Monday, 27 April 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-114

गतांश से आगे...अध्याय अठारहः ः भाग उनतीस

अब विविध प्रकार के सरोवरों की चर्चा करते हैं-
सरोऽर्धचन्द्रस्तु महासरश्च वृत्तं चतुष्कोणकमेव भद्रम्।
भद्रैः सुभद्रं परिघैकयुग्मं बकस्थैकद्वयमेव यस्मिन्।।
                     (वास्तुराजवल्लभ-४-२९,वास्तुरत्नाकर-१२-४०)
अर्थात् अर्द्धचन्द्राकार,वृत्ताकार,चतुष्कोण,भद्र और सुभद्र नामक पाँच प्रकार के सरोवर होते हैं। इनमें परिघ एक ही होना चाहिए, तथा बकस्थल (पक्षियों के बिश्राम के लिए)सुविधानुसार एक या दो अवश्य बनाना चाहिए।
सरोवर के प्रकार निरुपण के पश्चात् अब आकार की बात करते हैं।यथा-
ज्येष्ठं मितं दण्डसहस्रकेन मध्यं तदर्धेन ततःकनिष्ठम्।
तथा करैः पञ्चशतानि दैर्घ्ये तदर्धमध्यं तु पुनः कनिष्ठम्।।
                  (वास्तुराजवल्लभ-४-३०,एवं वास्तुरत्नाकर-१२-४१)
अर्थात् चार हजार हाथ लम्बा और दो हजार हाथ चौड़ा उत्तम तालाब  माना गया है,दो हजार हाथ लम्बा और एक हजार हाथ चौड़ा को मध्यम,तथा एक हजार हाथ लम्बा और पाँच सौ हाथ चौड़ा को कनिष्ठ सर कहा गया है।

अब आगे कुछ चित्रों के माध्यम से इन्हें स्पष्ट किया जा रहा है-


क्रमशः.....

Monday, 20 April 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-113

गतांश से आगे....अध्याय अठारह-अठाईसवां भाग


ये सब है वापी के नमूनेः-इनका वर्णन गत पोस्ट किया जा चुका है।



क्रमशः.....आगामी पोस्ट में सरोवरों की चर्चा होगी.....

Friday, 17 April 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-112

गताशं से आगे...अध्याय अठारह,भाग सताईस

(ख) वास्तुरत्नाकर,जलाशय प्रकरण-श्लोक संख्या-३०,३१ में सूर्य नक्षत्र से अभीष्ट चन्द्र नक्षत्र तक गणना करने की युक्ति बतायी गयी है,जिसे नीचे के चक्र में  स्पष्ट किया गया है।हृषिकेश पंचाग के वास्तुप्रकरण में भी अन्य चक्रों के साथ यह चक्र भी उद्धृत है।यथा- कूपेऽर्कभान्मध्यगतैस्त्रिभिर्भैः
            स्वादूदकं पूर्वदिशस्त्रिभिस्त्रिभिः।
 स्वल्पं जलं स्वादुजलं जलक्षयं,
              स्वादूदकं क्षारजलं शिलाश्च।
 मिष्टंजलं क्षारजलं क्रमात्फलं ज्ञेयं बुधैर्भास्करभात्सदा प्रहेः।।
दिशायें
मध्य
पूर्व
अग्नि
दक्षिण
नैऋत्य
पश्चिम
वायु
उत्तर
ईशान
नक्षत्र
फल
स्वादु
स्वल्प
स्वादु
जलक्षय
स्वादु
क्षार
शिला
मिष्ट
क्षार

(ग) वास्तुरत्नाकर,जलाशय प्रकरण-श्लोक संख्या-३२ में भौम यानी मंगल के नक्षत्र से अभीष्ट चन्द्रमा के नक्षत्र तक गणना कर जलफल-विचार की बात कही गयी है-शशिशराब्धित्रित्र्यब्धिगुणाब्धयो वधजलं हि सुसिद्धिरभङ्गदम्। रुजमसिद्धियशोऽर्थप्रसिद्धये जलविभङ्गकरः कुजभादिति।।

