Friday, 17 May 2019

बूढ़े पीपल की पीड़ाभरी चेतावनी


                            
                           बूढ़े पीपल की पीड़ाभरी चेतावनी

उस बूढ़े पीपल से आँख मिलाकर बात करने की जरा भी हिम्मत नहीं होती मेरी, जो पितामहेश्वरघाट पर लम्बे समय से अविचल खड़ा है । लम्बी-लम्बी बाहें  पसारे नारियल के दो दरख्तों के बीच मेरे किराये के घर की एक छोटी सी खिड़की उस ओर ही खुलती है । उसकी सलाखों की आड़ लेकर कभी-कभार साहस जुटाकर बस झांकभर लेता हूँ उसे, जिसकी शाखा-प्रशाखाओं में अगनित छोटी-बड़ी घटिकायें लटकी पड़ी होती हैं । हररोज कई फोड़ी जाती हैं उनमें और कई नयी घटिकायें लटकायी भी जाती हैं । ये परम्परागत सिलसिला कब से जारी है, कुछ कहा नहीं जा सकता ।  हां, इतना जरुर कह सकता हूँ कि जैसे ही उस पीपल की शाखायें कुछ भार सम्भालने लायक हो गयी होंगी, घटिकायें लटकनी शुरु हो गयी होंगी और ये भी पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि आने वाले दिनों में भी ये क्रम जारी रहेगा, जबतक उन शाखाओं में भारवहन की क्षमता रहेगी ।

पितरों की पवित्रभूमि, प्राणियों की सद्गति और मोक्ष की नगरी गया जिसे श्रद्धावनत लोग गयाधाम भी कहते हैं । इस नगरी में ही पितामहेश्वर—पितामहों के ईश्वर (न कि महेश्वर के पिता) का एक अति प्राचीन स्थान भी है ।     
यूँ तो गयाश्राद्ध जनित पिण्डदान का एक प्रधान वेदी है - पितामहेश्वर, किन्तु गयाश्राद्धीय पिंडदानी से कहीं अधिक संख्या में,  अनन्तंशिवसन्निधौ... आप्तवाक्य से प्रभावित प्रायः शहरभर के लोग यहीं आकर, इसी पीपल के आसपास विशेषकर दशगात्रकर्म सम्पन्न करते हैं । मान्यता है कि दस दिनों पूर्व जिस प्रियजन का अग्निसंस्कार करके पार्थिव शरीर को विलीन कर देते हैं, उसे ही दशगात्र के पावन वैदिक मन्त्रों से पुनर्निर्मित करने का प्रयास करते हैं । श्राद्धीय (श्रद्धायुक्त) पिण्ड-शरीर तो निर्मित हो जाता है, किन्तु, क्या वो आत्मीय प्राणी स-प्राण लौट आ सकता है- ऐसा करने से ? नहीं न । परन्तु हम ऐसा करते हैं । भारतीय संस्कृति और परम्परा ऐसा करने का हमें निर्देश देती है । हम उसका अनुपालन करते हैं ।

इस पीपलवृक्ष के पत्ते-पत्ते पर अगनित रुदन और करुणा की ध्वनितरंगें अवशोषित हैं । हो सकता है आने वाले समय में कोई ऐसे डिवाइस का हम  प्रयोग कर पायें, जो इन अवशोषित तरंगों को डिकोड कर हमें फिर से सुना सके । 

हालाकि मैं इन्हें बिना डिकोडिंग के ही सुनता हूँ, रोज सुनता हूँ । और यही कारण है कि उस पीपल से आँख मिलाकर संवाद करने की साहस नहीं है मुझमें । वह सिर्फ दिवंगत प्राणी के परिजनों का क्रन्दन ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ सुनाते रहता है, क्यों कि उसे भी पता है कि मैं उसकी बातों को ध्यान से सुनता हूँ, भले ही कुछ कर नहीं पाता – न उसके बावत, न अपने लिए और न रोती-विलखती दुःखी दुनिया के लिए ही ।

सुनने-सुनाने से भी मन से पीड़ा का बोझ शायद कुछ कम होता है, जब कि कहा गया है—रहिमन निजमन की व्यथा मन ही राख्यो गोय...।

लगभग दिनभर दशगात्रकर्मियों का रोना-धोना गूंजते रहता है पीपल के आसपास—विशेष कर अपने लाल खोयी माताओं का करुण क्रन्दन और सुहाग खोयी अबलाओं की चीत्कार सुनते-सुनते सिर झनझनाने लगता है । 
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्माद परिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।-- जो जन्मा है वो मरेगा ही और जो मर गया है वो जन्म भी जरुर लेगा । ऐसे में किसी तरह के शोक की क्या आवश्यकता यानी शोक न करे—कृष्ण ने तो कह दिया । पूरी गीता कंठाग्र भी है, किन्तु इससे क्या ? केवल कहने भर से क्या होता है ? सुनने भरसे क्या कहीं ज्ञान-लब्ध हो जाता है कोई ? जानकारी और ज्ञान के बीच बहुत बड़ी खाई  है और वो खाई जबतक पटेगी नहीं, तबतक सिर तो झनझनायेगा ही न !

