Tuesday, 23 April 2019

प्राण-प्रक्रिया और मानव-साङ्कर्य






प्राण-प्रक्रिया और मानव-साङ्कर्य

        हमारे पुराणों में अभिव्यक्ति की अद्भुत परम्परा रही है प्राण-प्रक्रिया के साथ-साथ मनुष्य-चरित का सांकर्य यथेष्ठ स्थानों पर देखा जाता है । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि प्रकृति का प्रचुर और विशद रुप से मानवीकरण किया गया है । हम मनुष्य मनुष्य की भाषा और क्रिया-कलापों को ही आसानी से समझ पाते हैं । इससे इतर क्रियाओं को आत्मसात करने में काफी कठिनाई होती है । पति-पत्नी-पुत्र-कलत्रादि मानुषी सम्बन्धों को समझना हमारे लिए अपेक्षाकृत आसान होता है । देवता-देवी (शक्ति-शक्तिमान) आदि को भी इसी रुप में चित्रित किया गया है ताकि गहन सृष्टि-विज्ञान को हम सहजता से समझ सकें ।  वस्तुतः पुराणों की रचना(संकलन)ज्ञानक्षेत्र के पंचमाधिकारियों के लिए ही किया गया है । यानी वेदोपनिषदादि से ब्रह्म और तत्लीलासृष्टि रहस्य पूर्ण स्पष्ट नहीं हो पाया, फलतः पुराणों का संकलन करना पड़ा ।  कथोपकथन की इस परिपाटी को ठीक से हृदयंगम न कर सकने के कारण ही हम प्रायः भ्रमित होते रहते हैं और पुराणकार पर ही आक्षेप कर बैठते हैं । यहां एक छोटे से प्रसंग में कुछ ऐसी ही बातों की चर्चा करते हुए स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है । अस्तु ।

       सृष्टि के मूलाधार सूर्य हैं- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च...(ऋग्वेद १-११५-१), यत् सर्वे प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सन्नधत्ते...(प्रश्नोपनिषद १-६) इत्यादि उद्धरणों से यही स्पष्ट होता है । पुराणों में विविध कथाक्रम में सूर्य की पांच पत्नियां कही गयी हैंप्रभा,संज्ञा,राज्ञी,वडवा और छाया । वस्तुतः ये सब क्रम और काल भेद है । प्रभा से प्रभात हुए । यहां संज्ञा के समतुल्य (हर दृष्टि से समान) होने के कारण छाया को सवर्णा भी कहते हैं । सवर्णा से ही सावर्णीमनु हुये । इनके अतिरिक्त शनैश्चर (छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्...), ताप्ती और विष्टि नामक तीन सन्तानें और उत्पन्न हुयी । उधर संज्ञा से वैवश्वत्मनु, यम और यमुना हुए । वडवा (अश्विनी > घोड़ी) से अश्वस्वरुप में सम्भुक्त होने पर नासत्य और दस्र नामक दो सन्तानें हुयी, जो अश्विनीकुमारों के नाम से सुख्यात हुये । ज्ञातव्य है कि अश्वस्वरुप जनक-जननी के कारण इनका शेष शरीर तो मनुष्य का है, किन्तु मुंख-मंडल घोड़े का है । कालान्तर में आरोग्यधर्मा देववैद्य के रुप में ये प्रतिष्ठित हुए ।

       पौराणिक प्रसंग (वायुपुराण अध्याय २२, मत्स्यपुराण अध्याय ११, पद्मपुराण-सृष्टिखंड अध्याय  ८) इत्यादि में वर्णित कथासार ये है कि त्वष्टा पुत्री संज्ञा सूर्य से व्याही गयी । दीर्घकाल तक तो वो सूर्य के साथ रही, किन्तु बाद में प्रखर सूर्य रश्मियों से व्याकुल होकर स्वयं को अन्तर्हित करने के विचार से अपने ही स्वरुप (सवर्णा) छाया को स्थान देकर, स्वयं सुमेरु प्रान्त में जा छिपी । समयानुसार संज्ञा-सवर्णा छाया से भी सन्तानें उत्पन्न हुयी । छाया अपनी सन्तानों की तुलना में संज्ञा की सन्तानों के प्रति सौतेलेपन का भेद-भाव रखती थी । सूर्य-संज्ञा पुत्र वैवस्वत् द्वारा इस आशय की शिकायत करने पर सूर्य अति कुपित हुये और संज्ञा स्वरुपिणी छाया को प्रताड़ित करके रहस्य ज्ञात किये । रहस्य जान कर वे मूल पत्नी- संज्ञा की खोज में निकल पड़े । संज्ञा अश्विनी रुप में जलमग्न थी, अतः सूर्य ने भी अश्व रुप धारण किया । दीर्घकालोपरान्त प्रेमालाप से समझा-बुझा कर वापस लाया । इसी जल-प्रवासक्रम में अश्विनीकुमारों का जन्म हो चुका था । इस दुर्घटना की सूचना पिता विश्वकर्मा(त्वष्टा) को भी मिली । पुत्री-जामाता के सुदृढ़ सुखमय जीवनयापनार्थ उन्होंने सूर्य के तेज को खरादकर(सुधारकर) किंचित न्यून (सह्य) किया । ध्यातव्य है कि इन्हीं रश्मियों से विभिन्न दिव्य सर्जना के साथ-साथ दिव्य विप्रों का स्रजन भी हुआ, जिन्हें शाकद्वीप में स्थान दिया गया ।

        अब, सूर्य की इस सन्तति (संसृति) परम्परा को वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषित करने का प्रयास करते हैं यहां । कथा का प्रतीकात्मक आशय ये है कि सूर्य-मंडल के चारों ओर प्रभा व्याप्त होती है , जो सदा सूर्य के साथ विराजती रहती है सहचारिणी होकर । अतः प्रभा को सूर्य की प्रथम पत्नी कहा गया ।  उस प्रभा के प्रभाव से ही प्रभात होता है, अतः प्रभात को प्रभा का पुत्र कहा गया । सूर्य के अस्ताचल गामी हो जाने पर रात्रि का प्रादुर्भाव होजाता है, हालाकि इसका सम्बन्ध भी परोक्षरुप से सूर्य से ही होता है, अतः रात्रि(राज्ञी)को सूर्य की दूसरी पत्नी कहा गया । प्राणः प्रजानामुदयत्वेष सूर्यः...समस्त प्राणियों में संज्ञा(चेष्टा)सूर्य के कारण ही है । सूर्यपिंड ही सारी सृष्टि में प्राणरुपसे उदित है- व्याप्त है । इस प्रकार संज्ञा सूर्य की सहचारिणी सिद्ध हुयी । त्वष्टा सभी प्राणिरुप देवताओं के भिन्न-भिन्न स्वरुपों के संगठन का हेतु बनता है । विशकलित यानी प्रकीर्णभाव से विखरे हुए सभी प्राण त्वष्टारुप प्राणशक्ति से ही संगठित होकर अपना रुप ग्रहण करते हैं । यही कारण है कि त्वष्टा ही प्राणियों की चेष्टा (संज्ञा) में कारण बना । संज्ञा को त्वष्टापुत्री कहने का यही अभिप्राय है । ध्यातव्य है कि पृथ्वी पर सीधे आने वाले सूर्यरश्मियों को ही प्रभा कहते हैं, जिससे प्राणिमात्र में संज्ञा (चेष्टा) का संचार होता है । यही प्रभा (रश्मि) किसी भित्ति आदि से प्रतिहत (अवरोधित) होकर किंचित तिरछी पड़ती है वही छाया वा सवर्णा नाम से अभिहित है । सीधी किरणों से जो अर्द्धेन्दु बना वो वैवश्वतमनु कहलाया और प्रतिहत(सवर्ण) किरणों से बने अर्द्धेन्दु को सावर्णिमनु कहा गया । यम को सूर्यपुत्र कहा गया है । तात्पर्य ये है कि सभी प्राणियों की आयु सूर्य-सन्निहित है । सूर्यमंडल से प्राप्त होने वाली ऊर्जा(प्राण) किंचित कारणों से विच्छिन्न होजाती है जब, तभी प्राणी की मृत्यु होती है । सूर्य और उससे उत्पन्न होने वाली आयु को परस्पर विच्छिन्न करनेवाली शक्ति का ही नाम है यम । ये यमात्मक शक्ति भी कहीं बाहर से नहीं आती, प्रत्युत सूर्य से ही उत्पन्न होती है, यही कारण है कि यम को सूर्यपुत्र कहा गया है । छाया (सवर्णा) से उत्पन्न शनैश्चर नामक पुत्र की चर्चा है । वस्तुतः सूर्यमंडल में काफी दूरी पर शनि नामक ग्रह है । सूर्य से इतनी दूर कि वहां तक सूर्यरश्मियों का सम्यक् पहुँचना कठिन है । रश्मियां किंचित वक्र होकर ही वहां पहुँच पाती हैं । यही कारण है कि सवर्णा वा छायोत्पन्न माना गया । ब्रह्माण्ड की परिधि पर सुमेरुप्रान्त की बात कही जाती है । 

        व्याकरण और निरुक्त के ज्ञाता इससे अवगत है कि वस्तुतः रश्मि, अश्व, प्राण आदि एक दूसरे के पर्याय हैं । सूर्य-संज्ञा(अश्व-अश्वी)संयोग से अश्विनीकुमारों का जन्म होने का तात्पर्य ये है कि सुदूर सुमेरुप्रान्त में सूर्य किरणें किंचित भिन्न रुप से लक्षित होती है- अश्विनीनक्षत्र की आभा से अद्भुत समागम होता है वहां । वहां का वातावरण अन्य स्थानों की तुलना में अति मनोरम होता है ।

