Friday, 30 October 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-174

गतांश से आगे...
अध्याय उनतीस,भाग चार
(गत प्रसंग में आपने धराचक्र के मूल पाठ का अवलोकन किया,अब आगे....)

उक्त धराचक्र विधान का सुबोध  भाषान्तर एवं क्रियात्मक प्रदर्शनः-
सुखासीन महर्षि लोमश से सुतजन्मा नामक विप्र ने भूगत द्रव्य,शल्यादि ज्ञान सम्बन्धी प्रश्न किया। तदुत्तर में महर्षि ने इस लोककल्याणकारी विद्या पर प्रकाश डाला। सर्वप्रथम महर्षि ने भूखण्ड के बाह्य(परिवेशीय) लक्षणों पर प्रकाश डालते हुए कहा(श्लोकसंख्या२२ पर्यन्त) कि जिस स्थान पर अकारण ही गीतवाद्यादि का शब्द सुनायी पड़े,तथा रात्रि के अन्त में स्वयं प्रकाश दीख पड़े,वैसे स्थान में निश्चित ही धन होता है। जिस स्थान में नित्य सर्प,नेवले, सरठ(गोह) आदि दिखें,तथा प्रात-सायं उत्तराभिमुख खञ्जन पक्षी देखा जाय,वैसे स्थान पर गड़े हुए धन की सम्भावना होती है। लाल रंग का सर्प, और लाल चीटियाँ आदि भी द्वव्य की सूचना देती हैं। ‘चहा’ नामक पक्षी का निवास भी गुप्तधनसूचक है।
     इसी प्रसंग में आगे कहते हैं- स्वाभाविक रुप से कुत्ता एक पैर उठाकर ही मूत्र त्याग करता है,किन्तु जिस स्थान पर वह चारो पैरों पर खड़े होकर मूत्र त्याग करे,ऐसे स्थान पर गुप्तधन की सम्भावना होती है। श्वेतपुष्प वाली वृहती(भटकटैया) जहाँ विशेष रुप से उदित हो,वहाँ गुप्तधन की सम्भावना होती है। जिस भूमि में कमल के समान सुगन्ध हो, वा जल प्रक्षेपण से पुष्पगन्ध निकले,जहाँ की मिट्टी चिकनी,श्वेत,मधुरस्वाद वाली हो तो वहाँ गुप्तधन की सम्भावना होती है। जिस स्थान पर शयन करने पर  भोर के स्वप्न में सुन्दरियाँ,सवत्सागौ,श्वेत गौ,श्वेत सर्प,मोती, हल्दी, कमल,मछली या अन्य जलीयजन्तु प्रायः दीख पड़ें,वैसे स्थान में गुप्तधन की सम्भावना होती है।
     धन की सम्भावना के बाद अब जल की सम्भावना पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं- जहाँ चिकनी,मधुर स्वाद वाली मिट्टी हो साथ ही आसपास ज्यादातर वृक्ष कंटीले हों,तथा चीटियों के अंडे बहुतायत से दीख पड़े,दूर्वा सघन रुप से पसरा हुआ हो,ऐसे स्थान पर पर्याप्त मात्रा में जल की प्राप्ति होती है।
     इसी प्रसंग में आगे देवादि वास की चर्चा करते हैं। महर्षि कहते हैं कि जिस स्थान पर शयन करने से स्वप्न में देवता,ब्राह्मण,अग्नि,दूध, दही,,घृतादि मांगलिक पदार्थ का दर्शन हो,जहाँ तुलसी,पीपल,निम्बादि वृक्ष स्वयमेव उत्पन्न होते हों ऐसे स्थान में देवों का वास होता है।
     अब,शल्यादि लक्षण कहते हैं- जहाँ की ऊषर भूमि श्रृगाल आदि युक्त हो,और वृक्ष अकारण ही सूख जायें- ऐसे स्थान में शल्य की आशंका रहती है।जिस स्थान में तेलपूर्ण दीपक अकारण बुझ जाये,या उसका तेज फीका लगे,थोड़ी देर तक भी वास करने पर उद्वेग होने लगे,अनेकानेक विघ्न-वाधायें अकारण ही आती रहें,ऐसे स्थान पर निश्चित ही शल्य होता है।स्वप्न में पुष्प-फलादि युक्त वृक्ष,वन्ध्या स्त्री,टूटे-फूटे वरतन, तैल और तारागण दीख पड़ें,ऐसे स्थान पर निश्चित ही शल्य की आशंका होती है।
