Sunday, 29 October 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- पचीसवां भाग

गतांश से आगे...

चौदहवें अध्याय का चौथा भाग...

प्रश्नांक ५.  साम्ब को रोगमुक्ति क्या आयुर्वेदिक उपचार से मिली?


            प्रायः लोग ये जानते हैं, और ऐसा ही कह कर स्वयं को गौरवान्वित करते हैं कि साम्ब को रोगमुक्ति दिलाया शाकद्वीपियों ने। आरोग्य प्राप्ति हेतु सूर्योपासना से अच्छा और क्या हो सकता है ! किन्तु यह उपासना साम्ब ने स्वयं की। सूर्योपासना में किसी सहायकीय भूमिका की आश्यकता नहीं पड़ी उन्हें। वस्तुतः साम्ब तो सूर्योपासना करके स्वयं रोगमुक्त (कुष्ठरोग) हो चुके थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य ने दर्शन दिया। रोगमुक्त किया और यह आदेश दिया कि तुम मेरी प्रतिमा स्थापित करो। इस सम्बन्ध में साम्बपुराण में वृहत् चर्चा है। अन्य पुराणों में भी यत्किंचित प्रसंग मिलते हैं इस विषय के । आगे, प्रतिमा-स्थापन क्रम में पुण्याह वाचनादि कर्म के काफी बाद यानी जब प्रतिमा में सूर्यतेज अवतरित होने की स्थिति आयी, तब स्थापन यज्ञ में लगे हुए जम्बूद्वीपीय विप्र तेज-रश्मि-उष्मा से विकल होकर भाग खड़े हुए। और ऐसी विकट परिस्थिति में पुनः नारद का संकेत (सुझावादेश) मिला शाकद्वीप से मग-साधकों को लिवा लाने का । ऐसा भी पौराणिक प्रसंग मिलता है कि स्वयं सूर्य ने ही साम्ब को आदेश दिया कि सूर्यांश दिव्यजन्मा सूर्योपासक को बुला कर स्थापना कराओ,जो कि एकमात्र शाकद्वीप में ही उपलब्ध हैं। मूलतः सर्वविद्या निष्णात शाकद्वीपीय सिर्फ सूर्योपासक ही नहीं, प्रत्युत सूर्यतन्त्र-साधक हैं । और इसी रुप में इनकी पहचान होनी चाहिए।
क्रमशः... 

Saturday, 28 October 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका--चौबीसवां भाग

गतांश से आगे...

