Thursday, 18 May 2017

पुण्यार्कमगदीपिकाःमेरी अगली योजना

 प्रिय बन्धओं,

आपका स्नेह सदा मिलते रहता है,जो मेरे लिए प्रेरमास्रोत बनता है। इसके लिए आप सभी विजिटरों को साधुवाद।

इस ब्लॉग पर मेरी अगली पोस्टिंक की तैयारी चल रही है- पुण्यार्कमगदीपिका की। पुस्तक का मुखपृष्ठ आपके सामने है। विषयवस्तु की चर्चा अगले पोस्ट में करुंगा।
धन्यवाद।


                                             कहां—क्या

        क्रम.             विषय
१.                  पुरोवाक्
२.                  मगागमन की पृष्ठभूमि और नारद की विकलता
३.                  मेरी व्यथा
४.                  कलापग्राम : रहस्यमय यात्रा
५.                  देवर्षि नारद का प्रथम प्रश्न और सुतनु ब्राह्मण वटुक  द्वारा  तदुत्तर
६.                  सृष्टि-संरचना और पौराणिक भूगोल
७.                  मगोत्पत्तिःकारण और उत्कर्ष
८.                  शाकद्वीप से जम्बूद्वीप आगमन(साम्ब-सूर्य-याग)
९.                 मगोपाख्यानःबहत्तरपुर(पं.वृहस्पति पाठक)का ग्राम्यगीत(संकलन)
१०.              अन्यान्य पुरतालिका(किरणादि सहित)
११.              पुर-गोत्रादि विचार और औचित्य
१२.              ऐतिहासिक शिलालेखीय प्रमाण
१३.              सामाजिक ईर्ष्या (गैर शाकद्वीपियों द्वारा विरोध और अवमानना)
१४.              विडम्बना
१५.              सुपथ और समाधान के रास्ते (संध्या-रहस्य सहित)
१६.              कुलदेवता/देवी की अवधारणा और औचित्य
१७.              कुलदेवता/देवी  पूजा की संक्षिप्त और विस्तृत विधि

१८.              उपसंहार   

Sunday, 16 April 2017

मगमहिमा और मेरी व्यथा--पांचवां भाग

गतांश से आगे... पांचवां भाग
(इस प्रसंग का अन्तिम भाग)

प्रश्न. युगानां च चतुर्णां वा को मूल दिवसान् वदेत्  - चारो युगों के प्रथम दिन कौन-कौन हैं ?

उत्तर- कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सतयुग की आदि तिथि है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि त्रेतायुग की आदि है। माघ कृष्ण पक्ष की अमावश्या द्वापर युग की आदि तिथि है। एवं भाद्र कृष्ण त्रयोदशी कलयुग की आदि तिथि है। इन सभी तिथियों में दान,धर्म,कर्मादि अति शुभद कहे गए हैं। (नोट- किंचत मतभेद भी है उक्त तिथियों में। फिर भी अधिक मान्य उक्त तिथियां ही हैं।)

प्रश्न. चतुर्दशमनूनां वा मूलवारं च वेत्ति कः -- चौदह मन्वन्तरों की आद्य तिथि क्या है ?

उत्तर- अब मन्वन्तर की आदि तिथियों की चर्चा करते हैं - ये हैं क्रमशः आश्विन शुक्ल नवमी,कार्तिक द्वादशी, चैत्र और भाद्र तृतीया, फाल्गुन अमावश्या, पौष एकादशी, आषाढ़ दशमी, माध सप्तमी, श्रावण कृष्णाष्टमी, आषाढ़ पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन चैत्र और ज्येष्ठ पूर्णिमा। ये सब भी दानादि कर्मों के लिए उत्तम कहे गए हैं।

प्रश्न. कस्मिश्चैव दिने प्राप पूर्वं वा भास्करो रथम् --  सर्व प्रथम सूर्यनारायण किस दिन रथारुढ़ हुए ?

उत्तर- माध शुक्ल सप्तमी को रथ सप्तमी के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः सूर्यनारायण के रथारुढ़ होने का प्रथम और प्रशम दिवस यही है। मगविप्रों के लिए इससे उत्तम और कौन सा दिन हो सकता है ! सूर्य-साधना के लिए यह सर्वोत्तम दिन है।
प्रश्न १०. उद्वेजयति भूतानि कृष्णाहिरिव वेत्ति कः -  काले सर्प की भांति नित्यप्रति संसार को उद्विग्न कौन करता है ?
उत्तर- जो प्रतिदिन याचना करता है,वह पापात्मा सदा सबके लिए उद्वेगकारी है। यह कह कर याचना(भीख मांगना) को अति निकृष्ट कर्म कहा गया है। वैसे भी मांगने वाले का हाथ सदा नीचे ही रहता है। आत्महीनता की भावना से भी ग्रसित रहता है।

प्रश्न ११. को वास्मिन् घोर संसारे दक्षदक्षतमो भवेत् -- सुदक्ष कौन है ?
उत्तर- इस लोक में किस कर्म से मुझे सिद्धि प्राप्त हो सकती है और मृत्योपरान्त यहां से मुझे कहां यानी किस लोक में जाना है - इस बात का भलीभांति विचार करके,जो पुरुष भावी क्लेश के निराकरण का सदा प्रयत्न करते रहता है, विद्वानों ने उसे ही सुदक्ष कहा है।

प्रश्न १२.पन्थानावपि द्वौ कश्चिद्वेत्ति वक्ति च ब्राह्मणः -- दोनों मार्गों को कौन जानता और बतलाता है?

उत्तर- वेदान्तवादियों ने दो मार्ग कहे हैं—अर्चि और धूम्र। इसे ही देवयान और पितृयान भी कहा गया है। श्रेयस और प्रेयस भी यही है। इन दोनों से भिन्न(विपरीत)जो अशास्त्रीय मार्ग है उसे पाखण्ड कहते हैं। वस्तुतः दो ही मुख्य मार्ग हैं। अर्चीमार्गी पुरुष मोक्ष का पूर्ण अधिकारी है और धूम्रमार्गी जीव स्वर्गादि पुण्यफल भोग कर पुनः वापस आता है इसी संसार में। उपनिषदों ने श्रेय और प्रेय नामक दो ही मार्ग सुझाये हैं। श्रेयमार्ग का पथिक ही अर्चिमार्ग का अनुसरण करते हुए मुक्ति प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत प्रेयमार्ग का अनुयायी निरन्तर जन्म-मृत्यु-चक्र में आवागमन करते हुए व्यतीत करते हैं। श्रेयमार्गी सीधे सूर्य की ओर प्रस्थान करते हैं। उनका उत्तरोत्तर विकास होते रहता है। जबकि प्रेयमार्गी सदा इन्द्रिय-सुख-लिप्त-मोहित अनन्तकाल व्यतीत करता है संसार सागर में । वस्तुतः ये दक्षिणायन या धूम्रमार्ग ही है,जो अन्धकार का प्रतीक है।

इस सम्बन्ध में महर्षि पिप्लाद के वचन हैं— 
अघोत्तरतेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्या- दित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त ।। (प्रश्नोपनिषद् १-१०) जिन्होंने आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण विश्वास पूर्वक तप, ब्रह्मचर्यादि से जीवन को संयमित रखते हुए सदा सूर्य रुपी परमेश्वर में लगा दिया है, वे मनुष्य उत्तरीमार्ग (उत्तरायण) से लोकान्तर प्रस्थान करते हैं। गीता में गोविन्द ने कहा है - यं प्राप्यं न विवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।। इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं - निष्काम कर्मी और सकाम कर्मी। निष्कामी मुक्त होजाता है, और सकामी सदा बन्धन में रहता है, भले ही वह ब्रह्मा का दिन क्यों न हो। एक  न एक दिन अन्त तो होगा ही न !  अस्तु।

इस प्रकार देवर्षि नारद को अपने सारे प्रश्नों का समुचित उत्तर प्राप्त हुआ विप्र कुमार सुतनु द्वारा। कलाप ग्राम के अन्यान्य ब्राह्मणों का दर्शन करके नारदजी स्वयं को धन्य समझने लगे और श्रीमन्नारायण का गायन करते हुए प्रस्थान किए। एवमस्तु।

अब इस कठिन कसौटी पर परखने पर सोचने-विचारने को विवश हो जाता हूँ कि हमसब  कहां हैं !

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मगमहिमा और मेरी व्यथा--चौथा भाग

गतांश से आगे...
चौथा भाग

प्रश्न .  पञ्चपञ्चाद्भुतं गेहं को विजानाति वा द्विजः – पांच गुने पांच यानी पचीस तत्त्वों के अद्भुत गृह को कौन जानता है ?

