Sunday, 26 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःचौंतीसवां भाग

गतांश से आगे...

                     सोलहवें अध्याय का तीसरा भाग


कुलदेवी/देवता की प्राप्त(ज्ञात) नामावली—


१.     परमेश्वरी
२.     सिद्धेश्वरी
३.     भुवनेश्वरी
४.     कौलेश्वरी
५.     वागेश्वरी
६.     विन्ध्येश्वरी
७.     यक्षेश्वरी/यक्षणेश्वरी
८.     दक्षिणेश्वरी
९.     दक्षिणकाली
१०.कात्यायनी
११.काली
१२.कालरात्रि
१३.सती
१४.भगवती
१५.पद्मावती
१६.महालक्ष्मी
१७.उग्रतारा
१८.नवदुर्गा
१९.शक्ति
२०.चामुण्डा
२१.सिद्धमाता
२२.कालभैरव
२३.नरसिंह
२४.विष्णु
२५.सविता
२६.हनुमान
२७.सोखाबाबा
२८.चन्द्रमनबाबा
२९.ब्रह्मबाबा
३०.मातादाई
३१.नागदेवता
३२......

  
       उक्त नामावली से बिलकुल स्पष्ट है कि मातृकाशक्ति की प्रधानता रही है मगों में। साथ ही विष्णु और नरसिंह (एक सौम्य और दूसरा उग्र) को भी स्थान मिला है, तथा हनुमानजी भी इस सूची में हैं। दूसरी ओर बिलकुल हट कर- ब्रह्मबाबा, सोखाबाबा, चन्द्रमनबाबा और मातादाई भी घुसी हुयी हैं कुल परम्पराओं में । पुर परिचय अध्याय में दी गयी सारणी में भी देवता/देवी की चर्चा हुयी है- जहां रुद्र, ब्रह्मा और विष्णु ही प्रायः  कुलपूज्य माने गए हैं। दक्षिण-पश्चिम भारत में षोडश गोत्रीय सारणी में चामुण्डा, कालभैरव, गौरी आदि भी नाम मिलते हैं। कुछ अन्य नाम भी मिलते हैं, जिनसे उक्त मूलनामों के ही अपभ्रंसित होने का संकेत मिलता है।
हालाकि सनतकुमारसंहितान्तर्गत सिद्धेश्वरी स्तोत्रम् की निम्न पंक्तियों से ऐसा भी संकेत मिलता है कि शाकद्वीपीय मात्र की कुलदेवी सिद्धेश्वरी ही हैं। कालान्तर में किंचित कारणों से अन्य नाम,रुप की परम्परा बन गयी होगी। यथा—  
   शाकद्वीप कुलोद्धार कारिण्यै च नमो नमः ।
     शाकद्वीप प्रियायै च कुलदेव्यै नमो नमः ।।।।
     अष्टादश कुल पूज्यायै सिद्धिदायै नमो नमः ।
      सिद्धिदा श्रावणे मासे फाल्गुने सर्वकामिका ।।।।

