Wednesday, 9 January 2019

पत्तियाँ छांटने की कवायद


                                पत्तियाँ छांटने की कवायद

          जड़ सींचने की शिक्षा हमारे बुज़ुर्ग लोग दिया करते थे । जड़ ही सुरक्षित न रहा यदि, फिर पत्तियों और तनों का क्या होगा ? जड़ गया कि सब नेस्तोनाबूद ।

बात में दम भी है ।

किसी ऐसे ही जड़ को जड़ से समाप्त करने की प्रतिज्ञा ली थी आचार्य चाणक्य ने । ये कहने की जरुरत नहीं कि वे मगध-विभूति थे । और आज भी समीचीन हैं । भविष्य में भी रहेंगे ।

किन्तु बड़े खेद की बात है कि कौटिल्य के उसी मगध या जरा विस्तार से कहें तो ऐतिहासिक पाटलीपुत्र या और विस्तार दें तो हमारे बिहार में जड़ पर प्रहार किये वगैर, पत्तियों की छंटायी की कवायद चल रही है । हालाकि बिलकुल पहली बार ऐसा किसी राज्य में हुआ है- सो बात नहीं है । ऐसे प्रयास, सुप्रयास, दुस्प्रयास कई बार चलते रहे हैं—अलग-अलग कार्यों के लिए, अलग-अलग प्रदेशों में । ये नजदीक होने के चलते थोड़ा बड़ा दीख रहा है- वो जैसे मैग्नीफाइंग-ग्लास से दीखता है न, ठीक वैसा ही ।

 जग-जाहिर है कि छोटे-बड़े आकार देने का काम मीडिया के जिम्मे होता है । इसका मुंह मीठा रहेगा तो करेला भी कलाकन्द सा स्वाद देगा, अन्यथा कलाकन्द भी खाने की कोई चीज है ! बहुत ही गैस बनाता है पेट में पहुँच कर ।

    खैर, बात मैं शुरु किया था पत्तियों की कटाई-छंटाई से । क्यों कि नयी वाली चाणक्य नीति यही है- पत्तियाँ छांटते रहो, जड़ को तो छूना भी मत , क्यों कि सबका जड़ वहीं है- तुम्हारा भी हमारा भी । नेता का भी, अनेता का भी । विजेता का भी, अविजेता का भी । पक्ष का भी , प्रतिपक्ष का भी । एक ही ईश्वर के अनेक रुपों की तरह, एक ही कारण का सारा कुछ विस्तार भर है ।

  दरअसल हमारे सरकार बहादुर के पास वो ‘’सायन्स-रिव्यू’’ वाली मैगज़ीन अभी हाल में पहुँची है शायद । छपी तो बहुत पहले थी, वैज्ञानिकों ने अगाह तो शुरु में ही कर दिया था- मेरिट-डिमेरिट का, परन्तु वो क्या है न कि जानकारी या कहें सूचना जरा देर से मिली कि प्लास्टिक-पोलीथीन आदि पर्यावरण के लिए बहुत ही हानिकारक हैं । इसी तरह शराब भी व्यक्ति और समाज के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । और यही कारण है कि नौकरशाहों को जरुरी फाइलें छोड़ कर महुए के पेड़ गिनने और पड़ोसी राज्यों से आने वाली ट्रेनों में ड्यूटी लगा दी गयी है । इतना ही नहीं अकसर खा-पीकर मस्त रहने वाले नगरनिगम-कर्मी भी चैतन्य हो गये हैं । सड़क-गली-नुक्कड़ों पर बड़े-बड़े वोर्ड लगाये गए हैं पर्यावरण-पुराण-सूत्र लिखकर, तथा जनता को जागरुक करने के लिए नाटकों के रंगारंग कार्यक्रम भी चलाये जा रहे । आखिर जागरुक जनता को करना है, तो इसमें पैसा भी जनता का ही लगना चाहिए न ! इसीलिए  टैक्स के पैसे को पानी की तरह बहाकर,  एन्फ्रास्ट्रकचर के विकास के बजाय वौद्धिक-विकास यानी पर्यावरण की समझ पर प्रकाश डाला जा रहा है । बाजार जाते समय घर से झोला लेकर निकलने की नसीहत दी जा रही है । इसका प्रत्यक्ष लाभ तो हमें ये दीखता है कि झोले का व्यवसाय खूब विकसित होगा और आने वाले चुनाव के पहले काफी बेरोजगारों को रोजगार मिल जायेगा । पुराने अखबार की कीमत भी बढ़ेगी, क्यों कि वर्षों से ठोंगा बनाने का पिछड़ा हुआ सा व्यवसाय, फिर एकबार सिर उठाकर बाइज्जत जिन्दगी जी सकेगा ।

मजे की बात ये है कि आलू वाले को जुर्माना देना पड़ेगा पोलीथीन में आलू देने पर, किन्तु मल्टीनेशन कम्पनियों को उसी दस रुपये वाले आलू का चीप्स बनाकर 400 रुपये में बेचने पर ज़ुर्माने के बजाय बख़्सिश  देने का इन्तज़ाम है , क्यों कि बड़ी कम्पनियों के रैपर से पर्यावरण को कोई नुकसान होने का खतरा नहीं है- ऐसा शायद मंगलग्रह के एलीयन वैज्ञानिक ने दावा किया है । ठीक उसी तरह थानाप्रभारी को पूजा-दक्षिणा देकर दारु बेचने वा पीने से या वीवीआईपी लोगों द्वारा शराब का इस्तेमाल करने  से देश या समाज को कोई नुकसान नहीं होता – ठीक वैसे ही जैसे पंडितजी के पेट में जाकर अंडा भी शाकाहारी हो जाता है, उसी तरह औकाद वाले लोगों के हलक से उतर कर दारु भी गंगाजल हो जाता है ।

असल बात ये है कि आम आदमी को हमेशा अपने हद-वो-ज़द में रहना चाहिए , क्योंकि औकाद के लिए कद जरुरी है । 

किन्तु ये गम्भीर सी बातें मुझ नासमझ को समझ नहीं आ रही है कि पत्तियां छांटें या कि जड़ काटें ? क्या पोलीथीन बनानेवाली कम्पनियों को लाइसेंस देते समय सिरफिरी सरकारों को ये सोचना नहीं चाहिए था या फिर, बाजारों और गोदामों में छापेमारी करने के बजाय, सीधे कम्पनियों का प्रोडक्शन ही क्यों नहीं बन्द करवा दिया जाता ? जड़ कट जाने पर पत्तियां क्या खुद-व-खुद झड़-सूख नहीं जायेंगी ?

