Tuesday, 22 November 2016

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin of Accupressure)

गतांश से आगे...

(नोट- पिछले पोस्ट से सम्बन्धित एक चित्र को यहां पहले देख लें,फिर आगे के प्रसंग पर जायें)

नौवें अध्याय का शेषांश..


चीनी एक्यूप्रेशर विशेषज्ञों ने इसके लिए बड़ा ही युक्ति-संगत माप-प्रणाली निश्चित की है। इस सम्बन्ध में डॉ.केथ केनियन कहते हैं- Chinese called this measurement a ‘TSUN’ the distance between two points on the middle finger is completely bent- अर्थात हाथ की मध्यमा अंगुली को मध्य एवं अग्र पोरुये से मोड़ने पर,बीच के मुड़े हुए भाग को सुन या चुन कहा गया है।

     अब इसी के आधार पर दूरी का निश्चय किया जा रहा है। हाथ की चार अंगुलियों (अंगूठा छोड़कर) का मान हुआ 3 सुन(चुन),एवं तीन अंगुलियों का मान हुआ 2 सुन,तथा सिर्फ अंगूठे का सामान्य मान(अग्रभाग का) मात्र एक सुन। इस प्रकार मध्यमा के मध्य खंड अथवा अन्य अंगुलियों या सिर्फ अंगूठे के अग्रभाग के सहारे आसानी से माप कर किसी विन्दु के सही स्थान को जाना जा सकता है। ध्यान रहे कि इस माप प्रणाली में भी रोगी की अंगुली का ही उपयोग होना चाहिए, न कि उपचार-कर्ता का। उदाहरणतया नेईकुआनसुबो नामक प्रतिबिम्ब केन्द्र मणिबन्ध रेखा (हथेली-मूल का सिलवट वाला भाग) से तीन अंगुल या दो सुन की दूरी पर है- यदि यह कहा जाये,तो हम बड़ी आसानी से रोगी के एक हाथ की अंगुलियों को दूसरे हाथ के मणिबन्धस्थान पर रखकर, विन्दु का सही निश्चय कर सकते हैं। भारतीय मतानुसार नेईकुआनसुबो को द्वारीकहा जाता है, क्यों कि हथेली के मूल में स्थित यह अति महत्त्वपूर्ण प्रतिबिम्ब केन्द्र एक ओर हमारे प्राणवह स्रोतों को ठीक करता है,तो दूसरी ओर रक्तवह स्रोतों को भी नियन्त्रित करता है। यही कारण है कि हृदय और फेफड़े के हर प्रकार के रोगों में यह विशेष रुप से उपयोगी है।
         इस द्वारी विन्दु की भांति ही अन्य विन्दुओं के स्थान का भी निश्चय करना उचित है। एक्यूप्रेशर उपचार क्रम में प्रतिबिम्ब केन्द्रों की सही पहचान हेतु कुछ और भी ध्यान देने योग्य बातें हैं। यथा-
१.     रोगग्रस्त (प्रभावित) विन्दु अत्यन्त संवेदनशील होता है,अर्थात आसपास के क्षेत्रों की तुलना में उस स्थल पर वेदना अधिक होगी- यह सर्वोत्तम पहचान है।
२.     रोग का प्रभाव यदि कम हो तो प्रारम्भ में संवेदनशीलता भी कम ही होगी,किन्तु लागातार कुछ देर उपचार करते रहने पर,सही वेदना का आभास होने लगेगा। अतः यदि अन्यान्य तरीकों से रोग का सही निदान हो जाय,परन्तु विन्दु-विनिश्चय में कठिनाई हो रही हो,तो अवयव (रोग) से सम्बन्धित उस महत्वपूर्ण किन्तु अपेक्षाकृत कम संवेदनशील विन्दु पर भी अधिक बार दबाव देकर जांच अवश्य कर लेनी चाहिए।
३.     रोग-प्रभावित विन्दु का क्षेत्र आसपास के क्षेत्र की तुलना में कुछ भिन्नता युक्त अवश्य पाया जाता है,अर्थात संवेदनशीलता की भिन्नता के अतिरिक्त,वर्ण-भिन्नता,उष्मा-भिन्नता,आदि विशेष लक्षण-युक्त  होगा। यथा- रोग प्रभावित विन्दु लाली,सफेदी या पीलापन युक्त हो सकता है,तथा अंगुली से स्पर्श करने मात्र से,उक्त स्थान अन्य स्थान की अपेक्षा कुछ अधिक गर्म भी मालूम पड़ सकता है।
४.     रोग-ग्रस्त विन्दु की किंचित आकार भिन्नता भी भासित होती है। जैसे- प्रभावित विन्दु हल्का सूजन,खुरदरापन,या फुंसी युक्त पाया जा सकता है। यह लक्षण कान या चेहरे के प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर विशेष रुप से पाया जा सकता है।
५.     ताप-भिन्नता तो प्रभावित विन्दु का स्वाभाविक लक्षण है,किन्तु कभी कभी उष्ण के वजाय शीत भी अनुभव हो सकता है। हालाकि ऐसा बहुत कम ही पाया जाता है।
६.      अत्याधुनिक एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ विन्दु-विनिश्चय हेतु विशेष प्रकार के विद्युत उपकरण का भी व्यवहार करने लगे हैं। उनकी ऐसी मान्यता है कि रोग-प्रभावित प्रतिबिम्ब केन्द्र अति सामान्य विद्युत तरंग से ही उत्तेजित हो जाता है,जब कि अप्रभावित विन्दु में यह बात नहीं पायी जाती। वहां अधिक प्रवाह(वोल्ट)सहने की क्षमता होती है।
७.     जीर्ण व्याधि( chronic disease) की स्थिति में विन्दु की संवेदनशीलता बढ़ने के बजाय घट जाती है,किन्तु बारम्बार के उपचार से यथास्थिति पर आ जाती है।

इन सभी लक्षणों और नियमों के सहारे आसानी से प्रतिबिम्ब केन्द्रों को परखा जा सकता है।अस्तु।

क्रमशः....

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे....
नौवें अध्याय का शेष भाग...
इस प्रणाली को स्पष्ट करने के लिए प्रस्तुत है चित्रांक 21-घ 

(किसी कारण से चित्र यहां नहीं पोस्ट हो पा रहा है,इसे अगले पोस्ट में डालने का प्रयास करुँगा।)