उत्तर— पञ्चभूतानि पञ्चैव कर्मज्ञानेन्द्रियाणि च । पञ्च पञ्चापि विषया मनोबुद्ध्यहमेव च ।। प्रकृतिः पुरषश्चैव पञ्चविंशः सदाशिवः । पञ्चपञ्चभिरेतैस्तु निष्पन्नं गृहमुच्यते ।। (स्क.पु.कुमारिकाखंड ३-२७१) वस्तुतः त्रिगुणात्मिका सृष्टि पचीस ईंटों का अद्भुत भवन है। महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन में इन्हें विशद रुप से वर्णित किया है, जो नास्ति सांख्यसमं ज्ञानं, नास्ति योगसमं बलम् -  को चरितार्थ करता है। आकाश,वायु,अग्नि,जल और पृथ्वी— पांच महाभूत ; शब्द,स्पर्श,रुप,रस, गन्धादि इनके पांच विषय ; हस्त,पाद, मुख,गुदा,उपस्थादि पांच कर्मेन्द्रिय ; कर्ण,नासिका,नेत्र, जिह्वा,त्वचादि पांच ज्ञानेन्द्रिय; मन,बुद्धि,अहंकार,प्रकृति और पुरुष—ये ही कुल पच्चीस मूलतत्त्व हैं। इनका सम्यक् (तत्त्वतः) ज्ञान ही परमात्म बोध है। यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वाधास्या अहम् ।  स्युष्टे सत्या इहाशिषः ।। (ऋग्वेद-६.३.४०.२३) हे प्रकाशस्वरुप परमात्मन् ! यदि मैं तू हो जाऊँ और तू मैं हो जाय तो तेरा आशीर्वाद सच हो जाय। यानी द्वैत भाव मिटकर,एकत्वभाव उत्पन्न हो जाये। उक्त सांख्य का यही तो परिपाक है। इसे जो जान लेता है उसका द्वित्व तिरोहित हो जाता है। अस्तु।

प्रश्न . बहुरुपां स्त्रियं कर्तुंमेकरुपाञ्च वेत्ति कः  – बहुरुपा स्त्री को एकरुपा बनाने की कला किसे मालूम है?

उत्तर— स्त्री एक रुप अनेक—एक ऐसी स्त्री जो सदा अनेकानेक रुप धारण करते रहती है—प्रश्न प्रथम दृष्ट्या बड़ा ही जटिल प्रतीत होता है। मानवी बुद्धि में समाने वाला विषय ही नहीं है यह,किन्तु किंचित ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री तो अनेक रुपा है ही। निर्बुद्धि पुरुष को रिझाने हेतु सदा अनेकानेक रुप धारण करते रहती है। और पुरुष उलझा रहता है सदा उसके जाल में। कदाचित निकल जाये जंजाल से तो मुक्त हो जाये। पुरुषवादी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इसे ठीक से समझ नहीं पाने के कारण इसके विरोध में खड़ा हो गया है। और विरला कोई समझ गया इसके चरित्र को,तो मुस्कुरा कर बाहर निकल गया,या कहें निर्विकार खड़ा रह गया- यथास्थान,और वह स्वयं ही निराश होकर परे हट गयी।

नारद के इस प्रश्न में सांख्य के बाइसवें तत्त्व- बुद्धि के बारे में कहा गया है। बुद्धिरुपां स्त्रियं प्राहुर्वुद्धिं वेदान्तवादिनः । सा हि नानार्थभजनान्नानारुपं प्रपद्यते ।। धर्मस्यैकस्य संयोगाद्वहुधाप्येकिकैव सा। इति यो वेद तत्वार्थं नासौ नरकमाप्नुयात् ।। बुद्धि स्त्री ही है न ! स्त्रीलिंगी। ध्यातव्य है कि यह आद्यशंकर की माया नहीं। ये तो बुद्धि है- मन के बाद वाला जटिल तत्त्व,जो सदा मनुष्य को अनेकानेक रुप धारण करके नचाते रहती है। क्षण में कुछ,क्षण में कुछ। सत्य को मिथ्या, असत्य को सत्य,कुरुप को रुप,रुप को कुरुप बताते रहती है। जिसका कोई अस्तित्त्व ही नहीं,उसे अस्तित्त्ववान साबित कर देती है अपनी वाक्पटुता से,चातुर्य से। वेदान्तवादियों ने इसे ठीक से पहचाना है, और जैसे छोटे से लौह अंकुश से विशाल गजराज वशीभूत हो जाता है, उसी भांति धर्माचरण के अंकुश से इसे वश में करने की युक्ति सुझायी है।  दश लक्षणयुक्त धर्मानुयायी सदा इस बहुरुपा के चंगुल से बाहर निकलने में सफल हो जाता है। या कहें उसकी अनेकरुपता ही निरस्त होजाती है- धर्माचारी के सामने। अतः विद्वान मनुष्य को सतत सावधान रहकर, यत्न पूर्व धर्म का पालन करना चाहिए। (अब यहां धर्म को हिन्दू,मुसलमान, ईसाई,पारसी,जैन,बौद्ध,सिक्ख आदि न समझ ले कोई। ये सब धर्म कदापि नहीं हैं। ये सब बहुरुपा बुद्धि के भ्रमजाल हैं हमें फंसाने-उलझाने हेतु।) धर्मस्य तत्त्वं निहिते गुहायां...। अस्तु।

प्रश्न . को वा चित्रकथं वंधं वेत्ति संसार गोचरः –  विचित्र चित्रबंध क्या है ?

उत्तर— अब वटुक सुतनु देवर्षि के चित्रवंध विषयक चौथे प्रश्न का उत्तर दे रहा है । मुनियों ने जिसे नहीं कहा है, यानी तत्त्वदर्शियों द्वारा जो प्रमाणित(अनुभूत)नहीं है, जो वचन देवों को मान्य नहीं है यानी स्वीकार नहीं है,उसे ही विद्वानों ने विचित्र कथा से मुक्त बन्ध(वाक्यविन्यास) कहा है। तथा जो कामयुक्त वचन है, वह भी इसी श्रेणी में आता है। ऐसा वचन कदापि सुनने और मानने योग्य नहीं है। वास्तव में वह बन्धन है,मोक्ष कदापि नहीं।अस्तु।

प्रश्न . को वार्णवमहाग्राहं वेत्ति विद्यापरायणः - समुद्र में रहने वाले सर्वाधिक भयंकर महाग्राह का ज्ञान किसे है ?

उत्तर- एको लोभो महान् ग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते । लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते ।। स्कन्दपुराण कुमारिकाखंड ३-२७७ से प्रारम्भ कर अगले दश श्लोकों में लोभ रुपी महाग्राह की विशद चर्चा है । संसार रुपी महार्णव में उबचूब हो रहे प्राणी(विशेष कर मनुष्य - जो एकमात्र बुद्धि सम्पन्न है) को लोभ रुपी महाग्राह सदा ग्रसे रहता है । काम, क्रोध, मोहादि सब इसके ही साथी-संगी हैं। कहा गया है- लोभः पापस्य कारणम् । बहुधा पापों का मूल कारण लोभ ही है। इसका स्वरुप सर्वदा एक समान नहीं रहता। बहुत बार तो इसे ठीक से पहचानने भी कठिनाई होती है। और न पहचान पाने के कारण बुद्धिमान मनुष्य भी लोभ के शिकार हो जाते हैं। लोभी अजितेन्द्रिय पुरुष में दम्भ,द्रोह,निन्दा,चुगली,डाह आदि दुर्गुण सहज ही समाविष्ट हो जाते हैं। लोभासक्त मनुष्य सदाचार से दूर हो जाता है। ऐसे लोगों की गति तिनके-पत्तों से ढके गहरे कुंए के पार जाने जैसी होती है,जो युक्तिवाद का आश्रय लेकर अनेकानेक पन्थ चला देते हैं, और धर्म के सन्मार्ग का लोप कर देते हैं।  यहां तक कि धर्म को अलंकार बनाकर संसार को ठगने-लूटने का साधन बना लेते हैं। अतः प्रज्ञावान पुरुष को सदा इससे सावधान रहना चाहिए। अस्तु।

प्रश्न . - को वाष्टविधं ब्राह्मण्यं वेत्ति ब्राह्मण सत्तमः - अष्टविध ब्राह्मणों का ज्ञान किसे है ?

उत्तर- अब देवर्षि नारद के छठे प्रश्न का उत्तर देते हुए ब्राह्मण वटुक सुतनु कहते हैं- अथ ब्राह्मणभेदांस्त्वमष्टौ विप्रावधारय । मात्राश्च ब्राह्मणश्चैव श्रोत्रियश्च ततः परम् ।। अनूचानश्च तथा भ्रूणो ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः । इत्येतेऽष्टौ समुद्दिष्टा ब्राह्मणाः प्रथमं श्रुतौ ।। तेषां परं परः श्रेष्टो विद्यावृत्तविशेषतः । ब्राह्मणानां कुले जातो जातिमात्रो यदा भवेत् । अनुपेतक्रियाहीनो मात्र इत्यभिधेयते ।। एकोदेशमतिक्रम्य वेदस्याचारवानृजुः । स ब्राह्मण इति प्रोक्तो निभृतः सत्यवाग्घृणी ।। एकां शाखां सकल्पां च षड्भिरङ्गैरधीत्य च । षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियो नाम धर्मवित् ।। .... 
(नोट— आलेख बोझिल होने के वजह से सभी श्लोकों को यहां नहीं दिया जा रहा है। जिज्ञासुओं को इसे मूल ग्रन्थ में देखना चाहिए।) 

इस प्रकार स्कन्दपुराण कुमारिका खंड ३- २८७ से २९८ तक बारह श्लोकों में ब्राह्मणों के आठ भेद (कर्मानुसार) बतलाये गये हैं।  यथा- १. मात्र,२.ब्राह्मण, ३.श्रोत्रिय, ४.अनुचान, ५.भ्रूण, ६.ऋषिकल्प, ७.ऋषि, और ८.मुनि । ज्ञान, विद्या और सदाचार की विशेषता से उक्त आठ प्रकार पूर्व-पूर्व की तुलना में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ कहे गए  हैं।

अब यहां संक्षेप में इनका विशेष परिचय भी दिए देता हूँ, ताकि सामान्य जन को समझने में सुविधा हो।

यथा- .मात्र- जो मात्र जन्मना ब्राह्मण है,यानी माता-पिता ब्राह्मण हैं जिनके,परन्तु उसका निज संस्कार उपनयनादि, संध्यावन्दनकर्मादि लोप हो गया है, वह मात्र नामक ब्राह्मण कहलाता है।

