Thursday, 13 September 2018

कृष्ण कलंकित हुए जब


  
         भाद्र शुक्ल चतुर्थी के चन्द्रमा का दर्शन करना वर्जित है । इसे कलंकित चन्द्र कहा जाता है । भूल से यदि ऐसा हो जाये तो उसके निवारण हेतु श्रीकृष्ण के इस कलंक-कथा का पाठ-स्मरण करना चाहिए । प्रस्तुत है ये कथाप्रसंग-

जब कृष्ण कलंकित हुए-

      अपराधी होने और कहलाने में बड़ा फर्क है।कभी-कभी अपराधी होने से भी कहीं अधिक विपदाकारी हो जाता है अपराधी कहलाना । क्यों कि सच में यदि अपराध किया हो,तो कम से कम खुद को तो भान होगा ही कि मैं अपराधी हूँ, किन्तु अपराध किया न होने पर भी यदि किसी कारण से कलंक थोपा जाये तो जीना दुभर हो जाता है ।

     भोलेनाथ शिव अपनी प्रिया उमा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- 
माघ युगल गुण चैत के,भादो वेद उमंग।    
उमा न देखु मम सिर,ता दिन वसत कलंक।। — 
हे उमा ! वर्ष के इन तीन तिथियों को तुम मेरे सिर को मत देखना।ये तिथियां हैं—माध शुक्लपक्ष द्वितीया, चैत्र शुक्लपक्ष तृतीया और भादो शुक्लपक्ष चतुर्थी । तुम जानती ही हो कि मेरे सिर पर चन्द्रमा का वास है और इन तिथियों के चन्द्रमा शापित हैं । उन्हें कलंकचन्द्र कहा गया है शास्त्रों में। यानी इन तिथियों को किसी व्यक्ति को चन्द्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए, अन्यथा अकारण ही कलंकित होना पड़ता है ।

      इसी प्रसंग में आशुतोष शिव लोककल्याणकारी उपाय भी बतलाते हैं- यदि भूल या अज्ञानवश उस दिन चन्द्रमा दीख जाय तो दोष निवारण के लिए दो काम करे- एक तो चन्द्रदर्शनदोषशान्तिमन्त्र- 
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवताहतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।         का जप करे- कम से कम एक सौ आठ बार, और दूसरा काम है- श्रीमद्भागवत के स्यमन्तमणि प्रकरण का पाठ। इस सम्बन्ध में श्री शुकदेव जी कहते हैं- यस्त्वेतद् भगवत ईश्वरस्य विष्णोर्वीर्याढ्यं वृजिनहरं सुमङ्गलं च । आख्यानं पठति श्रृतोत्यनुस्मरेद् वा दुष्कीर्तिं दुरितमपोह्य याति शान्तिम्।। (भा.पु.दशम्-५७-४२)

     इस कलंक-कथा को संक्षिप्त में यहां प्रस्तुत करते हैं।सम्पूर्ण पाठ हेतु मूल ग्रन्थ का अवलोकन करना चाहिए,जो दो अध्याय मिलाकर(४५+४२) ८७ श्लोकों में है ।

      सामाजिक कलंक की विचित्र घटना घट गयी थी, एक बार श्रीकृष्ण के साथ भी—तत्कालीन समाज दबे जबान उन्हें कलंकित कर रहा था,जिसका निवारण बड़ी बीरता और चतुराई से,काफी समय के बाद वे करने में सफल हुए। यह प्रसंग है श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध के ५६वें और ५७वें अध्याय में ।

      सत्राजित नामक एक पुरुष सुदीर्घ आराधना से सूर्य नारायण को प्रसन्न करने में सफल हुआ । वरदान स्वरुप सूर्य ने उसे स्यमन्तक नामक मणि प्रदान किया,जो सूर्य के समान ही प्रकाशित था । उस मणि का गुण था कि वह नित्य आठ ‘भार’(करीब ८,१९,२००कि.) सोना देता था, और जहां भी रहता था वहां महामारी,दुर्भिक्ष आदि का प्रकोप नहीं होता था । भार का शास्त्रीय प्रमाण है-चतुर्भिर्ब्रीहिभिर्गुंजं,गुञ्जान्पञ्च पणं पणान् । 
अष्टौ धरणमष्टमौ च, कर्ष तांश्चतुरः पलम्,
तुलां पलशतं प्राहुर्भारंस्याद्विंशति तुलाम्।।
( चार व्रीहि का गुंजा,पांच गुंजा का पण, आठ पण का धरण, आठ धरण का कर्ष, चार कर्ष का पल यानी भरी, सौ पल का तुला, और बीस तुला का भार) ।