मंच पर भाषण देकर नहीं, मीडिया में फोटो छपवाकर नहीं, बल्कि बेडरुम में इत्मिनान से गाल या दिल पर हाथ धरकर सोचने की जरुरत है कि क्या शराब एक दिन के लिए भी बन्द हुआ है और क्या पोलीथीन भी बन्द हो जायेगा इस कवायद से ?  

मुझे तो ऐसा ही लगता है- सरकारी खजाने में शराब से मिलने वाले टैक्स का आना भले बन्द हो गया हो, पुलिस-प्रशासन के आय का एक नया ज़रिया खुल गया है, पीने-पिलाने वालों का क्रम उसी तरह जारी है और जारी भी रहेगा ।

ये कह कर मैं शराब या पोलीथीन का समर्थन नहीं कर रहा हूँ, बल्कि निर्णयात्मक सोच पर प्रश्न-चिह्न लगा रहा हूँ । कोई भी योजना बनाने से पहले उसके प्रत्येक पहलुओं पर गम्भीरता से विचार क्यों नहीं कर लिया जाता ? उतावले में बचकाने निर्णय लेकर, क्यों जनता पर थोप दिये जाते हैं?

क्या इन सवालों पर विधायिका के मदमस्त लोग विचार करेंगे कभी ?

और नहीं , तो फिर उन्हें चेत जाना चाहिए- जनता भी अपनी औकाद दिखाने को व्याकुल है ।

जय हिन्द ।

Tuesday, 1 January 2019

चौकी-चौका-चौक


                                चौकी-चौका-चौक

            वो क्या है न कि गोबर ठोंकने के लिए पहले भूसी मिलाकर गोल-गोल लोइयाँ बनाते हैं, फिर उसे किसी एक जगह पर आहिस्ते से थपकाते हैं और तब जोर से थाप मारते हैं सही जगह पर, ताकि गोइठा सही आकार लेले और तब तक चिपका रहे, जबतक उखाड़ा(हटाया) न जाये ।

            कुछ कहने से पहले, कुछ और कहना जरुरी सा लग रहा है । कुछ और का मैटर नहीं है मेरे पास, इसलिए जानी-पहचानी-पुरानी एक कहानी कहकर ही अपनी बात रखने की न्यू बना रहा हूँ ।

नेता और पंडित में बहुत मामले में समानता है । एक भाषण पिलाने को बेताब रहता है और दूसरा प्रवचन पिलाने को । भले ही भाषण किसी और ने लिखकर दिया हो, भले ही प्रवचन अभी हाल में ही कहीं सुना-पढ़ा हो, पर जल्दी से जल्दी किसी और को सुनाकर अपनी ज्ञान-गगरी को खाली कर लेना जरुरी ही नहीं अपरिहार्य समझता है ।

अनुभवी जनों का मानना है कि यदि ये ऐसा न करें तो पेट में गुड़गुड़ाहट सी होने लगती है, या हो सकता है विक्रमादित्य के वेताल वाली शर्त याद आ जाये- जानते हुए भी नहीं बोलोगे तो सिर फट जायेगा ।

नेता सदा चौक खोजता है और पंडित चौकी । या कहें तो दोनों चौक-चौकी की जुगाड़ में रहते हैं । चौकी यानी आम से थोड़ी ऊँची वाली जगह, जहां कोई खास उचक कर आसीन हो सके और अपने भीतर के गर्द-गुब्बारों को बाहर निकाल सके । भले ही उससे किसी का भला हो या बुरा । अब कहने वाला, भला कब सोचता है कि सुनने वाले पर क्या असर होगा उसकी बातों का । दरअसल असर-बेअसर तो सुनने वाले का क्षेत्र है न – वो सुने, ना सुने । सुन कर वहीं छोड़ जाये, अथवा घसीट कर घर ले जाये । हालाकि ज्यादातर होता ये  है कि हम सुन भी लेते हैं, समेट भी लेते हैं, परन्तु घसीट कर घर तक ले जाने की ज़हमत नहीं पालते । रास्ते में मौका पाते ही किसी और के गले मढ़ देने का प्रयास करते हैं । खैर ।

बात हो रही थी पुरानी कहानी की । एक बार एक पंडितजी भक्तों की भारी भीड़ में ऊँची सी चौकी पर बैठकर प्रवचन कर रहे थे । यजमानों को उपदेश देते हुए बोले कि बैंगन बहुत ही हानिकारक है- आयुर्वेद की दृष्टि से भी और धर्मशास्त्र की दृष्टि से भी , अब तो नासा वाले भी इसका विरोध करने लगे हैं ।

संयोग से या कहें दुर्योग से उसी स्रोता-मंडली में पंडिताइन भी बैठी थी । उस वेचारी ने तो अपने मैके में सिर्फ इतना ही सुन रखा था कि एकादशी से एक दिन पहले और एक दिन बाद बैंगन नहीं खाना चाहिए । और हां, आयुर्वेद तो यहां तक बैंगन का बखान करता है कि यदि गरिष्ट भोजन कर लिए हों तो बैंगन का चोखा प्रचुर मात्रा में खा लें...सारा का सारा घासलेटी मलबा साफ हो जायेगा । किन्तु आज पंडितजी की नयी बात पंडिताइन की जानकारियों पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया ।

भागी-भागी घर लौटी । थोड़ी देर बाद भूखे-प्यासे पंडितजी भी पधारे अकाल के कुकुर की तरह हांफते हुए ।

पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में स्त्री की क्या विसात !

कांपते हांथों से भोजन की थाल सामने रख गयी । कुड़कुड़ाते पेट को आश्वासन देते पंडित जी पीढ़े पर बैठते ही आग बबूला हो गए— अरे ! ये क्या सिर्फ रोटी और अचार...सब्जी क्यों नहीं बनायी ?

