Friday, 2 November 2018

प्रभावती-यात्रा-वृत्तान्त


प्रभावती-यात्रा-वृत्तान्त

      आपके बहुमूल्य समय का मान रखते हुए, पहले ही ये स्पष्ट कर दूँ कि ये कोई वी.आई.पी.यात्रा-वृत्तान्त नहीं है । न ए.सी. है न सिगार के घुएं, रम्म, ज़ाम, गॉबलेट कुछ भी नहीं हैं यहां । न किसी हवाईयात्रा का वर्णन है , न हिल स्टेशन का । कोई मेट्रोसीटी भी नहीं है इस प्रसंग में । धुंआधार नष्ट हो रहे जंगल या पहाड़ों की वेदना और विकलता भी नहीं है यहां । आत्महत्या करते किसान, लुटती हुयी बेटियों, जलती हुयी बहुओं की चर्चा भी नहीं है ।  स्त्री-विमर्श भी पुराना मैटर हो चला है । सर्वहारा पर तो बहुत रोटियां सेंकी जा चुकी । वैसे बात कुछ नयी नहीं कर रहा हूँ । बात नयी हो भी क्या सकती है ! पुराने चावल का माड़ भी बहुत गाढ़ा होता है, भले ही कूकरीसभ्यता में ये रहस्य किसी को पता न हो ।
       खैर, चर्चा कर रहा था प्रभावती यात्रा की । ये यात्रा कुछ पैदल, कुछ रिक्शे से तय हुयी थी- बहुत ही आनन-फानन में । ठीक से कपड़े पहनने और काकुल मारने का भी होश न था । तड़के ही दो-चार कुल्ला मारके निकल जाना पड़ा था- स्थिति ही कुछ ऐसी थी । आसपड़ोस के अनुभवियों ने सुझाव दिया कि साधारण लोगों के लिए प्राइवेट से कहीं अच्छा है प्रभावती । फॉर योर काइन्ड इन्फॉर्मेशन ये ज़ाहिर कर दूं कि प्रभावती अन्तर्राष्ट्रीय नगरी गया का बहुचर्चित जनानी अस्पताल है, जो पूरे तौर पर सरकार के नियन्त्रण में है और सरकारी दस्तावेज़ ये बताते भी हैं कि वहां सबकुछ व्यवस्था है...सारी आधुनिक सुविधाएं 24x7 की नयी व्यवस्थानुकूल है ; किन्तु वहां पहुँचने और सर्च करने पर पता चला कि जिस समय वहां पहुंचा था वो 24x7 के दायरे में नहीं आता ।  हताश होकर एक शिलापट्ट पर थब्ब से बैठ गया- 24x7 का हिसाब समझने के लिए, किन्तु चुंकि गणित मेरा बहुत ही कमजोर है, इसलिए कुछ जोड़-बाकी न कर पाया ।

        अभी ठीक से सुस्ता भी न पाया था कि एक सज्जन तत्काल वहां उपस्थित हुए और पट्टिका की ओर इशारा करते हुए बोले - ये बैठने की जगह नहीं है । देखते नहीं क्या लिखा है ।

       उनके कहने पर चश्मे को थोड़ा ऊपर-नीचे करके अपने मारक्रोस्कोप का पावर एडजस्ट किया, तब देखा— बा-मुश्किल एक फीट की ऊँचाई पर संगमरमर पर कुछ हुरुफे अपनी वेवसी पर कुंढ़ रहे थे । ज़ाहिर था कि इस अस्पताल को सन्1884 में तत्कालीन गवर्नर की पत्नी के नाम से स्थापित किया गया था, जिसे कालान्तर में नया नाम भले दे दिया गया- प्रभावती; किन्तु विडम्बना ये कि अभी तक गुलामी के उस दस्तावेज को हम उसी सम्मान से ढोये आ रहे हैं और सच्चाई ये कि अस्पताल की विल्डिंग ही नहीं अन्य व्यवस्थायें भी उसी दस्तावेज़ के मुताबिक हैं । अब भला उस जमाने में कोई सोनोग्राफी और अल्ड्रासाउण्ड जैसे अज़ूबे शब्द से क्यों कर वाकिफ़ हो सकता था ! हां, स्वच्छ भारत अभियान के जमाने में, पैथो-सेक्शन में जाने पर  सोचना पड़ेगा कि मिचली आने पर थूकने का जी करे तो नाक और मुंह में किसे पहले खोल कर काम चलाया जाये, वरना....।

   स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आपातकाल यानी इमर्जेंसी शब्द का चुंकि लोग गलत इस्तेमाल करने लगे हैं, इसलिए अनुशंसा की गयी है कि इसे व्यवहार से ही नहीं कोश से भी निकाल बाहर किया जाय । शायद उसी का नतीजा है कि इमर्जेंसी केश है - कहने पर एक बाबूनुमा व्यक्ति से झिड़की खानी पड़ी – अभी यहां कुछ नहीं होगा...बाहर जाइये...दो रुपये का टिकट कटाना पड़ता है...नौ बजे मैडम आयेंगी...।

    टाइमपास वाला एनरॉयडधारी न होने के कारण, इन्तजार में इधर-उधर भटकते हुए , एक सूचना पट्ट पर निगाहें चली गयीं, जो उपलब्ध दवाइयों के लिए बनायी गयी थी, किन्तु उस पर सिर्फ और सिर्फ नाम भर ही थे । आगे वाले कॉलमों का प्रयोग सिर्फ वोर्ड लिखने वाले ने ही किया था या हो सकता है किसी मन्त्री-संतरी के इन्सपेक्शन पीरियड में उसका उपयोग किया गया हो कभी । सब के सब खाने गरीबों की झोली की तरह ही खाली पड़े थे, जिनका सारा का सारा माल ऊपर-ऊपर ही उडंछू हो जाता है । बहुत मगज़पच्ची करने के बाद समझ आया कि गरीबी का ये रॉ-मेटेरियल कितना जरुरी है देश के लिए । इन्हीं पर तो बहुत सी योजनायें टिकी हैं । ये गरीब न होते, पिछली योजनाओं के बूते ये समृद्ध हो चुके होते, तो आज  इस अस्पताल की क्या जरुरत होती ! और ये अस्पताल न होता , तो फिर इससे जुड़ी सैंकड़ों योजनाओं का क्या होता !

      सवानौ वज गये थे । टिकटबाबू ने दर्शन दिया । दो रुपये का टिकट लेकर अन्दर मेमसाब के केबिन के बाहर खड़ा हो गया अपनी रुग्णा को आगे करके । चुंकि पहला नम्बर था, इसलिए जरा भी देर न लगी- अन्दर जाने में और उधर से बाहर निकलने में भी । बा-मुश्किल दो-ढ़ाई मिनट...। हाथ में पुर्जा लिये दूसरी खिड़की की तलाश होने लगी । दस मिनट के बाद खिड़की तो मिली पर वहां के बाबू के दर्शन के लिए थोड़ा और इन्तज़ार करना पड़ा । औपचारिकता का एक और नम्बर पुर्जे पर डाल कर , पीछे बने पैथोलैब में जाने का सुझाव मिला । 

          पैथोलैब और गोशाला में फर्क समझने में फिर थोड़ा मगज़पच्ची करना पड़ा । दस बजे दिन में भी कमरे में अनुकूल रौशनी के अभाव में बल्ब जलाने की जुगत करते वहां एक बाबू नजर, जो स्विचवोर्ड के प्लग प्वॉयन्ट में नंगी तार घुसेड़ने का प्रयास कर रहे थे और मुंयी तार बार-बार नीचे गिरे जा रही थी । काफी मस्सकत के बाद तार खुंश पाया और कमरा रौशन हुआ । तब बेचारे पी.टी.स्टिक को पुर्जे से जोड़ने के लिए सेलोटेप में उलझ गए । कोई पांच मिनट के बाद पता चला कि वो तो केवल ढांचा भर बचा है, टेप तो कब का खतम हो चुका है । लाचार होकर स्टिक को पुर्जे से स्टेपल करना पड़ा । खैरियत था कि स्टेप्लर में पीन मौजूद था । मुझे तो लग रहा था कि कहीं सूई-धागा का जुगाड़ न करना पड़े । यूरिनरिपोर्ट लेकर, पुनः मैडम के पास आना पड़ा । अगली मीटिंग में अल्ट्रासाउण्ड प्रेस्क्राइब हुआ, इस सुझाव के साथ कि कहीं बाहर से कराना पड़ेगा या फिर मेडिकल कॉलेज जा सकते हैं । आग्रह के बावजूद आपातस्थिति की भी कोई दवा  सजेस्ट इसलिए नहीं की गयी कि बिना फाइनल रिपोर्ट के कैसे हो सकता है ।

        मुझे लगा कि क्या बेवकूफ हुआ करते थे पहले के वैद्य, जो नब्ज़ टटोले और घास-पत्ते की पुड़िया थमा दिये । दूसरी बात, ये सोचने को मजबूर हुआ कि आधुनिक चिकित्सा मशीनों पर निर्भर होकर जटिल हुयी है या आसान ! 