 कुलदेवी/देवता की प्राप्त(ज्ञात)आकृतियाँ—
कुलदेवी/देवता की आकृति के सम्बन्ध में जानकारी एकत्र करने पर कुछ खास बातें समान रुप से मिली- गृहणी के हाथ का छापा- चौरेठ के घोल(ऐपन) में भिंगोयी हुयी दाहिनी हथेली का, देवता घर की दीवार पर छाप और उस पर ऊर्द्ध्वाधर सिन्दूरी रेखांकन । कहीं-कहीं हथेली का छाप न होकर, सिर्फ रेखाएं हीं । तो कहीं एक, तो कहीं दो मृत्तिका पिंडी—उसी तरह ताक या काष्ठ-पीठिका पर बनी हुयी। हथेली की छाप और सिन्दूर की रेखाओं की संख्या में काफी भेद मिला—एक,दो,पांच,सात, नौ, ग्यारह,सोलह, अठारह,बाइस इत्यादि । कुछ खास कुलों में हथेली की छाप के अतिरिक्त ऐपन से बना वित्ते भर का सुन्दर वृत्त और फिर वृत्त के मध्य भाग को सिन्दूर चर्चित किया हुआ भी मिला। हथेली की छापों को वर्गाकार या आयताकार मंडल से घेरा हुआ या कहीं बिना घेरे का भी होने की सूचना मिली । हां, घेरे के बाहर दायीं ओर एक और छोटे घेरे में अलग से एक या कहीं दो छापों की जानकारी भी मिली, जिसका नाम लोगों ने पखेजु या दाईमां बतलाया, जो पक्षेश की याद दिलाने वाली प्रतीत हुयी । कुछ एक कुल में (डोमरौर, अमारुत,गया) थापा, रेखा, वृत्त, पिंडी आदि से बिलकुल भिन्न आकृति भी ज्ञात हुयी—एक विन्दु से तीन दिशाओं में ऊर्ध्वगामी तीन रेखाएं सिन्दुर से खींची गयी, जो त्रिशूल का आभास दिला रही हैं। कुछ एक कुल में सीधे सूर्य बिम्ब पूजन की भी जानकारी मिली। वार (औरंगाबाद,बिहार) पुर अदैयार में नाम स्पष्ट है- सिद्धेश्वरी, जिनके प्रतीक स्वरुप दीवार पर नौ छापे हैं हथेलियों के, साथ ही थोड़ा हट कर एक और थापा है, जिन्हें नागदेवता के नाम से लवण रहित नैवेद्य अर्पित होता है। भलुनियार पुर ग्राम कनौंसी, गुरारु,गया के विप्रों से जानकारी मिली कि ये लोग मूलतः हैं तो भलुनी(रोहतास)के ही, जिनके मूलस्थान में श्रीदुर्गा स्वरुपा कुलदेवी हैं, जो दक्षिणेश्वरी/यक्षिणेश्वरी नाम से जानी जाती हैं। किन्तु वहां से कालवसात स्थानान्तरित होकर यहां आये लोग किसी प्रकार की आकृति की पूजा न करके मूल स्थान से निर्माल्य चन्दनादि से भित्ती लेपन करके पूजा करते हैं। एक विशेष बात इनलोगों से ज्ञात हुयी कि पुरुषों के लिए कुलदेवी का दर्शन भी निषिद्ध है। पूजनोपरान्त पट बन्द कर देने के बाद समीप जाकर, प्रणाम करते हैं, आरती लेते हैं। पूजन के प्रारम्भ में द्वार पर खड़े होकर संकल्पादि बोलने में स्त्री का सहयोग करते हैं। वहीं से ये भी जानकारी मिली कि उनके ही मूल के कुछ लोग जो बिहार (अब झारखंड) में जा बसे हैं, दुर्गादेवी के नाम से पूजते तो हैं, परन्तु छाग बलि का प्रयोग भी करते हैं। भलुनियार पुर (रामपुर,देवकुण्ड,औरंगाबाद) में १२+१०++थापा है,जिनमें प्रथम बारह को पुरुष रुप मानते हैं, जिनपर सिन्दूर नहीं लगाते। अगले दश पर सिन्दूर लगाते हैं। पुनः एक पखेजु के नाम से जाने जाते हैं, और इसके बाद थोड़ा हट कर मनतोड़ादाई और ब्रह्मबाबा के नाम से भी स्थान दिया हुआ है। ये लोग देवी का नाम सिद्धेश्वरी बतलाते हैं। खण्टवार पुर (कोतोगड़ा,गिरिडीह) से जानकारी मिली कि वहां की कुलदेवी विंध्येश्वरी हैं। सिन्दूर का एक टीका अपेक्षाकृत कुछ अधिक लम्बा है,जिनके आसपास अन्य तेरह टीकायें हैं, क्रमशः नरियारावीर,पख्खैवीर,ब्रह्मवीर, तथा जयन्त्यादि नौ दुर्गायें । मंडल के ईशानकोण में दक्षिणाभिमुख देवस्थान है। पूजन काल पुत्र-विवाह,अन्नप्राशन (मुंहजुट्ठी) तथा मुण्डन है। इन तीनों का प्रसाद भी भिन्न-भिन होगा। विवाह में अखरा बुन्दिया, अन्नप्राशन में हविष्य तथा मुण्डन में छागबलि । वैसे सामान्य तौर पर दुर्गापूजा (दशहरा) में मंडल से बाहर बने दुर्गा-मंडप में विशेष पूजा होती है, जहां छागबलि अनिवार्य माना जाता है। वुजुर्गों के बातचीत से प्रमाणित हुआ कि वस्तुतः ये दोनों दो कर्म हैं। ये सही है कि कुलदेवी में नवदुर्गा हैं, किन्तु बलि उस स्थान पर कदापि नहीं दिया जाता। वह तो बाहर के दुर्गा-मण्डप वाली दुर्गा के समीप दिया जाता है। और विशेषकर वालक के मुण्डन के उपलक्ष्य में ही। हां,ये सही है कि उसका प्रसाद परिवार के सभी लोग ग्रहण करते हैं।

     कुछ ऐसे परिवार(व्यक्ति)भी मिले जो गोपन परम्परा की अतिशयोक्ति स्वरुप, कुछ भी बताने से कतराये।

इस प्रकार शाकद्वीपियों के यहां परम्परा से पूजे जा रहे कुलदेवी/देवता के बारे में यथासम्भव जानकारी एकत्र करने का प्रयास किया । प्रायः लोग कुलदेवी/देवता के नाम से अपरिचित मिले । कुछ लोगों को तो आकृति का भी ज्ञान नहीं है। पूजा-कक्ष में दीवार में ताक, रेक या ऐसा ही कुछ बना हुआ है, जिस पर पीतल या तांबे का लोटा या तस्तरी है, या कहीं लकड़ी का छोटा पीढ़ा रखा हुआ है। कहीं खाली ताक मात्र है, जहां समयानुसार विधिहीन परम्परा से कुछ कोरम पूरा कर दिया जाता है। परिचय और इतिहास बतलाने वाले उनके पास कोई नहीं हैं, और कोई खास खोजी जिज्ञासा भी नहीं है। दैवयोग से परिवार में कोई विशेष अनिष्ट का सिलसिला लागातार दीखने लगे यदि, तो नींद खुलती है, और यहां-वहां अनाड़ी ओझा-गुनी-तान्त्रिकों के पास भटकने और ठगी के शिकार होने को विवश होते हैं। उन तथाकथित ओझाओं के लिए यह कह देना तो बड़ा आसान होता है कि आपके कुलदेवता विगड़े हुए हैं, इसी से कष्ट हो रहा है। किन्तु कुलदेवता का नाम, परिचय, आकृति, पूजाविधि आदि की जानकारी देना उनके वश की बात नहीं होती। अतः खूब हुआ तो पुरखों के नाम पर कुछ कर-करा दिया गया। आप भी सन्तुष्ट और ओझा भी तुष्ट।  किन्तु क्या इससे हमारी समस्या का सही हल मिल गया? कदापि नहीं।


