Thursday, 30 August 2018

आवश्यक सूचना

प्रिय बन्धुओं !

      पुण्यार्कवास्तुमंजूषा के प्रकाशन सम्बन्धी

     जैसा कि इस ब्लॉग के पाठकबन्धु अवगत हैं- प्रकाशन से पूर्व में ही ये सम्पूर्ण शोधग्रन्थ यहां पोस्ट किया जा चुका है ।
      
     सुदीर्घ प्रतीक्षोपरान्त चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी से प्रकाशित मेरा ये शोधग्रन्थ - पुण्यार्कवास्तुमंजूषा  मुझे हस्तगत हुआ ।
18 से.मी. x 25 से.मी. आकार में बाउण्ड फॉर्म में 520 +16 पेज (रंगीन चित्रावली) युक्त कुल 536 पृष्ठों का ये पुस्तक है, जिसका मूल्य प्रकाशक ने 1000रु.(एक हजार) रखा है ।


   बीच के पन्नों पर भी यथास्थान सैकड़ों सादे चित्र भी दिये गये हैं, जिससे विषय वस्तु को समझना आसान होगा ।

    पुस्तक में वास्तुशान्ति और गृहप्रवेश तथा शिलान्यास की पूरी पद्धति भी संलग्न है ।

   इस प्रकार वास्तु सलाहकार ही नहीं, कर्मकाण्डियों के लिए भी ये पुस्तक उपयोगी है , साथ ही विद्यार्थियों के लिए भी उतना ही उपयोगी है ।

      ब्लॉग पर पोस्ट करने के बाद से बहुत से बन्धुओं का लागातार संदेश आते रहा है इसके लिए । 
   अतः इच्छुक बन्धु पुस्तक प्राप्ति हेतु अब चाहें तो प्रकाशक से अथवा सीधे मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं- इस आई डी पर-  
guruji.vastu@gmail.com
अथवा कॉल करें- +918986286163 पर

धन्यवाद ।


   बड़े शहरों में रहने वाले बन्धु सीधे चौखम्बा की दुकान से पुस्तक उपलब्ध कर सकते हैं, जिससे उन्हें डाकखर्च की बचत होगी । 
  
 
धन्यवाद ।





Saturday, 18 August 2018

अटलजी की अमिट यादें

अटलजी की अमिट यादें—
बात सन् 1998 की है – चिर प्रतीक्षित मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हुयी थी । हँसी के लहज़े में श्रीमतीजी ने मुझे उत्प्रेरित किया- मैं तो अटलजी को वचपन में ही जयमाल पहना चुकी हूं । आप अपनी पुस्तकें भेंट करने के बहाने ही उनसे मिलते क्यों नहीं एक बार ।
मैंने मुस्कुराते हुए उसे परास्त करने का दुस्प्रयास किया— श्रीमती जी ! जरा गौर फरमायें- आप जिस समय उन्हें विजयमाल पहनायी उस समय वे जनसंघ का दीपक जला रहे थे और आज वे भारतीय जनता पार्टी का कमल खिलाकर सबसे बड़े लोकतान्त्रिक राष्ट्र के प्रधान मंत्री पद को सुशोभित कर रहे हैं । तब और अब में आसमान-जमीन का फ़र्क है । हालाकि अटलजी के दरबार में ड्योढ़ियां बहुत कम हैं , वो खास होकर भी आम से अलग हो ही नहीं पाये हैं, एक अद्भुत चुम्बकत्व है उस व्यक्तित्व में ।  फिर भी प्रधानमंत्री का रुतबा ही कुछ और होता है ।
  हालाकि उनसे मिलने की प्रबल इच्छा तो मेरी भी थी । लेकिन किन्तु-परन्तु बहुत था । शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, समाजिक कुल मिलाकर चारों ओर से विसंगतियां ही विसंगतियां झेल रहा था पिछले दो-तीन वर्षों से । ज्योतिष की भाषा में कहूं तो शनि की महादशा में शनि की ही अन्तर्दशा और उन्हीं का गोचर प्रकोप भी चल रहा था मेरे ऊपर । फलतः दिल्ली बहुत दूर रही मेरे लिए ।
इसी बीच मेरी पुत्री अर्चना का विवाह तय हो गया । दामाद मिले बाह्याभ्यन्तर  संघी- स्वनाम धन्य डॉ.प्रमोद पाठक ।  मैंने उस विवाह के निमन्त्रण-पत्र सहित, अपनी पुस्तकें उन्हें रजिस्टर्ड पार्सल से भेज दिया - अपनी इच्छा और विवशता को ज़ाहिर करते हुए ।
मुझे सपने में भी उम्मीद न थी कि मुझ तुच्छ के पत्र की त्वरित प्रतिक्रिया होगी । 
कोई सप्ताह भर बाद ही डाकिया प्रधानमंत्री कार्यालय-प्रेषित मेरे नाम का लिफाफा लिए मुहल्ले में तलाश करता हुआ पहुंचा । मेरा न तो निजी मकान है और न कोई प्रसिद्ध व्यक्ति ही हूं मैं । फलतः डाकिया को घंटों परेशानी उठानी पड़ी । कोई साधारण चिट्ठी होती तो डेड लेटर रुम में लौट कर धूल चाटती, किन्तु इस पत्र ने तो मुझे मुहल्ले ही नहीं शहर में  भी चर्चित कर दिया ।  सैंकड़ो लोग मुझसे मिलने आये - इस जिज्ञासा से कि उनके मुहल्ले में कौन ऐसा गुमनाम आदमी रह रहा है, जिसके पास प्रधानमंत्री का पत्र आता है ।
उस अविस्मरणीय पत्र को आपके लिए शेयर कर रहा हूँ, जो अनुकरणीय परमादर्णीय अटलजी की अमिट याद बन कर मेरे पास सुरक्षित है । 
      
