Saturday, 30 December 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःचालीसवां भाग

गतांश से आगे...
सत्रहवें अध्याय का पांचवां भाग

(नोट-आगे इस प्रसंग में जहां-जहां X चिह्न मिले वहां वैदिक स्वर ग्वं का उच्चारण करें। तकनीकि कारणों से यहां ये फॉन्ट नहीं आ पा रहा है)

             ।। अथ मगकुलदेवतास्थापनविधि ।।३।।
       पूर्वकृत्य— नये भवन में या नये स्थान में जिस दिन कुलदेवता/देवी की स्थापना करना सुनिश्चित हो, उसकी पूर्व संध्या को सपत्निक, स्नानादि से निवृत्त हो, नवीन वस्त्रादि धारण करके (ग्रन्थिबन्धन युक्त) अक्षत,पुष्प,सुपारी,द्रव्यादि लेकर पुराने कुलदेवस्थल में जाकर, एक पत्रावली पर मौन निवेदित कर दे - इस भाव से कि कल प्रातः आपको अपने नवीन स्थान पर स्थापन करने हेतु आमन्त्रित कर रहा हूँ। अगले दिन यथा समय पूर्व निवेदित पुष्पाक्षतादि को ग्रहण करके, मांगलिक कलश, गीतवाद्यादि सहित नवीन स्थान पर प्रस्थान करे।
       वहां पहुंचकर पवित्र आसन पर सपत्निक सुखासीन होकर,आगे की क्रिया अन्यान्य पूजा विधियों ही तरह ही सम्पन्न करे । बैठने के स्थान पर,दायीं ओर पत्नी द्वारा रोली से एक अधोत्रिकोण बनाया जाय, और पुरुष पूर्व से अपने हाथ में लिए हुए मांगलिक जलपात्र को ऊँ आधारशक्तयेनमः कहते हुए स्थापित कर दे।

       तत्पश्चात् आसन शुद्धि,शरीर शुद्धि इत्यादि —
ऊँ केशवाय नमः,ऊँ माधवाय नमः,ऊँ नारायणाय नमः – इन तीन मन्त्रों से तीन बार आचमन करे। तत्पश्चात् ऊँ हृषीकेशाय नमः बोलते हुए हाथ धो ले। ( सिर्फ पुरुष। ग्रन्थियुक्ता पत्नी को अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।)
              तत्पश्चात् आसनार्थ विनियोग- ऊँ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसने विनियोगः ।। - आसन के सामने जल गिरा, कर पुनः जल लेले और मन्त्रोच्चारण पूर्वक अपने आसन के चारो ओर जल-बन्धन करे- ऊँ पृथ्वी ! त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ।।
अब,तीन वा एक बार गायत्री मन्त्र पूर्वक पूरक,कुम्भक,रेचक प्राणायाम करे। तत्पश्चात् पीतल के जलपात्र में जलभर कर,गंगादि तीर्थजल मिश्रित करे। अभाव में सिर्फ मन्त्रोच्चारण करते हुए पात्र-जल को आम्रपल्लव से आलोड़ित करे— ऊँ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदे सिन्धुकावेरी जलेस्मिन्सन्निधौकुरु ।।
अब,क्रमशः तीन कुशाओं की बंटी हुयी पवित्री बायें हाथ की अनामिका अंगुली में और दो कुशाओं की बंटी हुयी पवित्री दायें हाथ की अनामिका अंगुली में धारण करे अग्रांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक- ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसवः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्।। अथवा मात्र ऊँ भूर्भुवःस्वः कह कर पहन लें(स्त्री को पवित्री धारण करने की आवश्यकता नहीं है, उसे सोने की अंगूठी धारण करनी चाहिए)।
अब विनियोग करे—  ऊँ अपवित्रःपवित्रोवेत्यस्य वामदेवऋषिः विष्णुर्देवता गायत्री छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।।
              अब,कलछी वा आम्रपल्लव से जल लेकर मन्त्रोच्चारण पूर्वक अपने चारो ओर और सभी पूजन सामग्रियों पर भी जल का छिड़काव करे-ऊँ अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।। ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु, ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु, ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु ।।