दिन ढलने पर शाम होती है, फिर लम्बी रात का सिलसिला शुरु होता है । उस समय क्रन्दन-चीत्कार तो नहीं होते, पर उनका अनुगूंज वहीं का वहीं मौजूद होता है । बूढ़ा पीपल मुस्कुराता है, खीझता भी है । और कभी-कभी बिलकुल कूटस्थ और स्थितप्रज्ञ प्रतीत होता है । सुनने की उत्सुकता हो तो संवाद भी खूब करता है । हमदोनों एक दूसरे के एकान्त का सम्बल बन जाते हैं अकसर ।   

एक दिन कहने लगा—

देखते हो, दुनिया की दशा—अपने को फ़िकरमन्द तो खूब लगाता है, पर है बिलकुल बेपरवाह...स्वार्थी और निर्लज्ज भी । हालाकि उसे पता है कि जो ऑक्सीजन लेता है और कार्बन उगलता है, उसे मैं ही संतुलित करता हूँ अपने साथियों के साथ, किन्तु धड़ल्ले से नष्ट करते जा रहा है हमें और हमारे साथियों को । कंकरीट के जंगल खड़े करता जा रहा है—पहाड़ों और जंगलों ही नहीं खेत-खलिहानों को भी दैत्य की तरह निगलते हुए । भूगर्भ का तेल ही नहीं पानी भी सोख लिया मूर्खों और स्वार्थियों ने । उन्मुक्त नीले आकाश तक को वक्शा नहीं । मिट्टी, पानी, धूप और हवा सब प्रदूषित कर चुका है फिर भी सन्तोष नहीं है । धरती तो सम्हला नहीं और  चाँद,मंगल,बृहस्पति, शनि पर छलांग लगाने की तैयारी में जुटा है मूरख । अमरता और सम्प्रभुता के सपने देखता, भीतर से भयभीत इन्सान इन्सानियत को कबका खो चुका है । जल-थल-वायु चारों ओर बारुदी सुरंगें बिछी-पटी हैं ।

साल में एक दिन पर्यावरणदिवस मनाता है और बाकी दिन पर्यावरण का विध्वंसक बनता है । मदर्सडे, फादर्सडे, चिल्ड्रन्सडे, ओमेन्सडे, फैमिलीडे- सब मनाता है, किन्तु कॉन्वेट और वृद्धाश्रम भी दिन दूने रात चौगुने की गति से बढ़ते जा रहे हैं । नौ महीने पेट में रख कर बच्चा पालने का धैर्य नहीं, फुरसत भी नहीं, बूढ़ों को भला कौन सम्भाले !  
 कॉन्वेन्ट का कॉन्सेप्ट उस हृदयहीन स्वार्थी समाज के मन का ही तो फितूल था, जो आज पूरी जवानी में है । कॉन्वेन्ट में बच्चों का दाखिला कराना अपना परम कर्तव्य समझता है । मूरख को  कॉन्वेन्ट का असली अर्थ और उद्देश्य भी नहीं मालूम । वारिश को भी लावारिश बना छोड़ा है आधुनिकों ने । और फिर भला कुकुरमुत्ते की तरह नये पनपे उस कॉन्वेन्टी समाज से आशा ही क्या रखना ? कॉन्वेन्टी चाँद-सूरज पर जाकर भले ही झंडा गाड़ आये, चाबुक से हुकूमत चलाले, परन्तु इन्सानी दिलपर झंडा गाड़ना और उस पर राज करना उसकी फितरत नहीं, ख्वाहिश भी नहीं । क्यों कि इस कला को वो भूल चुका है ।

बेपरवाह तो वो था ही, विज्ञान ने और भी बेपरवाह और आलसी बना दिया । सगे-सम्बन्धी, नाते-रिश्ते, यार-दोस्त सबके सब फेशबुक-वाट्सऐप पर सिमट आये, जिसका नतीजा है कि दूर-दराज वालों से मिलना-जुलना तो दूर, एक विस्तर पर पड़े पति-पत्नी भी 63 के वजाय 36 बने, अपने-अपने सोशलसाइटों पर व्यस्त दीखते हैं । व्यस्त हैं- बीजी विदाउट विजनेस । असल में व्यस्त नहीं, अस्त-व्यस्त है । निजता छिन गयी है । एकान्त खो गया है । कभी भी, कहीं भी, किसी समय कोई अचानक किसी की निजता और एकात्मता पर धावा बोल बैठता है- मोबाइल रिंगटोन वा नोटिफिकेशन हावी हो जाता है और खुद को काबिल समझने वाला इन्सान, यन्त्र की तरह, आदेशपाल की तरह हरकत करने को वाध्य हो जाता है । इन्सान अपनों से ही नहीं, बल्कि अपने आप से भी पलायन कर रहा है । अपनों को ही नहीं अपने आपको भी धोखा दे रहा है ।

बूढ़ा पीपल सूख रहा है ।

दूर-दराज गावों में पड़े गरीब-असहाय या भीड़भरे कोलाहल के बीच वृद्धाश्रम में पड़े वृद्धजन  की कातर आँखें निहार रहीं हैं अपनों को । इन्तजार कर रही है—फेमिलीडे, फादर्सडे, मदर्सडे का ।

बूढ़ा पीपल मुस्कुरा रहा है । हांक लगा रहा है । चेतावनी भी दे रहा है –घटिका टांगने आओगे मेरे पास ही...घड़ियाली आँसू बहाओगे मेरे पास ही...मैं निर्विकार खड़ा रहूँगा उस दिन भी , जैसे तुम निर्लज्ज खड़े हो आज ।

अरे मूर्ख कॉन्वेटियों ! पीपल की ये शाखायें सिर्फ घटिका टांगने के लिए नहीं हैं, उसके नीचे सिर्फ खड़े होकर आँसू बहाने के लिए नहीं है । इसकी सघन हरियाली तुम्हें सिर्फ छांव ही नहीं दे रहा है, सिर्फ जैविक ऊर्जा ही नहीं दे रहा है, बल्कि और भी बहुत कुछ मिल रहा है इसके ज़रिये ।

दरवाजे पर या घर के एक कोने में बैठा बूढ़ा सिर्फ खांय-खांय ही नहीं कर रहा है, बल्कि और भी बहुत कुछ कर रहा है, अब भी बहुत कुछ दे रहा है तुम्हें । किन्तु तुम्हारी आँखें देख नहीं पा रही हैं । तुम्हारी मन्द बुद्धि समझ नहीं पा रही है ।

पीपल की शाखायें और बूढ़े की बाहें,पीपल की पत्तियां और बूढ़े की हथेली लगभग एक जैसा ही काम कर रही है, पर मन्दबुद्धि में समाये ये बातें तब न ।

