Tuesday, 30 January 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान - एपीसोड 57



स्वागत है यहां भी आप चाहे तो पधार सकते हैं। धन्यवाद।

Friday, 26 January 2018

हृदयरोग :-: ज्योतिषीय दृष्टि


हृदयरोग :-: ज्योतिषीय दृष्टि
आधुनिक विचार-धारा से ओतप्रोत व्यक्ति प्रायः अटकल लगा लेते हैं कि हृदयरोग आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान की खोज है। कुछ ऐसा ही अनुमान कैंसर-एड्स जैसी बीमारियों के बारे में भी  लगाया जाता है;किन्तु ये बात बिलकुल निराधार है और उन लोगों की सोच है, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय ग्रन्थों का अवलोकन नहीं किया है और सुनी-सुनायी बातों में आकर अपना आँख-कान-दिमाग सब पश्चिम की ओर मोड़ लिया है।  
अतिप्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद से लेकर पुराण,वैद्यक,यहां तक कि ज्योतिषीय ग्रन्थों में भी हृदयरोग की पर्याप्त चर्चा मिलती है। चरक,सुश्रुत,वाग्भट्ट,माधव,शार्ङ्गधर से लेकर पराशर और वराहमिहिर तक ने हृदयरोग की चर्चा की है।
यहां हम हृदयरोग के ज्योतिषीय पक्ष पर एक नजर डालते हैं। ज्योतिषशास्त्र रोगोत्पत्ति के मूल में कर्म को स्वीकारता है। मुख्यरुप से कर्मज और दोषज दो प्रकार की व्याधियां कही गयी हैं। एक तीसरी भी है- आगन्तुज व्याधि। वस्तुतः ज्योतिष कालज्ञान का शास्त्र है और जिसका मूलाधार है ग्रह-नक्षत्रादि।
कालपुरुष के विभिन्न अंगों में स्थित ग्रह-नक्षत्र-राश्यादि और उनकी प्रकृति, धातु, रस, अंग, विन्यास,बलाबल के आधार पर रोगों का विनिश्चय(निदान) और फिर उनके उपचार-निर्देश  (वैदिक,तान्त्रिक,मान्त्रिक,भैषजीय आदि) विशद रुप से हमारे प्राचीन ग्रन्थों में उपलब्ध हैं।
श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कन्धान्तर्गत रासपंचाध्यायी प्रसंग में हृदयरोग- नाश हेतु भगवान भास्कर की आराधना की चर्चा मिलती है। वस्तुतः हृदयरोग से सूर्य का बड़ा ही सन्निकट सम्बन्ध है। वेदों में सूर्य को आत्मा कहा गया है और आत्मा का निवास हृदय-स्थल में स्वीकारा गया है। सूर्यपुत्र सौरि(शनैश्चर) और भूमिसुत मंगल तथा देवगुरु वृहस्पति का भी कारकत्व झलकता है   हृदयरोग में । राहु-केतु की युति,अवस्थिति वा दृष्टि को भी नकारा नहीं जा सकता । और सबके अन्त में चन्द्रमा मनसो जाता...को कैसे भूल सकते हैं। हृदय के साथ चन्द्रमा का जुड़ाव भी ध्यातव्य है।
हृदयरोग-कारक-ग्रहों में मुख्यरुप से चार प्रकार की स्थितियाँ लक्षित होती हैं— सूर्य-शनि, शनि-मंगल, मंगल-गुरु और शनि-मंगल-राहु। इनकी भावगत अवस्थिति,युति,दृष्टि आदि का प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणाम स्वरुप जातक हृदयरोग का न्यूनाधिक शिकार होता है। उक्त चार प्रकार के ग्रह-योगों के आधार पर चार प्रकार की हृदयरोग-स्थिति बनती है— .सामान्य हृदयरोग,.हृदयाधात,.हृच्छूल, .रक्तचाप ।
जन्मांकचक्र में चतुर्थभाव से हृदय सम्बन्धी विचार की बात की जाती है। किन्तु ये पर्याप्त नहीं है। चतुर्थभाव की प्रधानता है,किन्तु पंचम,षष्ठम,अष्टम,दशम और द्वादश भाव में उक्त ग्रहों की स्थिति का विचार भी गहन रुप से करना चाहिए।
कालपुरुष का हृदयस्थान कर्कराशि है और हृदय ही रक्तवहसंस्थान का मुख्य अवयव है। ग्रहों में मंगल का सीधा सम्बन्ध है रक्त से। हृदय में ताप और चाप का नियंत्रण तो सूर्यात्मज शनिदेव ही करेंगे न ! सूर्य की अपनी राशि है सिंह और सिंहराशि कालपुरुष के औदरिक अवयव और वायुतत्त्व का नियामक है।
यही कारण है कि जन्मांकचक्र के चतुर्थ और पंचम भाव में कर्क वा सिंह राशि की अवस्थिति कतिपय हृदयरोगों का संकेत देती है। किन्तु इसका अर्थ ये न समझ लिया जाये कि मेषलग्न के सभी जातकों को हृदयरोग हो ही जायेगा ।
दशम और द्वादश में भी कर्क वा सिंह राशि का होना हृदयरोगकारक कहा जाता है। स्थानों वा ग्रहयोगों का विचार सिर्फ जन्मांकचक्र से ही न करके,नवांश और त्रिशांश से भी करना विहित है- ऐसा आचार्य वराहमिहिर का कथन है।
हृदयरोगकारक कुछ अन्यान्य ग्रह-स्थितियां भी हैं। यथा— .आयुर्वेदग्रन्थ भावप्रकाश में कहा गया है कि राहु यदि द्वादशस्थ हो तो हृच्छूल हो सकता है। . आयुर्वेदग्रन्थ गदावली के अनुसार सिंहराशि के द्वितीय द्रेष्काण में यदि जन्म हो तो हृच्छूल हो सकता है। .इसी ग्रन्थ में ये भी कहा गया है कि चतुर्थेश चतुर्थभावगत ही हो और पापयुत वा दृष्ट हो तो भी हृच्छूल हो सकता है। .जन्मांकचक्र में सूर्य मकर,वृष,वृश्चिक वा सिंह राशिगत हो तो हृदयरोग हो सकता है। .निर्बल,विरामसन्धिगत वा सुप्त शनि की स्थिति  हृदयरोगकारक बन सकती है। तथा अष्टमभावगत शनि भी हृदयरोग दे सकते हैं।. तृतीयेश यदि राहु वा केतु युत वा दृष्ट हों तो हृदयरोग हो सकता है। . चतुर्थभाव में कोई भी पापग्रह हों साथ ही चतुर्थेश पापयुत हों तो हृदयरोग हो सकता है। . सूर्य षष्ठेश बनकर चतुर्थभावगत स्थित हों तो भी हृदयरोग हो सकता है। . कुम्भराशिगत सूर्य धमन्यावरोध उत्पन्न करते हैं। १०.शुक्र मकरराशि के हों तो भी हृदयरोग हो सकता है। ११.जातक पारिजात एवं सारावली में कहा गया है कि  चन्द्रमा शत्रुक्षेत्री  हों तो हृदयरोग हो सकता है। ध्यातव्य है कि ग्रहमैत्रीचक्र में चन्द्रमा का कोई शत्रु नहीं कहा गया है। किन्तु हां चन्द्रमा से बुध,शुक्र और शनि को एकपक्षीय शत्रुता अवश्य है। तदनुसार पंचधामैत्रीचक्र में स्थिति का निश्चय कर लेना चाहिए।