     इन बातों की विशद चर्चा श्री गिरधर शर्मा चतुर्वेदीजी के पुराण-परिशीलन नामक ग्रन्थ में द्रष्टव्य है , जो आधुनिक मतावलम्बियों की आँखें खोलने में पूर्ण समर्थ हैं । महमना मगकुलभूषण श्रीगोपीनाथजी कविराज ने भी सूर्य के रहस्यमय विज्ञान पर काफी कुछ प्रकाश डाला है । स्वामी विशुद्धानन्दजी के सानिध्य में उन्हें इस सावित्री-विद्या का ज्ञान प्राप्त हुआ था । जिज्ञासुओं को उनकी बहुचर्चित पुस्तक भारतीय संस्कृति और साधना  का अध्ययन-मनन अवश्य करना चाहिए । अस्तु ।

Sunday, 21 April 2019

लागा चुनरी में दाग


लागा चुनरी में दाग

लागा चुनरी में दाग…’ पंक्तियां एक निर्गुण सन्त की हैं, जिसे समय-समय पर मुहावरे के रुप में भी खूब प्रयोग किया जाता रहा है । ऐसा ही अवसर फिर एक बार लोकतन्त्र के रोचक वर्तमान में आया है- ऐन ऐसे वक्त में जब लोकतन्त्र का महापर्व- सांसदीय चुनाव का माहौल है देश में । लोकतन्त्र के कर्णधारों और तथाकथित मषीहाओं का वारान्यारा बहुत जल्द ही होने वाला है , साथ ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कुछ बड़े चेहरे और थोबड़ों को एक्सपोज़ भी होना है बहुत जल्दी ही । फैसला पक्ष में नहीं जाने की आशंका रातों की नींद और दिन का चैन हराम किये हुए है । ऐसे में लोकतन्त्र के रंगमंच पर तरह-तरह के खेल खेले जा रहे हैं । सभी प्रकार की मर्यादायें तारतार हो रहीं हैं । तथाकथित स्वतन्त्रता का पुरजोर उपयोग किया जा रहा है । जो चाहें,जितना चाहें,जब चाहें,जहाँ चाहें,जिसे चाहें अ-सम्मानित करदें, आरोपित करदें । यहां तक कि दूसरे को असम्मानित करने में अपने सम्मान को भी दांव पर लगा दें- स्वतन्त्रता का असली उपयोग तो यही है न ! और साथ ही यह भी कहने से न चूंकें कि लोग असहिष्णु हो गए हैं यानी सहिष्णुता का घनत्व भी घट गया है ।
            अभी हाल में सीबीआई का बखिया उघड़ा था । अब सीजेआई को पोस्टमॉर्टम टेबल पर घसीटा गया है ।
    खबर है कि बीस वर्षों के वेदाग कैरियर और सात महीने के बचे कार्यकाल वाले  हमारे सीजेआई महोदय पर ही कीचड़ उछाला गया है । और इस प्रकार लोकतन्त्र का सर्वाधिक विश्वासपात्र स्तम्भ ही संदेह के घेरे में आ गया है । उनकी ही एक बर्खास्त महिला कर्मचारी ने यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया है । बर्खास्तगी का एकमात्र कारण – यौन-उत्पीड़न का विरोध...पति और देवर तक को भी बक्शा नहीं गया ।
            आसमान में थूकना और किसी पर कुछ भी आरोप लगा देना बिलकुल आसान बात है, किन्तु...?
 आरोप बेबुनियाद है...सुनियोजित साजिश के तहत ऐसा हुआ है...सीजेआई महोदय ने भी वही कहा, जो प्रायः हर आरोपी कहता है ।
            लकदक-बेदाग चुनरी पर कीचड़ पड़ जाने के बाद कोई क्या करेगा ? क्या कहेगा ?
कुछ न कहना...मौनधारण भी कम खतरनाक थोड़े जो है ।
कोई उसे धोने की कोशिश करेगा तो कोई उसे सूख कर खुद-ब-खुद झड़ जाने का इन्तज़ार...कोई बेशर्म की तरह खींसें भी निपोड़ सकता है...ऐसी परम्परा भी हमारे प्यारे लोकतन्त्र में खूब रही है । हालाकि ये सब आरोपी की निजी स्वतन्त्रता और स्वविवेक की बातें है ।

            किन्तु एक आम आदमी क्या करें- ऐसी खबरों का ?

          अखबार के उस पन्ने को चट फाड़कर बच्चे का पॉटी फेंकने में इस्तेमाल करलेमुंह बिचकाकर अखबार एक ओर सरका दे—कहे जो झूठ-सच हरदम उसे अखबार कहते हैं...के तर्ज पर या कि रीडिंग टेबल पर करीने से सहेज कर उन पंक्तियों पर मगज़पच्ची करने बैठ जाये ?
            पहले दो करतब तो बेमानी हैं...सरासर बेमानी, परन्तु तीसरा भी सबके बस की बात नहीं है ।
            क्या कलयुग—सर्वाधिक भ्रष्ट युग सज-संवर कर हमारे देश में ही डेरा डाल लिया है ?
अनीति, अनेति, झूठ और भ्रष्टाचार की हद हो गयी !
किसी भी खबर या घटना के बाद हम दो धड़ों में सहज ही बंट जाते हैं—अनचाहे भी पक्ष या विपक्ष का दामन थाम लेते हैं । खबरों को चटकारे लेकर चखने लगते हैं । मुंह बिचका कर थू-थू भी करने लगते हैं । बिन सोचे-विचारे कठपुतली की तरह तालियां भी ठोंकने लगते हैं किसी और के इशारे पर ।
हालाकि पर्दे के पीछे जाकर सच्चाई तक पहुँचना सबके बस की बात नहीं है । खबर जुटाने वाले चौथे खम्भे में भी भरपूर घुन लग चुका है । एक ओर सच्चाई को हर कीमत पर उजागर करने वाले जीरोमाइलरिपोर्टरों पर भी आए दिन तरह-तरह के जुल्म ढाये जा रहे हैं- उनकी या उनके परिवारों की निर्मम हत्यायें हो रही हैं, तो दूसरी ओर डिजाइनर पत्रकारों की भी बाढ़ आगयी है । सोशलमीडिया खुराफ़ातियों का सुरक्षित गढ़ बन गया है । यहां पत्रकार बनना सबसे आसान काम हो गया है । सस्ते वा कहें मुफ्त के इन्टरनेट से संवाद-परिवहन को अल्लादीन का चिराग मिल गया है- एक क्लिक में दुनियां समा गयी है ।
हम बहुत ही संक्रामक दौर से गुज़र रहे हैं – ऐटोमिक रेडियेशन से भी खतरनाक दौर में ।
ऐसे में बहुत सूझ-बूझ से काम लेने की जरुरत है । विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र सर्वाधिक चर्चे में है । सर्वाधिक खतरे में भी । भीतर-बाहर, आजू-बाजू गिद्ध-कौये चोंच मारने को उतारु हैं । मूंछ और पूंछ रंग-रंग कर सियार हुआँ-हुआँ कर रहे हैं –आजाओ मेरे बाड़े में...।
ऐसे में हमें जगकर पूरे होशोहवाश में पहरेदारी करनी होगी । खुद को बचाते हुए देश को बचाना होगा । देश ही न रहेगा सुरक्षित तो फिर हम रहे न रहे –क्या मतलब ?
लोकतन्त्र के दुश्मनों - नापाक नेताओं को ठीक से सबक सिखाना होगा । चुनचुन कर दागदार चुनरियों को कलफ़ कर फिर पांच साल के लिए सहेजने के बजाय एकदम फूँ...ऽ...ऽ...कर देना होगा- रहे बांस न बजे बंसुरिया ...।
चलने-बोलने का सऊर नहीं, वो भला लोकतन्त्र क्या चलायेगा—सोचनेवाली बात है । मक्कार तन्त्र भले चला ले ।
राष्ट्र की सेवा वही कर सकता है- जिसे खुद की सेवा का सपना न हो । जिसकी बन्द पलकों में भी सिर्फ और सिर्फ सु-राष्ट्र का सपना हो ।
जन्मजात वा अपेक्षाकृत बेदाग चुनरी वाला ही सही ढंग से लोकतन्त्र सम्भाल सकता है ।  
कहीं फिर पछताना न पड़े— लागा चुनरी में दाग छुड़ाऊँ कैसे...घर जाऊँ कैसे ....।
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Sunday, 14 April 2019

जाँच-साँच-आँच


जाँच-साँच-आँच

कहने को तो साँच को आँच नहीं- पुरानी कहावत है, पर मुझे लगता है कि इसमें संशोधन होना चाहिए । क्यों कि साँच को जितनी आँच झेलनी पड़ती है, झूठ को नहीं । ऐसा पहले भी होते आया है और अब भी हो रहा है ।  
हमारे यहां बात-बात में जाँच की बात होती है । और जाँच भी कोई साधारण नहीं— टी.सी., डी.सी. से एम.आर.आई. तक, डी.एन.ए. से लाइडिटेक्टर तक, इन्सपेक्टर से प्लीडर कमिशनर तक । और विविध जाँचों की भीड़ में जाँचआयोग का गठन तो बिलकुल आम बात है – मेले में खोमचे-ठेले जैसी । मेला लगे और खोमचे वाले न आयें- घटना घटे और जांचकमीशन न बैठे- ऐसा कैसे सम्भव है । मुझे तो लगता है – आने वाले समय में ऐसा न हो कि भरी दोपहरी में सूरज को सूरज होने का जांचरिपोर्ट पेश करना पड़े और पांच में तीन कमीशन चांद वाला सर्टिफिकेट न दे दें ।