        एक अस्पताल में बारह बजा चुका था, अब दूसरे के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाया । साधारण लोग भाग्य और भगवान पर शायद अधिक भरोसा रखते हैं और अपने सनातन धरोहर पर भी ।

      वापस डेरा लौट आया । अपने तज़ुर्बे की चूरन-चटनी के बूते उपचार शुरु किया । पहले ही खुराख से काफी राहत महसूस किया रुग्णा ने  और अगले तीन-चार दिनों में बिलकुल सामान्य ।

   तामझामी उपकरणीय चिकित्सा-पद्धति को बढ़ावा देने के लिए क्या बिलकुल सुनियोजित ढंग से हमारे धरोहरों को नष्ट नहीं किया गया है ?
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Sunday, 21 October 2018

रावण-दहन-दर्शन-लीला


                      रावण-दहन-दर्शन-लीला

  हम उत्सव-प्रिय लोग हैं । मजे की बात ये है कि खुशी का तो उत्सव करते ही हैं, गम और दुःख का भी करते हैं । दुनिया में किसी के आने का स्वागतोत्सव मनाते हैं- हैपी वर्थ डे कह कर, तो जाने का भी जश्न मनाते हैं- रामनाम सत्य है बोल कर । कमाल की बात तो ये है कि जीवन भर राम का नाम याद नहीं रहा जिसे, उसकी भी शवयात्रा रामनाम सत्य है के उदघोष के साथ ही निकलती है । राम को ज्यादातर दो ही समय याद किया जाता है— किसी की महायात्रा में या फिर चुनाव के पहले राम-मन्दिर बनाने की चोंचलेबाजी में । वैसे राम का नाम और कई बार भी लेते हैं— भगवा पताका फहराते हुए, तलवार-वर्छे भांजते हुए...यहां तक कि किसी बदबूदार और घृणास्पद चीज को देखने के बाद भी- राम-राम छीःछीः कहने में जरा भी देरी नहीं करते । किसी की भर्त्सना करने के लिए भी राम का प्रयोग कर ही लिया जाता है , किन्तु कहने की जरुरत नहीं कि ये सबके सब शब्द सिर्फ होठों के कसरत भर हैं ।

काश , जीवन में सच्चे मन से कभी एक बार भी राम का नाम लिया गया होता !

हालाकि रामनाम के अध्यात्मिक-दार्शनिक पहलुओं पर टिप्पणी करने से कोई खास फायदा नहीं, क्योंकि हमारे धर्म-धुरन्धरों ने , कथा-वाचकों ने और कुछ रामभक्तों ने इतना कुछ कह डाला है कि अब सुनने को जी नहीं चाहता । वैसे भी सुन कर क्या होना है- न मुक्ति मिलनी है और न मन्दिर ही बनना है , क्यों कि इन दोनों कामों के लिए जो कुछ भी चाहिए वो हमारे पास बिलकुल नहीं है । एक ओर राम को बहुतों ने कमाई का साधन बना लिया है, तो दूसरी ओर वोटवैंक भी । इन दोनों स्थिति-परिस्थिति से अनेक बार हम सबका वास्ता पड़ चुका है, अतः इस बावत कुछ कहना फिज़ूल है ।

और जब राम के बारे में कुछ कहने का मन न हो तो रावण के बारे में ही कहने में क्या हर्ज है 
!
राम ने रावण को मारा था— एक दुराचारी, अत्याचारी, बलात्कारी रावण को । और फिर उसकी याद में हम हर बार रावण का दहन करते हैं- पुतला जलाकर । पुतला तो आये दिन नेताओं का भी जलाते हैं किसी न किसी चौक-चौराहे पर । फोटो खिंचवाते हैं । अखबारों का हेडलाइन बनवाते हैं । कभी-कभी उससे कुछ हासिल भी हो जाता है । और कुछ नहीं भी हुआ तो अखबार में नाम और फोटो तो छप ही जाता है- इतना क्या कम है !

राम ने सिर्फ एक रावण को मारा था- विशश्रवा के पुत्र रावण को , लंकापति रावण को, क्यों कि उनके जमाने में सिर्फ वही एक था । किन्तु जहां रावण ही रावण हों—दशानन, शतानन, सहस्रानन..., जिन्हें न बोलने की तमीज़ हो और न चलने की, तो फिर कितनों का दहन किया जाए ! और करेगा कौन ! राम भी तो चाहिए ।

वैसे ये लोग ज्यादातर अपनी खोली में ही आराम फरमाते रहते हैं, बीच-बीच में बाहर झांकते-ताकते हैं- खासकर चुनाव के समय या कुछ घटना-दुर्घटना के समय भी, क्यों कि कुछ बोलने की पूरी आजादी होती है उस समय और फोटो छपने या टीवी इन्टर्व्यू की भी पक्की गुंजायश रहती है । बाकी समय उनके सहयोगी यानी कम आननों वाले उनके बदले काम निपटाते रहते हैं—लूट-पाट का काम, बलात्कार और हत्या का काम । इनमें अधिकांश का ऑथेन्टिक और ऑथोराइज वर्क होता है- ठेकेदारी । सड़क हो, बिल्डिंग हो, बालू-मिट्टी हो, पहाड़-जंगल हो या बोतल-सोतल । सरकारी-गैरसरकारी ज्यादातर निविदायें इन्हीं का स्वागत करती हैं , क्यों कि इन्हें कर्णपिचशाचिनी सिद्धि होती है- कि इस बार कितने का निविदा भरना है । ये सिद्धि वाली सुविधा चुंकि और लोगों को नहीं होती, इसलिए उन्हें सिर्फ भीड़ लगाने का अवसर मिलता है ।  

रावण को जलाते समय भी ऐसी ही भीड़ लगती है । भीड़ बढ़ने का इन्तज़ार भी किया जाता है । भीड़ बढ़ाने का उपाय भी किया जाता है । और फिर भीड़ तो महज भीड़ होती है । उसके पास देह के अलावे और कुछ नहीं होता । देह में दो हाथ होते हैं, जिन्हें जरुरत पड़ने पर एक दूसरे पर पटक-पटक कर तालियां बजायी जाती हैं । और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सिर भी पटकना पड़ता है । भीड़ में खुदा न खास्ते कुछ होनी-अनहोनी हो जाये, तो इसकी न तो खास परवाह की जाती है और न कोई जिम्मेवारी ही होती है – न मेहमान की औ न मेज़बान की । न आयोजक की और न प्रशासक की ।  और अपनी जिम्मेवारी तो हमसब प्रायः बहुत पहले ही लेना छोड़ दिये हैं, क्यों कि हमें पता हो चुका है कि हम अब गुलाम नहीं रहे यानी स्वतन्त्र हो गए हैं । अब हम पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं कुछ भी करने को, कुछ भी बोलने को, कहीं आने-जाने को । मन करे तो एन.एच. पर टेंड लगाकर भोज-पार्टी देदें या डिस्को करें । मन हो तो रेलवे टैक पर टट्टी करें या उस पर बैठ कर रावण दहन देखें । सेल्फी मोड में तो हम हमेशा रहते ही हैं—मौका देखा, चट सेल्फी लिए और खट पोस्ट कर डाले । अरे भाई ट्रेनों का आना-जाना होगा तो खुद समझेगा- वो तो रेलवे का काम है । आंखिर इतनी कीमती वोट देकर हमने रेलमन्त्री बनाया किस बात के लिए है ! और ये भी तय है कि कुछ होने-जाने पर जरा से हो-हंगामें में मुआवज़ा तो मिल ही जाना है । आखिर अपनी सरकार है, फिर हम अपनी जिम्मेवारी क्यों उठाने की ज़हमत पालें ! अपना बेसकीमती दिमाग क्यों इस्तेमाल करें ! अपने भीतर के रावण को ढूढ़ने की क्यों कोशिश करें !

