ही अर्द्धमात्रा स्वरुप सदाशिव को लब्ध होते हैं । ध्यातव्य है कि आमतौर पर लोग शिव, शंकर, रुद्र, सदाशिव आदि को एक ही मान लेते हैं,जब कि इनमें पर्याप्त अन्तर है । अतः यात्रापथान्तर भी स्वाभाविक है । अस्तु।
(नोटः-उक्त मातृका विषय साधना-विधि सहित मैंने अपने बहुचर्चित तान्त्रिक उपन्यास— बाबाउपद्रवीनाथ का चिट्ठा में और भी विस्तार से वर्णित किया है । ये पुस्तक रुप में प्रकाशित है, तथा ब्लॉग पर भी उपलब्ध है। जिज्ञासु बन्धु इस लिंक पर जाकर भी देख सकते हैं— punyarkkriti.simplesite.com के उपन्यास सेक्शन में, तथा punyarkkriti.blogspot.com . यानी इसी ब्लॉग में)

प्रश्न .  पञ्चपञ्चाद्भुतं गेहं को विजानाति वा द्विजः – पांच गुने पांच यानी पचीस तत्त्वों के अद्भुत गृह को कौन जानता है ?
उत्तर— पञ्चभूतानि पञ्चैव कर्मज्ञानेन्द्रियाणि च । पञ्च पञ्चापि विषया मनोबुद्ध्यहमेव च ।। प्रकृतिः पुरषश्चैव पञ्चविंशः सदाशिवः । पञ्चपञ्चभिरेतैस्तु निष्पन्नं गृहमुच्यते ।। (स्क.पु.कुमारिकाखंड ३-२७१) वस्तुतः त्रिगुणात्मिका सृष्टि पचीस ईंटों का अद्भुत भवन है । महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन में इन्हें विशद रुप से वर्णित किया है, जो नास्ति सांख्यसमं ज्ञानं, नास्ति योगसमं बलम् -  को चरितार्थ करता है । आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— पांच महाभूत ; शब्द, स्पर्श,रुप,रस,गन्धादि,इनके पांच विषय ; हस्त,पाद,मुख, गुदा, उपस्थादि पांच कर्मेन्द्रिय ; कर्ण, नासिका,नेत्र, जिह्वा, त्वचादि पांच ज्ञानेन्द्रिय; मन,बुद्धि,अहंकार,प्रकृति और पुरुष—ये ही कुल पच्चीस मूलतत्त्व हैं । इनका सम्यक् (तत्त्वतः) ज्ञान ही परमात्म बोध है । यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वाधास्या अहम् ।  स्युष्टे सत्या इहाशिषः ।। (ऋग्वेद-६.३.४०.२३) हे प्रकाशस्वरुप परमात्मन् ! यदि मैं तू हो जाऊँ और तू मैं हो जाय तो तेरा आशीर्वाद सच हो जाय । यानी द्वैत भाव मिटकर,एकत्वभाव उत्पन्न हो जाये । उक्त सांख्य का यही तो परिपाक है । इसे जो जान लेता है उसका द्वित्व तिरोहित हो जाता है । अस्तु।