चीनी एक्यूप्रेशर विशेषज्ञों ने इसके लिए बड़ा ही युक्ति-संगत माप-प्रणाली निश्चित की है। इस सम्बन्ध में डॉ.केथ केनियन कहते हैं- Chinese called this measurement a ‘TSUN’ the distance between two points on the middle finger is completely bent- अर्थात हाथ की मध्यमा अंगुली को मध्य एवं अग्र पोरुये से मोड़ने पर,बीच के मुड़े हुए भाग को सुन या चुन कहा गया है।
 अब इसी के आधार पर दूरी का निश्चय किया जा रहा है। हाथ की चार अंगुलियों (अंगूठा छोड़कर) का मान हुआ 3 सुन(चुन),एवं तीन अंगुलियों का मान हुआ 2 सुन,तथा सिर्फ अंगूठे का सामान्य मान(अग्रभाग का) मात्र एक सुन। इस प्रकार मध्यमा के मध्य खंड अथवा अन्य अंगुलियों या सिर्फ अंगूठे के अग्रभाग के सहारे आसानी से माप कर किसी विन्दु के सही स्थान को जाना जा सकता है। ध्यान रहे कि इस माप प्रणाली में भी रोगी की अंगुली का ही उपयोग होना चाहिए, न कि उपचार-कर्ता का। उदाहरणतया नेईकुआनसुबो नामक प्रतिबिम्ब केन्द्र मणिबन्ध रेखा(हथेली-मूल का सिलवट वाला भाग) से तीन अंगुल या दो सुन की दूरी पर है- यदि यह कहा जाये,तो हम बड़ी आसानी से रोगी के एक हाथ की अंगुलियों को दूसरे हाथ के मणिबन्धस्थान पर रखकर,विन्दु का सही निश्चय कर सकते हैं। भारतीय मतानुसार नेईकुआनसुबो को द्वारीकहा जाता है, क्यों कि हथेली के मूल में स्थित यह अति महत्त्वपूर्ण प्रतिबिम्ब केन्द्र एक ओर हमारे प्राणवह स्रोतों को ठीक करता है,तो दूसरी ओर रक्तवह स्रोतों को भी नियन्त्रित करता है। यही कारण है कि हृदय और फेफड़े के हर प्रकार के रोगों में यह विशेष रुप से उपयोगी है।
            इस द्वारी विन्दु की भांति ही अन्य विन्दुओं के स्थान का भी निश्चय करना उचित है। एक्यूप्रेशर उपचार क्रम में प्रतिबिम्ब केन्द्रों की सही पहचान हेतु कुछ और भी ध्यान देने योग्य बातें हैं। यथा-
१.     रोगग्रस्त (प्रभावित) विन्दु अत्यन्त संवेदनशील होता है,अर्थात आसपास के क्षेत्रों की तुलना में उस स्थल पर वेदना अधिक होगी- यह सर्वोत्तम पहचान है।
२.     रोग का प्रभाव यदि कम हो तो प्रारम्भ में संवेदनशीलता भी कम ही होगी,किन्तु लागातार कुछ देर उपचार करते रहने पर,सही वेदना का आभास होने लगेगा। अतः यदि अन्यान्य तरीकों से रोग का सही निदान हो जाय,परन्तु विन्दु-विनिश्चय में कठिनाई हो रही हो,तो अवयव (रोग) से सम्बन्धित उस महत्वपूर्ण किन्तु अपेक्षाकृत कम संवेदनशील विन्दु पर भी अधिक बार दबाव देकर जांच अवश्य कर लेनी चाहिए।
३.     रोग-प्रभावित विन्दु का क्षेत्र आसपास के क्षेत्र की तुलना में कुछ भिन्नता युक्त अवश्य पाया जाता है,अर्थात संवेदनशीलता की भिन्नता के अतिरिक्त,वर्ण-भिन्नता,उष्मा-भिन्नता,आदि विशेष लक्षण-युक्त  होगा। यथा- रोग प्रभावित विन्दु लाली,सफेदी या पीलापन युक्त हो सकता है,तथा अंगुली से स्पर्श करने मात्र से,उक्त स्थान अन्य स्थान की अपेक्षा कुछ अधिक गर्म भी मालूम पड़ सकता है।
४.     रोग-ग्रस्त विन्दु की किंचित आकार भिन्नता भी भासित होती है। जैसे- प्रभावित विन्दु हल्का सूजन,खुरदरापन,या फुंसी युक्त पाया जा सकता है। यह लक्षण कान या चेहरे के प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर विशेष रुप से पाया जा सकता है।
५.     ताप-भिन्नता तो प्रभावित विन्दु का स्वाभाविक लक्षण है,किन्तु कभी कभी उष्ण के वजाय शीत भी अनुभव हो सकता है। हालाकि ऐसा बहुत कम ही पाया जाता है।
६.      अत्याधुनिक एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ विन्दु-विनिश्चय हेतु विशेष प्रकार के विद्युत उपकरण का भी व्यवहार करने लगे हैं। उनकी ऐसी मान्यता है कि रोग-प्रभावित प्रतिबिम्ब केन्द्र अति सामान्य विद्युत तरंग से ही उत्तेजित हो जाता है,जब कि अप्रभावित विन्दु में यह बात नहीं पायी जाती। वहां अधिक प्रवाह(वोल्ट)सहने की क्षमता होती है।
७.     जीर्ण व्याधि( chronic disease) की स्थिति में विन्दु की संवेदनशीलता बढ़ने के बजाय घट जाती है,किन्तु बारम्बार के उपचार से यथास्थिति पर आ जाती है।
इन सभी लक्षणों और नियमों के सहारे आसानी से प्रतिबिम्ब केन्द्रों को परखा जा सकता है।अस्तु।
क्रमशः...


Saturday, 19 November 2016

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...
नाड्योपचारतन्त्रम्....

