Tuesday, 21 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःबत्तीसवां भाग

गतांश से आगे....

   (सोलहवें अध्याय का पहला भाग)
                १६.    कुलदेवता/देवी की अवधारणा
                                      (औचित्य,परिचय और परम्परा )

                  विज्ञान की भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि सृष्टि महामाया का भ्रू-विलास मात्र है और सायंस की भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि पदार्थ और ऊर्जा का खेल है सब कुछ। ज्ञातव्य है कि सायंस का हिन्दी अनुवाद विज्ञान कदापि नहीं है, और न विज्ञान को अंग्रेजी में सायंस कहना चाहिए। सायंस और विज्ञान में जमीन-आसमान का फर्क है,किन्तु इस पर चर्चा, यहां मेरा अभीष्ट नहीं है।
कहने को तो सृष्टि में अनेकानेक देवी-देवता हैं। इनके नाम-रुप-कर्म को गिनना-जानना-समझना सामान्य मनुष्य के लिए असम्भव सा है।
वस्तुतः दिव् धातु से देवता शब्द बना है। दिवो दानात् द्योतनात् दीपनात् वा- यही इसका निर्वचन है।   प्रयोग प्रकाशमान होना अर्थ में है। विशेष अर्थ होता है— कोई पारलौकिक शक्ति जो अनश्वर और पराप्राकृतिक है और इसीलिये पूजनीय है। देव इस तरह के पुरुषों के लिये प्रयुक्त होता है और देवी इस तरह की स्त्रियों के लिये। देवताओं को परमेश्वर (ब्रह्म) का लौकिक रूप या ईश्वर का सगुण रूप कह सकते हैं। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि देवता मूलतः स्त्रीलिंग है। देव और देवता के शब्द-भेद को ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त स्थानों पर भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।
देवताओं का वर्गीकरण कई प्रकार से हुआ है, जिनमें चार मुख्य है— स्थान क्रम,परिवार क्रम ,वर्ग क्रम और समूह क्रम। निर्गुण-निराकार ब्रह्म जब सगुण-साकार हुआ तो स्वाभाविक है कि सुविधानुसार इनका मानवीकरण हुआ। क्यों कि मनुष्य सुविधापूर्वक मनुष्य के स्वरुप और स्वभाव को ही आसानी से समझ सकता है। ध्यान में उतारना भी आसान होता है।  अच्छाई और बुराई के विविध प्रतीकों, शक्ति और शौर्य की अभिव्यक्तियां,इच्छा,कामना और साधन—इन सबको ही आधार बनाया गया स्वरुप कल्पना में। फिर समयानुसार इन मानवीकृत स्वरुपों की मूर्तियाँ बनने लगी। विविध सम्प्रदाय बनने लगे। मत-मतान्तर होने लगे और अलग-अलग तरीके से  पूजा पाठ होने लगे।  
सबसे पहले जिन देवताओं का वर्गीकरण हुआ उनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश आते हैं। ये त्रिदेव कहे जाते हैं। इन्हें सृष्टि,पालन और संहार का कार्यभार सौंपा गया है। सौंपा क्या गया,प्रत्युत यों कहें कि इन्होंने सृष्टि,पालन और संहार का कार्यभार ग्रहण किया है । और आगे, क्रमशः देव-संख्याओं में निरन्तर वृद्धि होती गयी समयानुसार । निरुक्तकार यास्क के अनुसार देवताओं की उत्पत्ति आत्मा से ही मानी गयी है।  महाभारत (शांतिपर्व) में कहा गया है— आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ। स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राह्मणा इति निश्चयः, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्णं प्रकीर्तितम् ।।  शतपथब्राह्मण में भी देवताओं के सम्बन्ध में कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त किये गए हैं।
साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि— योगेनासृष्टिविधौ द्विधारुपो वभूवसः । पुमांश्च दक्षिणार्धांगो वामार्धा प्रकृतिःस्मृताः । सा च ब्रह्मस्वरुपा च नित्या सा च सनातनी ।। यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिकास्थिता । अतएव हि योगीन्द्रैः स्त्रीपुंभेदो न मन्यते।। (देवीभागवत) इस कथनानुसार देवता के लिए स्त्री-पुरुष के भेद का क्या औचित्य? मूलतः वह न स्त्री है, और न पुरुष।  मानवी अल्प बुद्धि में सहज समाने योग्य भाव से वह दिव्य शक्ति द्वि भेदाभासित हो रहा है।
वृहदारण्यकोपनिषद में एक रोचक प्रसंग है- सामान्यतः तैंतीस कोटि देवों की बात की जाती है। संहार क्रम में (सम्यक् आहरण—समेटने के क्रम में) यही तैंतीस करोड़ ३३३३ बना और फिर ३३ और फिर तीन (त्रिदेव- ब्रह्मा,विष्णु,महेश)। फिर डेढ़ । और फिर सिमट कर एक विन्दु मात्र रह गया। ध्यातव्य है कि कोटि शब्द सिर्फ संख्या बोधक न होकर प्रकार बोधक भी है। यानी सृष्टि में ३३ प्रकार के देवता कहे गए हैं। यथा— द्वादश आदित्य,एकादश रुद्र,अष्ट वसु तथा दो अश्विनी । शेष सब इन्हीं मूल के विस्तार या अंग-प्रत्यंग हैं। गहराई में जायेंगे तो वहीं पहुँच जायेंगे- शक्तिपुंज में समाहित हो जायेंगे।
ऐश्वर्य वचनः शश्च क्तिः पराक्रम एव च ।
तत्स्वरुपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता ।। (देवीभागवत)
ऐश्वर्य क्ति पराक्रम और इसके मेल से बना शब्द— शक्ति ।



प्रश्न उठता है कि आंखिर अनेकानेक झमेले क्यों ?
क्र 
          
१              

क्रमशः... 

Wednesday, 15 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणः लघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- इकतीसवां भाग

गतांश से आगे...

६.कुलदेवोपासना— उक्त सन्मार्गों पर चलते हुए, नियमानुसार,यथासम्भव कुलदेवता की पूजा-उपासना अपरिहार्य रुप से आवश्यक है। इसके वगैर सबकुछ अधूरा-अधूरा सा है। मानों किसी विद्यार्थी ने सत्र की पढ़ाई पूरी की,परीक्षा भी दी। किन्तु परीक्षा भवन की किंचित त्रुटियाँ, लापरवाही सबकुछ व्यर्थ कर दे सकता है । सारे किये कराये पर पानी फेर सकता है। अतः अपने कुलदेवता की जानकारी करके, समयानुसार पूजा-अर्चना अवश्य करें। मान लेते हैं- परिचय,नाम,आकृति,पूजाविधि कुछ भी ज्ञात नहीं है, वैसी स्थिति में भी  ऊँ आत्मनः कुलदेवतायै नमः सम्बोधन से स्मरण तो कर ही सकते हैं। वैसे भी षोडशमातृकाओं में इनका विशिष्ट स्थान है। नैष्ठिक रुप से किया गया यह स्मरण ही हो सकता है आगे का रास्ता दिखा दे। अस्तु।

.आडम्बर विहीनता— और सबसे अन्त में आग्रह पूर्वक ये कहना चाहूँगा कि पूर्वोक्त बातों पर ध्यान देते हुए, निज पिण्डान्तर्गत जो सूर्यशक्तिकेन्द्र है उसे साधें । ब्रह्माण्डीय सूर्य आपके जगने की प्रतीक्षा कर रहा है । शाकद्वीपीय को किसी को आकर्षित करने हेतु  वाह्याडम्बर की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है। वह तो चुम्बकीय ऊर्जा का महास्रोत है। सिद्धियों के पीछे दौड़ने की आवश्यकता जरा भी नहीं है। सिद्धियां उसके द्वार की चेरी हैं। आवश्यकता है सिर्फ कर्मणा शाकद्वीपीय होने की। जन्मना तो बहुत हो लिए। अस्तु।


                        ----)ऊँ आदित्याय नमः(---
क्रमशः...