बाहर रावण घूम ही रहा है ।  बाहर रावण जल ही रहा है । उसका ही दहन क्यों न देखा जाए ?
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Friday, 12 October 2018

अविरल प्रवाह

अविरल प्रवाह

          खबर है कि सरकार ने गंगा के अविरल प्रवाह की अधिसूचना जारी कर दी है और साथ ही ये भी खबर है कि  सूचना सुनने के अगले ही दिन पर्यावरणविद प्रो.जी.डी.अग्रवाल , जो पिछले 111 दिनों से गंगा मैया के उद्धार के लिए अनशन पर थे, गंगामैया की गोद में सो गए ।

            अधिसूचना पर प्रसन्न हुआ जाये या कि एक गंगापुत्र के निधन पर शोक प्रकट किया जाये ?

            और जब कुछ निर्णय की स्थिति न बनती हो तो लेखनी बेचैन होने लगती है ।

            गंगा की सफाई का कार्य ही नहीं अभियान चल रहा है विगत कई दशकों से । अब तक कितने करोड़ हज़म हुए इस अभियान में इस डाटाइन्ट्री में मुझे कोई खास दिलचश्पी नहीं है , क्यों कि हम सभी जानते हैं कि सरकार के ज्यादा तर काम योजना, परियोजना, अभियान और डाटाइन्ट्री के सहारे ही चलते हैं । उद्धाटन का शिलापट्ट लगा दिया जाता है, फोटो खिंच जाते हैं, अखबार रंग जाते हैं- बात पूरी हो जाती है ।

सम्भवतः  ज्यादातर योजनायें एक खास योजना के तहत ही बनायी जाती हैं, यानी मुख्य योजना बनाने के पहले एक योजना बनायी जाती है कि इस बार किस-किस को बेनीफीट देना है...इस बार किस-किस का पत्ता काटना है...।

न खाऊँगा औ न खाने दूंगा कहने भर से तो काम चलने को नहीं है । सोचने वाली बात है कि लम्बे समय से खाने-पीने की जो लत लगी हुयी है उसे अचानक बन्द करने के लिए भी तो एक योजना बनानी होगी ? साधारण सी बात है कि तम्बाकू खाने या कि सिगरेट पीने की आदत छुड़ानी मुश्किल है, फिर सीमेन्ट, सरिया, कोलतार, कोयला, कॉन्करीट, खाद, भूसा या कि नोट-वोट जैसी चीजें खाने-पचाने की आदत भला कैसे इतनी आसानी से छुड़ायी जा सकती है ? इतने मजबूत हाज़में वाली भट्टी को कुछ न कुछ ईंधन तो हमेशा चाहिए ही न ।

काफी पहले ही हमारे एक पूर्व प्रधान मन्त्री ने बड़े ईमानदारी पूर्वक खेद व्यक्त किया था कि सरकारी योजनाओं के लिए जो रकम मुहैया की जाती है, वो जमीन पर पहुँचते-पहुँचते मात्र 15% ही बच पाती है, यानी कि हमारे देश के नेता से लेकर अफसर तक इतने वफादार, ईमानदार और कर्मठ हैं कि सिर्फ 85% से ही अपना काम चला लेते हैं बेचारे । सोचने वाली बात है कि जहां 180 रुपये में आईकोनिक काजल की एक अच्छी सी डिबिया आती है, ऐसी भीषण मंहगाई के जमाने में तो कोरे वेतन से सिर्फ  बीबी को  खुश रखना भी मुश्किल है, फिर बाकी चीजों का क्या होगा ? मगर देशभक्त जनता इस गम्भीर विषय पर सोचती कहां है । वो तो वस अखबार और टीवी में खबरें देखती हैं और उबल जाती है बिलकुल दूध की तरह ही, जो 100 डिग्री का भी इन्तजार नहीं करता ।  अरे भाई ! अभी पन्द्रह प्रतिशत छोड़ दिया गया है तुम्हारे लिए । जरा रहम करो इन पर भी ।  कितना मिहनत करके, कितनी गालियां सुन कर, कितने अपमान सह कर क्या-क्या करम-कुकरम करके नेता और अब तो अफसर ही नहीं टीचर या कि सरकारी चपरासी भी बनने के लिए वैसा ही कुछ-कुछ करना पड़ता है । अब किसी यूनिवर्सीटी का या कि टीईटी का जाली सर्टिफिकेट न बनवाया जाये तो क्या बीबी-बच्चों को भूखा मारा जाये ? मगर नासमझ जनता इतनी भी बात समझ नहीं पाती । कितनी बार इशारा किया गया किन्तु समझ नहीं है बिलकुल, और समझ ही नहीं है जब तकनीकी बारीकी की तो फिर बेकार की चिन्ता में क्यों ? तुम अपना काम करते रहो-  हर पांच साल पर सिर्फ एक दिन । और ये लोग अपना काम करते रहेंगे 365 x 5 दिन ।

लूट-पाट का ये अविरल प्रवाह गंगा की अविरल धारा की तरह वैसे ही चलता रहेगा, जैसे हत्यायें और बलात्कार का दिनों-दिन विकास हो रहा है ।

अरे भाई ! कुछ तो विकास कर ही रहा है न । वादा तो विकास का ही किया गया था, फैक्ट्रियां नहीं बनी, बेरोजगारी दूर नहीं हो पायी, तो क्या हो गया, अगली बार कोशिश की जायेगी न । घबराते क्यों हो । क्या इतना भी कॉमनसेन्स नहीं है कि बड़ा काम करने के लिए बड़ा समय भी चाहिए होता होता है !

ऐसी स्थिति में मुझे तो एक बात और समझ आ रही है, सोचता हूँ योजना आयोग को लगे हाथ सुझाव दे ही डालूं – जिस तरह से बिना पढ़े-लिखे डिग्रियाँ घर पहुँचा जाते हैं वी सी साहव के मुफ़स्सिर , जिस तरह तीन रुपये किलो चावल-गेहूं पहुँच जाता है जरुरतमन्दों के घर, जिस तरह 35% वाले भी चुन लिए जाते हैं 95% को दरकिनार करके, उसी तरह चुनाव आयोग को  भी कुछ ऐसी ही करतब दिखाना चाहिए , ताकि ईवीएम पर भी लांछना न लगे और न फिर से वैलेटयुग में वापसी करनी पड़े ।

एक ऐसा ही सुझाव माननीय सुप्रीमकोर्ट के लिए भी है मेरे पास कि जैसे धारा 370 की चिन्ता छोड़कर, धारा 497 और 377 आदि पर गम्भीरता पूर्वक विचार हुआ उसी तरह कोई ऐसी व्यवस्था दी जाये कि बलात्कार और भ्रष्टाचार का स्वरुप ही बदल जाये । आंखिर दकियानूसी सोच वाला सोलवीं शताब्दी में जीने वाला भारतीय बलात्कार को बलात्कार कहता ही क्यों है और भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार ना कह कर सदाचार मान लेने में क्या आपत्ति है ?

एक बात और मुझे समझ नहीं आयी कि गंगाप्रेमी अग्रवालजी की तुष्टि के लिए अविरल प्रवाह की अधिसूचना जो जारी कर दी गयी, क्या वो गंगा आकाशगंगा होगी या कि यही वाली ? और यदि यही गंगोत्री वाली ही होगी तो फिर उन बड़े-बड़े बांधों वाली योजनाओं का क्या होगा ? कानपूर की फैक्ट्रियों का क्या होगा ?  और यदि ये सब नहीं होगा, तो फिर ये अविरल प्रवाह का नाटक ही क्यों नहीं बन्ध कर दिया जाता ये सफाई अभियानों को क्यों नहीं बन्द कर दिया जाता ?