                           नवम अध्याय
                                         
                          विन्दु-विनिश्चय
    नाड्योपचार तन्त्र (एक्यूप्रेशर पद्धति) में शक्ति-संचार-पथ (meridians) पर यत्र-तत्र स्थित तथा सहायक शक्ति-संचार-पथ (Sub-meridians) एवं उनके अन्तिम छोरों (तलवे-तलहथी) पर एकत्र रुप से स्थित प्रतिबिम्ब केन्द्रों (Reflex centre) का काफी महत्त्व है,क्यों कि ये ही वे वटन हैं,जिनपर दबाव देकर असंतुलित ऋणात्मक और धनात्मक (यिन और यांग) कायगत विद्युत बलों को संतुलित किया जाता है। इन विन्दुओं का महत्त्व ठीक वैसा ही है जैसे कोई कमरा विभिन्न प्रकार के विद्युत चालित उपकरणों से सुसज्जित हो,मगर उन उपकरणों को चालित करने वाले वटनों(स्विच) की जानकारी हमें न हो,तो उन उपकरणों का कोई लाभ हमें न मिल सकेगा। अतः इन वटनों की सही और सूक्ष्म जानकारी अत्यावश्यक है।
          एक्यूप्रेशर – प्रतिबिम्ब केन्द्रों का चायनिज नाम सुबो है, जो विभिन्न जिन्ग (मेरीडियन) पर यहां-वहां वड़े ही व्यवस्थित रुप से फैले हुये हैं—किसी महानगर के पथों पर यहां-वहां स्थित चिकित्सकों के केन्द्रों की तरह। अब एक रोगी को चिकित्सक के पास पहुंचने के लिए चिकित्सक का नाम और पता जानना जितना जरुरी है,उसी प्रकार यहां भी शरीर रुपी महानगर के पथों-उपपथों की सर्वप्रथम जानकारी,और तब उन पथों पर स्थित केन्द्रों का सही ज्ञान(परिचय और पहचान) भी आवश्यक है।
             शक्ति-संचार-पथों (meridians) की सही जानकारी के लिए पुस्तक के पूर्व अध्याय में दिये गये चित्रांक 6 से 19 तक निर्दिष्ट रेखाओं का बारबार अवलोकन-मनन अति आवश्यक है, साथ ही आगे दसवें अध्याय में वर्णित विभिन्न चित्रों का भी। हालाकि इन विभिन्न चित्रों के अवलोकन, मनन, स्मरण से ही काम पूरा नहीं हो जायेगा। इन चित्रों से प्राप्त होगा सिर्फ सैद्धान्तिक ज्ञान,जबकि मुख्य रुप से आवश्यक है व्यावहारिक ज्ञान। इसके लिए पहले अपने ही शरीर पर जांच-परख करके,अभ्यास करना सर्वोचित होगा। दिये गये चित्रों के अनुसार शक्ति-संचार-पथों (meridians) की रेखाओं (line of meridians) को देखते हुए अपनी अंगुली फिराकर उसकी सही स्थिति का अंदाजा लगाया जाना चाहिए- प्रारम्भ में तो यह काल्पनिक रुप से ही करना होगा,फिर धीरे-धीरे स्पष्ट होता जायेगा। करीब करीब सभी मेरीडियनों को अपने शरीर पर ही टटोल कर अनुभव किया जा सकता है। जिन अंगों (चेहरा,कान,आँख आदि) को प्रत्यक्ष देखना सम्भव नहीं,उनके लिए दर्पण का सहारा लेना श्रेयस्कर होगा। आगे इसी विधि से,अन्य व्यक्ति के शरीर पर भी अनुभव किया जा सकता है- उससे संवाद करके। सभी मेरिडियनों को भली भांति समझ लेने के बाद शक्ति-संचार-रेखा      ( मेरिडियन लाइन्स ) पर स्थित विभिन्न केन्द्रों को भी उसी भांति समझने का अभ्यास करना चाहिए। तलवे,तलहथी,उदर-प्रदेश, चेहरा, आदि कुछ बड़े आकार के विन्दु-समूह हैं,इन पर चित्रानुसार अंगुली फिरा कर खासखास विन्दुओं की पहचान की जानी चाहिए।
        इतने के वावजूद कुछ और भी महत्त्वपूर्ण बातें समझने को शेष रह जाती हैं। डॉ.केथ केनियन कहते हैं- The Chinese have discovered that there exists over one thousand points on fourteen meridian or lines going up and down the body. यानी चीनी विशेषज्ञों ने लगभग एक हजार विन्दुओं की खोज की है,पूरे शरीर के चौदहों मेरीडिनों पर,किन्तु समस्या ये है कि इन हजारों विन्दुओं को मानव शरीर पर सही-सही खोजा कैसे जाये?
सच पूछा जाय तो विन्दुओं की स्थिति का किंचित सामान्य अनुभव चौदह मेरीडियनों और दस खंडों(Zone) के सहयोग से प्राप्त हो जाता है। जरुरत है- गहराई पूर्वक उनके सही स्थान को जानने की,और इसे खोजने का सही तरीका है,एक्यूप्रेशर का मूल मन्त्र,याने जहां दुःखे,वहां दबायें। चित्र के अनुसार,अनुभव के आधार पर टटोल कर,उस विन्दु के आसपास के क्षेत्र में दबाव डालें। जिस स्थान पर कुछ विशेष प्रकार का(सामान्य दबाव से भिन्न- किंचित कष्टप्रद दबाव(दर्द)अनुभव हो,उसे ही निश्चित विन्दु (रुग्ण केन्द्र) समझना चाहिए। यहां इस बात की शंका हो सकती है कि कहीं दूसरा स्विच तो नहीं दब रहा है,जिसके लिए कुछ महत्त्वपूर्ण नियम ध्यान में रखने का है-- 
1)    अन्य(गलत)केन्द्र पर दबाव पड़ने से भी किसी तरह का नुकसान(side effect) नहीं है।
2)    विन्दु वही दुःखेगा,जिसके दुःखने की जरुरत है,यानी जिसे हम ढूढ़ रहे हैं। किन्तु एक बिलकुल स्वस्थ शरीर में ढूढ़ने में कठिनाई हो सकती है,परन्तु इसके लिए चिन्ता की बात नहीं है। थोड़े अभ्यास के बाद यह समस्या स्वयमेव दूर हो जायेगी।
विन्दु-विनिश्चय क्रम में दूसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है कि शरीर में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विन्दु-समूह तो तलवे और तलहथी में स्थित हैं। इनका क्षेत्र भी पर्याप्त बड़ा है,जैसा कि आगे दिये जा रहे चित्रों से स्पष्ट है- प्रत्येक अवयव का क्षेत्र भी सुविधा के लिए घेर कर दिखलाया गया है, जो करीब दो मीलीमीटर से लेकर दो सेन्टीमीटर तक का है। अब इस विस्तृत क्षेत्र में वेदना-युक्त खास विन्दु(स्थल) को ढूढ़ निकालना है,जो लगभग मटर के दाने सदृश आकार वाला होता है, कभी-कभी इससे बड़ा भी। इसकी जांच खास तरह के उपलब्ध उपकरण (जिम्मी, प्रेशरटूल,चट्टु आदि) द्वारा दबाव देकर वड़ी आसानी से हो सकती है, किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है  कि प्रभावित(रोग-ग्रस्त)अवयव से सम्बन्धित पूरा क्षेत्र वेदना-युक्त पाया जाता है, उदाहरणतया पेट-दर्द की स्थिति में आमाशय या आँतों का पूरा-पूरा क्षेत्र (2-3सें.मी.) दबाव डालने पर विशेष वेदना-युक्त पाया जाता है। ऐसी स्थिति में निशंक रुप से पूरे क्षेत्र पर दाब उपचार करना चाहिये। हाँ,कभी-कभी खास कर नये अभ्यासी चिकित्सक के लिए समस्या खड़ी हो जाती है,जब दर्द की अनुभूति अंगों के निर्दिष्ट क्षेत्र-मध्य न होकर,सीमावर्ती क्षेत्र में पायी जाती है। जैसे- तलवे या हथेली में बड़ी आंत और आमाशय की सीमा मिल रही है,जैसा कि आगे चित्रांक 22-1 व 23-1 में दर्शाया गया है, इस सीमाक्षेत्र पर यदि दबाव डालने पर विशेष वेदना-संकेत मिले तो यह निश्चय करना कठिन हो जायेगा कि वास्तविक वीमारी आंत में है,या आमाशय में,किन्तु सच पूछा जाय तो यह समस्या भी प्रारम्भिक अभ्यासियों की है। पुराने अभ्यासी और शरीर क्रिया विज्ञान के जानकार व्यक्तियों के लिए यह समस्या नहीं है। क्यों कि उसे यह ज्ञात है कि शरीर में आमाशय और बड़ीआंत की सीमा भी इसी प्रकार मिलती है,और एक व्याधि की स्थिति में दूसरा भी प्रभावित हो ही जाता है।
        उपर्युक्त विन्दु-विनिश्चय का तरीका तो सिर्फ सर्वप्रमुख केन्द्र समूह (तलवे-तलहथी) हेतु अपनाया जा सकता है,अन्य भागों में स्थित प्रितिबिम्ब-केन्द्रों की बात इससे कुछ भिन्न है, और वह भिन्नता भी एक जैसी नहीं है- कहीं आकार की भिन्नता है,तो कहीं क्षेत्र की। अतः इस सम्बन्ध में पहले कुछ विद्वानों की राय जान ली जाय।
   डॉ.केथकेनियन कायगत सुबो(स्विच)की मर्यादा(सीमा)निश्चित करते हुये कहते हैं कि- The Accupressure site is a circle about one centimeter or three eight of an inch in diameter . अर्थात 1से.मी. या  ईंच व्यास की परिधि वाला स्विच (केन्द्र) शरीर के विभिन्न भागों में पाया जाता है। डॉ.गाला का भी यही मत है, किन्तु थोड़े भेद सहित- अर्थात इनके कथनानुसार क्षेत्र गोल के वजाय चौकोर है। विस्तार उतना ही माना है इन्होंने भी। प्रसिद्ध साधक गुरुदेव मणिभाईजी इस विषय पर मौन हैं,क्यों कि उनके अनुसार तो पहले ही मूल मन्त्र फूंका जा चुका है- जहां दुःखे वहीं दबायें । ऐसा इसलिये कहा उन्होंने,क्यों कि विन्दु-क्षेत्र की मर्यादा(सीमा)पूरे शरीर में अनिश्चित है,और सिर्फ शरीर के विभिन्न अंग ही नहीं, बल्कि भिन्न भिन्न लोगों में भी व्यक्ति के आकार,कद,काठी आदि के आधार पर काफी भिन्नता भासित होती है। अतः इस झमेले से मुक्त रहने का सुझाव दिया है उन्होंने , सभी एक्यूप्रेशर चिकित्सकों को।