     एक बार श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा कि ऐसी वस्तु तो महाराज उग्रसेन के पास रहनी चाहिए । अतः तुम इस दिव्य मणि को उन्हें दे दो।लोभी सत्राजित ने कृष्ण की यह बात अस्वीकार कर दी । कुछ दिनों बाद की बात है, सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को गले में धारण करके आश्वारोहण किया, और जंगल में शिकार करने निकल पड़ा। शिकार करते समय स्वयं वह एक सिंह का शिकार बन गया । वहीं पास के गुफा में जाम्बवान् नामक एक ऋक्ष रहता था,जिसने उस सिंह को भी मार डाला, और मणि लेकर अपनी गुफा में चला गया ।

    मणि के साथ अचानक प्रसेनजित के गायब हो जाने की खबर से नगरवासियों में बात फैल गयी कि इस मणि के प्रति तो कृष्ण को लोभ था, हो न हो कृष्ण ने ही मणि-हरण करके, प्रसेनजित को मार डाला हो।सत्राजित ने भी कृष्ण को बहुत ही भला-बुरा कहा, और जैसे भी हो मणि वापस करने की बात कही ।

     इस कलंक से व्यथित कृष्ण, कुछ नगरवासियों को साथ लेकर वन में प्रसेनजित की खोज में निकले। घोर वन में एक गुफा के बाहर प्रसेनजित और उसके घोड़े का शव मिला,साथ ही एक सिंह का भी । किन्तु आसपास मणि का कहीं पता न चला । खोजबीन करने पर जमीन पर ऋक्ष और सिंह के युद्ध के भी निशान मिले,जो अन्ततः उस गुफा की ओर जा रहा था । ऋक्ष-पदचिह्न का अनुसरण करते हुए कृष्ण,नगरवासियों को गुफा के बाहर ही छोड़कर, उस अन्धेरी गुफा में प्रविष्ट हुए।कुछ अन्दर जाने पर उस दिव्य प्रकाशित मणि को एक सुन्दर बालिका के हाथो में देखा उन्होंने । 

   कृष्ण को देखकर बालिका घबराकर शोर मचायी, जिसे सुनकर उसका पालक, रक्षक एक भयानक ऋक्ष आगे आया, और क्रोध में भर कर बिना कुछ जाने-पूछे,कृष्ण पर प्रहार कर दिया । कृष्ण भी उससे भिड़ गये। दिन-दो दिन आशा देखकर, नगरवासी निराश होकर वापस लौट गये, और घटना की जानकारी दिये । कृष्ण-प्रिय प्रजाजन सत्राजित को ही दोषी मानने लगे इस दुर्घटना के लिए।सत्राजित भी बहुत भयभीत हुआ कि बिना ठोस प्रमाण के ही उसने कृष्ण को कलंकित किया है। नगरवासी कृष्ण की सकुशल वापसी हेतु माँदुर्गा की आराधना में लग गये ।

    इधर अठाइस दिनों तक ऋक्ष और कृष्ण के बीच युद्ध होता रहा।जाम्बवान् थक कर चूर हो गये, उनके अंग-अंग शिलिथ होने लगे, तब जाकर उन्हें ध्यान आया कि निश्चित ही ये हमारे आराध्य श्रीराम हैं, जिन्होंने द्वन्द्वयुद्ध की कामनापूर्ति हेतु द्वापर में मिलने का वरदान दिया था । श्रीकृष्ण का परिचय पाकर ऋक्षराज जाम्बवान् अतिशय प्रसन्न हुए, और अपनी कन्या जाम्बवंती के साथ स्यमन्तक मणि का उपहार भेंट कर, विदा किया ।

     सारा वृतान्त बताकर कृष्ण ने मणि सत्राजित को लौटा दी, किन्तु भयभीत और लज्जित सत्राजित उस मणि को रखना उचित न समझा । बल्कि श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु अपनी कन्या सत्यभामा को भी मणि के साथ अर्पित कर दिया । सत्यभामा को तो स्वीकार लिया कृष्ण ने,किन्तु मणि यथावत वापस कर दी सत्राजित को, यह कह कर कि मणि तो अपने पास ही रखो, पर इससे नित्य प्राप्त होने वाला सुवर्ण राजा उग्रसेन को दे दिया करो ।