पीपल बचाओ...पीपल लगाओ...पर्यावरण बचाओ...लौट जाओ अपने बुजुर्गों के पास...अपनी विरासत के पास...अपनी संस्कृति के पास ...अपने भारत के पास...अपने आर्यावर्त के पास...अन्यथा ये इण्डिया लील जायेगा तुम्हें और तुम्हारे कुनबे को भी । जिस दिन ये बूढ़ा पीपल नहीं रहेगा , उस दिन तुम भी नहीं रहोगे- पक्की बात है... समझ लो इसे ठीक से, वरना रोने के लिए आंसू भी न बचेंगे, उसे भी बोतलों में बन्द कर तुम्हें ही पिला देंगे - थोड़ा कलर, फ्लेवर, एसेन्स मिलाकर, ये हुनरमन्द व्यापारी ।
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Friday, 10 May 2019

हम और हमारी परम्परायें

हम और हमारी परम्परायें

हम शाकद्वीपीय ब्राह्मण हैं- सूर्यांश । वैसे तो सृष्टि में जो कुछ भी है, एक और एकमात्र ब्रह्म का ही अंश हैसर्वंऽखिलमिदंब्रह्म, फिर हमारी विशेषता क्या हुयी जो बारम्बार अपनी ही पीठ थपथपाये जा रहे हैं— है न जरा सोचने वाली बात !

किन्तु अपनी विशेषताओं पर विचार करके अपने अहं को और पुष्ट करने से बेहतर है कि कुछ उन चीजों को याद करें, कर्मों और कृत्यों को याद करें, उन बातों और परम्पराओं को याद करें—जिन्हें हम निरन्तर खोते चले जा रहे हैं और वर्तमान समय में सिर्फ बतकही का विषय बन कर रह गया है । इतिहास के पन्नों में कैद होते जा रहे हैं हम और हमारी परम्परायें ।

सूर्यांशों का सर्वाधिक मुख्य कृत्य- उपाकर्म-श्रावणीकर्म क्या हमें ज्ञात है- क्या होता है ये ? (हालाकि ये ब्राह्मणमात्र का मुख्य कर्म है) । दान-चन्दा बटोर कर किसी तरह रथसप्तमी-अचलासप्तमी मना लिए – बस हो गया मग-धर्म का कोरम पूरा !  द्विजत्व का आधार—शिखा-सूत्र, संध्या-गायत्री- हममें कितनों ने साध रखा है ? प्रतिशत निकालने चलेंगे तो ये ‘ % का चिह्न दशमलव पश्चात् कई शून्यों के बाद लगाना पड़ेगा ।

हमारी तत्परता है सिर्फ- नवरात्र के नाम पर एक साथ पांच-दस यजमानों का सप्तशती-पाठ-संकल्प ले लेना- कुछ बांच-बूंच लेना, कुछ धोती-साड़ी उगाह ले आना, यजमनिका के नाम पर भोज-भात कराकर मरियल बाछी और सड़ियल शैय्यादान वटोर लाना । संयोग से समाज में विद्वता का डंका बज गया यदि तो भागवत भी तोड़मरोड़ कर बांच लेना या फिर बहुकुण्डीय यज्ञों के नाम पर कुछ और भी हसोत-बटोर ले आना । यदि थोड़े और साहसी हुए तो स्वयं को जातिस्मर वैद्य, तान्त्रिक और ज्योतिर्विद घोषित कर देना । जब कि सच्चाई ये है कि ज्यादातर तिथि-सूचक से आगे हम हैं नहीं । ज्योतिष पढ़ने-गुनने का फुर्सत कहां है । कमाने-खाने-ठगने भर आही गया है । क्या होगा ज्यादा पढ़-लिख कर ।

आँखिर कितना कूड़ा बटोरेगे मेरे भाई ! कबतक बटोरते रहोगे ?  सूर्यांशों का क्या यही कर्म है समाज का कूड़ा बटोरना ?

इतिहास के पन्नों में दमतोड़ती सिसकती परम्परायें । देखादेखी के चक्कर में सबकुछ विसरता-खोता जा रहा है हमारा । समाज के अन्याय वर्गों में जो कुछ हो रहा है, बिना सोचे-विचारे उसे हम बड़ी तेजी से अंगीकार करते जा रहे हैं और मजे की बात ये है कि हम उसे मजबूरी और लाचारी का नाम  देकर दायित्व-मुक्त हो जा रहे हैं ।

अब भला बतायें— कायदे से पैर छूकर प्रणाम करने में कौन सी लाचारी आगयी ? क्या कमर में दर्द है या कि रीढ़ की हड्डियों में कुछ खराबी आगयी है, या बदरंग-टाइट जींस फटने का डर है, जो टखना-घुटना छूकर कर्तव्य-निर्वाह कर ले रहे हैं  ?

पैर छूने और छुलाने की भी विधि होती है- जानकर आश्चर्य होगा बहुतों को ।

मोमबत्तियां बुझाकर,अंडे से बना केक काटकर और उपस्थित जनों को जूठन खिलाकर हैपीवर्थडे और मैरेज एनवर्सरी हम मनाने लगे हैं, पर जातकर्म संस्कार की विधि  और औचित्य को विसार दिये । परम्परागत संस्कार चालीस से सिमट पर सोलह हुए । अब उसमें भी आदि-मध्य-अन्त तक ही सिमट जाने की नौबत है । यज्ञोपवीत बनाना तो भूल ही गए हैं, पहनने में भी बोझ लग रहा है । दूसरों की देखादेखी, विवाह में रिंगसेरेमनी और जयमाला को अपनाकर अतिरिक्त व्यय-बोझ बढ़ा लिए । डीजे-डांस के बिना बारात निकल ही नहीं पाती । नट-भड़ुओं की तरह कमर मटकाने में घंटों सड़क जाम किये रहते हैं- अपने समय का तो भान नहीं, ऐम्बुलेन्स और दमकल को भी गर्व से रोके रहते हैं- आम रास्ते को अपनी ज़ागीर समझकर, और दूसरी ओर धूआपानी, गोड़धो, जनवास-पूजा आदि मंगलाचरण में भी समय की बरबादी लगने लगती है । शास्त्र-पुराण पढ़ने की परम्परा लुप्त हो गयी है, वैसे में शास्त्रार्थ का औचित्य ही क्या रह जाता है ? सुनने-समझने का धैर्य और क्षमता भी तो चाहिए । सौंफ-गोलमिर्च-गुलाब-केवड़ा का ताजा-तरीन शर्बत गायब हो गया । प्रेज़र्वेटिव ज़हर वाला माजा-फ्रूटी, पेप्सी-कोला भाने लगा है ।  पलथी मारकर पंगत लगाने की तो बात ही बेमानी होगयी । क्यों कि नयी परिपाटी में दोनों को मजा है- खानेवाले को भी, खिलाने वाले को भी । बफेडीनरी व्यवस्था में आप खायें या भांड़ में जायें...कार्ड दिये हैं, लिफाफा देते जाइयेगा...।