  तत्पश्चात् अक्षतपुष्पपूंगीफलद्रव्यादि लेकर स्वतिवाचन मन्त्रोच्चार करे—
ऊँ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे ।। देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानाँ Xरातिरभि नो निवर्तताम् । देवानांXसक्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे ।। तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्। अर्यमणं वरुणँXसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ।। तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः ।। तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना श्रृणुतं धिष्ण्या युवम् ।। तमाशानं जगतस्त्स्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्तिन- स्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिरधातु ।। पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः । अग्निजिह्वा मनवः सूरचश्रसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह ।। भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाXसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ।। शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ।। अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।। विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ।। द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष X शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वXशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।। यतो यतःसमीहसे ततो नो अभयं कुरु । शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ।। सुशान्तिर्भवतु ।। ॐ गणानान्त्वा गणपतिXहवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपतिXहवामहे निधीनान्त्वा निधिपतिXहवामहे वसो मम । आहमाजानि गर्ब्भधमात्वमजासि गर्ब्भधम् ।। ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन । ससस्त्यस्वकः सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासि -नीम् ।। ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः । ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ मातृपितृ चरणकमलेभ्यो नमः । ॐ इष्टदेवताभ्यो नमः । ॐ कुलदेवताभ्यो नमः । ॐ ग्रामदेवताभ्यो नमः । ॐवास्तुदेवताभ्यो नमः । ॐ स्थानदेवताभ्यो नमः । ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः ।  ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः ।। ॐ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे सकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ।। अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः । सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ।। सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये ! शिवे ! सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यम्बके ! गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।। सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम् । येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनं हरिः ।। तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं देवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि ।। लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषामिन्दवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ।। यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम ।। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। स्मृतेः सकल कल्याणं भाजते यत्र जायते । पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ।। सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः । देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशान- जनार्दनाः ।। विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम् । वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ।। वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।। ॐ श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः ।।
 (नोट— शुभकार्यारम्भ में स्वस्तिवाचन और संकल्प अत्यावश्यक कर्म है । इसे किंचित संक्षिप्त रीति से भी करने का चलन है।  सुविधानुसार किया जाना चाहिए।)  

  तत्पश्चात् जलाक्षतपुष्पपूगीफलद्रव्यादि लेकर संकल्प करे— हरि ॐ तत्सत् ॐ विष्णुर्विष्णुविष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे द्वितीययामे तृतीयमुहूर्ते  श्रीश्वेतवारहकल्पे  सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैक- देशान्तरगते बौद्धावतारे प्रभवादि षष्टिसंवत्सराणां मध्ये, वैक्रमाब्दे...संवत्सरे श्रीमच्शा- लिवाहनशाके यथायने सूर्ये यथा ऋतौ च यथा नक्षत्रे यथा-यथा राशि स्थिते ग्रहेषु सत्सु यथा लग्न मुहूर्त योग करणान्वितायाम् एवं ग्रह गुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य पर्वणि वर्तमाने...नगरे/ग्रामे/क्षेत्रे....मासे...पक्षे....तिथौ...वासरे...गोत्रः....शर्माहं सपत्निकोहं स कुटुम्बस्य मम शरीराविरोधेन क्षेमायुः सौमनस्यनैरुज्य सुत सौख्योत्तरोत्तर संन्तति वृद्धि विपुल धनधान्य सर्वविध कल्याणावाप्ति हेतवे सर्गोपसर्ग त्रिविधोत्पात ग्रहभूतादि बाधा शान्त्यर्थं श्री कुलदेवता सिद्धेश्वर्य्याः तत् प्रीति कामो समुपस्थित पूजा द्रव्यैः पूजनमहं करिष्ये ।
तत्पश्चात् गोपीचन्दन,गंगामृत्तिका (गंगौट) वा गौरमृत्तिका,पीतमृत्तिकादि से उस स्थान को (भित्ती को) आवश्यकतानुसार चतुरस्र मंडल लेपित करे, जहां देव-स्थापन करना है। ध्यातव्य है कि मंडल-लेपन-कार्य प्रत्येक वर्ष किया जाता है। विवाहादि नैमित्तिक वा अर्द्धवार्षिक पूजन के समय पूर्व लेप पर ही सिर्फ छापे की आवृत्ति होती है, जिसे थापा जगाना कहते हैं।
मृत्तिका लेपित मंडल को रेखा,पुष्पपत्रादि से चित्रित करके सजा दे । कहीं-कहीं किसी कुल में बिना घेरे की भी आकृति मिलती है।  किन्तु पूजा-स्थान को सजाना-सवांरना या यूं ही छोड़ देना कोई विधानोचित बात नहीं प्रतीत होरही है । स्पष्टतः यह पूजक की मनस्थिति और श्रद्धा का द्योतक है। ऐसा नहीं कि नहीं सजे हुए देवता को कोई सजा-सवांर देगा तो भारी अनिष्ट हो जायेगा। हां, देवता की मौलिक आकृति में किसी तरह का छेड़छाड़ करना कदापि उचित नहीं है ।  अज्ञानवश या प्रमादवश होती चली आ रही किसी प्रकार की त्रुटि में सुधार करना भी अति साहसी और विद्वान-विवेकशील पुरुष का ही काम हो सकता है।