     द्रव्य-शल्यादि-ज्ञान हेतु बाह्य परिवेश लक्षण के पश्चात्(श्लोक संख्या २३ से आगे तक) अब,तत्ज्ञानार्थ क्रियात्मक पक्ष पर प्रकाश डालते हें।
     धराचक्र द्वारा भूमिपरीक्षण का मूल आधार प्रश्नज्योतिष है। इष्ट स्थान पर वास्तुसाधक को सादर आमन्त्रित करके, पुष्पाक्षतद्रव्यादि लेकर भूस्वामी द्वारा प्रश्न किया जाय। उस प्रश्न कालिक इष्टकाल से  गणित करके लग्न सहित सूर्यादि ग्रहों को स्पष्ट करें,साथ ही मात्र नवांश चक्र चित्रित करे। जन्मकुण्डली निर्माण की तरह यहाँ और अधिक गणित की आवश्यकता नहीं है। जन्मकुण्डली की तुलना में धराचक्र-क्रिया के गणित में किंचित भिन्नता भी है- इसका ध्यान रखना आवश्यक है। इष्टकाल से नवांश तक की क्रिया जन्मपत्र की भांति ही होगी,किन्तु पुनः लग्न स्पष्टी की एक और क्रिया करनी होगी। इस प्रकार स्पष्ट लग्न दो तरह का प्राप्त होगा। इसे आगे के उदाहरण से स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।यथा-मान लिया, १४ मई २०१५,संवत् २०७२,ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी, गुरुवार को पूर्वाह्न १०.३० बजे,बिहार प्रान्त के गया नगर में भूगर्भीय परीक्षण हेतु आमन्त्रित किया गया। ज्योतिषीय क्रिया करने पर निम्नांकित तथ्य सामने आये—
घट्यात्मक इष्टकाल- १३.५
स्पष्ट लग्न-कर्क-१३.५४.३१
स्पष्ट सूर्य- मेष-२९.२.३३
स्पष्ट चन्द्र- मीन-५.४७.११
स्पष्ट मंगल- वृष-७.२४.८
स्पष्ट बुध-  वृष- १८.७.१८
स्पष्ट गुरु-  कर्क-२०.२२.५०
स्पष्ट शुक्र-मिथुन-१२.४७.६
स्पष्ट शनि-वृश्चिक-८.१२.५१
स्पष्ट राहु-कन्या-१५.१९.१०
स्पष्ट केतु-मीन-१५.१९.१०
अब,मूल श्लोक संख्या २३के नियमानुसार,उक्त इष्टकाल को दो से गुणा करके पांच का भाग देकर,प्राप्त परिणाम को उक्त स्पष्टसूर्य में जोड़ देंगे।
इस प्रकार उक्त इ.का.- (घ.प.१३.०५ × २) ÷ ५ = ५.१४
अब,स्पष्टसूर्य- मेष यानी ०.२९.२.३३ + ५.१४ = ६.१३.२.३३की जो संख्या प्राप्त हुयी यही धराचक्रसाधनार्थ स्पष्टलग्न हुआ।हालाकि नवांशादि साधन क्रिया पूर्व साधित स्पष्टलग्न से ही करेंगे।इस दूसरे स्पष्टलग्न का उपयोग मेरु स्थापन हेतु करना है। इसकी संज्ञा- धराचक्रसाधनलग्न है।
अब,श्लो.सं.२४-२५(पूर्वार्ध)के अनुसार— यदि चरलग्न(मेष,कर्क,तुला,मकर) हो तो उसी राशि के नवांश तुल्य,स्थिरलग्न(वृष,सिंह,वृश्चिक,कुम्भ) हो तो उससे नवीं राशि के नवांश से,और द्विस्वभावलग्न(मिथुन,कन्या,धनु,मीन) हो तो उससे पांचवी राशि के नवांश में ‘मेरु’ की स्थापना करेंगे।
   उक्त उदाहरण में धराचक्रसाधनलग्न ६.१३.२.३३ यानी कन्या गत,तुला का १३ अंश,२ कला,३३विकला है। ज्ञातव्य है कि तुला चरलग्नों की सूची में है। अतः तुला के नवांश में ही मेरु की स्थापना करनी होगी।
     नवांश के नियमानुसार ३ अंश २० कला का एक नवांश होता है। अतः उक्त तुलालग्न का १३ अंश,२ कला,३३ विकला यानी चौथा नवांश हुआ। यही हमारा क्रियात्मक मेरु हुआ। यहीं से क्रमशः इलादि नौखण्डों को १२-१२अंश(प्रत्येक कोष्ठक का माप)पर स्थापित करना है;किन्तु इससे पहले एक और नियम को स्पष्ट कर लेना है- श्लोकसंख्या ३१ से ३३ तक स्पष्ट किया गया है कि किस भांति १२-१२ अंश के १०८ कोष्टकों में बारहों राशि और आठ दिशाओं को स्थापित करेंगे।