   सामान्यतया यह कलंक प्रसंग यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था; किन्तु हुआ नहीं,क्यों कि सत्राजित की पुत्री सत्यभामा से विवाह करने हेतु शतधन्वा नामक एक युवक पहले से लालायित था । श्वफलकनन्दन अक्रूर और कृतवर्मा ने इस प्रसंग में शतधन्वा को उकसाने का काम किया । जैसे ही उसे मालूम हुआ कि उसकी चहेती सत्यभामा कृष्ण को मिल गयी, तो उसने छल से सत्राजित को मारडाला। पिता की मृत्यु से विकल सत्यभामा हस्तिनापुर चली गयी,क्यों कि उस समय श्रीकृष्ण बलराम वहीं थे । सूचना पाकर कृष्ण अर्जुन को साथ लेकर शतधन्वा को युद्ध में मार गिराये, किन्तु स्यमन्तक मणि उसके पास मिली नहीं।परन्तु उनकी इस बात का किसी ने विश्वास नहीं किया, यहां तक कि दाउ बलरामजी को भी संदेह हो गया कि कृष्ण झूठ बोल रहा है । इस पर कृष्ण को चिन्तित होना स्वाभाविक था, क्यों कि दाउ ने भी उनपर अविश्वास किया।नगर में आने पर पता चला कि भय से भागते वक्त शतधन्वा ने मणि तो अक्रूर के पास रख छोड़ा था, और अक्रूर उसे लेकर कहीं और भाग गये हैं। कुछ समय बाद श्रीकृष्ण अक्रूर को खोज-ढूढ़, समझा-बुझाकर वापस लाये, और नगरवासियों को सारा वृतान्त ज्ञात हुआ । तब से यह मणि अक्रूर के पास रहा, और उससे प्राप्त सुवर्ण उग्रसेन को मिलने लगा । अस्तु । 

Friday, 7 September 2018

समलैंगिकता वनाम संवैधानिकता वनाम नैतिकता

समलैंगिकता वनाम संवैधानिकता वनाम नैतिकता

           ख़बर है कि सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 377 सम्बन्धी पांच साल पहले दिये गए अपने ही फैसले को पलट दिया । समलैंगिक सम्बन्धों को फिर से कानूनन ज़ायज़ करार दे दिया गया ।

    अपने निर्णय को समयानुसार तोड़ने, मरोड़ने, पलटने का अधिकार तो आम आदमी को भी होता है, फिर सुप्रीमकोर्ट तो अपने आप में सर्वोपरि है , सम्मान्य है । इस पर उंगुली भला मुझ जैसा साधारण आदमी उठाने की हिम्मत कैसे कर सकता है !  ऐसों के लिए ही तुलसीबाबा कह गए हैं- समरथ के नहीं दोष गुसाईं ।

            परन्तु नासमझ मन को कैसे समझाऊँ ? वो ये भी नहीं समझता कि हम उन समरथ वालों में नहीं हैं । मन तो अपनी बात कहने को बेताब है ।

     एक माननीय कहते हैं कि देश में सिर्फ संवैधानिक नैतिकता की जगह है, सामाजिक नैतिकता की नहीं । तो वहीं वैठे एक और माननीय का कथन है कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है । इसे संसद से मान्यता मिली हुयी है । और इतना ही नहीं- पीठ ने यह भी स्पष्ट किया गया कि यौन रुझान बायोलॉजिकल है । इस पर रोक संवैधानिक अधिकारों का हनन है । मजे की बात ये है कि यौन रुझानों के अधिकार को अन्तरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्यता भी मिली हुयी है ।

       कुछ और प्रकार के मान्यवरों द्वारा समय-समय पर ये भी कहा जाता रहा है कि बच्चे हैं, बहक गए थोड़े...सड़कों पर बिखरी खूबसूरती देख मन मचल उठा...उन्हें माफ कर देना चाहिए... पत्थरबाज भी हमारे ही बच्चे हैं...ये मॉबलिंचिग वाले भी हमारे ही जैसे लोग हैं...ये काले मुखौटा लगाये लोग भी हमारे ही बीच के हैं....भारत तेरे टुकड़े होंगे- कहने वाले लोग भी हमारे ही बीच के हैं ।
             अरे भाई ! ये सब तो हमारे ही बीच के हैं । हमारे ही जैसे । कोई एलीयन थोड़े जो हैं । फिर ये तरह-तरह के कानून क्यों बना रखे हो...ये ऊँची-ऊँची चारदीवारियों वाला लालघर क्यों सजा रखा है ? छोड़ दो सबको बिगड़ैल साढ़ की तरह, घूमने तो फिरंट होकर- जिसे जो मर्जी आये करने दो । कोई जिस्म लूटता है, कोई दौलत, कोई रिस्वत लेता है, कोई टैक्स चुराता है – क्या दिक्कत है, सब तो अपने ही है न ?