चौदहवें अध्याय का तीसरा भाग-

प्रश्नांक .— शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्यांश हैं और सूर्योपासक भी । ऐसे में कुछ कुलों में मांसाहार कैसे प्रचलित हो गया, यहां तक कि कुलदेवता/देवी पूजा में भी मांस का व्यवहार करने लगे,जैसे पूर्णाडीह,गिरीडीह,कौरा आदि ।
शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्यांश हैं और सूर्योपासक भी। पिछले प्रसंगों में मगों के विषय में काफी कुछ कहा जा चुका है। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है- अन्य समाज में या अपनों के बीच भी कि सूर्योपासक यानी परम वैष्णव का एक विशिष्ट स्वरुप- उस सूर्य का उपासक (साधक) जहां लवण और तैल भी वर्जित है, कुछ खास कुलों में सीधे मांसाहार कहां से प्रविष्ट हो गया ?
जिन कुलों में ऐसा हो रहा है,उनसे सवाल करने पर सीधे उत्तर देते हैं कि 1. हमारी कुलदेवी तारा हैं,काली हैं,दुर्गा हैं...इत्यादि,जिनके लिए बलि अनिवार्य है।  2. सूर्य की क्या वाम तन्त्र साधना नहीं है?
3.कुष्माण्ड,माषादि की बलि देते हैं- कल्पित गौ,छाग,महिष, मीनादि के रुप में,और स्वयं को परम वैष्णव कहते हैं। यदि सीधे इन जीवों की बलि दी जाय देवी के लिए तो क्या बुराई है?...
         और भी कुछ ऐसी बातें,ऐसे ही तर्क समाज में सुनने को मिलते हैं। ये भी नहीं कि कहने वाले कोई मूर्ख,आज्ञानी लोग हैं। जानकार हैं। समझदार भी हैं। किन्तु असली बात कहने में संकोच करते हैं, या हो सकता है असली रहस्य उन्हें भी ज्ञात ही न हो।
इस गम्भीर विषय पर हर तरह से जानकारी लेने का काफी प्रयास किया, किन्तु बात कुछ खास बनी नहीं । मुझे तो यही लगता है—कहीं न कहीं चूक हुयी है इन लोगों से। वामतन्त्र के चमत्कार आकर्षित किये होंगे...किसी अनाड़ी गुरु का सानिध्य मिल गया होगा...प्रलोभन देकर किसी ने अपने मार्ग में घसीटा होगा...कुल में कोई ऐसे साधक हुए होंगे, जो पहले गुप्त रुप से मूल साधना से हट कर अन्य साधना भी करते होंगे, और वहीं बाद में मूल लुप्त होकर,गौण प्रधान बन गया। आने वाली पीढ़ी ने इस बात का विचार करना भी आवश्यक न समझा। स्वाभाविक है- घर का बच्चा प्रसाद के नाम पर मांसाहार किया, और उसी वातावरण में पला-बढ़ा । मांस खाना अच्छा लगने लगा । फिर विरोध या विचार करने का विवेक ही कहां रह जायेगा ? फुरसत भी किसे है विचार के लिए।
सच पूछा जाय तो तथाकथित परम्परा शब्द भी बड़ा विचित्र है। कौन सी भूल कब परम्परा का रुप ले ले,कहा नहीं जा सकता। जरा भी आवृत्ति हुयी किसी घटना की, कि चट परम्परा का मुहर लग जाता है। और फिर वुद्धि, विचार, विवेक को पास फटकने भी नहीं दिया जाता । परम्परा में यत्किंचित भी परिवर्तन करने का साहस नहीं हो पाता। मड़वा में बिल्ली बाँधने वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। सच पूछा जाए तो परम्परा-परिवर्तन(गलत का सुधार) हेतु साहस, विवेक और ज्ञान तीनों की आवश्यकता होती है।
(इस प्रसंग में किसी बन्धु को कुछ स्पष्ट कारण ज्ञात हो तो कृपया सूचित अवश्य करेंगे)

