Tuesday, 5 November 2019

ईगोफ्रैन्डली


ईगोफ्रैन्डली

          भोंचूशास्त्री की झरखंडिया सायकिल में किसी मोटरसायकिल वाले ने टक्कर मार दी और बिना सॉरी बोले, आँखें तड़ेरते आगे निकल गया ऍनरॉयड पर गर्दन झुकाये । व्यथित शास्त्रीजी सीधे मेरे पास पहुँचे और करुणाभरे स्वर में पूछने लगे— ईगोफ्रैन्डली सिद्धान्त के बारे में कुछ पता है गुरु !

          मैंने उन्हें समझाते हुए कहा— नहीं शास्त्रीजी ! ईगोफ्रैन्डली नहीं होता है कुछ, ईकोफ्रैन्डली होता है । पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, नये जमाने में ईकोफ्रैन्डली गाड़ियों का इज़ाद हो गया है । इसके प्रचार-प्रसार पर सरकारों का काफी जोर है । इन गाड़ियों में पेट्रोल-डीज़ल आदि किसी ज्वलनशील और धुआँ छोड़ने वाली फूएल का प्रयोग नहीं होता, बल्कि विजली(वैट्री), सोलर पैनल आदि से ऊर्जा प्रदान की जाती है।

          मेरी बात पर वे झल्ला उठे— दुनिया की तरह तुम  भी मुझे निरा बेवकूफ ही समझ लिए हो या तुम्हें भी ईगो हो गया है । पर्यावरण के प्रति सौहार्द रखने वाली व्यवस्था को आजकल ईकोफ्रैन्डली कहा जाने लगा है- ये कौन नहीं जानता, किन्तु मैं इससे भी बड़ी वाली समस्या की बात कर रहा हूँ ।
          पर्यावरण से बड़ी समस्या ? मैं कुछ समझा नहीं ।

खुद समझे नहीं और चल दिए मुझे समझाने । यही तो सबसे बड़ी समस्या है - लोग खुद समझते नहीं । समझना-जानना भी जरुरी नहीं समझते और चल देते हैं दूसरों को समझाने । तुम्हें शायद नहीं मालूम या मालूम भी हो तो भी इस ओर ध्यान नहीं गया हो- देश ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है ईगोफ्रैन्डली व्यवस्था का नितान्त अभाव । इस ईगोफ्रैन्डली को समझाते-समझाते हमारे ऋषि-मुनि थक गए पर किसी ने ठीक से समझा ही नहीं । समझ लिये होते तो दुनिया का स्वरुप ही कुछ और होता । हमारी धरतीमाता बारुद के ढेर पर बैठी नहीं होती आज । सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाः, सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःख भाग्भवेत - के स्लोगन वाली दुनिया में एक दूजे के प्रति ऐसी  गिद्धदृष्टि नहीं होती । सत्य और न्याय इस तरह से कराहता नहीं होता । मानवता इस तरह शर्मसार नहीं होती ।

अच्छा तो अब समझा । आप अहंकी बात कर रहे हैं न ?

शास्त्रीजी ने सिर हिलाते हुए कहा— बिलकुल सही समझा तुमने । अरे गुरु ! इसी अहं को तो ईगो बोलते हैं न अंग्रेजीवाले ? मैं उसी ईगो की बात कर रहा हूँ । और ईगो के प्रति संवेदनशील होने की बात कर रहा हूँ । अब संवेदनशील का भी नेताओं वाला अर्थ मत लगा लेना । या पत्रकारों वाले अन्दाज में कुछ का कुछ समझकर छाप-छूप मत देना । मैं इस ईगोनामधारी, मानवता के सबसे खतरनाक दुश्मन की बात कर रहा हूँ । इसे ठीक से पहचानने की बात कर रहा हूँ । और पहचान कर इससे सावधान रहने की बात कर रहा हूँ । क्यों कि अनजाने में ही ये जब-तब, जहाँ-तहाँ सिर पर सवार हो जाता है और कुछ का कुछ करवा लेता हैं लोगों से । राहुग्रह की तरह इस ईगो के पास खुद का सिर्फ खोपड़ी है। हाथ-पैर और कुछ हैं नहीं । दिल-दिमाग भी नहीं है। अतः किसी के माध्यम से ही सारा अनर्थ कर गुजरता है । और मजे की बात ये है कि खुद को काबिल, होशियार और प्रबुद्ध मानने वाले लोग ही इसके ज्यादा शिकार होते हैं । और इससे भी अधिक मजेदार बात ये है कि ज्यादातर लोग इसे पाल-पोस कर बड़े जतन से अपने दिलोदिमाग में सुरक्षित रखते हैं । खासकर बड़े लोगों की, बड़ी उपलब्धियों में एक है ये । जितने बड़े लोग, उतना बड़ा उनका ईगो- एकदम से फोरवीलर के माफिक । किसी को धन का ईगो, किसी को रुप का ईगो, किसी को बल का ईगो, किसी को ज्ञान का ईगो, किसी को पद-प्रतिष्ठा का ईगो । यहाँ तक कि किसी को त्याग और तपस्या का ईगो । बड़े-बड़े सन्त-महात्मा भी इससे बच नहीं पाये । दुनिया में विरले ही कोई ऐसा मिले जिसपर इसका प्रभुत्व न हो, आधिपत्य न हो ... ।

“…मैंने एक ऐसे जजसाहब के बारे में सुना है, जो अपने बेडरुम में भी जज ही रहते थे, जिसके कारण उनकी पत्नी बहुत दुःखी और परेशान रहती थी । जज भी हाईकोर्ट के थे, इस कारण ईगो भी हाईलेबल वाला ही था । लाचार होकर पत्नी ने फैमिलीकोर्ट में तलाक की अर्जी लगायी, किन्तु भला उस अबला का कौन सुने ! किसी जज के खिलाब मुकदमा लेने का हिम्मत किसे हो ! जिस विधान से बंधकर न्यायाधीश लोग न्याय करते हैं, उस विधान को बनाने वाले नेता लोग इस ईगो के सबसे बड़े पालनहार होते हैं । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि बेरोजगारी बहुल देश में ईगो की सबसे बड़ी फैक्ट्री के मालिक नेतागण ही होते हैं । खुद को ईश्वर से भी ऊपर समझते हैं । कानून-व्यवस्था को मर्यादित ढंग से सक्रिय करने में जिन वाक्-कीलों(वकीलों)का सहयोग न्यायाधीश लोग लेते हैं वो भी अब्बल दर्जे के ईगो वाले होते हैं । इण्डियन पिनलकोड तो उनकी जेब में होता है सदा, फिर क्योंकर परवाह करें ! वो चाहें तो निरपराधी को फाँसी पर लटकवा दें, चाहें तो अपराधी को अपराध करने की खुली छूट दिलवा दें । कानून-व्यवस्था को सुचारु रुप से पालन कराने की जिम्मेवारी और जनता की रक्षा का दायित्व है पुलिस-प्रशासन पर । स्वाभाविक है कि उनका ईगो किसी से कम विकराल कैसे हो सकता है ! माँ-बहन की गालियों के ऐक्गेक्टिवक्लौज या कि तकियाकलाम सहित, बातें करने का संवैधानिक अधिकार सिर्फ उन्हें ही प्राप्त है । आरोपी को कानून की कौन सी धारा में बहाना है, बहाकर पार निकाल देना है, या कि मंझधार में डुबो देना है- ये सब इनके ही हाथों में होता है । अपराध-विश्वविद्यालय के वी.सी. का पद प्राप्त है इन्हें... ।