   ये अपनों का दायरा इतना बड़ा कब से होने लगा ?  यौन आकर्षण बायोलॉजिकल है – लगता है सांसदों को या कानूनविदों को ये कोई स्मार्ट मैगज़ीन से खबर लगी है । अव से पहले भला कहां किसी को पता था ये सब ।

        सच पूछें तो मुझ नासमझ को इन सारी बातों में दाल में कुछ काला नजर आ रहा है । अब यहां दाल के कालेपन का विशेष खुलासा मुझसे कराने की आशा मत रखियेगा ।  हो सकता है कि ये मेरे नजरों की गुस़्ताखी हो । किन्तु नजरें भी तो लाचार होती हैं मन की तरह ही । कभी-कभी जगह-कुजगह, वजह-बेवजह झपक जाती हैं और गूंगों को भी बोलने का अवसर दे जाती हैं । ज़ुबान वाले तो हमेशा बोलते ही रहते हैं ।

  सच पूछें तो मेरी समझ से परे है - समलैंगिकता पर नैतिकता की मुहर, वो भी संवैधानिकता की दुहाई देते हुए । क्या हमारा संविधान किसी अनैतिक को नैतिक सिद्ध करने का अधिकार हमें देता है ?

   ऐसे में लगता है नैतिकता की परिभाषा और उसके मूल्य पर पुनर्विचार करना होगा । परिभाषायें बनायी जा सकती हैं, तो बदली भी जा सकती है न अपने मन माफ़िक ?

     मगर यह करेगा कौन ?

         लोकतन्त्र में बहुमत का महत्त्व है । बेचारी नैतिकता का यहां बारम्बार शील-भंग होता है । बाहुबलियों द्वारा बलात्कार होता है उसके साथ और नैतिकता की नयी-नयी परिभाषा गढ़ दी जाती है । अस्तु ।  

Sunday, 2 September 2018

अद्भुत विवाद वाला देश


अद्भुत विवाद वाला देश

नाम, धाम और समय याद रखना जरा मुश्किल है ।  किन्तु काम और परिणाम अवश्य याद रहता है । एक  पड़ोसी पर्यटक हमारे देश की सैर करने आया था । उसने दूर से सुन रखा था कि उसके पड़ोस में एक अद्भुत और महान देश है, जिसे लोग आर्यावर्त या भारतवर्ष कह कर याद करते हैं । संस्कृति, संस्कार, चरित्र, न्याय, समृद्धि...हर दृष्टि से वो महान है । कुछ लोग इसे सोने की चिड़िया कहते हैं , तो कुछ लोग पवित्र देवभूमि ।

यहां पहुँच कर चप्पाचप्पा घूमा और पाया कि जितना सुना था, उससे कई गुना ज्यादा है । इस भूमि के संस्कार की बखान करे या कि संस्कृति की ? समृद्धि को आंके या कि न्याय और अनुशासन को ?

एक दिन घूमते-घूमते एक छोटे से गांव में पहुँच गया । उसने देखा — एक विशाल वटवृक्ष के नीचे ग्रामवासियों की जमघट लगी हुयी थी । ऊँचे से चबूतरे पर चार-पांच बुजुर्ग बैठे हुए थे और उन्हें घेरे बैठे थे ग्रामवासी । दो व्यक्ति आमने-सामने सबसे आगे की पंक्ति में खड़े थे । लगता था कि पंचायत लगी है । आपस में बातचीत चल रही थी । वाद-विवाद बिलकुल नहीं ।

एक ग्रामीण हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा रहा था- पंच जी महाराज ! मैं अपनी पैत्रृक भूमि का कुछ भाग अपने पड़ोसी को उचित मूल्य लेकर बेंच चुका हूँ । मुझे इसने मांगी गयी पूरी राशि भी चुकता कर दी है । अब मेरा उस पर किसी प्रकार का क्या अधिकार ?

दूसरा व्यक्ति उससे भी अधिक कातर स्वर में कह रहा था— नहीं पंच जी, इसने केवल अपनी भूमि मुझे बेची है । मैंने भी केवल भूमि का ही मूल्य दिया है । अब जब मैं इस पर मकान बनाने के लिए खुदायी करना शुरु किया तो इसके भीतर से सोने की मुहरें निकली । मैंने तो केवल मिट्टी का मोल चुकता किया । सोने पर मेरा अधिकार भला कैसे हो सकता है ? अतः आप कृपा करके उसे स्वीकार करने का आदेश दें और मुझे पाप का भागीदार बनने से बचावें ।

पहला व्यक्ति पुनः गिड़गिड़ाया— ऐसा अनर्थ न हो महाराज ! विक्रीत भूमि के भीतर से जो कुछ भी निकला वो तो मेरे द्वारा विक्रय और मूल्य प्राप्ति के बाद न ? फिर मेरे अधिकार का प्रश्न ही कहां रह जाता है । मुहरों को ग्रहण कर मैं भला क्यों नरकगामी बनूं ? और जहां तक भाग्य का प्रश्न है, मेरे भाग्य में यदि होता तो अब से पहले मुझे मिल चुका होता ।