           उपर्युक्त सभी मत अपने स्थान पर सही हैं। वस्तुतः शरीर के मुख्य बड़े भागों (हाथ,पैर,पीठ, पेट आदि) में शक्ति-संचार-पथों पर स्थित विन्दुओं का आकार पूर्व निर्दिष्ट क्रम से समझना चाहिये, यानी बड़े क्षेत्र में करीब मटर के आकार सदृश गोलाकार क्षेत्र है प्रत्येक प्रतिबिम्ब केन्द्र का। ध्यान रहे इस सीमा में तलवे-तलहथी नहीं आते। इनका आकार पीठ,पेट की तुलना में काफी छोटा जरुर है,किन्तु जोनों का अन्तिम भाग होने के कारण शरीर के सभी मुख्य अंगों से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब केन्द्र यहाँ  मौजूद हैं,और काफी सक्रिय होने के कारण अति महत्त्वपूर्ण भी। इतने महत्त्वपूर्ण कि Reflexology नामक स्वतन्त्र चिकित्सा-धारा चल पड़ी, और कतिपय विशेषज्ञ इसे एक्यूप्रेशर से बिलकुल अलग पद्धति करार दे दिए। किन्तु बात ऐसी है नहीं। इस सम्बन्ध में पूर्व अध्यायों में स्पष्ट किया जा चुका है। जैसा कि इनकी स्वयं में आकार-भिन्नता है,तलवे-तलहथी में बड़े और छोटे अलग-अलग आकारों में क्षेत्र हैं। शरीर विज्ञान (Anatomy) के अनुसार विचार और परीक्षण किया जाय,तो हम पाते हैं कि तुलनात्मक रुप से इनका क्षेत्र वैसा ही है,जैसा कि अंगों का अपना क्षेत्र(विस्तार),यानी शरीर में जो अंग बड़ा है,उसे तलवे और हथेली में भी बड़ा क्षेत्र मिला है,एवं छोटे अंग को कम स्थान मिला है। हलांकि इस नियम का किंचित अपवाद भी यहीं मौजूद है। यथा- आंख और कान छोटा अंग है,किन्तु हथेली और तलवे पर तुलनात्मक दृष्टि से अधिक स्थान मिला है। जांघ, बांह, कंधा आदि बड़े अंग हैं, किन्तु इसके प्रतिबिम्ब केन्द्र को अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है। शारीरिक वनावट और स्थिति पर गौर किया जाय तो और अधिक स्पष्ट होगा। यथा- बड़ीआंत छोटीआंत को चारो ओर से घेरे हुए है, इस कारण तलवे और तलहथी में इन्हें इसी प्रकार का घेरेदार स्थान प्राप्त है। पीयूषग्रन्थि (Pituitary gland), चेतनाग्रन्थि (Pinal gland) , ललाट आदि शरीर के उर्ध्व भाग में स्थित हैं, अतः उन्हें तलवे-तलहथी के ऊपरी भाग में यथास्थान रखा गया है प्रकृति द्वारा। इस सम्बन्ध में एक और अति महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है ,जो खास तलवे और तलहथी के प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर लागू होता है । जैसा कि जोन विभाजन के क्रम में पूर्व अध्याय में स्पष्ट किया गया है- जो अंग शरीर के जिस भाग (बायां-दायां) में स्थित है,उसका प्रतिबिम्ब केन्द्र भी उसी भाग में है। यथा- हृदय शरीर के वामपार्श्व में है,अतः उसका प्रतिबिम्ब केन्द्र भी सिर्फ बायीं हथेली में एवं बायें तलवे में ही है। इसी भांति अन्य अंगों को भी समझना चाहिए।
         कान के प्रतिबिम्ब केन्द्र बड़े नाजुक और अति संवेदनशील होते हैं।  योगशास्त्र के अनुसार कान पूरे मानव शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। गौर से देखा जाय तो कान की वनावट गर्भगत बालक के काफी समतुल्य होता है।  फलतः आकार में अपेक्षाकृत बहुत छोटा होते हुए भी शरीर के सभी अंगों और बीमारियों से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब केन्द्र कान पर मौजूद हैं। आकार छोटा और प्रतिबिम्ब केन्द्र अति सघन होने का नतीजा है कि बड़े से अंग का प्रतिनिधित्व,कान का छोटा सा अंश ही कर पाता है। यही कारण है कि कान पर अधिक से अधिक सरसो के बड़े दाने जैसा ही कोई प्रतिबिम्ब केन्द्र का क्षेत्र मिल पाता है ,किन्तु दो केन्द्रों के बीच की दूरी इतनी अवश्य रहती है कि उसे कुशल एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ आसानी से पहचान सकता है,और सरलता से दाब उपचार भी कर लेता है। सही विन्दु की पहचान हो जाने पर सुविधा से उसे उपचारित किया जा सकता है और समीपवर्ती विन्दु पर दबाव पड़ने की चिन्ता भी नहीं रहती।
          यही बात आँखों के प्रतिबिम्ब केन्द्रों की भी है। यहाँ के क्षेत्र कानों की तरह ही हैं,किन्तु संख्या में पर्याप्त अन्तर है,साथ ही अवयव समूह का भी झमेला नहीं है। एक बात विशेष ध्यान रखने योग्य है कि चुंकि आँख अति नजुक अंग है,इस कारण दबाव बहुत ही सावधानी से देना पड़ता है,तथा किसी भी दाब उपकरण का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। हां,कुछ विशेष खास उपकरण- comb cleaner  जैसे गुच्छेदार छोटे नोकों वाले उपकरण के व्यवहार करने का सुझाव देते हैं। इस लघु उपकरण से कोई खतरा नहीं है,और दबाव भी बड़ी सुविधा पूर्वक एक साथ कई आवश्यक विन्दुओं पर पड़ जाता है, जिसके फलस्वरुप उपचार-प्रक्रिया उबाऊ के बजाय सुखद हो जाती है।
         चेहरे पर स्थित प्रतिबिम्ब केन्द्रों का सामान्य आकार गोलमिर्च के समान है। चेहरे के आकार की तुलना में विन्दुओं की संख्या भी न तो कान की तरह अति है,और न हथेली की तरह न्यून। उपकरणों का व्यवहार यहां भी वर्जित है। दबाव तर्जनी अंगुली से देना सर्वोत्तम माना गया है। ललाट पर स्थित दो-तीन केन्द्र अपेक्षाकृत कुछ बड़े आकार वाले हैं। इनका क्षेत्र बड़े आकार के मटर जैसे हैं, जहाँ दाब उपचार हाथ के अंगूठे से करना उत्तम है।
      जीभ पर भी काफी अधिक संख्या में प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं,जिनमें कुछ काफी बड़े (मटर सदृश, कुछ गोलमिर्च जैसे) हैं, शेष शहतूत के पके फल पर उभरे दानों की तरह होते हैं। इन अतिसूक्ष्म केन्द्रों का अंगानुसार अलग-अलग विश्लेषण और पहचान न तो आवश्यक है,और न स्वतन्त्र रुप से उपयोगी। इनमें अधिकांश सिर्फ एक ही तन्त्र- पाचनतन्त्र(Digestive System) से सम्बन्ध रखते हैं, अतः इनका उपयोग एकत्र रुप से ही उपचारित करने में होना चाहिए। दातुन करने के बाद, दातुन की जीभी से जीभ को रगड़ कर साफ करना- इस पाचनतन्त्र उपचार प्रक्रिया का ही अंग है,जिसे सामान्य दिनचर्या में इस कदर शामिल कर लिया गया है कि अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं होती। नारी जननांगों से सम्बन्धित कुछ खास केन्द्र भी जीभ पर हैं,जिन पर खास समय में खास विधि से दबाव देने का नियम है। जीभ के बिलकुल अगले हिस्से में(बिलकुल नोक पर)एक गोलकीनुमा केन्द्र है, जिसे कामकेन्द्र कहना अतिशयोक्ति न होगी। सम्भोग के समय स्त्रियां यदि अपने दांतों से इस भाग पर आहिस्ते से दबाव डालें,तो उनके कामतुष्टि में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। सुप्तकामेच्छावृति वाली स्त्रियों को नियम से (चौबीस घंटे में चार-पांच बार) इस तरह का प्रयोग करना चाहिए। इससे काफी लाभ मिलेगा। प्रसव-वेदना के समय इस केन्द्र पर उसी विधि से दबाव देकर,सुखप्रसव का लाभ भी पाया जा सकता है।  पुरुषों में इस विन्दु पर प्रयोग का तरीका बिलकुल भिन्न है। उन्हें अपनी जीभ के अग्रभाग को उल्टा मोड़कर,दबाव देना चाहिए।
            तलवे-तलहथी,कान,आँख,जीभ आदि की तुलना में सिर का उपरी भाग,जो सदा बालों से ढका रहता है,कई बड़े-छोटे प्रतिबिम्ब केन्द्रों का समूह है। इनमें अधिकांश पित्ताशय एवं यकृत से  सम्बन्धित हैं। वैसे,सिर के असंख्य बालों की जड़ (प्रत्येक) में पित्ताशय को उत्तेजित करने वाले अतिसूक्ष्म केन्द्र मौजूद हैं,जो खासकर बालों की रक्षा का कार्य करते हैं। इन सभी केन्द्रों पर सामूहिक तौर पर मालिश के क्रम में उपचार किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त गोल नोकों वाले विशेष प्रकार की कंघी से दबाव देकर भी इन सभी केन्द्रों को उपचारित किया जा सकता है। सिर पर कुछ खास केन्द्र मटर के आकार वाले भी हैं,जिन पर अंगुली से आसानी से दबाव दिया जा सकता है। यहां अन्य किसी उपकरण का व्यवहार विहित नहीं है।
         नाड्योपचार (एक्यूप्रेशर) केन्द्रों के विनिश्चय क्रम में पूर्व में दिये गये चित्रों का अवलोकन,तथा स्थान और क्षेत्र सम्बन्धी दिये गये विभिन्न संकेतों के बावजूद,तलवे-तलहथी के अतिरिक्त भागों पर स्थित प्रतिबिम्ब केन्द्रों की सही परख बड़ी ही उलझन वाली होती है। फलतः नये अभ्यासी काफी परेशानी अनुभव कर सकते हैं। जैसे यदि कहा जाय कि अमुख केन्द्र घुटने से चार अंगुल नीचे है,या कहें कि कुहनी के मोड़ से दो अंगुल ऊपर कंधे के दर्द सम्बन्धी एक केन्द्र है। अब,विचारणीय ये है कि दूरी की ये माप- दो अंगुल,या दो सें.मी. जैसा पैमाना क्या अर्थ रखता है? क्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए यही पैमाना अनुकूल होगा,या नापेगा कौन- चिकित्सक या कि रोगी स्वयं? कोई लम्बा है,कोई नाटा,कोई मोटा है,कोई दुबला,कोई बच्चा है,कोई सयाना। ऐसी स्थिति में स्थान बोधक संकेत को सही कैसे समझा जाय- यह एक अहम सवाल है-  एक्यूप्रेशर के नये अभ्यासियों के लिए।