 “… गहराई से विचार करें तो पता चलता है कि एक जाति के ईगो की ही कई प्रजातियाँ विकसित हैं समाज में । सन्त-महात्मा, पंडित-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी, डॉक्टर-वकील सबके अपने-अपने ईगो हैं । और जाहिर है कि अलग-अलग तरह के ईगो होंगे तो आपस में टकराव की आशंका भी बहुत अधिक होगी । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि एक ही मानवजाति अनेक जाति, धर्म और मज़हबों में बटी हुयी है, उसी तरह एक ही ईगो अनेक रुप लेकर आपस में जूझने-टकराने का काम करती रहती है और स्वर्गीय सुखदायी संसार को नरक बना छोड़ा है । आये दिन इस ईहो के तरह-तरह के कारनामें चैनलों और अखबारों की सुर्खियाँ बनती रहती हैं । विज्ञापन और टी.आर.पी. के पैदाइशी पुत्र इसे और भी हवा देते रहते हैं, ताकि उनकी सजी-धजी दुकानों के ग्राहकों में इज़ाफा होता रहे...।

 “…ईगो-प्रभाव-ग्रस्त, संवेदनहीन मानव किसी भी दृष्टि से तात्कालिक मानव रह ही जाता, विशुद्ध दानव बन जाता है । उस स्वरुप में आविष्ट व्यक्ति को पहचान पाना बड़ा ही मुश्किल होता है कि वो प्राण-रक्षक डॉक्टर है या कानून रक्षक वकील, पुलिस-प्रशासक है या न्यायपीठिका पर आसीन जज , नेता है या अभिनेता, क्रेता है या विक्रेता, पंडित-पुरोहित है, मुल्ला-काज़ी है या आतंकवादी...! ईगो के ज़ाम का असर जैसे ही चढ़ता है दिमाग में बस एक ही स्वरुप दीखता है- आतंकवादी का..मानवता के शत्रु का... ।

 “…अतः मैं किसी ऐसे सिद्धान्त की तलाश में हूँ, किसी ऐसी विधि की तलाश में हूँ, किसी ऐसे डिवाइस (ऐप) की तलाश में हूँ जो फटाफट ईगोफ्रैन्डली बना दे दुनिया को ।  इसके बारे में तुम भी सोचो । मैं भी सोचता हूँ । अच्छा तो अब चलता हूँ । जयरामजी । वन्देमातरम् ।
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Sunday, 27 October 2019

बाजारवाद का अट्टहास

                               बाजारवाद का अट्टहास

          भोंचूशास्त्री आज अजीब ड्रेसकोड में नजर आए । आदतन धोती-कुर्ता वाले शास्त्रीजी आज पायजामा-कुर्ता और कंधे से लटकते हैंडीकैम के नये लुक में बाजार में घूमते मिल गए । उत्सुकतावश मैं लपक कर उनकी ओर बढ़ा । राम-सलाम की नयी चलन— गुडमॉर्निंग-गुडइवनिंग की फॉर्मेलिटी से चुँकि उन्हें सख़्त नफ़रत है, इस कारण सीधे सवाल कर दिया— अरे वाह ! आपने तो अपना गेटअप ही बदल डाला । एकदम कैमरामैन वाले यूनिफॉर्म में आगए। कहीं कोई... ?

            मेरी बात बीच में ही काटते हुए बोले— हाँ गुरु ! दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है, तो कभी-कभी मुझे भी थोड़ा बदलाव लाने का मन कर देता है । हालाकि लोग वदल लेते हैं खुद को और दोष मढ़ देते हैं दुनिया के माथे । अरे, किसी ने कभी कहा आपको कि बदल लो खुद को, भूल जाओ अपनी सभ्यता-संस्कृति, भुला दो अपने वजूद को ? नहीं न । फिर क्यों पागल हुए जा रहे हो- कभी कौआ बनते हो, कभी मोर, कभी बगुला, कभी तोता...अरे, हंस हो ।  हंस रहने में शरम किस बात की? किन्तु अचानक याद आ गयी किसी की कही बातें— हंसा रहा सो मरि गया, सुगना गया पहाड़ , अब हमारे मंत्री भए कौआ और सियार। यही सोचकर आज धोती छोड़, पायजामा पहन लिया । देखता हूँ- इस बाने में वही आदमी लगता हूँ या बहूरुपिया ।

            सो तो ठीक है । मुगलसल्तनत की देन, ये पोशाक अब तो बहुतों को भाने लगी है । पुराने खद्दरधारी भी धोती छोड़ इसी को अपना लिए हैं । ये लदर-फदर धोती से बाहर निकल कर, ऊपर से बंडी डालकर टीक-टीका के साथ पंडित-पुरोहित भी आजकल खूब दिख रहे हैं इसी वेष में । ठेठ लहज़े में कहूँ तो मुझे भी अच्छा ही लगता है । अंग्रेजी हैंट-पैंट से तो लाख दर्जे अपनापन है इस पोशाक में । भारतीयता की थोड़ी-बहुत सुगन्ध मिल जाती है इसमें । वशर्ते कि पायजामा छोटे भाई वाला न हो और कुर्ता बड़े भाई वाला । कम्बिनेशन सही हो तो कोई बुराई नहीं । परन्तु ये कैमरा?

            शास्त्रीजी एकबार कैमरे को बड़े प्यार से टटोले और कहने लगे— झूठ-सच वाली पत्रकारिता रिपोर्ट तो रोज पढ़ता ही हूँ, आज मन किया कि अपनी आँखों से बाजार का मूड देखूँ और कैमरे में कैद करुँ । नोटबन्दी के बाद से ही देश भर में शोर मचा है – घनघोर आर्थिक मन्दी का । विरोधीदल चीख रहे हैं कि ऐसी मन्दी तो कभी आयी ही नहीं । पुराने वाले वित्तमंत्री भी सीकचे से बाहर झांक कर विक्ट्रिम साइन के साथ पत्रकारों को पंजा दिखा रहे हैं, यानी ग्रोथरेट 5% । ऐसे में धनतेरस का क्या होगा !

        अच्छा तो अब समझा- आप धनतेरस का ग्राउण्ड रिपोर्ट लेने निकले हैं ।

         बिलकुल सही समझे । धोती इसलिए नहीं पहना क्यों कि पत्रकारिता बहुत खतरे में है आजकल। कब कौन खदेड़ने लगे, कब कौन मार बैठे- कुछ कहा नहीं जा सकता । पायजामा से भाग-दौड़ में सहूलियत होती है। सबसे बड़ी बात है कि धोती से रुतबा भी थोड़ा कमजोर पड़ जाता है और हैंट-पैंट से मैं समझौता नहीं कर सकता, इसीलिए बीच वाला रास्ता निकाला ।

            तब, कुछ हासिल हुआ बाजार-मूड?  