पोलीथीन की फैक्ट्रियों पर अंकुश नहीं लगना है । पोलीथीन यूज़र पर अंकुश लगने की बात हो रही है ।  लाइसेन्स देते समय का नियम-कानून कुछ और था अब क्या कुछ और हो गया है ?

स्वच्छ भारत का अभियान चल रहा है अभी । फोटो खिंचवाने का जबरदस्त दौर है । भावी चुनाव के पहले चेहरे दिखाने का फोकटिया अवसर है । धो लो हाथ बहती गंगा के अविरल प्रवाह में ।

अरे बाबूमोसाय ! दिमाग में जो कचरा भरा है, बेईमानी भरी है, भ्रष्टाचार भरा है.. उसे पहले क्यों नहीं साफ करते ?  पहले वही छोटा वाला ड्रेन साफ कर लो , सड़कें और गलियां खुद-ब-खुद साफ हो जायेंगी- बिलकुल तुम्हारे पायजामें-कुरते की तरह एकदम बगुला मार्का ।

माँ गंगे मुझे माफ कर देना । 

Sunday, 7 October 2018

भोंचूशास्त्री की वेदना



भोंचूशास्त्री की वेदना   
  
धर्म-अधर्म,न्याय-अन्याय,सत्य-असत्य, व्यवस्था- अव्यवस्था के बीच अनवरत द्वन्द देवासुर संग्राम जैसा सनातन है – भोंचूशास्त्री का ये वक्तव्य मुझे चौंका गया । सुप्रभातम् की अप्रत्याशित कॉलिंग-बेल के साथ भोरमभोर की उनकी उपस्थिति, टिप्पणी या कहें सूचना मेरे भीतर कई सवालों को ला खड़ा कर दिया, किन्तु उनका जवाब ढूढ़ने का रत्ती भर भी अवसर न दिया शास्त्रीजी ने ।

       नये डेरे में आने के बाद से ही मुझे भोंचूशास्त्री जैसे कोहीनूर  पड़ोसी मिलने का सौभाग्य-लाभ हुआ है । हालाकि इसका असली श्रेय तो मेरे श्रीमतीजी को ही मिलना चाहिए, क्यों कि इस नये मकान को अपनी खोजी हुनर से ढूढ़ने का काम उन्होंने ही किया था ।  उनकी पुरानी सहेली के पूर्व पति होने का सौभाग्य या अब कहूं तो दुर्भाग्य प्राप्त था शास्त्रीजी को । किसी के नीजी मामले में दखल देने की गुस़्ताखी माफ हो तो कह सकता हूँ कि बात-बात में शास्त्री जी धमकी दिया करते थे अपनी प्राणप्यारी को छोड़ कर, गिरि-कन्दराओं में कहीं ध्यानस्थ हो जाने का, किन्तु अभी हाल के उच्चन्यायालय के फैसले के ठीक दूसरे ही दिन शास्त्री जी के साथ जो कुछ घटित हुआ, भगवान न करें किसी दुश्मन के साथ भी ऐसा घटित हो ।

            धारा ४९७ को निरस्त कर सुप्रीमकोर्ट ने खुद को ही भारतीय संस्कृति के कठघरे में ला खड़ा कर दिया है ।  मनीषियों की आत्मा सुदूर स्वर्गलोक से उसे धिक्कारती होंगी, शापित करती होंगी । क्यों कि आदरणीय ही नहीं, सम्माननीय कहे-माने जाने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संस्कृति पर घोर कुठाराघात करने की धृष्टता की है, बदतमीज़ी की है, जिसका जीता-जागता, अति ज्वलन्त, सद्यः प्रमाण हैं भोंचूशास्त्री , जिन्हें घनीभूत वेदना की साक्षात प्रतिमूर्ति कहना अतिशयोक्ति न होगी ।  गौरवशाली भारतीय संस्कृति और सभ्यता के इतिहास पर कालिख पोत दिया इसके ही मान्यवरों ने, अन्यथा आज शास्त्रीजी को इस दारुण विरहाग्नि में झुलसना न पड़ता ।

        दरअसल शास्त्रीजी की प्राणवल्लभा ने उनकी धमकी से आजिज़ आकर और आज तक कभी पहल होता न पाकर, खुद को ही मुक्त कर लिया उनकी गृहस्थी से । उन्हें धत्ता बताकर, खुलेआम खुरानन शास्त्री  के घर जा घुसी और अगली सुबह होने से पहले ही बोरिया-विस्तर बांध कर, उस नीरस-मनहूस शहर को भी छोड़ दी, जहां शास्त्रीजी जैसे रसहीन लोग रहते हैं ।  

      सिर मुड़ाते ओले पड़े वाली कहावत लगता है शास्त्रीजी जैसों के लिए ही बनी होगी । उधर सुप्रीमकोर्ट का फैंसला आया और इधर प्राणप्यारी उड़ंछू...। अब भला कौन सी धारा में बांध कर लावें खुरानन जैसे घरफोड़ू को या कि अपनी विवाहिता पत्नी को , जिसके दाम्पत्यातिहास में सुखमय गृहस्थी का पन्ना था ही नहीं कभी शायद ।

       भोंचूशास्त्री औपचारिक शिक्षा के नाम पर तो शून्य से थोड़े ही आगे थे, किन्तु सनातनी ज्ञान और अनुभव के अथाह सागर होने के दावे के चलते लोगों ने उन्हें शास्त्री सम्बोधन से अभिषिक्त करना ही  उचित समझा था । धर्मशास्त्र हो या कि कर्मशास्त्र, जहां कहीं भी किसी प्रौढ़ाचार्य की ज्ञान-गाड़ी फंसती, शास्त्रीजी ही पंक से निकालने का बीड़ा उठाते । आज उन्हीं शास्त्रीजी की वेदनामूर्ति मेरे सम्मुख खड़ी है और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा उनके सामने खड़ा, समझ नहीं पा रहा हूँ कि ऐसी स्थिति में किन शब्दों के मरहम का लेप उनके जख़्मों पर लगाउँ !

         मैं उन्हें बैठने के लिए कहने की स्थिति में भी न था । उनका वेदनामय प्रलाप जारी था— भगवान कभी भला न करे इन नेताओं का और इन न्यायाधीशों का । मजे की बात तो ये है कि ये पत्रकार भी इन्हीं के सुर में सुर मिलाने को उत्सुक दीख रहे हैं । क्यों इतनी जल्दीबाजी रहती है इन्हें ऐसी बाहियात खबरें छापने की ? नो नेगेटिववाले दिनों में भी कुछ पॉजेटिव निकाल पाना इनके लिए कठिन पड़ जाता है । इसी का नतीज़ा है कि बहुत से नेता जानबूझ कर बेतुकी बातें निर्लज्जता पूर्वक करते रहते हैं, क्यों कि उन्हें मालूम है कि अखबार वाले इसे हेडलाइन बनाने में जरा भी देर न करेंगे । उन्हें भला क्या पड़ी है जनहित या राष्ट्रहित से । नेताओं को सिर्फ हाइलाइट होने से मतलब है और खबरनवीसों को सिर्फ अखबार बिकने से  । देश जाये भांड़ में ...।