            इस सम्बन्ध में कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ईंच या सें.मी.जैसा पैमाना तो नाड्योपचार में होना ही नहीं चाहिए। हां, अंगुली की नाप चल सकती है। इसके लिए उपचारकर्ता अपनी अंगुली से नाप कर,विन्दु-विनिश्चय करने के वजाय,रोगी की अंगुली से ही नाप कराये,तो अधिक अच्छा होगा। यही उचित भी प्रतीत होता है। क्यों कि रोगी की अंगुली आनुपातिक दृष्टि से सुव्यवस्थित नाप बतलायेगी। माप-परख का यह तरीका काफी हद तक सही, मान्य और सुविधाजनक कहा जा सकता है। फिर भी इसे सर्वमान्य सिद्धान्त कहना अनुचित ही होगा। इस प्रणाली को स्पष्ट करने के लिए आगे प्रस्तुत है

चित्रांक 21-घ

चीनी एक्यूप्रेशर विशेषज्ञों ने इसके लिए बड़ा ही युक्ति-संगत माप-प्रणाली निश्चित की है। इस सम्बन्ध में डॉ.केथ केनियन कहते हैं- Chinese called this measurement a ‘TSUN’ the distance between two points on the middle finger is completely bent- अर्थात हाथ की मध्यमा अंगुली को मध्य एवं अग्र पोरुये से मोड़ने पर,बीच के मुड़े हुए भाग को सुन या चुन कहा गया है। 
क्रमशः...



Wednesday, 16 November 2016

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे.....