           

Wednesday, 15 August 2018

गुलामी का कैप्सूलाइजेशन

स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर-

गुलामी का कैप्सूलाइजेशन

          आप चाहें तो इसे सुधार कर, कैप्सूलाइज्ड गुलामी भी कह सकते हैं । हो सकता है किसी को अटपटा भी लगे ये शब्द-योजना, किन्तु मुझे उनसे सहानुभूति है थोड़ी । हमदर्दी भी । वो बिलकुल दया के पात्र हैं, जिन्हें यह शीर्षक बेतुका लग रहा है । दरअसल पिछले इकहत्तर वर्षों से हम इसे ही स्वतन्त्रता के नाम से जानते आ रहे हैं ।

          इस सम्बन्ध में कुछ और कहने से पहले, कुछ और ही कह लूं— बेतुकी शब्द-योजना के दोनों पदों को ठीक से समझना जरा जरुरी है । वैद्य लोग जरा भोले किस्म के होते थे । चिरायता का कड़वा काढ़ा भी सीधे-सीधे पीने की सिफारिश करते थे । गिलोय, नीम, करेला सब कुछ सीधे हज़म करो । किन्तु ये डॉक्टर लोग जरा हुशियार होते हैं । होशियारी का ही नाम है – एलोपैथ ।  जिलेटीन कैपसूल में छिपा कर चाहो तो सूअर का मैला भी खिला दो । जीने की चाह लिए लोग खाने में जरा भी आनाकानी नहीं करेंगे । विशुद्ध शाकाहारियों को भी एडीकैप खाने में कोई दिक्कत नहीं क्यों कि वो कैप्सूलाइजडफॉर्म में होता है । ज्यादातर लोगों को तो पता भी नहीं होता कि वे मछली का तेल खा रहे हैं । प्लेसेन्टा का जूस भी बड़े चाव से पीये जा रहे हैं, बिना ना-नुकूर के । यही कमाल है कैप्सूलाइजेशन का ।
         इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए गुलामी को भी कैप्सूलाइज करने का करिश्मा दिखाया गया । सत्ता के छद्म हस्तानान्तरण को ही स्वतन्त्रता मान लिया गया और समझा भी दिया गया देशवासियों को । पिछले इकहत्तर वर्षों से हम इसका जश्न मनाते आ रहे हैं । जलेबियां खाते-खिलाते आ रहे हैं । वोट देते आ रहे हैं, सिर भी पीटते आ रहे हैं । गाड़ी वही है , ड्राइवर बदलते आ रहे हैं ।