उदाहरणार्थ यहां दो बहु चर्चित आकृतियों का रेखाचित्र प्रस्तत कर रहा हूँ। कहीं-कहीं थापाओं(तण्डुलपिष्टी-लेपित हथेली की छाप) की दो पंक्तियों के बीच एक वृत्त बना हुआ भी मिलता है,जिसपर सिन्दूर से पुनः किंचित  छोटा वृत्त चित्रित रहता है। वस्तुतः विभूतियों सहित सूर्य की आकृति जान पड़ती है यह । पूर्व में भी कह चुके हैं कि थापाओं की संख्या में काफी भेद मिलता है। अतः लोगों को अपने कुलाचारानुसार अनुशरण करना चाहिए।

 प्रसंगवश उक्त आकृतियों पर थोड़ी चर्चा समीचीन होगी। सबसे पहले दायीं ओर अलग छोटे से मंडल में दिये गए दो छापों की बात करते हैं। प्रायः लोग इन्हें दाई माँ या देवता की सहयोगिनी(उपदेव) मान लेते हैं। वस्तुतः इन दो में एक हैं- आद्यपूजित विघ्न विनाशक गणपति और दूसरे हैं परमशिव । इन्हें पक्षयुग्मदेव वा पखेजु के नाम से भी जाना-माना जाता है। कुलदेवता-मंडल की पूजा या कहें आकृति निर्माण (दोनों कार्य) पहले यहीं से प्रारम्भ करना चाहिए,तत्पश्चात् शेष छापों का सृजन एवं पूजन करेंगे। सिन्दूरादि लेपन भी पहले इन्हीं दो पर करेंगे। सिन्दूर-लेपन-आदेश से यह भ्रम भी हो सकता है कि पुरुष देवों को सिन्दूर क्यों ? ये तो सर्वविदित है कि गणेश और हनुमान दो पुरुष देवता अपवाद स्वरुप हैं, यानी इन दोनों को सिन्दूर अर्पित करना अनिवार्य है। फिर भी शिव को क्यों ? वस्तुतः शिव में शिवा का अन्तर्भाव है यहां । कुछ विद्वानों का मत है कि ये दोनों पक्षेश शुक्ल-कृष्ण पक्षों के अधिपति यानी सूर्य और चन्द्र का प्रतिनित्व कर रहे हैं, जो स-शक्ति हैं।
  आचार्य गणेशदत्त मिश्रजी इन पक्षेशों के पूजन के लिए ऊँ गणपतये नमः  एवं    ऊँ शिवाय नमः मन्त्र सुझाये हैं। आचार्य चन्द्रमोहन मिश्रजी इन्हें सूर्य और चन्द्र मान रहे हैं। यदि सीधे हम सूर्य और गणेश रुप में भी स्वीकारें तो भी किसी प्रकार की आपत्ति और संशय नहीं होना चाहिए। कृष्णपक्ष नाम ही पड़ा है कृष्ण की प्रधानता से और गणेश तो साक्षात कृष्ण ही हैं - इस रहस्य को ठीक से हृदयंगम कर लेना चाहिए । और ठीक इसी भांति सूर्य और शिव में भेदाभास अज्ञान सूचक है। आदित्यहृदय स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है— आदित्यं च शिवंविद्याच्छिवमादित्य रुपिणम् ।
उभयोरन्तरं नास्ति आदित्यस्य शिवस्य च ।।११६।।