प्रश्न . बहुरुपां स्त्रियं कर्तुंमेकरुपाञ्च वेत्ति कः  – बहुरुपा स्त्री को एकरुपा बनाने की कला किसे मालूम है?
उत्तर— स्त्री एक रुप अनेक—एक ऐसी स्त्री जो सदा अनेकानेक रुप धारण करते रहती है—प्रश्न प्रथम दृष्ट्या बड़ा ही जटिल प्रतीत होता है । मानवी बुद्धि में समाने वाला विषय ही नहीं है यह, किन्तु किंचित ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री तो अनेक रुपा है ही । निर्बुद्धि पुरुष को रिझाने हेतु सदा अनेकानेक रुप धारण करते रहती है । और पुरुष उलझा रहता है सदा उसके जाल में । कदाचित निकल जाये जंजाल से तो मुक्त हो जाये । पुरुषवादी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इसे ठीक से समझ नहीं पाने के कारण इसके विरोध में खड़ा हो गया है । और विरला कोई समझ गया इसके चरित्र को,तो मुस्कुरा कर बाहर निकल गया या कहें निर्विकार खड़ा रह गया- यथास्थान और वह स्वयं ही निराश होकर परे हट गयी ।
नारद के इस प्रश्न में सांख्य के बाइसवें तत्त्व- बुद्धि के बारे में कहा गया है । बुद्धिरुपां स्त्रियं प्राहुर्वुद्धिं वेदान्तवादिनः । सा हि नानार्थभजनान्नानारुपं प्रपद्यते ।। धर्मस्यैकस्य संयोगाद्वहुधाप्येकिकैव सा । इति यो वेद तत्वार्थं नासौ नरकमाप्नुयात् ।। बुद्धि स्त्री ही है न ! स्त्रीलिंगी । ध्यातव्य है कि यह आद्यशंकर की माया नहीं । ये तो बुद्धि है- मन के बाद वाला जटिल तत्त्व,जो सदा मनुष्य को अनेकानेक रुप धारण करके नचाते रहती है । क्षण में कुछ, क्षण में कुछ । सत्य को मिथ्या, असत्य को सत्य,कुरुप को रुप,रुप को कुरुप बताते रहती है । जिसका कोई अस्तित्त्व ही नहीं,उसे अस्तित्त्ववान साबित कर देती है अपनी वाक्पटुता से,चातुर्य से । वेदान्तवादियों ने इसे ठीक से पहचाना है, और जैसे छोटे से लौह अंकुश से विशाल गजराज वशीभूत हो जाता है, उसी भांति धर्माचरण के अंकुश से इसे वश में करने की युक्ति सुझायी है।  दश लक्षणयुक्त धर्मानुयायी सदा इस बहुरुपा के चंगुल से बाहर निकलने में सफल हो जाता है। या कहें उसकी अनेकरुपता ही निरस्त हो जाती है- धर्माचारी के सामने । अतः विद्वान मनुष्य को सतत सावधान रहकर, यत्न पूर्व धर्म का पालन करना चाहिए। (अब यहां धर्म को हिन्दू,मुसलमान, ईसाई,पारसी,जैन,बौद्ध,सिक्ख आदि न समझ ले कोई । ये सब धर्म कदापि नहीं हैं । ये सब बहुरुपा बुद्धि के भ्रमजाल हैं हमें फंसाने-उलझाने हेतु।) धर्मस्य तत्त्वं निहिते गुहायां...। अस्तु।

प्रश्न . को वा चित्रकथं वंधं वेत्ति संसार गोचरः –  विचित्र चित्रबंध क्या है ?
उत्तर— अब वटुक सुतनु देवर्षि के चित्रवंध विषयक चौथे प्रश्न का उत्तर दे रहा है । मुनियों ने जिसे नहीं कहा है, यानी तत्त्वदर्शियों द्वारा जो प्रमाणित (अनुभूत) नहीं है, जो वचन देवों को मान्य नहीं है यानी स्वीकार नहीं है,उसे ही विद्वानों ने विचित्र कथा से मुक्त बन्ध(वाक्यविन्यास) कहा है । तथा जो कामयुक्त वचन है, वह भी इसी श्रेणी में आता है । ऐसा वचन कदापि सुनने और मानने योग्य नहीं है । वास्तव में वह बन्धन है,मोक्ष कदापि नहीं । अस्तु।

प्रश्न . को वार्णवमहाग्राहं वेत्ति विद्यापरायणः - समुद्र में रहने वाले सर्वाधिक भयंकर महाग्राह का ज्ञान किसे है ?
         उत्तर- एको लोभो महान् ग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते । लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते ।। स्कन्दपुराण कुमारिकाखंड ३-२७७ से प्रारम्भ कर अगले दश श्लोकों में लोभ रुपी महाग्राह की विशद चर्चा है । संसार रुपी महार्णव में उबचूब हो रहे प्राणी (विशेष कर मनुष्य - जो एकमात्र बुद्धि सम्पन्न है) को लोभ रुपी महाग्राह सदा ग्रसे रहता है । काम, क्रोध, मोहादि सब इसके ही साथी-संगी हैं । कहा गया है- लोभः पापस्य कारणम् । बहुधा पापों का मूल कारण लोभ ही है । इसका स्वरुप सर्वदा एक समान नहीं रहता । बहुत बार तो इसे ठीक से पहचानने में भी कठिनाई होती है । और न पहचान पाने के कारण बुद्धिमान मनुष्य भी लोभ के शिकार हो जाते हैं । लोभी अजितेन्द्रिय पुरुष में दम्भ,द्रोह,निन्दा, चुगली,डाह आदि दुर्गुण सहज ही समाविष्ट हो जाते हैं । लोभासक्त मनुष्य सदाचार से दूर हो जाता है । ऐसे लोगों की गति तिनके-पत्तों से ढके गहरे कुंए के पार जाने जैसी होती है,जो युक्तिवाद का आश्रय लेकर अनेकानेक पन्थ चला देते हैं, और धर्म के सन्मार्ग का लोप कर देते हैं ।  यहां तक कि धर्म को अलंकार बनाकर संसार को ठगने-लूटने का साधन बना लेते हैं । अतः प्रज्ञावान पुरुष को सदा इससे सावधान रहना चाहिए । अस्तु।