सन् 1935 के गवर्मेन्ट ऑफ इण्डिया रुल को ही झाड़-पोंछ कर संविधान के कैपसूल में भर कर करीने से सहेज लिए हैं । हम पूरी तरह वाकिफ़ हैं कि जो भी कानून हमने बना रखे हैं, खुल कर सच कहें तो किसी और के बनाये हुए कानूनी दाव-पेज को ही हम अपनाये बैठे हैं, जिसके बूते शायद ही किसी को न्याय मिल पाया हो । सच्चाई ये है कि बहुत से कानून तो बनाने वालों को भी ठीक से समझ नहीं आया आज तक, फिर उससे खेलने वाले की क्या विसात ! न्याय की देवी तो आंखों पर पट्टी बांधे हुयी हैं हस्तिनापुर की महारानी गांधारी की तरह, जो किसी खास क्षण में क्षणभर के लिए खुली भी तो कृष्ण की कलाबाजी से निरस्त हो गयी ।  एक धृतराष्ट्र ने ही सर्वनाश करा दिया । एक ही उल्लू काफी है बरबाद-ए-गुलिस्तां को, हर शाख पे उल्लू बैठा है , अन्ज़ाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ? सत्य सिसकारियां ले रहा है- सत्यमेव जयते के स्लोगन में टंग कर । गीता की शपथ लेकर सत्य बोलने की वचनबद्धता , संविधान की शपथ लेकर राष्ट्रसेवा का संकल्प कितना बेमानी है- इससे वाकिफ़ हैं हम सभी । जितना झूठ न्यायालय में बोला जाता है उतना तो शायद वेश्यालय और मदिरालय में भी नहीं बोला जाता होगा । न्याय के हाथ कानून की डोर से बंधे हैं और कानून बनाने वाले कलम कम, अंगूठा ज्यादा इस्तेमाल करने वाले हैं हमारे अज़ूबे लोकतन्त्र में । चपरासी पढ़ा-लिखा होना जरुरी है, कानून तो बिना पढ़े हुए भी बनाया ही जा सकता है । सत्तर वर्षों में न्याय अपना लिवास नहीं बदल पाया, देश क्या खाक बदलेगा !  न्याय चेहरे की बनावट , कुर्सी की ऊँचाई, वेशभूषा और जेब का वजन देख कर मिलता है ।  सुख-सुविधायें, रोजी-रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सबकुछ उसी बैरोमीटर पर आधारित है । जान-माल और इज्ज़त-आबरु  - तब भी दांव पर लगा था और आज भी ।

थोड़ा कुछ जो बदलाव दीख रहा है वो तो ईश्वर की कृपा है और वलिदानियों का आशीष या कहें भ्रष्टाचारियों की मुट्टी से छिटका हुआ किंचित कर्मठों का कर्म-किरण ।  अन्यथा गुलामी की जंजीर बिलकुल टूटी नहीं है, स्वरुप बदला है सिर्फ – कैप्सूलाइज्ड हुआ है सिर्फ ।

हां, कुछ खास सुविधायें मिली हुयी हैं, जिनसे साफ ज़ाहिर होता है कि स्वतन्त्र हो गए हैं –  चाहें तो पद-मर्यादा का लाज-लिहाज छोड़ कर किसी को कभी भी कुछ भी कह सकते हैं—गाली भी दे सकते हैं, गले भी लगा सकते हैं और मन करे तो आँख भी मार सकते हैं । आँखों की सारी गुस्ताखियां माफ हो सकती हैं अनोखे लोकतन्त्र में ।

इतना ही नहीं , ग्रूप बना कर कुछ भी कर सकते हैं । मन हो तो इसे पार्टी नाम दे दें ।  दंगा-फसाद की तैयारी चाहें तो कोतवाली में भी बैठ कर कर सकते हैं और  इच्छा हो तो संसद में भी । सड़क पर तो जन्मसिद्ध अधिकार है ही । यहां भला कौन रोक सकता है । चाहें तो ठेला-खोमचा लगा लें, चाहें तो लाल-हरे झंडे लहरा लें , चाहें तो किसी का पुतला फूंक लें या किसी को जिन्दा ही फूंक दें । 
   पहाड़ या जंगल में छिप कर रहना कोई जरुरी नहीं । मुंह ढक कर या कि अन्धेरे का लाभ लेकर चलने की भी जरुरत नहीं । सही आदमी को सही समय पर सही तरीके से वोट देते रहें - सारा कुछ सही होता रहेगा - खासकर आपके लिए । ये आप पर निर्भर है कि आप आम रहना पसन्द करते हैं कि खास । आप चाहें तो वी.सी. आपके घर आकर मनमानी डिग्री पहुँचा दे सकते हैं । आप चाहें तो न्यायालय 24X7 आपकी सेवा में सिर झुकाये, हाथ जोड़े खड़ा भी रह सकता है, क्यों कि डोरी बांटने वाले का कदर तो करना ही है न अनोखे लोकतन्त्र में ।  इतना ही नहीं आप अपने मनोरथ के लिए शेल्टर होम को बेडरुम में जब चाहें कन्वर्ट कर सकते हैं – सोफा कम बेड की तरह ।

