Sunday, 21 October 2018

रावण-दहन-दर्शन-लीला


                      रावण-दहन-दर्शन-लीला

  हम उत्सव-प्रिय लोग हैं । मजे की बात ये है कि खुशी का तो उत्सव करते ही हैं, गम और दुःख का भी करते हैं । दुनिया में किसी के आने का स्वागतोत्सव मनाते हैं- हैपी वर्थ डे कह कर, तो जाने का भी जश्न मनाते हैं- रामनाम सत्य है बोल कर । कमाल की बात तो ये है कि जीवन भर राम का नाम याद नहीं रहा जिसे, उसकी भी शवयात्रा रामनाम सत्य है के उदघोष के साथ ही निकलती है । राम को ज्यादातर दो ही समय याद किया जाता है— किसी की महायात्रा में या फिर चुनाव के पहले राम-मन्दिर बनाने की चोंचलेबाजी में । वैसे राम का नाम और कई बार भी लेते हैं— भगवा पताका फहराते हुए, तलवार-वर्छे भांजते हुए...यहां तक कि किसी बदबूदार और घृणास्पद चीज को देखने के बाद भी- राम-राम छीःछीः कहने में जरा भी देरी नहीं करते । किसी की भर्त्सना करने के लिए भी राम का प्रयोग कर ही लिया जाता है , किन्तु कहने की जरुरत नहीं कि ये सबके सब शब्द सिर्फ होठों के कसरत भर हैं ।

काश , जीवन में सच्चे मन से कभी एक बार भी राम का नाम लिया गया होता !

हालाकि रामनाम के अध्यात्मिक-दार्शनिक पहलुओं पर टिप्पणी करने से कोई खास फायदा नहीं, क्योंकि हमारे धर्म-धुरन्धरों ने , कथा-वाचकों ने और कुछ रामभक्तों ने इतना कुछ कह डाला है कि अब सुनने को जी नहीं चाहता । वैसे भी सुन कर क्या होना है- न मुक्ति मिलनी है और न मन्दिर ही बनना है , क्यों कि इन दोनों कामों के लिए जो कुछ भी चाहिए वो हमारे पास बिलकुल नहीं है । एक ओर राम को बहुतों ने कमाई का साधन बना लिया है, तो दूसरी ओर वोटवैंक भी । इन दोनों स्थिति-परिस्थिति से अनेक बार हम सबका वास्ता पड़ चुका है, अतः इस बावत कुछ कहना फिज़ूल है ।

और जब राम के बारे में कुछ कहने का मन न हो तो रावण के बारे में ही कहने में क्या हर्ज है 
!
राम ने रावण को मारा था— एक दुराचारी, अत्याचारी, बलात्कारी रावण को । और फिर उसकी याद में हम हर बार रावण का दहन करते हैं- पुतला जलाकर । पुतला तो आये दिन नेताओं का भी जलाते हैं किसी न किसी चौक-चौराहे पर । फोटो खिंचवाते हैं । अखबारों का हेडलाइन बनवाते हैं । कभी-कभी उससे कुछ हासिल भी हो जाता है । और कुछ नहीं भी हुआ तो अखबार में नाम और फोटो तो छप ही जाता है- इतना क्या कम है !

राम ने सिर्फ एक रावण को मारा था- विशश्रवा के पुत्र रावण को , लंकापति रावण को, क्यों कि उनके जमाने में सिर्फ वही एक था । किन्तु जहां रावण ही रावण हों—दशानन, शतानन, सहस्रानन..., जिन्हें न बोलने की तमीज़ हो और न चलने की, तो फिर कितनों का दहन किया जाए ! और करेगा कौन ! राम भी तो चाहिए ।

वैसे ये लोग ज्यादातर अपनी खोली में ही आराम फरमाते रहते हैं, बीच-बीच में बाहर झांकते-ताकते हैं- खासकर चुनाव के समय या कुछ घटना-दुर्घटना के समय भी, क्यों कि कुछ बोलने की पूरी आजादी होती है उस समय और फोटो छपने या टीवी इन्टर्व्यू की भी पक्की गुंजायश रहती है । बाकी समय उनके सहयोगी यानी कम आननों वाले उनके बदले काम निपटाते रहते हैं—लूट-पाट का काम, बलात्कार और हत्या का काम । इनमें अधिकांश का ऑथेन्टिक और ऑथोराइज वर्क होता है- ठेकेदारी । सड़क हो, बिल्डिंग हो, बालू-मिट्टी हो, पहाड़-जंगल हो या बोतल-सोतल । सरकारी-गैरसरकारी ज्यादातर निविदायें इन्हीं का स्वागत करती हैं , क्यों कि इन्हें कर्णपिचशाचिनी सिद्धि होती है- कि इस बार कितने का निविदा भरना है । ये सिद्धि वाली सुविधा चुंकि और लोगों को नहीं होती, इसलिए उन्हें सिर्फ भीड़ लगाने का अवसर मिलता है ।  