प्रश्नांक शाकद्वीपी पारम्परिक तान्त्रिक,ज्योतिषी और वैद्य – कितना सत्य?
   ये सत्य है कि शाकद्वीपीय तन्त्र, ज्योतिष, आयुर्वेदादि निष्णात हैं। सरस्वती के वरदहस्त शाकद्वीपियों के तेज और प्रतिभा का कितना हूँ वर्णन किया जाय कम ही है। शाकद्वीपीय मूलतः सूर्यतन्त्र के साधक हैं। सूर्यतन्त्र अपने आप में अद्भुत है। सृष्टि-संरचना और प्रसरण में सूर्य का बहुत बड़ा योगदान है। सूर्य के विभिन्न नाम- आदित्य,मार्तण्डादि शब्दों की व्युत्पत्ति पर ध्यान देने पर ये बातें और भी स्पष्ट होजाती है— आदित्य ब्रह्म इत्यादेशः । असदेवेदमग्रआसीत् । तत्सम्भवत् तदण्डन्निरवर्तत । तत्सँव्चत्सरस्यमात्रामशयत् । तन्निरभिधत । तेऽण्ड कपाले रजतं सुवर्णं चाभवताम् । यद्रजतं सेयं पृथिवी । यत्सुवर्णं सा द्यौः । यदजायत सोऽसावादित्यः । य एतमेव विद्वान् आदित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याह...। (छान्दोग्योपनिषद्-३-१९) (आदित्य ब्रह्म हैं- ऐसा आदेश है। सृष्टि के पूर्व में असत शून्य था । वह अपनी इच्छा (माया) में आविष्ट होकर अण्ड रुप में परिणत हो गया। चिरकाल तक शयनोपान्त विस्फोटित (विखंडित) हुआ । विस्फोटित (मृतांड) से उत्पन्न होने के कारण मार्तण्ड नाम की सार्थकता है। उसके एक भाग से रजत और दूसरे से सुवर्ण बना । निम्न रजत भाग भूमि और उर्ध्व स्वर्ण भाग द्यौ हुआ । जो उसके मध्य से उत्पन्न हुआ वही आदित्य सूर्य (आदि में होने के कारण) है। इन आदित्य की उपासना विद्वान ब्राह्मण सदा करते रहते हैं।) और जब सूर्य ही आदि है, तो फिर सूर्यतन्त्र को आदि कहने-मानने में क्या आपत्ति हो सकती है ! इसी आदि तन्त्र (व्यवस्था, साधना, विधि...) के मर्मज्ञ रहे हैं शाकद्वीपीय ब्राह्मण । सूर्यतन्त्र ही इनका मूल धरोहर है। सूर्य के बारे में शाकद्वीपीय जितना जान-समझ सकते हैं, भला अन्य क्या समझेंगे उतना?
          ज्योतिष और व्याकरण भी तो सूर्य से ही उद्भुत हुआ। व्या करोमि...। पवनपुत्र हनुमान ने सूर्य से ही व्याकरण सीखा । आठ प्रकार के व्याकरण कहे गए हैं। श्री हनुमान इन आठों के ज्ञाता हैं। इन्होंने अन्य विद्यायें भी सूर्य से ही ग्रहण की।  हनुमान ज्योतिष भी ज्योतिष का चमत्कारी ग्नन्थ है। व्याकरण ही शाकद्वीपियों की वाणी है और ज्योतिष ही उनका नेत्र(ज्ञान अर्थ में भी) है। तन्त्र,ज्योतिष,व्याकरण तीनों का अद्भुत संगम है शाकद्वीपियों में । और इस व्याकरण को कोरा शब्दशास्त्र समझने की भूल न करें। यह जान कर बहुत लोगों को आश्चर्य हो सकता है, या इसे मिथ्या भी मान ले सकते हैं,किन्तु सत्य है,जिसे हृदयंगम करना चाहिए। वस्तुतः पाणिनी अष्टाध्यायी और  पतंजलि महाभाष्य गूढ़ योगविज्ञान है। योग के रहस्य जितने यहां खुले हैं, अन्यत्र दुर्लभ है- इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं ।

इस प्रकार तन्त्र, ज्योतिष और व्याकरण का सम्यक् ज्ञान जिसे हो, उसके लिए शेष ही क्या रह जाता है- संसार में !

 ये कहना अधिक सही होगा कि जम्बूद्वीप में आगमन और आवासन के पश्चात् बहुत बाद में यहां की सभ्यता-संस्कृति को आत्मसात करते हुए, जीविकोपार्जन का आधार बना लिया उन्होंने तन्त्र,ज्योतिष,आयुर्वेदादि को। हम चिकित्सा करने आये थे यहां—यह कहना हमारी तौहीनी है। अपनी तेज व गरिमा को कमतर करके आंकने वाली बात है । ऐसा कह कर हम आयुर्वेद के महत्व और मानवजीवन में इसकी उपादेयता को नीचा नहीं दिखाना चाहते, प्रत्युत सर्वविद्या निष्णात को एक विद्या-विशारद कहने-मानने में आपत्ति जता रहे हैं। अस्तु।
क्रमशः... 

Friday, 27 October 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- तेइसवां भाग

गतांश से आगे...