तो आइये स्वतन्त्रता की जश्न एक बार फिर मना लें । जलेबियां आप खा लें जी भर कर । चिन्ता करने की जरुरत नहीं , कीमत किसी और ने चुकायी हैं । रोकने वाला भला कौन है ! आपही का तो लोकतन्त्र है ।

वन्देमातरम् । वन्देमातरम् । वन्देमातरम् । 

Thursday, 9 August 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारणःःपचीसवां भाग (समापन खण्ड))

गतांश से आगे...
                                         नवम अध्याय
                      उपसंहार
      चिर प्रतीक्षित योजना आज पूरी हुयी । विभिन्न कारणों से इस शोधपरक पुस्तिका के सम्पादन कार्य में व्यवधान आते रहे , किन्तु अन्ततः आज सम्पन्न हुयी ।

कालसर्पयोग के बारे में जो कुछ भी मैंने पढ़ा, जाना, अनुभव किया उसे यथासम्भव आप सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया । कालसर्पयोग को लेकर फैले भ्रम का निवारण इससे अवश्य होगा - ऐसा मुझे विश्वास है । आशा है ये पुस्तिका आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।

पुनः एक बार आग्रह करना चाहता हूँ कि कालसर्पदोष का विनिश्चय करने में जल्दवाजी न की जाये । विभिन्न विन्दुओं से जांच-परख करके ही निश्चित किया जाये कि वास्तव में ये दोष जन्मांक में लागू हो रहा है या नहीं । क्यों कि बहुत बार हम निर्णय लेने में जल्दवाजी कर देते हैं और इससे जातक को परेशानी होती है तथा ज्योतिषशास्त्र की बदनामी होती है ।

विनिश्चय के पश्चात् समुचित उपाय अवश्य करे । उपचार के सम्बन्ध में पुनः स्पष्ट कर दूं कि कालसर्पदोष का उपचार जीवन में कई बार करना पड़ता है । ऐसा नहीं कि अन्य दोषों की तरह एक बार शान्ति कराके निश्चिन्त हो गये ।

पितृदोषादि अन्यान्य दोषों का भी तुलनात्मक विचार कर ही लेना चाहिए । बहुत बार तो ऐसा होता है कि पितृदोष को ही कालसर्प दोष करार दे देते हैं । इससे सही उपचार नहीं हो पाता । अस्तु।

कमलेश पुण्यार्क
मैनपुरा,चन्दा,अरवल,बिहार
    विक्रमाब्द २०७५, ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी,
    शुक्रवार,दि.११ मई २०१८

    ःःःःःःःःइत्यलम्ःःःःःःःः

Wednesday, 8 August 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारणःःचौबीसवां भाग

गतांश से आगे....


                          अष्टम अध्याय
                               
                उपयोगी स्तोत्र-मन्त्रादि

नवनाग मन्त्र— 
  ऊँ नवकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नः सर्पः प्रचोदयात् ।।

नवनाग स्तोत्र—
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् । शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ।। एतानि नवनामानि नागानां च महात्मनाम् । सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः ।।
सर्पगायत्री— . ऊँ भुजंगेशाय विद्महे सर्पराजाय धीमहि  तन्नो नागः प्रचोदयात् ।
. ऊँ भुजंगाय विद्महे चक्षुः श्रोत्राय धीमहि तन्नः सर्पः प्रचोदयात् ।
. ऊँ तत्पुरुषाय विद्महे कद्रवंशाय धीमहि तन्नः सर्पः प्रचोदयात् ।
शिवपंचाक्षर स्तोत्र— 
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय , भस्मांगरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ।।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय ।।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकारय नमः शिवाय ।।
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय ।।
यक्षस्वरुपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ।
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।
 ।। इति श्री शिवपंचाक्षर स्तोत्रम् श्री शिवार्पणमस्तु ।।