भींगे कुकुर की तरह कांपती पंडिताइन ने कहा- सब्जी तो बैंगन की बनायी थी । आपका प्रवचन सुन अभी-अभी बाहर फेंक आयी ।

पंडितजी पहले तो भड़कने के मूड में आये, किन्तु प्यारी पंडिताइन के भोलेपन और पतिपरायणता का ध्यान आते ही बिलकुल नरम पड़ गए, मानों पंडिताइन नहीं कोई सलोनी सी जजमानिन ही हो सामने । मुस्कुराते हुए बोले— अरे भाग्यवती ! तुम्हें इतनी भी अकल नहीं मिली थी मैके से कि चौकी और चौका की बात जुदा-जुदा होती है। अब वहां जजमानों की जमात में बैंगन की बुराई न करुं तो गोभी-परवल भला कौन खिलायेगा ? वही सस्ता वाला बैंगन परोस देगा पूड़ी-बुन्दिया के साथ...।

 ये पुरानी कहानी बहुत कुछ सोचने-कहने का अवसर दे जाती है ।

चौकी और चौका में हम इतना फर्क क्यों कर लेते हैं ? कथनी और करनी में इतना विरोधाभास क्यों हो जाता है? कथनी का लेशमात्र भी करनी में नज़र नहीं आता । मंच पर घोषणायें बड़ी-बड़ी होती हैं और जमीन पर कुछखास उतर नहीं पाता । वचने किं दरिद्रता... वाली लोकोक्ति चरितार्थ होकर रह जाती है ।

किसी पार्टी का घोषणा-पत्र हो या किसी बाबा का प्रवचन, परिणाम और उपलब्धि सब शिफ़र । मेरी बातों पर यकीन न हो तो दस पार्टियों का चुनावी घोषणा-पत्र उठा लें, सबके मुखपृष्ठ फाड़ दें और फिर आपस में मिला दें, और फिर से पेजवाइज सजा दें । आप पायेंगे कि क्रमांकों और अनुच्छेदों में अन्तर भले हो, ‘थीममें अन्तर बिलुकल नहीं मिलेगा । सभी पार्टियां एक  जैसी चोचलेबाजी करती मिलेंगी- गरीबी की बात, किसान की बात, मजदूर की बात, दलित-शोषित की बात, मन्दिर-मस्जिद  की बात, बेरोजगार की बात, भ्रष्टाचार की बात, लूट की बात, घोटाले की बात, काले-गोरे धन की बात, मन की बात, तन की बात...।

ठीक इसी तरह दस-बीस बाबाओं के प्रवचन कलेक्ट कर कल्चर करलें। आप पायेंगे कि सबमें एक ही उपदेश है- निन्दा मत करो, चुगली मत करो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, जीव हिंसा मत करो, सबमें ईश्वर का अंश है...।

नेता भाषण देकर चले जाते हैं, बाबा प्रवचन देकर । देश और समाज वहीं का वहीं ठिठका रह जाता है। अपने पुराने ढर्रे पर चलता रह जाता है । क्यों कि उसे भी पता है कि ये दोनों अपना-अपना रोजगार कर रहे हैं । न तो नेता को देश से मतलब है और न बाबा को समाज से । किन्तु मजे की बात ये है कि जान-समझ कर भी हम फिर इकट्ठे हो जाते हैं- किसी बाबा या कि नेता की बकबक सुनने को ।

नेता की बातों में सिर्फ एक पर ईमानदारी से पहल हो जाये- भ्रष्टाचार पोलियो उन्मूलन की तरह जड़-मूल से समाप्त हो जाये, तो देश की दिशा और दशा दोनों बदल जाये ।

बाबाओं की बात में सिर्फ एक पर पहल हो जाये- सर्वत्र एक ही ईश्वरीय सत्ता है, फिर संसार की सारी समस्यायें ही समाप्त हो जायें । कौन किसकी निन्दा करेगा, कौन किससे और किसकी चुगली करेगा, कौन हिंसा करेगा !

आजकल विभिन्न जातीय सम्मेलनों की बाढ़ आयी है । सभी जातियां एकजुट होने को उतारु हैं । सब अपने-अपने खेमे में घुस जाने को आतुर दीखते हैं । क्यों कि मानव वाली बड़ी सी कनात माकूल नहीं लगती ।

किन्तु दीखते भर हैं । होते नहीं ।

जरा गौर फरमायें तो पायेंगे कि वहां भी कुर्सी और तिजोरी की ही कवायद है सिर्फ । पूरी जमात सचिव-अध्यक्ष-कोषाध्यक्ष  की कुर्सी पर ही आसीन होना चाहता है । कार्यकर्ता तो कोई रहना ही नहीं चाहता । और परिणाम—टुकड़े-टुकड़े-टुकड़े । पूरी कायनात फाड़-फूड़, नोच-चोंथ कर रुमाल भर भी बच नहीं पाता सलामत ।

दरअसल ये सारा खेल अहंकार का है । समर्पण का इसमें रत्ती भर भी खुशबू नहीं है । अहं में सत्ता की भूख है सिर्फ , समर्पण में सेवा का भाव । यहां रखना कुछ है ही नहीं । पाना कुछ है ही नहीं । सिर्फ देना और देना है । करना और करना है ।

इस अहंका ही विसर्जन करना होगा । अहं गया कि ईश्वर उतरा । चौकी-चौका का भेद मिटा कि सबकुछ चौक में बदल जायेगा । अस्तु।

Friday, 14 December 2018

सूर्यपुत्र की समस्या


सूर्यपुत्र की समस्या

इधर अचानक कुछ दिनों से छोटे वाले सूर्यपुत्र कुछ चिन्तित से हैं । हालाकि बड़े वाले पहले की तरह ही बमबम हैं, और कभी-कभी मुस्कुरा भी लेते हैं अपने छोटे भाई की चिन्ता पर । कर्तव्य की भाषा में कहूं तो चाहिए ये था कि तत्काल यमलोक जाते और अनुज की समस्या जानने का प्रयास करते और यथासम्भव उससे निज़ात दिलाने की कोशिश भी करते । किन्तु ऐसा कुछ उन्होंने किया नहीं और न करना जरुरी ही समझा । ढाई वर्षों में राशि परिवर्तन करते, मुस्कुराते हुए अपनी मन्द गति से चलते रहे राशिपथ पर । इनकी तरह उस बेचारे को तो कुण्डली में कोई खास जगह मिली नहीं है, भले ही आधुनिक ज्योतिषी अरुण, बरुण,यम सबको लपेट लिए हैं पुराने वाले बारहघरवा में ही ।