रावण को जलाते समय भी ऐसी ही भीड़ लगती है । भीड़ बढ़ने का इन्तज़ार भी किया जाता है । भीड़ बढ़ाने का उपाय भी किया जाता है । और फिर भीड़ तो महज भीड़ होती है । उसके पास देह के अलावे और कुछ नहीं होता । देह में दो हाथ होते हैं, जिन्हें जरुरत पड़ने पर एक दूसरे पर पटक-पटक कर तालियां बजायी जाती हैं । और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सिर भी पटकना पड़ता है । भीड़ में खुदा न खास्ते कुछ होनी-अनहोनी हो जाये, तो इसकी न तो खास परवाह की जाती है और न कोई जिम्मेवारी ही होती है – न मेहमान की औ न मेज़बान की । न आयोजक की और न प्रशासक की ।  और अपनी जिम्मेवारी तो हमसब प्रायः बहुत पहले ही लेना छोड़ दिये हैं, क्यों कि हमें पता हो चुका है कि हम अब गुलाम नहीं रहे यानी स्वतन्त्र हो गए हैं । अब हम पूरी तरह से स्वतन्त्र हैं कुछ भी करने को, कुछ भी बोलने को, कहीं आने-जाने को । मन करे तो एन.एच. पर टेंड लगाकर भोज-पार्टी देदें या डिस्को करें । मन हो तो रेलवे टैक पर टट्टी करें या उस पर बैठ कर रावण दहन देखें । सेल्फी मोड में तो हम हमेशा रहते ही हैं—मौका देखा, चट सेल्फी लिए और खट पोस्ट कर डाले । अरे भाई ट्रेनों का आना-जाना होगा तो खुद समझेगा- वो तो रेलवे का काम है । आंखिर इतनी कीमती वोट देकर हमने रेलमन्त्री बनाया किस बात के लिए है ! और ये भी तय है कि कुछ होने-जाने पर जरा से हो-हंगामें में मुआवज़ा तो मिल ही जाना है । आखिर अपनी सरकार है, फिर हम अपनी जिम्मेवारी क्यों उठाने की ज़हमत पालें ! अपना बेसकीमती दिमाग क्यों इस्तेमाल करें ! अपने भीतर के रावण को ढूढ़ने की क्यों कोशिश करें !

बाहर रावण घूम ही रहा है ।  बाहर रावण जल ही रहा है । उसका ही दहन क्यों न देखा जाए ?
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Friday, 12 October 2018

अविरल प्रवाह

अविरल प्रवाह

          खबर है कि सरकार ने गंगा के अविरल प्रवाह की अधिसूचना जारी कर दी है और साथ ही ये भी खबर है कि  सूचना सुनने के अगले ही दिन पर्यावरणविद प्रो.जी.डी.अग्रवाल , जो पिछले 111 दिनों से गंगा मैया के उद्धार के लिए अनशन पर थे, गंगामैया की गोद में सो गए ।

            अधिसूचना पर प्रसन्न हुआ जाये या कि एक गंगापुत्र के निधन पर शोक प्रकट किया जाये ?

            और जब कुछ निर्णय की स्थिति न बनती हो तो लेखनी बेचैन होने लगती है ।

            गंगा की सफाई का कार्य ही नहीं अभियान चल रहा है विगत कई दशकों से । अब तक कितने करोड़ हज़म हुए इस अभियान में इस डाटाइन्ट्री में मुझे कोई खास दिलचश्पी नहीं है , क्यों कि हम सभी जानते हैं कि सरकार के ज्यादा तर काम योजना, परियोजना, अभियान और डाटाइन्ट्री के सहारे ही चलते हैं । उद्धाटन का शिलापट्ट लगा दिया जाता है, फोटो खिंच जाते हैं, अखबार रंग जाते हैं- बात पूरी हो जाती है ।

सम्भवतः  ज्यादातर योजनायें एक खास योजना के तहत ही बनायी जाती हैं, यानी मुख्य योजना बनाने के पहले एक योजना बनायी जाती है कि इस बार किस-किस को बेनीफीट देना है...इस बार किस-किस का पत्ता काटना है...।

न खाऊँगा औ न खाने दूंगा कहने भर से तो काम चलने को नहीं है । सोचने वाली बात है कि लम्बे समय से खाने-पीने की जो लत लगी हुयी है उसे अचानक बन्द करने के लिए भी तो एक योजना बनानी होगी ? साधारण सी बात है कि तम्बाकू खाने या कि सिगरेट पीने की आदत छुड़ानी मुश्किल है, फिर सीमेन्ट, सरिया, कोलतार, कोयला, कॉन्करीट, खाद, भूसा या कि नोट-वोट जैसी चीजें खाने-पचाने की आदत भला कैसे इतनी आसानी से छुड़ायी जा सकती है ? इतने मजबूत हाज़में वाली भट्टी को कुछ न कुछ ईंधन तो हमेशा चाहिए ही न ।