Sunday, 12 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- तीसवां भाग

गतांश से आगे...

पन्द्रहवें अध्याय का चौथा भाग...

.संध्या-गायत्री,सूर्योपासना— शास्त्र निर्दिष्ट समय पर उपवीति होकर, नित्य (यथासम्भव त्रिकाल, प्रातः-सायं, या सिर्फ प्रातः अनिवार्यतः) संध्योपासन कर्म अवश्य करे। संध्या का अनिवार्य – अपरिहार्य अंग है— गायत्री जप। इसे अष्टोत्तरशत से लेकर अष्टोत्तरसहस्र तक यथासम्भव साधना चाहिए। संध्या की कई प्रचलित शास्त्रीय विधियां हैं- संक्षिप्त, विस्तृत, अति विस्तृत आदि। सुविधानुसार किसी एक का पालन किया जा सकता है। संध्या-गायत्री के पश्चात् नित्य वा कम से कम साप्ताहिक (प्रत्येक रविवार) एवं सूर्य के विशेष पर्व- छठ, सूर्यसप्तमी आदि अवसरों पर अलोन भोजन व्रत रखते हुए, आदित्यहृदय स्तोत्र का एक वा द्वादश आवृत्ति पाठ अवश्य करे। आदित्यहृदय स्तोत्र भी लधु और वृहत् दो प्रकार का है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है। किसी को कमतर नहीं आंका जा सकता। एक है भविष्योत्तरपुराण का अंश और दूसरा है महर्षि वाल्मीकि रचित।
   सच पूछें तो संध्या-गायत्री का रहस्यमय सूत्र पकड़ा कर ऋषियों ने आत्म-कल्याण का अति सरल-सुगम मार्ग प्रशस्त कर दिया है। किशोरावस्था में ही कुलगुरु द्वारा अध्यात्मविद्या का बीज रहस्यमय ढंग से रोपित कर दिया जाता है हमारे भीतर, जो समय पर स्वतः प्रस्फुटित,पल्लवित,पुष्पित और अन्त में फलित हुए बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु अज्ञान में हम इस हीरे को कंकड़ समझ कर त्याग दिये हैं। कुछ बन्धु जो इसे कर भी रहे हैं, तो सिर्फ खानापूर्ति रुप में, न कि रहस्य को जान-समझ कर।
 प्रसंगवश यहां इसके रहस्यों पर किंचित प्रकाश डालने का प्रयास करते हैं। संध्या-विधान के कुछ मुख्य कड़ियों पर ध्यान दें— तिलक,शिखाबन्धन,आसन शुद्धि-बन्धन,प्राणायाम,अघमर्षण,सूर्यार्घ्य,उपस्थान,न्यास,पूर्वमुद्रा,गायत्रीजप,उत्तरमुद्रा, गायत्रीस्तोत्र, हृदय,कवचादि । साधना जगत में पदार्पण करके, सम्यक् गतिशील होने के लिए, उक्त कड़ियाँ प्रशस्त पायदानों की भूमिका में होती हैं। शनैःशनैः आगे बढ़ते हुए, परमलक्ष्य को सहज ही लब्ध किया जा सकता है।
 ध्यातव्य और ज्ञातव्य है कि संसार की जो कोई भी साधना विधि हो—वैदिक हो या तान्त्रिक या उभय,किसी भी पंथ,किसी भी सम्प्रदाय का क्यों न हो, गहराई में झांकेंगे तो एक ही बात मिलेगी,क्यों कि परमात्मा एक ही है। ढूढ़ने-पहुँचने-पाने के रास्ते भले ही अनेक हों। ध्यानयोगी हो या कर्मयोगी,भक्तियोगी हो या अष्टांगयोगी - गहरे में बहुत अन्तर नहीं है। विभिन्न पथ-यात्रियों की अन्तःक्रिया (प्रभाव) लगभग समान होती है।
 संध्या-गायत्री नित्यक्रिया के क्रम में वस्तुतः हम जाने-अनजाने सूर्यतन्त्र की साधना ही कर रहे होते हैं। इसका सीधा प्रभाव कुण्डलिनी महाशक्ति पर पड़ता है। शिखा-सूत्र,तिलक ये सभी किसी न किसी भीतरी नक्शे का स्मरण दिलाते हैं। भले ही इन्हें हम सिर्फ धार्मिक चिह्न (साइनवोर्ड) की तरह उपयोग करते आ रहे हैं। विभिन्न तरह का तिलक लगा कर हम यही प्रदर्शित करना चाहते हैं कि हम अमुख सम्प्रदाय के, अमुक परम्परा के हैं। जबकि इनका वास्तविक रहस्य कुछ और ही है। मूलतः अध्यात्म को इन साइनवोर्डों से कोई वास्ता नहीं है। साधना-पथ पर आगे बढ़ा हुआ साधक इन सारे बाहरी आडम्बरों दिखावे) से विलग हो जाता है। उसे न तिलक की अनिवार्यता प्रतीत होती है, न विभिन्न मालाओं की । सच पूछा जाय तो जिसने अन्तस्थ माला को चैतन्य कर लिया (ज्ञान प्राप्त कर लिया), उसे बाहरी माला की क्या आवश्यकता ! पंचप्राणों को जिसने यामित कर लिया उसके लिए तो जीवन और मृत्यु एक खेल भर है।
अब क्रमशः संध्या की एक-एक मुख्य क्रियाओं पर थोड़ा प्रकाश डालते हैं। संध्यार्थ आसन ग्रहण करने के पश्चात् सर्वप्रथम शिखा-बन्धन करते हैं। इसके मन्त्रों पर ध्यान दें—चित्तरुपिणी महामाये...ये हमारी चेतना ग्रन्थि को उद्दीपित करने की विधि है। फिर भूमध्य में तिलक लगाते हैं। साम्प्रदायिक भेद से, मध्य नासिका से लेकर ललाट के उर्ध्वभाग पर्यन्त तिलक का स्वरुप कुछ भी हो सकता है। तिलक वस्तुतः अन्तर्द्वार का संकेत है। स्मरण है। उद्दीपन है। क्रियाकाल की अन्तःवाह्य सुरक्षा हेतु आचमन,विनियोग,आसन शुद्धि और बन्धन आदि करते हैं। उन ऋषियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं- उनके नाम,गोत्रादि सहित,जिन्होंने ये पथ प्रशस्त किये हमारे लिए। फिर नाम-गोत्र, दिक्, कालादि में स्वयं को संतुलित-व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं- संकल्प पूर्वक । जीवन का मूलाधार- प्राणादि पंचप्राणों को संतुलित-नियन्त्रित करते हैं। वस्तुतः साधना रुपी संयन्त्र का ईंधन है— प्राणायाम के समय क्रमशः ब्रह्मा-विष्णु-महेश का तीन विशिष्ट स्थानों पर ध्यान । ध्यातव्य है कि इसका श्रीगणेश वहीं से होता है, जहां कायगत सूर्य की स्थिति है। इस स्थान को ही योगियों ने संसार कहा है। सतत प्राणायाम की क्रिया सम्पन्न करते-करते साध्य छः चक्रों में तीन की सम्यक् शुद्धि हो जाती है, यानी लगभग आधा काम तो अनजाने में ही, हँसी-खेल में ही सम्पन्न होगया। यहीं पर सूर्य को अर्घ्य अपर्पित करते हैं। उपस्थान से स्वयं को उत्थानित करते हैं, तो विविध न्यासों से चेतना को न्यस्त।
  वेदमाता (ज्ञान की कुँजी, या कहें ज्ञान का प्रमुख स्रोत) गायत्री के विशिष्ट वर्णों द्वारा निरन्तर प्रहार— मूल को चैतन्यकर, परम चैतन्य से जोड़ने का अद्भुत कार्य करता है। जप के पूर्व-पर की विभिन्न मुद्राएं अत्याधुनिक इलोक्ट्रोनिक संयन्त्र के सर्किट डायग्राम से कम हैं क्या !  सर्किट डायग्रामको जिसने ठीक से समझ लिया वो तो अभियन्त्रणा-निष्णात् हो गया । अग्नि, वायु और आकाश का प्रतिनिधित्व करती मध्यमा, तर्जनी और अंगुष्ठ के सहारे सरकता रुद्राक्ष-मनका कब तीन तत्त्वों को समाहृत कर देता है, पता भी नहीं चलता। फिर तो साधने को रह जाता है सिर्फ जल और पृथ्वी । सतत प्रणव-प्रहार से पृथ्वी तो पहले ही द्रवित (मुलायम अर्थ में) हुयी रहती है, जहां किसी बीज का अंकुरण सहज ही सम्भव है।