 विभिन्न स्रोतों से अब तक प्राप्त कुछ नाम मिले हैं, जिसे ऊपर की तालिका में दर्शाया गया है। विशेष छानबीन करने पर ये भी ज्ञात हुआ कि समान पुर में भी स्थान-भेद वा गोत्र भेद से कुलदेवता/देवी भेद है। जैसे – पुण्यार्कपुर,मौद्गलगोत्र (महुआइन, गया) में दक्षिणेश्वरी उपासना की परम्परा है, तो इसी पुर के भारद्वाजगोत्र (गुमला,झारखंड)में परमेश्वरी पूजन की परम्परा है। इसी भांति उरवार पुर में मुख्य रुप से तो सिद्धेश्वरी परम्परा है, किन्तु चन्द्रपुरा(औरंगाबाद,बिहार) में इसी पुर में चन्द्रमनबाबा पूजे जा रहे हैं। इसी भांति अन्य पुरों में भी गोत्र भेद या स्थान भेद से देवता-भेद मिल रहा है। यहां एक बात गौर करने योग्य है कि बहुत से लोग अपने मूल स्थान (कुल) से विलग होकर मातृकुल, स्वसुरकुलादि में जा बसे। कोई फूआ,मौसी आदि के यहां भी तड़का(सम्पत्ति) पाकर वस गए। वैसे लोग अपना पुर-गोत्र तो वही याद रखे, जो उनका मूल है, किन्तु कुलदेवता स्थानान्तरित कुल वाले का पूजते रहे, और तदनुसार नाम भी उन्हीं का स्मरण रहा आगे की पीढ़ी में । स्वाभाविक नियम है कि एक व्यक्ति दो कुल की देवों की उपासना नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही जैसे दो नावों में सवार होकर जलयात्रा नहीं हो सकती । किसी एक को तो त्यागना ही होगा।
क्रमशः...

Thursday, 23 November 2017

शाकद्वीपीय ब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःभाग 33

गतांश से आगे...
सोलहवें अध्याय का दूसरा भाग..