प्रश्न . - को वाष्टविधं ब्राह्मण्यं वेत्ति ब्राह्मण सत्तमः - अष्टविध ब्राह्मणों का ज्ञान किसे है ?
उत्तर- अब देवर्षि नारद के छठे प्रश्न का उत्तर देते हुए ब्राह्मण वटुक सुतनु कहते हैं- अथ ब्राह्मणभेदांस्त्वमष्टौ विप्रावधारय । मात्राश्च ब्राह्मणश्चैव श्रोत्रियश्च ततः परम् ।। अनूचानश्च तथा भ्रूणो ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः । इत्येतेऽष्टौ समुद्दिष्टा ब्राह्मणाः प्रथमं श्रुतौ ।। तेषां परं परः श्रेष्टो विद्यावृत्तविशेषतः । ब्राह्मणानां कुले जातो जातिमात्रो यदा भवेत् । अनुपेतक्रियाहीनो मात्र इत्यभिधेयते ।। एकोदेशमतिक्रम्य वेदस्याचारवानृजुः । स ब्राह्मण इति प्रोक्तो निभृतः सत्यवाग्घृणी ।। एकां शाखां सकल्पां च षड्भिरङ्गैरधीत्य च । षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियो नाम धर्मवित् ।। .... 
(नोट— आलेख बोझिल होने के वजह से सभी श्लोकों को यहां नहीं दिया जा रहा है। जिज्ञासुओं को इसे मूल ग्रन्थ में देखना चाहिए।) 
इस प्रकार स्कन्दपुराण कुमारिका खंड ३- २८७ से २९८ तक बारह श्लोकों में ब्राह्मणों के आठ भेद (कर्मानुसार) बतलाये गये हैं।  यथा- १. मात्र,२.ब्राह्मण,३.श्रोत्रिय,४.अनुचान,५.भ्रूण, ६.ऋषिकल्प,७.ऋषि, और ८.मुनि । ज्ञान, विद्या और सदाचार की विशेषता से उक्त आठ प्रकार पूर्व-पूर्व की तुलना में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ कहे गए  हैं ।
अब यहां संक्षेप में इनका विशेष परिचय भी दिए देता हूँ, ताकि सामान्य जन को समझने में सुविधा हो ।
यथा- .मात्र- जो मात्र जन्मना ब्राह्मण है,यानी माता-पिता ब्राह्मण हैं जिनके,परन्तु उसका निज संस्कार उपनयनादि, संध्यावन्दनकर्मादि लोप हो गया है, वह मात्र नामक ब्राह्मण कहलाता है।
२.ब्राह्मण- जो व्यक्तिगत स्वार्थ की उपेक्षा करके,वैदिक आचार का पालन करते हुए, सरल,एकान्तप्रिय,सत्यवादी और दयालु है उसे ब्राह्मण कहते हैं । (ध्यातव्य है कि यहां अष्टविध ब्राह्मणों में ब्राह्मण एक प्रकार है, न कि जाति बोधक ।)
३.श्रोत्रिय- जो वेद की किसी एक शाखा को कल्प और षडङ्गों सहित पढ़ कर, ब्राह्मणोचित षट्कर्मों (अध्यापन, अध्ययन, यजन,याजन,दान,प्रतिग्रह) में संयमित, संलग्न रहता है वह धर्मज्ञ विप्र श्रोत्रिय कहलाता है। (ध्यातव्य है कि आजकल श्रोत्रिय एक जाति/प्रकार बोधक शब्द बन कर रह गया है।)
४.अनुचान- उक्त श्रोत्रिय के लक्षणयुक्त ब्राह्मण कल्प और षडङ्गों का तत्त्वज्ञ होकर,अपने ही अनुकूल शुद्ध,पापरहित विद्वान,श्रोत्रिय विप्र निर्मित करने की योग्यता रखता हो उसे अनुचान(श्रोत्रिय से किंचित श्रेष्ठ )कहा गया है।
५.भ्रूण- जो अनुचान के समस्त गुणों से युक्त ब्राह्मण यज्ञ और स्वाध्याय में ही सदा रमा रहता है, यज्ञशिष्टान्न भोजी होता है, और सभी इन्द्रियों को अपने अधीन रखता है,विद्वान लोग उसे भ्रूण ब्राह्मण कहते हैं।
६.ऋषिकल्प- जो सम्पूर्ण वैदिक-लौकिक विषयों का ज्ञानार्जन करके,मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा आश्रम में निवास करता है,उसे ऋषिकल्प कहा गया है।
७.ऋषि- जो पहले ऊर्ध्वरेता (नैष्टिक ब्रह्मचारी) के रुप में जीवन व्यतीत करता है, उसे किसी विषय का संदेह नहीं रहता,तथा जो शाप और अनुग्रह में पूर्ण समर्थ और सत्यनिष्ठ रहता है, उसे ऋषि कहा जाता है।
८.मुनि- निवृत्ति मार्ग में स्थित सम्पूर्ण तत्त्वों का ज्ञाता,काम क्रोधादि से रहित, ध्याननिष्ठ,निष्क्रिय,जितेन्द्रिय, तथा मिट्टी और सोने में समानता रखता हो,ऐसे ब्राह्मण को मुनि कहा गया है।
इस प्रकार ज्ञान, कर्म और स्वभावानुसार ब्राह्मणों के आठ प्रकार कहे गए ।