काफी पहले ही हमारे एक पूर्व प्रधान मन्त्री ने बड़े ईमानदारी पूर्वक खेद व्यक्त किया था कि सरकारी योजनाओं के लिए जो रकम मुहैया की जाती है, वो जमीन पर पहुँचते-पहुँचते मात्र 15% ही बच पाती है, यानी कि हमारे देश के नेता से लेकर अफसर तक इतने वफादार, ईमानदार और कर्मठ हैं कि सिर्फ 85% से ही अपना काम चला लेते हैं बेचारे । सोचने वाली बात है कि जहां 180 रुपये में आईकोनिक काजल की एक अच्छी सी डिबिया आती है, ऐसी भीषण मंहगाई के जमाने में तो कोरे वेतन से सिर्फ  बीबी को  खुश रखना भी मुश्किल है, फिर बाकी चीजों का क्या होगा ? मगर देशभक्त जनता इस गम्भीर विषय पर सोचती कहां है । वो तो वस अखबार और टीवी में खबरें देखती हैं और उबल जाती है बिलकुल दूध की तरह ही, जो 100 डिग्री का भी इन्तजार नहीं करता ।  अरे भाई ! अभी पन्द्रह प्रतिशत छोड़ दिया गया है तुम्हारे लिए । जरा रहम करो इन पर भी ।  कितना मिहनत करके, कितनी गालियां सुन कर, कितने अपमान सह कर क्या-क्या करम-कुकरम करके नेता और अब तो अफसर ही नहीं टीचर या कि सरकारी चपरासी भी बनने के लिए वैसा ही कुछ-कुछ करना पड़ता है । अब किसी यूनिवर्सीटी का या कि टीईटी का जाली सर्टिफिकेट न बनवाया जाये तो क्या बीबी-बच्चों को भूखा मारा जाये ? मगर नासमझ जनता इतनी भी बात समझ नहीं पाती । कितनी बार इशारा किया गया किन्तु समझ नहीं है बिलकुल, और समझ ही नहीं है जब तकनीकी बारीकी की तो फिर बेकार की चिन्ता में क्यों ? तुम अपना काम करते रहो-  हर पांच साल पर सिर्फ एक दिन । और ये लोग अपना काम करते रहेंगे 365 x 5 दिन ।

लूट-पाट का ये अविरल प्रवाह गंगा की अविरल धारा की तरह वैसे ही चलता रहेगा, जैसे हत्यायें और बलात्कार का दिनों-दिन विकास हो रहा है ।

अरे भाई ! कुछ तो विकास कर ही रहा है न । वादा तो विकास का ही किया गया था, फैक्ट्रियां नहीं बनी, बेरोजगारी दूर नहीं हो पायी, तो क्या हो गया, अगली बार कोशिश की जायेगी न । घबराते क्यों हो । क्या इतना भी कॉमनसेन्स नहीं है कि बड़ा काम करने के लिए बड़ा समय भी चाहिए होता होता है !

ऐसी स्थिति में मुझे तो एक बात और समझ आ रही है, सोचता हूँ योजना आयोग को लगे हाथ सुझाव दे ही डालूं – जिस तरह से बिना पढ़े-लिखे डिग्रियाँ घर पहुँचा जाते हैं वी सी साहव के मुफ़स्सिर , जिस तरह तीन रुपये किलो चावल-गेहूं पहुँच जाता है जरुरतमन्दों के घर, जिस तरह 35% वाले भी चुन लिए जाते हैं 95% को दरकिनार करके, उसी तरह चुनाव आयोग को  भी कुछ ऐसी ही करतब दिखाना चाहिए , ताकि ईवीएम पर भी लांछना न लगे और न फिर से वैलेटयुग में वापसी करनी पड़े ।

एक ऐसा ही सुझाव माननीय सुप्रीमकोर्ट के लिए भी है मेरे पास कि जैसे धारा 370 की चिन्ता छोड़कर, धारा 497 और 377 आदि पर गम्भीरता पूर्वक विचार हुआ उसी तरह कोई ऐसी व्यवस्था दी जाये कि बलात्कार और भ्रष्टाचार का स्वरुप ही बदल जाये । आंखिर दकियानूसी सोच वाला सोलवीं शताब्दी में जीने वाला भारतीय बलात्कार को बलात्कार कहता ही क्यों है और भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार ना कह कर सदाचार मान लेने में क्या आपत्ति है ?

एक बात और मुझे समझ नहीं आयी कि गंगाप्रेमी अग्रवालजी की तुष्टि के लिए अविरल प्रवाह की अधिसूचना जो जारी कर दी गयी, क्या वो गंगा आकाशगंगा होगी या कि यही वाली ? और यदि यही गंगोत्री वाली ही होगी तो फिर उन बड़े-बड़े बांधों वाली योजनाओं का क्या होगा ? कानपूर की फैक्ट्रियों का क्या होगा ?  और यदि ये सब नहीं होगा, तो फिर ये अविरल प्रवाह का नाटक ही क्यों नहीं बन्ध कर दिया जाता ये सफाई अभियानों को क्यों नहीं बन्द कर दिया जाता ?

पोलीथीन की फैक्ट्रियों पर अंकुश नहीं लगना है । पोलीथीन यूज़र पर अंकुश लगने की बात हो रही है ।  लाइसेन्स देते समय का नियम-कानून कुछ और था अब क्या कुछ और हो गया है ?