प्रिय भगिनी यमुना पर प्रसन्न होकर, यम ने उसे वचन तो दे दिया था कि तुममें स्नान करने वाले को यमदूतों का भय नहीं सतायेगा- इसीलिए खास कर यमद्वितीया के दिन तो यमुना और मथुरा दोनों का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, किन्तु अपने को आधुनिक ही नहीं अत्याधुनिक और काबिल समझने वाला आदमी भला इन बातों को समझे-जाने-बूझे तब न । थोड़े से, मिथकवादी विचारधारी भले मानस यदि हिम्मत जुटा कर यमुना में स्नान का मन भी बनावें तो कहां जायें डुबकी लगाने ? आधुनिक हस्तिनापुर वाले तो यमुना की उत्ताल तरंगों की कल्पना भी नहीं कर पाते । पुरानी वाली गहराई क्या खाक जानेंगे !  सुरसरिता कही जाने वाली गंगा की ही जब ये दुर्गति है कि कई करोड़ हज़म कर जाने के बावजूद सफाई अभियान का कोई खास नतीज़ा नहीं नज़र आया, तो फिर भला यमुना को कौन पूछे ? निरीह-दुर्बल सा दो हाथ वाला आदमी अपनी भरपायी और सफाई तो ठीक से कर नहीं पाता, अब भला इन नदियों का कितना खयाल रखे ! ये मुआ पेट भी ऐसा ज़ालिम है कि कभी भरता ही नहीं । ब्रह्मा को क्या इतना भी नहीं मालूम कि कलिकाल में कुछ छोटे आकार के पेट वाला इन्सान गढ़ना चाहिए ! और साथ ही देवताओं से उधार लेकर दो-चार हाथ और बढ़ा दे , ताकि दौलत बटोरने में सुविधा हो । दौलत और शोहरत ही न कमाया, जवानी का लुफ़्त ही न उठाया, तो भला मानव-जीवन अकारथ हुआ कि नहीं ! ‘मिनी’ के जमाने में सबकुछ तो छोटा होता जा रहा है, एक से एक चमत्कारी छोटे डिवाइसों का इज़ाद हो रहा है, ऐसे में नदियों का कलेवर भी मिनी कर दिया भू-माफिआओं ने तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा ! पर्यावरणविदों को और कुछ काम-वाम तो रह नहीं गया है, कुछ का कुछ ब्रॉडकास्ट करते रहते हैं । और नहीं तो रिटायरमेन्ट के बाद सधुआ जाते हैं, और गंगा-सफाई के नाम पर आमरण अनशन पर बैठ जाते हैं । उन भले मानस को ये भी नहीं पता होता कि सरकारें कान में गुलरोगन का तेल डालकर, इत्मिनान से अपने आवंटित ए.सी. में डनलप लगाकर सोयी होती हैं । उनके कान पर जूं भी नहीं रेंगते । मच्छरों को तो कालाहिट से मार ही डाला है । राम तेरी गंगा मैली- सिर्फ फिल्म हो सकती है, जिसे देखकर मनोरंजन और धनार्जन किया जा सकता है । ऐसी बातें अमल-पहल के लिए बिलकुल नहीं होती । अब कोई गौ-गंगा-गोविन्द के नाम पर असलीवाला अनशन करे और मर जाये तो भला सरकारों का क्या दोष ? वे तो केवल माने बैठे होती हैं कि अनशन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की परम्परा सी चल पड़ी है । ठेठ मगहिया अंदाज में कहना चाहूं तो कहना पड़ेगा—रोज-रोज ऊखिये में राह गलयेबs ! अब कोई बार-बार एक ही हथियार का प्रयोग करेगा- तो उस पर भला कितना ध्यान दिया जाये ! हालाकि निठल्लों के लिए रामलीला मैदान और जन्तर-मन्तर जैसी जगह तो मुहैया कर ही दी गयी है- जी भर कर अनशन-धरना-प्रदर्शन करते रहो वहां जाकर । ये कौन नहीं जानता कि बहुतों की रोजी-रोटी इसी पर चलती है ।

खैर, बात-बात में मैं जरा बहक गया था । बात थी सूर्यपुत्र की निजी समस्या की । इस पर तो मेरी राय है कि वचन देते समय ही उन्हें सोच लेना चाहिए था ठीक से । प्यारी बहना पर खुश होकर, जल्दबाजी में वचन क्यों दे दिये- जैसा कि नेतालोग जल्दबाजी में कुछ का कुछ बयानबाजी कर देते हैं ?

हालाकि नेतालोग कौवे से भी ज्यादा चतुर होते हैं । हर बात सोच-समझ कर, झाड़-पोंछ कर बोलते हैं । उलजलूल सा लगने वाला बयान तो वो इसलिए देते हैं, ताकि अखबार की सुर्खियां बटोरी जा सके । हालाकि कभी-कभी चूक जाते हैं । उन्हें ये पता होना चाहिए कि बयानबाजी या कि ज़ुमलेबाजी से जनता बोट नहीं देती । न बार-बार सूट बदलने से वोट मिलने को है, और न टीका लगाकर, जनेऊ पहनने से । टीक-टोपी पर वोट बटोरने का जमाना लद गया । जनता तो जमीन देखती है, वो जमीन जिस पर कुछ उतरा होता है- पिछले पांच सालों में । वो आसमान देखती है, जिस पर कुछ चमकता होता है पिछले पांच सालों में । वैसे किटआउट और हुटआउट का अर्थ तो मालूम ही होना चाहिए ।

अरे ! मैं भी कहां फंस गया नेताओं की बखिया-विचार में ! बात ये है कि कनिष्ठ सूर्यपुत्र के वचन तो भीष्म की प्रतिज्ञा सी  ‘ अजागलस्तन ’ सा नासूर बन गया । एक बार दशरथ ने भी ऐसी ही जल्दबाजी में वचन दे दिया था कैकेयी को जिसका खामियाज़ा पूरे अयोध्यावासी को भुगतना पड़ा था । अयोध्या-नरेश की बात तो आज भी विवादास्पद ही है । मुझे तो लगता है कि अयोध्या की कुण्डली पर ही विचार करने की जरुरत है कि शनि की साढ़ेसाती अभी पूरी हुयी या नहीं ? शनि की महादशा भी तो उन्नीस वर्षों की ही होती है । कहीं ऐसा तो नहीं कि शनि अपना लोक छोड़कर राम जन्मभूमि में ही आ बसे हों ! किन्तु नहीं, ज्योतिष कहता है कि शनि का वास शुभ होता है, दोष केवल दृष्टि में होता है ।

वैसे पता नहीं इन दोनों भाइयों का आपस में क्या गुपचुप चल रहा है । मैं तो सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि सूर्य-पुत्र नाहक परेशान हैं । वचन और बयान में कोताही बिलकुल नहीं करनी चाहिए ।