ये तो हुयी हृदयरोग की स्थितियाँ। किन्तु ये प्रभावी कब होंगी ये विचारणीय विन्दु है। ध्यातव्य है कि कलिकाल में पराशर-मत की विशेष मान्यता है— कलौ पाराशरस्मृतिः। ये बात सिर्फ स्मृति के सन्दर्भ में ही मान्य न होकर ज्योतिष में भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महर्षि पराशर ने शुभाशुभग्रहों के प्रभाव-काल के लिए तत्तत पंचदशाओं (महा, अन्तर, प्रत्यन्तर, सूक्ष्म और प्राण) को ही माना है। और दशाओं में अनेकानेक मत होते हुए भी विंशोत्तरी को वरीय सूची में रखा गया है। अतः निर्विवाद रुप से कहा जा सकता है कि जन्मांकचक्र के साथ-साथ चलितांक,नवांश और त्रिशांश का गहन अवलोकन करते हुए, दशासाधन करके रोगोत्पत्ति वा प्रभाव-काल का निश्चय करना चाहिए , तथा कारक ग्रहों के बलाबल के अनुसार रोगस्थिति को भांपना चाहिए। इसके साथ ही उक्त कारकग्रहों के अतिरिक्त भी यदि कोई मारकेश की स्थिति बनती हो तो उसका भी सूक्ष्मता से विचार कर लेना चाहिए।