स्वच्छ भारत का अभियान चल रहा है अभी । फोटो खिंचवाने का जबरदस्त दौर है । भावी चुनाव के पहले चेहरे दिखाने का फोकटिया अवसर है । धो लो हाथ बहती गंगा के अविरल प्रवाह में ।

अरे बाबूमोसाय ! दिमाग में जो कचरा भरा है, बेईमानी भरी है, भ्रष्टाचार भरा है.. उसे पहले क्यों नहीं साफ करते ?  पहले वही छोटा वाला ड्रेन साफ कर लो , सड़कें और गलियां खुद-ब-खुद साफ हो जायेंगी- बिलकुल तुम्हारे पायजामें-कुरते की तरह एकदम बगुला मार्का ।

माँ गंगे मुझे माफ कर देना । 

Sunday, 7 October 2018

भोंचूशास्त्री की वेदना



भोंचूशास्त्री की वेदना   
  
धर्म-अधर्म,न्याय-अन्याय,सत्य-असत्य, व्यवस्था- अव्यवस्था के बीच अनवरत द्वन्द देवासुर संग्राम जैसा सनातन है – भोंचूशास्त्री का ये वक्तव्य मुझे चौंका गया । सुप्रभातम् की अप्रत्याशित कॉलिंग-बेल के साथ भोरमभोर की उनकी उपस्थिति, टिप्पणी या कहें सूचना मेरे भीतर कई सवालों को ला खड़ा कर दिया, किन्तु उनका जवाब ढूढ़ने का रत्ती भर भी अवसर न दिया शास्त्रीजी ने ।

       नये डेरे में आने के बाद से ही मुझे भोंचूशास्त्री जैसे कोहीनूर  पड़ोसी मिलने का सौभाग्य-लाभ हुआ है । हालाकि इसका असली श्रेय तो मेरे श्रीमतीजी को ही मिलना चाहिए, क्यों कि इस नये मकान को अपनी खोजी हुनर से ढूढ़ने का काम उन्होंने ही किया था ।  उनकी पुरानी सहेली के पूर्व पति होने का सौभाग्य या अब कहूं तो दुर्भाग्य प्राप्त था शास्त्रीजी को । किसी के नीजी मामले में दखल देने की गुस़्ताखी माफ हो तो कह सकता हूँ कि बात-बात में शास्त्री जी धमकी दिया करते थे अपनी प्राणप्यारी को छोड़ कर, गिरि-कन्दराओं में कहीं ध्यानस्थ हो जाने का, किन्तु अभी हाल के उच्चन्यायालय के फैसले के ठीक दूसरे ही दिन शास्त्री जी के साथ जो कुछ घटित हुआ, भगवान न करें किसी दुश्मन के साथ भी ऐसा घटित हो ।

            धारा ४९७ को निरस्त कर सुप्रीमकोर्ट ने खुद को ही भारतीय संस्कृति के कठघरे में ला खड़ा कर दिया है ।  मनीषियों की आत्मा सुदूर स्वर्गलोक से उसे धिक्कारती होंगी, शापित करती होंगी । क्यों कि आदरणीय ही नहीं, सम्माननीय कहे-माने जाने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संस्कृति पर घोर कुठाराघात करने की धृष्टता की है, बदतमीज़ी की है, जिसका जीता-जागता, अति ज्वलन्त, सद्यः प्रमाण हैं भोंचूशास्त्री , जिन्हें घनीभूत वेदना की साक्षात प्रतिमूर्ति कहना अतिशयोक्ति न होगी ।  गौरवशाली भारतीय संस्कृति और सभ्यता के इतिहास पर कालिख पोत दिया इसके ही मान्यवरों ने, अन्यथा आज शास्त्रीजी को इस दारुण विरहाग्नि में झुलसना न पड़ता ।

        दरअसल शास्त्रीजी की प्राणवल्लभा ने उनकी धमकी से आजिज़ आकर और आज तक कभी पहल होता न पाकर, खुद को ही मुक्त कर लिया उनकी गृहस्थी से । उन्हें धत्ता बताकर, खुलेआम खुरानन शास्त्री  के घर जा घुसी और अगली सुबह होने से पहले ही बोरिया-विस्तर बांध कर, उस नीरस-मनहूस शहर को भी छोड़ दी, जहां शास्त्रीजी जैसे रसहीन लोग रहते हैं ।  

      सिर मुड़ाते ओले पड़े वाली कहावत लगता है शास्त्रीजी जैसों के लिए ही बनी होगी । उधर सुप्रीमकोर्ट का फैंसला आया और इधर प्राणप्यारी उड़ंछू...। अब भला कौन सी धारा में बांध कर लावें खुरानन जैसे घरफोड़ू को या कि अपनी विवाहिता पत्नी को , जिसके दाम्पत्यातिहास में सुखमय गृहस्थी का पन्ना था ही नहीं कभी शायद ।

       भोंचूशास्त्री औपचारिक शिक्षा के नाम पर तो शून्य से थोड़े ही आगे थे, किन्तु सनातनी ज्ञान और अनुभव के अथाह सागर होने के दावे के चलते लोगों ने उन्हें शास्त्री सम्बोधन से अभिषिक्त करना ही  उचित समझा था । धर्मशास्त्र हो या कि कर्मशास्त्र, जहां कहीं भी किसी प्रौढ़ाचार्य की ज्ञान-गाड़ी फंसती, शास्त्रीजी ही पंक से निकालने का बीड़ा उठाते । आज उन्हीं शास्त्रीजी की वेदनामूर्ति मेरे सम्मुख खड़ी है और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा उनके सामने खड़ा, समझ नहीं पा रहा हूँ कि ऐसी स्थिति में किन शब्दों के मरहम का लेप उनके जख़्मों पर लगाउँ !