प्रातः कालिक सूर्य को ब्रह्म स्वरुप, मध्याह्न कालिक सूर्य को विष्णु स्वरुप, और सायं कालिक सूर्य को शिव स्वरुप माना गया है- ययुर्वेदीय संध्या प्रकरण में । तद्भांति ही तत्-तत् कालिक गायत्री का स्वरुप भी त्रिरुपा(ब्रह्माणी,वैष्णवी,शिवा)मान्य है। किन्तु आदित्यहृदयस्तोत्र में किंचित भिन्न स्थिति कही गयी है- उदये बह्मणो रुपं मध्याह्ने तु महेश्वरः अस्तमाने स्वयं विष्णु स्त्रिमूर्तिश्च दिवाकरः । (११७ का उत्तरार्द्ध एवं  ११८ का पूर्वार्द्ध) । परन्तु इस स्थानभेद, कालभेद से भ्रमित नहीं होना चाहिए। वस्तुतः ये सब क्रियाभेद है।
  खैर,इतना तो निश्चित है कि गणेश, शिव, सूर्यादि कुछ भी कहने-मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हां, आपत्ति होनी चाहिए इन्हें दाईमाँ कहने में । दाईमाँ कह-मान कर प्रधान को ही हमने गौण कर दिया – यह अक्षम्य त्रुटि कही जायेगी।
अब, उक्त मण्डलान्तर्गत शेष छापों की चर्चा करते हैं। आकृति में दिखलाये गए नौ छापे क्रमशः नौ विभूतियों (शक्तियों) के हैं— १.ब्राह्मी, २.माहेश्वरी, ३.कौमारी, ४.वैष्णवी, ५.वाराही, ६.नारसिंही, ७.ऐन्द्री, ८.शिवदूती और ९.चामुण्डा । इनका पूजन प्रणव और नमः युक्त पंचाक्षर मन्त्र से करना चाहिए। यथा- ऊँ ब्राह्म्यै नमः, ऊँ माहेश्वर्य्यै नमः इत्यादि । इन नौ छापों के अतिरिक्त चार और   नाम हैं-१०.विष्णु, ११.लक्ष्मी, १२.ब्रह्मा और१३.सिद्धेश्वरी । इस प्रकार २++४ कुल १५ स्वरुपों की पूजा होती है कुलदेवतापूजन में।

क्रमशः... 

Tuesday, 26 December 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःभाग उनचालीसवां

गतांश से आगे...
सत्रहवें अध्याय का चौथा भाग...

                               — : अथ सिद्धेश्वरी स्तोत्रम् :
सिद्धेश्वर्य्यैः नमस्तुभ्यं नमस्ते च शिवप्रिये ।
धूम्राक्ष्यै च विरुपायै घोरायै च नमो नमः ।।।।
पञ्चास्यायै शुभास्यायै चन्द्रास्यायै च वै नमः ।
वरदायै वराहायै कुर्मायै च पुनर्नमः ।।।।
नरवीरार्द्धदेहायै त्रिनेत्रायै नमो नमः ।
लीलालकशिखण्डायै विश्वायै च पुनर्नमः ।।।।
कव्यरुपायै हव्यायै रुद्रजाप्यै नमोनमः ।
मुण्डायै चण्डमुण्डायै दिग्वस्त्रायै नमोनमः ।।।।
गिरीशायै सुरेशायै विश्वेशायै च वै नमः ।
विरुपायै स्वरुपायै ईशान्यायै नमोनमः ।।।।
सिंहासनायै सिंहायै सोमायै सततं नमः ।
शाकद्वीप निवासायै शाकायै सततं नमः ।।।।
भक्ते शोभान्तरुपायै अथर्वणायै नमो नमः ।
ऋक् साम यजु रुपायै शाकद्वीप प्रिये नमः ।।।।
शाकद्वीप कुलोद्धार कारिण्यै च नमो नमः ।
शाकद्वीप प्रियायै च कुलदेव्यै नमो नमः ।।।।
अष्टादश कुल पूज्यायै सिद्धिदायै नमो नमः ।
सिद्धिदा श्रावणे मासे फाल्गुने सर्वकामिका ।।।।
पुष्पमालार्चिता देवी सर्वदा निश्चितं भवेत् ।। १०।।
                    ।।श्री सनतकुमारसंहितायां सिद्धेश्वरीस्तोत्रम् श्रीदेव्यार्पणमस्तु।।