सच पूछें तो ये सब करिश्मायी गठन है, जिसके बदौलत तात्कालिक समस्या को दूर धकेलना बहुत आसान हो जाता है । और फिर समय का मनोनुकूल उपयोग करना भी उतना ही आसान । जाँच आयोगों का गठन और अदालतों में मिलने वाली तारिखें- सहोदर नहीं तो सौतेले जरुर लगते हैं ।

भले ही जुकाम की दवा दो रुपये की आती हो, पर जुकाम की जाँच में हजारों लग जांये तो कोई आश्चर्य नहीं । क्यों कि डॉक्टर साब का पर्सनल डायग्नोसिस तो कुछ होता ही नहीं , जो भी होता है पैथोलॉजिस्ट-रेडियोलॉजिस्ट का । और ये दोनों कितने एक्सपर्ट होते हैं शायद हम सब वाकिफ हैं । निन्यानबे प्रतिशत जाँचघर क्वैकों द्वारा चलाये जाते हैं, जहां मैट्रिक-आइ.ए. या अंगूठा छाप बेरोजगार काम कर रहे होते हैं और जाँच रिपोर्ट पर किसी एक्सपर्ट का दस्तख़त भर होता है । जाँच करने वाले को भी पता होता है और दस्तख़त करने वाले को भी कि इस पर कोई जाँचआयोग नहीं बैठने वाला है । रोगी मरेगा तो अपने भाग्य से, जीयेगा तो अपने भाग्य से । और डॉक्टरसाहब सिर्फ वही दवा लिखेंगे जिस पर उनका कमीशन ज्यादा बनेगा या किसी खास केमिस्ट के यहां ही उपलब्ध हो ।  झूठ-सच उगलवानेवाली मशीन भी प्रायः वही बात कह जाती है, जिसे चतुरसुजान लोग सुनना-सुनाना चाहते हैं । और डी.एन.ए. में भला कहां दम है कि निर्णय कर दे बेटे के असली बाप का । जाति-वर्ण, धर्म-सम्प्रदाय के घालमेल और नकली के जमाने में बाप का असली साबित होना कितनी कठिन बात है ! वैसे भी बेटा भला क्या जाने...।

खैर,बात चल रही थी जाँच की । नगर की सीमा हो या देश की सीमा, जेल का गेट हो या सचिवालय का, मेट्रो- स्टेशन की एन्ट्री हो या एयरपोर्ट की, अतिसंवेदनशील इलाके हों या आम-वो-खास—किसी न किसी तरह की जांच-व्यवस्था बनायी गयी है- सुविधा और सुरक्षा के लिहाज़ से । क्या यह सच नहीं कि देश की पूरी सुरक्षाकर्मियों का सबसे बड़ा हिस्सा बगुलों की सुरक्षा में व्यस्त है और उससे बचे हिस्से का बहुत बड़ा हिस्सा विविध घटनाओं की जांच में खपा दिया गया है । इस सबसे बचे-खुचे सुरक्षाकर्मी विभिन्न संवेदनशील जांच-स्थलों में विठा दिये गये हैं ।

सच तो ये है कि जाँच महज एक कोरम है, जिसे किसी तरह पूरा कर लिया जाता है – ज्यादातर बिना किसी उपकरण के ही , सिपाहीजी की जादुई हथेली के छुअन मात्र से । ऐसी जादुई जांचों से कई दफा वास्ता पड़ चुका है- रेल व सड़क यात्राओं में ।

सोचने वाली बात है कि यदि सख्ती और ईमानदारी बरती जाती तो जेल के अन्दर चरस-गांजा-हेरोईन से लेकर घातक हथियार और विभिन्न अवांछित सामग्री तक प्रायः वरामद न होते रहते । तस्करी का धंधा दिन दूना रात चौगुना न फलता-फूलता और इतना ही नहीं, हमारे प्यारे सैनिकों को हठात जानें भी न गंवानी पड़ती । आये दिन किसी न किसी छोटे चूक की बड़ी सजा हमें भुगतनी पड़ती है । फिर भी सबक लेने, चुस्त-दुरुस्त होने के बजाय नयी कवायदें शुरु कर देते हैं हम ।

ये कह कर पूरी जाँच-प्रक्रिया पर उँगली नहीं उठा रहा हूँ, किन्तु ज्यादातर जांच खानापुरी से कुछ अधिक नहीं होते—यही सच है । फलतः एक ओर आम आदमी को यात्रा के दौरान परेशानी उठानी पड़ती है, तो दूसरी ओर कभी-कभी भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है । फिर भी हम चेतते नहीं ।

ये सही है कि जांच कर्मियों के पास अल्लादीन का चिराग़ नहीं है और न बालवीर वाली जादुई छड़ी ही, फिर भी ईश्वर की दी हुयी बुद्धि और विज्ञान का दिया हुआ विविध आधुनिक तकनीक और उपकरण तो है ही उसके पास ,वशर्ते कि वो ईमानदारी पूर्वक इनका इस्तेमाल करे ।

किसी घटना पर गठित जांच-आयोगों के साथ भी कुछ ऐसी ही बातें होती हैं- आनन-फानन में आयोग का गठन हो जाता है। सोच-समझ कर चुनिन्दें लोग नियुक्त कर दिये जाते हैं और फिर उनकी चुनिंदी प्रक्रियायें वरषों-बरष चींटी की चाल चलते रहती है—तब तक चलती है जब तक जनता के दिमाग में घटना सो न जाये । सौभाग्य या दुर्भाग्य से घटना की ताज़गी बनी रही यदि, टीस बरकरार रहा यदि, तो भी अन्ततः परिणाम क्या होता है—इससे भी हमसब वाकिफ़ हैं । जांचआयोगों की रिपोर्ट-फाइलें अन्धकूपों में दबी सिसकती रह जाती हैं । सुभाष और शास्त्री की टीस क्या कभी बिसरने वाली है किसी राष्ट्रपूत से ? और भी ऐसे अनेक कांटे चुभे हैं - जिनका सम्बन्ध किसी न किसी जांच से है । किसी जांचआयोग से है ।

अभी हाल में हुयी चौवालिस सैनिकों की बलि- क्या ऐसी की जांच लापरवाही का दुष्परिणाम नहीं है ?

आप सी.सी.कैमरे के ज़द में हैं— ये स्लोगन(सूचना)लिखकर हम क्या जताना चाहते हैं ?  जनसामान्य को हड़काना या कि अपराधियों को सावधान करना ? हजारों-लाखों जगह पर ये सूचना लिखने में राष्ट्रीय आय का कुछ तो हिस्सा बरबाद हुआ ही होगा या किसी राजभक्त श्रमजीवी ने श्रमदान कर दिया ! मेरे विचार से तो इसे लिखे वगैर भी काम चल सकता था ।

मजे की बात तो ये है कि प्रायः सुनने को मिलता है कि अपराधी आये, सुनियोजित ढंग से अपना काम किए और जाते-जाते  D.V.R.भी लेते गए । अब जाँच करने वाले ओल छीलते रहें । अपराध का सबूत सबसे पहले मिटाया जाता है और मजेदार बात है कि जांच करने वाले ही इसमें सबसे अधिक सहयोगी होते हैं । मोतियाविन्द की मोटी पपड़ी वाली कानून की दो आँखों (साक्ष्य और सबूत) को फोड़ने का तरीका भी जांचकर्मियों के खलीते में ही छिपा होता है, वशर्ते की आपको खलीता ढीला करने का तरीका मालूम हो । आप सक्षम हों ।  जांच की टीम रसूकदारों के घर भी जाती है, सलामी दागती है, चाय-वाय पीकर वापस आजाती है । चौकीदार हो कि दफादार, छोटे सिपाही हो या कि आला अफसर उनकी घुड़की का शिकार सिर्फ आमजन होता है । खास तो सदा खास ही बना रहता है । खासकर जबतक उसकी कुर्सी बनी हुयी हो । कुर्सी के बाद भले ही कुछ बेतुका करिश्मा हो जाये । इन सबके ताजे-तरीन नमूने मिल जाते हैं आजकल चारोंओर ।

      देश की बड़ी से बड़ी जांच-संस्था भी आज खुद ही कठघरे में है । अब आप उसे तोता कहें या कि उल्लू । शेर भी होता यदि तो भी पिंजरेवाला ही न ! क्या सत्तर सालों में देशवासियों ने पिंजरेवाले शेर का सर्कश कभी नहीं देखा है ?  
       देश की सबसे बड़ी न्याय-व्यवस्था ने भी कुछ ऐसे-ऐसे गुल खिलाये हैं कि प्रबुद्ध जन को सिर पकड़ कर बैठ जाना पड़ा है कई बार । अभागे सच को चीख-चीख कर कहना पड़ता है, फिर भी उसकी सुनी नहीं जाती । झूठ और आडम्बर की रंगीन कनात इतने बेहतरीन ढंग से तनी होती है कि सच को बारबार मुंहकी खानी पड़ती है— वांस-बल्लियों-रस्सी-गुंजरों की जाल में उलझ-उलझ कर । सच सबसे अधिक अपमानित अदालतों में होता है, भले ही सत्यमेवजयते की पट्टिका लिखी पड़ी हो न्यायमूर्ति के सिर पर ।