२.ब्राह्मण- जो व्यक्तिगत स्वार्थ की उपेक्षा करके,वैदिक आचार का पालन करते हुए, सरल,एकान्तप्रिय,सत्यवादी और दयालु है उसे ब्राह्मण कहते हैं।(ध्यातव्य है कि यहां अष्टविध ब्राह्मणों में ब्राह्मण एक प्रकार है, न कि जाति बोधक)

३.श्रोत्रिय- जो वेद की किसी एक शाखा को कल्प और षडङ्गों सहित पढ़ कर, ब्राह्मणोंचित षट्कर्मों (अध्यापन, अध्ययन, यजन,याजन,दान,प्रतिग्रह) में संयमित,संलग्न रहता है वह धर्मज्ञ विप्र श्रोत्रिय कहलाता है। (ध्यातव्य है कि आजकल श्रोत्रिय एक जाति/प्रकार बोधक शब्द बन कर रह गया है)

४.अनुचान- उक्त श्रोत्रिय के लक्षणयुक्त ब्राह्मण कल्प और षडङ्गों का तत्त्वज्ञ होकर,अपने ही अनुकूल शुद्ध,पापरहित विद्वान,श्रोत्रिय विप्र निर्मित करने की योग्यता रखता हो उसे अनुचान(श्रोत्रिय से किंचित श्रेष्ठ )कहा गया है।

५.भ्रूण- जो अनुचान के समस्त गुणों से युक्त ब्राह्मण यज्ञ और स्वाध्याय में ही सदा रमा रहता है,यज्ञशिष्टान्न भोजी होता है, और सभी इन्द्रियों को अपने अधीन रखता है,विद्वान लोग उसे भ्रूण ब्राह्मण कहते हैं।

६.ऋषिकल्प- जो सम्पूर्ण वैदिक-लौकिक विषयों का ज्ञानार्जन करके,मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा आश्रम में निवास करता है,उसे ऋषिकल्प कहा गया है।

७.ऋषि- जो पहले ऊर्ध्वरेता (नैष्टिक ब्रह्मचारी) के रुप में जीवन व्यतीत करता है,उसे किसी विषय का संदेह नहीं रहता,तथा जो शाप और अनुग्रह में पूर्ण समर्थ और सत्यनिष्ठ रहता है, उसे ऋषि कहा जाता है।

८.मुनि- निवृत्ति मार्ग में स्थित सम्पूर्ण तत्त्वों का ज्ञाता,काम क्रोधादि से रहित, ध्याननिष्ठ,निष्क्रिय,जितेन्द्रिय, तथा मिट्टी और सोने में समानता रखता हो,ऐसे ब्राह्मण को मुनि कहा गया है।


इस प्रकार ज्ञान,कर्म और स्वभावानुसार ब्राह्मणों के आठ प्रकार कहे गए।

क्रमशः..

Friday, 14 April 2017

मगमहिमा और मेरी व्यथा - तीसरा भाग

गतांश से आगे...
मगमहिमा और मेरी व्यथा -  तीसरा भाग
() देवर्षि नारद का प्रथम प्रश्न और सुतनु ब्राह्मण वटुक  द्वारा  तदुत्तर –
प्रश्नः- .मातृकां को विजानाति,कतिधा कीदृशाक्षरम् मातृकाविद्या का ज्ञाता कोई है , अक्षर कितने हैं और उनका वैज्ञानिक स्वरुप क्या है ?
उत्तर-  ऊँकारः प्रथमस्तस्य चतुर्दश स्वरास्तथा। वर्णाश्चैव त्रयस्त्रिंशदनुस्वारस्तथैव च ।।  विसर्जनीयश्च परो जिह्वा मूलीय एव च । उपध्मानीय एवापि द्विपञ्चाशदमीस्मृताः ।।  अकारः कथितो ब्रह्मा उकारो विष्णुरुच्यते । मकारश्च स्मृतो रुद्रस्त्रयश्चैते गुणाः स्मृताः ।। अर्द्धमात्रा च या मूर्ध्निं परमः स सदाशिवः।। (प्रथम मातृकावर्ण ऊँकार है, जो अ-उ-म का संघटन है। अ- ब्रह्मा, उ-विष्णु, म-रुद्र- त्रिगुणमय स्वरुप हैं। अनुस्वार स्वरुप अर्द्धमात्रा ही सदाशिव हैं।) अकार से औकार तक चौदह स्वर,ककारादि तैंतीस व्यंजन,अनुस्वार,विसर्ग,जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये कुल मिलाकर बावन मातृतावर्ण हैं। अकार से औकार पर्यन्त चौदह स्वर ही चौदह मनु हैं। इनके प्रसिद्ध नाम हैं— स्वायम्भुव,स्वारोचिष,औत्तम,रैवत,तामस,चाक्षुष, वैवश्वत,सावर्णि,ब्रह्मसावर्णि,रुद्रसावर्णि,दक्षसावर्णि,धर्मसावर्णि,रौच्य तथा भौत्य । श्वेत,पाण्डु,लोहित,ताम्र, पीत,कपिल, कृष्ण,श्याम,धूम्र,अतिपिंगल,अल्पपिंगल,त्रिरंग,बहुरंग एवं कवर—ये क्रमशः उक्त चौदह मनुओं के रंग हैं।  क से ठ पर्यन्त बारह व्यंजन मूलतः द्वादशादित्य हैं। इन बारहों के क्रमशः प्रसिद्ध नाम हैं — धाता,मित्र,अर्यमा,शक्र, वरुण,अंशु,भग, विवस्वान्, पूषा, सविता,त्वष्टा और विष्णु। ड से ब पर्यन्त ग्यारह रुद्र हैं। ये हैं क्रमशः- कपाली,पिंगल,भीम, विरुपाक्ष,विलोहित, अजक, शासन, शास्ता,शम्भु,चण्ड और भव। भ से ष पर्यन्त आठ वसु हैं। यथा- ध्रुव,घोर, सोम,आप, नल,अनिल,प्रत्यूष तथा प्रभास। स और ह ये दोनों अश्विनीकुमार हैं। इस प्रकार ये तैंतीस देवता हुए। प्रकारन्तर में ये ही तैंतीस कोटि कहे गए। ध्यातव्य है कि यहां कोटि शब्द प्रकार बोधक है,न कि संख्या बोधक। अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये चार अक्षर ही क्रमशः जरायुज, अण्डज,पिण्डज और उद्भिज नामक चार प्रकार के जीव हैं सृष्टि में। अनुस्वारो विसर्गश्च जिह्वामूलीय एव च। उपध्मानीय इत्येते जरायुजास्तथाऽण्डजाः । स्वेदजाश्चोद्भिञ्जाश्चापि पितर्जीवाः प्रकीर्तिताः ।। (स्क.पु.कुमारिकाखंड ३-२५४)

आगे, विप्र कुमार सुतनु ने देवर्षि नारद को बतलाया कि जो पुरुष उक्त देवों का आश्रयी होकर निज कर्मानुष्ठान में सतत तत्पर रहते हैं वे ही अर्द्धमात्रा स्वरुप सदाशिव को लब्ध होते हैं। ध्यातव्य है कि आमतौर पर लोग शिव, शंकर, रुद्र, सदाशिव आदि को एक ही मान लेते हैं,जब कि इनमें पर्याप्त अन्तर है। अतः यात्रापथान्तर भी स्वाभाविक है। अस्तु।


(नोटः-उक्त मातृका विषय साधनाविधि सहित मैंने अपने तान्त्रिक उपन्यास— बाबाउपद्रवीनाथ का चिट्ठा में और भी विस्तार से वर्णित किया है। जिज्ञासु बन्धु इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं— punyarkkriti.simplesite.com के उपन्यास सेक्शन में,तथा punyarkkriti.blogspot.com . यानी इसी ब्लॉग के विगत पोस्ट में देख सकते हैं।)

क्रमशः...

मगमहिमा और मेरी व्यथा - दूसरा भाग

गतांश से आगे...
मगमहिमा और मेरी व्यथा का दूसरा भाग

() कलापग्राम : परिचयात्मक यात्रा
मत्स्य पुराण के प्रारम्भ में ही प्रसंग है— मनु स्नानोपरान्त तर्पणार्थ अंजली में जल ग्रहण किए,तभी उन्हें शफरी (अतिलधुमत्स्य) का दर्शन हुआ। दयार्द्र ऋषि ने उसे अपने कमण्डलु में डाल दिया। थोड़े ही पल में उसके आकार में वृद्धि हुयी और कमण्डल छोटा पड़ने लगा। आगे क्रमशः उसका त्वरित आकार-वृद्धि होता रहा और उसे कूप, सरोवर,सरितादि में स्थानान्तरण करते रहे ऋषि। अन्त में अति जिज्ञासु भावापन्न ऋषि ने सादर निवेदन किया- परिचय स्पष्टी हेतु। वस्तुतः प्रभु का मत्स्यावतार था वह। प्रभु ने मनु को आज्ञा दी कि सृष्टि के समस्त बीज यथाशीध्र एक नौका में संग्रहित कर दिये जायें, क्यों कि आसन्न महाप्रलय में सबकुछ जलमग्न होजाना है। उस नौका को महामत्स्य के विशाल श्रृंग में बांध कर प्रभु कलाप ग्राम की यात्रा पर निकल पड़े।
योग्य विप्र की खोज में देवर्षि नारद भूमंडल छान मारने के पश्चात् निराश हो उसी कलापग्राम की यात्रा पर निकले, क्यों कि उन्हें विश्वास था कि वहां उन्हें दिव्य विप्रों का दर्शन अवश्य मिलेगा,जिनसे उन्हें अपने द्वादश जटिल प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होगा।