सच पूछें तो संध्या-गायत्री अप्रकम्पित आधार शिला है, जिस पर सूर्यतन्त्र का साधना-प्रासाद खड़ा होता है। इसकी महत्ता और गरिमा को प्रकाशित करते हुए ऋषि कहते हैं—
विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् । तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ।।
संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता ।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते।।                  
(देवीभागवत पुराण११-१६-६,७)
तथाच-
  संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु ।
  यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ।। (दक्षस्मृति २-२७)
  संध्यामुपासते ये तु सततं संशितव्रताः ।
  विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। (अत्रि)
   यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः ।
  तेषां वै पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयम्भुवा ।।
  निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत् ।  त्रैकाल्यसंध्याकरणात् तत्सर्वं विप्रणश्यति ।। (याज्ञ्यवल्क्य)

  ब्राह्मण रुपी वृक्ष का मूल संध्या है। चारो वेद इसकी शाखाएँ हैं। धर्म-कर्म पत्ते हैं। अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिए,क्यों कि मूल के छिन्न (नष्ट) होने से वृक्ष और शाखा सब कुछ नष्ट हो जायेगा। अस्तु।
क्रमशः...

Friday, 10 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःउनतीसवां भाग

गतांश से आगे...

पन्द्रहवें अध्याय का तीसरा भाग--

३.अशौच मुण्डन— अशौच कई प्रकार के होते हैं, जिनमें जननाशौच और मरणाशौच प्रधान है। शवगमन, प्रसूतिगृहगमनादि भी अशौच में आता है। अलग-अलग अशौचों में मुण्डन का समय (अवधि) भिन्न-भिन्न निर्धारित किया गया है शास्त्रों में। जननाशौच (घर में बच्चे का जन्म) में नौवें दिन और मरणाशौच में दसवें दिन सांगोपांग मुण्डन अति आवश्यक है। ध्यातव्य है पितृजीवी श्मश्रु(मूंछ)का मुंडन न करावें। तथा सभी के लिए नियम है कि अशौच निवार्णार्थ मुण्डन में पार्श्व और कच्छ(गुप्तांगों के बाल)का छेदन न करे (पार्श्वकच्छ विवर्जयेत्...गरुड़पुराण) अशौच मुण्डन के लिए सपिण्ड और सप्तकुल के आधार पर सीमा निर्धारित की गयी है।
   यहां मगबन्धुओं से वस इतना ही आग्रह है कि स्वयं को संस्कृत रखने के लिए अशौच जनित मुण्डन संस्कार का यथासम्भव पालन अवश्य करें। ध्यान रखें- मुण्डन सम्पूर्ण मुण्डन होता है। दाढ़ी बनवा लेना,केश थोड़ा छंटवा लेना अशौच मुण्डन नहीं है।  मुण्डनोपान्त यज्ञोपवीत परिवर्तन भी अनिवार्य है।

.श्राद्धीय भोजन परित्याग — सच पूछा जाये तो किसी भी प्रकार के यज्ञीय भोजन से परहेज करना चाहिए। इस बात का सदा स्मरण रखें कि यज्ञीय भोजन करके यज्ञकर्ता के शुभाशुभ कर्मों का भागीदार बनना पड़ता है । उसमें भी किसी व्यक्ति के मृत्योपरान्त कराया जाने वाला श्राद्धीय भोजन तो बिलकुल ही त्याज्य है; क्यों कि मृतप्राणी और श्राद्धकर्ता दोनों के कर्मफल का समावेश होता है उसमें। पितृमेलन के पश्चात् के ब्राह्मणभोजन की तुलना में वार्षिकी श्राद्ध निमित्त भोजन न्यून दोषयुक्त है। अन्य कालों में किया गया—तीर्थश्राद्ध, गया- श्राद्धादि जनित भोजन क्रमशः न्यून-न्यून दोषपूर्ण हैं। पौरोहित्य कर्म में रत मगों को भी इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए। सच पूछें तो प्रायश्चित गायत्री-क्रिया उन्हीं के लिए निर्धारित किया गया है। शौकिया या लापरवाही पूर्वक नियम की अवहेलना प्रायश्चित के दायरे में कदापि नहीं आ सकता। (इस सम्बन्ध में पूर्व अध्याय में भी थोड़ी चर्चा हो चुकी है)

     अतः सूर्यांशों को ऊर्जस्वित रहना है यदि तो इनका पालन करना होगा, भले ही सामाजिक तौर पर थोड़ी असामाजिकता झलके। ध्यातव्य है कि सगोत्र, सपिण्ड (विशेष कर तीन पीढ़ी तक) का श्राद्धीय (और यज्ञीय) भोजन कदापि त्याज्य नहीं है। वो तो पूर्वज का प्रसाद है। आशीर्वाद है। उसे हर हालत में ग्रहण करना ही चाहिए।
क्रमशः...

Thursday, 9 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका - अठाइसवां भाग

गतांश से आगे...

                             पन्द्रहवें अध्याय का दूसरा भाग...

.विविध संस्कारों की अनिवार्यता—यज्ञोपवीतादि विविध संस्कार की परम्परा रही है हमारे यहां। गृह्यसूत्रों के अनुसार चालीस संस्कारों की बात तो बहुत पुरानी हो चली, उनके नाम गिनना-गिनाना भी मात्र ज्ञानवर्द्धन कहा जायेगा। संक्षिप्त होकर षोडश संस्कार पर आ टिका है । कुछ ऋषियों (बाद के कर्मकाण्डियों) ने बारह और चार (वरीयता क्रम सूची) बना दी । यथा—गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, नामकर्म, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, उपनयन, केशान्त, समावर्त्तन और विवाह, तथा दूसरे चार में - कर्णवेध, विद्यारम्भ,वेदारम्भ और अन्त्येष्टि। समयानुसार अब वो भी लुप्त होते जा रहा है ।
    मोमबत्तियां बुझाकर,जन्मोत्सव मना कर केक काटने-बांटने की परम्परा को हमने पश्चिम से आयात कर लिया है, किन्तु उम्रांकानुसार दीपक जलाकर, गणेशाम्बिका पूजन-आरती करके, फिर बच्चे की आरती उतारने की अपनी परम्परा को विसार दिए । गर्भाधान संस्कार की तो बात ही बेमानी है, क्यों कि वो तो विविध आधुनिक अवरोधकों की चूक से नैसर्गिक रुप से सम्पन्न हो जाता है। उसके लिए पति-पत्नी की ओर से कोई खास तैयारी तो होती नहीं। पुंसवन-सीमन्तादि संस्कार को किंचित नाम भेद (गोदभराई) से कहीं-कहीं ढोया जा रहा है, वो भी क्रिया भ्रष्ट रुप से। फिर बारी आती है- जातकर्म,नामकर्म,अन्नप्राशन,मुण्डन,कर्णवेध,उपनयन, विवाहादि संस्कार की।