         मैं उन्हें बैठने के लिए कहने की स्थिति में भी न था । उनका वेदनामय प्रलाप जारी था— भगवान कभी भला न करे इन नेताओं का और इन न्यायाधीशों का । मजे की बात तो ये है कि ये पत्रकार भी इन्हीं के सुर में सुर मिलाने को उत्सुक दीख रहे हैं । क्यों इतनी जल्दीबाजी रहती है इन्हें ऐसी बाहियात खबरें छापने की ? नो नेगेटिववाले दिनों में भी कुछ पॉजेटिव निकाल पाना इनके लिए कठिन पड़ जाता है । इसी का नतीज़ा है कि बहुत से नेता जानबूझ कर बेतुकी बातें निर्लज्जता पूर्वक करते रहते हैं, क्यों कि उन्हें मालूम है कि अखबार वाले इसे हेडलाइन बनाने में जरा भी देर न करेंगे । उन्हें भला क्या पड़ी है जनहित या राष्ट्रहित से । नेताओं को सिर्फ हाइलाइट होने से मतलब है और खबरनवीसों को सिर्फ अखबार बिकने से  । देश जाये भांड़ में ...।

   इन होमोसेक्शुवल-गैंग को धारा ३७७ (समलैंगिकता) के कुठाराघात से सन्तोष न हुआ तो ४९७ (एडल्टरी) भी जोड़ लिया फैसले में और भी रास्ता साफ करने के लिए । अब बारी है ३७६ (वलात्कार) और ३५४ (छेड़खानी) की ।  वैसे भी ये आमबात हो गयी है । इसके बारे में ज्यादा क्या कहना । सड़क-बाजार, रेल, विमान, ऑफिस, मन्दिर- सब जगह मर्दानगी दिखायी जाती है- जन्मसिद्ध अधिकार समझकर और कोई खास भय भी नहीं दीखता इस धारा का । वैसे तो रसूकदारों के लिए ३०७ वा ३०२ का भी कोई खास महत्त्व नहीं है । लिव-इन-रिलेशन पर पहले ही मुहर लग चुकी है कोर्ट की । खाओ-पीओ-मौज करो, लूटो-पाटो-ऐश करो— चार्वाक से भी दो कदम आगे की सोच रखने वाले धन्य हैं हमारे महानुभाव । अभी हाल में ही समाचार आया है कि सिर्फ आरोपित होना ही पर्याप्त नहीं है चुनाव-नामांकन की अयोग्यता हेतु, यानी की आरोप सिद्ध होना भी जरुरी है । और ये कौन नहीं जानता कि आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना में कितना फर्क होता है, कितनी लम्बी दोड़ होती है । कितना समय लगता है । दादा के केस का फैसला पोता भी सुन ले तो खुद को भाग्यवान समझे । साक्ष्य और सबूत को दो आँखें मानने वाले अंधे कानून को क्या ये भी नहीं पता कि कितना दम है इन दो आँखों में, और कितनी सहजता से इनपर पट्टी बांधी जा सकती है ! कितने कमाल का है न हमारा संविधान, हमारा कानून, महान है हमारी संसद और उससे भी महान है हमारी न्यायपालिका, जहां गोटसे को फांसी लगती है, भगत, आजाद और विसमिल को विसार दिया जाता है और दूसरी ओर कोई  बाप-चाचा सम्बोधन से प्रचारित होता है ।  कभी किसी ने ये भी नहीं सोचा कि राष्ट्र का भी कोई बाप होता है क्या ! किसने कब दिया ये खिताब आर.टी.आई. लगाने पर भी जान पाना मुश्किल  । शास्त्रीजी का शव परीक्षण भी जरुरी नहीं समझा गया और सुभाष को गुमनामीबाबा बनना पड़ा । हजारों हजार शव पर मिट्टी डाल कर यूनियन कारबाईड को पोषित किया गया , राजीव दीक्षित जैसे चिन्तक, विचारक, वक्ता की हत्या पर खींसे निपोरता उसका ही तथाकथित साथी अरबों का टर्नओवर करता है और इसे भी स्वाभिमान भारत के चश्मे से देखा जाता है । व्रितानियों के पोथड़े(डाईपर) को ही ऋषियों-मुनियों का धर्मशास्त्र और विचारकों का समाजशास्त्र मान लिया गया और उसके ही आलोक में सात दशक गुज़र गए सुराज के बिगुल बजाते-  सुशासन के नाम पर । सच पूछो तो क्या किया है इन हरामखोरों ने विगत दशकों में …?