पंच बड़े पेचोपेच में थे । उन्हें दोनों का तर्क वजनी लग रहा था । अन्त में उन्होंने निर्णय सुनाया— मुहरों का छः-छः आना भाग दोनों को दिया जाय और शेष चार आना भाग राजकोष को प्रजा-कल्याण हेतु सुपुर्द किया जाय ।

पंच का निर्णय परमेश्वर का निर्णय होता है । अब पाप हो या कि पुण्य, इसमें भला किसी को आपत्ति का अधिकार ही कहां रह जाता है । पंच के निर्णय में विवाद की गुंजायश ही कहां ?

न्याय व्यवस्था सुन-देख कर पर्यटक गदगद होकर नृत्य करने लगा — अद्भुत है यह देश ।

जी हां, अद्भुत ही है यह देश ।

अभी हाल की ही तो बात है- एक व्यक्ति ने अपनी विवाहिता पत्नी और दो पुत्रों को प्रताड़ित कर निष्कासित कर दिया इस आरोप के साथ कि ये सन्तानें मेरी नहीं हैं । और बाद में मौका पाकर उन सन्तानों की हत्या भी करवा दी - सुपारी देकर ।

उम्र, नाते-रिश्ते और पद-मर्यादा की सीमा लांघ कर रोज दिन बलात्कार हो रहे हैं । बलात्कारी को डंड देने के वजाय चैनलों पर विवाद और बयानबाजी कर रहे हैं । घृणित,अमानवीय (राक्षसी) अपराध को भी धर्म, जाति और मज़हब से माप रहे हैं । और उससे भी मजे की बात है कि टिप्पणी कर रहे हैं- शरीर की नुमाइश सड़कों पर करेंगीं तो क्या होगा ?...बच्चे हैं, बहक गए थोडे । इन्हें माफ कर देना चाहिए । मिट्टी, चारा, कोयला, सीमेन्ट सब खा-पचा कर दांत निपोर रहे हैं । राष्ट्रद्रोह के नारे,राष्ट्रगान और तिरंगे का अपमान, सेना पर पत्थरवाजी जैसे कुत्सित कार्यों को भी वोट-बैंक बनाने पर आमादा हैं । सर्जिकलस्ट्राइक को भी  फर्जिकल बना रहे हैं बेशर्मी पूर्वक । प्रहरियों की शहीदी का भी सबूत मांग रहे हैं ।

हो सकता है वो पर्यटक फिर आए और कहे— अद्भुत है ये देश । अद्भुत है यहां का विवाद ।
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Thursday, 30 August 2018

आवश्यक सूचना

प्रिय बन्धुओं !

      पुण्यार्कवास्तुमंजूषा के प्रकाशन सम्बन्धी

     जैसा कि इस ब्लॉग के पाठकबन्धु अवगत हैं- प्रकाशन से पूर्व में ही ये सम्पूर्ण शोधग्रन्थ यहां पोस्ट किया जा चुका है ।
      
     सुदीर्घ प्रतीक्षोपरान्त चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी से प्रकाशित मेरा ये शोधग्रन्थ - पुण्यार्कवास्तुमंजूषा  मुझे हस्तगत हुआ ।
18 से.मी. x 25 से.मी. आकार में बाउण्ड फॉर्म में 520 +16 पेज (रंगीन चित्रावली) युक्त कुल 536 पृष्ठों का ये पुस्तक है, जिसका मूल्य प्रकाशक ने 1000रु.(एक हजार) रखा है ।


   बीच के पन्नों पर भी यथास्थान सैकड़ों सादे चित्र भी दिये गये हैं, जिससे विषय वस्तु को समझना आसान होगा ।

    पुस्तक में वास्तुशान्ति और गृहप्रवेश तथा शिलान्यास की पूरी पद्धति भी संलग्न है ।

   इस प्रकार वास्तु सलाहकार ही नहीं, कर्मकाण्डियों के लिए भी ये पुस्तक उपयोगी है , साथ ही विद्यार्थियों के लिए भी उतना ही उपयोगी है ।

      ब्लॉग पर पोस्ट करने के बाद से बहुत से बन्धुओं का लागातार संदेश आते रहा है इसके लिए । 
   अतः इच्छुक बन्धु पुस्तक प्राप्ति हेतु अब चाहें तो प्रकाशक से अथवा सीधे मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं- इस आई डी पर-  
guruji.vastu@gmail.com
अथवा कॉल करें- +918986286163 पर

धन्यवाद ।


   बड़े शहरों में रहने वाले बन्धु सीधे चौखम्बा की दुकान से पुस्तक उपलब्ध कर सकते हैं, जिससे उन्हें डाकखर्च की बचत होगी । 
  