            क्यों नहीं हासिल होगा । लगता है कि अर्थशास्त्री भी कुछ सठिया गए हैं या डिजानर पत्रकारों की तरह ग्राउण्ड रिपोर्टिंग के बजाय बेडरुम रिपोर्टिंग में ज्यादा विश्वास रखने लगे हैं ।  सोचो जरा— अकेले गया जैसे साधारण शहर में धनतेरस के दिन 125 करोड़ से ऊपर का टर्नओवर हुआ । 50 करोड़ के वाहनों की विक्री हुयी, 20 करोड़ के जेवरात और 10 करोड़ के इलेक्ट्रोनिक प्रोडक्ट बिके । फ्रिज़, कूलर, वाशिंग मशीन की भी जबर्दस्त बिक्री नजर आयी । फाइवर और चाइनाबोन के जमाने में फूल-पीतल के बर्तन भला किसे भाता है ! फिर भी 5 करोड़ का कारोबार वहां भी दर्ज हुआ । इसी हिसाब से पूरे देश का हिसाब लगा लो कि आर्थिक मन्दी कैसी है, गरीबी और बेरोजगारी कैसी है। आगे, दीपावली अभी बाकी ही है। और कौन कहता है कि शहर में जुआरियों की कमी है। एकाध अरब का टर्नओवर वहां भी होना तय है। भले ही वो अण्डरग्राउण्ड हो । किन्तु हमारे यहां ग्राउण्ड-अण्डरग्राउण्ड में ज्यादा फर्क ही कहां है। ये सब इच्छाधारी नाग की तरह है। और  ये डाटाकलेक्टर, रिपोर्टर, अर्थशास्त्री- ये क्यों नहीं कभी बतलाते कि हमारे यहां सबसे बड़ी समस्या है- ‘ have & have not ’ का गैप । ये गैप दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। रुपये दो रुपये की दवा के बिना किसी की जान चली जा रही है, तो दूसरी ओर ऐसे बहुत से लोग हैं जो सांप की केचुली की तरह 10-20 लाख की गाड़ियाँ बदल देते हैं । उनके लिए बनियान बदलना और गाड़ी बदलना एक जैसी घटना है। ऐसे विषधरों से ही देश को असली परेशानी है। किन्तु इसकी चर्चा कोई अर्थशास्त्री ने किया है कभी ? बाजारवाद ने भारतीय संस्कृति के मौलिक अस्तित्व पर प्रहार कर दिया है। चारों ओर इस भयंकर बाजारवाद के अट्टहसों की गूंज सुनाई पड़ रही है, जिसके बीच बाकी सबकुछ दबा कराह रहा है, सुबक रहा है। मुट्ठी भर पूँजीपतियों का ताण्डल झेल रहा है समाज । धरतेरस के नाम पर लूट हो गयी । लोग हँसते-हँसते लुटते गए । देखादेखी का नशा ही ऐसा है। बाजारवादियों (पूँजीपतियों) की  जाल में फंसते गए। कौन भरा, कौन खाली हुआ - दिमाग की खिड़की खोल कर झांक लो, कानों को कुरेद कर साफ कर लो और सुनो— ताण्डव और अट्टहास कितना भारी है भूखमरी और गरीबी पर ।
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Friday, 25 October 2019

ग्रीन पटाखाःलॉलीपॉप


ग्रीन पटाखाःलॉलीपॉप

          न्याय-व्यवस्था व्याकुल है । सरकारें भी व्याकुल हैं । पटाखे के व्यापारी भी व्याकुल हैं । दीपावली मनाने वाले भी व्याकुल हैं । बच्चे भी व्याकुल हैं । बच्चों के बाप भी व्याकुल हैं । देशभक्त भी व्याकुल हैं। राष्ट्रद्रोही भी व्याकुल हैं। आतंकी भी व्याकुल हैं । उनके पालनहार भी व्याकुल हैं। व्याकुलों का हुज़ूम भी व्याकुल है । इन शब्दों की बड़बड़ाहट से व्याकुल भोंचूशास्त्री ने अचानक कमरे में प्रवेश किया । आज न तो पानी मांगे और न चाय की इच्छा ज़ाहिर किए । मोढ़े पर बैठे और शुरु होगए ।

            जानते हो गुरु ! कहने को तो लोग कह देते हैं कि दशहरे से देवोत्थान तक हँसी-खुशी, पर्व-त्योहार का माहौल होता है । परन्तु मुझे लगता है कि ये सरासर गलत है । वास्तव में इन दिनों सबसे अधिक व्याकुलता का माहौल होता है । न कायदे से शहर-बाजार में निकला जा सकता है और न किसी जुलूस-जलसे का लुफ़्त लिया जा सकता है। पता नहीं कब किधर से रोड़ेबाजी हो जाये , कब किधर धमाका हो जाये । पता नहीं कब मज़हवी भांग का नशा उफान मारने लगे । कब प्रशासन की नींद खुल जाये, कब सरकार अंगड़ाई लेने लगे । भले ही व्याकुलता की जाति एक हो । पर व्याकुलों का थीम बिलकुल अलग-अलग होता है । बच्चे इसलिए व्याकुल हैं कि उन्हें नये कपड़े, खिलौने, मिठाइयाँ और पटाखे नहीं मिल रहे हैं । बच्चों के बाप इसलिए व्याकुल हैं कि ये सबकुछ उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है । सरकारें इसलिए व्याकुल हैं कि उसे पहले की अपेक्षा थोड़ी चुस्ती से काम करना पड़ रहा है, नहीं तो होशियार हो चुकी जनता कभी भी ठेंगा दिखा सकती है । पुलिस इसलिए व्याकुल है कि कमाई के नये झालरदार लॉपीपॉप लटके हैं इधर-उधर, किन्तु ज्यादातर जनता ऐक्टिवमोड में रह रही है । प्रशासन इसलिए व्याकुल है कि सरकारें एक से एक कानून हाइजैक और लॉन्चकर रहीं हैं , जिनका पालन कराना एवरेस्ट फ़तह जैसा है । न्यायालय इसलिए व्याकुल है कि दशहरा-दिवाली की छुट्टी तो ग्रान्डेड है , पर सब कुछ जानते हुए भी राम के जन्म का सबूत मांगना पड़ रहा है और मजे की बात तो ये है कि जन्म-स्थान का नक्शा फड़वाने का ठीकरा भी उसी के माथे फोड़ दिया जा रहा है। राष्ट्रभक्त इसलिए व्याकुल है कि अभी तक उसने राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं लिया है किसी यूनिवर्सीटी से है और राष्ट्रदोही इसलिए व्याकुल है कि वो बारबार नायाब मुद्दे ढूढ़-ढूढ़ कर ला रहा है और सब निरस्त होता जा रहा है। आतंकवादी इसलिए व्याकुल है कि उसका हुक्का-पानी बन्द होने का मुहूर्त निकल आया है और उसका पालनहार इसलिए व्याकुल है कि उसके पांव तले की धरती ही खिसक रही है ।