यात्रा काशी से प्रारम्भ होती है केदारक्षेत्र की ओर,जहां सौ योजन विस्तार वाला हिमाच्छादित प्रदेश है। उसे पार करने पर कलापग्राम की सीमा तो प्रारम्भ हो जाती है,किन्तु भूस्वर्ग उससे भी सौयोजन दूर है,जो प्रायः वालुकौघ है। उसे पार करने हेतु अति गुप्त मार्ग (सुरंग) से गमन करना पड़ता है- अन्न-जलादि त्याग पूर्वक। किंचित आगे बढ़ने पर दक्षिणमुख कार्तिकेय का दर्शन होता है। उनकी कृपा प्राप्त करने के पश्चात आगे का मार्गनिर्देश मिलता है,जो उनके स्थान से पश्चिम की ओर सात सौ योजन विस्तार वाला है। नीरव गुफा में मरकतमणि-मंडित शिवलिंग का दर्शन होता है। आगे बढ़ने पर सुवर्ण सदृश मिट्टी मिलती है। उस मिट्टी को ग्रहण कर, आगे बढ़ स्तम्भतीर्थ में स्नानोपरान्त , तत्उपस्थित कुमार और वाराह का दर्शन-आराधन करना चाहिए।  वहीं अर्द्ध रात्रि में  कूपजल ग्रहण करे,और उस जल में सुवर्णमृत्तिका का घोल बना कर,आंखों में अँजन करे तथा पूरे शरीर में लेपन भी करे। आगे लगभग साठ पग गमनोपरान्त  एक अति सुन्दर गुहा का मुख दीखेगा,जिसमें निःशंक यात्रा करे। उस गुहा में असंख्य कारीयकीट मिलेंगे,किन्तु सुवर्णमृत्तिका लेपन के प्रभाव से यात्रा किंचित भी बाधित नहीं कर पायेंगे। उस गुहा में निरंतर आगे बढ़ते जाना है,जहां दिव्यातिदिव्य सूर्य-सदृश सिद्धों का दर्शन लाभ होगा। गुहा समाप्ति के पश्चात् ही कलापग्राम अवस्थित है। अस्तु।
क्रमशः...

Sunday, 9 April 2017

मग-महिमा और मेरी व्यथा

                         मग-महिमा और मेरी व्यथा
पहला भाग

महाभारत वर्णित यक्षप्रश्न की तरह स्कन्दपुराणान्तर्गत नारदप्रश्न भी है,जिसे बहुत कम लोग जानते होंगे। गरिमामय प्रश्न अति चुनौती पूर्ण है। प्रश्नों की संख्या मात्र बारह है,जो भट्टादित्य महामठस्थापन प्रसंग में वर्णित है। उसकी कुछ बानगी यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। यथा-
मातृका को विजानाति,कतिधा कीदृशक्षरम् । पञ्च-पञ्चाद्भुतं गेहं को विजानाति वा द्विजः ।। बहुरुपां स्त्रियां कर्तुंमेकरुपाञ्च वेत्ति कः । को वा चित्रकथो वंधं वेत्ति संसार गोचरः ।। को वार्णव महाग्राहं वेत्ति विद्या परायणः । को वाष्टविधि ब्राह्मण्यं वेत्ति ब्राह्मण सत्तमः ।।…..

भट्टादित्य महामठस्थापन हेतु नारद जी अपनी वीणा पर उक्त प्रश्नावली का गान करते हुए, भूमंडल पर सर्वश्रेष्ठ द्विजों की खोज में भटकने लगे। प्रश्न थे— मातृकाविद्या का ज्ञाता कोई है ?  अक्षर कितने हैं और उनका वैज्ञानिक रुप क्या है ? पांच गुने पांच यानी पच्चीस के अद्भुत गृह को कौन जानता है ? बुहरुपा स्त्री को एकरुपा बनाने की कला किसे मालूम है? विचित्र चित्रबंध क्या है ? सर्वाधिक भयंकर महाग्राह का ज्ञान किसे है ? अष्टविध ब्राह्मणों का ज्ञान किसे है ? चारो युगों के प्रथम दिन कौन-कौन हैं ? चौदह मन्वन्तरों की आद्यतिथि क्या है ? सर्वप्रथम सूर्यनारायण किस दिन रथारुढ़ हुए ? नित्यप्रति संसार को उद्विग्न कौन करता है ? सुदक्ष कौन है ?

नारदजी की मान्यता थी कि इन प्रश्नों का सम्यक् ज्ञाता ही सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कहा जाना चाहिए। उनकी मान्यता का दूसरा पहलू ये भी हो सकता है कि जिसे इन प्रश्नों का उत्तर न मालूम, वो ब्राह्मण कहाने के योग्य नहीं। और वैसे ही सुयोग्य ब्राह्मण की खोज में भटक रहे थे देवर्षि ।  सुदीर्घ भटकाव के पश्चात् वे कलाप ग्राम पहुंचे,जो द्विजोत्तमों का प्रधान ग्राम कहा जाता था। ज्ञातव्य है कि ये वही ग्रामश्रेष्ठ है,जहां महाप्रलय काल में सृष्टिबीज संग्रहित किया जाता है। देवर्षि अपना प्रश्न वहां भी रखे,जिसके उत्तर में एक विप्र ने कहा कि हे महाराज ! इन प्रश्नों का उत्तर तो हमारे यहां बच्चा-बच्चा जानता है। कृपया इन सामान्य प्रश्नोत्तरों में हमारा समय नष्ट न करें। कोई और गूढ़ बात हो तो हमसे चर्चा करें।

ये तो रहा प्रश्न,वो भी पौराणिक काल का, किन्तु आगे जो कहना चाह रहा हूँ, वो बिलकुल ही पौराणिक नहीं है। हां, प्रसंग कोई साठ साल पुराना जरुर है। मेरे पितृव्य पं.वालमुकुन्द पाठक जी उत्तराखंड की यात्रा पर थे। जमाना अतिथि देवो भव वाला था, होटल-ग्राहको भव वाला बिलकुल नहीं। दिन भर की यात्रा के बाद, जहां अन्धेरा हुआ, किसी द्वार पर दस्तक दें दें, स्वागत के लिए तत्पर है वह। मेरे स्वयंपाकी पितृव्य महोदय भी ऐसे ही एक विप्र के द्वार पर टिके। एक बालिका ने चूल्हा-चौका,अन्नादि का प्रबन्ध कर दिया। गृहस्वामी ने सादर निवेदन किया कि सबकुछ व्यवस्थित है,आप अपना भोजन बनायें। किन्तु पितृव्य ने कहा कि ईंधन तो है,पर अग्नि नहीं। बालिका शायद भूल गयी है। गृहस्वामी मुस्कुराये,और अपनी बालिका को बुलाकर कहा कि पंडितजी को आग जलाने में सहयोग करो। फुदकती हुयी छोटी बालिका आयी। गोइठा तोड़ कर सजायी,और हाथों में उठा कर,फूंक मार दी। अग्नि प्रज्वलित हो उठा। पितृव्य आवाक। उधर गृहस्वामी भी। गृहस्वामी ने सशंकित दृष्टि डाली — पंडितजी ! आपने तो कहा कि हम शाकद्वीपीय ब्राह्मण हैं, और भोजन बनाने के लिए आग मांग रहे हैं ? मेरे यहां तो छोटी बच्चियां भी निपुण हैं इस विधा में...।

मेरे दादा-परदादा हाथी रखते थे,हम उसकी सांकल झनझनाते फिर रहे हैं— यही तो दशा है हमारी। कहने को तो मगद्विजकुलोद्जात हैं,परन्तु सामान्य संध्या-गायत्री से भी कोसों दूर। जब कि शास्त्र कहते हैं कि तीन दिन भी संध्या-गायत्री छूठ जाये तो ब्राह्मण चाण्डालवत हो जाता है। कृष्ण ने गीता में विप्र-कर्म-संकेत किया है— शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। या फिर एक और संकेत है,जो शायद सरल लगे — अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन,दान-प्रतिग्रह वाला । किन्तु यहां भी घपला मार जाते हैं - तीनों जोड़ों को अधियाकर — ज्ञानार्जन में अभिरुचि नहीं,प्रवचन खूब करते हैं। स्वयं यजन में जरा भी रुचि नहीं,पर याजन(यजमनिका) को परम कर्तव्य समझते हैं। दान लेने हेतु सदा हाथ पसरा रहता है,पर देने में महा संकोची...।


लगता है देवर्षि को पुनः कलापग्राम की यात्रा करनी होगी- नये बीज हेतु, किन्तु डर है कि कहीं वो भी हाईब्रीड न हो ! महाकवि की उक्ति याद आती है- हम कौन थे,क्या हो गए,और क्या होंगे अभी ? आओ विचारें बैठ कर, हम समस्यायें सभी....। उत्तिष्ठ ! जाग्रत ! !
क्रमशः...