  यदि हम अपनी परम्परागत सत्संस्कारों को यथावत (यथासम्भव) जीवित रखें तो हम अपने नष्ट धरोहर को अधिकाधिक लब्ध करने में सफल होंगे- इसमें कोई दो मत नहीं। अतः प्रयास ही नहीं, संकल्प करें कि यथासम्भव अधिकाधिक संस्कारों का पालन करेंगे। ऋषि-मुनियों द्वारा बनाये गए ये नियम पूर्ण वैज्ञानिक हैं। (सायंटिफिक नहीं कह रहा हूँ यहां) । इनका जितना अधिक पालन करेंगे, उतना अधिक लाभ होगा। तेज,बल,आरोग्य,यहां तक कि भोग और मोक्ष में भी सहयोगी होगा।

    तेजी से बदल रही (लुप्त होरही) यज्ञोपवीत (उपनयन) परम्परा पर  विशेष रुप से ध्यान दिलाना चाहूंगा,क्यों कि इसकी महत्ता और उपयोगिता को बिलकुल नकारा जा रहा है। इस अति महत्त्वपूर्ण संस्कार के आयु सीमा को न तो ध्यान में रखा जा रहा है और न अन्य पालनीय, करणीय बातों का ही । जब कि स्मृतिकारों ने स्पष्ट रुप से क्रमशः पांच,आठ,और बारह वर्ष निर्धारित किया है। यानी पांच वर्ष सर्वश्रेष्ठ, फिर आठ वर्ष मध्यम, फिर बारह वर्ष अधम और तद्पश्चात् प्रति वर्ष के क्रियालोप हेतु प्रायश्चित गोदान पूर्वक अधिकतम सोलह वर्ष की सीमा निर्धारित की है। सोलह के बाद का यज्ञोपवीत तो सिर्फ बोझ है शरीर पर— एक व्यर्थ धागे का। किन्तु प्रायः देखा जाता है कि सीधे विवाह के समय यज्ञोपवीत का धागा डाल दिया जाता है। और कौन कहें कि विवाह पहले की तरह किशोरावस्था में होता है अब। आजकल तो पढ़ाई पूरी करते और फिर नौकरी ढूढ़ते-ढूढ़ते चेहरे पर झुर्रियां आने लगती हैं। लड़कियां भी तीस के आसपास ही व्याही जाती हैं। और ये सब भी हमने पश्चिम से ही आयात किया है। इतिहास तो अपना भूल ही गए हैं,भूगोल भी याद नहीं है। ध्यान देना चाहिए कि इंगलैंड और भारत एक ही अक्षांशरेखा पर नहीं हैं। फिर दोनों जगह का प्राकृतिक नियम समान कैसे हो सकता है ?

   और हां,ये भी गौर करने लायक है कि  दुल्हेराजा अपने रुप-सौन्दर्य को बचाये रखने के लिए मुण्डन भी नहीं कराते। ज्ञातव्य है कि यज्ञोपवीत कोई सामान्य सा धागा नहीं है,प्रत्युत उपनयन की प्रक्रिया है।

   यज्ञोपवीत के सम्बन्ध में प्रसंगवश यहां कुछ और बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ। जनेऊ कोई सामान्य धागा नहीं हैं। इसके निर्माण और स्थापन की विशिष्ट विधि है। आजकल लोग सीधे बाजार से मोटा-मजबूत धागा खरीद लाते हैं। मनमाने ढंग से उसका मापन करके सुविधानुसार किसी लम्बाई का जनेऊ बना लेते हैं और पहन लेते हैं। जबकि जनेऊ पहनने की चीज नहीं है,प्रत्युत धारण करने की चीज है। पहनना और धारण करना बिलकुल भिन्न क्रिया है।
   मुख्यतः चरखे या तकली पर काता हुआ सूत्र ही सर्वाधिक पवित्र और उपयुक्त माना जाता है,जिसे कच्चा सूता कहते हैं। कुमारी कन्या द्वारा काता हुआ सूत्र तन्त्र-शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। समयानुसार व्यवस्था और उपलब्धि बदलती गयी। लोग मूल बात को भूलते-विसारते गए। जीवनोपयोगी सारी वस्तुओं के लिए बाजारवाद पैदा हो गया । और हम पूरे तौर पर उसी पर निर्भर होते चले गए।

   मैं ये नहीं कहता कि आप अपना नौकरी-चाकरी,काम-धन्धा,रोजी-रोजगार छोड़कर सूत कातते रहें। किन्तु इतना तो कर ही सकते हैं कि बाजार से सही ढंग का कच्चा सूता खरीद लायें। ऐसा नहीं कि आजकल ये मिलता नहीं । ढूढ़ने की जरुररत है।

   कच्चे सूते की लत्ती (लच्छी) से चावा (हाथ की चार अंगुलियां- कनिष्ठा, अनामिका,मध्यमा और तर्जनी को मिलाने से बनने वाला आकार) के माप से छियानबे चावा सूत निकालें। इसे बिना तोड़े हुए ही त्रिगुणित करें। सूत्र की यही लम्बाई यज्ञोपवीत के लिए शास्त्र-विहित है। इस प्रकार लम्बाई कुल उतनी ही रही, मोटाई बढ़ गयी। अब इस त्रिगुणित छियानबे को लच्छी से तोड़ कर अलग करलें और टेकुए(बड़ी तकली) के सहारे ऐठन दें । अब पुनः त्रिगुणित करें ।  इस प्रकार (९६x)÷३ का वास्तविक परिणाम ३२ चावा ही हुआ । यही धागा शुद्ध यज्ञोपवीत के लिए तैयार हुआ । अब इसमें खास तरीके से प्रवरादि विचार पूर्वक गांठें लगानी हैं। इस प्रकार तैयार जनेऊ का एक जोड़ा(गृहस्थ के लिए) और ब्रह्मचारी के लिए तीन तन्नी का प्रयोग होना चाहिए । तैयार जनेऊ को संध्या-विधान में निर्दिष्ट वैदिक मन्त्रों या सिर्फ गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित-पूजित करके, पुनः विनियोग और धारण मन्त्र पूर्वक धारण करना चाहिए। (विशेष जानकारी के लिए नित्यकर्म पद्धति का अवलोकन करें। गीताप्रेस से प्रकाशित नित्यकर्मपूजाप्रकाश प्रमाणिक और उपयोगी पुस्तक है। कीमत भी औरों की अपेक्षा काफी कम है। नियम-संयम की बहुत सी बातें यहां सरल शब्दों में स्पष्ट हैं। )

   शाकद्वीपियों में कुलदेवता पूजन के लिए श्रावण पूर्णिमा विशेष रुप से ग्राह्य है। वैसे भी चार वर्णों के लिए शास्त्रों में कहे गए चार मुख्य त्योहारों में ब्राह्मण के लिए श्रावणीकर्म ही निर्धारित है। क्षत्रियों के लिए दशहरा,वैश्यों के लिए दीपावली और शूद्रों के लिए होली। किन्तु आजकल लोग इसे बिलकुल भुला बैठे हैं। श्रावण पूर्णिमा सिर्फ रक्षा बन्धन, वो भी भाई-बहन का त्योहार बन कर रह गया है। श्रावण पूर्णिमा को शाकद्वीपियों को क्या-क्या करना चाहिए, इसके लिए उपाकर्म-श्रावणीकर्म पद्धति का अवलोकन करना चाहिए। ये पुस्तकें अभी आसानी से उपलब्ध हैं।  पूरे वर्ष के लिए आवश्यक यज्ञोपवीत स्थापन हेतु यह दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
क्रमशः... 

Saturday, 4 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- सताइसवां भाग

गताँश से आगे...