क्रमशः...

Thursday, 29 October 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-173

गतांश से आगे...अध्याय उनतीस,भाग तीन

अब यहाँ , जिज्ञासुओं के अवलोकनार्थ ग्रन्थ का मूलपाठ यथावत प्रस्तुत किया जा रहा है,तत्पश्चात् क्रिया विधि पर प्रकाश डाला जायेगा।  

धराचक्रम् — मूलपाठः-
अथ स्वस्थं सुखासीनं लोमशं मुमिसत्तमम् ।                 सुतजन्मा द्विजो भूयो नत्वा प्रोवाच सादरम् ।।
विप्र उवाच—
यत्र भूमिस्थितं द्रव्यं शल्यं तोयं च दैवतम्। कथं ज्ञानं भवेत्तस्य केनो पायेन लभ्यते ।।१।। श्रुतं नास्ति च यद्वित्तं दृष्टं नास्ति च यद् वसु।
तत्कथं लभ्यते स्वामिन् ! वद मे मुनिसत्तम ।।२।।
मुनिरुवाच—
साधु पृष्टं त्वया वत्स ! लोकानां भाग्यवर्धनम्। एतेषां लक्षणं वक्ष्ये येन ज्ञानं भवेन्नृणाम् ।।३।। श्रवणं गीतनादस्य वाद्यस्य श्रवणं तथा। प्रकाशो दृश्यते यत्र निशान्ते निश्चितं निधिः ।।४।। सर्पाणां दर्शनं चैव जायते यत्र नित्यशः। नकुलानां च सदनं सरठानां तथैव च ।।५।। दर्शनं खञ्जरीटानां प्रभाते यदि जायते । उदङ् मुखानां सायाह्ने तत्र स्यान्निश्चितं निधिः ।।६। सरीसृपाणां रक्तानां दर्शनं यत्र नित्यशः । पिपीलिकानां च तथा तत्र द्रव्यं न संशयः ।।७।। आरोप्य चतुरः पादान् यत्र श्वा मूत्रमुत्सृजेत् । चषाणां वसनं यत्र तदधो निश्चितं निधिः ।।८।। श्वेतपुष्पा च वृहती दृश्यते यत्र भूतले । तत्र द्रव्यं न सन्देहो ज्ञेयं देवेन रक्षितम् ।।९।। पद्मगन्धा धरा यत्र पुष्पतोयाभिषिञ्चने । सुश्वेतमधुरा स्निग्धा ज्ञेयं तत्र धनं ध्रुवम्।।१०।। नारीणां सुन्दरीणां च नित्यं स्वप्ने प्रदर्शनम् । यत्र श्वेता सवत्सा गौः श्वेतसर्पश्च मौक्तिकम् ।।११।। हरिद्रा तोयजानां च प्रभाते दर्शनं मुहुः । तत्रापि निश्चितं द्रव्यं ज्ञेयं लक्षणवेदिभिः।।१२।। स्निग्धा सुशर्करायुक्ता मृत्तिका लक्ष्यते यदि। सर्वे सकण्टका वृक्षा दृश्यन्तेऽण्डानि नित्यशः । यत्र दूर्वाङ्कुराढ्याभूस्तत्र तोयं न संशयः ।।१४।। देवानां दर्शनं यत्र विप्राणां दर्शनं तथा । यत्राग्निर्दृश्यते स्वप्ने गव्यानां दर्शनं तथा ।।१५।। तुलसी स्वयमुत्पन्ना यत्र तत्र च भूतले । निम्बाश्वत्थादिवृक्षाश्च तत्र देवो न संशयः ।।१६।। यत्रोषरप्रयुक्ता भूः श्रृगालाद्यैः समन्विता । वृक्षाः स्वयं विनश्यन्ति तत्र शल्यं न संशयः।।१७।। यत्र तैल प्रपूर्णोपि स्वयं दीपो विनश्यति । मन्दा ज्योतिर्हि दीपस्य दृश्यते यत्र भूतले।।