(नोटः-मगबन्धु(अखिल)के परम्परा-संस्कार अंक में पं.रामानुज पाठक द्वारा प्रेषित उक्त स्तोत्र में किंचित पाठभेद है,जिन्हें ऊपर रेखांकित किया गया है। यथा—धूम्राग्रायै,पंचवास्यायै,भक्ते द्दीयान्तरुपायै)

       श्री साम्बपुराण में सूर्य-साम्ब संवाद क्रम में भी एक सिद्धेश्वरी स्तोत्र है,जिसे यहां उद्धृत कर रहा हूँ—     
।।श्रीसूर्य उवाच।।
श्रृणु साम्ब महाबाहो,सिद्धा स्तोत्रमनुत्तमम् ।
विरुद्धस्यासुरगुरौः पीडा शान्ति विधायकम् ।।।।
योगिनी सिद्धिदा सिद्धा मन्त्र सिद्धि स्वरुपिणी ।
तमसा सिद्धिरुपा च दया रुपा क्षमान्विता ।।।।
सिद्धिरुपा शान्तिरुपा मेधारुपा तपस्विनी ।
पद्महस्ता पद्मनेत्रा शुक्रमाता महेश्वरी ।।।।
वरदा धनदा धन्या राजदा सुखदायिनी ।
शरदा च रमा काली प्रज्ञासागररुपिणी ।।।।
सिद्धेश्वरी सिद्धि विद्या सिद्धि लक्ष्मी च पंकजाः ।
शुक्लवर्णा श्वेत वस्त्रा श्वेतमाल्यानुलेपना ।।।।
श्वेत पर्वत संकाशा सुश्वेतस्तनमण्डला ।
कर्पूरराशि मध्यस्या चन्द्रमण्डल वासिनी ।।।।
कृशरान्न प्रिया साध्वी त्रिमधुस्था प्रियम्बदा ।
कन्या शरीरगाराम विप्रदेह विचारिणी ।।।।
चित्रान्न हस्तासुभगा परमान्नप्रियातथा ।
दशा स्वरुपा नक्षत्रा रुपातर्यामिरुपिणी ।।।।
सिद्धेश्वरी सिद्धरुपा सिद्धिदा सिद्धिरुपिणी ।
इत्येत्कथितं वत्स सिद्धास्तोत्रमनुत्तमम् ।।।।
पठनात्पाठनात् वापि गो सहस्रफलं लभेद ।
ग्रहजन्यं दशाजन्यं चक्रजं भूत सम्भवम् ।।१०।।
पिशाचोरग गन्धर्व पूतनामातृ सम्भवम् ।
दोषं विनाशमायान्ति सत्यं सत्यं न संशयः ।।११।।
                   ।।इति श्री साम्बपुराणे सूर्यसाम्ब संवादे सिद्धेश्वरी स्तोत्रम् ।।


        गुरुजनों के सानिध्य और प्राप्त विभिन्न सूचनाओं के आधार पर यहां एक और कुल देवता/देवी स्थापन विधि अंकित कर रहा हूँ। ध्यातव्य है कि यह विधि नये स्थान में स्थापना हेतु है। किन्तु नित्य,नैमित्तिक,अर्द्धवार्षिक,वार्षिकादि पूजनों में भी किंचित परिवर्तित रुप में व्यवहृत हो सकता है। मुख्यतः इस पद्धति में उरवार पुर की कुलदेवी भगवती सिद्धेश्वरी को नामित किया गया है, किन्तु नाम-मन्त्र-भेद करके अन्य कुल के मग भी इस पद्धति का उपयोग कर सकते हैं।
क्कक्रमश..