                    अष्टम अध्याय   
     नाड्योपचारःनिदान भी,चिकित्सा भी

    जहाँ दुःखे वहीं दबायें- एक्यूप्रेशर यानी नाड्योपचार का मूल मन्त्र कहा गया है। तात्पर्य ये है कि जिस प्रतिबिम्ब केन्द्र पर दर्द अनुभव हो रहा हो,उसी केन्द्र पर दाब विधि से उपचार करनी चाहिए। मान लिया कि यकृत केन्द्र पर दर्द अनुभव हो रहा है,यहां यह प्रश्न उठता है कि यकृत के प्रतिबिम्ब केन्द्र पर दबाव देकर जांच करने से हमें ज्ञात हुआ कि उक्त स्थल पर स्वाभाविक दबाव की अपेक्षा किंचित भिन्न प्रकार के दर्द की अनुभूति होरही है- यह उक्त अवयव (व्याधि) से सम्बन्धित निदान (diagnosis) हुआ या उस रोग की चिकित्सा (treatment) हुयी?
        सच कहें तो यही विशेषता है इस पद्धति की- जो निदान है,वही चिकित्सा भी। यानी जिस विधि से निदान किया गया,उसकी ही पुनरावृत्ति, उस व्याधि की चिकित्सा भी होती है। नाड्योपचार (एक्यूप्रेशर) पद्धति का यह चमत्कारिक गुण किसी भी अन्य पद्धति में नहीं है। उदाहरण के लिए , यकृतविद्रधि (Liver Cirrhosis)  के लिए चिकित्सा-विज्ञान (विकृति-विज्ञान) व्याधि-विनिश्चय के तह तक पहुंचने हेतु एक्सरे,रक्त-परीक्षण,मूत्र-परीक्षण आदि वीसियों प्रकार के परीक्षणों की शिफारिश करेगा,और तब जाकर रोग-विनिश्चय हो पायेगा। फिर औषधी-सेवन की बात होगी,और तब लम्बे इन्तजार के बाद (समय,श्रम,और धन) गंवा कर रोग से मुक्ति मिलती है। ऐसा भी नहीं होता कि बारबार उपर्युक्त परीक्षण ही करते रहते हैं। हां,पुनः कितना लाभ हुआ – जानने के लिए परीक्षण की क्रिया दुहरायी जा सकती है। इन बातों से यह स्पष्ट होता है कि रोग-निदान बिलकुल अलग बात है,और रोग की चिकित्सा बिलकुल अलग। ये एक ही चिकित्सा पद्धति के दो सहायक अंग (उपविधि) कहे जा सकते हैं, या यूं कहें कि विविध परीक्षण करके,रोग का निश्चय किया जाय,फिर चिकित्सा चाहे आयुर्वेद की करें,होमियोपैथी की करें,या कि एलोपैथ की। फिर भी निदान और चिकित्सा अलग-अलग बातें तो है ही। निदान की पद्धति सिर्फ सहयोगी है चिकित्सा की पद्धति के लिए। दूसरे शब्दों में इसे कह सकते हैं कि निदान निदान है,और चिकित्सा चिकित्सा।
         किन्तु नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर) पद्धति इससे बिलकुल अलग है,जो निदान है वही चिकित्सा भी है। यथा- यकृत प्रतिबिम्ब-केन्द्र पर दबाव देकर ज्ञात करते है यकृत की बीमारी के सम्बन्ध में,और पुनः निदान वाली क्रिया की ही आवृत्ति करके रोगमुक्त भी होते हैं। ऐसा क्यों होता है,इसे पूर्व अध्यायों में स्पष्ट किया जा चुका है।
            शरीर का कोई भी भाग(अंग)जब रोगग्रस्त होता है,तब उससे सम्बन्धित प्रतिबिम्ब केन्द्र पर शीघ्र ही सूचना पहुँच जाती है- अवयव विकृति की,और इस प्रतिक्रिया स्वरुप विशेष प्रकार के दर्द की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार व्याधि का निदान बड़ी सरलता से सम्पन्न होजाता है,जब कि अन्य पद्धतियों में श्रवण,दर्शन,स्पर्शन,विकृति परीक्षण आदि कई विधियों (निदान पंचक) से गुजरने के बाद रोग-निश्चय हो पाता है। फिर औषध विनिश्चय,औषध सेवन, और तब रोग-निवारण।
            यहां एक और बात ध्यान देने योग्य है कि विकृति परीक्षण(Pathological test) आदि द्वारा रोग-निर्णय(विनिश्चय)उस अवस्था में प्रायः हो पाता है,जब व्याधि अपने युवावस्था में पहुंच चुकी होती है,कभी कभी तो बिलकुल जरावस्था(जीर्ण,जटिल अवस्था) में जानकारी मिल पाती है। कैंसर जैसे घातक बीमारी की जानकारी प्रायः दूसरे और तीसरे या कि चौथे स्टेज में मिलने के कारण ही मौतों की संख्या अधिक होती है- यह कटु सत्य है। जब कि नाड्योपचार विधि में बात की बात में सब कुछ हो जाता है। अनुभवी चिकित्सक विन्दुओं को छूकर ही रोग की स्थिति का अंदाजा लगा लेता है। चिकित्सा जगत में प्रायः देखा जाता है कि बहुत सी बीमारियों में रोग-निदान अत्यन्त जटिल(उलझन पूर्ण) हो जाता है। फलतः सही निदान के अभाव में सही चिकित्सा व्यवस्था नहीं हो पाती,और रोग भीतर ही भीतर बढ़ते जाता है। प्रायः विपरीत या अन्दाज से की गयी चिकित्सा- अन्धेरे में चलायी गयी तीर की तरह होती है,जो लक्ष्य भेदन कर भी सकता और नहीं भी। ज्यादातर तो ऐसा होता है कि अनुमानित रोग की चिकित्सा घातक सिद्ध होती है। एक रोग जाय या न जाय,कई अन्य रोग पैदा हो जा सकते हैं। बड़े से बड़े अनुभवी चिकित्सक भी निदान करने में प्रायः चूक जाते हैं। ऐसा इसलिये भी होता है कि उनकी सारी पद्धति ही मशीनी हो गयी है,जो काफी व्ययकारी और उबाऊ भी है,साथ ही जटिल और समय-साध्य भी। ऐसे बहुत से रोगी देखने में आते हैं, जो वर्षों से जटिल हृदयरोग की चिकित्सा करा रहे हैं। विशेषज्ञों के सुझाव पर दवा खाते जा रहे हैं,क्यों कि उनकी यान्त्रिक जांच विधि में रक्तचाप (B.P.) और E.C.G. का रिपोर्ट विपरीत आया है। किन्तु सूक्ष्म परख के बाद पता चलता है कि उन्हें कुछ नहीं,मात्र आमाशय सम्बन्धी सामान्य विकृति (गैस वगैरह) है। निदान की यह त्रुटि मुख्य रुप से इस कारण है,क्यों कि यहां निदान और चिकित्सा दो अलग-अलग क्रियायें हैं।
            नाड्योपचार पद्धति में चुंकि दोनों—  निदान-चिकित्सा एक ही (एक सी) क्रिया है, इस कारण गलत निदान और गलत चिकित्सा की बात ही नहीं हो सकती ; क्यों कि रोग से प्रभावित अवयव से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब केन्द्र पर दबाव देने पर खास तरह के दर्द की अनुभूति होगी ही,और फिर उसी केन्द्र पर बारम्बार के दाब उपचार से रोग का निवारण भी हो जायेगा। इस सम्बन्ध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि एक ही रोग से सम्बन्धित अनेक प्रतिबिम्ब केन्द्र शरीर के विभिन्न भागों में मौजूद हैं,किन्तु यह आवश्यक नहीं कि उन सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर दाब उपचार किया ही जाय। इस सम्बन्ध में डॉ.गाला स्पष्ट कहते हैं—इस बात को खासतौर पर नोट कर लिया जाय कि जिस प्रतिबिम्ब केन्द्र को दबाने से दर्द की अनुभूति नहीं होती,उस केन्द्र पर दाब उपचार करना व्यर्थ है, अर्थात एक रोग के लिए अनेक स्विचों में जिस स्विच पर विकृति संकेत मिले,सिर्फ वहीं उपचार करना उचित है।  डॉ.गाला के इस ध्यानाकर्षण नोट को कुछ उदाहरण द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है- मानलिया घुटने में दर्द हो रहा है प्रत्यक्ष रुप से, किन्तु दर्द का कोई कारण (चोट, मोच,सूजन आदि) स्पष्ट नहीं है,साथ ही एक्यूप्रेशर-विन्दु-परीक्षण में घुटने के प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर किसी तरह का विकृति-संकेत नहीं मिल रहा है। ऐसी स्थिति में सामान्य चिकित्सक को उलझन हो सकता है। चुँकि घुटने में दर्द हो रहा है,इसलिए दवा,स्थानिक मालिस आदि दर्द निवारक उपाय तो किये ही जायेंगे, किन्तु लाख उपचार के बावजूद पीड़ा का निवारण नहीं हो पायेगा,और न किसी अन्य चिकित्सक के पास इसका सही जवाब ही है; परन्तु नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर)पद्धति में इस समस्या का अति सरल समाधान है। वस्तुतः घुटने के समीप से यकृत,तिल्ली,मूत्राशय आदि के शक्ति-संचार-पथ (meridians) गुजरते हैं। यदि उन किसी अंगों की विकृति होगी, तो उसका संकेत घुटने पर मिलेगा ही। अब इन कई शक्ति-संचार-पथों (meridians) में किस खास अवयव से सम्बन्धित उपचार (चिकित्सा) की आवश्यकता है,इसका निश्चय उन-उन अंगों के लिए शरीर में निर्दिष्ट अन्य प्रतिबिम्ब केन्द्रों के सूक्ष्म परख से सापेक्षिक-निदान द्वारा किया जायेगा। इसी भांति हृदय सम्बन्धी विभिन्न व्याधियों में प्रायः रोगी यह कहता है कि उसके बायें कंधे या बांह में दर्द है- ऐसा क्यों? यहां अन्य डॉक्टर सिर्फ यह कह कर रोगी को सन्तोष दिला देता है कि अमुक दवा खा लो,आराम मिल जायेगा। या कहें- उसके मुख्य व्याधि की चिकित्सा चलती रहती है,इस क्रम में बाहों या कंधे का दर्द स्वाभाविक रुप से कम हो जाता है,फलतः रोगी और डॉक्टर दोनों ही निश्चिंत हो जाते हैं। किन्तु असली कारण तो पता चला नहीं।
         नाड्योपचारपद्धति (एक्यूप्रेशर) में इसका स्पष्ट जवाब है— हृदय शक्ति-संचार-पथ (Heartmeridian) के पास से ही हृदयावरण शक्ति-संचार पथ (Pericardium meridian) भी गुजरता है, अतः हृदय सम्बन्धी किसी प्रकार की विकृति में दोनों हाथों में (विशेषकर वायें हाथ में)कहीं भी दर्द होगा ही,यह स्वाभाविक है। और ध्यान देने की बात है कि इस प्रकार के दर्द का निवारण कंधे,वांह आदि के प्रतिबिम्ब केन्द्र पर दबाने से कदापि नहीं होगा। दर्द है कंधे और वांह में,किन्तु दूर होगा हृदय और हृदयावरण केन्द्र पर उपचार करने से। इस तरह के वाहों का दर्द अन्य व्याधियों का संकेत भी हो सकता है- इसका निश्चय भी होना चाहिए। क्यों अन्य कई शक्ति-संचार-पथ (meridians)भी आसपास से ही गुजर रहे हैं। जैसा कि हम पहले प्रसंगों में भी कह आये हैं कि मुख्य मेरेडियनों के अतिरिक्त सब मेरेडियन भी हैं,जो वहीं कहीं आसपास से गुजरते हैं,या कहीं थोड़े दूर से भी। आगे इस अध्याय के अन्त में दो चित्रों के माध्यम से इस स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

  इस प्रकार हम पाते हैं कि नाड्योपचार वड़ी सूक्ष्म परख की क्षमता रखता है,और पूर्ण निरापद भी है। इस पद्धति में रोग-निदान अति सरल है,और चिकित्सा भी वही है,जो निदान है,इस कारण अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में रोगी और चिकित्सक दोनों को सुविधा होती है। नाड्योपचार अपने आप में निदान का बेमिशाल तरीका है,और साथ ही चिकित्सा का अद्भुत उपाय भी।अस्तु।
क्रमशः....


