Thursday, 19 April 2018

रहते कहाँ हो ?


रहते कहाँ हो ?

अकसर ये सवाल मन को झकझोरता  है ।

रहते कहां हो ? - सवाल ही इस बात की ख़बर है कि   होना तो मंजूर है , पर रहने की जगह में संदेह है या कहें रहने का सही ठिकाना मालूम नहीं ।  बड़े-बुज़ुर्गों की कही बातें, मोटी-मोटी किताबों की तरह-तरह की बातें और इन सब के उलट-पुलट, टटोल-मटोल के बाद दिल-वो-दिमाग में उठने वाले बेहिसाब बवण्डर, बाप रे बाप !

            लोगों की देखा-देखी, सुनी-सुनायी युक्तियों के सहारे ढूढ़ने-जानने का कई बार प्रयास किया, किन्तु हर बार निराशा ही हाथ लगी । आख़िर क्यों ?

क्या मैंने गलत जगह में ढूढ़ा ? गलत तरीके से ढूढ़ा ? या कि कहने-बतलाने वाले ने ही गलत बतला दिया - कुछ कह नहीं सकता । हां, साथ में एक और सवाल भी उठा— बतलाने वाले ने क्या कभी देखा ? मिला ? कुछ बातचीत भी हुयी उससे ? या यूं ही वो भी सुनी-सुनायी बातें बक गया ?

 किन्तु इतने भाग-दौड़,खोज-बीन के बाद जो कुछ समझा-जाना, वो सिर्फ इतना ही कि उन सारे जगहों में वो बिलकुल नहीं है, अकसरहां जिसके बारे में लोग कहा करते हैं ।  
और इसी उधेड़बुन में हिचकोले खाता,शरीर और मन से थका-मादा,विस्तर पर औंधे मुंह गिर पड़ा । न जाने कब आँखें लग गयीं । 

आँखें लग जाने का सामान्य अर्थ होता है नींद के आगोश में समा जाना,किन्तु इसे पक्के तौर पर नींद भी कैसे कहूं ? सपना है - मानने को मन गवाही नहीं दे रहा । बहुत बार ऐसा होता है कि सपने और सच के बीच अन्तर करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है । जैसे कि वो पुरानी वाली किताबों में कुछ अनुभवियों ने लिखा है कि ये संसार ही सपना है...। जीता-जागता, दौड़ता-भागता ये इऽत्ताऽ बड़ा सा संसार जब सपना हो सकता है, फिर बाकी की बातें...!

मैंने देखा...नहीं, देखा कैसे ? देखने के लिए तो आँखों का खुला होना जरुरी होता है न ?  सुना । ऐसा लगा मुझे— हाथ पकड़ कर कोई मुझे उठा रहा है — उत्तिष्ठ !...जाग्रत !...वाले अन्दाज में—उठो,जागो,देखो...।

मेरे चारों ओर अज़ीब तरह की रौशनी थी । ऐसी रौशनी पहले कभी देखा नहीं था । रौशनी भी ऐसी हो सकती है - सोचा भी नहीं था । उस खास तरह की रौशनी के सिवा कहीं कुछ और न था या हो भी यदि तो मेरी आँखें देख न पा रही थी,किन्तु कान सुन पा रहे थे ।

मैं सुन रहा था—
‘‘ देखो,ये सब इमारतें देख रहे हो न ! ये गोल गुम्बद वाली...ये मेहराब़ वाली...और ये शंकू वाली...और ये वाली और ये वाली भी...चारो ओर शोर है—कोई कहता है - ये वाला मेरा घर है...कोई कहता है वो वाला मेरा घर है...कोई कहता है वो वाला मेरा घर है...। ये वाला सबसे बढ़िया है...ये वाला सबका सिरताज है...इमारतों की श़क्लें ज़ुदा-ज़ुदा हैं, परन्तु सभी बने हुए हैं एक सी ही ईंट-गारों से । बनाने वाले हाथ भी एक जैसे ही हैं- पांच उँगलियों वाले । बस, फ़र्क इतना ही है कि बनने के साथ ही उनका अलग-अलग नाम हो गया है । और जानते हो— असल झमेला इन सारे नामों से ही है । तुम्हारे जनमने के पहले तुम्हारा कोई नाम था क्या ? तुम्हारा कोई घर था क्या ? जहां जनमे वही घर हो गया न । जिस नाम से पुकार लिए गए - वस वहीं भर होकर रह गए तुम । रत्ती भर भी इधर-उधर नहीं हो पाये । इन नामों ने जकड़ लिया तुम्हें । इन बेतुके नामों की खूँटियों पर टंग गए तुम । इन चारदीवारों ने कैद कर लिया तुम्हें । और इस कैदखाने को ही घर समझ लिया तूनेमेरा घर...अपना घर । दरअसल, इन सारी इमारतों में  न कोई तुम्हारा घर है और न मेरा ही । इन चारदीवारों में न कोई तुम्हें कैद कर सकता है और न मुझे ही । ये बिलकुल तय मान लो कि इन इमारतों में मैं रहा ही नहीं कभी । क्यों कि यहां बहुत शोर-श़राबा है । बहुत झगड़े-फस़ाद हैं । यूं कहो कि दुनिया के सारे फ़सादों की जड़ ये इमारतें ही हैं और साथ ही है वो तुम्हारा वाला नाम जिसे तुम्हारे अपने कहे जाने वाले लोगों ने दे दिया था, ज़बरन थोप दिया था — अपने निजी स्वार्थ में । और तुम भी फंस गए उनकी जाल में । तुमने कभी कोशिश भी नहीं की ये जानने की  कि मैं कौन हूँ ? तुम पक्के तौर पर जान लो कि तुम वही हो जो मैं हूँ ।  मैं, तुम और वो का झमेला खत्म करो । और सबसे बड़ी बात यह कि मुझे ढूढ़ने की कवाय़द बिलकुल फ़िजूल है । मेरा कोई घर नहीं । मेरा कोई अता-पता ठिकाना नहीं । कहां ढूढ़ोगे ? किसी की मत सुनो । ये सबके सब तुम्हें अपने-अपने मक़सद के लिए बरगलाया है सिर्फ । तुम जहां हो, जैसे हो, जिस हाल में हो बस थिर हो जाओ । बहुत भाग-दौड़ कर लिए रेगिस्तानी चश़्मे की तलाश़ में । अब चुप बैठ जाओ । मैं यहीं रहता हूँ...बिलकुल तुम्हारे पास ही...तुम्हारे ही भीतर...तुम्हारी ही सांसों की डोर से बंधा हुआ सा।
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Sunday, 8 April 2018