            शास्त्री जी कहे जा रहे थे, मैं सिर हिलाये जा रहा था ।

            ...इधर कुछ दिनों से पर्यावरण मुद्दा बना हुआ है । ग्रीन पटाखे से लेकर सिंगलयूज प्लास्टिक तक की बातें की जा रही है। पत्तियां छांटने की कवायद चल रही है, जड़ों का खाद-पानी जारी है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, हाईग्रीपिंग गाड़ियाँ जहरीले धुँए उगल रही हैं, बारुदों का अम्बार लग रहा है और हवन-समिधा से सफोकेशन हो रहा है । पत्तल बीनने वाले वारी, कुल्हड़ बनाने वाले कुम्हार भूखे मर रहे हैं और डिस्पोजल की फैक्ट्रियाँ खुल रही हैं । ठेला-खोमचा लगाने वाले, फुटपाथी आलू-प्याज बेंचने वाले पर जुर्माना लग रहा है और उसी आलू का चीप्स चारसौगुने दाम में बेचने का लाइसेंस मुहैया कराया जारहा है । रातों-रात नोटबन्दी हो गयी, चुटकी बजाकर सत्तर साल पुराने मेहमान 370 अपने बाल-बच्चों के साथ विदा हो गए, परन्तु धुंए उगलने वाली और प्लास्टिक बनाने वाली फैक्ट्री बन्दी पर विचार भी नहीं हो रहा है । धनतेरस के दिन सबसे अधिक गाड़ियाँ बिकेंगी । तोंद वाले उस पर छाती फुलाकर चलेंगे और पर्यावरण पर भाषण भी देंगे । एक नेता के आगे-पीछे सौ-सौ गाड़ियाँ दौड़ेगी, क्योंकि छोटे क़ाफिले से सन्तोष नहीं होता बड़े लोगों को । मुंह से लेकर साइलेंसर तक ज़हर ही ज़हर निकलेगा । जरा तुम ही बतलाओ गुरु ! फैक्ट्रियाँ बनायेंगी ही नहीं तो रेहड़ीवाला इस्तेमाल कहां से करेगा ?  सबसे बड़े कमाल की बात ये है कि मिट्टी से लेकर पहाड़ तक, तने-गुल्म-लताओं से लेकर वरगद-पीपल तक, कुएं से लेकर तालाब और नदियों तक, जल-थल-नभ  को पूजने वाले देश को पर्यावरण-रक्षण-सिद्धान्त और महत्व समझाया जा रहा है । हद हो गयी मूर्खता की । पर्यावरण-रक्षण-अभियान पर जितने पैसे बहाये जा रहे हैं, उतने में कितने स्कूल-अस्पताल खुल जाते । कितनों को रोजगार मिल जाता । कितने का कुपोषण दूर हो जाता । क्या एक ही संदेश काफी नहीं है? एक ही प्रचार काफी नहीं है — भारतीय संस्कृति को वापस बुला लो, बहुत सी समस्यायें खुद-ब-खुद हल हो जायेंगी । फिर न गंगा-अभियान चलाना पड़ेगा, न सिंगलयूज प्लास्टिक की बात करनी पड़ेगी और न ग्रीन पटाखे की बात । सामान से लेकर इन्सान तक सिंगलयूजयूज एण्ड थ्रों बना रख छोड़ा है पश्चिमी बयार के बहकावे में और बातें कर रहे हैं पर्यावरण संरक्षण की । हाइड्रो-प्रोजेक्ट के चक्कर में हाइड्रो-फोबिया की स्थिति बना डाली है।

बात तो आप बिलकुल सही कह रहे हैं शास्त्रीजी , किन्तु ये करोड़ों-करोड़ का माल डम्प पड़ा है शिवकाशी से दिल्ली-पटना तक और प्रशासन दुकानों पर अंकुश लगाये बैठा है । भला उन फैक्टी मालिकों और व्यापारियों का क्या होगा जिनकी पूँजी फंसी है ? बेरोजगारी बहुल देश में उन कामगारों का क्या होगा, जो इस धन्धे में लगे हुए हैं ? बच्चे की हसरत भरी उन मुस्कानों का क्या होगा, जो पटाखों के फेहरिश्त लिए खड़े हैं अपने पापाओं के पास? 
   
शास्त्रीजी एकदम झल्ला गये मेरी बातों से— तुम भी न कमाल की बात करते हो गुरु ! हेरोइन-गांजे-अफीम के धन्धेबाज, ज़हर के धन्धेबाज , दारु के धन्धेबाज, सुपारीकीलर, चोर-पॉकेटमार...सबके सब तो बेरोजगार ही हो जायेंगे न यदि कानूनों का सख़्ती से पालन होने लगे? तो क्या चाहते हो इन सबको अपना धन्धा चलाते रहने की खुली छूट दे दी जाये ? कोई भी नियम बनेगा, सख़्ती से उसका पालन होगा, तो थोड़ी कठिनाई तो झेलनी ही होगी न । हमें अपनी बुरी आदतें छोड़नी होंगी । गलत परम्पराओं को त्यागना होगा । घी-तेल के शुभकारी दीए जलाकर दीपावली मनाने की परम्परा रही है हमारी । बारुदी धुँए के गुब्बार पता नहीं कब भर गए हमारे ज़ेहन में ! इसे तो निकालना ही होगा । वरना प्रकृति दण्ड दिये बिना मानेगी नहीं ।  हम नहीं, हमारे की भी चिन्ता करनी होगी और हमारे का दायरा बहुत बड़ा है हमारे देश में — 
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् आब्रह्मभुवनालोकादिदमस्तु तिलोदकम्...वाले सिद्धान्त प्रदाता हैं हम ।  

शास्त्रीजी के तर्क ने निरुत्तर कर दिया मुझे ।
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Tuesday, 22 October 2019

ज़मीर वाला स्टॉल

ज़मीर वाला स्टॉल

एक पड़ोसन ने दूसरे पड़ोसन को बतलाया कि शहर में आज एक नया सा स्टॉल लगा है । किसी शहर में स्टॉल का लगना कोई नयी बात नहीं है । किन्तु नया सा सुन कर मेरी श्रीमतीजी के भी कान खड़े हो गये। छज्जे से थोड़ा और लपक कर पूछना चाही तो, दोनों पड़ोसिने आपस में कुछ इशारेबाजी की । फिर एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरायी भी ।

आप जानते ही होंगे कि इशारों में शब्द नहीं हुआ करते,पर शब्द-शक्ति बेहिसाब हुआ करती है। मेरी पत्नी उस अचानक के आघात से मर्माहत हो गयी,किन्तु उत्सुकता भी ऐसी बला है कि दबाये नहीं दबती। अतः होठ सिकोड़ कर, आहत से हताहत के वजाय, राहत-सा भाव दिखाकर, पूछने की हिम्मत जुटाने लगी । वो जानना चाहती थी कि स्टॉल कहां और किस चीज की लगी है ।