ग्रहशान्ति एवं रोगनिवारण
१.       कारण का मारण—बहुश्रुत कथन है। रोग के कारक का सम्यक् ज्ञान करके समुचित उपचार करना चाहिए।
२.      सुविधा और स्थिति के अनुसार योग्य दैवज्ञ के संरक्षण में वैदिक,तान्त्रिक वा पौराणिक मन्त्रों द्वारा कारकग्रह की यथोचित शान्ति करानी चाहिए। ग्रहों का जप,होम,भेषजस्नान,दानादि शास्त्र सम्मत मार्ग कहे गए हैं।
३.      रत्न-धारण,यन्त्र-धारण,यन्त्र-पूजन आदि भी उपाय प्रशस्त हैं।
४.      महामृत्युञ्जय की क्रिया को प्रायः अमोघ मान लिया जाता है और सीधे उसी पर निर्भर होजाया जाता है,किन्तु ये नियम सर्वत्र लागू नहीं होना चाहिए। विभागीय कारवायी की असफलता के पश्चात ही इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।
५.     योग्य तान्त्रिक के निर्देशन में ललितादेवी की सम्यक् उपासना अति लाभकारी है।
६.      रासपंचाध्यायी तथा सूर्यसूक्त का पाठ भी शास्त्र-सम्मत है।
आयुर्वेदीय औषधियों पर यथोचित मान्त्रिक प्रयोग करके,प्रभावित व्यक्ति को कुछ समय तक खिलाना भी लाभदायक होता है।अस्तु।

Tuesday, 16 January 2018

Sunday, 14 January 2018

वास्तु-ज्योतिषःशिक्षा और समाधान - एपीसोड 48

         

प्रिय बन्धुओं, सप्रेम नमन।



जैसा कि आपको विदित है कि पुण्यार्ककृति ब्लॉग पर पिछले 43 खंडों में पुण्यार्कमगदीपिका की पोस्टिग की गयी। इसके साथ ही शाकद्वीपीय ब्राह्मणों पर आधारित ये लधुशोध का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ। फिलहाल जबतक कोई नया आलेख या पुस्तिका तैयार नहीं हो जाती तब तक ब्लॉग पर सीधे प्रकाशन का कार्य स्थगित ही रहेगा। अतः इस बीच आपको नियमित रुप से यूट्यूब चैनल पुण्यार्ककृति की गतिविधियों की सूचना ही शेयर करता रहूंगा।

जैसा कि आपको ज्ञात है यूट्यूब चैनल पर वास्तुज्योतिष शिक्षा और समाधान व्याख्यान- माला का प्रसंग जारी है। इसका मूल आधार है-- पुण्यार्कवास्तुमंजूषा नामक मेरा वृहद् शोधग्रन्थ,जिसका प्रकाशन इस ब्लॉग पर काफी पहले ही आप देख चुके हैं।  निकट भविष्य में चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी के सौजन्य से ये शोध-ग्रन्थ पुस्तकाकार रुप में भी आपके हाथों में हो सकता है।

आशा है आप मेरे साथ यानी मेरे ब्लॉग- पुण्यार्ककृति के साथ इसी भांति भविष्य में भी सम्बन्ध बनाये रखेंगे।

धन्यवाद।

Saturday, 13 January 2018

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःभाग 43(अन्तिम भाग)


गतांश से आगे...

                  १८.    उपसंहार  

       पिछले सत्रह अध्यायों में मगबन्धुओं के विषय में यथासम्भव जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया। पुस्तिका की अधिकांश सामग्री पत्र-पत्रिकाओं से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित हैं। यथोचित प्रमाणार्थ उपनिषद,पुराणादि का प्रचुर उपयोग भी किया गया है। बहुत से मगबन्धुओं से सीधे (मिलकर) या टेलीफोनिक सम्पर्क करके भी जानकारियाँ जुटायी गयी हैं, तथा प्राप्त जानकारी की पुष्टि करायी गयी है। जहां तक हो सका है, सतत प्रयत्नशील रहा हूँ कि जो कुछ भी वर्तमान और भावी पीढ़ी को हम समर्पित करने जा रहे हैं, वो पुष्ट और प्रमाणिक हो। फिर भी त्रुटियां तो सहज मानव स्वभाव है। हो सकता है, बारम्बार की चेष्टा के बावजूद यत्रतत्र गलतियाँ रह गयी हों। किसी पाठक बन्धु को ये दीख पड़े तो निःसंकोच सूचित करेंगे। इतना ही नहीं किसी प्रकार का सुझाव भी आपके पास हो तो स्वागत है। फिलहाल तुरत तो पुस्तकाकार रुप मिलने वाला नहीं है मेरे इस श्रम को, क्यों कि लेखन से कहीं बहुत अधिक कठिन होता है प्रकाशन-कार्य । अतः अपनी अन्यान्य रचनाओं की तरह पहले इसे भी अपने ब्लॉग एवं फेशबुकपेज पर डाल रहा हूँ। इस बीच प्रकाशन की पूरी कोशिश भी जारी रहेगी। और प्रकाशन में विलम्ब,आप पाठकों के सुझावों का भरपूर अवसर दे देगा।
             आशा है मेरी यह मगदीपिका आप मगबन्धुओं के लिए वस्तुतः दीपिका का कार्य करेगी। मेरे द्वारा दिए गए सुझावों पर आप अमल अवश्य करेंगे- ऐसा मुझे विश्वास भी है। हो सकता है, पुस्तिका के कुछ अंश आपको कठोर लगें । अव्यावहारिक भी लग सकता हैं। किन्तु उन-उन स्थलों पर जरा स्थिर चित्त, तटस्थ रुप से विचार करेंगे, तो कठोरता और अव्यावहारिकता का दोषारोपण सम्भवतः नहीं कर पायेंगे - ऐसा मेरा विश्वास है।
       आपके सुझावों के स्वागत के लिए अहर्निश इच्छुक हूँ।  