सर्पप्रार्थना—
ब्रह्मलोके च ये सर्पाः शेषनाग पुरोगमाः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
विष्णुलोके च ये सर्पाः वासुकि प्रमुखाश्चये ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
रुद्रलोके च ये सर्पाः तक्षक प्रमुखास्थता ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
खांडवस्य तथा दाहे स्वर्ग ये च समाधितः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
सर्पसत्रे च ये सर्पाः आस्तिकेन च रक्षिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
प्रलये च ये सर्पाः कर्कोट प्रमुखाश्च ये ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
धर्मलोके च ये सर्पाः वैतरण्यां समाश्रिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
ये सर्पाः पार्वतीयेषुदरीसंधिषु संस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पाः प्रचरन्ति हि ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
पृथिव्यां चैव ये सर्पाः ये सर्पाः बिलसंस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
रसातले च ये सर्पाः अनन्ताद्या महाबलाः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
ब्रह्मलोके च ये सर्पाः शेषनाग पुरोगमाः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
विष्णुलोके च ये सर्पाः वासुकि प्रमुखाश्चये ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
रुद्रलोके च ये सर्पाः तक्षक प्रमुखास्थता ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
खांडवस्य तथा दाहे स्वर्ग ये च समाधितः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
सर्पसत्रे च ये सर्पाः आस्तिकेन च रक्षिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
प्रलये च ये सर्पाः कर्कोट प्रमुखाश्च ये ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
धर्मलोके च ये सर्पाः वैतरण्यां समाश्रिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
ये सर्पाः पार्वतीयेषुदरीसंधिषु संस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पाः प्रचरन्ति हि ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
पृथिव्यां चैव ये सर्पाः ये सर्पाः बिलसंस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
रसातले च ये सर्पाः अनन्ताद्या महाबलाः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ।।
                   ।। इति सर्पप्रार्थना ।।

मनसादेवी मन्त्र— ऊँ ह्रीं तत्कारिणी मत्कारिणी विषहारिणी विषरुपिणी विषं हन हन इन्द्रस्यवज्रेण नमः ।।
मनसादेवी स्तोत्रम्—
                    महेन्द्र उवाच-
देवीं त्वां स्तोतुमिच्छामि सा दीनां प्रवरां पराम् ।
परात्परां च परमां नहि स्तोतुं क्षयोऽधुना ।।
स्तोत्राणां लक्षणं वेदे स्वभावाख्यानतः परम् ।
न क्षमः प्रकृतिं वक्तुं गुणानां तव सुव्रते ।।
शूद्रसत्त्वस्वरुपा त्वं कोपहिंसाविवर्जिता ।
न च शप्तो मुनिस्तेन त्यक्तया च त्वया यतः ।।
त्वं मया पूजिता सा वी जननी च यथाऽदिति ।
दयारुप च भगिनी क्षमारुपा यथा प्रसूः ।।
त्वया में रक्षिताः प्राणाः पुत्रदारा सुरेश्वरी ।
अहं करोमि त्वां पूज्यां मम प्रीतीश्च वर्द्धते ।।
नित्यं यद्यपि पूज्या त्वं भवेऽत्र जगदम्बिके ।
तथाऽपि तव पूजां वै वर्द्धयामि पुनः पुनः ।।
ये त्वामाषाढसंक्रान्त्यां पूजयिष्यन्ति भक्तितः ।
पञ्चम्यां मनसाख्यायां मासान्ते वा दिने दिने ।।
पुत्रपौत्रदयस्तेषां वर्द्धन्ते च धनानि च ।
यशस्विनः कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विताः ।।
ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दत्यज्ञानतोजनाः ।
लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा ।।
त्वं स्वर्गलक्ष्मीः स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला ।
नारायणांशो भगवान् जरत्कारुर्मुनीश्वरः ।।
तपसा तेजसा त्वां च मनसा ससृजे पिता ।
अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिधा ।।
मनसादेवितुं शक्ता चाऽऽमना सिद्धयोगिनी ।
तेन त्वं मनसादेवीं प्रवदन्ति पुराविदः ।।
सत्त्वरुपा च देवी त्वं शश्वत्सर्वानषेवया ।
यो हि यद्भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम् ।।
इमं स्तोत्रं पुण्यबीजं तां सम्पूज्य च यः पठेत् ।
नस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।।
विषं भवेत्सुधातुल्यं सिद्धस्तोत्रं यदा पठेत् ।
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धस्तोत्रो भवेन्नरः ।।
सर्पशायी भवेत्सोऽपि निश्चितं सर्पवाहनः ।।