जाँच के इस कोरे जंजाल से हम कब बाहर निकलेंगे ! कब हम जांच की महत्ता और अनिवार्यता को समझते हुए, सही तरीके से पूरी ईमानदारी से इसे अंज़ाम देंगे – मौके का इन्तजार है ।
काश ! वो जल्दी आजाये ।

Friday, 12 April 2019

मृत्यु-सूचक चिह्न-चर्चा


मृत्यु-सूचक चिह्न-चर्चा

श्रीस्कन्दपुराण,काशीखण्ड(पूर्वार्द्ध)में महर्षि अगस्त ने शिवपुत्र भगवान षडानन कार्तिकेयजी से जिज्ञासा की है कि आसन्न मृत्यु-सूचक लक्षण को मनुष्य कैसे जाने । अमरत्त्व की कामना लिए मनुष्य की ये सहज जिज्ञासा है । क्यों कि वह भयभीत है सदा । इस भय ने ही उसकी सुखानुभूतियों पर पानी फेर रखा है । जो सामने है,जो उपलब्ध है,उसकी चिन्ता से कहीं अधिक चिन्ता अदृष्ट और भविष्य की खाये जाती है । इस चिन्ता में सहज-स्वाभाविक,नित्य-नैमित्तिक कर्मों में भी प्रायः व्यवधान वा अलस्य होने लगता है ।

करुणासागर कार्तिकेयजी ने मुनि की लोकोपयोगी जिज्ञासा का शमन करते हुए विशद वर्णन किया है । उन्होंने बतलाया कि जिस मनुष्य की दाहिनी नासिका में एक अहोरात्र(रात-दिन)(एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय पूर्व तक)श्वांस अखण्ड रुप चलती रह जाये तो समझे कि उसकी आयु अब मात्र तीन वर्ष शेष है । ज्ञातव्य है कि प्राणवायु (श्वास-प्रश्वास)का संचरण प्रति घटी(पैंतालिस मिनट करीब)पर परिवर्तित होते रहता है । यही क्रिया यदि दो अहोरात्र पर्यन्त जारी रहे तो मृत्यु एक वर्ष पश्चात होने की आशंका रहेगी ।

 यदि दोनों नासिका छिद्र दस दिन तक निरन्तर ऊर्ध्वश्वास के साथ चलते रहें तो मनुष्य मात्र तीन दिवस का मेहमान जाने स्वयं को । प्राणवायु नासिका के दोनों छिद्रों के वजाय सीधे मुंह से आवागमन करने लगे तो दो दिन में यमलोक प्रयाण कर जाये ।

ज्ञातव्य है कि मृत्युदेवी की बिलकुल आसन्न स्थिति में प्राणी विविध भयकारक दृश्य  का अवलोकन करने लग जाता है ।

ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि सूर्य जन्मराशि से सप्तम राशि पर और चन्द्रमा सीधे जन्म नक्षत्र पर आ गए हों तब यदि दाहिनी नासिका से श्वास चलने लगे तो उस समय सूर्याधिष्ठित काल जाने । ऐसे काल में विशेष सावधान रहते हुए प्रभु चिन्तन करे ।

यदि अकस्मात किसी काले-पीले पुरुष का दृश्य स्पष्ट हो और तत्काल ही अदृश्य भी हो जाये तो दो वर्ष का जीवन शेष जाने । जिस मनुष्य का मल-मूल,वीर्य वा मल-मूत्र व छींक एक साथ प्रकट हो तो मात्र एक वर्ष ही जीवन शेष जाने । नीलमणि के तुल्य नागों के झुंड को आकाश में तैरता हुआ यदि देखे तो द्रष्टा की आयु मात्र छः माह शेष जाने ।

जिसकी मृत्यु अति निकट हो उसे सप्तर्षि मंडल में महर्षि वशिष्ठ की सहधर्मिणी अरुन्धती का तारा एवं ध्रुवतारा दिखायी नहीं पड़ता । ध्यातव्य है कि यहां आँखों की सामान्य रौशनी की स्थिति में बात कही जा रही है ।  जो मनुष्य अकस्मात नीले-पीले रंगों को या खट्टे-मीठे रसों को विपरीत क्रम में अनुभव करने लगे तो उसकी मृत्य छः माह के भीतर जाने । यही अवधि उस मनुष्य की भी होगी जिसके वीर्य,नख और आँखों का कोना नीले या काले पड़ जायें ।

भलीभांति स्नान करने के बाद जिनका हृदयस्थल और हाथ-पैर अन्य अंगों की अपेक्षा जल्दी सूख जाये तो उसकी मृत्यु तीन मास के अन्दर होना निश्चित समझे ।

जो मनुष्य जल,घी आदि तरल पदार्थ तथा दर्पण में अपने सिरोभाग को स्पष्ट न देख पाये वो अपना जीवन एक मास शेष जाने । अपनी छाया में सिरो भाग का न दीखना भी सद्यः मृत्यु-सूचक है । जिसकी बुद्धि अचानक भ्रष्ट हो जाये(पूर्व से विपरीत),वाणी अस्पष्ट हो जाये,रात में इन्द्रधनुष दिखायी पड़े,दो-दो सूर्य वा चन्द्रमा दीख पड़ें,तो इसे सद्यः मृत्यु की सूचना समझे ।

अंगुलियों से कान बन्द करने पर एक विशेष प्रकार की ध्वनि सुनायी पड़ती है । ये ध्वनि सुनायी पड़ना यदि बन्द हो जाये तो मास पर्यन्त जीवन शेष जाने । यही अवधि उस मनुष्य की भी होगी जो अचानक मोटे से दुबला या दुबले से मोटा हो जाये- विना किसी विशेष रोग-व्याधि के । स्वभाव में अचानक परिवर्तन भी आसन्न मृत्यु का लक्षण है । जैसे कृपण का अचानक उदार वा उदार का कृपण हो जाना ।

स्वप्न में निरन्तर कुत्ते, कौए, गधे, सूअर, गीध, सियार, असुर, राक्षस, भूत, पिशाच आदि दीखें तो एक वर्ष के भीतर मृत्यु जाने । यदि मनुष्य स्वप्न में स्वयं को गन्ध,पुष्प,लाल वस्त्रादि से अलंकृत देखे तो आठ महीने बाद मृत्यु जाने । स्वप्न में धूल या दीमक की बॉबी पर स्वयं को चलता देखे तो छः माह बाद मृत्यु जाने । स्वप्न में तेल लगाता हुआ स्वयं को देखे,गधे वा घोड़े पर सवारी करता हुआ,दक्षिण दिशा की यात्रा करता हुआ,अपने पूर्वजों का लागातार दर्शन करता हुआ पाये तो छः मास की आयु शेष समझे । यदि स्वप्न में अपने शरीर पर घास या सूखी लकड़ियां रखा देखे तो छः मास की आयु शेष समझे ।

स्वप्न में लौह दंडधारी, काले वस्त्रधारी पुरुष का दर्शन हो तो तीन मास की आयु शेष समझे । श्यामवर्णा स्त्री का स्वप्न में आलिंगन महीने भर के भीतर ही यमपुरी की यात्रा करा देता है ।

स्वप्न में वानर की सवारी करता हुआ,पूर्व दिशा की ओर स्वयं को जाता देखे तो महीने भर के अन्दर मृत्युपाश में बांधा जाये । यहां ध्यान देने की बात है कि घोड़े की सवारी करते हुए दक्षिण दिशा की यात्रा और वानर की सवारी करते हुए पूर्व दिशा की यात्रा अनिष्ट सूचक है । 

इसी भांति और भी अनेक लक्षण विविध पुराणों में कहे गए हैं । सद्बुद्धि वाले मनुष्य को चाहिए कि ऐसे अशुभ लक्षणों के उदित होने पर योगसाधना,धर्मसाधना का अवलम्बन करे वा काशीवास करे ।

दुःस्वप्न के निवारण के लिए भी शास्त्रों में उपाय सुझाये गए हैं । यथा- जगने के बाद नित्यकृत्य से निवृत्त होकर आदित्यहृदय स्तोत्र, दुर्गाकवच, नारायण कवच,शिवमहिम्नस्तोत्र,शिवपंचाक्षर मन्त्र,नवार्ण मन्त्र आदि जो भी साधित हो जिसका उसका जप-पाठादि सम्पन्न करे- विधिवत संकल्प पूर्वक । कुछ ना कर सके तो कम से कम निरन्तर भगवन्नाम चिन्तन तो कर ही सकता है ।। हरिऊँतत्सत् ।।