गंगा-जमुना पट जाये, देश बंट जाये या कि जनता कट जाये- देखा जायेगा फिर पांच साल बाद । मुद्दा बना रहे- होशियारी इसी में है । अनुभवी लोग कहा करते हैं न कि वर्तमान जीवी होना चाहिए । 
भविष्य की चिन्ता क्यों ! वचने किं दरिद्रता ?
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Friday, 2 November 2018

प्रभावती-यात्रा-वृत्तान्त


प्रभावती-यात्रा-वृत्तान्त

      आपके बहुमूल्य समय का मान रखते हुए, पहले ही ये स्पष्ट कर दूँ कि ये कोई वी.आई.पी.यात्रा-वृत्तान्त नहीं है । न ए.सी. है न सिगार के घुएं, रम्म, ज़ाम, गॉबलेट कुछ भी नहीं हैं यहां । न किसी हवाईयात्रा का वर्णन है , न हिल स्टेशन का । कोई मेट्रोसीटी भी नहीं है इस प्रसंग में । धुंआधार नष्ट हो रहे जंगल या पहाड़ों की वेदना और विकलता भी नहीं है यहां । आत्महत्या करते किसान, लुटती हुयी बेटियों, जलती हुयी बहुओं की चर्चा भी नहीं है ।  स्त्री-विमर्श भी पुराना मैटर हो चला है । सर्वहारा पर तो बहुत रोटियां सेंकी जा चुकी । वैसे बात कुछ नयी नहीं कर रहा हूँ । बात नयी हो भी क्या सकती है ! पुराने चावल का माड़ भी बहुत गाढ़ा होता है, भले ही कूकरीसभ्यता में ये रहस्य किसी को पता न हो ।
       खैर, चर्चा कर रहा था प्रभावती यात्रा की । ये यात्रा कुछ पैदल, कुछ रिक्शे से तय हुयी थी- बहुत ही आनन-फानन में । ठीक से कपड़े पहनने और काकुल मारने का भी होश न था । तड़के ही दो-चार कुल्ला मारके निकल जाना पड़ा था- स्थिति ही कुछ ऐसी थी । आसपड़ोस के अनुभवियों ने सुझाव दिया कि साधारण लोगों के लिए प्राइवेट से कहीं अच्छा है प्रभावती । फॉर योर काइन्ड इन्फॉर्मेशन ये ज़ाहिर कर दूं कि प्रभावती अन्तर्राष्ट्रीय नगरी गया का बहुचर्चित जनानी अस्पताल है, जो पूरे तौर पर सरकार के नियन्त्रण में है और सरकारी दस्तावेज़ ये बताते भी हैं कि वहां सबकुछ व्यवस्था है...सारी आधुनिक सुविधाएं 24x7 की नयी व्यवस्थानुकूल है ; किन्तु वहां पहुँचने और सर्च करने पर पता चला कि जिस समय वहां पहुंचा था वो 24x7 के दायरे में नहीं आता ।  हताश होकर एक शिलापट्ट पर थब्ब से बैठ गया- 24x7 का हिसाब समझने के लिए, किन्तु चुंकि गणित मेरा बहुत ही कमजोर है, इसलिए कुछ जोड़-बाकी न कर पाया ।

        अभी ठीक से सुस्ता भी न पाया था कि एक सज्जन तत्काल वहां उपस्थित हुए और पट्टिका की ओर इशारा करते हुए बोले - ये बैठने की जगह नहीं है । देखते नहीं क्या लिखा है ।

       उनके कहने पर चश्मे को थोड़ा ऊपर-नीचे करके अपने मारक्रोस्कोप का पावर एडजस्ट किया, तब देखा— बा-मुश्किल एक फीट की ऊँचाई पर संगमरमर पर कुछ हुरुफे अपनी वेवसी पर कुंढ़ रहे थे । ज़ाहिर था कि इस अस्पताल को सन्1884 में तत्कालीन गवर्नर की पत्नी के नाम से स्थापित किया गया था, जिसे कालान्तर में नया नाम भले दे दिया गया- प्रभावती; किन्तु विडम्बना ये कि अभी तक गुलामी के उस दस्तावेज को हम उसी सम्मान से ढोये आ रहे हैं और सच्चाई ये कि अस्पताल की विल्डिंग ही नहीं अन्य व्यवस्थायें भी उसी दस्तावेज़ के मुताबिक हैं । अब भला उस जमाने में कोई सोनोग्राफी और अल्ड्रासाउण्ड जैसे अज़ूबे शब्द से क्यों कर वाकिफ़ हो सकता था ! हां, स्वच्छ भारत अभियान के जमाने में, पैथो-सेक्शन में जाने पर  सोचना पड़ेगा कि मिचली आने पर थूकने का जी करे तो नाक और मुंह में किसे पहले खोल कर काम चलाया जाये, वरना....।

   स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आपातकाल यानी इमर्जेंसी शब्द का चुंकि लोग गलत इस्तेमाल करने लगे हैं, इसलिए अनुशंसा की गयी है कि इसे व्यवहार से ही नहीं कोश से भी निकाल बाहर किया जाय । शायद उसी का नतीजा है कि इमर्जेंसी केश है - कहने पर एक बाबूनुमा व्यक्ति से झिड़की खानी पड़ी – अभी यहां कुछ नहीं होगा...बाहर जाइये...दो रुपये का टिकट कटाना पड़ता है...नौ बजे मैडम आयेंगी...।

    टाइमपास वाला एनरॉयडधारी न होने के कारण, इन्तजार में इधर-उधर भटकते हुए , एक सूचना पट्ट पर निगाहें चली गयीं, जो उपलब्ध दवाइयों के लिए बनायी गयी थी, किन्तु उस पर सिर्फ और सिर्फ नाम भर ही थे । आगे वाले कॉलमों का प्रयोग सिर्फ वोर्ड लिखने वाले ने ही किया था या हो सकता है किसी मन्त्री-संतरी के इन्सपेक्शन पीरियड में उसका उपयोग किया गया हो कभी । सब के सब खाने गरीबों की झोली की तरह ही खाली पड़े थे, जिनका सारा का सारा माल ऊपर-ऊपर ही उडंछू हो जाता है । बहुत मगज़पच्ची करने के बाद समझ आया कि गरीबी का ये रॉ-मेटेरियल कितना जरुरी है देश के लिए । इन्हीं पर तो बहुत सी योजनायें टिकी हैं । ये गरीब न होते, पिछली योजनाओं के बूते ये समृद्ध हो चुके होते, तो आज  इस अस्पताल की क्या जरुरत होती ! और ये अस्पताल न होता , तो फिर इससे जुड़ी सैंकड़ों योजनाओं का क्या होता !