          अब किंचित भिन्न दृष्टिकोण से देव-विस्तार पर विचार करें। तन्त्रात्मक सृष्टि-विस्तार को समझने का प्रयास करें तो प्रमाणिक रुप से पाते हैं कि निर्गुण-निराकार आद्यशक्ति सगुण-साकार होकर विन्दु का स्वरुप ग्रहण करती है। वस्तुतः विन्दु का आकार है भी और नहीं भी। उसी विन्दु का पुनः चतुर्दिक विस्तार होता जाता है। सृष्टि को दर्शाने वाले और पाये जाने वाले सारे यन्त्र और कुछ नहीं, वश विन्दु के विस्तार मात्र हैं। अपरिमित वृत्त,उसका केन्द्र,केन्द्र से परीधि की ओर गत्यमान रेखायें, उसका उभयदिक् (वृत्तीय) घूर्णन,घूर्णन काल में बनते उर्ध्वाधर विविध त्रिकोण और फिर त्रिकोण ही त्रिकोण...यही तो सृष्टि है।
और विपरीत विचार करें तो संहार कहलाता है। वृत्त,त्रिकोणादि सभी सिमट कर विन्दु में समाहित हो जाते हैं और फिर वह विन्दु भी महाशून्य में विसर्जित हो जाता है। वैसे ही जैसे मकड़ी अपने लार से जाले बुनती है और आवश्यकतानुसार उसे आत्मसात भी कर जाती है। पुनः-पुनः सृष्टि-पालन और संहार की ऐसी ही क्रिया दुहराई जाती है- अनादि और अनन्त । गंगा से भी पूर्व पवित्रतम नदी- पुनपुन के महत्त्व और औचित्य का रहस्य भी इसी में छिपा है- आदिगंगा पुनःपुनः...जो कि स्वतन्त्र रुप से गहन विचार का विषय है,किन्तु यहां इसकी गहनता में जाना उद्देश्य नहीं है।
शक्ति और शक्तिमान(शिव और शक्ति) का ही सम्यक् विस्तार है अखिल ब्रह्माण्ड । और पिण्ड तो ब्रह्माण्ड की ही प्रतिकीर्ति है। यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे, यत्  ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे—  इस बात से सभी अवगत हैं—जो ब्रह्माण्ड में हैं, वो सब पिण्ड में भी विद्यमान है। इसे समझाने,बुझाने, साधने,सधवाने वाला शास्त्र ही  वस्तुतः तन्त्र शास्त्र है। और सर्व तत्त्व विलेयक आकाश की तन्मात्रा का सम्यक् ज्ञान कराने वाला शास्त्र मन्त्र शास्त्र कहलाता है। महाण्ड के विस्फोट के समय जो प्रथम ध्वनि उत्पन्न हुयी थी, वह ओंकार की ध्वनि थी। यही कारण है कि यह महामन्त्र कहलाया । मन्त्रों का अथ और इति यही है। भूः,भुवः,स्वः ये तीन व्याहृतियाँ,जो साक्षात् सूर्य स्वरुपा हैं, इसी समय उत्पन्न हुयी। सच पूछा जाय तो ऊँ से भी सूक्ष्म है सूर्य का स्वरुप । कारण सूक्ष्म और सौर रुप से कार्य रुप स्थूल विश्व का आविर्भाव हुआ। तदनन्तर सभी ओर विखरे सौर किरणों से यह विश्व प्रकाशमान हो उठा। निखिल जगत के मूल कारण अविनाशी स्वरुप सूर्यनारायण सबके आदि में उत्पन्न होने के कारण आदित्य नामधारी हुए। तन्मुखादोमिति महानभूच्छब्दो महामुने । ततो भूस्तु भुवस्तस्मात् ततश्च स्वरनन्तरम् ।। एता व्याहृतयस्तिस्र्यः स्वरुपं तद्विवस्वतः । ओमित्यस्मात् स्वरुपात्तु सूक्ष्मरुपं रवेः परम् ।। (मार्कण्डेयपुराण अ.१०१ श्लो. २३,२४) इसी आदित्य के तेज से उत्पन्न हुए हैं मगविप्र,जिन्हें तन्त्र,मन्त्र और यन्त्र त्रिकुटी का महान ज्ञाता कहा गया है।
पुनः हम विन्दु पर आते हैं। हम जो ब्रह्म के एकोऽहं वहुस्यामः की बात करते हैं- वो और कुछ नहीं इस एकमात्र विन्दु का ही अनन्त विस्तार है। स्वाभाविक है कि विन्दु विस्तार पाकर रेखा में परिणत होगा । रेखा आगे बढ़कर अपरिमित अनादि वृत्त की परिधि का स्पर्श करेगी - उभय दिशा में । सच पूछें तो महाशून्य में ऊपर-नीचे,दायें-बायें तो कुछ होता नहीं। ये तो सापेक्षता-सिद्धान्त है सिर्फ । हम से वो की दूरी और दिशा का बोध...।  ये सब विविध दिक् संज्ञायें हम अपनी सुविधा और समझ के लिए विकसित किए हुए हैं- समयानुसार,आवश्यकतानुसार।
पुनः इसे जरा भौतिकी या रेखागणितीय शैली में समझने का प्रयास करते हैं— चुम्बक के छड़ में हम पाते हैं कि नैसर्गिक रुप से ऊर्जा-प्रवाह द्विविध होता है, इस प्रकार यह  निश्चित है कि उसका कोई मध्य विन्दु होगा। मध्य(केन्द्र)से सिर्फ किसी एक दिशा में शक्ति  प्रवाह कदापि हो ही नहीं सकता । जब भी होगा तो दो दिशाओं में, जो एक दूसरे के ठीक विपरीत होंगी ।  दो विपरीत दिशाओं में लगता हुआ (जाता हुआ) चुम्बकीय बल ही वृत्ताकार घूर्णन की क्षमता (ऊर्जा) प्रदान करता है । इसी कारण चुम्बकीय कम्पास का कांटा धूमता है, और हमें उत्तर-दक्षिण दिशाओं का बोध कराता है। वस्तुतः दोनों सिरायें परस्पर आकर्षण की स्थिति में होती हैं। एक ही चुम्बक दो दिशाओं में चुम्बकीय शक्ति से गति करता हुआ वृत्तीय पथ पर भ्रमण करता है। ध्यातव्य है कि उसका केन्द्र सदा स्थिर रहता है।  कल्पना करें कि चुम्बक के दोनों सिरों पर दो व्यक्ति बैठे हैं। यदि उनसे हम पूछें तो दोनों दो तरह की बात करेंगे- एक कहेगा कि हम पूरब जा रहे हैं और दूसरा कहेगा कि हम पश्चिम जा रहे हैं।  एक ही केन्द्र से निकलने वाला बल दो प्रकार का हो गया।