(पन्द्रहवें अध्याय का पहला भाग)

१५.    सुपथ और समाधान (संध्या-रहस्य सहित)

   पिछले चौदह अध्यायों में शाकद्वीपी ब्राह्मणों के विषय में काफी कुछ चर्चा हुयी। दीर्घ कालावधि में आए परिवर्तन और ह्रास का भी विचार किया गया। विडम्बनायें और समस्यायें भी दिखी। अब प्रश्न ये उठता है कि आगे करना क्या है ? करना क्या चाहिए ?

   इस सम्बन्ध में कुछ पगडंडियाँ मुझे दीख रही हैं,जिनके रास्ते आगे बढ़ कर हम भावी पीढ़ी को  सुदृढ़-संतुलित-तेजस्वी बना सकते हैं।

  आधुनिकता के दौर में एक ओर लम्बी छलांग लगाने को सभी आतुर हैं, तो दूसरी ओर ऐसा भी वर्ग है,जो हमारा प्रबल प्रतिद्वन्द्वी बनने को आतुर है। ज्ञान, विद्वत्ता और आजीविका- ये तीनों कोई जरुरी नहीं कि एकत्र सुलभ हों । मैं ये नहीं कहता कि हम तान्त्रिक,ज्योतिषी,आयुर्वेदज्ञ, कर्मकाण्डी, याज्ञिक, मठाधीश, आचार्य, पुजारी पुरोहित आदि बन कर ही जीविकोपार्जन करें । अपनी इच्छा, सुविधा और स्थिति के अनुसार हम डॉक्टर,ईंजीनियर,वैज्ञानिक, प्रोफेसर, वैरिस्टर जो भी बनना चाहें बनें; किन्तु अपने मूल संस्कार को बचाते हुए ही आगे बढ़ें । आगे बढ़ने की आपाधापी में इतना न रम जायें कि पीछे मुड़ कर अपनी संस्कृति को देख-पहचान भी न सकें।
        हम सूर्य तेज से उत्पन्न हुए हैं—सूर्यांश हैं। तेजोदीप्त हैं। आकस्मिक मेघ हमें कितना ढकेंगे ! वायु का झोंका आयेगा और बहा ले जायेगा मेघों को। किन्तु यदि हम स्वयं ही सघन-श्याम-मेघाच्छन्न रहना पसन्द करने लगेंगे तो फिर वायु क्या करेगा ! आँखें मूंद कर रश्मि और आलोक को विसारते रहेंगे तो सूर्योदय-सूर्यास्त में अन्तर ही कहां समझ आयेगा !

    इसके लिए बहुत अधिक नहीं,कुछ खास दो-चार बातों पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ मगबन्धुओं को,विशेष कर नयी पीढ़ी को,क्यों इस पुस्तिका की योजना खास कर उन्हीं के लिए है। इस संदेश के साथ आप मगबन्धुओं से अनुनय पूर्ण आग्रह है कि कार्य कठिन नहीं,यदि इच्छा-शक्ति प्रबल हो। यथासम्भव इसे जीवन में उतारने का प्रयास किया जाए,ताकि मगों की मन्द पड़ रही चमक पुनः पूर्ववत  तेजोदीप्त हो सके।

. मदिरा-मांसादि का संकल्प पूर्वक त्याग— निस्पक्ष होकर,थोड़ा हिम्मत जुटा कर, गम्भीरता पूर्वक विचारें- सूर्यांश होकर मदिरा-मांस का प्रयोग क्यों? सामान्य सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में,यहां तक कि कुछ कुलों में कुलदेवी पूजन तक भी? क्या यह सिर्फ जिह्वा-लोलुपता नहीं है?

   सच पूछा जाय तो मांसाहार मनुष्य मात्र के लिए प्राकृतिक रुप से बना ही नहीं है। परमात्मा ने हमारी शारीरिक संरचना शाकाहार,अन्नाहार,फलाहार आदि के योग्य बनाया है और हम इस पवित्र मन्दिर को कब्रगाह बनाये हुए हैं।
   प्राकृतिक व्यवस्था में थोड़ा नीचे आकर कहना चाहूंगा कि उन क्षेत्रों में जहां जीवन निर्वाह के लिए मांसाहार आवश्यक हो,उन्हें छोड़ कर शेष मनुष्य को तो इससे परहेज करना ही चाहिए। और जरा इससे भी आगे आकर यह कहना चाहूंगा कि वर्णव्यवस्था में सर्वोत्तम ब्राह्मण- जिसका सीधा सम्बन्ध ज्ञान-साधनादि से है, सरस्वती का वरद हस्त है जो, उसे तो कम से कम सात्त्विक आहार पर ही निर्भर रहना चाहिए। थोड़ा और आगे की सोचें तो कह सकते हैं कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण – सूर्य तेजांश मगों को तो कदापि इसका सेवन नहीं करना चाहिए। सूर्योपासक और मांसाहार- कैसी विडम्बना है ये ! जरा विचार कर तो देखें ।

   सूर्य परम सात्त्विक हैं। हम भी सात्त्विक बनें। बनने का सतत प्रयास करें। मान लिया कि लोभ, अज्ञान,दबाव,बहकावे या अन्य किसी कारण से पूर्व में किसी ने कुल में तामसी वस्तुओं का प्रयोग कर लिया,तो क्या कुल परम्परा के नाम पर हम भी उसे ढोते रहें? ढोना उसे ही चाहिए जो ढोने योग्य हो। अपरिहार्य हो।

    हिम्मत करके,इस दुर्गुण को दूर करना होगा। सत्त्व हमारे मूल में है। उसे हर हाल में लब्ध करना होगा। ये हमारे मन की दुर्बलता है कि कुलदेवी या किसी भी देवता के लिए चली आरही परम्परा को बदलेंगे- यदि वह बदलने योग्य प्रतीत हो रहा हो, तो देवी हम पर नाराज हो जायेगीं। पक्के तौर पर जान लें कि ऐसा कुछ नहीं होता। ये सीधे मनोरोग है। अन्धास्था है। अन्धविश्वास है। घोर अज्ञान है।

    हालाकि ये सत्य है कि शारीरिक रोग को दूर करने से कहीं अधिक कठिन होता है- मानसिक रोग दूर करना। रोगी को सत्य का ज्ञान नहीं होता और चिकित्सक (ज्ञानी) जोर-जबरदस्ती नहीं कर पाता। मांस-मदिरा का प्रयोग शाकद्वीपी के लिए कदापि ग्राह्य नहीं हो सकता। कहीं न कहीं चूक हुयी है, हमारे पूर्वजों से, जिसे भावी पीढ़ी को सम्मार्जित करना चाहिए। पूर्वज सदा वन्दनीय हैं, इसमें कोई दो राय नहीं, किन्तु उनके अज्ञान या दोष या गलती कैसे स्वीकार्य हो सकती है—विवेकपूर्ण विचार की अपेक्षा रखती है।

   हो सकता है- मेरे इस सुझाव-प्रस्ताव पर बहुतों को आपत्ति हो । क्यों कि हमारे समाज में भी देखा-देखी,अधिक समाजिक बनने के चक्कर में, आधुनिक दीखने-दिखाने के चक्कर में,या फिर नौकरी,प्रवास,परिवेश,सानिध्य आदि कारणों से काफी प्रवेश हो गया है मांसाहार का । यही कारण है कि विवाहादि सम्बन्ध करने, कौटुम्बिक भ्रमण-मिलन आदि में पूछने-जानने की आवश्यकता पड़ती है- उनके खान-पान के विषय में। जहां पहले तामसी कहे जाने वाले प्याज-लहसुन,मसूर की दाल आदि की भी वर्जना थी शाकद्वीपियों द्वारा, वहां अब शाकाहार-मांसाहार का सवाल करना पड़ता है। ये बड़े दुःख,ग्लानि और लज्जा की बात है। और इससे भी बड़ी पीड़ा ये है कि सामाजिक तौर पर(खुले रुप से) लोग स्वीकार भी नहीं करते- अपने पारिवारिक आहार को । और इस प्रकार अनजाने में या धोखे में गयी (व्याही) लड़कियों को आजीवन कष्ट उठाना पड़ता है। ये मैं कोई सिद्धान्त की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि कई दुःखद उदाहरण हैं मेरे सामने। इसका दूसरा पक्ष ये है कि गैर व्राह्मण समाज में भी गलत संदेश जाता है। हमें अपनी श्रेष्ठता (गुणात्मक) रखनी है, समाज का पथ-प्रदर्शक बनना है,अपने पूर्व तेजस्विता को वापस लाना है,तो ऐसा करना ही होगा—तामसी आहार से संकल्प पूर्वक मुंह मोड़ना होगा,क्योंकि आहार-विहार पर ही तो व्यवहार अवलम्बित है।  इस विषय पर गीता में श्रीकृष्ण के वचनों को स्मरण रखते हुए उसका सम्यक् पालन करना होगा—
  आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकः प्रियाः ।। 
                                                          (१७-)
क्रमशः...