            शास्त्रीजी के प्रवचन से मुझे भी कुछ बोलने का बल मिला । सादर उनका हाथ पकड़ कर वरामदे में रखे बेंत वाले मोढ़े पर विठाया और बोला— ऐसा क्यों कहते हैं शास्त्री जी ? क्या नहीं दिया देश के मसीहाओं ने , अकेलापन न खले इसके लिए दो टुकड़े करके पाक पड़ोसी दिया, धारा ३७० (कश्मीर मामला) दिया, अमर आरक्षण की बूटी पिलाई, जो देश को सदा युवा रखने में कामयाब रहेगा । धर्म तो पहले भी था, जातियां पहले भी थी, किन्तु दशहरे के पहले गाय का मांस मन्दिर में और ईद के पहले सूअर का मांस मस्जिद में फेंक आना - इन्हीं के बदौलत तो हमने सीखा है । करपात्री पर गोलियां चली और स्वतन्त्रता संग्राम का एक अहम मुद्दा माना जाने वाला- गोकसी बन्दी का बिल बड़े कलाबाजी से निरस्त हुआ ।  इस रहस्य की बात तो उस दिन आपने ही कहा था न कि कई मानिन्द हिन्दू कहे जाने वाले गोमांस के बिना रह ही नहीं सकते । फिर ऐसा क्यों न किया जाये कि ये हिन्दु-मुस्लिम आपस में कटारें भांजते रहें और हम घड़ियाली आँसू बहाते हुए मज़हबी ज़ंग की आँच में अपनी रोटियाँ सेंकते रहें । जाति हटाओ का नारा देते रहें और जाति प्रमाणपत्र भी बीडीओ साहब निर्गत करते रहें । आरक्षण के बम्बू से ठेलठाल कर अयोग्यों को उच्चासन पर बैठाते रहें, और असली योग्यता उधर बिदेशी बाजारों में बिकती रहे । समाज के एक बड़े वर्ग को निकम्मा बनाते रहें- सबकुछ फ्री का दे-बांट कर ।   गांधी जयन्ती मनाते रहें और गांधी के सदविचारों को लहुलुहान करते रहें । क्या गांधी ने ही कहा था आर्यावर्त भरत भूमि में दो ऊँची कुर्सियां लगाने को ? जिस दिन आधी रात को सैम्पेन और बोगदा की  बोतलें खुल रही थी, मारकोपोलो के धुएं में  माँ भारती का दम घुट रहा था, कुटिला मेम अपनी सफलता पर थिरक रही थी, ठीक  उसी समय सुदूर नोआखाली के बन्द कमरे में बैठा बूढ़ा बाप अपने अश्रुसिक्त चेहरे को मज़हबी आंसुओं के गंगाजल से धोने की नाकामयाब कोशिश में लगा था । दो ऐयास वेटे तो अपनी-अपनी कुर्सियां सहेजने की जुगत में थे, बूढ़े बाप की अब भला क्या चिन्ता ! अच्छा हुआ एक सपूत ने उसे मुक्ति देदी अन्यथा पता नहीं किन-किन बातों पर रोना पड़ता बेचारे को । किंचित बिगड़े हालातों को सम्भालने वाले प्रबुद्ध पटेल न होते तो पता नहीं और क्या-क्या हुआ होता...।  

    भोंचूशास्त्री पूरे तैस में थे । कहने लगे— सच पूछो तो गांधी को अमर्यादित जितना गांधीवादियों ने किया है उतना किसी और ने नहीं । इतना ही नहीं, हजार वर्षों की गुलामी में जितना लूटपाट मचा, उतना तो चन्द दशकों में ही पूरा कर दिया अपने ही रहनुमाओं ने ।

   जरा गर्दन टेढ़ी करके शास्त्रीजी ने कहा- एक और रहस्य की बात बताउँ तुम्हें - एक विशेषज्ञ ने सलाह दी है कि धरती पर जनसंख्या का वोझ बहुत ज्यादा है । अच्छे-खासे संसाधन इसमें ही खप जाते हैं । कठोरता पूर्वक परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाने में जानते ही हो कि एक अभिनेत्री को कितना कुछ सहना पड़ा था । अतः नया तरीका इज़ाद किया गया- धारा ३७७ के सहारे । अब तुम ही सोचो न- समलैंगिक सम्बन्ध होंगे तो बच्चे कहां से आयेंगे फिज़ूल के ? और वैसे भी शादी के बाद मजे कम चिन्ता ज्यादा सताती है- कहीं बच्चा न ठहर जाये । अब जरा सोचो कितना दूरगामी लाभ होगा इससे हमारे देश को ! आये दिन प्रायः हर घरों में कमोवेश पति-पत्नी की तू-तू-मैं-मैं होती है । दोनों का जीना हराम हो जाता है । गलती से भी पड़ोसन पर या कहो पड़ोसी पर नज़रें चली गयी तो बाहर से भीतर तक बवाल मच जाता है । अब इसे नियन्त्रित करने वाला कानून ही न रहेगा तो भला किस बूते पर झगड़े-लड़ाइयां होंगी ? सीना तान कर औरतें कहेंगी- हम तुम्हारी मिल्कियत नहीं...मेरा शरीर, मेरा मन...मेरा दिल...जिसे चाहें दूंगी...। और कुछ ऐसी ही बातें कहने का अधिकार मर्दों को भी अनकहे ही मिल जायेगा – है न मजे की बात ? बड़ा ही विचित्र रहा है हमारा देश- सात सेकेन्ड में ही मन भर जाता है और बात करते हैं- सात जनमों तक सम्बन्ध निभाने की । ऐसा भी भला कोई सम्बन्ध होता है ? यही सब देख-सुन कर तो विदेशी हमें पिछड़ा कहते हैं । मिथकों में भला कितना जीये इकीसवीं सदी का भारत ? कुछ और भी फायदे सुनो इन धाराओं के निरस्ती के— ।