सम्वत् २०७६ का साम्वत्सरिक राशिफल




सम्वत् २०७६ का साम्वत्सरिक राशिफल एवं कुछ अन्य खास बातें   :-----

             सम्वत् २०७६ का नया पंञ्चाग दिनांक ६ अप्रैल २०१९ से लागू हो गया है, जो आगामी २४ मार्च २०२० तक जारी रहेगा ।
            आंग्ल नववर्ष (कैलेन्डर इयर) प्रारम्भ होने के बाद कई बन्धुओं ने आग्रह किया था राशिफल पोस्टिंग के लिये, किन्तु पुराने सम्पर्की बन्धु जानते हैं कि मैं साम्वत्सरिक राशिफल ही पोस्ट करता हूँ। हर वर्ष की भांति इस बार भी वार्षिक (साम्वत्सरिक) राशिफल प्रस्तुत किया जा रहा है। किन्तु इससे पूर्व नये सम्वत् के सम्बन्ध में कुछ खास बातें जानने योग्य हैं, जिन्हें यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।
वर्ष के प्रारम्भ में  परिधावीनामक सम्वत्सर रहेगा, किन्तु वैशाख शुक्ल सप्तमी,शनिवार, दिनांक ११ मई २०१९ को (गया समयानुसार) दिन में १ बजकर १४ मिनट से प्रमादीनामक सम्वत्सर का प्रवेश हो जायेगा, परन्तु वर्ष पर्यन्त संकल्पादि में परिधावी’  नामक सम्वत्सर का ही प्रयोग करना चाहिए, क्यों कि नियम है कि वर्षप्रवेश में जो नामधारी है, वही आगे भी संकल्पित होना चाहिए। ऐसा प्रायः हर वर्ष ही होता है।
इस सम्वत् २०७६ के प्रवेश के साथ-साथ कलियुग का ५१२० वर्ष व्यतीत हो जायेगा। प्रत्येक सम्वत्सर के एक राजा और मंत्री हुआ करते हैं, जिनके स्वभावानुसार प्रजाजन सुख-दुःखादि भोग करती है। इस सम्वत्सर के राजा शनि और मंत्री सूर्य हैं । ये गत सम्वत् के ठीक विपरीत स्थिति है। भले ही पिता-पुत्र का सम्बन्ध है इन दोनों में, किन्तु ग्रहमैत्रीचक्रानुसार परस्पर शत्रुभाव है,परिणामतः शासकों में भी परस्पर मतान्तर बहुल, विरोधी स्थिति देखी जा सकती है। एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना बनी रहेगी, जिससे राष्ट्र के सम्यक कल्याण में बाधायें आयेंगी । जगल्लग्न के अनुसार इस बार भी लग्नेश बुध ही हैं।बुध के सप्तम स्थान में यानी नीचराशिगत होने के कारण वैश्विक स्तर पर राष्ट्र की प्रतिष्ठा और वर्चश्व का संकेत तो है, किन्तु यदाकदा किंचित पड़ोसी राष्ट्रों से तनावपूर्ण वातावरण भी बना रह सकता है। हालाकि राष्ट्र का उत्तरोत्तर विकास दीख रहा है। प्रशासनिक व्यवस्था पहले की अपेक्षा चुश्तदुरुस्त होने के आसार हैं। फिर भी प्रशासन के प्रति जनाक्रोश देखा जायेगा,क्यों कि अफसरशाही का बोलबाला भी रहेगा । विदेशी राजनयिकों की भारत यात्रा की सम्भावना में वृद्धि होगी। राष्ट्रीय राजनैतिक दलों में आपसी खींचतान की स्थिति से अान्तरिक कलह की स्थिति प्रायः बनी रहेगी । सैन्य-शक्ति का भी विकास होगा। अन्तरिक्षीय अनुसंधान कार्य में आशातीत प्रगति होने की सम्भावना है। विश्व बाजार में भारत की स्थिति पहले से भी सुदृढ़ होगी । अनेक राष्ट्रों से नये सम्बन्ध स्थापित होंगे । वर्षलग्नानुसार इस वर्ष कर्कलग्न में वर्ष का प्रवेश हो रहा है, जिसके अधिपति चन्द्रमा त्रिकोणस्थ और मित्रगृही हैं ,जो प्रशासनिक सुधार और सीमा-सुरक्षा का संकेत दे रहा है । पर्यटकों के विशेष आगमन से विदेशी मुद्रा का आवक होगा,जिससे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा । यातायात और परिवहन का भी प्रचुर विकास होगा । राष्ट्रीय आयात-निर्यात में भी वृद्धि होगी । विभिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में केन्द्रीकरण होगा । 
आर्द्राप्रवेशांक के विचार से (वर्षा-विचार के अनुसार) एक ओर उत्तम वृष्टि-योग दीख रहा है,तो दूसरी ओर जलप्लावन और कहीं-कहीं सुखाड़ जैसी स्थिति भी हो सकती है। फिर भी कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बर्षा अच्छी होगी । खरीफ की फसल पूर्व की अपेक्षा अच्छी होगी,किन्तु रबी का उत्पादन किंचित न्यून हो सकता है। किंचित प्राकृतिक आपदायें भी देश को झेलनी पड़ सकती हैं,जिससे कृषि, खनिज तथा रासायनिक पदार्थों को नुकसान होगा। फलों और सब्जियों का उत्पादन भी अच्छा होगा ।
सम्वत् २०७६ में विश्व में कुल तीन ग्रहण होंगे- दो सूर्यग्रहण एवं एक चन्द्र ग्रहण,जिसमें भारतवर्ष में एक सूर्यग्रहण और एक चन्द्रग्रहण ही दृश्य होगा। ये खण्डग्रास चन्द्रग्रहण आषाढ़ पूर्णिमा मंगलवार १६/१७ जुलाई २०१९ को मानक समयानुसार रात्रि एक बजकर इकतिस मिनट से रात्रि चार बजकर तीस मिनट तक होगा। दूसरा दृष्यमान सूर्यग्रहण पौषकृष्ण अमावस्या गुरुवार २६ दिसम्बर २०१९  को दिन में आठ बजे से ग्यारह बजकर चौदह मिनट तक होगा । ये सूर्यग्रहण भारत के अधिकांश भागों में खण्डग्रास के रुप में दीखेगा,तो किंचित भागों में कंकणाकृति रुप में ।

अब यहां आगे क्रमशः मेषादि बारहों राशि के जातकों के लिए संक्षिप्त राशिफल प्रस्तुत किया जा रहा है। आमतौर पर सीधे अपनी राशि जानकर फल देख लेने की परम्परा है; किन्तु इस सम्बन्ध में मैंने पिछली बार भी कहा था,पुनः स्मरण दिला रहा हूँफल-विचार सिर्फ राशि से न करके, लग्न से भी करें। जैसे - मेरी राशि कुम्भ है और लग्न सिंह । सटीक फल विचार के लिए राशिफल-विवरण में दिए गये दोनों फलों का विचार करके निश्चय करना चाहिए । मान लिया कुम्भ राशि का फल उत्तम है, किन्तु सिंह लग्न का फल प्रतिकूल है । ऐसी स्थिति में निश्चयात्मक परिणाम मध्यम होगा ।
            दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि आपके नाम का प्रभाव भी सामान्य जीवन में काफी हद तक पड़ता है। हमारे यहां विधिवत नामकरण-संस्कार की परम्परा थी । नाम सार्थक हुआ करते थे, उनका निहितार्थ हुआ करता था; किन्तु अब तो इंगलैंड-अमेरिका के कुत्ते-विल्लयों का नाम हम अपने बेटे-बेटियों का रखकर गौरवान्वित होते हैं । नियमतः नाम के प्रथमाक्षर के अनुसार बनने वाली राशि के फल का भी विचार कर लेना चाहिए । इस प्रकार त्रिकोणीय दृष्टि से राशिफल-विचार करना सर्वोचित है ।
            एक और,सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य, जिसे लोग प्रायः नजरअंदाज कर देते हैंव्योम-मण्डल में सत्ताइस नक्षत्र और बारह राशियों के परिक्रमा-पथ पर विचरण करते हुए सूर्यादि नवग्रह (ध्यातव्य है कि अरुण, वरुण, यम को प्राचीन भारतीय ज्योतिष में स्थान नहीं है) भूमण्डलीय समस्त पद-पदार्थों को प्रभावित (नियन्त्रित) कर रहे हैं। विश्व की आबादी सात अरब से भी अधिक की है। इन्हें मात्र बारह भागों में विभाजित करके किसी ठोस फलविचार / निर्णय पर पहुँचना कितना बचकाना (नादानी) हो सकता है? सिर्फ राशि वा लग्न के आधार पर मनुष्य मात्र को बांट देना क्या सही और समुचित नियम हो सकता है? आपका उत्तर भी कदापि नहींही होगा। आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, शारीरिक, मानसिक आदि कई मापदण्ड होंगे इन्हें प्रभावित करने हेतु । इसके साथ ही अलग-अलग व्यक्तियों के जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति, तथा वर्तमान (गोचर) स्थिति आदि कई बातों पर किसी व्यक्ति का वर्तमान और भविष्य आधृत होता है । राशि तो मात्र जन्मकालिक चन्द्रमा की स्थिति को ईंगित करता है और लग्न जन्मकालिक कक्षों (भावों) की सांख्यिकी मात्र है। अतः फलविचार कितना सार्थक-कितना निरर्थक हो सकता है, आप स्वयं समझ सकते हैं। पुनः यह कहना आवश्यक नहीं रह जाता कि राशिफल के आधार पर अपने जीवन को आशा-निराशा, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के झूले में हिचकोले खाने से बचावें और अपना तात्कालिक कर्म यथोचित रीति से करने का प्रयास करें। अस्तु।

            सुविधा के लिए अबकहा चक्र-सारणीभी राशिफल के साथ प्रस्तुत है । इससे उन लोगों को भी लाभ होगा, जिन्हें अपनी राशि और जन्म-समय आदि की सही जानकारी नहीं है।
                         