प्रश्न. युगानां च चतुर्णां वा को मूल दिवसान् वदेत्  - चारो युगों के प्रथम दिन कौन-कौन हैं ?
उत्तर- कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सतयुग की आदि तिथि है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि त्रेतायुग की आदि है । माघ कृष्ण पक्ष की अमावश्या द्वापर युग की आदि तिथि है । एवं भाद्र कृष्ण त्रयोदशी कलयुग की आदि तिथि है । इन सभी तिथियों में दान,धर्म,कर्मादि अति शुभद कहे गए हैं । (नोट- किंचत मतभेद भी है उक्त तिथियों में । फिर भी अधिक मान्य उक्त तिथियां ही हैं ।)

प्रश्न. चतुर्दशमनूनां वा मूलवारं च वेत्ति कः –  चौदह मन्वन्तरों की आद्य तिथि क्या है ?
उत्तर- अब मन्वन्तर की आदि तिथियों की चर्चा करते हैं - ये हैं क्रमशः आश्विन शुक्ल नवमी,कार्तिक द्वादशी, चैत्र और भाद्र तृतीया, फाल्गुन अमावश्या, पौष एकादशी, आषाढ़ दशमी, माध सप्तमी, श्रावण कृष्णाष्टमी, आषाढ़ पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन चैत्र और ज्येष्ठ पूर्णिमा। ये सब भी दानादि कर्मों के लिए उत्तम कहे गए हैं।

प्रश्न. कस्मिश्चैव दिने प्राप पूर्वं वा भास्करो रथम् --  सर्व प्रथम सूर्यनारायण किस दिन रथारुढ़ हुए ?
उत्तर- माध शुक्ल सप्तमी को रथ सप्तमी के नाम से जाना जाता है । वस्तुतः सूर्यनारायण के रथारुढ़ होने का प्रथम और प्रशम दिवस यही है । मगविप्रों के लिए इससे उत्तम और कौन सा दिन हो सकता है ! सूर्य-साधना के लिए यह सर्वोत्तम दिन है।

प्रश्न १०. उद्वेजयति भूतानि कृष्णाहिरिव वेत्ति कः -  काले सर्प की भांति नित्यप्रति संसार को उद्विग्न कौन करता है ?
             उत्तर- जो प्रतिदिन याचना करता है,वह पापात्मा सदा सबके लिए उद्वेगकारी है । यह कह कर याचना(भीख मांगना) को अति निकृष्ट कर्म कहा गया है। वैसे भी मांगने वाले का हाथ सदा नीचे ही रहता है । आत्महीनता की भावना से भी ग्रसित रहता है ।