कितना विलक्षण दृश्य हुआ करता था- बातबात में गौरी-गणेश वन्दना...मंगलम् भगवान विष्णु का सस्वरोच्चारण...सुदीर्घ शान्तिपाठ, सुसंस्कृत शुभेच्छुओं द्वारा बारबार अक्षताभिषेक और क्या ही आनन्ददायक क्षण हुआ करता था गृह रमणियों द्वारा गीतगोविन्द, यदुकुलज्योनार, ब्रह्मज्योनार,गंडनमंडन,बहत्तरपुर आदि के साथ-साथ  सुमधुर लोकगीत-गायन । सच पूछें तो उन दिनों की वो गालियां भी  पुष्पहार और बुके से कहीं ज्यादा मनमोहक लगती थी । ज्यादा प्रीतिकर होती थी ।

किन्तु ये सब इतिहास की बतकही बन गयी है । भोंड़े रॉक-पॉप के कर्कश स्वर के सामने कोकिलाकंठ कुमारियों का स्वर सपना हो गया है । फिल्मी गानों को छोड़कर लोकगीतों को याद रखना भी आधुनिकाओं के बस की बात नहीं । उन दिनों उन्हें अभ्यास करना पड़ता था, गाना पड़ता था- गले में चूना लगाकर,मुलहठी-कुलंजन से गला साफ कर-करके । अब तो ब्यूटीपॉर्लर से लौटने के बाद भी सारा समय घर में डेंटिंग-पेंटिग, साड़ी-सूट मैचिंग में ही निकल जाता है ।  समय ही कहां मिल पाता है बेचारियों को ।   

जबतक लड़की व्याहनी होती है, समाज का कोढ़—दहेज-दानव का रोना रोते हैं और जैसे ही लड़के की बारी आते है, अचकन-पगड़ी सम्भालने लगते हैं— हम खानदानी लोग ठहरे...सामाजिक प्रतिष्ठा-निर्वाह में खर्च तो होगा ही...लड़के को पढ़ाने-लिखाने, नौकरी दिलाने में बहुत खर्च हो जाता है...। मजे की बात तो ये है कि कौवे-गदहे को भी अप्सरा उर्वशी ही चाहिए..., कम्पटीटिव लाइफ में उच्च शिक्षा और गुण  के बिना काम कैसे चलेगा...और इसके साथ-साथ सांगोंपांग दहेज तो लड़केवालों का जन्मसिद्ध अधिकार है... एक से एक नाज़-नखरे सुनते-सुनते कान से मवाद आने लगता है । प्रबुद्ध समाज के नाम से उबकायी आने लगती है । जिनकी प्रबुद्धता सिर्फ मंचों पर झलकती है- एक से एक आह्वान, एक से एक संकल्प—वचने किं दरिद्रता...।

सवाल है कि ब्लूब्लड क्या केवल लड़के वाले ही होते हैं और लड़कियों की उँची डिग्रियाँ कूड़ेदान में पड़ी मिल जाती हैं क्या ?  

       विवाह को स्टेटससिम्बल क्यों बना लेते हैं हम- वो भी लड़की वाले के बदौलत ? औकाद है तो दिखाना चाहिए किसी गरीब-लाचार की बेटी को बहू बना कर । हां, अकसर देखने को मिल जाता है- कुरुप-बेडौल को भी सोने से मढ़ाकर विदा होते । भारीभरकम दहेज सात खून भी माफ कर देता है ।

हम ये भूल जाते हैं कि वैभव-प्रदर्शन वैश्य का कर्म है और शौर्य-प्रदर्शन क्षत्रिय का । हम तो ब्राह्मण हैं- ब्रह्मणत्व कितना उतर पाया है हमारे भीतर- ये विचारणीय है ।

            विवाह एक परम्परागत अनिवार्य मांगलिक कृत्य है, जिसमें दो कुल-परिवार मिलकर दो शरीरों व दिलों के मिलन का तानाबाना बुनते हैं । जहां दोनों के समान अधिकार हैं, तो दोनों के समान कर्तव्य भी । समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो कहना चाहिए कि दो परिवार मिलकर एक भावी परिवार का शिलान्यास करते हैं । अतः दोनों का समान योगदान होना चाहिए । बेहतर तो ये होगा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में चौदहआना जिम्मेवारी वरपक्ष की होनी चाहिए । कन्या तो अपना कुल-परिवार-गोत्र-पहचान  सबकुछ छोड़कर जाती है ।

            कृत्य,कर्म,परम्परायें जब लुप्त होंगी,तो संस्कारहीनता तो आनी ही आनी है । इसे भला कैसे रोका जा सकता है ? मन्त्रण देकर, आहूत किया है हमने ।

इन सब बातों की याद दिलाकर, ये नहीं कहता कि ट्रेन-बस छोड़कर बैलगाड़ी से चलें । पर इतना तो जरुर कहना बनता है कि जड़ के आधार पर ही तने और शाखायें हैं । कोंपलों का सौन्दर्य जड़ की वजह से ही है । जड़ से बिलकुल बिलग होकर कदापि जीया नहीं जा सकता- विलुप्त होना अवश्यमभावी है- आज हो, कल हो, या कि वरषों बाद हो । नष्टे मूले न पत्रं नैव शाखा । अस्तु ।

(नोटः-आलेख के किंचित अंशों को परिवर्तित कर दिया जाये तो समाज के अन्य वर्गों पर भी समान रुप से घटित हो सकता है )

Sunday, 5 May 2019

अद्भुत धैर्य-परीक्षण

                               अद्भुत धैर्य-परीक्षण

भले ही सन्तों द्वारा संसार को असार कहा गया है , किन्तु इस असारता का बोध हो जाये, सिर्फ सन्त-वाणी सुन कर तब न !