इसे निम्न सारणी में स्पष्ट किया गया है-
नक्षत्र
फल
वधजल
सुसिद्धि
शुभ
रोग
अशुभ
यश
धन
जलभंग

(घ) वास्तुरत्नाकर,जलाशय प्रकरण-श्लोक संख्या-३३से ३५तक राहु के संचरण से कूपचक्र का विचार किया गया है।यथा-

राहुऋक्षात्त्रयं पूर्वे भयमाग्नेयतः क्रमात्।
                   मध्ये चत्वारि देयानि फलं वाच्यं शुभाशुभम्।।
पूर्वे शोककरो राहुराग्नेयां जलदो भवेत्।
                    दक्षिणे स्वामिमरणं नैऋत्यां बहु दुःखदः।।
पश्चिमे सुखसौभाग्यं वायव्ये जलवर्द्धनम्।
                   उत्तरे निर्जलं विद्यादीशाने जलवृद्धिदम्।।
मध्ये च सजलं वाच्यं नान्यथा रुद्रभाषितम्।।

इन श्लोकों की स्पष्टी के लिए निम्न सारणी का अवलोकन करें।ध्यातव्य है कि यहाँ सताइस से वजाय अभिजित सहित अठाइस नक्षत्रों को ग्रहण किया गया है-
दिशायें
मध्य
पूर्व
अग्नि
दक्षिण
नैऋत्य
पश्चिम
वायव्य
उत्तर
ईशान
२८नक्षत्र
फलाफल
सजल
शोक
जलद
मृत्यु
दुःख
सौभाग्य
वद्धि
निर्जल
वृद्धि

ऊपर कूपस्थापन-विचार हेतु चार विधियां कही गयी।प्रश्न उठता है कि इन चार का क्या प्रयोजन?या चारो में किसकी प्रधानता, या सबकी समानता, या चारो में किसी एक का अनुशरण?तदुत्तर स्वरुप अगला संकेत-(चतुर्णां प्रयोजनम्)-

रोहिण्यर्क्षात्सूर्यभाद्भौमभाच्च राहो ऋक्षाद्गण्यते कूपचक्रम्।
यस्मिनकाले सर्वमेतत्प्रशस्तं तस्मिनभूमौ निर्जलायां जलत्वम्।।

प्रसंगवश अब आगे वापी के विभिन्न संज्ञायों पर प्रकाश डालते हैं-

वापी च नन्दैकमुखा त्रिकूटा षट कूटिका युग्ममुखा च भद्रा।
जया त्रिवक्त्रा नव कूटिका च त्येकैस्तु कूटैः विजया मता सा।। 
                                          वास्तुराजवल्लभ ४-२७,एवं वास्तुरत्नाकर १२-३९)
अर्थात् एक मुख और तीन कूट की वापी को नन्दा,दो मुख और छः कूट की वापी को भद्रा,तीन मुख और नौ कूट की वापी को जया,तथा चार मुख और बारह कूट की वापी को विजया कहा जाता है।ध्यातव्य है कि वापी में जाने के मार्ग को मुख, और ऊपर खुले हुए भाग को कूट कहते हैं।कूट ऊपर वाले खुले हुए मुख की संज्ञा है,वापी के मध्य का ऊपरीमुख इस गणना में नहीं है। आगे कुछ चित्रों के माध्यम से इन्हें स्पष्ट किया जा रहा है।नीचे के चित्र एक में नन्दा और भद्रा वापी का दृश्य है,तथा दूसरे चित्र में सिर्फ जया नाम वापी का दृश्य है,जो तीन मुख और नौ कुटों वाला है।उसके बाद तीसरे चित्र में चारमुख,बारह कूट वाले विजया नामक वापी का दृश्य है।वापी के निर्माण में मुख और कूट का ध्यान रखना अति आवश्यक है।मनमाने ढंग से निर्माण न किया जाय।न्यूनाधिक(दोनों) प्रकार के दोषों से बचना चाहिए,अन्यथा स्थापक को नाना विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है।                                                                         क्रमशः.....