परजीवीदर्शन




                         परजीवीदर्शन

  आपकी उत्सुकता और आशंका का त्वरित समाधान करते हुए मैं पहले ही कह देना चाहता हूँ कि ये बिलकुल नया वाला दर्शन है। अथक प्रयास के बावजूद षडदर्शनों में इसे अभी तक स्थान नहीं मिल पाया है और भविष्य तो मैंने देखा नहीं। हालाकि प्रयास जारी है। विद्वानों से आग्रह किया जा रहा है। आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि निकट भविष्य में पुराने पड़ चुके सारे दर्शनों को निरस्त करके, एक मात्र इसी महान दर्शन की स्थापना हो जायेगी। दुनिया का गुरु और अग्रणी होने के कारण हमारे देश को ही इसका परम श्रेय मिलना भी बिलकुल तय है।  

अपने देश की बूढ़ी हो रही भाषा में यदि आप यक़ीन नहीं रखते हों, इसे बोलने-लिखने में मानहानि मूहसूस करते हों तो आपकी सुविधा के लिए मैं इसका अनुवाद भी बतला ही देता हूँ। अंग्रेजी में इसे फिलॉस्फी ऑफ पैरासाइट या                पैरासाइटिक फिलॉस्फी कह सकते हैं । हालाकि इस शब्द को अभी किसी डिक्शनरी में ढूढ़ने का ज़हमत मत मोलिएगा । वनस्पति-विज्ञान में कस्कूटारिफ़्लेक्सा के नाम से जाने जाने वाले पौधे को आयुर्वेद में अमरबेल या  अमरलता कहते हैं। सदा दूसरे के रस से रसवान होना इसका प्रधान गुण है।  यह अद्भुत वनस्पति ही आधार है इस नये दर्शन का ।

 ये न तो नास्तिक दर्शन समूह का सदस्य है और न आस्तिक दर्शन समूह का ही । 
यावत जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत वाला सिद्धान्त शायद चार्वाक दर्शन का है। हालाकि मैंने कभी इसे पढ़ा नहीं, किन्तु इस नये वाले दर्शन का सिद्धान्त इसी दर्शन के मूलतत्त्वों पर आधारित है - ये मैं पूरी तरह से जानता हूँ ।
इसका प्रणयन ठीक वैसे ही हुआ है , जैसे पूरी दुनिया के कानूनों का कतरन हमारे अपने वाले कानून का,जिसे बड़े ज़तन से बनाया था हमारी पिछली वाली पीढ़ी ने, इस आशा और विश्वास के साथ कि लम्बी गुलामी से मुक्त होने के बाद राष्ट्र को नयी ऊर्जा मिलेगी और चहुमुखी विकास होगा । सौभाग्य है हमारा कि ये विकास सत्तर वर्षों में भी अभी वालिग नहीं हुआ है । विशेषज्ञों की राय है कि इसका चिर युवा वा किशोर ही रहना,देश के सेहत के लिए फायदेमन्द है ।

इस नये वाले दर्शन यानी परजीवीदर्शन का नवीन अनुगृहित वाक्य है — यावत जीवेत सुखं जीवेत, 
                        परजीवी रुपेण घृतं पिवेत । 
परजीवी रुपेण घृतं पिवेत का ये मौलिक सिद्धान्त जबसे सुना हूँ, पता नहीं क्यों मुझे बहुत भा रहा है और पिछले कई दिनों से अनवरत इस पर ही चिन्तन-मनन में लगा हूँ । और एक गूढ़ बात बताऊँ आपको ? इस पर लागातार चिन्तन करने में बड़ा ही सुकून मिल रहा है । परमात्म-चिन्तन से भी कहीं ज्यादा ।