   शास्त्रीजी इससे आगे कुछ कहते कि तभी अचानक मेरी श्रीमतीजी प्रकट हुयी वरामदे में, बिलकुल काली स्वरुप में, जिनके हाथ में कटार और खप्पर की जगह झाड़ू की मूठ थी । बिना मीन-मेष के सीधे प्रहार कर दी शास्त्रीजी के सिर पर और दहाड़ उठी— तुम्हारे जैसे मर्दों के चलते ही ये दुनिया नापाक होते जा रही है । सत्तर चूहे खाकर बिल्ली चली हज़ को...जीवन गुजार दिया  ३७७ के चक्कर में और अब बात करने चले हैं भारतीय सभ्यता और संस्कृति की ? तुम्हारे जैसे मुखौटे पर मुखौटा लगाये मर्दों ने ही बरबाद किया है इस धरती को, रौदा है सदा नारी को अपनी मिलकियत समझ कर । जीवन खपा दी जिसने तुम्हारी सेवा में, उसके बदले में तूने क्या दिया मेरी उस सहेली को ? डूब मरो कहीं जाकर चुल्लु भर पानी में....।

  झाड़ू के दूसरी ही प्रहार में शास्त्रीजी उड़ंछू हो गए थे । मौका देख मैं भीतर जा घुसा वाथरुम में, सुबह का फ़ारिग होने के ख्याल से ।
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Saturday, 6 October 2018

शारदीय नवरात्रःशंका-समाधान


शारदीय नवरात्रःशंका-समाधान

आसन्न शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, बुधवार दि. १० अक्टूबर २०१८ से लेकर गुरुवार, १८ अक्टूबर २०१८ तक पूर्ण नवदिवसीय रुप से प्राप्त हो रहा है । तदनुसार शुक्रवार १९ अक्टूबर २०१८ को विजयादशमी (दशहरा) मनाया जायेगा । तिथि- क्रम बिलकुल सही और शुद्ध है, फिर भी किंचित पंचांग अपने-अपने अन्दाज में बातें कह कर भ्रम पैदा कर रहे है । इधर लागातार विभिन्न राज्यों और नगरों से जिज्ञासुओं के फोन आ रहे हैं । अतः तत शंका-समाधान हेतु अपना स्पष्ट मत रखना आवश्यक प्रतीत हो रहा है ।

ध्यान देने योग्य कुछ विन्दु-

1.नवरात्र अनुष्ठान में प्रथम दिन कलशस्थापन और अन्तिम दिन होमकार्य विशेष रुप से विचारणीय होता है ।

2.कलशस्थापन हेतु सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त अभिजित को माना गया है, जो प्रायः दिन में साढ़े ग्यारह के आसपास आ जाता है, और अगले अड़तालीस मिनट तक रहता है । निश्चित काल का निर्धारण उस दिन के धट्यात्मक दिनमान के आधार पर करने का नियम है, जो हर वर्ष थोड़ा-बहुत ही आगे-पीछे होता है । यही कारण है कि साढ़ेग्यारह से साढ़ेबारह के समय को मोटे तौर पर शुभ मुहूर्त मान कर कलशस्थापन कार्य सम्पन्न किया जाता है । इसमें बहुत अधिक माथापच्ची भी उचित नहीं है ।

3.ध्यान देने की बात है कि जिन बन्धुओं को पूर्ण अनुष्ठानिक विधि का पालन करते हुए सिर्फ एक सादा या सम्पुट श्रीदुर्गासप्तशती पाठ करना अभीष्ट है उनके लिए तो कोई परेशानी नहीं है, किन्तु पेशेवर बन्धुओं को असली नियम को किनारे रखकर, अपनी सुविधा और अधिक से अधिक यजमान को खुश कर, अधिक से अधिक दक्षिणा संग्रह करना ही एकमात्र उद्देश्य होता है, वैसे में उन्हें परेशानी होती है और तरह-तरह के बेतुके सवाल भी खड़े होने लगते हैं । अलग-अलग यजमानों को अलग-अगल बातें बोल कर, अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में शास्त्रीय नियम की अवज्ञा और अवहेलना होना स्वाभाविक है ।

4.सोचने वाली बात है कि विधिवत एक सादा पाठ करने में अच्छे अभ्यासी को तीन घंटे (पूजन से लेकर पाठ तक) और सम्पुट पाठ में पांच-साढ़ेपांच घंटे लगने चाहिए, ऐसी स्थिति कोई पांच-सात पाठों की जिम्मेवारी कैसे ले लेते हैं मां भगवती ही जाने, मेरे समझ से तो परे है ।