                      विक्रम सम्वत् २०७६,शकाब्द १९४१,खृष्टाब्द २०१९-२०२०
                     { ६ अप्रैल २०१९ से २४ मार्च २०२० तक का राशिफल }
                                   बारह राशियों का क्रमानुसार फल-विचार

१.मेष राशि- (चू,चे,चो,ला,ली,लू,ले,लो,अ) - मेष राशि वाले लोगों के लिए यह वर्ष (संवत्)सामान्य सुखकारी होगा । कार्य सिद्धि में गति धीमी रहेगी । सन्तोषजनक विकास-कार्य नहीं हो पायेंगे । पूर्व संचित  धनराशि का अकारण व्यय हो सकता है । अकारण वाद-विवाद की स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है । वालवृन्द की तरक्की सामान्य होगी । भूमि-भवन-वाहनादि क्रय व निर्माण कार्य में सावधानी वरतनी चाहिए ।  माता-पिता के साथ भी अकारण मतभेद होसकते हैं । मेषराशि जातक विद्यार्थियों के लिए भी समय बहुत अनुकूल नहीं दीखता । आर्थिक स्थिति में काफी उतार-चढ़ाव की आशंका है । वैवाहिक जीवन सुखद रहना चाहिए । व्यापार के क्षेत्र में नये कार्य की योग दीख रहा है । नौकरी पेशा वालों को विशेष संघर्ष करना पड़ सकता है । वर्ष का तीसरा,सातवां और नौवां महीना अनिष्टकर है ।ध्यातव्य है कि महीनों की गणना हिन्दी चान्द्रमास यानी चैत्र,वैशाख आदि करें। न कि जनवरी-फरवरी। मेष राशि और मेष लग्न वाले लोगों के लिए लाल चन्दन का तिलक लगाना लाभ दायक होगा। अपने आराध्यदेव की उपासना नियमित करते रहें। इससे ग्रहजनित बाधाओं में शान्ति मिलेगी। साथ ही जन्म कुण्डली के अनुसार भी महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि पूर्ण सफलता लब्ध हो सके। अस्तु।
२.वृष राशि- (ई,,,,वा,वी,वू,वे,वो)- वृष राशि वालों के लिए यह संवत् सामान्यतया शुभदायक रहेगा। ध्यातव्य है कि शनि की लघुकल्याणी(अढ़ैया)का प्रभाव गत सम्वत से ही जारी है,इसके फलस्वरुप व्यर्थ की चिन्ता,भागदौड़,परेशानी,आर्थिक क्षति,पारिवारिक कलह-विवाद,मित्रों से वैर आदि का सामना करना पड़ सकता है। । आर्थिक मामलों में सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए । भूमि-भवन-वाहनादि के लिए समय अनुकूल प्रतीत हो रहा है । माता-पिता की सेवा करना और सलाह का सौभाग्य लेना चाहिए । सामाजिक मानापमान के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। प्रेम-सम्बन्धों में सावधानी वरतनी चाहिए,अन्यथा काफी परेशानी हो सकती है। वैवाहिक जीवन में सामान्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। सन्तान-सुख का लाभ मिलना चाहिए । न्यायिक मामलों में प्रगति धीमी रहेगी । अध्ययन-अध्यापन में किंचत बाधायें आ सकती हैं। बालवृन्द को शारीरिक कष्ट की आशंका रहेगी। विरोधियों का शमन होगा। शत्रु पराजित होंगे। किन्तु दूसरी ओर अकारण मित्रों से विरोध भी हो सकता है। नेत्र विकार जनित परेशानी का विशेष सामना करना पड़ सकता है। व्यापार के क्षेत्र में कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। नौकरीपेशा लोगों को किंचित अतिरिक्त भार बहन करना पड़ सकता है। शेयर,सट्टे आदि से जुड़े लोगों को सावधानी पूर्वक निर्णय लेने की आवश्यकता है। वाहन चालकों को जरा सावधान रहना चाहिए। दुर्घटना होने की आशंका अधिक है। पूर्वार्द्ध की अपेक्षा वर्ष का उत्तरार्द्ध अधिक उलझन पूर्ण हो सकता है। वर्ष के चौथे,छठे और बारहवें महीने कष्टप्रद होगें। अशुभ फलदायी होने के कारण इन महीनों में किसी तरह की नयी योजना न बनायें। शिव की आराधना से विशेष लाभ होगा। शनि की प्रसन्नता हेतु यथासम्भव सामान्य आराधना(दीपदान,पीपल-दर्शन,जल दानादि) शनिवार को अवश्य करें। शनिस्तोत्र का पाठ करना लाभदायक होगा। संस्कृत का जिन्हें अभ्यास नहीं है, वे लोग शनि-चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। अभिमन्त्रित किया हुआ छतिवन की जड़ या छाल ताबीज में भर कर धारण करें। तत्काल शान्ति मिलेगी। साथ ही अपने आराध्यदेव की उपासना नियमित रुप से करते रहें। इससे ग्रह जनित बाधाओं में शान्ति मिलेगी। जन्म कुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके। अस्तु।

३.मिथुन राशि- (का,की,कु,,,,के,को,हा)- मिथुन राशि वालों के लिए यह संवत्सर अपेक्षाकृत विशेष शुभदायक रहेगा। उन्नति के नये मार्ग खुलने के आसार दीख रहे हैं । आर्थिक विकास के नये आयाम बन सकते हैं । सम्पत्ति अर्जन का योग भी दीख रहा है । नये और प्रतिष्ठित व्यक्तियों का साथ और सहयोग मिल सकता है । प्रेम सम्बन्धों में दृढ़ता आयेगी । अध्ययन-अध्यापन में किंचित बाधायें आ सकती हैं। स्वास्थ्य सम्बन्धी बाधायें भी झेलनी पड़ सकती हैं । बालवृन्द को शारीरिक कष्ट की आशंका रहेगी। परिवार में मांगलिक कार्य- विवाहादि की योजना बन सकती है। तीर्थयात्रा के भी संयोग दीख रहे हैं। धार्मिक कृत्यों में भाग लेने के अवसर भी बनेंगे। व्यापारी वर्ग को पूर्व की अपेक्षा अधिक लाभ होने की सम्भावना है। विद्यार्थियों के लिए ये वर्ष उत्तम प्रतीत हो रहा है।  वर्ष के चौथे,पांचवें और नौवें महीने अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में कोई नयी कार्ययोजना बनाने और उस पर पहल करने से परहेज करें। कटहल का पका हुआ फल मौसम में उपलब्ध हो तो एक-दो बार अवश्य खा लें। कटहल की पत्तियों पर लड्डुगोपाल की मूर्ति को स्थापित कर नित्य पूजन करें। आशातीत लाभ होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।

४.कर्क राशि - (ही,हू,हे,हो,डा,डी,डू,डे,डो)- कर्क राशि के जातकों के लिए यह संवत् सामान्य शुभदायक रहेगा। विशेष आर्थिक लाभ की सम्भावना नहीं है । शारीरिक स्वास्थ्य में भी उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी रहेगी । पूर्व से चली आ रही (पुरानी) बीमारी में किंचित सुधार की सम्भावना है । विरोधियों का बोलबाला रह सकता है । अकारण वाद-विवाद की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। व्यर्थ के भागदौड़ और आर्थिक दबाव के कारण मानसिक स्थिति तनावपूर्ण रह सकती है । पारिवारिक सुख-शान्ति सामान्यतया सही रहेगा । भाई-बन्धुओं की उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे । तत्जनित भागदौड़ करनी पड़ सकती है। खाने-पीने की चीजों में लापरवाही न वरतें । भोज्यपदार्थों की विषाक्तता (फुडप्वॉयजनिंग)  की वेदना झेलनी पड़ सकती है । सामाजिक कार्य और प्रतिष्ठा में वृद्धि के आसार हैं । विद्यार्थियों के लिए ये वर्ष उत्तम प्रतीत हो रहा है । परीक्षा-परिणाम विशेष रुप से अनुकूल होने की आशा है । जीवन के अन्य कार्यों में भी सफलता मिलेगी । प्रेम-प्रसंग में स्थायित्व बना रहेगा । वैवाहिक जीवन में सुख-शान्ति सामन्जस्य बना रहेगा । तीर्थ-यात्रायें हो सकती हैं । व्यापारिक स्थिति में काफी उतार-चढ़ाव की स्थिति  बनी रह सकती है । नौकरी पेश लोगों के लिए शुभसंकेत मिल रहे हैं । वर्ष के दूसरे,सातवें और दशवेें महीने किंचित अनिष्टकर हैं।   अतः इन महीनों में कोई नयी कार्ययोजना बनाने और उस पर पहल करने से परहेज करें। पलाश के चार बीज लाल कपड़े में वेष्ठित(बांध कर) ताबीज की तरह धारण करें। पलाश की लकड़ी और गोघृत से सोमवार की रात्रि में विधिवत हवन करें। इन उपचारों से बड़ी शान्ति मिलेगी और सामयिक संकटों का निवारण भी होगा। सम्प्रति जारी उभय दशापतिग्रहों की शान्ति पर भी ध्यान देना चाहिए। अस्तु।