पर जवाब गोल-मटोल सा मिला— तुम तो कभी किसी मॉल-सॉल में आती-जाती नहीं। वैसे भी मॉल जाना,रोज नये-नये स्टॉल से खरीदारी करना सौ-दो सौ रुपल्लों से थोडे जो होता है । वहां ज्यादातर स्वाइप मशीनें होती है और उसे इस़्तेमाल करना सबके बस की बात नहीं । किराये की छत के नीचे बाल पका लेने वालियों के लिए न तो मॉल होता है और न स्टॉल ।

बात बहुत बड़ी थी । थोड़ी चुटीली भी। किन्तु ज्यादातर सच चुटीला ही हुआ करता है। परन्तु इसमें सच की गलती कहां है । वो तो उसका स्वभाव है । खैर।

ऑफिस से घर आते ही, रोज की तरह बिना दूध वाली चाय परोसने से पहले देवीजी ने कहा— सुनो न जी ! शहर में शायद कोई नया-सा स्टॉल लगा है । आज मेरा भी मन हो रहा है। चलो न जरा देख-घूम आवें। खरीदारी करने पर न, पैसे खरच होंगे । मैं रिक्शे के लिए भी नहीं कहूंगी।  

पत्नी की उत्कट इच्छा और चेहरे पर विखरे उतावलेपन के अन्दर दुबकी, किसी दुखते रग की टीस को भांपने में मुझे जरा भी देर न लगी । बेचारी कभी कुछ कहती-फ़रमाती ही कहां है। आजतक कभी लिप्सटिक भी तो लाकर नहीं दिया है मैंने । कुल जमा दो साड़ियों में एक बाहर अलगनी पर सूखती होती है और दूजी वदन पर । अपने पायज़ामे-कुर्ते का भी वही हाल है । शादी में मिले ससुराली जूते में ऑरीजिनल स्टीचिंग ज्यादा है या कि पंचिंग— कहना मुश्किल ।  ऐसे में हॉल-मॉल-स्टॉल...!
परन्तु इन निरर्थक सी बातों पर विचार करने से बेहतर लगा कि उसकी मुरादों को आज पूरा ही कर डालूं । बोतल वाली लीकर तो बड़े लोगों के फ्रिज़ों में हुआ करती है, कप वाली लीकर की बात भी भूल गयी - मुझे भी और उसे भी ।  जीवन में बहुत बार ऐसा होता है कि कुछ न कहना, बहुत कहने से भी कहीं ज्यादा होता है। आज भी कहने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था । पास बुलाकर उसके बदरंग हो रहे बालों को स्नेह से सहलाया और बिना कुछ कहे, हाथ पकड़ कर बाहर निकल पड़ा ।
चौक के करीब पहुँचा तो चारो ओर उत्सव सा माहौल मिला । लोग सज-धज कर चले जा रहे थे। सारे अननेचुरलों को बटोर कर नेचुरल बनने की होड़ में, घुंटे-पिटे आईब्रो पर आईलाइनर, आईपेन्सिल, आईशेडो, आईलेंस, मस्करा, मेरुन लिपस्टिक और न जाने क्या-क्या पोतपात करके घर से निकलने वालियों की भीड़ में मैं थोड़ा असहज महसूस कर रहा था खुद को और वो असमय में ही बूढ़े होरहे बालों को आँचल से ढकने की कोशिश में लगी थी ।

आज़ाद पार्क के करीब पहुँचा तो कनातों की गुलामी में कैद कुछ स्टॉल दीख पड़े । सबसे पहले वाले स्टॉल पर जरा रुका ।  एक बड़े से कैनवैसपर मनोहारी चित्रकारी थी- एक नवयौवना की । चेहरे को निहारते-निहारते पैरों की ओर आया तो एक प्राइसटैग दीखा , जिस पर लिखा था - कीमत सिर्फ बिकाऊ की ही आँकी जा सकती है।  उसके बगल में मोटे अक्षरों में कुछ पंक्तियां थी— मैं बनी नहीं हूँ...बनायी गयी हूँ....तुमने मुझे बनाया है....मैं ज़िश्म बेचती हूँ, ज़मीर नहीं। पढ़ कर सिर झन्ना उठा ।

आगे बढ़ा, दूसरे स्टॉल की ओर । वहां तो कोई चित्र भी नहीं था, कैनवैस रिक्त पड़ा था। प्राइसटैग पर लिखा था— अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह- ये सब यदि है तुम्हारे बटुये में तो हिम्मत करके हाथ आगे बढ़ाओ,अन्यथा पैर पीछे खींच लो।   बात कुछ अज़ीब सी लगी,परन्तु होठों पर इत्मिनान और सुकून वाली मुस्कान तैर गयी ।

जरा और आगे बढ़ा । लागातार कई स्टॉल बड़े करीने से अगल-अलग रंगों की छतरी ओढ़े खड़े थे। डिस्क्रिप्शन और प्राइसटैग भी लगे हुए थे वरीयता क्रम से— न्यायाधीश, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, ईंजीनियर, डॉक्टर, विश्वविद्यालयों के परीक्षा-विभाग, सरकारी स्कूल के माटसाब, सचिवालय के किरानी, जिलास्तर के किरानी, प्रखंडस्तर के किरानी, शिक्षावोर्ड, मठाधीश, पंडा-पुरोहित, पुलिस, प्रशासन, पत्रकार... और सबसे अन्त में जो कुछ लिखा था उसे पढ़ना-देखना बड़ा कठिन हो रहा था, क्यों कि लोगों की भीड़ वहां सबसे ज्यादा थी ।  खुशबुदार स्प्रे में डुबोया हुआ रुमाल नाकों पर जकड़ कर बांधे हुए लोग लाइन में धक्के खा रहे थे । थोड़े साधारण से दीखने वाले लोग जेब में ऑडोनिल का पैकेट लिए हुए भी लाइन में खड़े दीखे। बदबू भीड़ के कारण थी या कि वहां स्टॉल पर रखे कुछ कॉन्टेनरों के कारण – बात समझने में थोड़ी मस़क्कत करनी पड़ी । मेरे पास तो ऑडोनिल भी नहीं था । पता होता पहले से तो कम से कम फिनायल की गोली ही जेब में धर लिया होता ।

खैर,अब आ गया हूँ तो बिना देखे-दिखाये तो वापस लौटना भलमनसी नहीं है। आठ-दस बार बाबा रामदेव वाला उपचार किया । पत्नी को भी आहिस्ते-आहिस्ते अनुलोम-विलोम करने का सुझाव दिया।  