      "  रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निशान..." किन्तु हाड़-चाम की खोपड़ी में आसानी से कुछ समाता ही नहीं ।  निशान क्या पड़े, खाक !

        पोथी-पुरान,सन्त-महात्मा कह-कह कर थक  जाते हैं, एक ही बात को बारम्बार दुहराते हैं, फिर भी स्वभाव से लापरवाह आदमी ध्यान  नहीं देता । बातें इस कान से उस कान तक आवाजाही करके हवा हो जाती है ।

       जन्म-मृत्यु का खेल निरन्तर जारी है- जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद...।

         संसार में निरन्तर घटित होरही घटनाओं से हम प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकते । पर ये भूल जाते हैं कि सुख और दुःख सिक्के के दो पहलुओं के समान हैं । इनके आने-जाने का क्रम जारी रहता है । फिर भी हमारी कामना होती है कि सुख ही आवे मेरे हिस्से, दुःख कहीं और जाये । किन्तु भला ऐसा भी कहीं होता है- एक पहलु वाला सिक्का देखा है आपने !

        शास्त्रों ने धैर्य की महिमा का भरपूर बखान किया है- धीरज,धर्म,मित्र अरु नारी आपतकाल परीखिये चारी

        वस्तुतः धैर्य की आवश्यकता जीवन में सर्वाधिक है । धैर्य बहुत बड़ा सम्बल है मनुष्य का । धैर्यहीनता की स्थिति में अनेक विरोधीतत्व(दुर्गुण)हमपर हावी होने लगते हैं । किन्तु पराकाष्ठा तो तब है, जब हम घोर विपत्ति में हों—हमारे किसी प्रियजन का वियोग हो गया हो- ऐसा वियोग जो कदापि संयोग में नहीं बदला जा सकता, यानी मृत्युलोक को त्याग चुका हो कोई बन्धु , कोई प्रियजन । ऐसे में हमारे धैर्य का बांध चरमराने  लगता है । हम रोने-कलपने-विलखने लगते हैं । तड़पने लगते हैं उसके वियोग में- जैसे जल बिन मछली तड़पती है । मछली तो जल बिन तड़प-तड़प कर मर भी जाती है, पर हम मरते नहीं इतनी सहजता से, बल्कि  तड़पते हैं सिर्फ ।

       पंचतन्त्र ने बड़ी कठोरता पूर्वक हमें संयम का पाठ पढ़ाया है— एकदम भय दिखाकर, प्रियजन के वियोग पर रोने-धोने पर अंकुश लगा दिया है । यथा-
        श्लेष्माश्रु बान्धवैर्मुक्तं प्रेतो भुंक्ते यतोऽवशः ।
     तस्मान्न रोदितव्यं हि क्रियाः कार्याश्च शक्तितः ।। (पंचतन्त्र- मित्रभेद ३६५)
     (अपने बन्धु-बान्धवों द्वारा त्यक्त कफादि मिश्रित आँसुओं को मृतात्मा को विवश होकर खाना-पीना पड़ता है । अतः  रोना उचित नहीं है, प्रत्युत यथाशक्ति धैर्य पूर्वक और्ध्वदैहिक क्रियाओं को सम्पन्न करे ।)

इन बातों की पुष्टि हमें पुराणों में भी मिलती है ।
      मृतानां बान्धवा ये तु मुञ्चन्त्यश्रूणि भूतले ।
    पिबन्त्यश्रूणि तान्यद्धा मृताः प्रेताः परत्र वै ।। (स्कन्दपुराण ब्राह्म.खंड ४८।४२) 
   (भूतल पर मृतात्मा के बन्धु-बान्धव जिन आँसुओं का त्याग करते हैं, उन आँसुओं को  परलोक  में मृतप्राणी को पीना पड़ता है ।)

     उपदेश तो मिल गया, किन्तु कितना कठिन है- इसका पालन, ये कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है ।

      गरुड़पुराण-प्रेतखंड में इस कठोरता को थोड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से सरल किया गया है । वहां कहा गया है कि जबतक मृतकशरीर का विसर्जन (अग्निसंस्कार) नहीं हुआ हो, तबतक आँसु न बहने दे । दाहसंस्कार के पश्चात् श्मशान भूमि से वापस आकर मृतक स्थान पर बैठ कर जीभर कर रोये...इत्यादि ।

      वंशीधारी कृष्ण ने तो बड़े सहज भाव से कह डाला है—
      अशोच्यानन्वशोच्यस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । 
      गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिताः ।। (गीता २।११)
    
     बात यहां पंडित की की जा रही है । 


     पंडित-  सत-असत विवेकवती बुद्धि का नाम है पण्डा । वह पण्डा जिसका विकसित हो चुका है, अर्थात असत-सत का ज्ञान हो गया है- जिसे, उसे ही पण्डित कहते हैं । ऐसे व्यक्ति को किसी प्रकार का शोक नहीं होता । शरीर और शरीरी का भेद समझ लिया है जिसने वही पंडित है सच्चे अर्थों में ।

   किन्तु यहां सभी पंडित तो हैं नहीं । 

   परन्तु पंडित बनने का प्रयास तो करना ही होगा, अन्यथा अपने प्रियजनों को क्या हम विवश करना चाहेंगे- हमारे आँसुओँ को पीने के लिए ? अस्तु । 