Thursday, 2 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःछबीसवां भाग

गतांश से आगे...
चौदहवें अध्याय का पांचवां(अन्तिम)भाग...

प्रश्नांक — इतनी जल्दी इतने तेजहीन क्यों और कैसे हो गये?
इसका उत्तर सम्भवतः सबसे सरल है,जिसे आगे कुछ विन्दुओं में ढूढ़ने-जानने का प्रयास करते हैं। यथा—
(क) दान-दक्षिणाजैसा कि मुझे लगता है- इस संस्कारहीनता का श्रीगणेश तो उसी क्षण हो गया था,जिस क्षण साम्ब का सूर्ययाग सम्पन्न कर, पुनः शाकद्वीप वापसी हेतु तैयार हुए थे और कपट पूर्ण आग्रह का शिकार होकर, गुप्त दक्षिणा ग्रहण कर लिए। प्रसंगवश यहां पुनः स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि शाकद्वीप से जम्बूद्वीप के लिए यात्रा करते समय ही गुरुड़ से वचन वद्ध हुए थे कि मगगण किसी प्रकार का दान-दक्षिणा स्वीकार नहीं करते । और इस प्रकार गुप्त दक्षिणा-द्रव्य स्वीकार करके हमने अनजाने में ही अपनी प्रतिज्ञा भंग की या कहें नियम की अवहेलना की । उसके दण्ड स्वरुप हम पुनः स्वशक्ति से, आकाशमार्ग से शाकद्वीप वापस नहीं जा सके । शाकद्वीप स्थलीय भूभाग से जुड़ा हुआ तो है नहीं, जो पदयात्रा करके वापस चले जाते । वायुमार्ग से जाने हेतु गरुड़ का सहयोग अनिवार्य था, जो अब दक्षिणा-भार युक्त (दोष-युक्त) हो जाने के कारण असम्भव था ।
यहीं से संस्कारहीनता का दूसरा चरण भी आरम्भ होता है। अपने मूलस्थान से (च्युत) विस्थापित शाकद्वीपियों को यहां स्थायी रुप से बसने हेतु मानो साम्ब द्वारा कृपा की गयी वासार्थ भूमि (ग्राम) देकर। इस प्रकार हमने प्रचुर मात्रा में भूमिदान और साथ ही जीवनयापनार्थ  गोधन,द्रव्यादि दान भी स्वीकार करने को विवश हुए ।
दान के गुण-दोष को ठीक से नहीं जानने-समझने वाले ये कह सकते हैं कि सामान्य सा दक्षिणा ग्रहण करने मात्र से ऐसा क्या हो गया, जिसके दुष्प्रभाव से सूर्यांश शाकद्वीपी इतने तेजहीन हो गये ? इसे थोड़ा स्पष्ट करने के लिए आद्य शंकराचार्य की एक घटना का उल्लेख करना समीचीन होगा।
एक समय की बात है, शंकराचार्य को मार्ग अवरुद्ध किए एक प्रेत ने दर्शन दिया। परिचय और उद्देश्य पूछने पर उस प्रेत ने कहा कि रावणवधोपरान्त मर्यादापुरुषोत्तम राम द्वारा ब्रह्महत्या-दोष-निवारणार्थ प्रचुर धन-सामग्री का प्रायश्चित-दान-ग्रहण हेतु योग्य ब्राह्मण की खोज हो रही थी, किन्तु पाप-भय से कोई योग्य ग्रहणकर्ता मिल नहीं रहा था । घोर दारिद्रदुःख से पीड़ित एक ब्राह्मण यह सोच कर आगे आया कि दारिद्रदुःख से बड़ा और दुःख क्या हो सकता है ! अकूत धन-सम्पदा प्राप्त करने के पश्चात् कोई उपाय कर लिया जायेगा । यह व्यर्थ हुआ जा रहा मानव जीवन तो सार्थक हो जायेगा सम्पत्ति पाकर। किन्तु भोगैश्वर्य में वह ऐसा लिप्त हुआ कि मृत्यु कब ग्रस ली पता भी न चला। प्रायश्चित-दान-ग्रहण-दोष ने महापिशाच योनि में डाल दिया। मैं वही पिशाच हूँ । कृपया आप मेरा उद्धार करें ।
शंकराचार्य ने ध्यानस्थ होकर विचार किया । किन्तु तत्काल कोई ठोस  उपाय न सूझा, जो उसे प्रेतत्व से मुक्ति प्रदान कर सके । अनन्तः उन्होंने एक पिटारी की व्यवस्था की और उस प्रेत को उसमें स्थान ग्रहण करने को कहा । प्रेत ने उनकी आज्ञा का पालन किया । शंकराचार्य ने उस पिटारी को उठा कर रामेश्वरम् तीर्थ की यात्रा की । वहां पहुँचकर मन्दिर के सामने उसे स्थापित कर दिया और कहा कि आज से जो कोई भी इस तीर्थ का दर्शन करने आयेगा,उसे जो भी तीर्थ दर्शन का पुण्य-लाभ प्राप्त होगा उसका एक अंश तुम्हें प्राप्त हुआ करेगा । और इस प्रकार पुण्य संचित होते हुए, कालान्तर में तुम्हें प्रेतत्व से मुक्ति अवश्य मिल जायेगी ।
वर्तमान समय में भी वह पिटारी एक ऊँचे चबूतरे के रुप में रामेश्वरम् मन्दिर के बाहर देखा जा सकता है । पता नहीं उस आत्मा को अभी तक मुक्ति मिली या नहीं, किन्तु यह प्रसंग दानार्थियों और ग्रहीताओं के लिए एक बड़ा संकेत है, इसमें कोई दो राय नहीं।
किसी प्रकार का दान लेने को प्रायः ब्राह्मण आतुर रहते हैं । किन्तु अज्ञान और लोभ वश ये भूल जाते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा । दान देने वाला भी यह सोचता है कि वह ब्राह्मण पर कृपा कर रहा है,किन्तु सच पूछा जाय तो ब्राह्मण का अपना जो भी थोड़ा बहुत पुण्यार्जन है,उसे नष्ट कर रहा है। लुटा रहा है- मिट्टी के मोल किसी से कुछ भी दान लेकर । यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी के घर का कूड़ा-कचरा कोई उठाकर अपने घर ले आवे सिर चढ़ाकर ।
हर पदार्थ और व्यक्ति की अपनी ओरा होती है। चुम्बकीय प्रभाव होता है। इसमें अकारण या सकारण अतिक्रमण प्रायः हानिकारक ही होता है । अतः सावधानी पूर्वक बचना चाहिए । सामान्य रुप से (उपहारादि) भी दिया गया, किसी प्रकार का कोई भी पदार्थ अपना गुण-दोष-प्रभाव छोड़े बिना नहीं रह सकता,यह विज्ञान सम्मत है । और सारे धार्मिक कृत्य पूर्णतया वैज्ञानिक हैं,इसमें भी कोई दो राय नहीं।
मन्त्र-पूरित सांकल्पिक दान तो और भी घातक हुआ करता है। बचना तो हमें किसी के उपहार से भी चाहिए । दान तो फिर दान ही है । वह सदा दोषपूर्ण ही होगा । दान का उद्देश्य भी इसी बात (गुणवत्ता या कहें दोष की मात्रा) की ओर संकेत करता है। राम ने ब्रह्महत्या-दोष-प्रायश्चित दान किया था,जिसका दुष्प्रभाव ऊपर के प्रसंग के कहा गया।
दान की वस्तु,मात्रा,उद्देश्य,काल और देश(स्थान)सबका प्रभाव अलग-अलग होगा- यह निश्चित है। इसे ठीक से समझने के लिए पुराणों और धर्मशास्त्रों में दिए गए दान के गुण को ठीक से देख-समझ लें । गुण समझ लेने के पश्चात् दोष समझना बिलकुल आसान हो जायेगा । किसी भी प्रकार का प्रायश्चित दान सर्वाधिक हानिकारक होगा ग्रहीता के लिए । तुलादान, छायादान आदि भी विशेष हानिकारक हैं। एकादशी उद्यापन करने के क्रम में किया गया शैय्यादान और श्राद्ध में दशकर्म या एकादशाह के दिन किया गया शैय्यादान का प्रभाव कदापि एक जैसा नहीं हो सकता । इसी भांति विशेष अवसरों पर, विशेष स्थान (तीर्थादि) में किया गया और सामान्यतया दिया गया दान कदापि एक जैसा नहीं हो सकता । इन बातों को भी ठीक से समझ लेना जरुरी है ।
दान लेना जिन्होंने अपना अधिकार या कि कर्तव्य समझ लिया है, वे यह सवाल उठा सकते हैं कि आखिर ब्राह्मणों के लिए ही तो ये कर्म बना है— दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानां....। इस सूत्र को हम आधा याद रखते हैंदान के बाद का शब्द- प्रतिग्रह भूल जाते हैं। दान लेने के बाद का प्रायश्चित करना भी तो कहा गया है उन्ही शास्त्रों में,जहां दान की महिमा कही गयी है।
(ख) भोजन— यज्ञान्ते ब्राह्मणभोजनम्...भोजन का ब्राह्मण से विशेष सम्बन्ध है । किसी भी यज्ञ के अन्त में ब्राह्मण-भोजन की सनातन परम्परा है। समुचित दक्षिणा के अभाव(अवहेलना) से यज्ञ निरर्थक(व्यर्थ) हो जाता है,किन्तु दक्षिणा दान के पश्चात् भी एक अत्यावश्यक कर्म शेष रह जाता है- विप्रभोजन । क्यों कि स्वाहा स्वधाऽदि शब्दैर्देवपित्रादिभ्यो हुतवहत्वाद् यथा वह्निरिति नामधेयमग्नेः, तथैव स्वाशित द्रव्यैर्देवपित्रादि तोषवहत्त्वात् विप्राणां वह्नित्वम् ।। अर्थात् सूर्य से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण अग्नि स्वरुप हैं। स्वाहा-स्वधादि शब्दों द्वारा देवता एवं पितरों के निमित्त प्रदान की गयी वस्तु (हुत) को वहन करने वाला होने के कारण अग्नि को वह्नि कहा गया। उसी प्रकार देवता एवं पितरों को स्वाशित(स्व-अशित) (अशन) भोजन की गयी वस्तुओं से तृप्ति प्रदान करने के कारण ब्राह्मण भी वह्नि(अग्नि) (वाहक) कहे गए। यज्ञान्ते ब्राह्मणभोजनम् की यही उपादेयता है।