१८।। चित्तमुद्वेग संयुक्तं जायते यत्र संस्थिते । नानाविघ्नयुता भूमिस्तत्र शल्यं न संशयः।।१९। फलितः पुष्पितो वृक्षो वन्ध्यास्त्री भग्नभाण्डकम् । तैलं तारागणश्चैव स्वप्ने शल्यस्य सूचकाः ।।२०।। जलप्रतरणं स्वप्ने श्रृगालादिकदर्शनम् । तत्र शल्यं वदेत् सत्यं तत्स्थानं च भयप्रदम्।।२१।। एवं ज्ञात्वा धनं शल्यं दैवतं जलमेव च। तत्र स्थाप्यं धराचक्रं द्रव्यशल्यादिसूचकम् ।।२२।। सूर्योदयादिष्टनाड्यो द्विघ्नाः शरविभाजिताः। युक्ताःस्पष्टार्कराश्यादौ स्फुटं लग्नं भवेद्ध्रुवम् ।।२३।। सार्धद्विघटिकामानमर्काल्लग्नं भवेदिह । चरे तन्नवमांशो यः स्थिरे तन्नवमादितः ।।२४।। द्विस्वभावे सुताद् ज्ञेयस्तदंशो मेरुसंज्ञकः । यत्रांशे संस्थितो मेरुस्तदादिद्वादशांशकाः।।२५।। ‘इलावृता’ख्यं ज्ञेयं, तदग्रे द्वादशांशकाः । ‘सुभद्राश्वा’ भिधं ज्ञेयं तदग्रे द्वादशांशकाः ।।२६।। ‘हरिवर्ष’ ततो ज्ञेयं तत्तुल्यं ‘किन्नरा’ ह्वयम् । ततो ‘भारत’ संज्ञं च ‘केतुमाला’ भिधं ततः ।।२७।। ‘रम्यका’ ख्यं ततो ज्ञेयं ‘हिरण्या’ ख्यं ‘कुरु’ न्तथा । विधोर्वषाणि ज्ञेयानि त्रीणि हर्यादिकानि च ।।२८।। त्रीणि वै रम्यकादीनि भानोः शेषाणि तद्द्वयोः । एवं देवविभागेषु दैत्यांशे व्यत्ययाद् वदेत्।।२९।। त्रयोदशोर्ध्वगा रेखा दश तिर्यग्गतास्तथा । कोष्ठानि तत्र जायन्ते शतान्यष्ठाधिकानि च ।।३०।। अधोऽधः क्रमतो लेख्यमङ्कानां नवकं बुधैः। दिने वृषादितो लेख्यं रात्रौ तु वृश्चिकादितः।।३१।। ईशानकोणमारभ्य यामद्वयमिनोदयात् । ततोयामद्वयं वह्निकाद् यामद्वयं ततः ।।३२।। नैर्ऋत्य कोणतो,वायुकोणाद् यामद्वयं तथा । एवं संस्थाप्य चक्रे तु ततः खेटान् प्रविन्यसेत् ।।३३।। यस्मिन्नंशे स्थिता ये च खेटाःस्युर्भास्करादयः । चन्द्रवर्षे यदार्केन्दू निधिर्ज्ञेयस्तदा ध्रुवम् ।।३४।। तौ सूर्यवर्षगौ शल्यं वाच्चं तत्र न संशयः । मिश्रवर्षे गतौ तौ चेद् देवता तत्र निश्चितम्।।३५।। सूर्यवर्षे यदा चन्द्रश्चन्द्रवर्षे यदा रविः। तत्र शून्यं विजानीयाल्लेशोऽपि नैव लक्ष्यते ।।३६।। स्व-स्ववर्षगतौ द्वौ चेत् शल्यं-द्रव्यंसविघ्नकम्।(स्वल्पंद्रव्यं च पाठान्तरम्)  स्वस्य वर्षे स्थितः सूर्यो मिश्रवर्षे निशाकरः ।।३७।। भिन्नभाण्डं वदेत्तत्र तुषकेशादिसंयुतम् । सूर्यवर्षे स्थितश्चन्द्रो मिश्रवर्षे दिवाकरः ।।३८।। धनं बहुविधं तत्र दृश्यते च तु लभ्यते। चन्द्रवर्षे दिवानाथो मिश्रवर्षे निशाकरः।।३९।। तत्र द्रव्यमलभ्यं स्याद्रक्षोभूतादि संयुतम् । स्वस्य वर्षे यदा चन्द्रो मिश्रवर्षे यदा रविः।।