Tuesday, 23 April 2019

प्राण-प्रक्रिया और मानव-साङ्कर्य






प्राण-प्रक्रिया और मानव-साङ्कर्य

        हमारे पुराणों में अभिव्यक्ति की अद्भुत परम्परा रही है प्राण-प्रक्रिया के साथ-साथ मनुष्य-चरित का सांकर्य यथेष्ठ स्थानों पर देखा जाता है । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि प्रकृति का प्रचुर और विशद रुप से मानवीकरण किया गया है । हम मनुष्य मनुष्य की भाषा और क्रिया-कलापों को ही आसानी से समझ पाते हैं । इससे इतर क्रियाओं को आत्मसात करने में काफी कठिनाई होती है । पति-पत्नी-पुत्र-कलत्रादि मानुषी सम्बन्धों को समझना हमारे लिए अपेक्षाकृत आसान होता है । देवता-देवी (शक्ति-शक्तिमान) आदि को भी इसी रुप में चित्रित किया गया है ताकि गहन सृष्टि-विज्ञान को हम सहजता से समझ सकें ।  वस्तुतः पुराणों की रचना(संकलन)ज्ञानक्षेत्र के पंचमाधिकारियों के लिए ही किया गया है । यानी वेदोपनिषदादि से ब्रह्म और तत्लीलासृष्टि रहस्य पूर्ण स्पष्ट नहीं हो पाया, फलतः पुराणों का संकलन करना पड़ा ।  कथोपकथन की इस परिपाटी को ठीक से हृदयंगम न कर सकने के कारण ही हम प्रायः भ्रमित होते रहते हैं और पुराणकार पर ही आक्षेप कर बैठते हैं । यहां एक छोटे से प्रसंग में कुछ ऐसी ही बातों की चर्चा करते हुए स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है । अस्तु ।

       सृष्टि के मूलाधार सूर्य हैं- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च...(ऋग्वेद १-११५-१), यत् सर्वे प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सन्नधत्ते...(प्रश्नोपनिषद १-६) इत्यादि उद्धरणों से यही स्पष्ट होता है । पुराणों में विविध कथाक्रम में सूर्य की पांच पत्नियां कही गयी हैंप्रभा,संज्ञा,राज्ञी,वडवा और छाया । वस्तुतः ये सब क्रम और काल भेद है । प्रभा से प्रभात हुए । यहां संज्ञा के समतुल्य (हर दृष्टि से समान) होने के कारण छाया को सवर्णा भी कहते हैं । सवर्णा से ही सावर्णीमनु हुये । इनके अतिरिक्त शनैश्चर (छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्...), ताप्ती और विष्टि नामक तीन सन्तानें और उत्पन्न हुयी । उधर संज्ञा से वैवश्वत्मनु, यम और यमुना हुए । वडवा (अश्विनी > घोड़ी) से अश्वस्वरुप में सम्भुक्त होने पर नासत्य और दस्र नामक दो सन्तानें हुयी, जो अश्विनीकुमारों के नाम से सुख्यात हुये । ज्ञातव्य है कि अश्वस्वरुप जनक-जननी के कारण इनका शेष शरीर तो मनुष्य का है, किन्तु मुंख-मंडल घोड़े का है । कालान्तर में आरोग्यधर्मा देववैद्य के रुप में ये प्रतिष्ठित हुए ।

       पौराणिक प्रसंग (वायुपुराण अध्याय २२, मत्स्यपुराण अध्याय ११, पद्मपुराण-सृष्टिखंड अध्याय  ८) इत्यादि में वर्णित कथासार ये है कि त्वष्टा पुत्री संज्ञा सूर्य से व्याही गयी । दीर्घकाल तक तो वो सूर्य के साथ रही, किन्तु बाद में प्रखर सूर्य रश्मियों से व्याकुल होकर स्वयं को अन्तर्हित करने के विचार से अपने ही स्वरुप (सवर्णा) छाया को स्थान देकर, स्वयं सुमेरु प्रान्त में जा छिपी । समयानुसार संज्ञा-सवर्णा छाया से भी सन्तानें उत्पन्न हुयी । छाया अपनी सन्तानों की तुलना में संज्ञा की सन्तानों के प्रति सौतेलेपन का भेद-भाव रखती थी । सूर्य-संज्ञा पुत्र वैवस्वत् द्वारा इस आशय की शिकायत करने पर सूर्य अति कुपित हुये और संज्ञा स्वरुपिणी छाया को प्रताड़ित करके रहस्य ज्ञात किये । रहस्य जान कर वे मूल पत्नी- संज्ञा की खोज में निकल पड़े । संज्ञा अश्विनी रुप में जलमग्न थी, अतः सूर्य ने भी अश्व रुप धारण किया । दीर्घकालोपरान्त प्रेमालाप से समझा-बुझा कर वापस लाया । इसी जल-प्रवासक्रम में अश्विनीकुमारों का जन्म हो चुका था । इस दुर्घटना की सूचना पिता विश्वकर्मा(त्वष्टा) को भी मिली । पुत्री-जामाता के सुदृढ़ सुखमय जीवनयापनार्थ उन्होंने सूर्य के तेज को खरादकर(सुधारकर) किंचित न्यून (सह्य) किया । ध्यातव्य है कि इन्हीं रश्मियों से विभिन्न दिव्य सर्जना के साथ-साथ दिव्य विप्रों का स्रजन भी हुआ, जिन्हें शाकद्वीप में स्थान दिया गया ।