Thursday, 23 March 2017

राशिफल एवं कुछ अन्य खास बातें

    

सम्वत् २०७४ का साम्वत्सरिक राशिफल एवं कुछ अन्य खास बातें   :-----
           
सम्वत् २०७४ का नया पञ्चांग २९ मार्च २०१७ से लागू होने वाला है, जो आगामी १७  मार्च २०१८ तक जारी रहेगा। आंग्ल नववर्ष (कैलेन्डर इयर) प्रारम्भ होने के बाद कई बन्धुओं ने आग्रह किया था राशिफल पोस्टिंग के लिये, किन्तु पुराने सम्पर्की बन्धु जानते हैं कि मैं साम्वत्सरिक राशिफल पोस्ट करता हूँ। हर वर्ष की भांति इस बार भी वार्षिक (साम्वत्सरिक) राशिफल प्रस्तुत किया जा रहा है। किन्तु इससे पूर्व नये सम्वत् के सम्बन्ध में कुछ खास बातें जानने योग्य हैं, जिन्हें यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।

वर्ष के प्रारम्भ में साधारण नामक सम्वत्सर रहेगा, किन्तु ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी शुक्रवार, दिनांक १९ मई २०१७ को (गया समयानुसार) दिन में ११बजकर ३९ मिनट से विरोधकृत नामक सम्वत्सर का प्रवेश हो जायेगा, परन्तु वर्ष पर्यन्त संकल्पादि में साधारण नामक सम्वत्सर का ही प्रयोग करना चाहिए, क्यों कि नियम है कि वर्षप्रवेश में जो नामधारी है, वही आगे भी संकल्पित होना चाहिए। ऐसा प्रायः हर वर्ष ही होता है।

अभी हाल में ही कुछ बन्धुओं ने जिज्ञासा प्रकट की थी कि ये सम्वत का  नाम निर्धारण किस आधार पर होता है।  प्रसंगवश यहां सम्वत-नाम-वोध हेतु ज्योतिषीय सिद्धान्त की भी चर्चा कर दे रहा हूँ।

सम्वत्सर आनयन विधिः-
हमारे यहां वर्ष(काल)-गणना की अनेक रीतियां हैं। अनेक प्रकार भी हैं।  विक्रमी सम्वत,शक सम्वत, श्रीकृष्ण सम्वत,फसली, हिजरी, बंगीय,ईस्वीसन् इत्यादि। ज्योतिषीय गणना में विक्रमी सम्वत और शक सम्वत की विशेष मान्यता है। ये विक्रमी संवत की गणना महाराज विक्रमादित्य के राज्यारोहण से की जाती है। विक्रमादित्य के राज्याभिषेक के १३५ वर्षों बाद शालिवाहन नामक राजा हुए, जिन्होंने शकसम्वत चलाया। यानी कि शक सम्वत जानने के लिए विक्रम सम्वत में से १३५घटाना चाहिए,तदनुसार शक सम्वत में  १३५ वर्ष जोड़ने से विक्रमाब्द की जानकारी हो जायेगी। सर्वाधिक प्रचलित इस विक्रमाब्द के क्रमशः प्रभवादि ६० नाम दिये गये हैं। यानी प्रत्येक सम्वसर का एक अपना नाम होता है और इन क्रमिक नामों की पुनरावृति प्रत्येक साठ वर्षों पर होती रहेगी। अब प्रश्न है कि कैसे जाना जाय कि वर्तमान सम्वत् का क्या नाम होना चाहिए। इसके लिए मुख्यतया दो सूत्र कहे गये हैं-

. शाकेन्द्रकालःपृथगाकृतिघ्नः,शशांकनंदाश्वियुगैःसमेतः। शराद्रिवस्विंदुहतःसलब्धःषष्ट्याप्तशेषे प्रभवादयोष्टौ।। अर्थात प्रभवादि षष्ठी सम्वत्सरों में कौन सा सम्वत्सर चल रहा है,जानने के लिए ज्ञात शालीवाहन शक को दो स्थानों पर अलग-अलग लिखेंगे। अब एक जगह की शकसंख्या में २२ से गुणा करेंगे, और प्राप्त गुणनफल में ४२९१ को जोड़कर,फिर उस योगफल में १८७५ से भाजित करेंगे। इससे प्राप्त लब्धि को दूसरी जगह लिखे गए शक संख्या में जोड़ देंगे। इससे प्राप्त योगफल यदि ६० के भीतर हो तो क्रमशः गणना करके प्राप्त उस नाम को ग्रहण करेंगे, और यदि साठ से अधिक हो तो साठ घटा कर शेष से संवत क्रमांक का निर्धारण करेंगे।
.इस सम्बन्ध में दूसरा सूत्र और भी सरल है-     शाकंरामाक्षि संयोज्यं षष्ठि भागेनहर्यते । शेषंसंवत्सरंज्ञेयंलब्धंतत्परिवर्तकम्।। अर्थात   सम्वत नाम ज्ञात करने के लिए शालिवाहन शक को २३ में जोड़ने से जो अंक प्राप्त हो, उसमें ६० का भाग देने से,जो शेष रहे उसको ही सम्वत्सर जाने। उसमें एक जोड़ने से वर्तमान सम्वतसर होता है।

अब यहां प्रसंगवश सम्वत्सर के नाम गिनाये जा रहे हैं-
प्रभवो विभवः शुक्लःप्रमोदोथ प्रजापतिः ।               अंगिरा श्रीमुखो भावो युवा धाता तथैव च ।।  
ईश्वरो बहुधान्यश्च प्रमाथी विक्रमो वृषः ।             चित्रभानुः सुभानुश्च तारणः पार्थिवोऽव्यय ।।
सर्वजित् सर्वधारी च विरोधी विकृतिः खरः।               नंदनो विजयश्चैव जयो मन्मथदुर्मुखौः।।
हेमलम्बी बिलम्बी च विकारी शर्वरी प्लवः।   शुभकृच्छोभनः क्रोधी विश्वावसुपराभवौ।।
प्लवंगः कीलकः सौम्यः साधारणो विरोधकृत्।       परिधावी प्रमादी च आनन्दो राक्षसो नलः।।
पिंगलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थी रौद्र दुर्मुती।                 दुम्दुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षी क्रोधनः क्षयः।।

यथाः-

१.      प्रभव
२.      विभव
३.      शुक्ल
४.      प्रमोद
५.      प्रजापति
६.      अंगिरा
७.      श्रीमुख
८.      भाव
९.      युवा
१०.  धाता
११.  ईश्वर
१२.  बहुधान्य
१३.  प्रभावी
१४.  विक्रम
१५.  वृष
१६.  चित्रभानु
१७.  सुभानु
१८.  तारण
१९.  पार्थिव
२०.  व्यय
२१.  सर्वजित
२२.  सर्वधारी
२३.  विरोधी
२४.  विकृति

२५.  खर
२६.  नन्दन
२७.  विजय
२८.  जय
२९.  मन्मथ
३०.  दुर्मुख
३१.  हेमलम्बी
३२.  विलम्बी
३३.  विकारी
३४.  शार्वरी
३५.  प्लव
३६.  शुभकृत
३७.  शोभन
३८.  क्रोधी
३९.  विश्वावसु
४०.  पराभव
४१.  प्लवंग
४२.  कीलक
४३.  सौम्य
४४.  साधारण
४५.  विरोधकृत्
४६.  परिधावी
४७.  प्रमादी
४८.  आनन्द
४९.  राक्षस
५०.  नल
५१.  पिंगल
५२.  कालयुक्त
५३.  सिद्धार्थ
५४.  रौद्र
५५.  दुर्मति
५६.  दुदुंभी
५७.  रुधिरोद्रारी
५८.  रक्ताक्षी
५९.  क्रोधन
६०.  क्षय




          इस सम्वत् २०७४ के प्रवेश के साथ-साथ कलियुग का ५११८ वर्ष व्यतीत हो जायेगा। प्रत्येक सम्वत्सर के एक राजा और मन्त्री हुआ करते हैं, जिनके स्वभावानुसार प्रजाजन सुख-दुःखादि भोग करती है। इस बार के राजा बुध हैं और मन्त्री गुरु । राजा का मंत्री के प्रति समता भाव है,किन्तु मंत्री का राजा के प्रति शत्रुभाव है ग्रहमैत्री चक्रानुसार। फलतः उच्चशासकों के बीच आपसी मतभेद की स्थिति बनी रहने की सम्भावना है। सामान्यतया देश में विकास कार्य प्रगति पर रहेगा,फिर भी समय-समय पर प्रजाजन किंचित कारणों से आक्रोशित भी होती रह सकती है। जगल्लग्नानुसार लग्नेश शनि आयभाव में विद्यमान हैं,अतः वैश्विक उन्नति तो होगी किन्तु राहु-मंगल दृष्टिसंयोग वश कुछ राष्ट्रों में आन्तरिक उथल-पुथल की स्थिति भी बनी रहेगी।  भारत का वैश्विक वर्चश्व निरंतर बढ़ता रहेगा। कृषि,उद्योग,तकनीकि आदि का विकास होगा। कुल मिलाकर भारत की स्थिति क्रमिक रुप से सुदृढ़ होगी।
अब यहां आगे क्रमशः मेषादि बारहों राशि के जातकों के लिए संक्षिप्त राशिफल प्रस्तुत किया जा रहा है। आमतौर पर सीधे अपनी राशि जानकर फल देख लेने की परम्परा है; किन्तु इस सम्बन्ध में मैंने पिछली बार भी कहा था,पुनः स्मरण दिला रहा हूँ— फल-विचार सिर्फ राशि से न करके, लग्न से भी करें। जैसे- मेरी राशि कुम्भ है और लग्न सिंह। सटीक फल विचार के लिए राशिफल-विवरण में दिए गये दोनों फलों का विचार करके निश्चय करना चाहिए। मान लिया कुम्भ राशि का फल उत्तम है,किन्तु सिंह लग्न का फल प्रतिकूल है। ऐसी स्थिति में निश्चयात्मक परिणाम मध्यम होगा ।

          दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि आपके नाम का प्रभाव भी सामान्य जीवन में काफी हद तक पड़ता है। हमारे यहां विधिवत नामकरण-संस्कार की परम्परा थी। नाम सार्थक हुआ करते थे, उनका निहितार्थ हुआ करता था; किन्तु अब तो इंगलैंड-अमेरिका के कुत्ते-विल्लयों का नाम हम अपने बेटे-बेटियों का रखकर गौरवान्वित होते हैं। नियमतः नाम के प्रथमाक्षर की राशि के फल का भी विचार कर लेना चाहिए। इस प्रकार त्रिकोणीय दृष्टि से राशिफल-विचार करना सर्वोचित है।