   ज़ाहिर है कि जिस विषय का चिन्तन ही इतना शान्ति-सन्तोषप्रद है, वो अपने आप में कितना आनन्ददायक होगा ! सोच कर ही सिहरन हो रहा है । सुख,शान्ति और आनन्द यदि सौभाग्य से तीनों उपलब्ध हो जाये,फिर परमात्मा को पाने वाली समस्या भी खतम हो जाये । मैं समझता हूँ कि देश के विकास में इससे काफी मदद मिलेगी,क्यों कि आवादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा परमात्मा को ही खोजने में लगा हुआ है,ठीक उसी तरह जैसे  कुछ वैज्ञानिक एलीयन की खोज में व्यस्त हैं। जबकि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस परजीवीदर्शन के अध्ययन,मनन,चिन्तन,प्रयोग और आत्मसात के बाद कभी कुछ खोजने की जरुरत ही नहीं रह जायेगी। हालाकि मेरा ये अनुभव अपना नहीं है। इसे कुछ परजीवीदार्शनिकों से कुछ दिनों के लिए उधार लिया हूँ।

जैसा कि मैंने कहा— मुझे अभी तक इसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी, अनुभव और ज्ञान  नहीं है , फिर भी थोड़ा कुछ प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूँ । वो इसलिए कि आजकल इसकी बहुत ही आवश्यकता है और स्कोप भी । इसके फ्यूचर स्कोप को मद्देनज़र रखते हुए महानगरों, नगरों, कस्बों में ही नहीं पंचायतीराज के कारण गांव-गांव में पैरासाइटिक इन्डस्ट्रीज़   की स्थापना हो रही है। कुल मिलाकर  कहा जा सकता है कि किसी राष्ट्र का विकास इसी दर्शन की सिद्धि-असिद्धि पर निर्भर है।

  परजीवीदर्शन का अहं तत्त्व है - अन्तःकरण या कहें अन्तरात्मा ।  कुछ लोग इसीको ज़मीर भी कहते हैं । और दूसरा तत्त्व  है—  स्वार्थ । ये वही स्वार्थ है जिसे ज्यादातर लोग जानते हैं । यानी कि ये वो वाला स्वार्थ बिलकुल नहीं है,जिसके बारे में हमारे यहां के साधु-संत बतलाते रहते हैं — स्व का अर्थ । परजीवीदर्शन के फॉलोवरों को स्व को ढूढ़ने-जानने की  जरा भी जरुरत नहीं है । ज़मीर और स्वार्थ दो ही चीजों को ठीक से समझना होता है इस नये दर्शन के विद्यार्थी को । सुविधा की बात ये है कि पहले घटक को त्याग देना होता है और दूसरे को ग्रहण कर लेना होता है । पहले का जैसे ही त्याग करते हैं, दूसरा अपने आप ग्रहण हो जाता है । उसके लिए कोई खास साधना-वाधना बिलकुल नहीं करनी होती । इसीलिये आजकल ये सरल अनुष्ठान बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है ।

  सबसे बड़ी बात ये है कि जैसे ही आप इस दर्शन में सिद्ध हो जाते हैं,फिर कुछ करने-धरने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती । सबकुछ वैसे ही होने लगता है, जैसे जेनरेटर स्टार्ट करके ऑपरेटर निश्चिन्त हो जाता है । सिर्फ सुख-सुविधा ही नहीं बल्कि ऐशोआराम की पूरी व्यवस्था हो जाती है । स्वर्ग की अप्सराओं पर तो इन्द्र ने पहले से ही कब्जा जमा रखा है,किन्तु इस लोक वालियों पर ऐसे सिद्धों का पूरा हक बनता है । ऐश्वर्य इनके चरणों का दास हो जाता है। प्रशासन ही नहीं न्याय भी इनके आगे नतमस्तक होने को विवश हो जाता है । देर रात भी दरबार बैठ सकता है, निर्णय भी सुना सकता है। माइक और कैमरा लिए लोग सदा आगे-पीछे घूमते रहेंगे । यदि मन हो तो उन्हें भद्दी से भद्दी गालियां भी दे सकते हैं और वे सिर्फ दांत निपोरते हुये, यसऽ सरऽ यसऽ सरऽ की रट्ट लगायेंगे । और रही बात विधि-विधान की ।  तो, वो तो इनके साइडपॉकेट में भरे  रहने की चीज है — पान की गिलौरियों की तरह । जब मन हो निकाल कर थोबड़े में डाल लो, जब चाहो प..ऽ..च्च से थूक दो । पीकदान की भी ज़रुरत नहीं । मेज़ के नीचे वाली जगह आखिर कारीगरों ने बनाया किस लिए है !  
   इतना ही नहीं जब चाहें, जितनी बार चाहें संसद ठप्प करा सकते हैं । संसद ठप्प कराने का रेकॉर्ड लिखने के लिए गिनीज़बुक वाले रोज दिन फोन मिलाते रहेंगे । रोडजाम, चक्काजाम ये सब तो बायें हाथ का खेल होता है इन सिद्धों के लिए । वो पुरानी वाली किताबों की जैसे मिथकीय सुनते हैं न कि देवी के भृकुटि विलास मात्र से क्या से क्या हो जाता है— सृजन भी और संहार भी...। बस समझ लीजिये कि उन सारी विभूतियों  से लैस होते हैं ये सिद्ध । घटोत्कच पुत्र बरबरीक के तरकस की तरह इनके पास भी महज दो ही तीर होते हैं — इन्फॉर्मेशन वाला और प्रोडक्शन वाला । और रही बात चाटुकारों की , तो इसकी कमी जरा भी महसूस नहीं होती कभी भी । चाहें तो       बेडरुम में भी इनसे घिरे रह सकते हैं ।