Sunday, 13 November 2016

नाड्योपचारतन्त्रम्ःThe Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...

                सप्तम अध्याय
                रोग-निवारण-सिद्धान्त
        शरीरगत शक्ति संचार पथ (meridians) में किसी प्रकार का व्यवधान या प्राकृतिक बलों (यिंन-यांग) का असंतुलन ही रोगोत्पत्ति का मुख्य कारण है- यह पूर्व अध्याय में स्पष्ट किया जा चुका है। अतः अब उत्पन्न व्याधियों के निवारण के विषय में विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है।
     प्रासंगिक विषय – नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर) पद्धति में एक ओर रोगों का निदान अति सरल है, तो दूसरी ओर उनकी चिकित्सा यानी उपचार भी उतना ही सरल है। ऐसा इसलिए क्यों कि रोगत्पत्ति का कारण यहां बिलकुल स्पष्ट है, और निवारण का अर्थ ही होता है कारण को समाप्त कर देना। ऋणात्मक और धनात्मक शक्तिसंचार में बाधा उत्पन्न हो गयी, रोग उत्पन्न हो गया। इस संचारपथ की बाधा दूर कर दी जाये,रोग भी दूर हो जायेगा यह निश्चित है। यानी कारण का मारण ही रोग का निवारण है। अतः कारण का मारण यानी रोग-निवारण कैसे करें- यहां इस अध्याय में यही विचारणीय है।
      इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ डॉ.एफ.एम.होस्टन कहते हैं कि शरीर के विभिन्न भागों में स्थित कुछ खास-खास विन्दु हैं,जो प्रतिबिम्ब केन्द्र(Reflex Center) कहे जाते हैं। एक्यूप्रेशर- रोग-निवारण-सिद्धान्त(तरीका,विधि) यही है  कि इन केन्द्रों पर खास विधि से उपचार किया जाय।
  हालाकि कुछ विद्वान इस उपचार-विधि(Reflexology) को एक स्वतन्त्र चिकित्सा-पद्धति का दर्जा दिये हुए हैं। किन्तु बात ऐसी है नहीं। संचार-पथों के व्यवधान को दूर करने के प्राचीन यौगिक सिद्धान्त (विधि) पर ही आधुनिक युग में अमरीका के डॉ.जॉनफिट्झजेराल्ड ने व्यापक अध्ययन कर, आधुनिक रुप प्रदान किया। अतः इसे कदापि भिन्न नहीं कहा जा सकता। वैचारिक संकीर्णता सिर्फ इस बात की है कि हाथ-पैर के हथेली और तलवे पर ही डॉ.जॉन की विशिष्टता प्रकाशित हुयी,किन्तु चिकित्सा का यह विधान पूरे शरीर पर इसी भांति लागू होता है।
        ध्यान देने योग्य बात यह है कि ज्यों ही शक्ति संचार में बाधा उत्पन्न होती है, त्यों ही उस पथ (Zone or meridian) स्थित विभिन्न केन्द्रों  (जो प्राकृतिक रुप से पूर्व निर्धारित हैं) पर सांकेतिक सूचना मिलने (पहुंचने) लगती है,क्यों कि पथ पर उत्पन्न व्यवधान के साथ-साथ एक ओर उनका नियत विन्दु(केन्द्र)प्रभावित होने लगता है,तो दूसरी ओर तत्सम्बन्धित अवयव (अंग) भी प्रभावित होने लगता है,और अपनी रुग्णता का संकेत देने लगता है,भले ही उसे हम शीघ्र (तत्काल) पहचान लें अथवा विलम्ब से बूझें। वह अपना संकेत तो तत्क्षण ही देने लगता है।
         शरीर का अमुक भाग रुग्ण हो रहा है,या हो गया है- आमतौर पर लगभग हर व्यक्ति कमोवेश
अनुभव कर लेता है। किन्तु तत्सम्बन्धी प्रतिबिम्ब केन्द्र (Reflex Center) भी इसकी पुष्टि कर रहा है,और पहले से करता आ रहा है- इस बात की जानकारी या अनुभव हर कोई को नहीं हो पाता। यह ज्ञान वही कर/करा सकता है,जिसे इन अद्भुत विन्दुओं से परिचय हो।
            रोगोत्पत्ति की स्थिति में वस्तुतः होता ये है कि शक्ति-प्रवाह के व्यवधान से प्रभावित कायगत केन्द्र अपेक्षाकृत (पहले की तुलना में) अधिक संवेदनशील हो जाता है,और यदि उस खास केन्द्र पर दबाव देकर जांच-परख की जाय तो हम पायेंगे कि सामान्य दबाव की अनुभूति से काफी भिन्न प्रकार का दर्द होता प्रतीत होता है। यह बिलकुल बुनियादी संकेत है। ऐसा होता इस कारण है कि वह केन्द्र अपेक्षाकृत दुर्बल हो जाता है।
  इस सम्बन्ध में एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ डॉ.एफ.एम.होस्टन कहते हैं कि उस पीड़ादायी स्थान की विजली लिक कर रही है,अर्थात अपने प्रवाह-पथ से विचलित हो गयी है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी नहर या नाली की होती है- मुहाने पर कोई अवरोध उपस्थित हो जाने पर जल-प्रवाह वाधित हो कर तितर-वितर होने लगता है,और आसपास के क्षेत्र को प्रभावित करने लगता है। उसी प्रकार शरीर स्थित जैवविद्युत  भी स्थान-भ्रष्ट होकर दुःखदायी होने लगता है। इस स्थिति को दूसरे रुप में भी कहा-समझा जा सकता है कि प्रभावित केन्द्र दर्द का संकेत देकर उपचार हेतु गुहार लगा रहा है,और इस प्रकार हमारा कर्तव्य हो जाता है उस संकेत को समझकर बिजली के विचलन (LICKES)  को दूर करना,जिसका तरीका है- खास ढंग से खास समय तक दबाव देना। दबाव उस खास स्थान पर ही देना है क्यों कि उत्पन्न अवरोध (उत्पन्न व्याधि) का संकेत-केन्द्र (प्रतिबिम्बकेन्द्र- Reflex Center) है वह दर्द भरा विन्दु। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध भारतीय एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ मेरे गुरुदेव संत श्री मणिभाईजी के शब्दों में कहें तो शायद अधिक स्पष्ट हो- जहां दुःखे वहीं दबाओ,तुरतातुरत आराम पाओ एक्यूप्रेशर का मूल मन्त्र घर घर पहुंचाओ...। मणिभाईजी का यह संदेश लाक्षणिक गरिमापूर्ण है। जहां दुःखे वहीं दबाओ का यह अर्थ नहीं कि आँख में पीड़ा हो तो आँख को ही दबाओ,या हट्टी टूटी हो तो वहीं दबाओ या शरीर के किसी भाग में जख्म हो गया है,पीड़ा हो रही है,तो वहीं दबायें,बल्कि उस अवयव से सम्बन्धित संचार पथ या खंड (Zone or meridian) पर स्थित विन्दु (प्रतिबिम्ब केन्द्र) को टटोल कर, अनुभव कर, पहचाने, और फिर उन पर दबाव वाली विधि से उपचार करे।
            दबाब का उद्देश्य- यह स्पष्ट है पूर्व वर्णनों से कि दबाव का एकमात्र उद्देश्य है, प्रतिबिम्बकेन्द्र पर हो रहे दर्द को समाप्त करना,किन्तु इस सम्बन्ध में दो प्रश्न उठ सकते हैं—
1.उस विन्दु पर दबाव देने से क्या होगा या क्या होता है?
2. यह क्रिया होती कैसे है?
            इन प्रश्नों का परोक्ष उत्तर पूर्व में ही दिया जा चुका है,उसे ही अब प्रत्यक्ष कर लें।
नाड्योपचारपद्धति(एक्यूप्रेशर)आन्तरिक चिकित्सा पद्धति का ही दूसरा नाम है।  सृष्टिकर्ता ने सिर्फ  शरीर ही नहीं बनाया,बल्कि उसका रक्षक भी साथ-साथ ही बना दिया है,जिसे हम बाह्य चिकित्सा की चकाचौंध में भुलाये बैठे हैं। या कहें उस रक्षक से काम लेना बन्द कर दिये हैं, या काम लेने की कला विसार दिये हैं। हालांकि हम उस रक्षक से पूर्णतः काम लें अथवा न लें, वह अपना काम पूरी ईमानदारी से करता ही रहता है। अपना कर्तव्य भूलता नहीं कभी। विद्वान हिपोक्रेटीस ने कहा है- बाहरी चिकित्सा व्यवस्था मात्र अन्तःचिकित्सा व्यवस्था का सहयोगी है। वस्तुतः बाहरी चिकित्सा व्यवस्था (चाहे कोई भी पद्धति की हो) तभी कारगर (सफल) होती है जब आन्तरिक शक्ति उसे स्वीकार करती है। संयोगवश यदि वह आन्तरिक व्यवस्था वाह्य व्यवस्था को ग्रहण करने से इनकार कर दे,तो फिर बाह्य व्यवस्था किसी काम की नहीं रह जायेगी- इस सिद्धान्त को आधुनिक चिकित्साशास्त्री भी सहर्ष स्वीकार करने लगे हैं। भले ही इस स्वीकृति को कुछ भी नाम दे लें।
      एक्यूप्रेशर उपचार विधि में प्रभावित प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर दबाव देने का एकमात्र उद्देश्य है उस आन्तरिक चिकित्सक को जागृत (सूचित) करना,जो हमारे आहार-विहार-विपर्यय से सुप्तावस्था में चला गया है।
         यहां प्रसंगवश उस आन्तरिक चिकित्सक के बारे में कुछ और भी जानकारी कर ली जाय। रोग प्रतिरोधी-क्षमता को बनाये रखना उस आन्तरिक चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य है, साथ ही किसी उत्पन्न संकट का निवारण करना भी । वह चिकित्सक पूरे शरीर में (एक शरीर में) एक ही है,किन्तु उसका चिकित्सालय अनेक है- हर अवयव में प्रायः अलग-अलग है। इस बात को दार्शनिकों के अंदाज में कहें तो कह सकते हैं कि एक ही ब्रह्मसत्ता अनेक जीवों में प्रकट होता है। वह एक भी है और अनेक भी। इसी प्रकार वह प्राकृतिक चिकित्सक एक है, सिर्फ एक, और दूसरी ओर रक्त के कण-कण में व्याप्त हो रहा है,अपने अनेक रुपों में। शरीर के प्रत्येक अंग में बैठा है अपनी विशिष्टता युक्त अंदाज में।
            एकत्व रुप में है उभय संतुलनात्मक शक्ति संचार पथ (Governing Vessel Meridian & Conception Vessel Meridian) के रुप में रोग-प्रतिरोधी क्षमता ( Immunity power) का उत्पादन और आपूर्ति निरन्तर करता रहता है, एवं अनेक रुप में जब जिस खास अंग में विकार उत्पन्न होता है,तब उस अवयव से सम्बन्धित अपने केन्द्र में बहुरुप होकर,अपना कर्तव्य पूरा करता है। सच पूछा जाय तो वह स्वयं सूचित है,स्व-संज्ञानी, है, सक्रिय है। किसी प्रकार की सूचना की उसे आवश्यकता नहीं है, फिर भी दबाव-प्रक्रिया द्वारा उसे सूचित कर दिया जाता है, तब अधिक सक्रिय (चैतन्य) होकर कार्य करता है। शरीर पर स्थित विभिन्न विन्दु (प्रतिबिम्बकेन्द्र) उसके सूचना-स्थल हैं। अलग-अलग स्थानों पर शक्ति-संचार-पथों (Meridian) पर अलग-अलग बीमारियों के लिए विभिन्न सूचना केन्द्र बने हुये हैं। इन प्रतिबिम्ब केन्द्रों को शारीरिक विद्युत प्रणाली का वटन कहना गलत न होगा। यानी  Reflect  Switch for Bioelectricity System और उनके समूह को Switch Board कहना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। ये सभी वटन करीब-करीब वैसे ही कार्य करते हैं, जैसे घर में लगा बिजली का वटन। स्विचवोर्ड पर लगे वटन को सही तरीके से दबाने पर तत्सम्बन्धी विद्युत उपकरण- पंखा, बल्ब, फ्रीज, कूलर आदि अपना कार्य प्रारम्भ कर देता है, उसी भांति प्रतिबिम्ब केन्द्रों को दबाने से कायगत अवयव सुचारु रुप से अपना कार्य करने लगते हैं। इस बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए कह सकते हैं कि आन्तरिक चिकित्सक के द्वार पर लगे कॉलिंगबेल का स्विच है यह प्रतिबिम्ब केन्द्र। जिस विशेषज्ञ के द्वार पर लगे घंटी के वटन को दबाते हैं, वह चैतन्य होकर उपस्थित होता है,और अपने कर्तव्य में लग जाता है। इसी भांति प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर दबाव देने से भी होता है। इस बात को एक और रीति से समझा जा सकता है- एक्यूप्रेशर प्रतिबिम्ब केन्द्र एक नियामक और नियंत्रक (operator & controller ) का कार्य करता है। टेलीफोन के तारों से जिस प्रकार संवाद परिवहित होता है, और उसका नियंत्रण दूर कहीं बैठे नियंत्रण-कक्ष के ऑपरेटर द्वारा होता रहता है,उसी भांति शरीर के विभिन्न शक्ति संचार पथ रुपी तारों में प्रवाहित हो रही प्राणऊर्जा के यिन और यांग (रयि और प्राण) बलों का नियंत्रण (नियमन) तत्सम्बन्धी केन्द्र करता रहता है।
           