          एक और,सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य,जिसे लोग प्रायः नजरअंदाज कर देते हैं— व्योम-मण्डल में सत्ताइस नक्षत्र और बारह राशियों के परिक्रमा-पथ पर विचरण करते हुए सूर्यादि नवग्रह(ध्यातव्य है कि अरुण, वरुण, यम को प्राचीन भारतीय ज्योतिष में स्थान नहीं है) भूमण्डलीय समस्त पद-पदार्थों को प्रभावित(नियन्त्रित)कर रहे हैं। विश्व की आबादी सात अरब से भी अधिक की है। इन्हें मात्र बारह भागों में विभाजित करके किसी ठोस फलविचार / निर्णय पर पहुँचना कितना बचकाना(नादानी)हो सकता है? सिर्फ राशि वा लग्न के आधार पर मनुष्य मात्र को बांट देना क्या सही और समुचित नियम हो सकता है? आपका उत्तर भी ‘कादापि नहीं’ ही होगा। आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, शारीरिक,मानसिक आदि कई मापदण्ड होंगे इन्हें प्रभावित करने हेतु। इसके साथ ही अलग-अलग व्यक्तियों के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति,तथा वर्तमान(गोचर)स्थिति आदि कई बातों पर किसी व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य आधृत होता है। राशि तो मात्र जन्मकालिक चन्द्रमा की स्थिति को ईंगित करता है,और लग्न जन्मकालिक कक्षों (भावों)की सांख्यिकी मात्र है। अतः फलविचार कितना सार्थक-कितना निरर्थक हो सकता है,आप स्वयं समझ सकते हैं। पुनः यह कहना आवश्यक नहीं रह जाता कि राशिफल के आधार पर अपने जीवन को आशा-निराशा,प्रसन्नता-अप्रसन्नता के झूले में हिचकोले खाने से बचावें,और अपना तात्कालिक कर्म यथोचित रीति से करने का प्रयास करें। अस्तु।

          सुविधा के लिए ‘अबकहा चक्र-सारणी’ भी राशिफल के साथ प्रस्तुत है। इससे उन लोगों को भी लाभ होगा, जिन्हें अपनी राशि और जन्म-समय आदि की सही जानकारी नहीं है।

                         
  विक्रम सम्वत् २०७,शकाब्द १९३,खृष्टाब्द २०१७-१८

 {२९ मार्च २०१७ से १७  मार्च २०१८  } तक का राशिफल
                               
              बारह राशियों का क्रमानुसार फल-विचार



१.मेष राशि- (चू,चे,चो,ला,ली,लू,ले,लो,अ)- मेष राशि वाले लोगों के लिए यह वर्ष (संवत्) सामान्यतया शुभदायक रहेगा। आर्थिक स्थिति सामान्य सुदृढ़ रहेगी। किन्तु पारिवारिक उलझनों और किंचित विवादों का सामना करना पड़ सकता है। बाल-बच्चों का स्वास्थ्य किंचित चिन्ता का कारण बन सकता है। उनके पठन-पाठन में भी बाधायें आ सकती हैं। पुराने ऋण बोझ से तो मुक्ति मिलेगी,किन्तु नये ऋण की भी आशंका है। विरोधियों का प्रभाव कम होता प्रतीत होगा। धार्मिक कार्यों में बाधायें आयेंगी। माता-पिता को शारीरिक पीड़ा सता सकती है। व्यवसाय में सामान्य लाभ दीखेगा। कार्यक्षेत्र में परिवर्तन की सम्भावना है। नौकरी पेशा लोगों का स्थानान्तरण हो सकता है। दाम्पत्य-सुख की प्राप्ति होगी। निर्माण कार्य में आशातीत सफलता मिल सकती है। नये मित्रों का साथ मिलेगा। सम्वत् के चौथे,आठवें और दसवें महीने(चैत्रादि क्रम से)किंचित कष्टकारक हो सकते हैं। इन महीनों में कोई नया कार्य प्रारम्भ न करें। ध्यातव्य है कि ये महीने अंग्रेजी के नहीं वल्कि हिन्दी महीने से गिने जाने चाहिए। पहला यानी चैत्र,चौथा यानी आषाढ़,दसवां यानी पौष।  मेष राशि और मेष लग्न वाले लोगों के लिए लाल चन्दन का तिलक लगाना लाभ दायक होगा। अपने आराध्यदेव की उपासना नियमित करते रहें। इससे ग्रहजनित बाधाओं में शान्ति मिलेगी। साथ ही जन्म कुण्डली के अनुसार भी महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि पूर्ण सफलता लब्ध हो सके। अस्तु।

२.वृष राशि- (ई,उ,ए,ओ,वा,वी,वू,वे,वो)- वृष राशि वालों के लिए यह संवत् सामान्यतया शुभदायक रहेगा। ध्यातव्य है कि शनि की लघुकल्याणी(अढ़ैया)का प्रभाव शुरु हो गया है,इसके फलस्वरुप व्यर्थ की चिन्ता,भागदौड़,परेशानी,आर्थिक रुप से किंचित क्षति,पारिवारिक कलह-विवाद,मित्रों से वैर आदि का सामना करना पड़ सकता है। व्यापार में भी अचानक मन्दी का सामना करना पड़ सकता है,फिर भी कुल मिलाकर लाभ की स्थिति सही और सन्तोषजनक रहेगी। भूमि-भवन आदि से सम्बन्धित कार्यों में बाधा आ सकती है। वाहन दुर्घटना का शिकार होना पड़ सकता है। खास कर उन्हें जिनका निजी वाहन है,विशेष सावधान रहना चाहिए। हो सके तो सिद्धवाहनदुर्घटनायन्त्र अपने वाहन में स्थापित करा दें,ताकि सुरक्षा हो सके। न्यायालय से सम्बन्धित कार्यों में धन की फिजूलखर्ची होगी,फिर भी अनुकूल लाभ संदिग्ध है। नेत्रों में पीड़ा हो सकती है। अन्य कारणों से चोट चपेट भी लग सकता है। माता-पिता के लिए समय अनुकूल प्रतीत हो रहा है। सम्वत्सर का दूसरा,छठा,एवं दसवां महीना प्रतिकूल है। अतः इन महीनों में कोई नवीन कार्यारम्भ कदापि न करें। ध्यातव्य है कि ये महीने चैत्रादि क्रम से गिने जायें,न कि अंग्रेजी क्रम से। शिव की आराधना से विशेष लाभ होगा। शनि की प्रसन्नता हेतु यथासम्भव सामान्य आराधना(दीपदान,पीपल-दर्शन, जलदानादि) शनिवार को अवश्य करें। शनिस्तोत्र का पाठ करना लाभदायक होगा। संस्कृत का जिन्हें अभ्यास नहीं है, वे लोग शनि-चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। अभिमन्त्रित किया हुआ छतिवन की जड़ या छाल ताबीज में भर कर धारण करें। तत्काल शान्ति मिलेगी। साथ ही अपने आराध्यदेव की उपासना नियमित रुप से करते रहें। इससे ग्रह जनित बाधाओं में शान्ति मिलेगी। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके। अस्तु।


३.मिथुन राशि- (का,की,कु,घ,ङ,छ,के,को,हा)- मिथुन राशि वालों के लिए यह संवत्सर अपेक्षाकृत शुभदायक रहेगा। आर्थिक,सामाजिक,पारिवारिक,व्यावसायिक कार्यों में पूर्व की अपेक्षा अनुकूलता प्रतीत होगी। फलतः मान-सम्मान,ख्याति पर भी अनुकूल प्रभाव लक्षित होगा। सुख-सुविधा के संसाधनों की बढ़ोत्तरी होगी। फलतः इन पर व्यय होना स्वाभाविक है। फिर भी आय-व्यय का संतुलन प्रायः बना रहेगा। भूमि,भवन,वाहन,विविध निर्माण कार्य आदि का भी सुन्दर संयोग प्रतीत हो रहा है। बाल-बच्चों के लिए प्रगति सूचक संकेत हैं। वर्ष के उत्तरार्द्ध में भाइयों को शारीरिक कष्ट हो सकता है। सप्तम भाव के प्रभावित होने के कारण पति/पत्नी के लिए वर्ष के मध्य में शारीरिक पीड़ा,चोट-चपेट,ऑपरेशन आदि की आशंका है। (यानी मिथुन राशि वाले पुरुष की स्त्री प्रभावित होगी,एवं स्त्री का पति)।  विरोधियों की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है। पहला,पांचवां एवं नौवां महीना किंचित विशेष कष्टप्रद हो सकता है। (महीने की गणना हिन्दी रीति से करें) ।  कटहल का पका हुआ फल मौसम में उपलब्ध हो तो एक-दो बार अवश्य खा लें। कटहल की पत्तियों पर लड्डुगोपाल की मूर्ति को स्थापित कर नित्य पूजन करें। आशातीत लाभ होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।