Wednesday, 20 December 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाः अड़तीसवां भाग

गतांश से आगे...

सत्रहवें अध्याय का तीसरा भाग...


                                 -:अथ सिद्धेश्वरी कवचम्:-
ध्यानम् यस्याः पाणि तले सरोजममलं तस्यान्तरालेरमाः । देवस्तन्निकटे पुराण पुरुषःस्तन्नाभि पद्मे विधिः ।। तद वक्त्रेनिगमावली विरचिता जाता क्रतूनां क्रिया । याभिर्जीवति देवता कुलमिदं मां पातु सिद्धेश्वरी ।।
  
अथातः संप्रवक्ष्यामि कवचं भुवि दुर्लभं, यस्यस्मरण मात्रेण सिद्धेश्वरी प्रसीदति ।।

विनियोग—   भैरव उवाच-   ऊँ अस्य श्री सिद्धेश्वरी कवचस्य वशिष्ठ ऋषिः श्री सिद्धेश्वरी देवता सकल मनोरथ सिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।।
कवचम्—
संसार तारिणो सिद्धापूर्वस्यां पातु मां सदा ।
ब्रह्माणि पातु चाग्नेयां दक्षिणे दक्षणप्रिया ।।
नैर्ऋत्यांञ्चण्डमुण्डा च पातु मां सर्वतः सदा ।
त्रिरुपा सा महादेवी प्रतीच्यां पातु मां सदा ।
वायव्यां त्रिपुरा यातु ह्युत्तरे रुद्रनायिका ।।
ईशाने पद्म नेत्रा च पातु चौर्द्घं त्रिलिंगिका ।
दक्षपार्श्वे महामाया वामपार्श्वे हरप्रिया ।।
मस्तकं पातु मे देवि सदा सिद्धा मनोहरा ।
भालं मे पातु रुद्राणी नेत्रे भुवनसुन्दरी ।।
सर्वतः पातु मे वक्त्रं सदा त्रिपुरसुन्दरी ।
श्मशानभैरवी पातु स्कन्धो सर्वतः स्वयम् ।।  
उग्रपार्श्वे महाब्राह्मी हस्तौ रक्षतु चाम्बिका ।
हृदयं पातु वज्राङ्गी निम्ननाभि नभस्तले ।।
अग्रतः परमेशानी परमानन्द विग्रहा ।
पृष्टतः कुमुदः पातु सर्वतः सर्वदा वतान् ।।
       गोपनीयं सदा देवी न कस्मै चित् प्रकाशयेत् ।
       यः कश्चित् श्रृणुयात् ऐतत् कवचं भैरवोदितम् ।।
       संग्रामे संजयेच्छत्रुं मातंगमिव केशरी ।
       न शस्त्राणि न चास्त्राणि देहे प्रविसन्तिवै ।।
       श्मशान प्रान्तरे दुर्गे घोरे निगडबन्धनै ।
       नौका योगिनी दुर्गे च संकटे प्राण संशये ।।
       यन्त्र तन्त्र भये प्राप्ते विष वह्नि भयेषुच ।
       दुर्गति संतरेत घोरां प्रयान्ति कमला पदम् ।।
       वन्ध्या वा काकवन्ध्यावा मृतवत्सा च याङ्गना ।
       श्रुत्वा स्तोत्रं लभेत् पुत्रं स धनं चिरजीविनम् ।।
       गुरौ मन्त्रे तथा देवे वन्धने यस्य चोत्तमा ।
       धीर्यस्य समता मेति तस्य सिद्धिर्न संशयः ।।
  ।।ऊँ श्री नीलतन्त्रं कालिकाभैरव संवादे श्री सिद्धेश्वरी कवचं श्री देव्यार्पणमस्तु ।।

अथ प्रार्थना एवं नमस्कार — ऊँ सिद्धेश्वरी तवाद्यापि ह्यक्ष मालाकरेस्थिता विश्वेश्वर पादलग्नः किमतः परमीहते ।।  ऊँ सिद्धेश्वरी नमस्तुभ्यं वरदे सुरसेविते कृपया पस्यमामत्र शरणागत वत्सलः ।।