लाइन में खड़े, ये सब करते-कराते, धक्के खाते स्टॉल के बिलकुल करीब पहुँचा तो बड़ा सा कैनवास दीखा – वो नावनुमा टोपी और घुटने से काफी नीचे तक बगुला मार्का कुर्ते-पायजामे वाला लकदक सा बिलकुल खुश़मिज़ाजी तस्वीर । प्राइसटैग पर लिखा था -   कोई कीमत नहीं...बिलकुल मुफ़्त...बड़ी कृपा होगी - अंगुली पर स्याही लगा लें एक बार...और कहें तो उसके बदले अपना पायजामा उतार कर पेट के बल उकड़ू लेट भी जा सकता हूँ...बस मेरे भाई ! एक बार की तो बात है...स्याही लगवा लो अपनी अंगुली पर...।
उबकायी सी आने लगी । सिर झनझनाने लगा । पत्नी का हाथ खींचते हुए, भीड़ से बाहर आया— ज़मैयत मिली या कि ज़मीर चाहिए ?  
उसकी आँखों में आँसू छलक रहे थे। गला भर्राया हुआ था । लपक कर मेरे सीने से आ लगी—  ‘ मुझे माफ कर दो।
उसकी पीठ थपथपाते हुए मैंने कहा— तुम्हारी गलती ही कहां है ! कसूर तो मेरा है...लोकतन्त्र में ज़मीर ही तो सबसे पहले गिरवी रखना पड़ता है , सो मैं कर नहीं पाया ।
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नोटः- ज़मैयत= सुकून या मन को सन्तोष मिलना । ज़मीर = अन्तरात्मा

Tuesday, 8 October 2019

धराशायी रावण का यक्षप्रश्न


धराशायी रावण का यक्षप्रश्न
             पटना के गांधी मैदान में दहन के लिए खड़ा किया गया रावण का पुतला एक दिन पहले ही धराशायी हो गया । खबरिया चैनलों का ज़ुबान सूख रहा है सुपरसोनिक की रफ़्तार से एक ही बात का रट लगाते हुए । कल के अखबार का हेडलाइन बनना भी तय है । लग रहा है मानों स्काईलैब गिर गया है ।

आनन-फानन में एक ख़बरनवीश पहुँच गया चित पड़े पुतले के पास और माइक उसके मुंह के पास ले जाते हुए सवाल दागा— कहो रावण ! कैसा लग रहा है इस समय ?”

पहले तो तुम अपनी ज़ुबान सम्हालो । ये वाली भाषा पुलिसवालों के लिए छोड़ दो, जिन्हें लाइसेन्स मिला हुआ है अभद्र भाषा का । निस्पक्ष पत्रकार को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती ।  इतना सा नसीहत देकर, रावण ने जोर से अट्टहास किया । दशानन के सभी मुंह से एकसाथ निकले जोरदार अट्टहास से घबराकर बेचारे खबरिये को दस कदम पीछे सरकना पड़ा । डर के मारे माइक हाथ से छूट गया । अट्टहास बड़ा ही डरावना था, किन्तु ज्यादा लम्बा नहीं । इससे थोड़ी राहत मिली ।

हिम्मत जुटा कर फिर नजदीक आया और पहलेवाला सवाल दुहराया । इस बार रावण मुस्कुराया । हालाकि उसकी मुस्कुराहट भी कम घातक नहीं थी । कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हँसी या मुस्कुराहट ही अधिक घातक हो जाती है । इसका पुराना अनुभव है आर्यावर्त को । द्रौपदी की ऐसी ही हँसी महाभारत रचा गयी थी ।

जवाब के बदले रावण का अगला सवाल था— आँखिरकार हर साल मेरा पुतला क्यों जलाते हैं लोग, क्या मिलता क्या है इससे ? जरा सोचो, मैं तो अपने जमाने में अकेला था । मेरा न कोई जोड़ था, न तोड़ । मैंने सिर्फ एक सीता का अपहरण किया था । वो भी बिलकुल जान-बूझ-समझ कर । कामातुर होकर नहीं । क्यों कि कामातुर के पास इतना धैर्य नहीं होता । वह सबकुछ जल्दबाजी में कर गुज़ारना चाहता है, जबकि मुझे पता था कि इस पापी शरीर से भगवद्भक्ति हो नहीं सकती, सो दूसरा रास्ता अपनाया बैर वाला - अपनी सद्गति के लिए । मुझ पर राम की कृपा हो गयी । राम के साथ-साथ मैं भी अमर हो गया । जब-जब राम याद किये जायेंगे, मैं याद आ ही जाउँगा । मेरा उद्धार कर राम ने एक संदेश दिया समाज को । किन्तु मेरा पुतला क्यों जलाया जा रहा है - समझ नहीं आता । सचपूछो तो मैं मरा कहां हूँ ! अमर कभी मरा नहीं करते । रक्तबीज की तरह अनेक रुप धारण करके जन-जन के तन-तन में जा घुसा हूँ। आश्रम, मठ, मन्दिर, शहर-बाजार, संसद तक कहीं भी अछूता नहीं है मेरे प्रभाव से । अपहरण, बलात्कार, हत्यायें रोज दिन बढ़ रही हैं । एक से एक घातक हथियारों के ज़खीरे बटोरे जा रहे हैं। जिधर देखो युद्ध का माहौल है । लहू की प्यासी जीभें लपलपा रही हैं । काली भी शरमा रही हैं ।  प्रेम-भाईचारा सिर्फ स्लोगन बन कर रह गया है।  मैं एक था । एक राम आये और काम तमाम कर दिये मेरा । किन्तु अब तो राम को भी अनेक रुप लेकर अवतरित होना होगा । क्या पता राम भी मार पायें या नहीं इन अनेक रावणों को, क्यों कि वो रावण मूर्त था और ये रावण अमूर्त है । इस अमूर्त रावण का फोटो कहीं मिल जाये तो छाप दो हेडलाइन बनाकर सभी अखबारों में । ननस्टॉप न्यूज बनाकर दिखाते रहो चैनलों पर । काबिल पत्रकार हो तो ढूढ निकालो उस रावण को । समूल नाश करने की कोशिश करो उस रावण का, फिर पूछने आना मेरे पास कि कहो रावण कैसा लग रहा है ।  

Saturday, 5 October 2019

डीजे की दुकान::डीम का फ़रमान


डीजे की दुकान::डीम का फ़रमान

    भोंचूशास्त्री आज दरवाजा खटखटाने के वजाय, खुली खिड़की से ही हांक लगाये— अरे गुरु ! किसी डी.जे.वाले से जान-पहचान रखते हो? मुझे हाईपावर वाला आठ-दस डी.जे.चाहिए । लगन-त्योहारों का दौर शुरु होते ही इनका भाव बढ़ जाता है ।  सारा शहर घूम लिया, एक भी नहीं मिला खाली । इतना हैवी डिमान्ड तो पितृपक्ष और नवरात्र में पंडितों का भी नहीं हुआ कभी ।
क्या बात है ? अन्दर तो आइये । डरिये मत । श्रीमतीजी अभी तीन दिनों बाद आयेंगी मैके से । - कहते हुए मैंने किवाड़ खोल दिया । 

अन्दर घुसते हुए बोले— सोचता हूँ इन्सटॉल पर कहीं से दिला दो तो, मैं भी आठ-दस सेट खरीद लूं।

तो क्या अब आप जजमनिका छोड़कर डी.जे.चलायेंगे ?