प्रश्न ११. को वास्मिन् घोर संसारे दक्षदक्षतमो भवेत् –  सुदक्ष कौन है ?
    उत्तर- इस लोक में किस कर्म से मुझे सिद्धि प्राप्त हो सकती है और मृत्योपरान्त यहां से मुझे कहां यानी किस लोक में जाना है - इस बात का भलीभांति विचार करके,जो पुरुष भावी क्लेश के निराकरण का सदा प्रयत्न करते रहता है, विद्वानों ने उसे ही सुदक्ष कहा है ।

प्रश्न १२.पन्थानावपि द्वौ कश्चिद्वेत्ति वक्ति च ब्राह्मणः –  दोनों मार्गों को कौन जानता और बतलाता है?
उत्तर- वेदान्तवादियों ने दो मार्ग कहे हैं—अर्चि और धूम्र । इसे ही देवयान और पितृयान भी कहा गया है । श्रेयस और प्रेयस भी यही है । इन दोनों से भिन्न (विपरीत)जो अशास्त्रीय मार्ग है उसे पाखण्ड कहते हैं । वस्तुतः दो ही मुख्य मार्ग हैं । अर्चीमार्गी पुरुष मोक्ष का पूर्ण अधिकारी है और धूम्रमार्गी जीव स्वर्गादि पुण्यफल भोग कर पुनः वापस आता है इसी संसार में । उपनिषदों ने श्रेय और प्रेय नामक दो ही मार्ग सुझाये हैं । श्रेयमार्ग का पथिक ही अर्चिमार्ग का अनुसरण करते हुए मुक्ति प्राप्त करते हैं । इसके विपरीत प्रेयमार्ग का अनुयायी निरन्तर जन्म-मृत्यु-चक्र में आवागमन करते हुए व्यतीत करते हैं । श्रेयमार्गी सीधे सूर्य की ओर प्रस्थान करते हैं । उनका उत्तरोत्तर विकास होते रहता है । जबकि प्रेयमार्गी सदा इन्द्रिय-सुख-लिप्त-मोहित अनन्तकाल व्यतीत करता है संसार सागर में । वस्तुतः ये दक्षिणायन या धूम्रमार्ग ही है, जो अन्धकार का प्रतीक है।
इस सम्बन्ध में महर्षि पिप्लाद के वचन हैं—
अघोत्तरतेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्या दित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमे तत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त ।। (प्रश्नोपनिषद् १-१०) जिन्होंने आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण विश्वास पूर्वक तप, ब्रह्मचर्यादि से जीवन को संयमित रखते हुए सदा सूर्य रुपी परमेश्वर में लगा दिया है, वे मनुष्य उत्तरीमार्ग (उत्तरायण) से लोकान्तर प्रस्थान करते हैं । गीता में गोविन्द ने कहा है - यं प्राप्यं न विवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।। इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं - निष्काम कर्मी और सकाम कर्मी । निष्कामी मुक्त होजाता है, और सकामी सदा बन्धन में रहता है, भले ही वह ब्रह्मा का दिन क्यों न हो । एक  न एक दिन अन्त तो होगा ही न !  अस्तु।
इस प्रकार देवर्षि नारद को अपने सारे प्रश्नों का समुचित उत्तर प्राप्त हुआ विप्र कुमार सुतनु द्वारा । कलाप ग्राम के अन्यान्य ब्राह्मणों का दर्शन करके नारदजी स्वयं को धन्य समझने लगे और श्रीमन्नारायण नारायण का गायन करते हुए प्रस्थान किए। एवमस्तु।
अब इस कठिन कसौटी पर परखने पर सोचने-विचारने को विवश हो जाता हूँ कि हम सब  कहां हैं !

                  ---))))ऊँ श्री भास्कराय नमः((((---

Saturday, 15 July 2017

शाकद्वीपीय ब्राह्मणःलघुशोध--पुण्यार्कमगदीपिका भाग चार

गतांश से आगे...