कमलेश पुण्यार्क,
हरिशयनी एकादशी,विक्रमाब्द २०७४
सम्पर्क- guruji.vastu@gmail.com,
           Mo.8986286163

                         ।।हरिऊँ ।।

Sunday, 7 January 2018

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःवयालीसवां भाग

गतांश से आगे...

                      सत्रहवें अध्याय का सातवां भाग

    प्रियवर डॉ.रविन्द्रकुमार पाठक जी के सौजन्य से मिश्रबन्धु,खपरियावां, हजारीबाग, बिहार(सम्प्रति झारखंड) से चैत्र महाष्टमी विक्रमाब्द २०४४ में प्रकाशित श्री रामप्यारे मिश्रजी हजारीबाग द्वारा २०--१९८३ में संग्रहित पुस्तिका की छायाप्रति मुझे प्राप्त हुयी। उपयोगी जानकर इसे यथावत यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। पुस्तिका का नाम श्रीसिद्धेश्वरी पटल है। पुस्तिका के अन्त में कवच एवं आरती भी संग्रहित है। ये कवच नीलतन्त्र वाला ही है, जिसकी चर्चा ऊपर के प्रसंग में की जा चुकी है। साथ ही श्री सिद्धेश्वरीअष्टकम् भी है, जिसकी चर्चा यहां आगे करेंगे।
                                श्री सिद्धेश्वरीपटल

स्वस्तिवाचनादि कर्म करके अर्घ्य स्थापन करे। यथा— पृथिव्यै नमः,आधार शक्तये नमः, अनन्ताय नमः,कूर्माय नमः, शेषनागाय नमः—इन मन्त्रों से अपने वाम भाग में एक त्रिकोण मंडल बनाकर, उसके मध्य में पञ्चोपचार से पृथ्वी पूजन करे। इसी मण्डल के ऊपर अर्घ्य-पात्र स्थापित करे। अब यथाविधि संकल्प करे। मुख्य संकल्प के अन्त में निम्नांकित वाक्य जोड़ ले— सर्वाभीष्ट फलावाप्ति कामः कलश-स्थापन,गणपत्यादि पञ्चलोकपाल देवता, सूर्यादि नवग्रह, दशदिकपाल देवतादि पूजन पूर्वकं श्री सिद्धेश्वरी पूजनमहं करिष्ये।
तत्पश्चात् कलशस्थापन कर पञ्चदेवों तथा नवग्रहादि पूजन करे। पश्चात् विल्वपीठ के ऊपर श्री सिद्धेश्वरीदेवी के पूजायन्त्र को लिखे। पूजायन्त्र लिखने की विधि—जटामासी और रक्तचन्दन से विल्वकाष्ठ निर्मित पीठ(पीढ़ा)को लीपे। फिर रक्तचन्दन से दाड़िमलेखनी द्वारा उस पीठ के मध्य भाग में यन्त्र बनावे।

(नोट—पुस्तिका में यन्त्रोधार का श्लोक नहीं दिया हुआ है और न चित्र ही। सिर्फ क्रम चर्चा है—विन्दु,त्रिकोण, षट्कोण,वृत्त,अष्टदल कमल, पुनः वृत्त। इस संकेत के आधार पर मैं यन्त्र बनाने का प्रयास कर रहा हूँ। पाठकबन्धु कृपया इसमें मेरी कलात्मकता न देखें,क्यों कि मैं चित्रकार नहीं हूँ। सिर्फ मूल आकृति को ग्रहण करें और साधना में इसे ही आत्मसात करने का प्रयास करें) यथा—