।। ऊँ श्री ब्रह्मवैवर्तमहापुराणे महेन्द्रकृतं मनसास्तोत्रं श्री मनसार्पणमस्तु ।।

राहुमन्त्रम्— ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः ऊँ भूर्भुवः स्वः ऊँ कयानश्चित्र आभुवदूती सदा वृधः सखा । कया सचिष्ठता वृता । ऊँ स्वः भुवः भूः ऊँ सः भ्रां भ्रीं भ्रौं सः ऊँ  रां राहवे नमः ।।
राहु कवचम्—) ऊँ अस्य श्री राहु कवचस्तोत्र महामन्त्रस्य चन्द्र ऋषिः अनुष्टुप छन्दः     राहुः देवताः     मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे / पाठे विनियोगः ।
ध्यानम्-   प्रणमामि सदा राहुं सर्पाकारं किरीटिनम् ।
             सैहिकेयं करालास्यं भक्तानामभयप्रदम् ।।
कवचम्— नीलाम्बरः शिरः पातु ललाटं लोकवन्दितः ।
चक्षुषी पातु मे राहुः श्रोत्रे मेऽर्थशरीरवान्  ।।
नासिकां मे करालास्यः शूलपाणिः मुखं मम ।
जिह्वां मे सिंहिकासूनुः कण्ठं में कण्ठनाशनः ।।
भुजगेशो भुजौ पातु नीलमाल्यः करौ मम ।।
पातु वक्षस्तपोमूर्तिः पातु कुक्षिं विधुन्तुदः ।
कटिं मे विकटः पातु उरु मे सूरपूजितः ।
स्वर्भानुः जानुनी पातु जंघे मे पातु चाप्यहिः ।।
गुल्फौ ग्रहाधिपः पातु पातु में भीषणाकृतिः ।
सर्वाण्यं मे पातु नीलचन्दनभूषितः ।।
राहुस्तोत्रमिदं नृणा सिद्धिदं पापनाशनम् ।
यो भक्त्या पठत्यनुदिनं नियतः शुचिस्सन् ।।
स कमानवाप्नोति कीर्तिमतुलां श्रियमृद्धिम् ।
आयुरोग्यमात्मविजयित्व महि प्रसादात् ।।
(नोट—इसे कवच के रुप में अंगस्पर्श करे अथवा सिर्फ पाठ करे )
राहु कवचम्— ) ऊँ अस्य श्री राहु कवचस्य कश्यप ऋषिः अनुष्टुप छन्दः राहुर्देवता राहु प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।।
ऊँ प्रणमामि सदा राहुं शूर्पाकारं किरीटिनम् ।
सैंहिकेयं करालास्यं भूतनामभयप्रदम् ।।
नीलाम्बरः शिरः पातु ललाटं लोकविन्दितः ।
चक्षुषी पातु मे राहु  श्रोत्रे त्वर्थशरीरवान् ।।
नासिकां मे करालास्यः शूलपाणिर्मुखं  मम ।
जिह्वां मे सिंहिकासुनूः कंठे मे कठिनांध्रिकः ।।
भुजंहेशो भुजै पातु नीलमाल्याम्बरः करौ ।
पातु वक्षस्थलं मंत्री पातु कुक्षिं विधुंतुदः ।।
कटिं में विकटः पातु उरु मे सुरपूजितः ।
स्वर्भानुः जानुनी पातु जंघे मे पातु जाड्यहा ।।
गुल्फौ ग्रहाधिपः पातु पादौ में भीषणाकृतिः ।
सर्वाण्यंगानि मे पातु नीलचन्दनभूषणः ।।
राहोरिदं कवचमीप्सितसिद्धिदं स्यात् ।
भक्त्या पठत्यनुदिनं नियतः शुचि सन् ।।
प्राप्नोति कीर्तिमतुलां श्रियमृद्धिमायुः ।
आरोग्यमात्मविजयं च हि तत्प्रसादात् ।।
।। इति श्री पद्मपुराणे राहुकवचंसम्पूर्णम् ।।