अरे नहीं गुरु ! डी.एम.- एस.पी. की कोठियों के आगे बांस गाड़ कर दो-चार दिन बजाना चाहता हूँ एक दम से लाउडब्वॉस में । ताकि इन्हें पता चले कि 75 डेसीबल और 750 डेसीबल साउण्ड में क्या फर्क होता है । और कनफोड़ू आवाज से जनता को कितना कष्ट होता है । - शास्त्रीजी आसन जमाते हुए बोले ।

मैं समझा नहीं- आप कहना क्या चाहते हैं । 

शायद तुम्हें नहीं मालूम - सप्ताह भर पहले ही शहर के गणमान्य लोगों के साथ जिला प्रशासन की बैठक हुयी थी, जिसमें छोटे विचार-विमर्श और लम्बी नोंक-झोंक के बाद फ़रमान जारी किया गया था कि पूजा-पण्डालों में पूरी तरह से स्वास्थ्य, सदभावना और पर्यावरण सुरक्षा का ध्यान रखा जाये । नियम का उलंघन करने वालों पर सख्त कारवाई होगी । मूर्ति बैठाने के लिए बाकायदा लिखित परमीशन लेना होगा, हर पंडाल में सी.सी.टी.वी. कैमरे भी लगाने होंगे, ताकि महिलाओं का आत्मबल बढ़े और 75 डेसीबल से ऊपर का साउण्ड न हो, क्यों कि हमारे यहां नर्वससिस्टम  और सर्कुलेटरीसिस्टम की रोगियों की संख्या काफी बढ़ गयी है । अब तो डायबिटीज वालों को भी हाईसाउण्ड से बेहोशी आने लगी है । और हां, अश्लील गाने भी न बजाये जायें। स्वच्छ-भारत अभियान और पर्यावरण विषयक बैनर-पोस्टर भी पंडालों में लगाने होंगे । सिंगल यूज प्लास्टिक का भी संदेश देना है आयोजकों को... ।

सो तो ठीक है। प्रशासन ऐसा कुछ न कुछ हर साल मीटिंग-सीटिंग करता है । विभिन्न अखबारों में खबरें भी छपती हैं । सरकारी अपीलों का विज्ञापन भी आता है ।

इसीलिये न कहता हूँ- तुम नहीं समझोगे असली बात । मीटिंग-सीटिंग तो सिर्फ ईटिंग-फिटिंग-सेटिंग  के लिए होता है । फोटू खिंचवाने, थोबड़ा दिखाने और विज्ञापन में कमीशन खाने के लिए होता है। ये सरकारी विज्ञापन न मिलें तो कितने चैनल और अखबारों का खटिया खड़ा हो जाए । और एक राज की बात बताउँ तुम्हें—आजकल देवी-देवता भी बिना डी.जे. और पॉप-रॉकसॉंग के खुश ही नहीं होते । दारु-बकरा तो पहले भी उन्हें अच्छा लगता था, पर अब ये सब भी भाने लगा है । क्या समझते हो - ये सारे नियम-कानून पालन करने के लिए बनाये जाते हैं ? असली बात तो ये है कि नियम-कानून बनाये ही जाते हैं सिर्फ तोड़ने और उलंघन करने के लिए । कानून तोड़ने का समर्थन और चलन तो गांधीबाबा ने भी किया था कि नहीं ?

क्या बात करते हैं शास्त्रीजी- ओ तो अंग्रेजों के खिलाफ नमक आन्दोलन शुरु किया था गांधी ने । खादी की हिमाकत की थी और अंग्रेजी सामानों के वहिष्कार का नारा दिया था । रामधुन गाकर, अनशन-धरना प्रदर्शन किया था ।

अरे हां गुरु ! तुम तो केवल सुने हो । मैंने तो देखा, भोगा और झेला भी है—ये सब । वह रामधुन ही अब रावणधुन बन गया है । अनशन, धरना, प्रदर्शन- यही तो आज लोकतन्त्र का कोढ़ बन गया है।  जाएज़-नाजाएज़, सही-गलत से कहां मतलब रहा अब । एनरॉयड पर गर्दन टेढ़ी किये, बिना हेलमेट के 80-90 के स्पीड में बाइक चलाओ, गिरो, मरो, मारो और फिर धरना-प्रदर्शन करके मुआवज़ा भी मांगो । सिगनल तोड़ो, जेल तोड़ो, ए.टी.एम. या कि लॉकर तोड़ो—सब सही है लोकतन्त्र में । और ये जो सी.सी.टी.वी. की बात करते हो - क्या तुम्हें नहीं पता कि अपराधी सबसे पहले D.V.R. पर ही अटैक करते हैं ।  हालाकि ज्यादातर कैमरे बीमार ही रहते हैं या ऐन मौके पर उन्हें ज़ुकाम हो जाता है।

 फिर भी ऐहतियात के तौर पर तो नियम-कानून बनाने ही पड़ते हैं न  — मैंने कहा ।

अरे गुरु ! नियम बना कर तकिये के नीचे रख देने से क्या होता है भला ! दवा का पर्ची लिखा जाने से रोग ठीक हो जाता है क्या ? नियम-कानून जो बनता है, उसका सख़्ती से पालन नहीं होगा जब तक, तबतक ज़मीनी सुधार कहां होगा भला ? और ज़मीनी परिणाम के लिए हिम्मत और ज़ज्बा की जरुरत होती है ।

तो आखिरकार किया क्या जाये शास्त्रीजी ?

करना कम, समझना ज्यादा है । सच पूछो तो लोकतन्त्र की मर्यादाओं और सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, जरा तानाश़ाही तर्ज़ पर सख़्ती और अनुशासन की जरुरत है । देख रहे हो न कैसे बिलबिला रहे हैं पुराने पिल्ले ? कहने को हम पढ़े-लिखे और काबिल है, किन्तु उससे कहीं अधिक हम ज़ाहिल, बदमिज़ाज़ और बदतमीज़ भी हैं । और ज़ाहिर है - ज़ाहिलों पर अनुशासन का डंडा थोड़ी बेरुखी से ही चलाना होता है । क्यों कि उसे लोकतन्त्र से आधा-अधूरा परिचय है सिर्फ । लोकतन्त्र के एक ही पक्ष का ज्ञान है उसे । लोकतन्त्र का दुरुपयोग जानता है वह, सदुपयोग नहीं । जरा, दिमाग की खिड़की-रौशनदान  खोलकर जान-समझ लो- ये साम्यवाद और समाजवाद कहीं बाहर से नहीं आया है, आर्यावर्त की रग-रग में दौड़ने वाला लहू है ये । ये हमारे D.N.A. में रसा-बसा है । विदेशियों के झूठे ठप्पे लगे हैं सिर्फ इसपर। असली वाले सोशलिज़्म और कम्युनिज़्म की सही परिभाषा का जिस दिन ज्ञान हो जायेगा उस दिन भारत सच में महान हो जायेगा । जिस दिन ये समझदारी आ जायेगी कि मेरे पड़ोस में कोई दिल का मरीज़ भी हो सकता है, किसी के यहां मौत का मातम भी मन रहा होगा, किसी के यहां आज चूल्हा नहीं जला होगा, मेरे कीचन में पकते बासमती चावलों का सुगन्ध किसी भूखे की भूख को और भी ललकार रहा होगा—तो उसी दिन भारत महान हो जायेगा । फिर उस दिन किसी डी.एम.-एस.पी., मीटिंग-सीटिंग की बात ही बे-मानी हो जायेगी । स्वच्छ-भारत, पर्यावरण रक्षा और थूकने-मूतने के तरीके का विज्ञापन करके जनता के धन में आग लगाने की जरुरत ही नहीं रह जायेगी । और न अलग से किसी बुद्धिजीवी की ही जरुरत रह जायेगी, क्यों कि सभी बुद्धिजीवी ही होंगे उस दिन । बदमिज़ाजी और ख़ुराफाती कोई रह ही नहीं जायेगा । । वन्देमातरम्।।