Wednesday, 15 April 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-111

गतांश से आगे....अध्याय अठारह-भाग छब्बीस

अब आगे कूपादि के परिमाण की चर्चा करते हैं।वास्तुरत्नाकर(जलाशयप्रकरण) १२-२२,२३,२४,एवं वास्तुराजवल्लभ ४-२७,तथा देवी पुराणादि में कहा गया है-
कुर्यात्पञ्करादूर्ध्वंपञ्चविंशत्करावधि।कूपंवृत्तायतंप्राज्ञः सर्वभूतसुखावहम्।।
अर्थात् पांच हाथ से लेकर पचीस हाथ व्यास तक वृत्ताकार कूप का निर्माण करना चाहिए।
पुनश्च-कूपः पञ्करादूर्ध्वं यावद्वर्गस्तदुद्भवः।वापी दण्डमयादूर्ध्वं दशवर्गा नृपोत्तमैः।।
अर्थात् पांच से पचीश हाथ व्यास तक का वृत्ताकार कूप और दश दण्ड(चालीस हाथ)से लेकर सौ दण्ड(चार सौ हाथ)व्यास का वापी निर्माण करना चाहिए।
अब आगे परिमाणानुसार कूपादि का नामकरण करते हैं, वास्तुराजवल्लभ४-२७में-
कूपाः श्रीमुखवैजयौ च तदनु प्रान्तस्तथा दुन्दुभि-
स्तस्मादेव मनोहरं च परतः प्रोक्तश्च चूड़ामणिः।
दिग्भद्रो जयनन्दशङ्करमतो वेदादिहस्तैर्मितै-
र्विश्वान्तैः क्रमवर्धितैश्च कथिता वेदादधः कूपिका।।
अर्थात् चार हाथ व्यास वाले कूप को श्रीमुख,पांच हाथ वाले को विजय,छःहाथ वाले को प्रान्त,सात हाथ वाले को दुन्दुभि,आठ हाथ वाले को मनोहर,दश हाथ वाले को दिग्भद्र,ग्यारह हाथ वाले को जय,बारह हाथ वाले को नन्द,और तेरह हाथ वाले को शंकर नाम से जाना जाता है।चार हाथ से कम व्यास वाले को कूपिका कहते हैं।
अब आगे कूपादि जलस्रोतों के स्थापन काल के अनुसार जलप्राप्ति की स्थिति पर प्रकाश डालते हैं-

(क) वास्तुरत्नाकर,जलाशय प्रकरण-२५से २७--

रोहिण्यादिलिखेच्चक्रं त्रयं मध्ये प्रतिष्ठितम्।
पूर्वादिदिक्षु सर्वासु सृष्टिमार्गेण दीयते।।
मध्ये शीघ्रं जलं स्वादु पूर्वभूमौ च खण्डितम्।
आग्नेयां सुजलं प्रोक्तं दक्षिणे निर्जलं तथा।।
नैऋते चामृतं वारि पश्चिमे शोभनं जलम्।
वायव्येऽपि जलं हन्ति चोत्तरे स्वादुकं जलम्।।
ईशाने कटुकं क्षारं प्रत्यक्तीक्ष्णस्य सम्भवः।।
इस श्लोक की स्पष्टी के लिए एक सारणी दी जा रही है।इसमें रोहिणी नक्षत्र से प्रारम्भ कर क्रमशः सभी सत्ताइश नक्षत्रों को स्थापित करेंगे,दिशाओं के अनुसार उनका फल है।(हृषिकेश पंचांग में भी इस चक्र की चर्चा है)यथा-

दिशायें
मध्य
पूर्व
अग्नि
दक्षिण
नैऋत्य
पश्चिम
वायव्य
उत्तर
ईशान
नक्षत्र संख्या
नक्षत्रों के नाम
रोहिणी,
मृगशिरा,
आर्द्रा
पुनर्वसु
पुष्य
आष्लेषा
मघा
पूर्वा
उत्तरा
हस्ता
चित्रा
स्वाती
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
मूल
पू,षा.
उ.षा.
श्रवण
धनिष्ठा
शतभिष
पू.भा.
उ.भा.
रेवती
अश्विन
भरणी
कृत्तिका
जल-फल
शीघ्र
स्वादु
आंशिक
सुजल
निर्जल
अमृत
जल
शोभन
जल
हानि
सुस्वादु
जल
खारा
जल

क्रमशः....