  तत्पश्चात् उक्त विल्वपीठ पर ही नूतन पीतवस्त्र विछाकर शुद्ध घृत से ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः सोलह रेखायें खींचें। इन रेखाओं पर सिन्दूर लगायें। पुनः उन सभी पर क्रमशः एक-एक पान,सुपारी,लौंग,इलाइची,अक्षत और द्रव्य रख दें। तत्पश्चात् अक्षत-पुष्प लेकर श्री सिद्धेश्वरीदेवी का ध्यान करे—
उद्यन्मार्तण्ड कान्तिं विगलित कवरीं कृष्ण वस्त्रावृताङ्गम् ,
दण्डं लिङ्गं कराब्जैर्वरमथ भुवनं सन्दधतीं त्रिनेत्राम् ।
नाना रत्नैर्विभातां स्मितमुख कमलां सेवितां देव सर्वे-
र्मायाराज्ञीं नमोऽभूत् स रवि कल तनुमाश्रये ईश्वरी त्वाम् ।।
इस प्रकार ध्यान कर,हाथ में लिए हुये पुष्पाक्षत को अपने सिर पर रख ले।
तदनन्तर पुनः पुष्पाक्षत लेकर भगवती का ध्यान करते हुए,निम्न मन्त्र से उनका आवाहन करे—
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं कान्हेश्वरी सर्वजनमनोसारिणी, सर्वमुखस्तम्भिनी, सर्वस्त्रीपुरुषाकर्षिणी वन्दी-शंखेनात्रोटय-त्रोटय सर्व शत्रुणां स्तम्भय स्तम्भय मोहनास्त्रेण द्वेषिं उच्चाटय उच्चाटय सर्ववशं कुरु कुरु स्वाहा । देवि सर्व सिद्धेश्वरि कामिनी गणेश्विरि ! इहागच्छ इह तिष्ठ ममोपकल्पितां पूजां गृहाण मम सपरिवारं रक्ष रक्ष नमः ।
हाथ में लिए हुए पुष्पाक्षत को पीढ़े पर छोड़ दे और जल लेकर नीचे लिखा विनियोग मन्त्रोच्चारण करके जल छोड़े —
ऊँ अस्य श्री कुलदेवी जगतो निवासिनी श्री सिद्धेश्वरी विजयीरितं मया राज्ञीति शक्ति स्याद् विनियोगः ।
पुनः पुष्पाक्षत लेकर ध्यान करे—
विंषाय संस्मरेद् वन्दिं रत्न सिंहासन स्थिताम् ।
यज्ञभाग गृहात्वम् अष्टाभिः शक्तिभिः सह ।।
सन्तोय पाथोद समान कान्तिभमित पीयूपं करि तुण्ड हस्ताम् ।
सुरासुराराधित पाद पद्मां भजामि देवीं भव बन्ध मुक्त्यैः ।।
पुष्पाक्षत समर्पित करके,पुनः पुष्प लेकर आसन मन्त्रोच्चारण करे—
आसनं गृहाण चार्वाङ्गि चण्डिके सर्वमंगले, भजस्व जगतां मातः स्थानं मे देहि चण्डिके ! इदं पुष्पासनं जयन्तीत्यादि ह्रीं देव्यै नमः ।।
पुनः पुष्प लेकर स्वागत मन्त्रोच्चारण करे—
मेनानन्दकरीं देवीं सर्वेषां त्राणकारिणीम् । जय दुर्गे नमस्तुभ्यं स्वागतं तव जायताम् । कुलदेव्याः तव स्वागतम् ।
तत्पश्चात् पाद्यार्थ जल प्रदान करे—
पाद्यं गृहाण महादेवि सर्व दुःखापहारिणि ! त्रायस्व वरदे देवि ! नमस्ते शङ्कर प्रिये ! इदं पाद्यं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् अर्घ्य प्रदान करे—
पुष्पाक्षत समायुक्तं विल्वपत्रं तथा परे शोभनं शङ्खपात्रस्थं गृहाणार्घ्यं कुलेश्वरि इदं अर्घ्यं ह्रीं कुलदेव्यैनमः ।
तत्पश्चात् आचमनार्थ जल प्रदान करे—
गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् । इदं आचमनीयं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् स्नानार्थ जल प्रदान करे—
इमं आपो मया देवि ! स्नानार्थमर्पितं त्वयि । स्नानं कुरु महामाये ! प्रीत्या शान्तिं प्रयच्छ मे । इदं स्नानीयं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् गात्र मार्जन वस्त्रार्थ सूत्र प्रदान करे—
शरीर प्रोक्षणमिदं बहु तन्तु विनिर्मितम् मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ! इदं शरीर प्रोक्षण वस्त्रं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् परिधान वस्त्र प्रदान करे। अभाव में सूत्र समर्पित करे—
तन्तु शतान संयुक्तं रञ्जितं राग वस्तुना,मया निवेदितं भक्त्या वासस्ते परिधार्यताम् । इदं परिधानवस्त्रं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् यथाशक्ति अलंकारादि प्रदान करे—
दिव्यरत्न समायुक्तं वह्निभानुसमप्रभम् । गात्राणि तव शोभार्थ अलंकारैः  सुरेश्वरि ! इदं अलंकरणं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात्  श्वेत-रक्तचन्दन गन्धादि प्रदान करे—
शरीरं ते न जानामि चेष्टां चैव महेश्वरि ! मया निवेदितान् गन्धान् प्रतिगृह्ण विलिप्यताम् । एषः गन्धः ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
नानादेश समुद्भूतं रक्तोत्पल समप्रभम् । सिन्दूरारुण संकाशं गृह्यतां रक्तचन्दनम् । इदं रक्तचन्दनम् ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात्  पुष्प-पुष्पमाल्यादि प्रदान करे—
पुष्पं मनोहरं दिव्यं सुगन्धि गन्ध योजितम् । गृह्यमद्भुतमाघ्रेयं देवि ! त्वं प्रतिगृह्यताम् । इदं पुष्पं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
ग्रथिता विमला माला नाना पुष्प समुद्भवा । कण्ठं ते शोभिता नित्यं लम्बमाना सुरेश्वरि ! इदं पुष्पमालां ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात्  अक्षत प्रदान करे—
संग्रामे राज पुरतः शत्रूणां विजयेऽपि च । दुर्गे देवि जगन्मातरक्षतं मां सदा कुरु । एतेऽक्षताः ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात्  सिन्दूर प्रदान करे(पुरुष हाथ से सिन्दूर न लगावें,पुष्पादि से अर्पित करे)—
सिन्दूरं गिरिकन्येत्थं जवारा गति रात्रिणम् सीमन्ते शोभतां नित्यं, भक्त्या ते परमेश्वरि इदं सिन्दूरं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात्  विल्वपत्र प्रदान करे(रक्तचन्दनार्चित विल्वपत्र भी प्रदान करे)—
अमृतोद्भवं श्रीवृक्षं शंकरस्य सदा प्रियं,विल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वरि ! एतानि विल्वपत्राणि ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
चन्दनेन समालिप्तं कुंकुमेनाभिरञ्जितं विल्वपत्रं समर्पितं दुर्गेऽहं शरणागतम् ।
तत्पश्चात्  धूप प्रदर्शित करे—
वनस्पति रसोत्पन्नो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः । आघ्रेयः सर्व देवानां धूपोऽयं प्रति- गृह्यताम् । एष धूपः ह्रीं कुलदेव्यै नमः
तत्पश्चात्  प्रज्ज्वलित षोडश(१६) दीप प्रदर्शित करे—
अग्निर्ज्योति रविर्ज्योतिश्चन्द्रज्योतिस्तथैव च । ज्योतिषामुत्तमो देवि ! दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् । एष दीपं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् नैवेद्य अर्पित करे(पहले फट् मन्त्रोच्चारण करते हुए नैवेद्य पर जलप्रोक्षण करे। धेनुमुद्रा प्रदर्शित करे। ह्रीं बीज का किंचित जप करे। तत्पश्चात् नैवेद्य अर्पित करे)—  मिष्ठान्नं घृतसंयुक्तं शर्करा दुग्धयोर्ज्जितम् । मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ! अन्नं चतुर्विधं स्वादुः रसैः षड्भिः समन्वितम् । मया नवेदितं भक्त्या नैवेद्यं प्रति गृह्यताम् । एतन्नैवेद्यं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् पेयजल अर्पित करे—
जलं सुशातलं देवि ! सुस्वादु सुमनोहरं कर्पूर वासितं दिव्यं पानीयं प्रतिगृह्यताम् । इदं पानार्थजलं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् आचमन अर्पित करे—
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्व पाप हरं शुभम् । गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् । इदं आचमनीयं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् ताम्बूल अर्पित करे—
नागबल्ली दलैर्युक्तं कर्पूरादि सुवासितम् । मया निवेदितं भक्त्या ताम्बूलं प्रति- गृह्यताम् । इदं ताम्बूलं ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् फलादि अर्पित करे—
फलमूलानि सर्वाणि रम्यारस्यानि यानि च । मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ! एतानि फलमूलानि ह्रीं कुलदेव्यै नमः ।
तत्पश्चात् प्रार्थना
मंगलां शोभनां शुद्धां निष्कलां परमां कलाम् । विश्वेश्वरीं विश्वमातां चण्डिकां प्रणमाम्यहम् । सिद्धेश्वरि ! मनस्तुभ्यं वरदे सुर सेविते कृपया पश्य मामम्बे ! शरणागत वत्सले !