  जरा और जानिये, परजीवीदर्शनशास्त्रियों के गुण— ऐसे सिद्ध लोग महापुरुष की श्रेणी में आ जाते हैं। महाजनः ये न गतः स पंथाः ....वो जिधर चल देते हैं उधर ही रास्ता बन जाता है । जहां बैठ जाते हैं वहीं दरबार हो जाता है । इतना ही नहीं, पाप-पुण्य से बिलकुल ऊपर उठ जाते हैं ऐसे लोग । क्यों कि उनके द्वारा किये गए कर्मों का फल भोगने के लिए सदा आमजनता तत्पर रहती है । शंकर ने तो सिर्फ हलाहल पीया था । किन्तु ये महासिद्ध बड़े-बड़े पहाड़,नदी के बालू,मिट्टी,जगह-जमीन,जंगल,डीज़ल,पेट्रोल,कंकरीट,सीमेंट, अलकतरा तक सब कुछ खा-पीकर डकार भी नहीं लेते । दरअसल डकार वाला गैस तब बनता है न, जब किसी का हाज़मा खराब हो । मजबूत हाज़में वाले का गैस क्या गैसकांड भी भला क्या विगाड़ेगा !

तो आइये चलें, परजीवीदर्शन की अनुभूति करें ।

दरअसल मेरी भी लाचारी है । पेट में गुड़गुड़ होने लगता है,यदि न कुछ कहूं आपसे ।
        आपने अपना बहुमूल्य समय दिया मेरे इस मनोविकार को पढ़ने-सुनने में, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।

Thursday, 5 April 2018

लोकतन्त्र का लेटेस्ट सेल्फी


लोकतन्त्र का लेटेस्ट सेल्फी

     लोकतन्त्र ज्यादातर सेल्फीमोड में ही हुआ करता है । सेल्फी लेते समय सेल्फी लेने वाले की जो मनोदशा और भावदशा, या कि बॉड़ीलैंगवेज जैसा हुआ करता है, लोकतन्त्र में भी नागरिकों की प्रायः वैसी ही स्थिति होती है । आसपास-परिवेश का तो सवाल ही नहीं, खुद को भी भूल जाते हैं हम, जब सेल्फीमोड में होते हैं। फिर जिसे वज़ूद का ही पता नहीं, उसे भला औरों की क्या फ़िकर ? वैसे आप स्वतन्त्र हैं- सेल्फी का अर्थ लेने में । क्यों कि हो सकता है एक और वाला अर्थ ही किसी को अच्छा लगे। अच्छा और इच्छा की पूरी गुंजायश है यहां।

    लोकतन्त्र का एक दूसरा नाम प्रजातन्त्र भी है- आप जानते ही होंगे। वैसे मैं सिविक्स; का विद्यार्थी नहीं हूँ, किन्तु कभी किसी विद्वान लेखक की किताब  में बड़े मनोयोग से पढ़ा था कि प्रजातन्त्र का मतलब ही होता है - प्रजा की इच्छा से चलने या कहें रेंगने वाली शासन-व्यवस्था। या कहें- सदा बीमार सी रहने वाली राज्य-व्यवस्था । वैसे आपका विचार हो तो इसका सही नाम- भेड़तन्त्र  या सियारतन्त्र रखा जा सकता है। क्यों कि ये नाम खूब फबता है इस पर। वैसे भी हमने सीखा है भेड़ों और सियारों से ही झुंड बनाने की कला , हुआ-हुआ करने का हुनर और हमेशा मिमियाते रहने की आदत ।

    क्या कभी आपने दौड़ने वाला लोकतन्त्र देखा है ? नहीं न ? तो फिर चौंकिये मत । लोकतन्त्र ज्यादातर बीमार ही रहता है। कम्बल ओढ़े रहना इसकी मजबूरी है। उससे भी काम न चला तो चेहरे पर भी कुछ डाल-डूल लेना पड़ता है। वो भी एक नहीं कई, ताकि एक यदि हवा-वयार में उड़ भी जाये तो दूसरा बरकारर रहे  और असली चेहरे को किसी तरह का नुकसान न हो। चेहरा यानी पहचान बचाना- इस तन्त्र की सबसे बड़ी समस्या है और सबसे अहं कर्तव्य भी। अपना चेहरा ही न बचा तो फिर देश बच करके ही क्या होगा ? यही कारण है कि जब-जब चेहरे पर ज़रब आता है, तब-तब लोकतन्त्र खतरे में पड़ने लगता है और अपने-अपने अन्दाज में, अलग-अलग कोनों से हुआ-हुआ, या मेंऽ मेंऽ मेंऽ में करना पड़ता है। ऐसे जरुरतमन्द लोकतन्त्र को सहेजने के लिए लोकलाज,धर्म,रिवाज,जाति-पाति सबकुछ छोड़कर, एकजुट होना पड़ता है। बे-हयायी और मक्कारी की लोकतन्त्र में सबसे ज्यादे अहमियत है। इसके बिना बिलकुल काम नहीं चलता। लोकतन्त्र की लाश भी यदि सलामत रही, तो भी उसपर चर्चा, वार्ता, प्रेस-कॉन्फरेन्स करके ऐशो-वो-मौज़ की जिंदगी बसर की जा सकती है—अनुभवियों ने कुछ ऐसा ही कहा है। धर्मराज बने रहने से काम नहीं चलने वाला ! जंगलराज क्या कम लोकप्रिय हुआ हमारे यहां ? खैर ।