साधना जगत में मूल रुप से ये ही दो (विपरीत प्रतीत होने वाली) शक्तियां दो कुल कहे गए—एक श्रीकुल और दूसरा कालीकुल । तन्त्र की गहरी पैठ रखने वाले भलीभांति जानते हैं कि ये सब भेद, सारा बखेड़ा परिधि पर है। केन्द्र तो केन्द्र है। वहां कोई न श्री है और न काली । या कहें काली ही श्री हैं और श्री ही काली। वहां न वाम है और न दक्षिण । या ये भी कह सकते हैं कि वाम कब अचानक दक्षिण हो जाता है या कि दक्षिण कब अचानक वाम में बदल जाता है कहना कठिन है। तारापीठ जैसे सिद्ध वामस्थल पर महर्षि वशिष्ठ जैसे साधक को भ्रमित होना पड़ा है, फिर अन्य की क्या विसात ! रामकृष्ण परमहंस जैसे कालीमय विभूति को भी इस द्वन्द्व ने क्षण भर के लिए उलझा लिया था।


            खैर । तन्त्र की इस गहराई में ले जाना यहां मेरा उद्देश्य नहीं है। हमारा अभीष्ट है- शाकद्वीपियों के कुलदेवी/देवता की एकता/अनेकता पर विचार करना। और इससे भी पहले सीधे ये कहना-सोचना कि जब हम सूर्यतेजांश हैं, तो सीधे सूर्यविम्ब की उपासना-साधना क्यों न करके ये विविध देवी-देवताओं के चक्कर में पड़ गए। दूसरी बात विचारने वाली ये है कि शाकद्वीप से गरुड़ द्वारा अठारह कुल मगविप्र लाए गये। वे सब के सब तो मग (सूर्यतन्त्रसाधक) ही थे। सीधे सूर्य की साधना करते। सूर्य ही उनके कुलदेवता कहे-माने जाते। या वे अठारह कुल भिन्न-भिन्न अठारह परम्पराओं वाले थे यदि, तो भी कुलदेवी/देवता की संख्या अठारह ही होनी चाहिए थी, जब कि ऐसा बिलकुल नहीं है। यदि ये कहें कि कुलदेवी/देवता का निर्धारण अपने-अपने पुर के आधार पर हुआ, तो ये सूत्र भी ठीक नहीं बैठ पाता, क्यों कि कुलदेवी/देवता की संख्या बहत्तर नहीं मिल रही है कहीं। कुलदेवी/देवता की संख्यात्मक भेद का एक और कारण हो सकता है—आम्नाय भेद । तो ये आम्नाय भी पांच ही हैं—अर्क,आर,आदित्य,कर और मण्डल— जब कि कुलदेवी/देवता की परम्परा-प्राप्त संख्या पांच से काफी अधिक है। ऐसे में उलझने होंगी ही, जिन्हें सुलझाने का प्रयास करना होगा। अस्तु।
क्रमश..

Tuesday, 21 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिकाःबत्तीसवां भाग

गतांश से आगे....

   (सोलहवें अध्याय का पहला भाग)
                १६.    कुलदेवता/देवी की अवधारणा
                                      (औचित्य,परिचय और परम्परा )