      सवानौ वज गये थे । टिकटबाबू ने दर्शन दिया । दो रुपये का टिकट लेकर अन्दर मेमसाब के केबिन के बाहर खड़ा हो गया अपनी रुग्णा को आगे करके । चुंकि पहला नम्बर था, इसलिए जरा भी देर न लगी- अन्दर जाने में और उधर से बाहर निकलने में भी । बा-मुश्किल दो-ढ़ाई मिनट...। हाथ में पुर्जा लिये दूसरी खिड़की की तलाश होने लगी । दस मिनट के बाद खिड़की तो मिली पर वहां के बाबू के दर्शन के लिए थोड़ा और इन्तज़ार करना पड़ा । औपचारिकता का एक और नम्बर पुर्जे पर डाल कर , पीछे बने पैथोलैब में जाने का सुझाव मिला । 

          पैथोलैब और गोशाला में फर्क समझने में फिर थोड़ा मगज़पच्ची करना पड़ा । दस बजे दिन में भी कमरे में अनुकूल रौशनी के अभाव में बल्ब जलाने की जुगत करते वहां एक बाबू नजर, जो स्विचवोर्ड के प्लग प्वॉयन्ट में नंगी तार घुसेड़ने का प्रयास कर रहे थे और मुंयी तार बार-बार नीचे गिरे जा रही थी । काफी मस्सकत के बाद तार खुंश पाया और कमरा रौशन हुआ । तब बेचारे पी.टी.स्टिक को पुर्जे से जोड़ने के लिए सेलोटेप में उलझ गए । कोई पांच मिनट के बाद पता चला कि वो तो केवल ढांचा भर बचा है, टेप तो कब का खतम हो चुका है । लाचार होकर स्टिक को पुर्जे से स्टेपल करना पड़ा । खैरियत था कि स्टेप्लर में पीन मौजूद था । मुझे तो लग रहा था कि कहीं सूई-धागा का जुगाड़ न करना पड़े । यूरिनरिपोर्ट लेकर, पुनः मैडम के पास आना पड़ा । अगली मीटिंग में अल्ट्रासाउण्ड प्रेस्क्राइब हुआ, इस सुझाव के साथ कि कहीं बाहर से कराना पड़ेगा या फिर मेडिकल कॉलेज जा सकते हैं । आग्रह के बावजूद आपातस्थिति की भी कोई दवा  सजेस्ट इसलिए नहीं की गयी कि बिना फाइनल रिपोर्ट के कैसे हो सकता है ।

        मुझे लगा कि क्या बेवकूफ हुआ करते थे पहले के वैद्य, जो नब्ज़ टटोले और घास-पत्ते की पुड़िया थमा दिये । दूसरी बात, ये सोचने को मजबूर हुआ कि आधुनिक चिकित्सा मशीनों पर निर्भर होकर जटिल हुयी है या आसान ! 

        एक अस्पताल में बारह बजा चुका था, अब दूसरे के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाया । साधारण लोग भाग्य और भगवान पर शायद अधिक भरोसा रखते हैं और अपने सनातन धरोहर पर भी ।

      वापस डेरा लौट आया । अपने तज़ुर्बे की चूरन-चटनी के बूते उपचार शुरु किया । पहले ही खुराख से काफी राहत महसूस किया रुग्णा ने  और अगले तीन-चार दिनों में बिलकुल सामान्य ।

   तामझामी उपकरणीय चिकित्सा-पद्धति को बढ़ावा देने के लिए क्या बिलकुल सुनियोजित ढंग से हमारे धरोहरों को नष्ट नहीं किया गया है ?
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Sunday, 21 October 2018

रावण-दहन-दर्शन-लीला


                      रावण-दहन-दर्शन-लीला

  हम उत्सव-प्रिय लोग हैं । मजे की बात ये है कि खुशी का तो उत्सव करते ही हैं, गम और दुःख का भी करते हैं । दुनिया में किसी के आने का स्वागतोत्सव मनाते हैं- हैपी वर्थ डे कह कर, तो जाने का भी जश्न मनाते हैं- रामनाम सत्य है बोल कर । कमाल की बात तो ये है कि जीवन भर राम का नाम याद नहीं रहा जिसे, उसकी भी शवयात्रा रामनाम सत्य है के उदघोष के साथ ही निकलती है । राम को ज्यादातर दो ही समय याद किया जाता है— किसी की महायात्रा में या फिर चुनाव के पहले राम-मन्दिर बनाने की चोंचलेबाजी में । वैसे राम का नाम और कई बार भी लेते हैं— भगवा पताका फहराते हुए, तलवार-वर्छे भांजते हुए...यहां तक कि किसी बदबूदार और घृणास्पद चीज को देखने के बाद भी- राम-राम छीःछीः कहने में जरा भी देरी नहीं करते । किसी की भर्त्सना करने के लिए भी राम का प्रयोग कर ही लिया जाता है , किन्तु कहने की जरुरत नहीं कि ये सबके सब शब्द सिर्फ होठों के कसरत भर हैं ।

काश , जीवन में सच्चे मन से कभी एक बार भी राम का नाम लिया गया होता !

हालाकि रामनाम के अध्यात्मिक-दार्शनिक पहलुओं पर टिप्पणी करने से कोई खास फायदा नहीं, क्योंकि हमारे धर्म-धुरन्धरों ने , कथा-वाचकों ने और कुछ रामभक्तों ने इतना कुछ कह डाला है कि अब सुनने को जी नहीं चाहता । वैसे भी सुन कर क्या होना है- न मुक्ति मिलनी है और न मन्दिर ही बनना है , क्यों कि इन दोनों कामों के लिए जो कुछ भी चाहिए वो हमारे पास बिलकुल नहीं है । एक ओर राम को बहुतों ने कमाई का साधन बना लिया है, तो दूसरी ओर वोटवैंक भी । इन दोनों स्थिति-परिस्थिति से अनेक बार हम सबका वास्ता पड़ चुका है, अतः इस बावत कुछ कहना फिज़ूल है ।

और जब राम के बारे में कुछ कहने का मन न हो तो रावण के बारे में ही कहने में क्या हर्ज है 
!
राम ने रावण को मारा था— एक दुराचारी, अत्याचारी, बलात्कारी रावण को । और फिर उसकी याद में हम हर बार रावण का दहन करते हैं- पुतला जलाकर । पुतला तो आये दिन नेताओं का भी जलाते हैं किसी न किसी चौक-चौराहे पर । फोटो खिंचवाते हैं । अखबारों का हेडलाइन बनवाते हैं । कभी-कभी उससे कुछ हासिल भी हो जाता है । और कुछ नहीं भी हुआ तो अखबार में नाम और फोटो तो छप ही जाता है- इतना क्या कम है !