ह्यग्निमुखतोऽयं वै भगवान् सर्वयज्ञभुक् ।
इज्येत हविषा राजन् !  यथा विप्रमुखे हुतैः ।। (श्रीमद्भागवत ७-१४-१७) 
तथाच-  
वरिष्ठअग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् । (मनुस्मृति ७-८४) अग्नि में हवन की अपेक्षा ब्राह्मण-मुख रुपी अग्नि में दी गयी अन्नाहुति अधिक श्रेष्ठ कही गयी है। क्यों कि देव-पितरादि को ब्राह्मण-भोजन से अधिक तुष्टि मिलती है । क्यों कि अग्नि के साक्षात् स्वरुप हैं ब्राह्मण । मनु कहते हैं कि योग्य वरिष्ठ अग्निहोत्री ब्राह्मण को भोजन कराना अत्युत्तम है। इसे और भी स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हवन-सामग्री,काष्ठादि में बहुत तरह के दोष की आशंका है,किन्तु विप्र-भोजन तो बिलकुल निरापद है। यथा –   
अस्कन्नमव्यर्थं चैव प्रायश्चित्तैरदूषितम् ।
अग्नेः सकाशात्  विप्राग्नौ हुतश्रेष्ठमिहोच्यते ।
यहां ध्यान देने की बात है कि भोजन की महत्ता, इसके पीछे छिपे दोष को भी ईंगित करता है।  इसे न भूलें नहीं ।  दान की भांति ही भोजन या अमान्नग्रहण (भोजन की जगह अन्नादि का सीधा लेना) भी ध्यान देने योग्य है। स्कन्दपुराण में विभिन्न अवसरों पर कराये जाने वाले भोजन के सुपरिणाम-दुष्परिणाम पर विस्तृत चर्चा है। विशेष जिज्ञासुओं को मूल ग्रन्थ का अवलोकन करना चाहिए। यहां संक्षेप में थोड़ी चर्चा किये देता हूँ।
अन्न में मुख्य रुप से तीन प्रकार के दोष माने जाते हैं— वस्तुगत, पात्रगत, और निमित्तगत। यानी क्या खा रहे हैं, किसका खा रहे हैं, तथा कब और कहां खा रहे हैं।
अमावस्या को परान्न भोजन करने से भोजनकर्ता के महीने भर का पुण्य लाभ अन्नदाता को मिल जाता है। अयनारम्भदिवसीय(जिस दिन सूर्य अयन परिवर्तन करते हैं- यानी वर्ष में दो बार) भोजन से भोजनकर्ता के छः महीने का पुण्य लाभ अन्नादाता को मिल जाता है। इसी भांति विषुवत् संक्रान्ति दिवसीय भोजन तीन महीने का पुण्य स्थानान्तरित कर देता है। सूर्य-चन्द्रग्रहण कालिक भोजन तो सबसे अधिक प्रभावशाली है। इससे बारह वर्षों का संचित पुण्य स्थानान्तरित हो जाता है। श्राद्धीय भोजन तीन वर्षों का पुण्य क्षय करा देता है। मासिक श्राद्ध भोजन आठ वर्ष का एवं अर्द्धवार्षिक श्राद्धभोजन छः माह का पुण्य-क्षय करा देता है। अस्थिसंचय जनित भोजन के दुष्परिणाम के बारे में कहना ही क्या,वह तो जीवन भर का पुण्य हरण कर लेता है। अघोषित रुप से यहां दूसरा भाव भी है कि पुण्य चला जाता है, और पाप लग जाता है। यानी अन्नदाता को लाभ ही लाभ है और भोजनकर्ता को हानि ही हानि है।
विवाह यज्ञादि के प्रसंग में किया गया ब्राह्मण भोजन और प्रेतकर्म-श्राद्धादि भोजन का दुष्प्रभाव बिलकुल भिन्न होगा। किन्तु व्यावहारिक समस्या है कि पौरोहित्य कर्म-रत कोई ब्राह्मण ऐसा कैसे कह सकता है कि हम विवाह में भोजन करेंगे, और श्राद्ध में नहीं करेंगे !
पुनः यहां भी वस्तु,उद्देश्य,देश,काल,पात्रादि का विचार करना होगा। इन पांच घटकों पर यदि गहन विचार(छानबीन)करते हुए चलें तो एक कदम बढ़ाना भी कठिन हो जायेगा व्यावहारिक दृष्टि से,किन्तु फिर भी जहां तक हो सके इन सबसे विवेक पूर्वक बचना होगा,तभी संस्कार शुद्ध हो सकता है। एक सद्गृहस्थ का अन्न-द्रव्यादि जितना शुद्ध होगा,उतना एक चाण्डाल का कदापि नहीं हो सकता । एक प्रसंग में भीष्म ने भी इसे स्वीकार किया है कि दुर्योधन के दूषित अन्न का प्रायश्चित करना पड़ रहा है। दूषित रक्त जितना बह जाये,अच्छा है।
अब भोजन के दूसरे पक्ष पर भी ध्यान दें। शास्त्रकारों ने जहां ये नियम सुझाये हैं कि किसी भी शुभाशुभ यज्ञादि के बाद ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए, वहीं ये भी सुझाया गया है कि ब्राह्मण को अपनी सुरक्षा और संस्कार रक्षा हेतु क्या करना चाहिए।  
श्राद्धभोजन के पूर्वापर (पहले और बाद में) सहस्र गायत्री जप का नियम है— कितने लोग इसे जानते,मानते और करते हैं ! लोभ और अज्ञान वश हम सदा तत्पर रहते हैं- यजमान के यहां खाने के लिए । यजमान भी ब्राह्मण को भोजन देकर ऐसा महसूस करता है कि उसने हमपर बड़ी कृपा कर दी । ये नहीं समझता कि हमने उसके पाप को अपने सिर मढ़ लिया । वशिष्ठस्मृति में इस प्रसंग में विशेष ध्यान दिलाया गया है ।
एक रोचक पौराणिक प्रसंग है- पौरोहित्य कर्म निन्दनीय है, त्याज्य है—ऐसा मानकर ऋषि वशिष्ठ सूर्यवंशियों का पौरोहित्य कर्म त्यागने का मन बना लिए, जो कि महाराज ईक्ष्वाकु के समय से ही सूर्यवंशियों का पौरोहित्य सम्भाले हुए थे।  । राजा को बड़ी चिन्ता हुयी । वे अपना योग्य और सनातन पुरोहित खोना नहीं चाहते थे। भगवत् कृपा उसी समय नारदजी वहां उपस्थित हुए और राजा के आग्रह का समर्थन करते हुए जानकारी दिए कि ये वो कुल है जहां भविष्य में परब्रह्म रामावतार में अवतरित होने वाले हैं। नारद के मुख से यह जान कर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुरोहित बनने के लोभ में गुरु वशिष्ठ ने सूर्यवंशियों का पौरोहित्य करना जारी रखा।