   इन होमोसेक्शुवल-गैंग को धारा ३७७ (समलैंगिकता) के कुठाराघात से सन्तोष न हुआ तो ४९७ (एडल्टरी) भी जोड़ लिया फैसले में और भी रास्ता साफ करने के लिए । अब बारी है ३७६ (वलात्कार) और ३५४ (छेड़खानी) की ।  वैसे भी ये आमबात हो गयी है । इसके बारे में ज्यादा क्या कहना । सड़क-बाजार, रेल, विमान, ऑफिस, मन्दिर- सब जगह मर्दानगी दिखायी जाती है- जन्मसिद्ध अधिकार समझकर और कोई खास भय भी नहीं दीखता इस धारा का । वैसे तो रसूकदारों के लिए ३०७ वा ३०२ का भी कोई खास महत्त्व नहीं है । लिव-इन-रिलेशन पर पहले ही मुहर लग चुकी है कोर्ट की । खाओ-पीओ-मौज करो, लूटो-पाटो-ऐश करो— चार्वाक से भी दो कदम आगे की सोच रखने वाले धन्य हैं हमारे महानुभाव । अभी हाल में ही समाचार आया है कि सिर्फ आरोपित होना ही पर्याप्त नहीं है चुनाव-नामांकन की अयोग्यता हेतु, यानी की आरोप सिद्ध होना भी जरुरी है । और ये कौन नहीं जानता कि आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना में कितना फर्क होता है, कितनी लम्बी दोड़ होती है । कितना समय लगता है । दादा के केस का फैसला पोता भी सुन ले तो खुद को भाग्यवान समझे । साक्ष्य और सबूत को दो आँखें मानने वाले अंधे कानून को क्या ये भी नहीं पता कि कितना दम है इन दो आँखों में, और कितनी सहजता से इनपर पट्टी बांधी जा सकती है ! कितने कमाल का है न हमारा संविधान, हमारा कानून, महान है हमारी संसद और उससे भी महान है हमारी न्यायपालिका, जहां गोटसे को फांसी लगती है, भगत, आजाद और विसमिल को विसार दिया जाता है और दूसरी ओर कोई  बाप-चाचा सम्बोधन से प्रचारित होता है ।  कभी किसी ने ये भी नहीं सोचा कि राष्ट्र का भी कोई बाप होता है क्या ! किसने कब दिया ये खिताब आर.टी.आई. लगाने पर भी जान पाना मुश्किल  । शास्त्रीजी का शव परीक्षण भी जरुरी नहीं समझा गया और सुभाष को गुमनामीबाबा बनना पड़ा । हजारों हजार शव पर मिट्टी डाल कर यूनियन कारबाईड को पोषित किया गया , राजीव दीक्षित जैसे चिन्तक, विचारक, वक्ता की हत्या पर खींसे निपोरता उसका ही तथाकथित साथी अरबों का टर्नओवर करता है और इसे भी स्वाभिमान भारत के चश्मे से देखा जाता है । व्रितानियों के पोथड़े(डाईपर) को ही ऋषियों-मुनियों का धर्मशास्त्र और विचारकों का समाजशास्त्र मान लिया गया और उसके ही आलोक में सात दशक गुज़र गए सुराज के बिगुल बजाते-  सुशासन के नाम पर । सच पूछो तो क्या किया है इन हरामखोरों ने विगत दशकों में …?

            शास्त्रीजी के प्रवचन से मुझे भी कुछ बोलने का बल मिला । सादर उनका हाथ पकड़ कर वरामदे में रखे बेंत वाले मोढ़े पर विठाया और बोला— ऐसा क्यों कहते हैं शास्त्री जी ? क्या नहीं दिया देश के मसीहाओं ने , अकेलापन न खले इसके लिए दो टुकड़े करके पाक पड़ोसी दिया, धारा ३७० (कश्मीर मामला) दिया, अमर आरक्षण की बूटी पिलाई, जो देश को सदा युवा रखने में कामयाब रहेगा । धर्म तो पहले भी था, जातियां पहले भी थी, किन्तु दशहरे के पहले गाय का मांस मन्दिर में और ईद के पहले सूअर का मांस मस्जिद में फेंक आना - इन्हीं के बदौलत तो हमने सीखा है । करपात्री पर गोलियां चली और स्वतन्त्रता संग्राम का एक अहम मुद्दा माना जाने वाला- गोकसी बन्दी का बिल बड़े कलाबाजी से निरस्त हुआ ।  इस रहस्य की बात तो उस दिन आपने ही कहा था न कि कई मानिन्द हिन्दू कहे जाने वाले गोमांस के बिना रह ही नहीं सकते । फिर ऐसा क्यों न किया जाये कि ये हिन्दु-मुस्लिम आपस में कटारें भांजते रहें और हम घड़ियाली आँसू बहाते हुए मज़हबी ज़ंग की आँच में अपनी रोटियाँ सेंकते रहें । जाति हटाओ का नारा देते रहें और जाति प्रमाणपत्र भी बीडीओ साहब निर्गत करते रहें । आरक्षण के बम्बू से ठेलठाल कर अयोग्यों को उच्चासन पर बैठाते रहें, और असली योग्यता उधर बिदेशी बाजारों में बिकती रहे । समाज के एक बड़े वर्ग को निकम्मा बनाते रहें- सबकुछ फ्री का दे-बांट कर ।   गांधी जयन्ती मनाते रहें और गांधी के सदविचारों को लहुलुहान करते रहें । क्या गांधी ने ही कहा था आर्यावर्त भरत भूमि में दो ऊँची कुर्सियां लगाने को ? जिस दिन आधी रात को सैम्पेन और बोगदा की  बोतलें खुल रही थी, मारकोपोलो के धुएं में  माँ भारती का दम घुट रहा था, कुटिला मेम अपनी सफलता पर थिरक रही थी, ठीक  उसी समय सुदूर नोआखाली के बन्द कमरे में बैठा बूढ़ा बाप अपने अश्रुसिक्त चेहरे को मज़हबी आंसुओं के गंगाजल से धोने की नाकामयाब कोशिश में लगा था । दो ऐयास वेटे तो अपनी-अपनी कुर्सियां सहेजने की जुगत में थे, बूढ़े बाप की अब भला क्या चिन्ता ! अच्छा हुआ एक सपूत ने उसे मुक्ति देदी अन्यथा पता नहीं किन-किन बातों पर रोना पड़ता बेचारे को । किंचित बिगड़े हालातों को सम्भालने वाले प्रबुद्ध पटेल न होते तो पता नहीं और क्या-क्या हुआ होता...।  

    भोंचूशास्त्री पूरे तैस में थे । कहने लगे— सच पूछो तो गांधी को अमर्यादित जितना गांधीवादियों ने किया है उतना किसी और ने नहीं । इतना ही नहीं, हजार वर्षों की गुलामी में जितना लूटपाट मचा, उतना तो चन्द दशकों में ही पूरा कर दिया अपने ही रहनुमाओं ने ।

   जरा गर्दन टेढ़ी करके शास्त्रीजी ने कहा- एक और रहस्य की बात बताउँ तुम्हें - एक विशेषज्ञ ने सलाह दी है कि धरती पर जनसंख्या का वोझ बहुत ज्यादा है । अच्छे-खासे संसाधन इसमें ही खप जाते हैं । कठोरता पूर्वक परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाने में जानते ही हो कि एक अभिनेत्री को कितना कुछ सहना पड़ा था । अतः नया तरीका इज़ाद किया गया- धारा ३७७ के सहारे । अब तुम ही सोचो न- समलैंगिक सम्बन्ध होंगे तो बच्चे कहां से आयेंगे फिज़ूल के ? और वैसे भी शादी के बाद मजे कम चिन्ता ज्यादा सताती है- कहीं बच्चा न ठहर जाये । अब जरा सोचो कितना दूरगामी लाभ होगा इससे हमारे देश को ! आये दिन प्रायः हर घरों में कमोवेश पति-पत्नी की तू-तू-मैं-मैं होती है । दोनों का जीना हराम हो जाता है । गलती से भी पड़ोसन पर या कहो पड़ोसी पर नज़रें चली गयी तो बाहर से भीतर तक बवाल मच जाता है । अब इसे नियन्त्रित करने वाला कानून ही न रहेगा तो भला किस बूते पर झगड़े-लड़ाइयां होंगी ? सीना तान कर औरतें कहेंगी- हम तुम्हारी मिल्कियत नहीं...मेरा शरीर, मेरा मन...मेरा दिल...जिसे चाहें दूंगी...। और कुछ ऐसी ही बातें कहने का अधिकार मर्दों को भी अनकहे ही मिल जायेगा – है न मजे की बात ? बड़ा ही विचित्र रहा है हमारा देश- सात सेकेन्ड में ही मन भर जाता है और बात करते हैं- सात जनमों तक सम्बन्ध निभाने की । ऐसा भी भला कोई सम्बन्ध होता है ? यही सब देख-सुन कर तो विदेशी हमें पिछड़ा कहते हैं । मिथकों में भला कितना जीये इकीसवीं सदी का भारत ? कुछ और भी फायदे सुनो इन धाराओं के निरस्ती के— ।