 
धन्यवाद ।





Saturday, 18 August 2018

अटलजी की अमिट यादें

अटलजी की अमिट यादें—
बात सन् 1998 की है – चिर प्रतीक्षित मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हुयी थी । हँसी के लहज़े में श्रीमतीजी ने मुझे उत्प्रेरित किया- मैं तो अटलजी को वचपन में ही जयमाल पहना चुकी हूं । आप अपनी पुस्तकें भेंट करने के बहाने ही उनसे मिलते क्यों नहीं एक बार ।
मैंने मुस्कुराते हुए उसे परास्त करने का दुस्प्रयास किया— श्रीमती जी ! जरा गौर फरमायें- आप जिस समय उन्हें विजयमाल पहनायी उस समय वे जनसंघ का दीपक जला रहे थे और आज वे भारतीय जनता पार्टी का कमल खिलाकर सबसे बड़े लोकतान्त्रिक राष्ट्र के प्रधान मंत्री पद को सुशोभित कर रहे हैं । तब और अब में आसमान-जमीन का फ़र्क है । हालाकि अटलजी के दरबार में ड्योढ़ियां बहुत कम हैं , वो खास होकर भी आम से अलग हो ही नहीं पाये हैं, एक अद्भुत चुम्बकत्व है उस व्यक्तित्व में ।  फिर भी प्रधानमंत्री का रुतबा ही कुछ और होता है ।
  हालाकि उनसे मिलने की प्रबल इच्छा तो मेरी भी थी । लेकिन किन्तु-परन्तु बहुत था । शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, समाजिक कुल मिलाकर चारों ओर से विसंगतियां ही विसंगतियां झेल रहा था पिछले दो-तीन वर्षों से । ज्योतिष की भाषा में कहूं तो शनि की महादशा में शनि की ही अन्तर्दशा और उन्हीं का गोचर प्रकोप भी चल रहा था मेरे ऊपर । फलतः दिल्ली बहुत दूर रही मेरे लिए ।
इसी बीच मेरी पुत्री अर्चना का विवाह तय हो गया । दामाद मिले बाह्याभ्यन्तर  संघी- स्वनाम धन्य डॉ.प्रमोद पाठक ।  मैंने उस विवाह के निमन्त्रण-पत्र सहित, अपनी पुस्तकें उन्हें रजिस्टर्ड पार्सल से भेज दिया - अपनी इच्छा और विवशता को ज़ाहिर करते हुए ।
मुझे सपने में भी उम्मीद न थी कि मुझ तुच्छ के पत्र की त्वरित प्रतिक्रिया होगी । 
कोई सप्ताह भर बाद ही डाकिया प्रधानमंत्री कार्यालय-प्रेषित मेरे नाम का लिफाफा लिए मुहल्ले में तलाश करता हुआ पहुंचा । मेरा न तो निजी मकान है और न कोई प्रसिद्ध व्यक्ति ही हूं मैं । फलतः डाकिया को घंटों परेशानी उठानी पड़ी । कोई साधारण चिट्ठी होती तो डेड लेटर रुम में लौट कर धूल चाटती, किन्तु इस पत्र ने तो मुझे मुहल्ले ही नहीं शहर में  भी चर्चित कर दिया ।  सैंकड़ो लोग मुझसे मिलने आये - इस जिज्ञासा से कि उनके मुहल्ले में कौन ऐसा गुमनाम आदमी रह रहा है, जिसके पास प्रधानमंत्री का पत्र आता है ।
उस अविस्मरणीय पत्र को आपके लिए शेयर कर रहा हूँ, जो अनुकरणीय परमादर्णीय अटलजी की अमिट याद बन कर मेरे पास सुरक्षित है । 
      
           

Wednesday, 15 August 2018

गुलामी का कैप्सूलाइजेशन

स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर-

गुलामी का कैप्सूलाइजेशन

          आप चाहें तो इसे सुधार कर, कैप्सूलाइज्ड गुलामी भी कह सकते हैं । हो सकता है किसी को अटपटा भी लगे ये शब्द-योजना, किन्तु मुझे उनसे सहानुभूति है थोड़ी । हमदर्दी भी । वो बिलकुल दया के पात्र हैं, जिन्हें यह शीर्षक बेतुका लग रहा है । दरअसल पिछले इकहत्तर वर्षों से हम इसे ही स्वतन्त्रता के नाम से जानते आ रहे हैं ।