    हालाकि सदा सेल्फीमोड में रहना लोकतन्त्र की मजबूरी है। दो-चार को परमानेन्ट खुश रखना मुश्किल होता है, फिर यहां तो लाख-करोड़ की बात है। लाख कोशिश करके भी क्या कोई बीबी अपने स़ौहर को असालतन तौर पर खुशमिज़ाज रख पायी है आजतक ? और यही हाल क्या अभागे स़ौहरों का भी नहीं है ? तो फिर औरों को सदा खुश रखने की ज़हमत ही क्यों ? क्यों न खुद को खुश रखने का इन्तज़ाम किया  जाये। हालाकि सेल्फीमोड में खुद का दायरा थोड़ा सा बड़ा होता है, फिर भी मेरा नाम जोकर के दिल की तरह नहीं ।

  तो आइये सेल्फीमोड में । 

 धड़ाधड़ सेल्फी लीजिये । 

खटाखट सेल्फी लीजिये। 

सोशलमीडिया आपका इन्तजार कर रहा है। 

फिर वहीं मिलेंगे ।

जनतान्त्रिक व्यवस्था का मनतान्त्रिक ताण्डव


जनतान्त्रिक व्यवस्था का मनतान्त्रिक ताण्डव

इस वहम में न रहियेगा कि यहां कुछ तन्त्र-मन्त्र के बारे में बताने जा रहा हूँ । हालाकि तन्त्र-मन्त्र,टोने-टोटके की बातें लूट-बलात्कार से कम हाइलाइटेड नहीं होती । वैसे मैं बात कर रहा हूँ तन्त्र-मन्त्र की ही पर वो वाला नहीं जो आप समझ रहे हैं।
आप देख ही रहे हैं कि लम्बे अरसे से हम सभी जनतन्त्र के दंश से जूझ रहे हैं, जी हां दंश ही । पर विच्छु वाला नहीं । वो तो टप से लगता है और खट से रग-रग में जहर फैला जाता है । ये हैस्लोप्वॉयजनिंग वाला मामला । धीरे-धीरे फैलने वाला, वो भी कभी इस भाग में तो कभी उस भाग में । और लोकलएनेस्थीसिया जैसा भी नहीं ।

सुना है किसी ने कहा था बहुत पहले ही कि बेहतर है- देश अभी कुछ और गुलामी झेले, पर ऐसी आजादी नहीं चाहिए । किन्तु किसी एक की इच्छा से क्या होने को है ? हालाकि हुआ किसी खास की ही इच्छा से, पर उसकी इच्छा से - जिसके सिर पर किसी संत का वरदहस्त था। कुछ बड़ी चीज पाने के लिए किसी बड़े से संत की कृपा जरुरी होती है । अब संत की भी मजबूरी थी या कि इच्छा - इस बहस को यहां छेड़ने का कोई तुक नहीं ।

बात इतनी ही है कि स्वतन्त्रता या कहें जनतन्त्रता का दंश झेल रहे हैं । पहले हाथ काट दिये गए दोनों । अब कलेजा भी निकाल लेना चाहता है जनतन्त्र । पहले  भी लुट रहे थे और आज भी । टेबुल की दिशा बदल देने से टॉक बदल जाये कोई जरुरी थोड़े जो है ।

लूटतन्त्र का ही परिष्कृत नाम है जनतन्त्र । यानी सब मिलकर लूटो । लूटो सब मिल कर, जिसे जितना मौका मिले ; परन्तु शोर मचाते रहो कि मैं नहीं वो लूट रहा है । मैं तो लुट रहा हूं ।  अरे भाई ! रसगुल्ले को कांटे-चम्मच से काट-कूट कर खाओ या कि पांचो अंगुलियों से एक बार उठाकर गटक जाओ - क्या फ़र्क पड़ता है ? अभागा गज़नी तो नाहक ही बदनाम हो गया ।  ऐसे ही गोरा भी । किन्तु गज़नी-गोरे क्या कम हैं हमारे यहां ? अरे वो दुनिया वालों किसी को चाहिए तो कहो, थोक भाव में हम मुहैया करा सकते हैं गज़नवियों को ।

जनतन्त्र में ज़मीर के जिन्दा रहने की गुज़ायश बहुत कम रहती है— ऐसा सुना है मैंने । और जिसे ज़मीर सहेजना हो वो भला कुर्सी-टेबल, गाड़ी-बंगला, ऐश-वो-आराम की बात क्यों सोचेगा ? वो कमअक्ल भला क्या सम्भाल पायेगा कुर्सी-मेज । टाट पर बैठने वाला कुर्सी का मोल भला क्या जाने !  उसकी ज़िन्दगी तो ज़मीर बचाने में ही खप जाती है ।