                  विज्ञान की भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि सृष्टि महामाया का भ्रू-विलास मात्र है और सायंस की भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि पदार्थ और ऊर्जा का खेल है सब कुछ। ज्ञातव्य है कि सायंस का हिन्दी अनुवाद विज्ञान कदापि नहीं है, और न विज्ञान को अंग्रेजी में सायंस कहना चाहिए। सायंस और विज्ञान में जमीन-आसमान का फर्क है,किन्तु इस पर चर्चा, यहां मेरा अभीष्ट नहीं है।
कहने को तो सृष्टि में अनेकानेक देवी-देवता हैं। इनके नाम-रुप-कर्म को गिनना-जानना-समझना सामान्य मनुष्य के लिए असम्भव सा है।
वस्तुतः दिव् धातु से देवता शब्द बना है। दिवो दानात् द्योतनात् दीपनात् वा- यही इसका निर्वचन है।   प्रयोग प्रकाशमान होना अर्थ में है। विशेष अर्थ होता है— कोई पारलौकिक शक्ति जो अनश्वर और पराप्राकृतिक है और इसीलिये पूजनीय है। देव इस तरह के पुरुषों के लिये प्रयुक्त होता है और देवी इस तरह की स्त्रियों के लिये। देवताओं को परमेश्वर (ब्रह्म) का लौकिक रूप या ईश्वर का सगुण रूप कह सकते हैं। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि देवता मूलतः स्त्रीलिंग है। देव और देवता के शब्द-भेद को ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त स्थानों पर भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।
देवताओं का वर्गीकरण कई प्रकार से हुआ है, जिनमें चार मुख्य है— स्थान क्रम,परिवार क्रम ,वर्ग क्रम और समूह क्रम। निर्गुण-निराकार ब्रह्म जब सगुण-साकार हुआ तो स्वाभाविक है कि सुविधानुसार इनका मानवीकरण हुआ। क्यों कि मनुष्य सुविधापूर्वक मनुष्य के स्वरुप और स्वभाव को ही आसानी से समझ सकता है। ध्यान में उतारना भी आसान होता है।  अच्छाई और बुराई के विविध प्रतीकों, शक्ति और शौर्य की अभिव्यक्तियां,इच्छा,कामना और साधन—इन सबको ही आधार बनाया गया स्वरुप कल्पना में। फिर समयानुसार इन मानवीकृत स्वरुपों की मूर्तियाँ बनने लगी। विविध सम्प्रदाय बनने लगे। मत-मतान्तर होने लगे और अलग-अलग तरीके से  पूजा पाठ होने लगे।  
सबसे पहले जिन देवताओं का वर्गीकरण हुआ उनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश आते हैं। ये त्रिदेव कहे जाते हैं। इन्हें सृष्टि,पालन और संहार का कार्यभार सौंपा गया है। सौंपा क्या गया,प्रत्युत यों कहें कि इन्होंने सृष्टि,पालन और संहार का कार्यभार ग्रहण किया है । और आगे, क्रमशः देव-संख्याओं में निरन्तर वृद्धि होती गयी समयानुसार । निरुक्तकार यास्क के अनुसार देवताओं की उत्पत्ति आत्मा से ही मानी गयी है।  महाभारत (शांतिपर्व) में कहा गया है— आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ। स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राह्मणा इति निश्चयः, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्णं प्रकीर्तितम् ।।  शतपथब्राह्मण में भी देवताओं के सम्बन्ध में कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त किये गए हैं।
साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि— योगेनासृष्टिविधौ द्विधारुपो वभूवसः । पुमांश्च दक्षिणार्धांगो वामार्धा प्रकृतिःस्मृताः । सा च ब्रह्मस्वरुपा च नित्या सा च सनातनी ।। यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिकास्थिता । अतएव हि योगीन्द्रैः स्त्रीपुंभेदो न मन्यते।। (देवीभागवत) इस कथनानुसार देवता के लिए स्त्री-पुरुष के भेद का क्या औचित्य? मूलतः वह न स्त्री है, और न पुरुष।  मानवी अल्प बुद्धि में सहज समाने योग्य भाव से वह दिव्य शक्ति द्वि भेदाभासित हो रहा है।
वृहदारण्यकोपनिषद में एक रोचक प्रसंग है- सामान्यतः तैंतीस कोटि देवों की बात की जाती है। संहार क्रम में (सम्यक् आहरण—समेटने के क्रम में) यही तैंतीस करोड़ ३३३३ बना और फिर ३३ और फिर तीन (त्रिदेव- ब्रह्मा,विष्णु,महेश)। फिर डेढ़ । और फिर सिमट कर एक विन्दु मात्र रह गया। ध्यातव्य है कि कोटि शब्द सिर्फ संख्या बोधक न होकर प्रकार बोधक भी है। यानी सृष्टि में ३३ प्रकार के देवता कहे गए हैं। यथा— द्वादश आदित्य,एकादश रुद्र,अष्ट वसु तथा दो अश्विनी । शेष सब इन्हीं मूल के विस्तार या अंग-प्रत्यंग हैं। गहराई में जायेंगे तो वहीं पहुँच जायेंगे- शक्तिपुंज में समाहित हो जायेंगे।
ऐश्वर्य वचनः शश्च क्तिः पराक्रम एव च ।
तत्स्वरुपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता ।। (देवीभागवत)
ऐश्वर्य क्ति पराक्रम और इसके मेल से बना शब्द— शक्ति ।



प्रश्न उठता है कि आंखिर अनेकानेक झमेले क्यों ?
क्र 
          
१              

क्रमशः... 

Wednesday, 15 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणः लघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- इकतीसवां भाग

गतांश से आगे...

६.कुलदेवोपासना— उक्त सन्मार्गों पर चलते हुए, नियमानुसार,यथासम्भव कुलदेवता की पूजा-उपासना अपरिहार्य रुप से आवश्यक है। इसके वगैर सबकुछ अधूरा-अधूरा सा है। मानों किसी विद्यार्थी ने सत्र की पढ़ाई पूरी की,परीक्षा भी दी। किन्तु परीक्षा भवन की किंचित त्रुटियाँ, लापरवाही सबकुछ व्यर्थ कर दे सकता है । सारे किये कराये पर पानी फेर सकता है। अतः अपने कुलदेवता की जानकारी करके, समयानुसार पूजा-अर्चना अवश्य करें। मान लेते हैं- परिचय,नाम,आकृति,पूजाविधि कुछ भी ज्ञात नहीं है, वैसी स्थिति में भी  ऊँ आत्मनः कुलदेवतायै नमः सम्बोधन से स्मरण तो कर ही सकते हैं। वैसे भी षोडशमातृकाओं में इनका विशिष्ट स्थान है। नैष्ठिक रुप से किया गया यह स्मरण ही हो सकता है आगे का रास्ता दिखा दे। अस्तु।

.आडम्बर विहीनता— और सबसे अन्त में आग्रह पूर्वक ये कहना चाहूँगा कि पूर्वोक्त बातों पर ध्यान देते हुए, निज पिण्डान्तर्गत जो सूर्यशक्तिकेन्द्र है उसे साधें । ब्रह्माण्डीय सूर्य आपके जगने की प्रतीक्षा कर रहा है । शाकद्वीपीय को किसी को आकर्षित करने हेतु  वाह्याडम्बर की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है। वह तो चुम्बकीय ऊर्जा का महास्रोत है। सिद्धियों के पीछे दौड़ने की आवश्यकता जरा भी नहीं है। सिद्धियां उसके द्वार की चेरी हैं। आवश्यकता है सिर्फ कर्मणा शाकद्वीपीय होने की। जन्मना तो बहुत हो लिए। अस्तु।


                        ----)ऊँ आदित्याय नमः(---
क्रमशः...