५.सिंह राशि - (मा,मी,मू,मे,मो,टा,टी,टू,टे)- सिंह राशि वालों के लिए यह संवत्सर सामान्य शुभदायक रहेगा। उन्नति के नये मार्ग दृष्टिगत होंगे । हालाकि काफी संघर्षपूर्ण स्थिति रहेगी। कार्यक्षेत्र में परेशानी के कारण मानसिक तनाव बना रह सकता है । स्थानान्तरण के योग भी दीख रहे हैं। स्वास्थ्य सम्बन्धी छोटी-मोटी परेशानियां हो सकती हैं। भाई-बहनों के साथ सहयोगपूर्ण वातावरण बनेगा। भूमि-भवन-वाहन सम्बन्धी  विशेष सुख-सुविधा का योग बन रहा है। माता-पिता का स्वास्थ्य किंचित बाधित रहेगा। विद्यार्थी वर्ग को पूर्व की अपेक्षा अधिक संघर्षशील होना पड़ेगा । वैवाहिक जीवन में किंचित मतभेद और तनावपूर्ण स्थिति झेलनी पड़ सकती है। धार्मिक कृत्य में भाग लेने के सुअवसर मिलेंगे। नौकरीपेशा लोगों को स्थान परिवर्तन  करना पड़ सकता है। वर्ष के पहले,छठे और ग्यारहवें महीने किंचित अनिष्टकर हैं।  अतः अच्छा होगा कि इन महीनों में कोई नयी योजना पर अमल न करें। विविध कष्टों के निवारण के लिए शिव एवं हनुमद् आराधना शान्तिदायक होगी। वटवृक्ष का वरोह(ऊपर से नीचे की ओर लटकती जड़ें) जल में घिस कर तिलक लगायें। वरोह का छोटा टुकड़ा ताबीज में भर कर धारण करना भी लाभदायक होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।

६.कन्या राशि- (टो,पा,पी,पू,,,,पे,पो)- कन्या राशि वालों के लिए यह संवत्सर मानसिक चिन्ता तथा पारिवारिक विवादों वाला होगा, क्यों कि शनि की अढ़ैया का प्रबल प्रभाव पूर्ववत जारी है। आगे   फाल्गुन कृष्ण नवमी,सोमवार तदनुसार १७ फरवरी २०२०ई. के बाद ही शनि जनित चिन्ताओं से मुक्ति मिलेगी। अनावश्यक दौड़-धूप करना पड़ेगा। घरेलू कार्यों में बाधायें आयेंगी और विशेष दौड़धूप भी करना पड़ सकता है। किसी कार्य में पर्याप्त मेहनत के बावजूद असफलता अधिक मिलेगी। मित्रों और प्रियजनों से अकारण विवाद हो सकता है। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में वाधायें आयेंगी। बाल-बच्चों को शारीरिक पीड़ा हो सकती है। उनके स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना होगा। समाज-सेवियों के लिए ये वर्ष अधिक संघर्ष-पूर्ण होगा। वर्ष के पहले,सातवें और बारहवें महीने अधिक प्रतिकूल हो सकते हैं।  अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें। ध्यातव्य है कि महीनों की गणना चैत्रादि क्रम से ही करें । शनि की आराधना यथा सम्भव करना लाभदायक होगा। आम के कच्चे और पके फलों को ब्राह्मण, भिखारियों और आत्मीय जनों में बांट कर, सबसे अन्त में स्वयं भी खा लें। अद्भुत लाभ होगा। सम्भव हो तो आम के वृक्ष में नियमित जल डालें। यह भी आपके लिए लाभदायक होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।

७.तुला राशि- (रा,री,रु,रे,रो,ता,ती,तू,ते)- तुला राशि वालों के लिए यह सम्वत् विशेष शुभदायक हो सकता है। पूर्व से बन रही योजनायें सफल होंगी। पारिवारिक वातावरण सुखप्रद होना चाहिए । किसी कार्यवश सुदीर्घ यात्रा का योग भी बन सकता है। मित्रवर्ग से सहयोग मिलेगा और पूर्व से रुके हुए काम में सफलता मिलेगी । रुका हुआ धनलाभ भी हो सकता है। संगीत और कला के प्रति अभिरुचि बढ़ेगी । भाई-बन्धुओं से सौहार्द्र की स्थिति बनी रहेगी । सम्पत्ति के क्रय-विक्रय के लिए ये वर्ष शुभकारी प्रतीत हो रहा है। फिर भी सोच-समझ कर कदम उठायें । वर्ष के प्रारम्भ में चोट-चपेट का सामना करना पड़ सकता है। माता-पिता को शारीरिक कष्ठ हो सकते हैं। पति / पत्नी का स्वास्थ्य वाधित रह सकता है। व्ययाधिक्य के कारण चिन्ता बनी रह सकती है। विशेषकर रोग बीमारियों पर अधिक व्यय होने की आशंका है। सरकारी नौकरी पेशा वालों की व्यस्तता बढ़ सकती है। विद्यार्थियों और प्रतियोगिता में लगे छात्रों को सामान्य लाभ मिलेगा। परिवार में खासकर बच्चों और पति / पत्नी के बीच आपसी विवाद अकारण उत्पन्न हो सकता है। किसी निकट सहयोगी का वियोग भी सहना पड़ सकता है । विरोधियों का दबाव बना रहेगा । वर्ष के तीसरे,पांचवें,नौवें और बारहवें महीने किंचित कष्टप्रद होंगे।  अतः इन महीनों में कोई नयी योजना न बनायें। ध्यातव्य है कि महीनों की गणना चैत्रादि क्रम से करें। मौलश्री(बकुल) के पुष्प उपलब्ध हों तो उन्हें भगवान विष्णु (राम,कृष्णादि किसी विग्रह) पर अर्पित करें। मौलश्री की छाल को चूर्ण बनाकर ताबीज में भरकर धारण करें। विशेष लाभ होगा। जन्मकुण्डली के अनुसार महादशा एवं अन्तर्दशापतियों की शान्ति के लिए जप-हवन आदि नियमित करना/कराना चाहिए। ताकि विशेष लाभ हो सके।  अस्तु।

८.वृश्चिक राशि- (तो,ना,नी,नू,ने,नो,या,यी,यू)- वृश्चिक राशि वालों के लिए यह वर्ष पहले की अपेक्षा काफी अच्छा होगा। हालाकि लम्बे समय से चली  आ रही शनि की साढ़ेसाती का उतरता हुआ दौर अब प्रारम्भ हो चुका है,यानी शनि महाराज वृश्चिक राशि वालों के पैर की ओर काफी नीचे उतर आये हैं। इस कारण पहले की अपेक्षा काफी राहत महसूस होगी। फिर भी आगे फाल्गुन कृष्ण नवमी,सोमवार तदनुसार १७ फरवरी २०२०ई. के बाद ही शनिजनित चिन्ताओं से पूर्ण रुप से मुक्ति मिलेगी। लम्बित कार्यों और स्थितियों में यत्किंचित सुधार प्रतीत होगा। सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ प्रभावशाली कार्यों को करने का अवसर भी मिलेगा, जिससे सुख-शान्ति मिलेगी। निरर्थक दौड़-धूप और अकारण उलझनों का सामना भी करना पड़ सकता है। खान-पान पर विशेष ध्यान देते हुए सावधानी वरतें। परिवार में कुछ मांगलिक कार्य सम्पन्न होने की आशा है। जमा पूंजी का शुभकार्यों में व्यय होगा । बाल-बच्चों को शारीरिक पीड़ा हो सकती है। अध्ययन-अध्यापन में बाधायें आ सकती हैं । विद्यार्थीवर्ग को अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। माता-पिता के साथ सम्बन्ध सुखमय होंगे। न्यायिक कार्यों में सफलता मिलेगी । पुराने चले रहे वादों का निपटारा होगा । पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद  समाप्त होकर, प्रेम-सौहार्द्र की स्थिति बनेगी। इस प्रकार वैवाहिक जीवन सुखद होगा । आर्थिक स्थिति में किंचित उतार-चढ़ाव बना रहेगा लगभग पूरे वर्ष में ।  नये व्यापार की योजना भी बन सकती है। नौकरीपेशा वालों की व्यस्तता बढ़ेगी और नयी उलझनें भी खड़ी हो सकती है। वर्ष के पहले,तीसरे और दसवें महीने किंचित कष्टकर हो सकते हैं। इन महीनों में कोई नयी योजना पर कार्यान्वयन न करें। शनि की साढ़ेसाती का समुचित शमन करके उचित लाभ प्राप्ति हेतु शनि की यथोचित आराधना- जप,हवन,पाठ आदि करते रहना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि जिनकी जन्म कुंडली में शनि उच्च के होकर शुभस्थानों में बैठें हों उन्हें शनि की शान्ति हेतु हनुमान जी की आराधना नहीं करनी चाहिए,वल्कि सीधे शनि की आराधना ही श्रेयस्कर है।  ध्यातव्य है कि वर्ष के अन्दर शनि की  वक्री-मार्गी गति परिवर्तन के कारण साढ़ेसाती का प्रभाव किंचित बढ़ेगा और घटेगा भी, किन्तु इससे विशेष चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अपना सामान्य प्रयास जारी रखें। शान्ति-लाभ होगा। खैर की लकड़ी और घी से मंगलवार को दोपहर में यथोचित हवन करें। पान यदि खाते हों तो कत्था अधिक खायें। इन उपचारों से यथोचित लाभ मिलेगा। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।