वेद-पुरान भले ही कहते हों कि आत्मा एक है और वही सबमें व्याप्त है । पर मुझे इसमें कोई दिलचश्पी नहीं और न य़कीन ही । अरे भाई ऐसा कैसे हो सकता है— भेड़ और आदमी में एक सी आत्मा कैसे रह सकती है ? कोई तुलना ही नहीं है दोनों में । भेड़-गधे को कभी आदमी बनते देखा है आपने ? नहीं न । तो फिर आदमी भी भेंड़-गीदड़ कैसे हो जायेगा?  आदमी आदमी रहेगा हमेशा और भेड़ भेड़ । आदमी की आत्मा भेड़ में डाल दी जाये यदि तो उसे घुटन होने लगेगा क्षण भर में ही । और यही बात भेड़ की आत्मा के साथ भी होगी। सफोकेशन दोनों ओर बराबर होगा ।

ये बात तो आप भी जानते हैं — आदमी के पास बुद्धि और विवेक होता है। वो हमेशा उसका इस्तेमाल करता है। और भेड़ - वो तो अगले वाले भेड़ के पीछे-पीछे विना कुछ सोचे-समझे वस मिमियाते रहता है । और अगला वाला किसी होशियार गड़ेरिये की जादुई छड़ी के इशारे पर चलता है,  या फिर किसी सघन अमियारी में आराम फरमाते, वहीं बैठे हु...ऽ...र...ऽ...हु...ऽ...र...ऽ करते गड़ेरिये के मनतन्त्र से । क्यों कि सोच-विचार, तर्क-वितर्क की शक्ति उस अगले वाले में भी कहां होती है !

यदि ऐसा होता तो क्या यही स्वरुप होता जो आज सामने है ?
जनतन्त्र की स्थापना के समय ही कुछ खास-खास तरह के जहरों का बड़े ज़तन से इन्तज़ाम कर दिया गया था । मज़हबी बंटवारा उस जहर की पहली पुड़िया थी, जो हृदयरोगी के एमडोपा की तरह आजीवन व्यवहार में आने वाली थी  और दूसरी पुड़िया ये कह कर दी गयी थी कि जनतन्त्र के  सेहत के लिए बहुत ही जरुरी है- अगले दश वर्षों तक । किन्तु धीरे-धीरे वह उस दूसरी पुड़िया का आदी हो गया । यानी कि पुड़िया के बिना रह ही नहीं सकता,जी ही नहीं सकता । मनतान्त्रिकों की कृपा से उसकी अवधि भी हरबार बढ़ायी जाती रही ।

क्या समझते हैं - कोई डॉक्टर अधिक से अधिक दवाइयां आपको दे रहा है इसके पीछे सिर्फ आपका बुरा सेहत ही जिम्मेवार है ? बिलकुल नहीं । सच्चाई का अंश इसमें अधिक है कि आप दवा खाते रहेंगे तो डॉक्टर की सेहत अच्छी रहेगी । आपकी सेहत से भला उसे क्या लेना-देना । डॉक्टर क्यों चाहेगा कि आप पूर्ण स्वस्थ हो जायें !  अरे भाई उसकी रोजी-रोटी का सवाल है । और कौन मूरख भला अपनी ही पेट पर लात मारेगा ?

खैर । लगता है सेहत वाली बात आपको ठीक से समझ नहीं आयी । तो लीजिये शिक्षा वाली वात से समझाता हूँ। आप अगर पढ़-लिखकर समझदार और होशियार बन जायेंगे, तो फिर मौके-बेमौके सड़कों पर उतर कर हाय-बाय कौन करेगा ? क्या लगता है ये सारक्षता मिशन आपको साक्षर बनाने के लिए बनाया गया है ? इस भ्रम में मत रहियेगा । ये रंग विरंगी मिशन , अभियान और योजनायें जो चल रही हैं वो सिर्फ इसलिए कि उसी के रास्ते से अपने वेटे को विदेशी डिग्री दिलाने का रास्ता निकलता है। कभी कहीं देखे हैं किसी नेता के बेटे को सरकारी स्कूल में जाते हुए ? सुना है - साल-छः महीने में तो भैंस को फ्रैंच बोलना आ जाता है । सत्तर वर्षों में क्या-क्या आया बोलना  ?

भेड़ों की तरह इकट्ठा किये गए कहीं चिलचिलाती धूप में और अभियानों और योजनाओं का ज़ाम उढेलाते रहा - ऊँचे मंचों से । पांच साल पर अंगुलियां रंगे आप, और पुलाव ढकेला कोई और, गरम छांछ हमारे जिम्मे। छाल्ही-रबड़ी कोई और चाटे — इसी को जनतन्त्र कहते हैं न ! 