अथांग पूजा— आदि में ऊँ एवं अन्त में नमः युक्त नाम मन्त्रों से पुष्पाक्षत प्रदान करे-
ऊँ कालिकायै नमः,ऊँ सिद्धेश्वर्यै नमः, ऊँ तारायै नमः,ऊँ भगवत्यै नमः, ऊँ बगलायै नमः,ऊँ कुञ्जिकायै नमः, ऊँ शीतलायै नमः, ऊँ त्रिपुण्यै नमः, ऊँ मात्रिकायै नमः , ऊँ लक्ष्म्यै नमः,ऊँ दिगीशायै नमः । ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि वन्दी देव्यै नमः । ऊँ सम्मोहिन्यै नमः । ऊँ मोहिन्यै नमः । ऊँ विमोहिन्यै नमः । ऊँ वस्वादि षडंगेभ्यो नमः । ऊँ ब्रह्मणेभ्यो नमः । ऊँ विष्णवेभ्यो नमः । ऊँ शिवायै नमः । ऊँ ऊर्वश्यै नमः । ऊँ मञ्जुघोषायै नमः । ऊँ सहजन्यै नमः । ऊँ सुकेशिन्यै नमः , ऊँ तिलोत्तमायै नमः । ऊँ गुप्तव्यै नमः । ऊँ सिद्ध कन्याभ्यो नमः । ऊँ किन्नरीभ्यो नमः । ऊँ नागकन्याभ्यो नमः । ऊँ विद्याधरीभ्यो नमः । ऊँ किंपुरुषेभ्यो नमः । ऊँ यक्षिणीभ्यो नमः । ऊँ पिशाचीभ्यो नमः । ऊँ ब्रह्माण्यै नमः। ऊँ वैष्णव्यै नमः । ऊँ इष्टशान्तये नमः । ऊँ क्रियाशान्त्यै नमः । ऊँ ज्ञानशक्तये नमः । ऊँ गुणाय नमः । ऊँ सत्त्व गुणायै नमः । ऊँ रजोगुणायै नमः । ऊँ तमोगुणायै नमः ।
 तत्पश्चात स्नानार्थ जल प्रदान करके,क्रमशः चन्दन,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्यादि प्रदान करे।