राहुस्तोत्रम्— ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः ।  ( राहुमन्त्र )
राहुदावनमंत्री च सिंहिकाचित्तनन्दनः ।
अर्द्धकायः सदा क्रोधी चन्द्रादित्यविमर्दनः ।।
रौद्रो रुद्रप्रियो दैत्यः स्वर्भानुर्भानुभीतिदः ।
ग्रहराजा सुधापायी राकातिथ्याभिलाषुकः ।।
कालदृष्टिः कालरुपः श्रीकण्ठहृदयाश्रयः ।
विधुंतुदः सैंहिकेयो घोररुपो महाबलः ।।
ग्रहपीडाकरो दंष्ट्री रक्तनेत्रो महोदरः ।
पञ्चविंशति नामानि स्मृत्वा राहुं सदा नरः ।।
यः पठेत् महती पीडा तस्य नश्यन्ति केवलम् ।
आरोग्यं पुत्रमतुलां श्रियं धान्यं पशूंस्तथा ।।
ददाति राहुस्तस्मै यः पठते स्तोत्रमुत्तमम् ।
सततं पठते यस्तु जीवेद्वर्षशतं नरः ।।
कायाहीनः महाशक्तिः ग्रसते शशिभास्करौ ।
सैंहिकेयो महावीर्यो राहुः प्रीतो भवेन्मम ।।
महाशिरो महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबलः ।
अतुश्चोर्ध्वकेशिश्च पीडां हरतुं में शिखी ।।
राहुग्रहः सदा क्रूरः सोमसूर्यस्य पीडकः ।
शान्त्यर्थं तु मया दत्तः अर्घोऽयं प्रतीगृह्यताम् ।।  
   ।। इति श्रीस्कन्दपुराणे राहुस्तोत्रम् ।।

केतुस्तोत्रम्— ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः केतवे नमः ।
अनेकरुपवर्णैश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
उत्पातरुपां जगतां पीडां हरतु में तमः ।।
केतुः कालः कलयिता धूम्रकेतुर्विवर्णकः ।
लोककेतुर्महाकेतुः सर्वकेतुभयप्रदः ।।
रौद्रो रुद्रपियो रुद्रः क्रूरकर्मा सुगन्धधृक् ।
पलालधूमसंकाशश्चित्रयज्ञोपवीतधृक् ।।
तारागणविमर्दी च जैमिनेयो ग्रहाधिपः ।
पञ्चविंशति नामानि केतोर्यः सततं पठेत् ।।
तस्य नश्यन्ति बाधा च सर्वाः केतुप्रसादतः ।
धनधान्यपशूनां च भवेद् वृद्धिर्नसंशयः ।।
      ।। इति केतुस्तोत्रम् ।।  

केतुकवचम्— ऊँ अस्य कवचस्तोत्र महामन्त्रस्य पुरन्दर ऋषिः अनुष्टुप छन्दः केतुः देवता मम सर्वाभिष्ट सिद्ध्यर्थे जपे / पाठे विनियोगः ।।
 केतु कराल वदनं चित्रवर्ण किरीटिनम् ।
 प्रणमामि सदा केतुं वज्राकारं ग्रहेश्वरम् ।।
 चित्रवर्णः शिरः पातु फालं में धूम्रवर्णकः ।
 पातु नेत्रे मंगलाक्षः श्रोत्रे मे रक्तलोचनः ।।
 घ्राणं पातु सुवर्णाभः चुम्बकं सिंहिकासुतः ।
 पातु कण्ठं च मे केतुः स्कन्दः पातु ग्रहाधिपः ।।
 बाहू पात्वसुरश्रेष्ठः कुक्षिं पातु महारोगः ।
 भीमात्मा मे कटिं पातुम यं पातु महासुरः ।।
 ऊरु पातु महाशीर्षाः जानुनी तीव्र कोपनः ।
 पादौ पातु च में शूरः सर्वांगं नरपीडकः ।।
 य इदं कवचं दिव्यं सर्व रोग विनाशनम् ।
 सर्व शत्रु प्रशमनं धारयेत्सुऽमृतो नरः ।।
             ।। इति केतुकवचम् ।।


क्रमशः...