                   . कलापग्राम : रहस्यमय यात्रा

मत्स्य पुराण के प्रारम्भ में ही प्रसंग है— महाराज मनु स्नानोपरान्त तर्पणार्थ अंजली में जल ग्रहण किए, तभी उन्हें शफरी (अति लधु मत्स्य) का दर्शन हुआ। दयार्द्र ऋषि ने उसे अपने कमण्डलु में डाल दिया। थोड़े ही पल में उसके आकार में वृद्धि हुयी और कमण्डल छोटा पड़ने लगा। आगे क्रमशः उसका त्वरित आकार-वृद्धि होता रहा और उसे कूप, सरोवर,सरितादि में स्थानान्तरण करते रहे ऋषि । अन्त में अति जिज्ञासु भावापन्न ऋषि ने सादर निवेदन किया- परिचय स्पष्टी हेतु । वस्तुतः प्रभु का मत्स्यावतार था वह । प्रभु ने मनु को आज्ञा दी कि सृष्टि के समस्त बीज यथाशीध्र एक नौका में संग्रहित कर दिये जायें, क्यों कि आसन्न महाप्रलय में सबकुछ जलमग्न हो जाना है। उस नौका को महामत्स्य के विशाल श्रृंग में बांध कर प्रभु कलाप ग्राम की यात्रा पर निकल पड़े।
योग्य विप्र की खोज में देवर्षि नारद भूमंडल छान मारने के पश्चात् निराश हो उसी कलापग्राम की यात्रा पर निकले, क्यों कि उन्हें विश्वास था कि वहां उन्हें दिव्य विप्रों का दर्शन अवश्य मिलेगा,जिनसे उन्हें अपने द्वादश जटिल प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होगा ।
यात्रा काशी से प्रारम्भ होती है केदारक्षेत्र की ओर,जहां सौ योजन विस्तार वाला हिमाच्छादित प्रदेश है । उसे पार करने पर कलापग्राम की सीमा तो प्रारम्भ हो जाती है,किन्तु भूस्वर्ग उससे भी सौयोजन दूर है,जो प्रायः वालुकौघ है। उसे पार करने हेतु अति गुप्त मार्ग (सुरंग) से गमन करना पड़ता है- अन्न-जलादि त्याग पूर्वक । किंचित आगे बढ़ने पर दक्षिणमुख कार्तिकेय का दर्शन होता है । उनकी कृपा प्राप्त करने के पश्चात आगे का मार्गनिर्देश मिलता है,जो उनके स्थान से पश्चिम की ओर सात सौ योजन विस्तार वाला है । नीरव गुफा में मरकतमणि-मंडित शिवलिंग का दर्शन होता है। आगे बढ़ने पर सुवर्ण सदृश मिट्टी मिलती है । उस मिट्टी को ग्रहण कर, आगे बढ़ स्तम्भतीर्थ में स्नानोपरान्त , तत्उपस्थित कुमार और वाराह का दर्शन-आराधन करना चाहिए ।  वहीं अर्द्ध रात्रि में  कूपजल ग्रहण करे और उस जल में सुवर्णमृत्तिका का घोल बना कर,आंखों में अँजन करे तथा पूरे शरीर में लेपन भी करे । आगे लगभग साठ पग गमनोपरान्त  एक अति सुन्दर गुहा का मुख दीखेगा, जिसमें निःशंक यात्रा करे। उस गुहा में असंख्य कारीयकीट मिलेंगे,किन्तु सुवर्णमृत्तिका लेपन के प्रभाव से यात्रा किंचित भी बाधित नहीं कर पायेंगे । उस गुहा में निरंतर आगे बढ़ते जाना है, जहां दिव्यातिदिव्य सूर्य-सदृश सिद्धों का दर्शन लाभ होगा। गुहा समाप्ति के पश्चात् ही कलापग्राम अवस्थित है । अस्तु ।
(नोट- पौराणिक कहानियां सिर्फ कहानी नहीं होती,उसके पीछे गहन रहस्य छिपा होता है—समानान्तर रुप से कथा और साधना-विधि दोनों जारी रहता है। नीर-क्षीर विवेचन सदा गुरुगम्य होता है। कहानी का रुप तो रोचकता हेतु दिया जाता है । किन्तु प्रायः लोग कथा में ही उलझे रह जाते हैं, और क्रम विन्यास नहीं बैठने पर पुराणों की आलोचना करने लगते हैं- कि बकवास है...एक ही बात अलग-अलग जगहों पर कही गयी है, यहां तक कि एक बात दूसरे को काटने वाली प्रतीत होती है । उक्त प्रसंग भी अति गूढ़ है । फलतः गुरुगम्य है । इसका सीधा सम्बन्ध चक्रसाधना से है । वो भी प्रारम्भिक नहीं, बल्कि काफि आगे की । सामान्य साधक भी गहराई से समझने का प्रयास करेंगे, तो सम्भवतः मार्ग स्पष्ट हो जायेगा।)

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