जनतन्त्र में कहीं कत्थक थोड़े होता है । रागभैरवी और बसंतबहार थोड़े जो गाया जाता है।  यहां तो ताण्डव मचता है। और ताण्डव का स्वर भी अलग होता है। थाप भी। भंगिमा भी ।

तो आइये जनतन्त्र के आगामी ताण्डव के लिए तन-मन को राजी कर लें,क्यों कि कलाकार अभी थके नहीं हैं। आप देखते-देखते भले थक जायें । जय जनतन्त्र ।

ज़मीर वाला स्टॉल (व्यथाकथा)


ज़मीर वाला स्टॉल

एक पड़ोसन ने दूसरे पड़ोसन को बतलाया कि शहर में आज एक नया सा स्टॉल लगा है । किसी शहर में स्टॉल का लगना कोई नयी बात नहीं है । किन्तु नया सा सुन कर मेरी श्रीमतीजी के भी कान खड़े हो गये। छज्जे से थोड़ा और लपक कर पूछना चाही तो, दोनों पड़ोसिने आपस में कुछ इशारेबाजी की । फिर एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरायी भी ।

आप जानते ही होंगे कि इशारों में शब्द नहीं हुआ करते,पर शब्द-शक्ति बेहिसाब हुआ करती है। मेरी पत्नी उस अचानक के आघात से मर्माहत हो गयी,किन्तु उत्सुकता भी ऐसी बला है कि दबाये नहीं दबती। अतः होठ सिकोड़ कर, आहत से हताहत के वजाय, राहत-सा भाव दिखाकर, पूछने की हिम्मत जुटाने लगी । वो जानना चाहती थी कि स्टॉल कहां और किस चीज की लगी है ।

पर जवाब गोल-मटोल सा मिला— तुम तो कभी किसी मॉल-सॉल में आती-जाती नहीं। वैसे भी मॉल जाना,रोज नये-नये स्टॉल से खरीदारी करना सौ-दो सौ रुपल्लों से थोडे जो होता है । वहां ज्यादातर स्वाइप मशीनें होती है और उसे इस़्तेमाल करना सबके बस की बात नहीं । किराये की छत के नीचे बाल पका लेने वालियों के लिए न तो मॉल होता है और न स्टॉल ।

बात बहुत बड़ी थी । थोड़ी चुटीली भी। किन्तु ज्यादातर सच चुटीला ही हुआ करता है। परन्तु इसमें सच की गलती कहां है । वो तो उसका स्वभाव है । खैर।

ऑफिस से घर आते ही, रोज की तरह बिना दूध वाली चाय परोसने से पहले देवीजी ने कहा— सुनो न जी ! शहर में शायद कोई नया-सा स्टॉल लगा है । आज मेरा भी मन हो रहा है। चलो न जरा देख-घूम आवें। खरीदारी करने पर न, पैसे खरच होंगे । मैं रिक्शे के लिए भी नहीं कहूंगी।  

पत्नी की उत्कट इच्छा और चेहरे पर विखरे उतावलेपन के अन्दर दुबकी, किसी दुखते रग की टीस को भांपने में मुझे जरा भी देर न लगी । बेचारी कभी कुछ कहती-फ़रमाती ही कहां है। आजतक कभी लिप्सटिक भी तो लाकर नहीं दिया है मैंने । कुल जमा दो साड़ियों में एक बाहर अलगनी पर सूखती होती है और दूजी वदन पर । अपने पायज़ामे-कुर्ते का भी वही हाल है । शादी में मिले ससुराली जूते में ऑरीजिनल स्टीचिंग ज्यादा है या कि पंचिंग— कहना मुश्किल ।  ऐसे में हॉल-मॉल-स्टॉल...!

परन्तु इन निरर्थक सी बातों पर विचार करने से बेहतर लगा कि उसकी मुरादों को आज पूरा ही कर डालूं । बोतल वाली लीकर तो बड़े लोगों के फ्रिज़ों में हुआ करती है, कप वाली लीकर की बात भी भूल गयी - मुझे भी और उसे भी ।  जीवन में बहुत बार ऐसा होता है कि कुछ न कहना, बहुत कहने से भी कहीं ज्यादा होता है। आज भी कहने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था । पास बुलाकर उसके बदरंग हो रहे बालों को स्नेह से सहलाया और बिना कुछ कहे, हाथ पकड़ कर बाहर निकल पड़ा ।
चौक के करीब पहुँचा तो चारो ओर उत्सव सा माहौल मिला । लोग सज-धज कर चले जा रहे थे। सारे अननेचुरलों को बटोर कर नेचुरल बनने की होड़ में, घुंटे-पिटे आईब्रो पर आईलाइनर, आईपेन्सिल, आईशेडो, आईलेंस, मस्करा, मेरुन लिपस्टिक और न जाने क्या-क्या पोतपात करके घर से निकलने वालियों की भीड़ में मैं थोड़ा असहज महसूस कर रहा था खुद को और वो असमय में ही बूढ़े होरहे बालों को आँचल से ढकने की कोशिश में लगी थी ।

आज़ाद पार्क के करीब पहुँचा तो कनातों की गुलामी में कैद कुछ स्टॉल दीख पड़े । सबसे पहले वाले स्टॉल पर जरा रुका ।  एक बड़े से कैनवैसपर मनोहारी चित्रकारी थी- एक नवयौवना की । चेहरे को निहारते-निहारते पैरों की ओर आया तो एक प्राइसटैग दीखा , जिस पर लिखा था - कीमत सिर्फ बिकाऊ की ही आँकी जा सकती है।  उसके बगल में मोटे अक्षरों में कुछ पंक्तियां थी— मैं बनी नहीं हूँ...बनायी गयी हूँ....तुमने मुझे बनाया है....मैं ज़िश्म बेचती हूँ, ज़मीर नहीं। पढ़ कर सिर झन्ना उठा ।