   शास्त्रीजी इससे आगे कुछ कहते कि तभी अचानक मेरी श्रीमतीजी प्रकट हुयी वरामदे में, बिलकुल काली स्वरुप में, जिनके हाथ में कटार और खप्पर की जगह झाड़ू की मूठ थी । बिना मीन-मेष के सीधे प्रहार कर दी शास्त्रीजी के सिर पर और दहाड़ उठी— तुम्हारे जैसे मर्दों के चलते ही ये दुनिया नापाक होते जा रही है । सत्तर चूहे खाकर बिल्ली चली हज़ को...जीवन गुजार दिया  ३७७ के चक्कर में और अब बात करने चले हैं भारतीय सभ्यता और संस्कृति की ? तुम्हारे जैसे मुखौटे पर मुखौटा लगाये मर्दों ने ही बरबाद किया है इस धरती को, रौदा है सदा नारी को अपनी मिलकियत समझ कर । जीवन खपा दी जिसने तुम्हारी सेवा में, उसके बदले में तूने क्या दिया मेरी उस सहेली को ? डूब मरो कहीं जाकर चुल्लु भर पानी में....।

  झाड़ू के दूसरी ही प्रहार में शास्त्रीजी उड़ंछू हो गए थे । मौका देख मैं भीतर जा घुसा वाथरुम में, सुबह का फ़ारिग होने के ख्याल से ।
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Saturday, 6 October 2018

शारदीय नवरात्रःशंका-समाधान


शारदीय नवरात्रःशंका-समाधान

आसन्न शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, बुधवार दि. १० अक्टूबर २०१८ से लेकर गुरुवार, १८ अक्टूबर २०१८ तक पूर्ण नवदिवसीय रुप से प्राप्त हो रहा है । तदनुसार शुक्रवार १९ अक्टूबर २०१८ को विजयादशमी (दशहरा) मनाया जायेगा । तिथि- क्रम बिलकुल सही और शुद्ध है, फिर भी किंचित पंचांग अपने-अपने अन्दाज में बातें कह कर भ्रम पैदा कर रहे है । इधर लागातार विभिन्न राज्यों और नगरों से जिज्ञासुओं के फोन आ रहे हैं । अतः तत शंका-समाधान हेतु अपना स्पष्ट मत रखना आवश्यक प्रतीत हो रहा है ।

ध्यान देने योग्य कुछ विन्दु-

1.नवरात्र अनुष्ठान में प्रथम दिन कलशस्थापन और अन्तिम दिन होमकार्य विशेष रुप से विचारणीय होता है ।

2.कलशस्थापन हेतु सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त अभिजित को माना गया है, जो प्रायः दिन में साढ़े ग्यारह के आसपास आ जाता है, और अगले अड़तालीस मिनट तक रहता है । निश्चित काल का निर्धारण उस दिन के धट्यात्मक दिनमान के आधार पर करने का नियम है, जो हर वर्ष थोड़ा-बहुत ही आगे-पीछे होता है । यही कारण है कि साढ़ेग्यारह से साढ़ेबारह के समय को मोटे तौर पर शुभ मुहूर्त मान कर कलशस्थापन कार्य सम्पन्न किया जाता है । इसमें बहुत अधिक माथापच्ची भी उचित नहीं है ।

3.ध्यान देने की बात है कि जिन बन्धुओं को पूर्ण अनुष्ठानिक विधि का पालन करते हुए सिर्फ एक सादा या सम्पुट श्रीदुर्गासप्तशती पाठ करना अभीष्ट है उनके लिए तो कोई परेशानी नहीं है, किन्तु पेशेवर बन्धुओं को असली नियम को किनारे रखकर, अपनी सुविधा और अधिक से अधिक यजमान को खुश कर, अधिक से अधिक दक्षिणा संग्रह करना ही एकमात्र उद्देश्य होता है, वैसे में उन्हें परेशानी होती है और तरह-तरह के बेतुके सवाल भी खड़े होने लगते हैं । अलग-अलग यजमानों को अलग-अगल बातें बोल कर, अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में शास्त्रीय नियम की अवज्ञा और अवहेलना होना स्वाभाविक है ।

4.सोचने वाली बात है कि विधिवत एक सादा पाठ करने में अच्छे अभ्यासी को तीन घंटे (पूजन से लेकर पाठ तक) और सम्पुट पाठ में पांच-साढ़ेपांच घंटे लगने चाहिए, ऐसी स्थिति कोई पांच-सात पाठों की जिम्मेवारी कैसे ले लेते हैं मां भगवती ही जाने, मेरे समझ से तो परे है ।

5.किसी भी पाठ के लिए शास्त्रों में छःगुण और छः दोष कहे गये हैं । इस मापदण्ड पर कितने पाठ और कितने पाठी खरे उतरते हैं- ये भी विचारणीय ही है ।

6.इस बार तिथि का जो भोग्यकाल है, वो थोड़ा व्यतिक्रमित है । मंगलवार को ही गया समयानुसार प्रातः नौ बजकर दो मिनट में शुक्ल प्रतिपदा तिथि का प्रवेश हो जा रहा है, जो आगे बुधवार को गया समयानुसार प्रातः सात बजकर अड़तालीस मिनट पर समाप्त हो रहा है । ऐसे में मध्याह्न व्यापिनी मुहूर्त अभिजित का ग्रहण होना कदापि सम्भव नहीं है । अतः दूसरे विकल्प की आवश्यकता पड़ रही है । पूर्वदिन यानी मंगलवार को मध्याह्न कालिक अभिजित मिल तो रहा है, किन्तु उस दिन का सूर्योदय चुंकि आमावस्या तिथि में हुआ है, यानी प्रतिपदा तिथि को सूर्य का बल नहीं मिल पाया है । यश आरोग्य और ऐश्वर्य के लिए सूर्य का बल अवश्य मिलना चाहिए । अतः स्पष्ट है अगले दिन सूर्य-शक्ति-युक्ता प्रतिपदा तिथि को ही ग्रहण करना उचित होगा । भले ही वहां अभिजित का परित्याग करना पड़ रहा है, या कहें अभिजित का बल नहीं मिल रहा है ।  वस ध्यान सिर्फ इतना ही रखना है कि कलशस्थापन जनित अनुष्ठान की प्रारम्भिक क्रिया प्रतिपदा तिथि में ही प्रारम्भ हो जाये । थोड़ा आलस्य त्यागें तो सवाघंटे का कलशस्थापन विधान पूर्ण सम्पन्न भी हो सकता है प्रतिपदा तिथि में ही । फिर चाहें तो किंचित विश्राम लेकर आगे पाठ आरम्भ कर सकते हैं ।

7.इसी भांति अब अन्तिम यानी समापन कार्य पर विचार करते हैं- अनुष्ठान की समाप्ति विहित होमादि कार्य से सम्पन्न होती है । और इसके लिए कठोर नियम है कि होमकार्य नवमी तिथि में ही सम्पन्न हो, दशमी में कदापि नहीं । ध्यातव्य है कि  गुरुवार, १८ अक्टूबर २०१८ को नवमी तिथि गया समयानुसार अपराह्न दो बजकर चौबीस मिनट तक है । इस दीर्घावधि में बड़ी सहजता से पाठ और होम सम्पन्न किया जा सकता है । किन्तु यहां भी अतिपाठी को अड़चने आयेंगी ही । और वे नियमों की धज्जियां उड़ायेंगे ही । अतः उनके बारे में कुछ कहना ही व्यर्थ है ।

8.अब अलगी शंका का स्थान है- विजयादशमी, सीमोलंघन, नीलकंठदर्शन, पट्टाभिषेकादि कार्य । ध्यातव्य है ये सभी कार्य दशमी तिथि में सम्पन्न होने चाहिए । और संयोग से शुक्रवार को सूर्यबल युक्ता दशमी तिथि गया समयानुसार दोपहर बाद चार बजकर इकतीस मिनट तक उपलब्ध है । यहां एक प्रश्न ये उठाया जा सकता है उक्त कार्य गोधूलीबेला में सम्पन्न होने की परम्परा जैसी भी है, किन्तु ध्यान देने की बात है ये परम्परा है, नियम नहीं । जमींदारों और राजा-महाराजाओं के जमाने में तैयारियां करते-करते दिन ढलने को तैयार हो जाता था, और फिर आगे देर रात तक मिलन समारोह चलते रहता था । किन्तु सामान्य लोगों को इन सबसे कोई मतलब तो है नहीं, फिर व्यर्थ की शंका या कि चिन्ता क्यों !