5.किसी भी पाठ के लिए शास्त्रों में छःगुण और छः दोष कहे गये हैं । इस मापदण्ड पर कितने पाठ और कितने पाठी खरे उतरते हैं- ये भी विचारणीय ही है ।

6.इस बार तिथि का जो भोग्यकाल है, वो थोड़ा व्यतिक्रमित है । मंगलवार को ही गया समयानुसार प्रातः नौ बजकर दो मिनट में शुक्ल प्रतिपदा तिथि का प्रवेश हो जा रहा है, जो आगे बुधवार को गया समयानुसार प्रातः सात बजकर अड़तालीस मिनट पर समाप्त हो रहा है । ऐसे में मध्याह्न व्यापिनी मुहूर्त अभिजित का ग्रहण होना कदापि सम्भव नहीं है । अतः दूसरे विकल्प की आवश्यकता पड़ रही है । पूर्वदिन यानी मंगलवार को मध्याह्न कालिक अभिजित मिल तो रहा है, किन्तु उस दिन का सूर्योदय चुंकि आमावस्या तिथि में हुआ है, यानी प्रतिपदा तिथि को सूर्य का बल नहीं मिल पाया है । यश आरोग्य और ऐश्वर्य के लिए सूर्य का बल अवश्य मिलना चाहिए । अतः स्पष्ट है अगले दिन सूर्य-शक्ति-युक्ता प्रतिपदा तिथि को ही ग्रहण करना उचित होगा । भले ही वहां अभिजित का परित्याग करना पड़ रहा है, या कहें अभिजित का बल नहीं मिल रहा है ।  वस ध्यान सिर्फ इतना ही रखना है कि कलशस्थापन जनित अनुष्ठान की प्रारम्भिक क्रिया प्रतिपदा तिथि में ही प्रारम्भ हो जाये । थोड़ा आलस्य त्यागें तो सवाघंटे का कलशस्थापन विधान पूर्ण सम्पन्न भी हो सकता है प्रतिपदा तिथि में ही । फिर चाहें तो किंचित विश्राम लेकर आगे पाठ आरम्भ कर सकते हैं ।

7.इसी भांति अब अन्तिम यानी समापन कार्य पर विचार करते हैं- अनुष्ठान की समाप्ति विहित होमादि कार्य से सम्पन्न होती है । और इसके लिए कठोर नियम है कि होमकार्य नवमी तिथि में ही सम्पन्न हो, दशमी में कदापि नहीं । ध्यातव्य है कि  गुरुवार, १८ अक्टूबर २०१८ को नवमी तिथि गया समयानुसार अपराह्न दो बजकर चौबीस मिनट तक है । इस दीर्घावधि में बड़ी सहजता से पाठ और होम सम्पन्न किया जा सकता है । किन्तु यहां भी अतिपाठी को अड़चने आयेंगी ही । और वे नियमों की धज्जियां उड़ायेंगे ही । अतः उनके बारे में कुछ कहना ही व्यर्थ है ।

8.अब अलगी शंका का स्थान है- विजयादशमी, सीमोलंघन, नीलकंठदर्शन, पट्टाभिषेकादि कार्य । ध्यातव्य है ये सभी कार्य दशमी तिथि में सम्पन्न होने चाहिए । और संयोग से शुक्रवार को सूर्यबल युक्ता दशमी तिथि गया समयानुसार दोपहर बाद चार बजकर इकतीस मिनट तक उपलब्ध है । यहां एक प्रश्न ये उठाया जा सकता है उक्त कार्य गोधूलीबेला में सम्पन्न होने की परम्परा जैसी भी है, किन्तु ध्यान देने की बात है ये परम्परा है, नियम नहीं । जमींदारों और राजा-महाराजाओं के जमाने में तैयारियां करते-करते दिन ढलने को तैयार हो जाता था, और फिर आगे देर रात तक मिलन समारोह चलते रहता था । किन्तु सामान्य लोगों को इन सबसे कोई मतलब तो है नहीं, फिर व्यर्थ की शंका या कि चिन्ता क्यों !

हो सकता है मेरी उक्त टिप्पणी से कुछ पेशेवर बन्धुओं को क्लेश पहुंचा हो, किन्तु मेरा उद्देश्य किसी को क्लेशित करना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाना मात्र है । स्वार्थ और लोभ में पड़कर या आलस्यवश हमें किसी भी नियम की अवहेलना नहीं करनी चाहिए और न गुमराह ही । सही दिशा ब्राह्मण ही तो दिखा सकते हैं समाज को । अतः विप्र बन्धुओं से निवेदन है कि मेरी बातों का अन्यथा न लें और अपनी गरिमा और महिमा को समझते हुए, समाज को सही मार्गदर्शन कराने का प्रयास करें । आपना मत थोपने का प्रयास भी न करें ।  कोई माने या न माने- इसकी चिन्ता भी न करें । कर्मण्येवाधिकारस्ते...। अस्तु ।