राम ने सिर्फ एक रावण को मारा था- विशश्रवा के पुत्र रावण को , लंकापति रावण को, क्यों कि उनके जमाने में सिर्फ वही एक था । किन्तु जहां रावण ही रावण हों—दशानन, शतानन, सहस्रानन..., जिन्हें न बोलने की तमीज़ हो और न चलने की, तो फिर कितनों का दहन किया जाए ! और करेगा कौन ! राम भी तो चाहिए ।

वैसे ये लोग ज्यादातर अपनी खोली में ही आराम फरमाते रहते हैं, बीच-बीच में बाहर झांकते-ताकते हैं- खासकर चुनाव के समय या कुछ घटना-दुर्घटना के समय भी, क्यों कि कुछ बोलने की पूरी आजादी होती है उस समय और फोटो छपने या टीवी इन्टर्व्यू की भी पक्की गुंजायश रहती है । बाकी समय उनके सहयोगी यानी कम आननों वाले उनके बदले काम निपटाते रहते हैं—लूट-पाट का काम, बलात्कार और हत्या का काम । इनमें अधिकांश का ऑथेन्टिक और ऑथोराइज वर्क होता है- ठेकेदारी । सड़क हो, बिल्डिंग हो, बालू-मिट्टी हो, पहाड़-जंगल हो या बोतल-सोतल । सरकारी-गैरसरकारी ज्यादातर निविदायें इन्हीं का स्वागत करती हैं , क्यों कि इन्हें कर्णपिचशाचिनी सिद्धि होती है- कि इस बार कितने का निविदा भरना है । ये सिद्धि वाली सुविधा चुंकि और लोगों को नहीं होती, इसलिए उन्हें सिर्फ भीड़ लगाने का अवसर मिलता है ।  

रावण को जलाते समय भी ऐसी ही भीड़ लगती है । भीड़ बढ़ने का इन्तज़ार भी किया जाता है । भीड़ बढ़ाने का उपाय भी किया जाता है । और फिर भीड़ तो महज भीड़ होती है । उसके पास देह के अलावे और कुछ नहीं होता । देह में दो हाथ होते हैं, जिन्हें जरुरत पड़ने पर एक दूसरे पर पटक-पटक कर तालियां बजायी जाती हैं । और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सिर भी पटकना पड़ता है । भीड़ में खुदा न खास्ते कुछ होनी-अनहोनी हो जाये, तो इसकी न तो खास परवाह की जाती है और न कोई जिम्मेवारी ही होती है – न मेहमान की औ न मेज़बान की । न आयोजक की और न प्रशासक की ।  और अपनी जिम्मेवारी तो हमसब प्रायः बहुत पहले ही लेना छोड़ दिये हैं, क्यों कि हमें पता हो चुका है कि हम अब गुलाम नहीं रहे यानी स्वतन्त्र हो गए हैं । अब हम पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं कुछ भी करने को, कुछ भी बोलने को, कहीं आने-जाने को । मन करे तो एन.एच. पर टेंड लगाकर भोज-पार्टी देदें या डिस्को करें । मन हो तो रेलवे टैक पर टट्टी करें या उस पर बैठ कर रावण दहन देखें । सेल्फी मोड में तो हम हमेशा रहते ही हैं—मौका देखा, चट सेल्फी लिए और खट पोस्ट कर डाले । अरे भाई ट्रेनों का आना-जाना होगा तो खुद समझेगा- वो तो रेलवे का काम है । आंखिर इतनी कीमती वोट देकर हमने रेलमन्त्री बनाया किस बात के लिए है ! और ये भी तय है कि कुछ होने-जाने पर जरा से हो-हंगामें में मुआवज़ा तो मिल ही जाना है । आखिर अपनी सरकार है, फिर हम अपनी जिम्मेवारी क्यों उठाने की ज़हमत पालें ! अपना बेसकीमती दिमाग क्यों इस्तेमाल करें ! अपने भीतर के रावण को ढूढ़ने की क्यों कोशिश करें !

बाहर रावण घूम ही रहा है ।  बाहर रावण जल ही रहा है । उसका ही दहन क्यों न देखा जाए ?
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Friday, 12 October 2018

अविरल प्रवाह

अविरल प्रवाह

          खबर है कि सरकार ने गंगा के अविरल प्रवाह की अधिसूचना जारी कर दी है और साथ ही ये भी खबर है कि  सूचना सुनने के अगले ही दिन पर्यावरणविद प्रो.जी.डी.अग्रवाल , जो पिछले 111 दिनों से गंगा मैया के उद्धार के लिए अनशन पर थे, गंगामैया की गोद में सो गए ।

            अधिसूचना पर प्रसन्न हुआ जाये या कि एक गंगापुत्र के निधन पर शोक प्रकट किया जाये ?

            और जब कुछ निर्णय की स्थिति न बनती हो तो लेखनी बेचैन होने लगती है ।

            गंगा की सफाई का कार्य ही नहीं अभियान चल रहा है विगत कई दशकों से । अब तक कितने करोड़ हज़म हुए इस अभियान में इस डाटाइन्ट्री में मुझे कोई खास दिलचश्पी नहीं है , क्यों कि हम सभी जानते हैं कि सरकार के ज्यादा तर काम योजना, परियोजना, अभियान और डाटाइन्ट्री के सहारे ही चलते हैं । उद्धाटन का शिलापट्ट लगा दिया जाता है, फोटो खिंच जाते हैं, अखबार रंग जाते हैं- बात पूरी हो जाती है ।

सम्भवतः  ज्यादातर योजनायें एक खास योजना के तहत ही बनायी जाती हैं, यानी मुख्य योजना बनाने के पहले एक योजना बनायी जाती है कि इस बार किस-किस को बेनीफीट देना है...इस बार किस-किस का पत्ता काटना है...।

न खाऊँगा औ न खाने दूंगा कहने भर से तो काम चलने को नहीं है । सोचने वाली बात है कि लम्बे समय से खाने-पीने की जो लत लगी हुयी है उसे अचानक बन्द करने के लिए भी तो एक योजना बनानी होगी ? साधारण सी बात है कि तम्बाकू खाने या कि सिगरेट पीने की आदत छुड़ानी मुश्किल है, फिर सीमेन्ट, सरिया, कोलतार, कोयला, कॉन्करीट, खाद, भूसा या कि नोट-वोट जैसी चीजें खाने-पचाने की आदत भला कैसे इतनी आसानी से छुड़ायी जा सकती है ? इतने मजबूत हाज़में वाली भट्टी को कुछ न कुछ ईंधन तो हमेशा चाहिए ही न ।