Saturday, 28 September 2019

खबरों की किल्लत Vs विज्ञापनों की बढ़त


बरों की किल्लत Vs विज्ञापनों की बढ़त

            खबर की सही परिभाषा क्या है और विज्ञापनों की सीमा क्या है 

— भोंचूशास्त्री की चाय-गोष्ठी का समसामयिक मुद्दा यही था आज । आदतन, 

दरवाजे पर दस्तक के साथ ही शुरु हो गए, बिना कॉमा-फुलिस्टॉप के—

एक ओर Howdy Modi और U.N. महासभा का 74वां अधिवेशन का गर्मागरम दौर चल रहा है, जिस पर मित्र-शुत्रु सभी देशों की निगाहें टिकी हैंगांधी को राष्ट्रपिता का खिताब कब, किसने, क्यों, किन हालातों में दिया था, RTI के तहत सवाल पूछे जाने पर भी समुचित जवाब नहीं मिला आज तक देश-दुनिया को, किन्तु मोदी को ट्रम्प ने राष्ट्रपिता कह दिया इतनी बड़ी सभा में, तो बहुतों के सिर फटने लगे और पिछवाड़े में भी खुजली होने लगी, ऐसी वाली खुजली जैसे कुत्ते के पिछवाड़े में पेट्रोल डाल देने पर होती है । ऐसा लगा मानों उनके ही बाप कहकर ट्रम्प ने उन पर पैदायशी तोहमत लगा दिया हो । शब्दशास्त्री बतलाते हैं कि पिता तो अनेक हो सकता है किसी का, किन्तु बाप सिर्फ और सिर्फ एक ही । क्यों कि पा रक्षणें धातु से पिता बनता है, जिसका मौलिक अर्थ होता है- पालन-रक्षण करने वाला, जब कि वपन-कार्य सम्पन्न कर, उत्पत्ति में सहभागी को वाप कहा जाता है ।

            शास्त्रीजी के श्रीमुख से शब्दशास्त्री की बात सुन कर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ और मेरी जानकारी में भी जरा इज़ाफा हुआ । मैं जानता था कि शास्त्रीजी का बेरोकटोक नियमित आना तबतक जारी रहेगा, जबतक मेरी श्रीमतीजी मायके में रहेगी, अतः उनके लिए भी चाय बना ही दिया था । बैठते के साथ ही प्याला थमा दिया और चटाई पर पसरते हुए उनकी वार्ता, समीक्षा, संदेशों और उपदेशों के लिए खुद को संयत करने लगा ।

            चाय की चुश्की लेते हुए कहने लगे — देखो गुरु ! मैं तो अखबार खरीदता नहीं । साढ़ेतीन रुपये पीस को सात रुपये किलो में बेचने के लिए भला कौन खरीदे । खबरें तो कुछ खास होती नहीं उनमें । अब आज का ही नामी अखबार देखो न- 16+4 पेज में मुकम्मल 11 पेज तो विज्ञापनों और टेन्डरों से भरा है । जरा तुम्हीं सोचो ये जापानीतेल या  हेमपुष्पा का  विज्ञापन देख कर मैं भला क्या करुंगा बिन बीबी-बच्चों वाला अधेड़ इन्सान ! आनेवाले धनतेरस में न मोटर-सोटर खरीदने की औकाद है और न ही कोई टेन्डर भरने का जुनून । आगामी किसी चुनाव में खड़े होने का भी कोई प्रोग्राम नहीं है । फिर ऐसे अनाप-सनाप विज्ञापनों से भरे कागज के पुलिंदे को, क्या इतनी अहमियत देना, जिसके पास खबरों की इतनी किल्लत है । तुम जानते ही हो कि मेरे पास अभी भी वो ब्लैक-एण्ड-वाइट वाला पोर्टेबल टीवी है । कभी फुरसत में फिलम-उलम देखने का जी कर गया तो ऑन कर देता हूँ, परन्तु वहां भी वही माज़रा –  तीन घंटें का फिलम देखने के लिए साढ़ेचार घंटे गंवाने पड़ते हैं । ताजा-तरीन खबरों के लिए चैनल बदलो तो वहां भी कुछ एक अपवादों को छोड़कर बाकी सबकी वही दशा है—हर दो मिनट पर तीन मिनट का ब्रेक, एकदम सरकारी दफ्तरों के बाबुओं की तरह, जो बामुश्किल आध घंटे टेबल-टिका करके, चाय की कैंटीन में तफ़रीह के लिए चले जाते हैं और घंटे भर बाद तश़रीफ लाते हैं । इन खबरदारों और खबरदाताओं की एक और ख़ासियत है कि ज्यादातर ग्राउण्ड रिपोटिंग के बजाय अन्डरग्राउण्ड रिपोर्टिंग रहती है- एकदम से अन्डरबियर स्टाइल वाली ।

            ये अन्डरग्राउण्ड रिपोर्टिंग क्या होता है शास्त्रीजी?

            आधी प्याली एक ही बार में सटाक से सुड़कते हुए बोले— तुम भी कमाल करते हो गुरु ! क्या तुम्हें ये भी नहीं पता कि निन्याब्बे फीसदी खबरें बेडरुम या कॉफीहाउस में बैठ कर लिखी जाती है । अलग-अलग गुटों के पत्रकार सम्मेलन हुआ करते हैं कॉफीहाउसों में, जहां इकट्ठे निर्णय लिये जाते हैं कि आज इसको उछाल देना है, आज इसको पटक देना है- एकदम से सेन्सेक्स के  बुल-वियर वाले अन्दाज़ में । किस खबर को हाईलाइट करना है और किस खबर का गला घोंट देना है, ये सब निर्णय वहीं बैठकर होता है । अब भला तुम्हीं बताओ- खबरों की सही परिभाषा क्या है? क्यों कि पाणिनी और यास्क के जमाने में तो अखबार छपते नहीं थे, इसलिए पूरी जानकारी जुटा नहीं पा रहा हूँ । अमरकोष भी देखा, शब्देन्दुशेखर भी ।  किन्तु वहां भी नहीं मिला- न खबरों की परिभाषा न तरज़ुमा । अब तुम ही मेरी शंका का समाधान करो गुरु ।  
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