चौदहवें अध्याय का दूसरा भाग--

प्रश्नांक — यदि ये कहें कि पुर के अनुसार कुलदेवता/देवी का निर्धारण हुआ है, फिर एक ही पुर-गोत्र में विभिन्न परम्परा क्यों?
            इसके कई कारण हो सकते हैं। यथा—
1.परिवेश परिवर्तन – पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, भौगोलिक, प्राकृतिक आदि अनेक कारणों से समयानुसार लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर स्थायी या अस्थायी रुप से बसना पड़ा। स्वाभाविक है कि इसका प्रभाव व्यक्ति की उपासना पर भी पड़ेगा । कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि स्थान तो पूर्ववत ही रहा, किन्तु सारी विधि-व्यवस्था चरमरा गयी। लम्बें इतिहास में झांकें तो हम पाते हैं कि भारतवर्ष की सीमा बहुत सिकुड़ी है। दुनिया का सर्वाधिक आधुनिक और विकसित कहा जाने वाला अमेरिका हमारे भारतवर्ष की तुलना में बिलकुल बच्चा जैसा है। अभी इसकी उमर ही कितनी हुयी है ! महज कुछ शतक ही तो । थोड़ा और पीछे जायें, तो पाते हैं कि सनातन धर्म की एकछत्रता थी - पृथ्वी के बहुत बड़े हिस्से पर। या कहें, एकमात्र धर्म था सर्वत्र(सातों द्वीपों में)जो सनातन धर्म के नाम से अभिहित था। सनातन का अर्थ ही होता है- सदा विद्यमान रहने वाला ।  सृष्टि के बहुत बाद में, समयानुसार कई-कई धर्म और सम्प्रदाय पैदा होते गए । धर्मान्तरण भी काफी जोर-शोर से हुआ । आततायियों और धर्मांधों से प्राण रक्षा के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ा । इस प्रकार, सनातनियों की संख्या और उनका क्षेत्र घटता गया बहुत तेजी से। मग भी इसके शिकार हुए- इसमें कोई संशय नहीं।

2.कुल परिवर्तन— प्रायः लोग अपना कुल-गोत्र(मूलस्थान) छोड़कर किसी कुटुम्बी (ससुराल,ननिहाल या अन्य)के यहां जा बसते हैं। उस नये कुल में उन्हें सम्पत्ति मिल जाती है। स्वाभाविक है कि सम्पत्ति के साथ-साथ उस कुल के देवता की सेवा भी तो करनी ही होती है न। अब उस व्यक्ति के सामने समस्या आती है कि किस कुल के देवता की पूजा करे- अपना या प्राप्त नया ? ऐसे में पुरनाम-गोत्र तो उसका पुराना ही रह जाता है,किन्तु देवता सम्बन्धी सभी बातें बदल जाती हैं।

3.अज्ञान—  अधिकांश लोगों को पता ही नहीं होता कि उनके कुलदेवता कौन हैं, उनकी आकृति कैसी है, पूजा-विधान क्या है? इत्यादि।

4.प्रलोभन— किसी के द्वारा दिया गया प्रलोभन या स्वयं में जागा प्रलोभन भी मूल साधना से दूर घसीट ले गया। विशुद्ध सात्त्विक साधक सूर्योपासक भी मदिरा-मांस का व्यवहार करने लगे- वाममार्गीय तथाकथित चमत्कारों के चक्कर में पड़ कर।
5. स्मृतिलोप—कालान्तर में स्मृति लोप भी कारण बना । पुरानी पीढ़ी ने नयी पीढ़ी को अपना अनुभव-ज्ञान साझा नहीं किया समय पर।

               इनके अतिरिक्त अन्य कारण भी हो सकते हैं।
क्रमशः...

Tuesday, 24 October 2017

शाद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- वाइसवां भाग

गतांश से आगे...
चौदहवें अध्याय का पहला भाग-

               १४.विडम्बना

कुछ ज्वलन्त प्रश्न

1.    शाकद्वीपी सब एक, फिर कुलदेवता/देवी अनेक— क्यों-कैसे?
2.    यदि ये कहें कि पुर के अनुसार कुलदेवता/देवी का निर्धारण हुआ है,फिर एक ही पुर-गोत्र में विभिन्न परम्परा क्यों?
3.    शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्यांश हैं और सूर्योपासक भी। ऐसे में कुछ कुलों में मांसाहार कैसे प्रचलित हो गया, यहां तक कि कुलदेवता/देवी पूजा में भी मांस का व्यवहार करने लगे,जैसे पूर्णाडीह,गिरीडीह,कौरा आदि ।
4.    शाकद्वीपीय पारम्परिक तान्त्रिक,ज्योतिषी और वैद्य – कितना सत्य?
5.    साम्ब को रोगमुक्ति क्या आयुर्वेदिक उपचार से मिली?
6.    इतनी जल्दी इतने तेजहीन क्यों और कैसे हो गये?
7.    ….