४.कर्क राशि - (ही,हू,हे,हो,डा,डी,डू,डे,डो)- कर्क राशि के जातकों के लिए यह संवत् सामान्य शुभदायक रहेगा। व्यापार में लाभ तथा भूमि सम्बन्धी कार्यों में सफलता की आशा है। स्त्री को शारीरिक पीड़ा हो सकती है। चोट-चपेट के साथ छोटे-मोटे ऑपरेशन की आशंका है। व्यावसायिक यात्रायें प्रायः सफल होंगी। नौकरी पेशा लोगों के लिए भी यह वर्ष उत्तम रहेगा। वर्ष के प्रारम्भ में शत्रुपक्ष की प्रबलता दीखेगी,किन्तु क्रमशः उत्तरार्द्ध में विजय-लाभ लब्ध होगा। पहले से रुग्ण चले आ रहे कर्कराशि वालों के स्वास्थ्य में सुधार होगा। अन्य विविध रुके हुए कार्यों में गतिशीलता आयेगी। लेन-देन में सावधानी वरतनी चाहिए। वर्ष के उत्तरार्द्ध में भूमि-विवाद का सामना भी करना पड़ सकता है। वर्ष का दूसरा,छट्ठा और दसवां महीना किंचित कष्टदायक हो सकता है। पलाश के चार बीज लाल कपड़े में वेष्ठित(बांध कर) ताबीज की तरह धारण करें। पलास की लकड़ी और गोघृत से सोमवार की रात्रि में विधिवत हवन करें। इन उपचारों से बड़ी शान्ति मिलेगी,और सामयिक संकटों का निवारण होगा। सम्प्रति जारी उभयदशा पतिग्रहों की शान्ति पर भी ध्यान देना चाहिए। अस्तु।


५.सिंह राशि - (मा,मी,मू,मे,मो,टा,टी,टू,टे)- सिंह राशि वालों के लिए यह संवत्सर सामान्य शुभदायक रहेगा। वात-व्याधि,उदरशूल आदि शारीरिक कष्ट झेलने पड़ सकते हैं। स्त्री का स्वास्थ्य प्रतिकूल रह सकता है। तदनुसार सिंहराशि वाली स्त्री के पति का स्वास्थ्य प्रभावित रहेगा। जिसमें खास कर निम्नांगों की समस्या हो सकती है। सुख-सुविधा के संसाधनों पर व्ययाधिक्य की स्थिति बनी रहेगी,जिसके कारण किंचित सुखद चिंता बनी रहेगी। वर्षान्त तक पूर्व नियोजित कार्यों में आशातीत सफलता मिलने के आसार हैं। विरोधियों से सन्धिवार्ता सफल हो सकती है। नौकरी पेशा लोगों की उन्नति की आशा है। वर्ष का तीसरा,आठवां और बारहवां महीना किंचित कष्टकारक हो सकता है। अच्छा होगा कि इन महीनों में कोई नयी योजना पर अमल न करें। विविध कष्टों के निवारण के लिए शिव एवं हनुमद् आराधना शान्तिदायक होगा। वट वृक्ष का वरोह(ऊपर से नीचे की ओर लटकती जड़ें) जल में घिस कर तिलक लगायें। वरोह का छोटा टुकड़ा ताबीज में भर कर धारण करना भी लाभदायक होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।


६.कन्या राशि- (टो,पा,पी,पू,ष,ण,ठ,पे,पो)- कन्या राशि वालों के लिए यह संवत्सर सामान्य शुभाशुभ रहेगा। ध्यातव्य है कि शनि की लघुकल्याणी(अढ़ैया) का प्रभाव शुरु हो गया है, इसके फलस्वरुप व्यर्थ की चिन्ता,भागदौड़,परेशानी,आर्थिक रुप से किंचित क्षति,पारिवारिक कलह-विवाद,मित्रों से वैर आदि का सामना करना पड़ सकता है। बाल-बच्चों को शारीरिक कष्ट हो सकता है। अध्ययन-अध्यापन में विविध वाधायें आ सकती हैं। नेत्र-पीड़ा हो सकती है। अन्य संघातिक स्थिति का भी सामना करना पड़ सकता है। दाम्पत्य जीवन किंचित कटुतापूर्ण रह सकता है। प्रवासी जीवन व्यतीत हो सकता है। किसी सगे-सम्बन्धी का वियोग  हो सकता है। वर्ष के पूर्वार्द्ध की अपेक्षा उत्तरार्द्ध अधिक कष्टप्रद हो सकता है। व्यापार में स्वल्प लाभ के आसार हैं। धार्मिक कार्यों में वाधायुक्त सफलता मिल सकती है। वर्ष के तीसरे,सातवें और ग्यारवें महीने अधिक प्रतिकूल हो सकते हैं,अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें। शनि की आराधना यथा सम्भव करना लाभदायक होगा। आम के कच्चे और पके फलों को ब्राह्मण,भिखारियों और आत्मीय जनों में बांट कर सबसे अन्त में स्वयं भी खा लें। अद्भुत लाभ होगा। सम्भव हो तो आम के वृक्ष में नियमित जल डालें। यह भी आपके लिए लाभदायक होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।


७.तुला राशि- (रा,री,रु,रे,रो,ता,ती,तू,ते)- तुला राशि वालों के लिए यह सम्वत् सामान्य शुभदायक रहेगा। ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष के पूर्वार्द्ध से मानसिक,शारीरिक,आर्थिक कष्ट झेलने पड़ सकते हैं। चोट-चपेट की भी आशंका बनी रहेगी। स्वास्थ्य जनित वाधाओं के कारण प्रगति के कार्यों में भी रुकावटें आयेंगी। भाई-बन्धुओं को भी कष्ट झेलना पड़ सकता है। वाहन दुर्घटना की आशंका है। वाहन मालिकों को विशेष सावधानी वरतनी चाहिए। वाहन चोरी का भी योग दीख रहा है। सन्तान पक्ष से निराशा होगी। उनके अनुकूल कार्य वाधित होंगे। पारिवारिक कलह,तनाव की स्थिति बनी रह सकती है। नौकरी पेशा लोगों को तथा व्यापारी वर्ग को लाभ मिलने की सम्भावना है। माता-पिता की योजनायें असफल हो सकती हैं। वर्ष के तीसरे,छठे और दसवें महीने किंचित कष्टप्रद होंगे, अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें।  मौलश्री(बकुल) के पुष्प उपलब्ध हों तो उन्हें भगवान विष्णु (राम, कृष्णादि किसी विग्रह) पर अर्पित करें। मौलश्री की छाल को चूर्ण बनाकर ताबीज में भरकर धारण करें। विशेष लाभ होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।


८.वृश्चिक राशि- (तो,ना,नी,नू,ने,नो,या,यी,यू)- वृश्चिक राशि वालों के लिए यह वर्ष प्रायः  कष्ट और चिन्तायुक्त ही रहने की आशंका है। हालाकि लम्बे समय से चली  आ रही शनि की साढ़ेसाती का उतरता हुआ दौर अब प्रारम्भ हो चुका है,इस कारण पहले की अपेक्षा काफी राहत महसूस होगी। लम्बित कार्यों और स्थितियों में यत्किंचित सुधार प्रतीत होगा। फिर भी आर्थिक कष्ट, पारिवारिक अशान्ति,कलल, विवाद, मित्रवैर, प्रियजन वियोग,भाईयों को चोट-चपेट,दुर्घटना आदि की आशंका बनी रह सकती है। किन्तु इन सबके बावजूद सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ साथ प्रभावशाली कार्यों को करने का अवसर भी मिलेगा,जिससे सुख-शान्ति मिलेगी। माता-पिता को शारीरिक कष्ट झेलना पड़ सकता है। भूमि, भवन, वाहन आदि से सम्बन्धित कार्यों में धन-व्यय होगा, जिससे अर्थभार के चलते मानसिक तनाव बन सकता है। बाल-बच्चों का स्वास्थ्य प्रायः अनुकूल रहेगा। अध्ययन-अध्यापन में किंचित बाधायें आ सकती हैं। दाम्पत्य जीवन प्रायः सुखमय होना चाहिए। व्यापार और नौकरी पेशा वालों को स्वल्प लाभ के आसार हैं। कार्यक्षेत्र में परिवर्तन वा स्थानान्तरण का भी योग दीख रहा है। वर्ष का पहला,पांचवां और नौवां महीना किंचित कष्टकर हो सकता है। ध्यातव्य है कि मास-गणना हिन्दी रीति से करें- चैत्रादिक्रम से। इन महीनों में कोई नयी योजना पर कार्यान्वयन न करें। शनि की साढ़ेसाती का समुचित शमन करके उचित लाभ प्राप्ति हेतु शनि की यथोचित आराधना- जप,हवन,पाठ आदि करते रहना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि जिनकी जन्म कुंडली में शनि उच्च के होकर शुभस्थानों में बैठें हों उन्हें शनि की शान्ति हेतु हनुमान जी की आराधना नहीं करनी चाहिए,वल्कि सीधे शनि की आराधना ही श्रेयस्कर है।  ध्यातव्य है कि वर्ष के अन्दर शनि की  वक्री-मार्गी गति परिवर्तन के कारण साढ़ेसाती का प्रभाव किंचित बढ़ेगा और घटेगा भी,किन्तु इससे विशेष चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अपना सामान्य प्रयास जारी रखें। शान्ति-लाभ होगा। खैर की लकड़ी और घी से मंगलवार को दोपहर में यथोचित हवन करें। पान यदि खाते हों तो कत्था अधिक खायें। इन उपचारों से यथोचित लाभ मिलेगा। तात्कालिक महादशा, अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।