(ग) कर्म और संस्कारों का लोप— क्या करना है,कैसे करना है,क्या नहीं करना है आदि बातों को धीरे-धीरे भुलाते चले गए। कर्मों के साथ-साथ विविध संस्कारों के महत्त्व को भी भूल बैठे। Happy Birthday मनाना तो सीख गए, पर गर्भाधान,पुंसवन,सीमन्त,जातकर्म,नामकरण,अन्नप्राशन,कर्णवेध,चूड़ाकरण,उपनयनआदि सत्  संस्कारों का शनैःशनैः लोप होता चला गया । इनकी उपयोगिता और महत्ता का ज्ञान ही न रहा,फिर पालन क्या होगा।
जम्बूद्वीप में वसने के बाद हम भी धीरे-धीरे वैसे ही होते चले गए जैसे यहां के अन्य विप्र थे । दिव्यता तिरोहित होती चली गयी, सहज मानवी दोष(विकार) अतिक्रमित होता चला गया।  ध्यान रहे- जो वस्त्र जितना स्वच्छ होगा,उस पर पड़ने वाला धब्बा भी उतना ही स्पष्ट और गाढ़ा होगा। अस्तु।

(घ) इतर वर्णो में विवाहादि सम्बन्ध— वैसे इसे भी कर्म-संस्कारों के लोप में ही रखा जा सकता है। फिर भी स्वतन्त्र विचार विन्दु है ये। पूर्वकाल (पौराणिक काल) में ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी कि ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र - इन चारो वर्णों का पूर्वोत्तर क्रम से क्रमशः चारों से,तीन से,दो से और सिर्फ एक वर्ण में विवाह मान्य था । इसके विपरीत भी वैवाहिक सम्बन्ध खूब हुए । परिणामतः अनुलोम-विलोम वैवाहिक प्रक्रिया  के कारण मूल चार वर्णों से क्रमशः भिन्न प्रकारों का सृजन होता चला गया । स्वाभाविक है कि ब्राह्मण-ब्राह्मणी,ब्राह्मण-क्षत्राणी,ब्राह्मण-वैश्या, ब्राह्मण-शूद्रा - इन चार प्रकार के जोड़ों से उत्पन्न सन्तान बिलकुल समान (पूर्व गुण-धर्म वाली) कदापि नहीं हो सकती। और इससे भी ठीक विपरीत जोड़े भी तो बने,जैसे ब्राह्मणी से क्षत्रिय का संयोग, क्षत्राणी से वैश्य का संयोग, वैश्या से शूद्र का संयोग—इस विपरीत संयोग क्रम ने चातुर्वर्ण-संख्या(प्रकार) में यौगिक के विपरीत गुणात्मक वृद्धि कर दी।  इतिहास-पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। सनातन वर्ण-व्यवस्था का नष्ट-भ्रष्ट होना- कलिकाल का प्रमुख लक्षण है। भविष्यादि पुराणों में इस सम्बन्ध में विशद चर्चा है।
इस प्रकार चार से चार सौ या कि अनगिनत होते जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं । वस्तुतः गुण-कर्मादि से ही संस्कार बनते हैं। संस्कार बनने में बहुत समय लग जाता है, किन्तु बिगड़ना तो मिनटों में हो जाता है। ऊपर चढ़ने में समय और श्रम लगता है। नीचे गिरना तो प्रकृति का सहज नियम है। निज गुरुत्वबल जब नष्ट हो जायेगा,तो अन्य के गुरुत्वाकर्षण में परवश होना ही पड़ेगा- वह पृथ्वी का हो या कि किसी अन्य का।
संस्कार हीनता के पीछे अनुचित वैवाहिक सम्बन्ध भी बहुत बड़ा कारण रहा है- इसे ईमानदारी से स्वीकरना होगा । निज स्वार्थ रक्षा में सामाजिक अहित भी भरपूर हुआ है और हो भी रहा है। हमारे कर्म-कुकर्म का प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव तो भावी पीढ़ी पर पड़ेगा ही,किन्तु  उसे सम्भालना-बचाना हमारे बस की बात नहीं है। हमारा वस है तो सिर्फ अपने कर्म और संस्कार पर, जिसकी रक्षा तो हर हाल में करनी होगी।  
मान लिया किसी ब्राह्मण ने विधिवत विवाह नहीं किया किसी वर्णेतर कन्या से। कोई सन्तान भी उत्पन्न नहीं हुआ वर्णेतर से, किन्तु सामयिक भोग-विलास में भी संलग्न हुआ यदि, तो इससे भी संस्कार हीनता तो आयेगी ही न। एक समय ऐसा भी काफी जोरों पर था जब भैरवी साधना की दीवानगी थी । इस आँधी में भी बहुत से तथाकथित साधक उड़े-गिरे पतन के गर्त में । उनका कल्याण हुआ हो या न हुआ हो, किन्तु समाज का तो अकल्याण हो ही गया। अस्तु।

                    ---)ऊँ श्री भास्करार्पणमस्तु(---
क्रमशः...