उक्त प्रश्नों का समुचित उत्तर ढूढ़ने का प्रयास करते हैः-

प्रश्नांक .— शाकद्वीपीय सब एक,फिर कुलदेवता/देवी अनेक— क्यों-कैसे?
                शाकद्वीपी विप्र मात्र मग हैं, यानी सूर्यसाधक, सूर्योपासक हैं। ऐसी स्थिति में तो एक मात्र उपासना सूर्य की ही होनी चाहिए थी। वही सबके कुलदेवता कहे जाते।
देवी-देवताओं का वैविध्य गम्भीर विचार हेतु वाध्य करता है।
सूर्यनारायण तेज(अग्नितत्त्व) के आदि स्रोत हैं। आकाशात्वायुः, वायोरग्निः...। वायु (प्राणादि) के अधिष्ठाता यही हैं।  महाशक्तिमान हैं। शक्तिमान (शक्ति को जो धारण किए हुए है)—स्पष्ट है कि शक्तिमान का अन्तस्थ तत्त्व है— शक्ति। ये वही शक्ति है,जो आकाश से वायु को > वायु के अधिपति सूर्य को प्राप्त हुयी। यही शक्ति अग्नि में आकर पूर्णतः व्यक्त (मुखर) हुयी। ये शक्ति कोई और नहीं, प्रत्युत आकाशस्त नारायणी शक्ति की नवदुर्गा रुप की अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि सूर्य को सूर्यनारायण कहते हैं। नारायणि शक्ति युक्त इसी सूर्य को साधना है हमें।
शक्तिमान को पाने के लिए शक्ति का सहारा लेना स्वाभाविक रुप से अनिवार्य है। आवश्यकता और स्थिति के अनुसार इस महाशक्ति के अनेकानेक स्वरुप हुए हैं। अग्नि की प्रचण्ड लपट जैसे वायु का सहयोग पाकर नाना आकृति धारण करती है, उसी भांति परिस्थितिवश शक्ति के भी अनेकानेक स्वरुप कल्पित हुए। मूलतः व तत्त्वतः जरा भी भेद नहीं होने पर भी गायत्री,सावित्री,तारा,काली,दुर्गा,बगला, पद्मावती, त्रिपुरसुन्दरी,धूमावती,छिन्नमस्ता,कात्यायनी... आदि-आदि अवस्थागत अनेकानेक भेद हैं। इस प्रकार शक्ति के विविध स्वरुप कल्पित और मान्य हैं। श्रीदुर्गासप्तशती,देवीभागवत आदि के अध्यवसायी ( मात्र पाठी नहीं) इस बात से भलीभांति परिचित हैं। अतः इसमें जरा भी भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है कि हम सूर्य की आराधना न करके, देवी की आराधना क्यों करने लगे । ध्यातव्य है कि उपनयनोपरान्त गायत्री की दीक्षा दी जाती है। ये गायत्री कोई और नहीं सविता (सूर्य) की ही महाशक्ति हैं। (नयी पीढ़ी वाले युवक सविता को कोई देवी न मान बैठें। सविता सूर्य का ही एक नाम विशेष है) अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वे प्रभवन्त्यहरागमे...(गीता) अव्यक्तः — मनोबुद्धिन्द्रियाद्य विषयः । अहरागमे प्रलमानो सवितृ रुपेण समुदिते व्यक्तयः प्राणिनः प्रभवन्तीति । सविता रुपी ब्रह्म से ही संसार का उद्भव हुआ । सविता में ही समस्त देवों का अन्तर्भाव है। सूर्यमंडल से आती हुयी ब्राह्मी,वैष्णवी, शैवी गायत्री स्वरुपों के सम्यक् ध्यान का यही औचित्य है। गायत्री का सहारा लिए वगैर हम सूर्य-शक्ति को कदापि प्राप्त नहीं सकते ।
अतः वेदमाता गायत्री के अवलम्ब सहित, कुलदेवता की सम्यक् आराधना करते हुए ही स्वयं को ऊर्जस्वित रखा जा सकता है । इससे अच्छा और कोई दूसरा उपाय नहीं हो सकता ।