अष्टशक्ति पूजा— (पूर्व की भांति यहां भी नाम मन्त्रों से पुष्पाक्षत प्रदान करे)—
ऊँ ह्रींकारेभ्यो नमः । ऊँ खेचरीभ्यो नमः । ऊँ चण्डाख्यायै नमः । ऊँ अक्षोहिण्यै नमः । ऊँ ह्रंकार्यै नमः । ऊँ क्षेमकार्य्यै नमः । ऊँ पञ्चभैरवीभ्यो नमः । ऊँ सिद्धेश्वर्य्यै नमः । ऊँ तारायै नमः । ऊँ भगवत्यै नमः । ऊँ बगलामुख्यै नमः । ऊँ कुञ्जिकायै नमः । ऊँ शीतलायै नमः । ऊँ त्रिपुण्यै नमः । ऊँ मातृवृकायै नमः । ऊँ लक्ष्म्यै नमः । ऊँ दिगीशायै नमः ।
पुनश्च— तन्मध्ये—
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि वन्दी देव्यै नमः । ऊँ सम्मोहिन्यै नमः । ऊँ मोहिन्यै नमः । ऊँ विमोहिन्यै नमः । ऊँ वस्वादि षडंगेभ्यो नमः । ऊँ ब्रह्मणेभ्यो नमः । ऊँ विष्णवेभ्यो नमः । ऊँ शिवायै नमः । ऊँ ऊर्वश्यै नमः । ऊँ मेनकायै नमः । ऊँ रम्भायै नमः । ऊँ धृताच्यै नमः । ऊँ मञ्जुघोषायै नमः । ऊँ सहजन्यै नमः । ऊँ सुकेशिन्यै नमः , ऊँ महा भैरवीभ्यो नमः । ऊँ. इन्द्राण्यै नमः । ऊँ असिताङ्गायै नमः । ऊँ संहारिण्यै नमः । ऊँ छिन्नमस्तिकायै नमः ।
तत्पश्चात् स्नानीय जल प्रदान करके, क्रमशः चन्दन,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्यादि प्रदान करे।
नरियारीवीर-पूजन— तत्पश्चात् अग्निकोण में त्रिकोण मंडल बनाकर , पूर्व की भांति ही नरियारीवीर का पंचोपचार पूजन करे— पुष्पाक्षत लेकर बोले—
ऊँ नरियारीवीरदेवता साङ्गायै सायुधायै सशक्तिकायै इहागच्छ,इहतिष्ठ,मत्कल्पितां पूजां गृहाण ।
 ऐसा बोल कर हाथ में लिया हुआ पुष्पाक्षत त्रिकोण मंडल के मध्य में छोड़ दे। पुनः
ऊँ नरियारीवीरदेवताभ्यो नमः स्नानीयं जलं समर्पयामि कह कर जल छोड़े। आगे इसी भांति उक्त मन्त्रोच्चारण करते हुए क्रमशः सूत्र,जल,चन्दन,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल,दक्षिणादि प्रदान करे।
तत्पश्चात् उन्हें दिखाये गए दीपक से ही अखण्डदीप को जलालें और झट से उनके दीपक को बुझा दें तथा क्षमायाचना पूर्वक प्रणाम करे।
तत्पश्चात् नव प्रज्ज्वलित अखण्डदीप का वायें हाथ से स्पर्श करते हुए,दाहिने हाथ में पुष्पजलाक्षतादि लेकर संकल्प करे—
ऊँ अद्य.....(पूर्वसंकल्प की भांति ही)...श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं समस्त परिवारस्याभ्युदयार्थं च श्री सिद्धेश्वरी प्रीतये अखण्ड दीपदानं करिष्ये।