४०।। धनं च विद्यते तत्र दृश्यते नैव नैव च । उद्योगस्तत्र कर्तव्यो येन वै लभ्यते धनम् ।।४१।। एवं च निश्चयं कृत्वा स्थानं संचालयेद् बुधः। तदहं संप्रवक्ष्यामि स्वमतेनावधारय ।।४२।। यत्र चन्द्रः स्थिते चक्रे मेरुं तत्र नवेद्धिया । एवं सञ्चालिते चक्रे यत्र वै संस्थितः शशी।।४३।। तत्रैवास्ति ध्रुवं द्रव्यं,शुक्रेणैवं जलं वदेत् । एवं सूर्येण वक्तव्यं शल्यं नानाविधं ध्रुवम् ।।४४।। दैवतं गुरुणाप्येवं तत्र वाच्चं न संशयः । स्थिरांशे तु स्थितं तत्र चरांशे चलितं ध्रुवम् ।।४५।। द्विस्वभावांशके वाच्चं पूर्वापरविभागयोः। गतांशक प्रमाणेन भूमानं कल्पयेद्धिया ।।४६।। स्थिरांशे द्विस्वभावांशे द्विगुणं त्रिगुणं चरेत् । मेरु चन्द्रौ चरांशे चेज्जलाश्रयं विनिर्दिशेत् ।।४७।। द्रव्यभाण्डं वदेत् प्राज्ञो मेषाद्यंशे विधौ क्रमात् । ताम्रं,पाषाण भाण्डं च, गिरिपात्रं मदायसे ।।४८।। हेमपात्रं च पाषाणं,ताम्रं च पित्तलं तथा । आयसं मृणमयं कुण्डं पात्रमेवं विचिन्तयेत् ।।४९।। परमोच्चांशगे चन्द्रे गगनस्थं  तु सार्गलम् । अधिष्ठितं भवेद् द्रव्यं चन्द्राः खेटान्वितो यदि ।।५०।। यक्षेण रक्षिते सूर्ये वायुपुत्रेण भूमिजे । चन्द्रात्मजे पिशाचेन कुवेरेणामरार्चिते ।।५२।। चक्रेणाहिबलाख्येन स्वकुलैः स्थापितं धनम् । अदृष्टं चाश्रुतं वित्तं धराचक्रेण निश्चयेत् ।।५३।। स्वप्नादिभिरनुमितिं प्रत्ययार्थं तु कारयेत् । स्वप्नेस्वर्या विधानेन पश्चात् स्थानं तु शोधयेत् ।। ५४।।
विप्र उवाच—
किं विधानं प्रकर्त्तव्यं येन वै प्रत्ययो भवेत् । वद मे मुनिशार्दूल ! शिष्यो ऽहं तव सुव्रत ! ।।५५।।
मुनिरुवाच—
प्रणवं च ततो माया रमा स्वप्नेश्वरीति च । ङेऽन्तोनवार्णवाख्योऽयं मन्त्रः सर्वार्थसिद्धिदः।।५६।। ब्रह्मचर्यरतो मन्त्री हविष्याशी जितेन्द्रियः । भूशायी प्रजपेन्मन्त्रं लक्षमेकं यथोचितम् ।।५७।। अश्वत्थस्य च पत्रे वै विलिखे- न्मन्त्रमुत्तमम् । दूर्वया चाष्टगन्धेन पूजयित्वा विधानतः।।५८।। विन्दूषट-कोणवृत्तं च पद्यं चाष्टदलं ततः। त्रिरेखा भूगृहं चेदं यन्त्रं सर्वेप्सितप्रदम् ।।५९।। तद्यन्त्रं मूर्ध्निं विन्यस्य शयनं तत्र कारयेत् । यादृशं प्रवदेत् स्वप्ने तादृशं तत्र निर्दिशेत् ।।६०।। अन्यथा दुःखमाप्नोति खननं क्रियते यदि । देवशापमवाप्नोति नानाचिन्ता प्रजायते ।।६१।। गोप्यं ज्ञान मिदं प्रोक्तं न देयं यस्य कस्यचित् । श्रद्धायुक्ताय शिष्याय देयं वत्सरवासिने ।।६२।।