प्रसंगवश एक बात और स्पष्ट कर दूं कि पुराणों में विशद रुप से कई जगहों पर आया है कि सूर्यमण्डल में केवल सूर्य, अकेले नहीं हैं,प्रत्युत सभी देवी-देवता,ऋषि आदि भी उपस्थित हैं। ज्ञातव्य है कि साल के बारहों महीनों के सूर्य एक ही नहीं बल्कि बारह होते हैं। तदनुसार साथ में परिभ्रमण करते ऋष्यादि भी बदलते रहते हैं। इसे राशिक्रम में रखने पर चैत्र मास के लिए मीन राशि होगी, वैशाख के लिए मेष राशि इत्यादि । वस्तुतः यही सूर्य मास है।

इसे आगे की सारणी में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है,जो श्रीमद्भागवत स्कन्ध १२ अ.११ श्लो. ३३ से ४४ के आधार पर बनाया गया हैः—
                    
                

         आदित्य-व्यूह-विवरण (चैत्रादि मासों में स-गण सूर्य)

क्र.
मास
सूर्य
अप्सरा
राक्षस
सर्प
यक्ष
ऋषि
गन्धर्व
१.
चैत्र                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             
धाता
कृतस्थली
हेति
वासुकि
रथकृत्
पुलस्त्य
तुम्बुरु
२.
वैशाख
अर्यमा
पुंजिकस्थला                       
प्रहेति
कच्छनीर
अथौजा
पुलह
नारद
३.
ज्येष्ठ
मित्र
मेनका
पौरुषेय
तक्षक
रथस्वन
अत्रि
हाहा
४.
आषाढ़
वरुण
रम्भा
चित्रस्वन
शुक्रनाग
सहजन्य
वशिष्ठ
हूहू
५.
श्रावण
इन्द्र
प्रम्लोचा
वर्य
एलापत्र
स्रोता
अङ्गिरा
विश्वावसु
६.
भाद्र
विवस्वान्
अनुम्लोचा
व्याघ्र
शंखपाल
आसारण
भृगु
उग्रसेन
७.
आश्विन
त्वष्टा
तिलोत्तमा
ब्रह्मापेत
कम्बल
शतजित्
जमदग्नि
धृतराष्ट्र
८.
कार्तिक
विष्णु
रम्भा
मखापेत
अश्वतर
सत्यजित्
विश्वामित्र
सूर्यवर्चा
९.
अगहन
अंशु
उर्वशी
विद्युच्छत्रु
महाशंख
तार्क्ष्य
कश्यप
ऋतसेन
१०.
पौष
भग
पूर्वचत्ति
स्फूर्ज
कर्कोटक
ऊर्ण
आयु
अरिष्टनेमि
११.
माघ
पूषा
घृताची
वात
धनञ्जय
सुरुचि
गौतम
सुषेण
१२
फाल्गुन
पर्जन्य
सेनजित
वर्चा
ऐरावत
क्रतु
भारद्वाज
विश्व