Sunday, 12 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- तीसवां भाग

गतांश से आगे...

पन्द्रहवें अध्याय का चौथा भाग...

.संध्या-गायत्री,सूर्योपासना— शास्त्र निर्दिष्ट समय पर उपवीति होकर, नित्य (यथासम्भव त्रिकाल, प्रातः-सायं, या सिर्फ प्रातः अनिवार्यतः) संध्योपासन कर्म अवश्य करे। संध्या का अनिवार्य – अपरिहार्य अंग है— गायत्री जप। इसे अष्टोत्तरशत से लेकर अष्टोत्तरसहस्र तक यथासम्भव साधना चाहिए। संध्या की कई प्रचलित शास्त्रीय विधियां हैं- संक्षिप्त, विस्तृत, अति विस्तृत आदि। सुविधानुसार किसी एक का पालन किया जा सकता है। संध्या-गायत्री के पश्चात् नित्य वा कम से कम साप्ताहिक (प्रत्येक रविवार) एवं सूर्य के विशेष पर्व- छठ, सूर्यसप्तमी आदि अवसरों पर अलोन भोजन व्रत रखते हुए, आदित्यहृदय स्तोत्र का एक वा द्वादश आवृत्ति पाठ अवश्य करे। आदित्यहृदय स्तोत्र भी लधु और वृहत् दो प्रकार का है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है। किसी को कमतर नहीं आंका जा सकता। एक है भविष्योत्तरपुराण का अंश और दूसरा है महर्षि वाल्मीकि रचित।
   सच पूछें तो संध्या-गायत्री का रहस्यमय सूत्र पकड़ा कर ऋषियों ने आत्म-कल्याण का अति सरल-सुगम मार्ग प्रशस्त कर दिया है। किशोरावस्था में ही कुलगुरु द्वारा अध्यात्मविद्या का बीज रहस्यमय ढंग से रोपित कर दिया जाता है हमारे भीतर, जो समय पर स्वतः प्रस्फुटित,पल्लवित,पुष्पित और अन्त में फलित हुए बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु अज्ञान में हम इस हीरे को कंकड़ समझ कर त्याग दिये हैं। कुछ बन्धु जो इसे कर भी रहे हैं, तो सिर्फ खानापूर्ति रुप में, न कि रहस्य को जान-समझ कर।
 प्रसंगवश यहां इसके रहस्यों पर किंचित प्रकाश डालने का प्रयास करते हैं। संध्या-विधान के कुछ मुख्य कड़ियों पर ध्यान दें— तिलक,शिखाबन्धन,आसन शुद्धि-बन्धन,प्राणायाम,अघमर्षण,सूर्यार्घ्य,उपस्थान,न्यास,पूर्वमुद्रा,गायत्रीजप,उत्तरमुद्रा, गायत्रीस्तोत्र, हृदय,कवचादि । साधना जगत में पदार्पण करके, सम्यक् गतिशील होने के लिए, उक्त कड़ियाँ प्रशस्त पायदानों की भूमिका में होती हैं। शनैःशनैः आगे बढ़ते हुए, परमलक्ष्य को सहज ही लब्ध किया जा सकता है।
 ध्यातव्य और ज्ञातव्य है कि संसार की जो कोई भी साधना विधि हो—वैदिक हो या तान्त्रिक या उभय,किसी भी पंथ,किसी भी सम्प्रदाय का क्यों न हो, गहराई में झांकेंगे तो एक ही बात मिलेगी,क्यों कि परमात्मा एक ही है। ढूढ़ने-पहुँचने-पाने के रास्ते भले ही अनेक हों। ध्यानयोगी हो या कर्मयोगी,भक्तियोगी हो या अष्टांगयोगी - गहरे में बहुत अन्तर नहीं है। विभिन्न पथ-यात्रियों की अन्तःक्रिया (प्रभाव) लगभग समान होती है।
 संध्या-गायत्री नित्यक्रिया के क्रम में वस्तुतः हम जाने-अनजाने सूर्यतन्त्र की साधना ही कर रहे होते हैं। इसका सीधा प्रभाव कुण्डलिनी महाशक्ति पर पड़ता है। शिखा-सूत्र,तिलक ये सभी किसी न किसी भीतरी नक्शे का स्मरण दिलाते हैं। भले ही इन्हें हम सिर्फ धार्मिक चिह्न (साइनवोर्ड) की तरह उपयोग करते आ रहे हैं। विभिन्न तरह का तिलक लगा कर हम यही प्रदर्शित करना चाहते हैं कि हम अमुख सम्प्रदाय के, अमुक परम्परा के हैं। जबकि इनका वास्तविक रहस्य कुछ और ही है। मूलतः अध्यात्म को इन साइनवोर्डों से कोई वास्ता नहीं है। साधना-पथ पर आगे बढ़ा हुआ साधक इन सारे बाहरी आडम्बरों दिखावे) से विलग हो जाता है। उसे न तिलक की अनिवार्यता प्रतीत होती है, न विभिन्न मालाओं की । सच पूछा जाय तो जिसने अन्तस्थ माला को चैतन्य कर लिया (ज्ञान प्राप्त कर लिया), उसे बाहरी माला की क्या आवश्यकता ! पंचप्राणों को जिसने यामित कर लिया उसके लिए तो जीवन और मृत्यु एक खेल भर है।