(इति लोमशसंहितायां त्रयोदशोत्थानेऽदृष्टाश्रुतवस्तु निर्णये धराचक्राख्यः नामः चतुर्विंशतितमोऽध्यायः।)

क्रमशः....



Tuesday, 27 October 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-172

गतांश से आगे....अध्याय उनतीस भाग दो

अज्ञात कुल के, भूगत गुप्त-सम्पदा-परीक्षण हेतु प्रयोग करने से पूर्व ऋषि प्रणीत भूगोल को समझ लेना अत्यावश्यक है।क्यों कि आगे इस क्रिया में हमें इसी भूगोल से काम लेना है।       हमारा पौराणिक भूगोल आधुनिक भूगोल-खगोल से बिलकुल भिन्न,गहन और रहस्यमय है। सात द्वीपों में विभक्त ब्रह्माण्ड में एक है जम्बूद्वीप,और यह जम्बूद्वीप भी नौ खण्डों में विभक्त है।    इस जम्बूद्वीप के लगभग मध्य में सुमेरु पर्वत है। इससे विभाजित आधे भाग को देवलोक,और आधे भाग को दैत्यलोक कहा जाता है। भारत की ओर देवभाग है,और तत् विपरीत दैत्य भाग। सुमेरु के चारो तरफ क्रम से निषध,सुगन्ध, नील और माल्यवान नामक चार पर्वत और भी हैं। इन चारो पर्वतों से घिरे हुए इलावृत खण्ड को ही स्वर्ग कहा जाता है। निषध पर्वत से दक्षिण में, आगे हेमकूट पर्वत पर्यन्त हरिवर्ष कहलाता है ; तथा हेमकूट पर्वत से दक्षिण हिमालय पर्वत पर्यन्त किन्नरवर्ष है,जिसे आज चीन,तिब्बत,महाचीन आदि नाम से जाना जाता है। हिमालय से दक्षिण, आगे समुद्र पर्यन्त जम्बूद्वीप का जो भाग है,वही हमारा भारतवर्ष है। ये तीनों— हरि,किन्नर, और भारतवर्ष देवभाग में हैं,और इनके अधिपति हैं चन्द्रमा।
     मध्य स्थित सुमेरु पर्वत के उत्तर में क्रम से नील,शुक्ल, और श्रृंगवान नामक तीन पर्वत हैं,तथा उन पर्वतों के बीच में क्रमशः रम्यकवर्ष,हिरण्यकवर्ष और कुरुवर्ष नामक तीन भूखण्ड हैं,जो दैत्यभाग में हैं,और इनके अधिपति हैं सूर्य।
     इलावृत खण्ड के पूर्वभाग में माल्यवान पर्वत और पूर्व समुद्र के बीच भद्राश्व खण्ड है,तथा पश्चिम भाग में सुगन्ध पर्वत और पश्चिम समुद्र के बीच केतुमाल खण्ड है।इन तीनों (ईलावृत, भद्राश्व और केतुमाल) खण्डों पर सूर्य और चन्द्रमा दोनों का समानाधिकार है।
   इस प्रकार स्पष्ट है कि जम्बूद्वीप के नौखण्डों में तीन-तीन खण्ड सूर्य और चन्द्रमा के पूर्ण अधिकार में हैं, एवं शेष तीन खण्डों पर दोनों का सहआधिपत्य है। यही कारण है कि इन तीनों को मिश्रखण्ड भी कहा जाता है। इस विभाजन को आगे एक सारणी से स्पष्ट किया जारहा है—