भविष्योत्तरपुराणान्तर्गत आदित्यहृदयस्तोत्र के श्लो.सं.५४-५८ में किंचित भिन्न क्रम में बारह महीनों के सूर्य की चर्चा है,जिसकी आराधना से पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि कही गयी है। ध्यातव्य है कि यहां मास क्रम भी माघ से प्रारम्भ है। यथा— अरुणोमाघमासे तु सूर्यो वै फाल्गुने तथा । चैत्रमासे तु वेगांगो भानुर्वैशाखतापनः ।। ज्येष्ठमासे तपेदिन्द्र आषाढ़े तपते रविः । गभस्तिः श्रावणेमासे यमो भाद्रपदे तथा ।। इषे सुवर्णरेताश्च कार्तिके च दिवाकरः । मार्गशीर्षेतपेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः ।। पुरुषस्त्वधिकेमासे मासाधिक्येषु-कल्पयेत् । इत्येते द्वादशादित्याः काश्यपेयाः प्रकीर्तिताः ।। उग्ररुपोमहात्मानस्तपन्ते विश्वरुपिणः । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्रस्फुटोहेतवोनृप ।।

ध्यातव्य है कि  माघ के महीने में ही मकर की संक्रान्ति होती है, जो सिर्फ शाकद्वीपीय ही नहीं,प्रत्युत सर्वसामान्य के लिए अति पुण्यकारी काल होता है। माघ की महत्ता को विस्तार से समझने के लिए पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य का अवलोकन करना चाहिए।

ऊपर के दो प्रसंगों में द्वादश सूर्य के क्रमभेद से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है। साधना-पद्धति-भेद से दोनों अपने स्थान पर अनुकूल ही हैं।

अब , प्रसंग के मूल में आते हैं—कुलदेवता की अनेकता वा एकरुपता पर। बारह सूर्य, पांच तत्त्व (तन्त्र में छत्तीश तत्त्व तथा सांख्य में पच्चीस तत्त्व),पांच आम्नाय (तन्त्र में षडाम्नाय), तीन गुण, द्विधा, मुख्य दो मार्ग (कुल—श्रीकुल, कालीकुल), शाकद्वीप से अठारह कुलों का आगमन और पुनः बहत्तरपुरों में विस्तार—कैसी विलक्षण तन्त्र-व्यवस्था है- साधना की, साधक के कल्याण की—इन सब पर गहराई से विचार करने पर व्यवस्थापक (पूर्वजों) के चरणों में नतमस्तक हो जाना पड़ता है भावविह्वल होकर । सूर्यतन्त्र की इस पूरी व्यवस्था को श्रद्धापूर्वक हृदयंगम करने की आवश्यकता है। फिर आत्मसात करने की आवश्यकता है। सारा संशय दूर हो जायेगा।  श्रद्धा-भक्ति-विश्वास पूर्वक पग बढ़ाने की आवश्यकता है। सूर्यमंडल में बैठे हमारे पूर्वज सहर्ष हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।


मगबन्धु के मग विशेषांक में यही सारणी किंचित भिन्नता युक्त है । साथ ही वहां क्रमशः बारह आचार्यों की भी चर्चा है कि शाकद्वीप से बारह आचार्य आए। प्रत्येक अपने साथ प्रत्येक वेदों के एक-एक ज्ञाता और सहयोगी लेते आए । यानी चार ज्ञाता, एवं एक सहयोगी - इस प्रकार १+४+१ = ६ हुआ । बारह आचार्यों के छः-छः के इस समूह से ही १२ x=७२ पुर हो गए। वहां इस सूचना का स्रोत स्पष्ट नहीं है। बारह आचार्यों में क्रमशः बारह पुरों के नाम गिनाये गए हैं, जिसका कोई औचित्य स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। क्यों कि ऐसा कोई प्रमाण अब तक नहीं मिलता कि पुरसंज्ञा सहित मग वहां से आए। फिर बारह की संख्या भी विचारणीय है। बारह महीनों पर तो सही बैठ रहा है,किन्तु अन्य पौराणिक प्रसंगों से बारह और अठारह का भ्रम पैदा हो रहा है। जानकारी के लिए यथावत उस पुर सूची को यहां दिए दे रहा हूँ। यथा— उरवार,छेरियार,मखपवार,देवकुलिआर,डुमरिआर,ओडरीआर, भलुनिआर, पवईआर, पोतिआर,अदईआर,पड़रिआर और सरईआर । बहत्तर में उक्त बारह का चयन कई प्रश्न चिह्न लगा रहा है। अस्तु।

क्रमशः..