हो सकता है मेरी उक्त टिप्पणी से कुछ पेशेवर बन्धुओं को क्लेश पहुंचा हो, किन्तु मेरा उद्देश्य किसी को क्लेशित करना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाना मात्र है । स्वार्थ और लोभ में पड़कर या आलस्यवश हमें किसी भी नियम की अवहेलना नहीं करनी चाहिए और न गुमराह ही । सही दिशा ब्राह्मण ही तो दिखा सकते हैं समाज को । अतः विप्र बन्धुओं से निवेदन है कि मेरी बातों का अन्यथा न लें और अपनी गरिमा और महिमा को समझते हुए, समाज को सही मार्गदर्शन कराने का प्रयास करें । आपना मत थोपने का प्रयास भी न करें ।  कोई माने या न माने- इसकी चिन्ता भी न करें । कर्मण्येवाधिकारस्ते...। अस्तु ।

Thursday, 13 September 2018

कृष्ण कलंकित हुए जब


  
         भाद्र शुक्ल चतुर्थी के चन्द्रमा का दर्शन करना वर्जित है । इसे कलंकित चन्द्र कहा जाता है । भूल से यदि ऐसा हो जाये तो उसके निवारण हेतु श्रीकृष्ण के इस कलंक-कथा का पाठ-स्मरण करना चाहिए । प्रस्तुत है ये कथाप्रसंग-

जब कृष्ण कलंकित हुए-

      अपराधी होने और कहलाने में बड़ा फर्क है।कभी-कभी अपराधी होने से भी कहीं अधिक विपदाकारी हो जाता है अपराधी कहलाना । क्यों कि सच में यदि अपराध किया हो,तो कम से कम खुद को तो भान होगा ही कि मैं अपराधी हूँ, किन्तु अपराध किया न होने पर भी यदि किसी कारण से कलंक थोपा जाये तो जीना दुभर हो जाता है ।

     भोलेनाथ शिव अपनी प्रिया उमा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- 
माघ युगल गुण चैत के,भादो वेद उमंग।    
उमा न देखु मम सिर,ता दिन वसत कलंक।। — 
हे उमा ! वर्ष के इन तीन तिथियों को तुम मेरे सिर को मत देखना।ये तिथियां हैं—माध शुक्लपक्ष द्वितीया, चैत्र शुक्लपक्ष तृतीया और भादो शुक्लपक्ष चतुर्थी । तुम जानती ही हो कि मेरे सिर पर चन्द्रमा का वास है और इन तिथियों के चन्द्रमा शापित हैं । उन्हें कलंकचन्द्र कहा गया है शास्त्रों में। यानी इन तिथियों को किसी व्यक्ति को चन्द्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए, अन्यथा अकारण ही कलंकित होना पड़ता है ।

      इसी प्रसंग में आशुतोष शिव लोककल्याणकारी उपाय भी बतलाते हैं- यदि भूल या अज्ञानवश उस दिन चन्द्रमा दीख जाय तो दोष निवारण के लिए दो काम करे- एक तो चन्द्रदर्शनदोषशान्तिमन्त्र- 
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवताहतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।         का जप करे- कम से कम एक सौ आठ बार, और दूसरा काम है- श्रीमद्भागवत के स्यमन्तमणि प्रकरण का पाठ। इस सम्बन्ध में श्री शुकदेव जी कहते हैं- यस्त्वेतद् भगवत ईश्वरस्य विष्णोर्वीर्याढ्यं वृजिनहरं सुमङ्गलं च । आख्यानं पठति श्रृतोत्यनुस्मरेद् वा दुष्कीर्तिं दुरितमपोह्य याति शान्तिम्।। (भा.पु.दशम्-५७-४२)

     इस कलंक-कथा को संक्षिप्त में यहां प्रस्तुत करते हैं।सम्पूर्ण पाठ हेतु मूल ग्रन्थ का अवलोकन करना चाहिए,जो दो अध्याय मिलाकर(४५+४२) ८७ श्लोकों में है ।

      सामाजिक कलंक की विचित्र घटना घट गयी थी, एक बार श्रीकृष्ण के साथ भी—तत्कालीन समाज दबे जबान उन्हें कलंकित कर रहा था,जिसका निवारण बड़ी बीरता और चतुराई से,काफी समय के बाद वे करने में सफल हुए। यह प्रसंग है श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध के ५६वें और ५७वें अध्याय में ।

      सत्राजित नामक एक पुरुष सुदीर्घ आराधना से सूर्य नारायण को प्रसन्न करने में सफल हुआ । वरदान स्वरुप सूर्य ने उसे स्यमन्तक नामक मणि प्रदान किया,जो सूर्य के समान ही प्रकाशित था । उस मणि का गुण था कि वह नित्य आठ ‘भार’(करीब ८,१९,२००कि.) सोना देता था, और जहां भी रहता था वहां महामारी,दुर्भिक्ष आदि का प्रकोप नहीं होता था । भार का शास्त्रीय प्रमाण है-चतुर्भिर्ब्रीहिभिर्गुंजं,गुञ्जान्पञ्च पणं पणान् । 
अष्टौ धरणमष्टमौ च, कर्ष तांश्चतुरः पलम्,
तुलां पलशतं प्राहुर्भारंस्याद्विंशति तुलाम्।।
( चार व्रीहि का गुंजा,पांच गुंजा का पण, आठ पण का धरण, आठ धरण का कर्ष, चार कर्ष का पल यानी भरी, सौ पल का तुला, और बीस तुला का भार) ।

     एक बार श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा कि ऐसी वस्तु तो महाराज उग्रसेन के पास रहनी चाहिए । अतः तुम इस दिव्य मणि को उन्हें दे दो।लोभी सत्राजित ने कृष्ण की यह बात अस्वीकार कर दी । कुछ दिनों बाद की बात है, सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को गले में धारण करके आश्वारोहण किया, और जंगल में शिकार करने निकल पड़ा। शिकार करते समय स्वयं वह एक सिंह का शिकार बन गया । वहीं पास के गुफा में जाम्बवान् नामक एक ऋक्ष रहता था,जिसने उस सिंह को भी मार डाला, और मणि लेकर अपनी गुफा में चला गया ।

    मणि के साथ अचानक प्रसेनजित के गायब हो जाने की खबर से नगरवासियों में बात फैल गयी कि इस मणि के प्रति तो कृष्ण को लोभ था, हो न हो कृष्ण ने ही मणि-हरण करके, प्रसेनजित को मार डाला हो।सत्राजित ने भी कृष्ण को बहुत ही भला-बुरा कहा, और जैसे भी हो मणि वापस करने की बात कही ।

     इस कलंक से व्यथित कृष्ण, कुछ नगरवासियों को साथ लेकर वन में प्रसेनजित की खोज में निकले। घोर वन में एक गुफा के बाहर प्रसेनजित और उसके घोड़े का शव मिला,साथ ही एक सिंह का भी । किन्तु आसपास मणि का कहीं पता न चला । खोजबीन करने पर जमीन पर ऋक्ष और सिंह के युद्ध के भी निशान मिले,जो अन्ततः उस गुफा की ओर जा रहा था । ऋक्ष-पदचिह्न का अनुसरण करते हुए कृष्ण,नगरवासियों को गुफा के बाहर ही छोड़कर, उस अन्धेरी गुफा में प्रविष्ट हुए।कुछ अन्दर जाने पर उस दिव्य प्रकाशित मणि को एक सुन्दर बालिका के हाथो में देखा उन्होंने । 

   कृष्ण को देखकर बालिका घबराकर शोर मचायी, जिसे सुनकर उसका पालक, रक्षक एक भयानक ऋक्ष आगे आया, और क्रोध में भर कर बिना कुछ जाने-पूछे,कृष्ण पर प्रहार कर दिया । कृष्ण भी उससे भिड़ गये। दिन-दो दिन आशा देखकर, नगरवासी निराश होकर वापस लौट गये, और घटना की जानकारी दिये । कृष्ण-प्रिय प्रजाजन सत्राजित को ही दोषी मानने लगे इस दुर्घटना के लिए।सत्राजित भी बहुत भयभीत हुआ कि बिना ठोस प्रमाण के ही उसने कृष्ण को कलंकित किया है। नगरवासी कृष्ण की सकुशल वापसी हेतु माँदुर्गा की आराधना में लग गये ।