वर्षाधीष
   देवभाग
    दैत्यभाग
चन्द्रवर्ष
हरिवर्ष,किन्नरवर्ष,भारतवर्ष
रम्यकवर्ष,हिरण्यवर्ष,कुरुवर्ष
सूर्यवर्ष
रम्यकवर्ष,हिरण्यवर्ष,कुरुवर्ष
हरिवर्ष,किन्नरवर्ष,भारतवर्ष
मिश्रवर्ष
भद्राश्ववर्ष,इलावृतवर्ष,केतुमालवर्ष
भद्राश्ववर्ष,इलावृतवर्ष,केतुमालवर्ष
     
   ऊपर की सारणी में भूखण्डों के विभाजन की विशेषता दीख रही है कि देवभागीय चन्द्रवर्ष दैत्यभाग में विपरीत स्थिति में हैं,और इसी प्रकार देवभागीय सूर्यवर्ष भी दैत्यभाग में विपरीत स्थिति में ही हैं। मिश्रवर्ष समानरुप से दोनों के आधिपत्य में है।                    
     महर्षि लोमश ने उक्त नौखण्डों को पुनः बारह-बारह उपखण्डों में विभाजित किया है। इस प्रकार कुल एक सौ आठ खण्ड हो गये। इन्हीं १०८ उपखण्डों को कोष्ठाकार चक्र में चित्रित कर, दिन-रात्रि के ४+४=८ प्रहर विभाग में, ४ दिशा + ४ विदिशा (४+४=८) का भिन्न-भिन्न मान कल्पित करके वृषादि तथा वृश्चिकादि से क्रमशः बारह राशियों के नवांश को स्थापित किया गया है। आगे धराचक्र के प्रयोगात्क कर्म में इन्हीं स्थापनाओं से विचार करना है। उदारणार्थ एक चक्र प्रस्तुत किया जा रहा है।
     
    आगे दिये गये चक्र-कोष्ठकों(१०८)में सुविधा के लिए संकेताक्षर का ही प्रयोग किया गया है,अतः, पहले यहाँ उन संकेतों का विस्तार दे दिया जा रहा है,ताकि समझने में कठिनाई न हो। यथाः- मे-मेरु, इ-इलावृत, ह-हरिवर्ष, किं-किन्नरवर्ष,  भा-भारतवर्ष, भ-भद्राश्ववर्ष, के-केतुमाल, र-रम्यक्, हि-हिरण्य, कु-कुरुवर्ष। नवग्रहों एवं द्वादशराशियों के भी प्रथमाक्षरसंकेत ही दिये हैं।
ईशान                      पूर्ब                       अग्नि
वृ.
मि.
क.
सिं
क.
तु.
वृ.
ध.
म.
कु.
मी.
मे.
वायव्य                    पश्चिम                       नैर्ऋत्य



क्रमशः....