        अब, सूर्य की इस सन्तति (संसृति) परम्परा को वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषित करने का प्रयास करते हैं यहां । कथा का प्रतीकात्मक आशय ये है कि सूर्य-मंडल के चारों ओर प्रभा व्याप्त होती है , जो सदा सूर्य के साथ विराजती रहती है सहचारिणी होकर । अतः प्रभा को सूर्य की प्रथम पत्नी कहा गया ।  उस प्रभा के प्रभाव से ही प्रभात होता है, अतः प्रभात को प्रभा का पुत्र कहा गया । सूर्य के अस्ताचल गामी हो जाने पर रात्रि का प्रादुर्भाव होजाता है, हालाकि इसका सम्बन्ध भी परोक्षरुप से सूर्य से ही होता है, अतः रात्रि(राज्ञी)को सूर्य की दूसरी पत्नी कहा गया । प्राणः प्रजानामुदयत्वेष सूर्यः...समस्त प्राणियों में संज्ञा(चेष्टा)सूर्य के कारण ही है । सूर्यपिंड ही सारी सृष्टि में प्राणरुपसे उदित है- व्याप्त है । इस प्रकार संज्ञा सूर्य की सहचारिणी सिद्ध हुयी । त्वष्टा सभी प्राणिरुप देवताओं के भिन्न-भिन्न स्वरुपों के संगठन का हेतु बनता है । विशकलित यानी प्रकीर्णभाव से विखरे हुए सभी प्राण त्वष्टारुप प्राणशक्ति से ही संगठित होकर अपना रुप ग्रहण करते हैं । यही कारण है कि त्वष्टा ही प्राणियों की चेष्टा (संज्ञा) में कारण बना । संज्ञा को त्वष्टापुत्री कहने का यही अभिप्राय है । ध्यातव्य है कि पृथ्वी पर सीधे आने वाले सूर्यरश्मियों को ही प्रभा कहते हैं, जिससे प्राणिमात्र में संज्ञा (चेष्टा) का संचार होता है । यही प्रभा (रश्मि) किसी भित्ति आदि से प्रतिहत (अवरोधित) होकर किंचित तिरछी पड़ती है वही छाया वा सवर्णा नाम से अभिहित है । सीधी किरणों से जो अर्द्धेन्दु बना वो वैवश्वतमनु कहलाया और प्रतिहत(सवर्ण) किरणों से बने अर्द्धेन्दु को सावर्णिमनु कहा गया । यम को सूर्यपुत्र कहा गया है । तात्पर्य ये है कि सभी प्राणियों की आयु सूर्य-सन्निहित है । सूर्यमंडल से प्राप्त होने वाली ऊर्जा(प्राण) किंचित कारणों से विच्छिन्न होजाती है जब, तभी प्राणी की मृत्यु होती है । सूर्य और उससे उत्पन्न होने वाली आयु को परस्पर विच्छिन्न करनेवाली शक्ति का ही नाम है यम । ये यमात्मक शक्ति भी कहीं बाहर से नहीं आती, प्रत्युत सूर्य से ही उत्पन्न होती है, यही कारण है कि यम को सूर्यपुत्र कहा गया है । छाया (सवर्णा) से उत्पन्न शनैश्चर नामक पुत्र की चर्चा है । वस्तुतः सूर्यमंडल में काफी दूरी पर शनि नामक ग्रह है । सूर्य से इतनी दूर कि वहां तक सूर्यरश्मियों का सम्यक् पहुँचना कठिन है । रश्मियां किंचित वक्र होकर ही वहां पहुँच पाती हैं । यही कारण है कि सवर्णा वा छायोत्पन्न माना गया । ब्रह्माण्ड की परिधि पर सुमेरुप्रान्त की बात कही जाती है । 

        व्याकरण और निरुक्त के ज्ञाता इससे अवगत है कि वस्तुतः रश्मि, अश्व, प्राण आदि एक दूसरे के पर्याय हैं । सूर्य-संज्ञा(अश्व-अश्वी)संयोग से अश्विनीकुमारों का जन्म होने का तात्पर्य ये है कि सुदूर सुमेरुप्रान्त में सूर्य किरणें किंचित भिन्न रुप से लक्षित होती है- अश्विनीनक्षत्र की आभा से अद्भुत समागम होता है वहां । वहां का वातावरण अन्य स्थानों की तुलना में अति मनोरम होता है ।

     इन बातों की विशद चर्चा श्री गिरधर शर्मा चतुर्वेदीजी के पुराण-परिशीलन नामक ग्रन्थ में द्रष्टव्य है , जो आधुनिक मतावलम्बियों की आँखें खोलने में पूर्ण समर्थ हैं । महमना मगकुलभूषण श्रीगोपीनाथजी कविराज ने भी सूर्य के रहस्यमय विज्ञान पर काफी कुछ प्रकाश डाला है । स्वामी विशुद्धानन्दजी के सानिध्य में उन्हें इस सावित्री-विद्या का ज्ञान प्राप्त हुआ था । जिज्ञासुओं को उनकी बहुचर्चित पुस्तक भारतीय संस्कृति और साधना  का अध्ययन-मनन अवश्य करना चाहिए । अस्तु ।