    इधर अठाइस दिनों तक ऋक्ष और कृष्ण के बीच युद्ध होता रहा।जाम्बवान् थक कर चूर हो गये, उनके अंग-अंग शिलिथ होने लगे, तब जाकर उन्हें ध्यान आया कि निश्चित ही ये हमारे आराध्य श्रीराम हैं, जिन्होंने द्वन्द्वयुद्ध की कामनापूर्ति हेतु द्वापर में मिलने का वरदान दिया था । श्रीकृष्ण का परिचय पाकर ऋक्षराज जाम्बवान् अतिशय प्रसन्न हुए, और अपनी कन्या जाम्बवंती के साथ स्यमन्तक मणि का उपहार भेंट कर, विदा किया ।

     सारा वृतान्त बताकर कृष्ण ने मणि सत्राजित को लौटा दी, किन्तु भयभीत और लज्जित सत्राजित उस मणि को रखना उचित न समझा । बल्कि श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु अपनी कन्या सत्यभामा को भी मणि के साथ अर्पित कर दिया । सत्यभामा को तो स्वीकार लिया कृष्ण ने,किन्तु मणि यथावत वापस कर दी सत्राजित को, यह कह कर कि मणि तो अपने पास ही रखो, पर इससे नित्य प्राप्त होने वाला सुवर्ण राजा उग्रसेन को दे दिया करो ।

   सामान्यतया यह कलंक प्रसंग यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था; किन्तु हुआ नहीं,क्यों कि सत्राजित की पुत्री सत्यभामा से विवाह करने हेतु शतधन्वा नामक एक युवक पहले से लालायित था । श्वफलकनन्दन अक्रूर और कृतवर्मा ने इस प्रसंग में शतधन्वा को उकसाने का काम किया । जैसे ही उसे मालूम हुआ कि उसकी चहेती सत्यभामा कृष्ण को मिल गयी, तो उसने छल से सत्राजित को मारडाला। पिता की मृत्यु से विकल सत्यभामा हस्तिनापुर चली गयी,क्यों कि उस समय श्रीकृष्ण बलराम वहीं थे । सूचना पाकर कृष्ण अर्जुन को साथ लेकर शतधन्वा को युद्ध में मार गिराये, किन्तु स्यमन्तक मणि उसके पास मिली नहीं।परन्तु उनकी इस बात का किसी ने विश्वास नहीं किया, यहां तक कि दाउ बलरामजी को भी संदेह हो गया कि कृष्ण झूठ बोल रहा है । इस पर कृष्ण को चिन्तित होना स्वाभाविक था, क्यों कि दाउ ने भी उनपर अविश्वास किया।नगर में आने पर पता चला कि भय से भागते वक्त शतधन्वा ने मणि तो अक्रूर के पास रख छोड़ा था, और अक्रूर उसे लेकर कहीं और भाग गये हैं। कुछ समय बाद श्रीकृष्ण अक्रूर को खोज-ढूढ़, समझा-बुझाकर वापस लाये, और नगरवासियों को सारा वृतान्त ज्ञात हुआ । तब से यह मणि अक्रूर के पास रहा, और उससे प्राप्त सुवर्ण उग्रसेन को मिलने लगा । अस्तु । 

Friday, 7 September 2018

समलैंगिकता वनाम संवैधानिकता वनाम नैतिकता

समलैंगिकता वनाम संवैधानिकता वनाम नैतिकता

           ख़बर है कि सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 377 सम्बन्धी पांच साल पहले दिये गए अपने ही फैसले को पलट दिया । समलैंगिक सम्बन्धों को फिर से कानूनन ज़ायज़ करार दे दिया गया ।

    अपने निर्णय को समयानुसार तोड़ने, मरोड़ने, पलटने का अधिकार तो आम आदमी को भी होता है, फिर सुप्रीमकोर्ट तो अपने आप में सर्वोपरि है , सम्मान्य है । इस पर उंगुली भला मुझ जैसा साधारण आदमी उठाने की हिम्मत कैसे कर सकता है !  ऐसों के लिए ही तुलसीबाबा कह गए हैं- समरथ के नहीं दोष गुसाईं ।

            परन्तु नासमझ मन को कैसे समझाऊँ ? वो ये भी नहीं समझता कि हम उन समरथ वालों में नहीं हैं । मन तो अपनी बात कहने को बेताब है ।

     एक माननीय कहते हैं कि देश में सिर्फ संवैधानिक नैतिकता की जगह है, सामाजिक नैतिकता की नहीं । तो वहीं वैठे एक और माननीय का कथन है कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है । इसे संसद से मान्यता मिली हुयी है । और इतना ही नहीं- पीठ ने यह भी स्पष्ट किया गया कि यौन रुझान बायोलॉजिकल है । इस पर रोक संवैधानिक अधिकारों का हनन है । मजे की बात ये है कि यौन रुझानों के अधिकार को अन्तरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्यता भी मिली हुयी है ।

       कुछ और प्रकार के मान्यवरों द्वारा समय-समय पर ये भी कहा जाता रहा है कि बच्चे हैं, बहक गए थोड़े...सड़कों पर बिखरी खूबसूरती देख मन मचल उठा...उन्हें माफ कर देना चाहिए... पत्थरबाज भी हमारे ही बच्चे हैं...ये मॉबलिंचिग वाले भी हमारे ही जैसे लोग हैं...ये काले मुखौटा लगाये लोग भी हमारे ही बीच के हैं....भारत तेरे टुकड़े होंगे- कहने वाले लोग भी हमारे ही बीच के हैं ।
             अरे भाई ! ये सब तो हमारे ही बीच के हैं । हमारे ही जैसे । कोई एलीयन थोड़े जो हैं । फिर ये तरह-तरह के कानून क्यों बना रखे हो...ये ऊँची-ऊँची चारदीवारियों वाला लालघर क्यों सजा रखा है ? छोड़ दो सबको बिगड़ैल साढ़ की तरह, घूमने तो फिरंट होकर- जिसे जो मर्जी आये करने दो । कोई जिस्म लूटता है, कोई दौलत, कोई रिस्वत लेता है, कोई टैक्स चुराता है – क्या दिक्कत है, सब तो अपने ही है न ?

   ये अपनों का दायरा इतना बड़ा कब से होने लगा ?  यौन आकर्षण बायोलॉजिकल है – लगता है सांसदों को या कानूनविदों को ये कोई स्मार्ट मैगज़ीन से खबर लगी है । अव से पहले भला कहां किसी को पता था ये सब ।

        सच पूछें तो मुझ नासमझ को इन सारी बातों में दाल में कुछ काला नजर आ रहा है । अब यहां दाल के कालेपन का विशेष खुलासा मुझसे कराने की आशा मत रखियेगा ।  हो सकता है कि ये मेरे नजरों की गुस़्ताखी हो । किन्तु नजरें भी तो लाचार होती हैं मन की तरह ही । कभी-कभी जगह-कुजगह, वजह-बेवजह झपक जाती हैं और गूंगों को भी बोलने का अवसर दे जाती हैं । ज़ुबान वाले तो हमेशा बोलते ही रहते हैं ।

  सच पूछें तो मेरी समझ से परे है - समलैंगिकता पर नैतिकता की मुहर, वो भी संवैधानिकता की दुहाई देते हुए । क्या हमारा संविधान किसी अनैतिक को नैतिक सिद्ध करने का अधिकार हमें देता है ?

   ऐसे में लगता है नैतिकता की परिभाषा और उसके मूल्य पर पुनर्विचार करना होगा । परिभाषायें बनायी जा सकती हैं, तो बदली भी जा सकती है न अपने मन माफ़िक ?

     मगर यह करेगा कौन ?

         लोकतन्त्र में बहुमत का महत्त्व है । बेचारी नैतिकता का यहां बारम्बार शील-भंग होता है । बाहुबलियों द्वारा बलात्कार होता है उसके साथ और नैतिकता की नयी-नयी परिभाषा गढ़ दी जाती है । अस्तु ।