अब क्रमशः संध्या की एक-एक मुख्य क्रियाओं पर थोड़ा प्रकाश डालते हैं। संध्यार्थ आसन ग्रहण करने के पश्चात् सर्वप्रथम शिखा-बन्धन करते हैं। इसके मन्त्रों पर ध्यान दें—चित्तरुपिणी महामाये...ये हमारी चेतना ग्रन्थि को उद्दीपित करने की विधि है। फिर भूमध्य में तिलक लगाते हैं। साम्प्रदायिक भेद से, मध्य नासिका से लेकर ललाट के उर्ध्वभाग पर्यन्त तिलक का स्वरुप कुछ भी हो सकता है। तिलक वस्तुतः अन्तर्द्वार का संकेत है। स्मरण है। उद्दीपन है। क्रियाकाल की अन्तःवाह्य सुरक्षा हेतु आचमन,विनियोग,आसन शुद्धि और बन्धन आदि करते हैं। उन ऋषियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं- उनके नाम,गोत्रादि सहित,जिन्होंने ये पथ प्रशस्त किये हमारे लिए। फिर नाम-गोत्र, दिक्, कालादि में स्वयं को संतुलित-व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं- संकल्प पूर्वक । जीवन का मूलाधार- प्राणादि पंचप्राणों को संतुलित-नियन्त्रित करते हैं। वस्तुतः साधना रुपी संयन्त्र का ईंधन है— प्राणायाम के समय क्रमशः ब्रह्मा-विष्णु-महेश का तीन विशिष्ट स्थानों पर ध्यान । ध्यातव्य है कि इसका श्रीगणेश वहीं से होता है, जहां कायगत सूर्य की स्थिति है। इस स्थान को ही योगियों ने संसार कहा है। सतत प्राणायाम की क्रिया सम्पन्न करते-करते साध्य छः चक्रों में तीन की सम्यक् शुद्धि हो जाती है, यानी लगभग आधा काम तो अनजाने में ही, हँसी-खेल में ही सम्पन्न होगया। यहीं पर सूर्य को अर्घ्य अपर्पित करते हैं। उपस्थान से स्वयं को उत्थानित करते हैं, तो विविध न्यासों से चेतना को न्यस्त।
  वेदमाता (ज्ञान की कुँजी, या कहें ज्ञान का प्रमुख स्रोत) गायत्री के विशिष्ट वर्णों द्वारा निरन्तर प्रहार— मूल को चैतन्यकर, परम चैतन्य से जोड़ने का अद्भुत कार्य करता है। जप के पूर्व-पर की विभिन्न मुद्राएं अत्याधुनिक इलोक्ट्रोनिक संयन्त्र के सर्किट डायग्राम से कम हैं क्या !  सर्किट डायग्रामको जिसने ठीक से समझ लिया वो तो अभियन्त्रणा-निष्णात् हो गया । अग्नि, वायु और आकाश का प्रतिनिधित्व करती मध्यमा, तर्जनी और अंगुष्ठ के सहारे सरकता रुद्राक्ष-मनका कब तीन तत्त्वों को समाहृत कर देता है, पता भी नहीं चलता। फिर तो साधने को रह जाता है सिर्फ जल और पृथ्वी । सतत प्रणव-प्रहार से पृथ्वी तो पहले ही द्रवित (मुलायम अर्थ में) हुयी रहती है, जहां किसी बीज का अंकुरण सहज ही सम्भव है।

सच पूछें तो संध्या-गायत्री अप्रकम्पित आधार शिला है, जिस पर सूर्यतन्त्र का साधना-प्रासाद खड़ा होता है। इसकी महत्ता और गरिमा को प्रकाशित करते हुए ऋषि कहते हैं—
विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् । तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ।।
संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता ।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते।।                  
(देवीभागवत पुराण११-१६-६,७)
तथाच-
  संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु ।
  यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ।। (दक्षस्मृति २-२७)
  संध्यामुपासते ये तु सततं संशितव्रताः ।
  विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। (अत्रि)
   यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः ।
  तेषां वै पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयम्भुवा ।।
  निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत् ।  त्रैकाल्यसंध्याकरणात् तत्सर्वं विप्रणश्यति ।। (याज्ञ्यवल्क्य)

  ब्राह्मण रुपी वृक्ष का मूल संध्या है। चारो वेद इसकी शाखाएँ हैं। धर्म-कर्म पत्ते हैं। अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिए,क्यों कि मूल के छिन्न (नष्ट) होने से वृक्ष और शाखा सब कुछ नष्ट हो जायेगा। अस्तु।
क्रमशः...