Sunday, 21 April 2019

लागा चुनरी में दाग


लागा चुनरी में दाग

लागा चुनरी में दाग…’ पंक्तियां एक निर्गुण सन्त की हैं, जिसे समय-समय पर मुहावरे के रुप में भी खूब प्रयोग किया जाता रहा है । ऐसा ही अवसर फिर एक बार लोकतन्त्र के रोचक वर्तमान में आया है- ऐन ऐसे वक्त में जब लोकतन्त्र का महापर्व- सांसदीय चुनाव का माहौल है देश में । लोकतन्त्र के कर्णधारों और तथाकथित मषीहाओं का वारान्यारा बहुत जल्द ही होने वाला है , साथ ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कुछ बड़े चेहरे और थोबड़ों को एक्सपोज़ भी होना है बहुत जल्दी ही । फैसला पक्ष में नहीं जाने की आशंका रातों की नींद और दिन का चैन हराम किये हुए है । ऐसे में लोकतन्त्र के रंगमंच पर तरह-तरह के खेल खेले जा रहे हैं । सभी प्रकार की मर्यादायें तारतार हो रहीं हैं । तथाकथित स्वतन्त्रता का पुरजोर उपयोग किया जा रहा है । जो चाहें,जितना चाहें,जब चाहें,जहाँ चाहें,जिसे चाहें अ-सम्मानित करदें, आरोपित करदें । यहां तक कि दूसरे को असम्मानित करने में अपने सम्मान को भी दांव पर लगा दें- स्वतन्त्रता का असली उपयोग तो यही है न ! और साथ ही यह भी कहने से न चूंकें कि लोग असहिष्णु हो गए हैं यानी सहिष्णुता का घनत्व भी घट गया है ।
            अभी हाल में सीबीआई का बखिया उघड़ा था । अब सीजेआई को पोस्टमॉर्टम टेबल पर घसीटा गया है ।
    खबर है कि बीस वर्षों के वेदाग कैरियर और सात महीने के बचे कार्यकाल वाले  हमारे सीजेआई महोदय पर ही कीचड़ उछाला गया है । और इस प्रकार लोकतन्त्र का सर्वाधिक विश्वासपात्र स्तम्भ ही संदेह के घेरे में आ गया है । उनकी ही एक बर्खास्त महिला कर्मचारी ने यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया है । बर्खास्तगी का एकमात्र कारण – यौन-उत्पीड़न का विरोध...पति और देवर तक को भी बक्शा नहीं गया ।
            आसमान में थूकना और किसी पर कुछ भी आरोप लगा देना बिलकुल आसान बात है, किन्तु...?
 आरोप बेबुनियाद है...सुनियोजित साजिश के तहत ऐसा हुआ है...सीजेआई महोदय ने भी वही कहा, जो प्रायः हर आरोपी कहता है ।
            लकदक-बेदाग चुनरी पर कीचड़ पड़ जाने के बाद कोई क्या करेगा ? क्या कहेगा ?
कुछ न कहना...मौनधारण भी कम खतरनाक थोड़े जो है ।
कोई उसे धोने की कोशिश करेगा तो कोई उसे सूख कर खुद-ब-खुद झड़ जाने का इन्तज़ार...कोई बेशर्म की तरह खींसें भी निपोड़ सकता है...ऐसी परम्परा भी हमारे प्यारे लोकतन्त्र में खूब रही है । हालाकि ये सब आरोपी की निजी स्वतन्त्रता और स्वविवेक की बातें है ।

            किन्तु एक आम आदमी क्या करें- ऐसी खबरों का ?

          अखबार के उस पन्ने को चट फाड़कर बच्चे का पॉटी फेंकने में इस्तेमाल करलेमुंह बिचकाकर अखबार एक ओर सरका दे—कहे जो झूठ-सच हरदम उसे अखबार कहते हैं...के तर्ज पर या कि रीडिंग टेबल पर करीने से सहेज कर उन पंक्तियों पर मगज़पच्ची करने बैठ जाये ?
            पहले दो करतब तो बेमानी हैं...सरासर बेमानी, परन्तु तीसरा भी सबके बस की बात नहीं है ।
            क्या कलयुग—सर्वाधिक भ्रष्ट युग सज-संवर कर हमारे देश में ही डेरा डाल लिया है ?
अनीति, अनेति, झूठ और भ्रष्टाचार की हद हो गयी !
किसी भी खबर या घटना के बाद हम दो धड़ों में सहज ही बंट जाते हैं—अनचाहे भी पक्ष या विपक्ष का दामन थाम लेते हैं । खबरों को चटकारे लेकर चखने लगते हैं । मुंह बिचका कर थू-थू भी करने लगते हैं । बिन सोचे-विचारे कठपुतली की तरह तालियां भी ठोंकने लगते हैं किसी और के इशारे पर ।
हालाकि पर्दे के पीछे जाकर सच्चाई तक पहुँचना सबके बस की बात नहीं है । खबर जुटाने वाले चौथे खम्भे में भी भरपूर घुन लग चुका है । एक ओर सच्चाई को हर कीमत पर उजागर करने वाले जीरोमाइलरिपोर्टरों पर भी आए दिन तरह-तरह के जुल्म ढाये जा रहे हैं- उनकी या उनके परिवारों की निर्मम हत्यायें हो रही हैं, तो दूसरी ओर डिजाइनर पत्रकारों की भी बाढ़ आगयी है । सोशलमीडिया खुराफ़ातियों का सुरक्षित गढ़ बन गया है । यहां पत्रकार बनना सबसे आसान काम हो गया है । सस्ते वा कहें मुफ्त के इन्टरनेट से संवाद-परिवहन को अल्लादीन का चिराग मिल गया है- एक क्लिक में दुनियां समा गयी है ।
हम बहुत ही संक्रामक दौर से गुज़र रहे हैं – ऐटोमिक रेडियेशन से भी खतरनाक दौर में ।
ऐसे में बहुत सूझ-बूझ से काम लेने की जरुरत है । विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र सर्वाधिक चर्चे में है । सर्वाधिक खतरे में भी । भीतर-बाहर, आजू-बाजू गिद्ध-कौये चोंच मारने को उतारु हैं । मूंछ और पूंछ रंग-रंग कर सियार हुआँ-हुआँ कर रहे हैं –आजाओ मेरे बाड़े में...।
ऐसे में हमें जगकर पूरे होशोहवाश में पहरेदारी करनी होगी । खुद को बचाते हुए देश को बचाना होगा । देश ही न रहेगा सुरक्षित तो फिर हम रहे न रहे –क्या मतलब ?
लोकतन्त्र के दुश्मनों - नापाक नेताओं को ठीक से सबक सिखाना होगा । चुनचुन कर दागदार चुनरियों को कलफ़ कर फिर पांच साल के लिए सहेजने के बजाय एकदम फूँ...ऽ...ऽ...कर देना होगा- रहे बांस न बजे बंसुरिया ...।
चलने-बोलने का सऊर नहीं, वो भला लोकतन्त्र क्या चलायेगा—सोचनेवाली बात है । मक्कार तन्त्र भले चला ले ।
राष्ट्र की सेवा वही कर सकता है- जिसे खुद की सेवा का सपना न हो । जिसकी बन्द पलकों में भी सिर्फ और सिर्फ सु-राष्ट्र का सपना हो ।
जन्मजात वा अपेक्षाकृत बेदाग चुनरी वाला ही सही ढंग से लोकतन्त्र सम्भाल सकता है ।  
कहीं फिर पछताना न पड़े— लागा चुनरी में दाग छुड़ाऊँ कैसे...घर जाऊँ कैसे ....।
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