तत्पश्चात् आरती करे एवं  क्षमापन मन्त्रों का उच्चारण भी करे—  
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ,
दासोऽयमिति मां भक्त्वा क्षमस्व परमेश्वरि ।।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं,
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व सिद्धेश्वरी ।।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ,
यत्पूजितं मया देवि ! परिपूर्णं तदस्तु में ।।
अज्ञानाद्विस्मृते भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ,
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि ! प्रसीद परमेश्वरि ।।
सिद्धेश्वरि जगन्मातः ! सच्चिदानन्द विग्रहे ,
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ।।
गुह्यातिगुह्यगोप्त्रीत्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं,
सिद्धिर्भवतु मे देवि ! त्वत्प्रसादात् सुरेश्वरि ।।

                    इति कुलदेवी श्री सिद्धेश्वरी  पूजनम्

                 ।। अथ श्री सिद्धेश्वरी अष्टकम् ।।
चूड़ामणिं नूपुरमुज्ज्वलचन्द्रहाराम् ।
हस्तेऽस्त्र पद्म युगलां हृदि संदधानम् ।।
ध्येयमहर्निशमनिष्ट विनाश दक्षाम् ।
सिद्धेश्वरीं स्मरण नष्ट कृतान्त लीलाम् ।।
कान्हेश्वरीं महादेवीं ब्रह्माण्डवशकारिणिम् ।
सिद्धेश्वरीं सिद्धदात्रीं शत्रुणां भय दायिनीम् ।।
रक्तोत्पलाभां शुभ्रवस्त्रां उद्यतभानुसमप्रभाम् ।
कुलदेवीं नमामित्वां सर्वकामप्रदां शिवाम् ।।
लक्ष्मी रुपेण देवीं त्वां विष्णु प्राणवल्लभाम् ।
कालिरुप धृतां उग्रां रक्तबीज निपातिताम् ।
विद्यारुपधरां गुण्यां बद्ध पद्मासन स्थिताम् ।।
दुर्गा रुप धरां देवीं दैत्य दर्प विनाशिनीम् ।
वृषारुढ़ां गजारुढां सिंहवाहन संयुताम् ।
ब्रह्माणीं ब्रह्मपत्नीं त्वां रुद्राणीं च भवप्रियाम् ।।
सृष्टि संहार हेतुस्त्वां जगत् पालन कारिणीम् ।
सिद्धेश्वरीं जगद्धात्रीं दक्ष यज्ञ विनाशिनीम् ।
गायत्री रुप धरा शुद्धां पंचवक्त्रां मनोहराम् ।।
सर्वरुप मयीं देवीं सर्वशक्ति समन्विताम् ।
अतस्त्वां सर्व रुपाख्यां सिद्धेश्वरी नमाम्यहम् ।।
                   फलश्रुति
इत्यष्टकं महत् पुण्यं प्रणीतं यन्मुरारिणा ।
पठनाद् धारणाद् वाग्मि त्रैलोक्यं वशमानयेत् ।।
शतवारं पठेत यो हि सर्वान् कामानवाप्तुयात् ।
चतुर्विंशति लक्षं तु पुरश्चरणमुच्यते ।।
पुरश्चरणविहीनस्तु न चेदं फलदायकम् ।
पुरश्चरण युक्तेन कवीन्द्रः सिद्धसाधकः ।।
                           ----इत्यलम्-----

                     ---)ऊँ श्री त्रयोमूर्त्यर्पणमस्तु(---
क्रमशः...