Friday, 9 October 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-165

गतांश से आगे...अध्याय अठाइस, पहला भाग

                   अध्याय-२८ — अहिबलचक्र 





     पूर्व प्रसंग, वास्तुभूमि चयन-परीक्षण-शोधन(द्रष्टव्य-अध्याय ग्यारह-ग) क्रम में भूगत शल्योद्धार की थोड़ी चर्चा हुयी है। वास्तुशास्त्र का महत्त्वपूर्ण विवेच्य विषय होने के कारण इसे स्वतन्त्र अध्याय में रखकर व्यापक रुप से इस पर प्रकाश डालना उचित प्रतीत हुआ। अतः सामान्य जनोपयोगी गृह निर्माण की सभी बातों की चर्चा के बाद अब इस विषय पर आते हैं।
     
     महर्षि लोमश का परिचय इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में ही दिया जा चुका है। तत्प्रणीत लोमशसंहिता,जो एक विशाल ग्रन्थ है,किन्तु उसका अल्पांश ही वर्तमान में उपलब्ध है। उसी में एक श्लोक है-
        चक्रेणाहिबलाख्येन स्वकुलैः स्थापितं धनम्।
        अदृष्टं चाश्रुतं वित्तं धराचक्रेण निश्चयेत्।।                         
धराचक्र (श्लोकसंख्या ५३) में यह श्लोक ज्यों का त्यों है। महर्षि का संकेत है कि अपने कुल द्वारा रक्षित-गोपित-विस्मृत सम्पदा का ज्ञान करने के लिए अहिबलचक्र की साधना करनी चाहिए,तथा अज्ञात कुल रक्षित-गोपित-विस्मृत सम्पदा का ज्ञान करने हेतु धराचक्र का प्रयोग करना चाहिए।
     लक्षणार्थ,हम कह सकते हैं कि भूगत समस्त सामग्रियों का ज्ञान इन(दोनों)चक्रों की साधना से हो सकता है-चाहे वो शल्य हो या जलादि। इसकी प्रमाणिकता असंदिग्ध है,अन्यथा बाद के अनेक विद्वान इसे यथावत अंगीकार नहीं करते।
     शकुनशास्त्र के अन्तर्गत स्वरशास्त्र का एक बहुश्रुत ग्रन्थ है- नरपति जयचर्या। वहाँ भी लोमशसंहिता का यह रहस्यमय विषय यथावत है। धारा नगरवासी जैन धर्मानुयायी आचार्य नरपति ने विक्रमसम्वत् १२३२ (ई.सन् ११७५)के करीब अपने ग्रन्थ में इसे समाहित किया। वास्तुरत्नाकर नामक प्रसिद्ध पुस्तक के शल्योद्धार प्रकरण में भी इसे ज्यों का त्यों रखा गया है। यह अहिबलचक्र मूलतः मात्र २८ श्लोकों का है,जो सुतजन्मा नामक ब्राह्मण और महर्षिलोमश का संवाद है। कल्पादि में महर्षिलोमश ने इस विद्या को भगवान शिव से प्राप्त किया था।
     अहिबलचक्र मुख्यरुप से प्रश्नज्योतिष है,फिर भी साधना बल के अभाव में सिद्धान्त-लब्ध तो हुआ जा सकता है,किन्तु सम्पदा-लब्ध होने में संशय है। ज्योतिषीय गणना हेतु, अभिजित सहित सताइस नक्षत्र समूह के स्थापन से जो आकृति बनती है,वह कुण्डलाकार सर्प की तरह होती है।  इसी कारण इसे अहि(सर्प)बलचक्र कहा गया है,जैसा कि पूर्व के चित्र से स्पष्ट है।             
     सर्वप्रथम उक्त ग्रन्थ के मूल श्लोकों को यहाँ संकलित कर रहा हूँ—
अहिचक्रं प्रवक्ष्यामि यथा सर्वज्ञभाषितम् । द्रव्यं शल्यं तथा शून्यं येन जानन्ति साधकाः।।१।। निधिर्निवर्तनैकस्थः सम्भ्रान्तो यत्र भूतले। तत्र चक्र मिदं स्थाप्यं स्थानद्वारमुखस्थितम्।।२।। ऊर्ध्वलेखाष्टकं लेख्यं तिर्यक् पञ्च तथैव च । अहिचक्रं भवत्येवमष्टाविंशतिकोष्ठकम्।।३।। तत्र पौष्णाश्वियाम्यर्क्षं कृत्तिकापितृभाग्यकम् । उत्तराफाल्गुनी लेख्यं पूर्वपंक्त्यां भसप्तकम्।।४।। अहिर्बुध्न्याजपादर्क्षं शतभं ब्राह्यसार्पभम्। पुष्यं हस्तं समालेख्यं द्वितीयां पंक्तिमास्थितम्।।५।। विधिर्विष्णुर्धनिठाख्यं सौम्यरौद्रपुनर्वसु । चित्राभं च तृतीयायां पंक्तौ धिष्ण्यस्य सप्तकम्।।६।। विश्वर्क्षं तोयभं मूलं ज्येष्ठां मैत्र विशाखिके । स्वाती पंक्त्यां चतुर्थ्यां च कृत्वा चक्रं विलोकयेत्।।७।। एवं प्रजायते चक्रे प्रस्तारः पन्नगाकृतिः । द्वारशाखे मघायाम्ये द्वारस्था कृत्तिका मता।।८।। अश्वीशपूर्वाषाढादित्रिकं पञ्च चतुष्टयम् । रेवती पूर्वभाद्रेन्दोर्भानि शेषाणि भास्वतः।।९।। उदयादिगता नाड्यो भग्नाः षष्ट्याऽऽप्तशेषके । दिनेन्दुभुक्तयुक्तेऽसौ भवेत्तत्कालचन्द्रमाः।।१०।। षष्ठिघ्नं तं निशानाथं शरवेदाप्तकं पुनः । त्रिभिर्भक्त्वा युगैः शेषं प्रागादि चक्रवक्त्रगम्।।११।। चन्द्रवत्साधयेत्सूर्यमृक्षस्थं चेष्टकालिकम् । पञ्चाद्विलोकयेत्तौ च स्वर्क्षे वा चान्यभे स्थितौ।।१२।। चन्द्रऋक्षे यदाऽर्केन्दू तत्रास्ति निश्चितं निधिः । भानु ऋक्षे स्थितौ तौ चेत्तदा शल्यं न चाऽन्यथा।।१३।। स्वस्वभे द्वितयं ज्ञेयं नास्ति किञ्चिद्विपर्यये । स्थितं न लभते द्वव्यं चन्द्रं क्रूरग्रहान्विते।।१४।।