          इस सम्बन्ध में कुछ और कहने से पहले, कुछ और ही कह लूं— बेतुकी शब्द-योजना के दोनों पदों को ठीक से समझना जरा जरुरी है । वैद्य लोग जरा भोले किस्म के होते थे । चिरायता का कड़वा काढ़ा भी सीधे-सीधे पीने की सिफारिश करते थे । गिलोय, नीम, करेला सब कुछ सीधे हज़म करो । किन्तु ये डॉक्टर लोग जरा हुशियार होते हैं । होशियारी का ही नाम है – एलोपैथ ।  जिलेटीन कैपसूल में छिपा कर चाहो तो सूअर का मैला भी खिला दो । जीने की चाह लिए लोग खाने में जरा भी आनाकानी नहीं करेंगे । विशुद्ध शाकाहारियों को भी एडीकैप खाने में कोई दिक्कत नहीं क्यों कि वो कैप्सूलाइजडफॉर्म में होता है । ज्यादातर लोगों को तो पता भी नहीं होता कि वे मछली का तेल खा रहे हैं । प्लेसेन्टा का जूस भी बड़े चाव से पीये जा रहे हैं, बिना ना-नुकूर के । यही कमाल है कैप्सूलाइजेशन का ।
         इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए गुलामी को भी कैप्सूलाइज करने का करिश्मा दिखाया गया । सत्ता के छद्म हस्तानान्तरण को ही स्वतन्त्रता मान लिया गया और समझा भी दिया गया देशवासियों को । पिछले इकहत्तर वर्षों से हम इसका जश्न मनाते आ रहे हैं । जलेबियां खाते-खिलाते आ रहे हैं । वोट देते आ रहे हैं, सिर भी पीटते आ रहे हैं । गाड़ी वही है , ड्राइवर बदलते आ रहे हैं ।

सन् 1935 के गवर्मेन्ट ऑफ इण्डिया रुल को ही झाड़-पोंछ कर संविधान के कैपसूल में भर कर करीने से सहेज लिए हैं । हम पूरी तरह वाकिफ़ हैं कि जो भी कानून हमने बना रखे हैं, खुल कर सच कहें तो किसी और के बनाये हुए कानूनी दाव-पेज को ही हम अपनाये बैठे हैं, जिसके बूते शायद ही किसी को न्याय मिल पाया हो । सच्चाई ये है कि बहुत से कानून तो बनाने वालों को भी ठीक से समझ नहीं आया आज तक, फिर उससे खेलने वाले की क्या विसात ! न्याय की देवी तो आंखों पर पट्टी बांधे हुयी हैं हस्तिनापुर की महारानी गांधारी की तरह, जो किसी खास क्षण में क्षणभर के लिए खुली भी तो कृष्ण की कलाबाजी से निरस्त हो गयी ।  एक धृतराष्ट्र ने ही सर्वनाश करा दिया । एक ही उल्लू काफी है बरबाद-ए-गुलिस्तां को, हर शाख पे उल्लू बैठा है , अन्ज़ाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ? सत्य सिसकारियां ले रहा है- सत्यमेव जयते के स्लोगन में टंग कर । गीता की शपथ लेकर सत्य बोलने की वचनबद्धता , संविधान की शपथ लेकर राष्ट्रसेवा का संकल्प कितना बेमानी है- इससे वाकिफ़ हैं हम सभी । जितना झूठ न्यायालय में बोला जाता है उतना तो शायद वेश्यालय और मदिरालय में भी नहीं बोला जाता होगा । न्याय के हाथ कानून की डोर से बंधे हैं और कानून बनाने वाले कलम कम, अंगूठा ज्यादा इस्तेमाल करने वाले हैं हमारे अज़ूबे लोकतन्त्र में । चपरासी पढ़ा-लिखा होना जरुरी है, कानून तो बिना पढ़े हुए भी बनाया ही जा सकता है । सत्तर वर्षों में न्याय अपना लिवास नहीं बदल पाया, देश क्या खाक बदलेगा !  न्याय चेहरे की बनावट , कुर्सी की ऊँचाई, वेशभूषा और जेब का वजन देख कर मिलता है ।  सुख-सुविधायें, रोजी-रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सबकुछ उसी बैरोमीटर पर आधारित है । जान-माल और इज्ज़त-आबरु  - तब भी दांव पर लगा था और आज भी ।

थोड़ा कुछ जो बदलाव दीख रहा है वो तो ईश्वर की कृपा है और वलिदानियों का आशीष या कहें भ्रष्टाचारियों की मुट्टी से छिटका हुआ किंचित कर्मठों का कर्म-किरण ।  अन्यथा गुलामी की जंजीर बिलकुल टूटी नहीं है, स्वरुप बदला है सिर्फ – कैप्सूलाइज्ड हुआ है सिर्फ ।