(पूजाविधि के अन्त में संकेत है- पञ्चमहापुरुषपूजन हेतु । वंशीधरो महाप्राज्ञो भोगानन्द महामुनि श्री मुकुन्दो कृपासिन्धु श्री हर्ष कमलापतिः द्वाविभोलोक विख्यातो वेद विद्या विशारदौ ।। पंचेतानर्चयेत् भक्त्या कुलदेवान् कृपा करान् ।। उपचारै षोडशभिपीत यज्ञोपवीतकैः धूपैः दीपैस्तथा पुष्पैः नैवेद्यैः विविधैरपि ।। )

(किंचित पाठभेद युक्त एक और कवच शिवसागर,नवीनगर,औरंगाबाद निवासी श्री पं. गणेशदत्त मिश्रजी द्वारा संग्रहित एवं मगज्योति विशेषांक,कलकत्ता से प्रकाशित प्राप्त हुआ । इसे भी यथावत संकलित कर रहा हूँ ।)

ध्यानम् यस्याः पाणि तले सरोजममलं तस्यान्तरालेरमाः । देवस्तन्निकटे पुराण पुरुषः स्तन्नाभि पद्मे विधिः ।। तद वक्त्रेनिगमावली विरचिता जाता क्रतूनां क्रिया । याभिर्जीवति देवता कुलमिदं मां पातु सिद्धेश्वरी ।।   

अथातः संप्रवक्ष्यामि कवचं भुवि दुर्लभं यस्यस्मरण मात्रेण सिद्धेश्वरी प्रसीदति ।।

विनियोग—भैरव उवाच- ऊँ अस्य श्री सिद्धेश्वरी कवचस्य वशिष्ठ ऋषिः श्री सिद्धेश्वरी देवता सकल मनोरथ सिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।।

संसार तारिणी सिद्धापूर्वस्यां पातु मां सदा ।
ब्रह्माणि पातु चाग्नेयां दक्षिणे दक्षणी प्रिया ।।।।
नैर्ऋत्यांञ्चण्डमुण्डा च पातु मां सर्वतः सदा ।
त्रिपुरा च महादेवी प्रतीच्यां मां सदाव्ययात् ।।।।
वायव्यां त्रिपुरा देवी उत्तरे रुद्रनायिका ।
ऐशान्यां पद्म नेत्रा च पातु चोर्ध्वं त्रिलिंगिका ।।।।
पातु मेऽधोमहामाया वामपार्श्वेऽग्निनायिका ।
मस्तकं पातु मे देवी सिद्धेश्वरी मनोहरा ।।।।
भालं मे पातु रुद्राणी नेत्रं मे भुवनेश्वरी ।
त्रिपुरासुन्दरी पातु वक्त्रं मे सर्वतः स्वयम् ।।।।
उग्रा पार्श्वे महावाहुः हस्तौ रक्षतु चण्डिकाः ।
हृदयं पातु चामुण्डा नाभिं चैवास्त मस्तिका ।।।।
अन्यतः परमेशानी परमानन्द विग्रहा ।  
पृष्टतः कामदा पातु सर्वतः सर्वदा स्वयम् ।।।।
इत्येतत्कवचं नित्यं सर्व कामार्थ साधकं ।  
गोपनीयं सदा देवी न कस्मै चित् प्रकाशयेत् ।।।।
श्मशाने प्रान्तरे दुर्गे घोरे निगडबन्धने ।
नौकायां गिरिदुर्गे च संकटे प्राण संशये ।।।।
यत्र-यत्र भये प्राप्ते विष वह्नि भयादिषु ।
दुर्गे-दुर्गान्तरे प्राप्ते समायात्यां किलापदि ।।१०।।
वन्ध्या वा काकवन्ध्यावा मृतवत्सा च याङ्गना ।
श्रुत्वा स्तोत्रं भवेत्पुत्रं स धनं चिरजीविनम् ।।११।।
गुरोर्भक्ताय दातव्यं साधकाय न संशयम् ।।

।।इति श्री नीलोधारतन्त्रे कालिकाभैरव संवादे श्री सिद्धेश्वरी कवचं श्री देव्यार्पणमस्तु ।।
       क्रमशः...