(मातान्तर— यत्र कोष्ठे स्थितश्चन्द्रस्तत्र कोष्टे निधिं वदेत् । यत्र कोष्ठे स्थितः सूर्यस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत्।।) शुभक्षेत्रगते चन्द्रे लाभः स्यान्नात्र संशयः। पापक्षेत्रे न लाभो हि विज्ञेयः स्वरपारगैः।।१५।। (मतान्तर— शुभक्षेत्रगते चन्द्रे द्रव्यलाभो न संशयः। पापक्षेत्रे न लाभःस्याज्ज्ञातव्यं दैवविद्वरैः।।)  पुष्टेचन्द्रे भवेन्मुद्रा क्षीणे चन्द्रेऽल्पको निधिः। ग्रहदृष्टिवशात्सोपि विज्ञेयो नवधा बुधैः।।१६।। हेम तारं तु ताम्रारं रत्नं कांस्यायसं त्रपु । नागं चन्द्रे विजानीयाद्भास्करादिग्रहेक्षिते।।१७।। मिश्रैर्मिश्रं भवेद् द्रव्यं शून्यं दृष्टिविवर्जिते । सर्वग्रहेक्षिते चन्द्रे निर्दिष्टोऽसौ महानिधिः ।।१८।। हेमरुप्यं च ताम्रं च पाषाणं मृणमयायसम् । सूर्यादिगृहगे चन्द्रे द्रव्यभाण्डं प्रजायते।।१९।। मुक्तराश्यंशमानेन भूमानं कामिकैः करैः। नीचे द्विघ्नं परं नीचे जलस्थोऽसौ भवेन्निधिः।।२०।। स्वोच्चस्थे तूर्ध्वगं द्रव्यं नवमांशक्रमेण च । परमोच्चे स्थिते चन्द्रं भित्तिस्थ मृक्षसंक्रमे।।२१।। चन्द्रांश भुक्तमानेन द्रव्यसंख्या विधीयते । तस्या दशगुणा वृद्धिः षड्वर्गेन्दुबलक्रमात्।।२२।। अधिष्ठितं भवेद्द्रव्यं यत्र चन्द्रो ग्रहान्वितः। तदाधिष्ठायको ज्ञेयो भास्करादिग्रहैः क्रमात्।।२३।। ग्रहं मुग्धग्रहं चैव क्षेत्रपालं च मातृकाः। दीपेशं भीषणं रुद्रं यक्षं नागं विदुः क्रमात्।।२४।। ग्रहे होमः प्रकर्तव्यः मुग्धे नारायणीबलिः।क्षेत्रपाले सुरामांसं मातृकायां महाबलिः।।२५।। दीपेशे दीपजा पूजा भीषणे भीषणार्चनम् । रुद्रे च रुद्रजो जाप्यो यक्षे यक्षादिशान्तयः।।२६।। नागे नागगणाः पूज्या गणनाथेन संयुताः । लक्ष्मी धरादितत्वानि सर्वकार्येषु पूजयेत् ।।२७।। एवं कृत्वा विधानेन निधिः साध्योऽपि सिद्ध्यति । निधिप्राप्ता नरा लोके वन्दनीया न संशयः।।२८।।

क्रमशः...


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