हां, कुछ खास सुविधायें मिली हुयी हैं, जिनसे साफ ज़ाहिर होता है कि स्वतन्त्र हो गए हैं –  चाहें तो पद-मर्यादा का लाज-लिहाज छोड़ कर किसी को कभी भी कुछ भी कह सकते हैं—गाली भी दे सकते हैं, गले भी लगा सकते हैं और मन करे तो आँख भी मार सकते हैं । आँखों की सारी गुस्ताखियां माफ हो सकती हैं अनोखे लोकतन्त्र में ।

इतना ही नहीं , ग्रूप बना कर कुछ भी कर सकते हैं । मन हो तो इसे पार्टी नाम दे दें ।  दंगा-फसाद की तैयारी चाहें तो कोतवाली में भी बैठ कर कर सकते हैं और  इच्छा हो तो संसद में भी । सड़क पर तो जन्मसिद्ध अधिकार है ही । यहां भला कौन रोक सकता है । चाहें तो ठेला-खोमचा लगा लें, चाहें तो लाल-हरे झंडे लहरा लें , चाहें तो किसी का पुतला फूंक लें या किसी को जिन्दा ही फूंक दें । 
   पहाड़ या जंगल में छिप कर रहना कोई जरुरी नहीं । मुंह ढक कर या कि अन्धेरे का लाभ लेकर चलने की भी जरुरत नहीं । सही आदमी को सही समय पर सही तरीके से वोट देते रहें - सारा कुछ सही होता रहेगा - खासकर आपके लिए । ये आप पर निर्भर है कि आप आम रहना पसन्द करते हैं कि खास । आप चाहें तो वी.सी. आपके घर आकर मनमानी डिग्री पहुँचा दे सकते हैं । आप चाहें तो न्यायालय 24X7 आपकी सेवा में सिर झुकाये, हाथ जोड़े खड़ा भी रह सकता है, क्यों कि डोरी बांटने वाले का कदर तो करना ही है न अनोखे लोकतन्त्र में ।  इतना ही नहीं आप अपने मनोरथ के लिए शेल्टर होम को बेडरुम में जब चाहें कन्वर्ट कर सकते हैं – सोफा कम बेड की तरह ।

तो आइये स्वतन्त्रता की जश्न एक बार फिर मना लें । जलेबियां आप खा लें जी भर कर । चिन्ता करने की जरुरत नहीं , कीमत किसी और ने चुकायी हैं । रोकने वाला भला कौन है ! आपही का तो लोकतन्त्र है ।

वन्देमातरम् । वन्देमातरम् । वन्देमातरम् । 

Thursday, 9 August 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारणःःपचीसवां भाग (समापन खण्ड))

गतांश से आगे...
                                         नवम अध्याय
                      उपसंहार
      चिर प्रतीक्षित योजना आज पूरी हुयी । विभिन्न कारणों से इस शोधपरक पुस्तिका के सम्पादन कार्य में व्यवधान आते रहे , किन्तु अन्ततः आज सम्पन्न हुयी ।

कालसर्पयोग के बारे में जो कुछ भी मैंने पढ़ा, जाना, अनुभव किया उसे यथासम्भव आप सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया । कालसर्पयोग को लेकर फैले भ्रम का निवारण इससे अवश्य होगा - ऐसा मुझे विश्वास है । आशा है ये पुस्तिका आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।

पुनः एक बार आग्रह करना चाहता हूँ कि कालसर्पदोष का विनिश्चय करने में जल्दवाजी न की जाये । विभिन्न विन्दुओं से जांच-परख करके ही निश्चित किया जाये कि वास्तव में ये दोष जन्मांक में लागू हो रहा है या नहीं । क्यों कि बहुत बार हम निर्णय लेने में जल्दवाजी कर देते हैं और इससे जातक को परेशानी होती है तथा ज्योतिषशास्त्र की बदनामी होती है ।

विनिश्चय के पश्चात् समुचित उपाय अवश्य करे । उपचार के सम्बन्ध में पुनः स्पष्ट कर दूं कि कालसर्पदोष का उपचार जीवन में कई बार करना पड़ता है । ऐसा नहीं कि अन्य दोषों की तरह एक बार शान्ति कराके निश्चिन्त हो गये ।

पितृदोषादि अन्यान्य दोषों का भी तुलनात्मक विचार कर ही लेना चाहिए । बहुत बार तो ऐसा होता है कि पितृदोष को ही कालसर्प दोष करार दे देते हैं । इससे सही उपचार नहीं हो पाता । अस्तु।

कमलेश पुण्यार्क
मैनपुरा,चन्दा,अरवल,बिहार
    विक्रमाब्द २०७५, ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी,
    शुक्रवार,दि.११ मई २०१८

    ःःःःःःःःइत्यलम्ःःःःःःःः