९.धनु राशि - (ये,यो,भा,भी,भू,ध,फ,ढ,भे)- धनु राशि वालों के लिए यह  संवत्सर प्रायः कष्ट और चिन्ताओं से घिरा हो सकता है। शनि के संचरण से साढ़ेसाती का प्रभाव जारी रहेगा, क्यों कि शनि का मध्य पाद इस राशि पर आरुढ़ हो चुका है। वर्ष के अन्दर इनका वक्री-मार्गी संचरण भी होगा,जिसके कारण परेशानियां कमोवेश होती प्रतीत होंगी। फिर भी कुल मिलाकर शनि का गहरा दुष्प्रभाव बना ही रहेगा। निरर्थक दौड़धूप,मानसिक तनाव, परेशानी, सन्ताप,    उद्विग्नता,आर्थिक-शारीरिक क्लेश आदि प्रायः वर्ष पर्यन्त झेलने पड़ेंगे। विशेष कर उदर व्याधि की आशंका है। वर्ष के प्रारम्भ में चोट-चपेट भी लग सकता है। भाइयों को भी शारीरिक पीड़ा हो सकती है। माता-पिता का स्वास्थ्य भी प्रतिकूल रह सकता है। अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में किंचित प्रगति के आसार हैं। किसी निकट सम्बन्धी का वियोग भी झेलना पड़ सकता है। व्यापारिक कार्यों में भी अवरोध प्रतीत हो रहा है। शनि की साढ़ेसाती का समुचित शमन करके उचित लाभ प्राप्ति हेतु शनि की यथोचित आराधना- जप,हवन,पाठ आदि करते रहना चाहिए। ध्यातव्य है कि वर्ष के अन्दर शनि की  वक्री-मार्गी गति परिवर्तन के कारण साढ़ेसाती का प्रभाव किंचित बढ़ेगा और घटेगा भी, किन्तु इससे विशेष चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अपना सामान्य प्रयास जारी रखें। शान्ति-लाभ अवश्य होगा।  सन्तान सुख का सुखद योग दीख रहा है। वर्ष का चौथा,आठवां और बारहवां महीना किंचित कष्टकारक हो सकता है। अच्छा होगा कि इन महीनों में कोई नयी कार्य-योजना न बनायें।  हल्दी का तिलक (स्त्रियों के लिए  पीला सिन्दूर का व्यवहार) लाभदायक होगा। अपने प्रिय देवता की आराधना करते रहें। विशेष कष्ट का निवारण अवश्य होगा। पीपल की लकड़ी और घी से प्रत्येक गुरुवार को यथोचित होम किया करें। इससे काफी राहत मिलेगी। जन्म कुंडली के तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।


१०.मकर राशि- (भो,जा,जी,खी,खू,खे,खो,गा,गी)- मकर राशि वालों के लिए यह संवत्सर प्रायः कष्ट और चिन्ताओं से घिरा हो सकता है। शनि के संचरण से साढ़ेसाती का प्रभाव जारी रहेगा, क्यों कि शनि का अग्र पाद इस राशि पर आरुढ़ हो चुका है। इस प्रकार मकर राशि वालों का शिरोभाग शनि के चपेट में आगया है। वर्ष के अन्दर इनका वक्री-मार्गी संचरण भी होगा, जिसके कारण परेशानियां कमोवेश होती प्रतीत होंगी। फिर भी कुल मिलाकर शनि का गहरा दुष्प्रभाव बना ही रहेगा। निरर्थक दौड़धूप,मानसिक तनाव,परेशानी, सन्ताप, उद्विग्नता, आर्थिक-शारीरिक क्लेश आदि प्रायः वर्ष पर्यन्त झेलने पड़ेंगे। विशेषकर मानसिक संताप अधिक झेलना पड़ सकता है। किसी बात में अनिर्णय की स्थिति बनी रह सकती है। हालाकि कोई निर्णय बहुत सोच-विचार कर और अनुभवियों की राय से ही करनी चाहिए। क्यों कि शनि के प्रभाव से गलत निर्णय(गलत कदम)की अधिक आशंका है। शारीरिक व्याधि- विशेष कर उदर व्याधि की आशंका है। पाचनतन्त्र की विशेष समस्या हो सकती है। गले और गर्दन सम्बन्धी समस्या भी सता सकती है। हड्डियों की समस्या भी सता सकती है। न्यायालय सम्बन्धी कार्यों में अकारण घसीटे जा सकते हैं।  पूर्व से चले आ रहे विवादों(न्यायिक मामलों) में प्रतिकूल स्थिति झलक रही है। व्यर्थ के खर्चे अधिक होंगे,जिनके कारण तनाव बना रहेगा। भूमि विवाद में भी उलझना पड़ सकता है।  साझेदारी के कार्यों में सोच-समझकर कदम बढ़ाना चाहिए, अन्यथा नुकसान और झगड़े खड़े होंगे। इस वर्ष में कोई नया कार्य तो कदापि न करें। विशेष कर वर्ष का तीसरा, सातवां और ग्यारहवां महीना तो विशेष विचारणीय है। शनि की साढ़ेसाती का समुचित शमन करके उचित लाभ प्राप्ति हेतु शनि की यथोचित आराधना- जप, हवन,पाठ आदि करते रहना चाहिए। ध्यातव्य है कि वर्ष के अन्दर शनि की  वक्री-मार्गी गति परिवर्तन के कारण साढ़ेसाती का प्रभाव किंचित बढ़ेगा और घटेगा भी, किन्तु इससे विशेष चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अपना सामान्य प्रयास जारी रखें। शान्ति-लाभ अवश्य होगा।  माता-पिता को धार्मिक कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए- ऐसा प्रतीत होता है। शीशम(विशेष कर काला शीशम) के फूल शीशे के पात्र में भर कर घर में सुविधानुसार किसी ऐसे स्थान पर  रखे दें जहां नित्य उन पर दृष्टि पड़ सके। सड़ने से पहले उसे विसर्जित कर दूसरा फूल रख दें। अद्भुत लाभ होगा। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए, ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।


११.कुम्भ राशि- (गू,गे,गो,सा,सी,सू,से,सो,दा)- कुम्भ राशि वालों के लिए यह सम्वत्सर सामान्य रहने की आशा है। परिवार में मांगलिक कार्य होने का शुभयोग प्रतीत हो रहा है। आर्थिक स्थिति किंचित कमजोर हो सकती है। न्यायिक मामलों में व्यर्थ का धन व्यय हो सकता है। माता-पिता को धार्मिक कार्य तीर्थयात्रादि का लाभ मिल सकता है। पत्नी/पति का स्वास्थ्य किंचित बाधायुक्त रहने की आशंका है। मित्रों, कुटुम्बियों, भाइयों आदि से अकारण विरोध का सामना करना पड़ सकता है। वर्ष को उत्तरार्द्ध में व्यापारिक कार्यों में प्रगति होगी। पूर्व में फंसे हुए धन की प्राप्ति का संयोग भी प्रतीत हो रहा है।  मनोवांछित पद-प्रतिष्ठा में व्यवधान आ सकता है। आय की तुलना में व्ययाधिक्य के कारण मानसिक क्लेश हो सकता है। विद्यार्थी वर्ग को समुचित लाभ होगा। परीक्षा में अच्छे अंक मिल सकते हैं। जमीन-जायदाद की समस्या सुलझ सकती है। भूमि सम्बन्धी नयी योजना सफल हो सकती है। ध्यातव्य है कि वर्ष का दूसरा,छठा और दसवां महीना किंचित कष्टप्रद है, अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें। सम्भव हो तो घर के पश्चिम दिशा में शमी का पौधा स्थापित करें और उसकी पत्तियां भगवान भोलेनाथ को नित्य अर्पित करें। शमी का फूल उपलब्ध हो तो उसे भी शिवार्पण करना चाहिए। शमी की लकड़ी और घी से शनिवार को संध्या समय हवन करने से विशेष लाभ होगा। शिव की आराधना लाभदायक होगी। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।


१२.मीन राशि-(दी,दू,थ,झ,ञ,दे,दो,चा,ची) - मीन राशि वाले लोगों के लिए यह संवत्सर प्रायः शुभदायक रहेगा। नवीन कार्यों का शुभारम्भ योग दीख रहा है। भाइयों की भी प्रगति का योग है। दाम्पत्य जीवन प्रायः सुखमय होगा।  सामाजिक प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। परिवार में शुभकार्यादि सम्पन्न होंगे। आय के नये स्रोत बनेंगे। धन-धान्य का बाहुल्य तो रहेगा, किन्तु व्यय भार किंचित बना रह सकता है। सम्वत्सर के मध्य में चोट-चपेट की आशंका है। शत्रु पक्ष पराजित होंगे। साझेदारी के कार्यों में किंचित विवाद हो सकता है। नौकरी पेशा वाले लोगों के स्थानान्तरण का योग दीखता है, किन्तु मनोनुकूल स्थान न मिलने की आशंका है, जिसके कारण मानसिक क्षोभ बना रहेगा। हो सकता है परिवार से थोड़ा अलग भी रहना पड़े। वर्ष का दूसरा, पांचवां और नौवां महीना किंचित कष्टप्रद होगा। अतः उन महीनों में कोई नवीन कार्य की योजना न बनावें और न पहल करें।  नित्य वटवृक्ष में जल डालना,परिक्रमा करना,तथा वरोह वा वट-पत्र को तकिये में डाल कर सोने से अद्भुत लाभ होगा। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।

नोटः- 1) अपने जन्मांक चक्रानुसार वर्तमान में जारी महादशा एवं अन्तर्दशा पतियों की शान्ति भी अवश्य करानी चाहिए, ताकि राशिफल के दुष्प्रभावों से बचा जा सके और अच्छे प्रभावों का सम्यक् लाभ लिया जा सके।

2) सिद्ध नवग्रहयन्त्र या अन्य आवश्यक यन्त्र आप चाहें तो मेरे यहां से मंगवा सकते हैं। इसके नित्य पूजन से समस्त ग्रहों की शान्ति और प्रसन्नता प्राप्त होती है।

3) धारण करने हेतु विभिन्न राशियों के यन्त्र भी अलग-अलग उपलब्ध हैं।
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