९.धनु राशि - (ये,यो,भा,भी,भू,,,,भे)- धनु राशि वालों के लिए यह  संवत्सर प्रायः कष्ट और चिन्ताओं से घिरा हो सकता है। शनि के संचरण से साढ़ेसाती का प्रभाव जारी रहेगा, क्यों कि शनि का मध्य पाद इस राशि पर पूर्व की भांति ही  है। यानी धनुराशि वालों के हृदय स्थल पर शनि का प्रकोप है। वर्ष के अन्दर इनका वक्री-मार्गी संचरण भी होगा, जिसके कारण परेशानियां कमोवेश होती प्रतीत होंगी। फिर भी कुल मिलाकर शनि का गहरा दुष्प्रभाव बना ही रहेगा। निरर्थक दौड़धूप,मानसिक तनाव,परेशानी,सन्ताप, उद्विग्नता, आर्थिक-शारीरिक क्लेश आदि प्रायः वर्ष पर्यन्त झेलने पड़ेंगे। विशेष कर उदर व्याधि की आशंका है। आर्थिक कठिनाई, स्वजनों से अकारण वैर-विरोध,पारिवारिक अशान्ति का वातावरण बना रहेगा। अर्थ व्यवस्था के लिए कठोर संघर्ष करना पडेगा। स्वास्थ्य के प्रति विशेष सचेष्ट रहने की आवश्यकता है। लम्बे समय से रुके हुए कुछ कार्य सम्पादित हो सकते हैं। भूमि-भवन-वाहनादि के क्रय-विक्रय में सावधानी वरतें। सन्तान पक्ष से किंचित चिन्ता की स्थिति बन सकती है। उनके स्वास्थ्य को लेकर विशेष रुप से परेशानी उठानी पड़ सकती है। नये कार्यों का भी अवसर मिल सकता है। किन्तु सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। रोग-व्याधि में धन का अपव्यय होगा। शत्रुपक्ष की प्रबलता भी दीखेगी। वर्ष का दूसरा,चौथा,छठा और नौंवा महीना विशेष कष्टप्रद हो सकता हैं। ध्यातव्य है कि महीनों की गणना चैत्रादि क्रम से करें। अतः अच्छा होगा कि इन महीनों में कोई नयी कार्य-योजना न बनायें।  मुख्य रुप से शनि की आराधना पर ध्यान देना जरुरी है। साथ ही अन्य उपाय भी करने चाहिए। तात्कालिक महादशा और अन्तर्दशापतियों की यथोचित शान्ति का उपाय भी करना चाहिए। हल्दी का तिलक (स्त्रियों के लिए  पीला सिन्दूर का व्यवहार) लाभदायक होगा। अपने प्रिय देवता की आराधना करते रहें। विशेष कष्ट का निवारण अवश्य होगा। पीपल की लकड़ी और घी से प्रत्येक गुरुवार को यथोचित होम किया करें। इससे काफी राहत मिलेगी। जन्म कुंडली के तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ-साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।
१०.मकर राशि- (भो,जा,जी,खी,खू,खे,खो,गा,गी)- मकर राशि वालों के लिए यह संवत्सर प्रायः कष्ट और चिन्ताओं से घिरा हो सकता है। शनि के संचरण से साढ़ेसाती का प्रभाव अभी जारी रहेगा, क्यों कि शनि का अग्र पाद इस राशि पर आरुढ़ है। इस प्रकार मकर राशि वालों का शिरोभाग शनि के चपेट में आया हुआ है। वर्ष के अन्दर इनका वक्री-मार्गी संचरण भी होगा, जिसके कारण परेशानियां कमोवेश होती प्रतीत होंगी। फिर भी कुल मिलाकर शनि का गहरा दुष्प्रभाव बना ही रहेगा। निरर्थक दौड़धूप, मानसिक तनाव, परेशानी, सन्ताप, उद्विग्नता, आर्थिक-शारीरिक क्लेश आदि प्रायः वर्ष पर्यन्त झेलने पड़ेंगे। विशेषकर मानसिक संताप अधिक झेलना पड़ सकता है। किसी बात में अनिर्णय की स्थिति बनी रह सकती है। हालाकि कोई निर्णय बहुत सोच-विचार कर और अनुभवियों की राय से ही करनी चाहिए। क्यों कि शनि के प्रभाव से गलत निर्णय (गलत कदम) की अधिक आशंका है। वाहन दुर्घटना हो सकती है। माता-पिता को शारीरिक पीड़ा हो सकती है। वर्ष के उत्तरार्द्ध में परिवार में रोग-शत्रु की बढ़ोत्तरी हो सकती है। नौकरी पेशा वालों को समय पर वेतन आदि न मिलने के कारण आर्थिक संकट झेलना पड़ सकता है। नौकरी में स्थानान्तरण  के योग भी बन सकते हैं। व्यापारी वर्ग के लिए भी ये वर्ष आर्थिक रुप से सुखद नहीं कहा जा सकता । साझेदारी के कार्यों में वाधायें आयेगी। ऑपरेशन की स्थिति भी बन सकती है। राजनैतिक सम्बन्धों में मजबूती आयेगी। वर्ष के पांचवें,सातवें और बारहवें महीने प्रायः अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में किसी प्रकार की नयी योजना बनाने से बचें। शीशम(विशेष कर काला शीशम) के फूल शीशे के पात्र में भर कर घर में सुविधानुसार किसी ऐसे स्थान पर  रखे दें जहां नित्य उन पर दृष्टि पड़ सके। सड़ने से पहले उसे विसर्जित कर दूसरा फूल रख दें। अद्भुत लाभ होगा। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ-साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।

११.कुम्भ राशि- (गू,गे,गो,सा,सी,सू,से,सो,दा)- कुम्भ राशि वालों के लिए यह सम्वत्सर लाभकर और सुखदायक रहने की आशा है। पूर्व में किये गये प्रयासों में सफलता के फल लग सकते हैं। प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क बनेंगे । स्वास्थ्य प्रायः अनुकूल रहेगा । कार्यक्षेत्र की परेशानियां कम होंगी । फिर भी भाग-दौड़ की जिन्दगी गुजर सकती है। कार्य-व्यापार का विस्तार हो सकता है। नयी सम्भावनायें बन सकती है। किन्तु सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए। भवन-निर्माण के कार्य पूरे होने के आसार दीख रहे हैं। अन्यान्य अवरुद्ध कार्य में भी प्रगति आयेगी। रुका हुआ धन वापस मिल सकता है। अध्ययन-अध्यापन में अभिरुचि बढ़ेगी । रोग-बीमारी में धन का अकारण व्ययाधिक्य हो सकता है। वाहन दुर्घटना की आशंका है। चोट-चपेट,ऑपरेशन आदि की भी आशंका है। वर्ष के उत्तरार्द्ध में परेशानी अधिक हो सकती है। आकस्मिक धन-लाभ की भी सम्भावना है। विद्यार्थीवर्ग के लिए ये वर्ष अधिक संघर्षपूर्ण रहेगा । सन्तानपक्ष से मधुर सम्बन्ध रहेंगे । नौकरीपेशा लोगों की पदोन्नति हो सकती है। वर्ष के तीसरे,आठवें और दसवें महीने प्रायः अशुभ फलदायी हैं। अतः इन महीनों में किसी प्रकार की नयी योजना बनाने से बचें। सम्भव हो तो घर के पश्चिम दिशा में शमी का पौधा स्थापित करें और उसकी पत्तियां भगवान भोलेनाथ को नित्य अर्पित करें। शमी का फूल उपलब्ध हो तो उसे भी शिवार्पण करना चाहिए। शमी की लकड़ी और घी से शनिवार को संध्या समय हवन करने से विशेष लाभ होगा। शिव की आराधना लाभदायक होगी। तात्कालिक महादशा,अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ-साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु।

१२.मीन राशि-(दी,दू,,,,दे,दो,चा,ची) - मीन राशि वाले लोगों के लिए यह संवत्सर प्रायः शुभदायक रहेगा।  किन्तु कार्य प्रगति की गति धीमी होगी। रुके हुए कार्यों की सिद्धि होगी। वर्ष के प्रारम्भ में चोट-चपेट की आशंका है। आर्थिक मामलों में संघर्षपूर्ण स्थिति बनी रहेगी। स्वास्थ्य बाधा भी झेलनी पड़ सकती है। पारिवारिक मतभेद और आर्थिक क्षति का सामना भी करना पड़ सकता है। सम्पत्ति क्रय-विक्रय की स्थिति बनेगी। माता-पिता के स्वास्थ्य बाधित रहेंगे । विद्यार्थियों के लिए ये वर्ष कठिन श्रम-साध्य होगा। वैवाहिक जीवन में सुखद स्थिति रहेगी । कोर्ट-कचहरी के कार्यों में भाग-दौड़ करना पड़ेगा और अवांछित अर्थ-क्षय का सामना करना पड सकता है। व्यापारी वर्ग को विशेष उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। नौकरीपेशा वालों के लिए ये वर्ष उत्तम रहेगा।  वर्ष के छठे,नौवें और ग्यारहवें महीने किंचित कष्टप्रद होंगे। अतः उन महीनों में कोई नवीन कार्य की योजना न बनावें और न पहल करें।  नित्य वटवृक्ष में जल डालना, परिक्रमा करना, तथा वरोह वा वट-पत्र को तकिये में डाल कर सोने से चमत्कारी लाभ होगा। तात्कालिक महादशा, अन्तर्दशादि के ग्रहों का उपचार भी साथ साथ अवश्य करना चाहिए,ताकि विशेष लाभ हो। अस्तु। 
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