काफी पहले ही हमारे एक पूर्व प्रधान मन्त्री ने बड़े ईमानदारी पूर्वक खेद व्यक्त किया था कि सरकारी योजनाओं के लिए जो रकम मुहैया की जाती है, वो जमीन पर पहुँचते-पहुँचते मात्र 15% ही बच पाती है, यानी कि हमारे देश के नेता से लेकर अफसर तक इतने वफादार, ईमानदार और कर्मठ हैं कि सिर्फ 85% से ही अपना काम चला लेते हैं बेचारे । सोचने वाली बात है कि जहां 180 रुपये में आईकोनिक काजल की एक अच्छी सी डिबिया आती है, ऐसी भीषण मंहगाई के जमाने में तो कोरे वेतन से सिर्फ  बीबी को  खुश रखना भी मुश्किल है, फिर बाकी चीजों का क्या होगा ? मगर देशभक्त जनता इस गम्भीर विषय पर सोचती कहां है । वो तो वस अखबार और टीवी में खबरें देखती हैं और उबल जाती है बिलकुल दूध की तरह ही, जो 100 डिग्री का भी इन्तजार नहीं करता ।  अरे भाई ! अभी पन्द्रह प्रतिशत छोड़ दिया गया है तुम्हारे लिए । जरा रहम करो इन पर भी ।  कितना मिहनत करके, कितनी गालियां सुन कर, कितने अपमान सह कर क्या-क्या करम-कुकरम करके नेता और अब तो अफसर ही नहीं टीचर या कि सरकारी चपरासी भी बनने के लिए वैसा ही कुछ-कुछ करना पड़ता है । अब किसी यूनिवर्सीटी का या कि टीईटी का जाली सर्टिफिकेट न बनवाया जाये तो क्या बीबी-बच्चों को भूखा मारा जाये ? मगर नासमझ जनता इतनी भी बात समझ नहीं पाती । कितनी बार इशारा किया गया किन्तु समझ नहीं है बिलकुल, और समझ ही नहीं है जब तकनीकी बारीकी की तो फिर बेकार की चिन्ता में क्यों ? तुम अपना काम करते रहो-  हर पांच साल पर सिर्फ एक दिन । और ये लोग अपना काम करते रहेंगे 365 x 5 दिन ।

लूट-पाट का ये अविरल प्रवाह गंगा की अविरल धारा की तरह वैसे ही चलता रहेगा, जैसे हत्यायें और बलात्कार का दिनों-दिन विकास हो रहा है ।

अरे भाई ! कुछ तो विकास कर ही रहा है न । वादा तो विकास का ही किया गया था, फैक्ट्रियां नहीं बनी, बेरोजगारी दूर नहीं हो पायी, तो क्या हो गया, अगली बार कोशिश की जायेगी न । घबराते क्यों हो । क्या इतना भी कॉमनसेन्स नहीं है कि बड़ा काम करने के लिए बड़ा समय भी चाहिए होता होता है !

ऐसी स्थिति में मुझे तो एक बात और समझ आ रही है, सोचता हूँ योजना आयोग को लगे हाथ सुझाव दे ही डालूं – जिस तरह से बिना पढ़े-लिखे डिग्रियाँ घर पहुँचा जाते हैं वी सी साहव के मुफ़स्सिर , जिस तरह तीन रुपये किलो चावल-गेहूं पहुँच जाता है जरुरतमन्दों के घर, जिस तरह 35% वाले भी चुन लिए जाते हैं 95% को दरकिनार करके, उसी तरह चुनाव आयोग को  भी कुछ ऐसी ही करतब दिखाना चाहिए , ताकि ईवीएम पर भी लांछना न लगे और न फिर से वैलेटयुग में वापसी करनी पड़े ।

एक ऐसा ही सुझाव माननीय सुप्रीमकोर्ट के लिए भी है मेरे पास कि जैसे धारा 370 की चिन्ता छोड़कर, धारा 497 और 377 आदि पर गम्भीरता पूर्वक विचार हुआ उसी तरह कोई ऐसी व्यवस्था दी जाये कि बलात्कार और भ्रष्टाचार का स्वरुप ही बदल जाये । आंखिर दकियानूसी सोच वाला सोलवीं शताब्दी में जीने वाला भारतीय बलात्कार को बलात्कार कहता ही क्यों है और भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार ना कह कर सदाचार मान लेने में क्या आपत्ति है ?

एक बात और मुझे समझ नहीं आयी कि गंगाप्रेमी अग्रवालजी की तुष्टि के लिए अविरल प्रवाह की अधिसूचना जो जारी कर दी गयी, क्या वो गंगा आकाशगंगा होगी या कि यही वाली ? और यदि यही गंगोत्री वाली ही होगी तो फिर उन बड़े-बड़े बांधों वाली योजनाओं का क्या होगा ? कानपूर की फैक्ट्रियों का क्या होगा ?  और यदि ये सब नहीं होगा, तो फिर ये अविरल प्रवाह का नाटक ही क्यों नहीं बन्ध कर दिया जाता ये सफाई अभियानों को क्यों नहीं बन्द कर दिया जाता ?

पोलीथीन की फैक्ट्रियों पर अंकुश नहीं लगना है । पोलीथीन यूज़र पर अंकुश लगने की बात हो रही है ।  लाइसेन्स देते समय का नियम-कानून कुछ और था अब क्या कुछ और हो गया है ?

स्वच्छ भारत का अभियान चल रहा है अभी । फोटो खिंचवाने का जबरदस्त दौर है । भावी चुनाव के पहले चेहरे दिखाने का फोकटिया अवसर है । धो लो हाथ बहती गंगा के अविरल प्रवाह में ।

अरे बाबूमोसाय ! दिमाग में जो कचरा भरा है, बेईमानी भरी है, भ्रष्टाचार भरा है.. उसे पहले क्यों नहीं साफ करते ?  पहले वही छोटा वाला ड्रेन साफ कर लो , सड़कें और गलियां खुद-ब-खुद साफ हो जायेंगी- बिलकुल तुम्हारे पायजामें-कुरते की तरह एकदम बगुला मार्का ।

माँ गंगे मुझे माफ कर देना ।