आगे बढ़ा, दूसरे स्टॉल की ओर । वहां तो कोई चित्र भी नहीं था, कैनवैस रिक्त पड़ा था। 
प्राइसटैग पर लिखा था— अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह - ये सब यदि है तुम्हारे बटुये में तो हिम्मत करके हाथ आगे बढ़ाओ, अन्यथा पैर पीछे खींच लो।   बात कुछ अज़ीब सी लगी,परन्तु होठों पर इत्मिनान और सुकून वाली मुस्कान तैर गयी ।

  जरा और आगे बढ़ा । लागातार कई स्टॉल बड़े करीने से अगल-अलग रंगों की छतरी ओढ़े खड़े थे। डिस्क्रिप्शन और प्राइसटैग भी लगे हुए थे वरीयता क्रम से— न्यायाधीश, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, ईंजीनियर, डॉक्टर, विश्वविद्यालयों के परीक्षा-विभाग, सरकारी स्कूल के माटसाब, सचिवालय के किरानी, जिलास्तर के किरानी, प्रखंडस्तर के किरानी, शिक्षावोर्ड, मठाधीश, पंडा-पुरोहित,पुलिस,प्रशासन,पत्रकार... और सबसे अन्त में जो कुछ लिखा था उसे पढ़ना-देखना बड़ा कठिन हो रहा था, क्यों कि लोगों की भीड़ वहां सबसे ज्यादा थी ।  
खुशबुदार स्प्रे में डुबोया हुआ रुमाल नाकों पर जकड़ कर बांधे हुए लोग लाइन में धक्के खा रहे थे । थोड़े साधारण से दीखने वाले लोग जेब में ऑडोनिल का पैकेट लिए हुए भी लाइन में खड़े दीखे। बदबू भीड़ के कारण थी या कि वहां स्टॉल पर रखे कुछ कॉन्टेनरों के कारण – बात समझने में थोड़ी मस़क्कत करनी पड़ी । मेरे पास तो ऑडोनिल भी नहीं था । पता होता पहले से तो कम से कम फिनायल की गोली ही जेब में धर लिया होता ।

खैर,अब आ गया हूँ तो बिना देखे-दिखाये तो वापस लौटना भलमनसी नहीं है। आठ-दस बार बाबा रामदेव वाला उपचार किया । पत्नी को भी आहिस्ते-आहिस्ते अनुलोम-विलोम करने का सुझाव दिया।  

 लाइन में खड़े, ये सब करते-कराते, धक्के खाते स्टॉल के बिलकुल करीब पहुँचा तो बड़ा सा कैनवास दीखा – वो नावनुमा टोपी और घुटने से काफी नीचे तक बगुला मार्का कुर्ते-पायजामे वाला लकदक सा बिलकुल खुश़मिज़ाजी तस्वीर । प्राइसटैग पर लिखा था -   कोई कीमत नहीं...बिलकुल मुफ़्त...बड़ी कृपा होगी - अंगुली पर स्याही लगा लें एक बार...और कहें तो उसके बदले अपना पायजामा उतार कर पेट के बल उकड़ू लेट भी जा सकता हूँ...बस मेरे भाई ! एक बार की तो बात है...स्याही लगवा लो अपनी अंगुली पर...।
उबकायी सी आने लगी । सिर झनझनाने लगा । पत्नी का हाथ खींचते हुए, भीड़ से बाहर आया— ज़मैयत मिली या कि ज़मीर चाहिए ?  
उसकी आँखों में आँसू छलक रहे थे। गला भर्राया हुआ था । लपक कर मेरे सीने से आ लगी—   मुझे माफ कर दो।
उसकी पीठ थपथपाते हुए मैंने कहा— तुम्हारी कसूर ही कहां है ! गलती तो मेरी है...लोकतन्त्र में ज़मीर ही तो सबसे पहले गिरवी रखना पड़ता है , सो मैं कर नहीं पाया ।
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नोटः- 
 ज़मैयत = सुकून या मन को सन्तोष मिलना ।
 ज़मीर = अन्तरात्मा

Sunday, 11 March 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान एपीसोड 64









प्रकाशन जारी है। स्वागत है आपका। साधुवाद।

Friday, 9 March 2018

राशिफल सम्वत् 2075 (2018-19 ई.सन्) भाग 3 (अन्तिम भाग)





इस पोस्ट के साथ राशिफल का अन्तिम भाग पूरा हुआ। पधारने हेतु साधुवाद।

Thursday, 8 March 2018

राशिफल सम्वत 2075 (2018-19 ई.सन्) भाग 2





नये सम्वत्सर का राशिफल भी यहां देख सकते हैं। धन्यवाद।

राशिफल सम्वत 2075 (2018-19 ई.सन्) भाग 1





अब आप नये सम्वतसर का राशिफल भी जान सकते है हमारे यूट्यूबचैनल पुण्यार्ककृति पर। धन्यवाद।