  यह हुआ प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर दबाव देने का परिणाम, किन्तु वस्तुतः यह हुआ क्यों- हमारा दूसरा प्रश्न अभी अनुत्तरित है,जिस पर आगे विचार करते हैं—
            इस सम्बन्ध में डॉ.किम वॉन्गहान का रिपोर्ट द्रष्टव्य है,जिसे उन्होंने 30 नवम्बर 1963 एवं 15 अप्रैल 1965 को प्योंगयांग नगर (कोरिया) में आयोजित सायन्टिफिक सिम्पोजियम में प्रस्तुत किया था।
            कोरियन लोगों की प्राचीन मान्यता है कि शरीर में जीवनी शक्ति का वाहक एक स्वतन्त्र कार्यप्रणाली वाला तन्त्र है,जिसका नाम है- क्युंगरॉक, और इस तन्त्र का सम्बन्ध है त्वचा के नीचे स्थित विशिष्ट कोशिकाओं से। ये खास कोशिकायें ही वास्तव में एक्यूप्रेशर / एक्युपंक्चर प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं।
         इन कोशिकाओं के सम्बन्ध में खोज बराबर जारी है। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के नजरों से ओझल  इन विशिष्ट कोशिकाओं के बारे में अद्यतन विधि से अन्वेषण करने का कार्य प्रोफेसर डॉ.किम वॉन्गहान ने ही किया,फलतः उन्हीं के नाम पर आज इन्हें लोग वॉन्गहानकोश ही कहते हैं। ये कोश कायगत अति सूक्ष्म नलिकाओं से जुड़े होते हैं। गहन जांच-परख के बाद ये ज्ञात हुआ कि इन नलिकाओं का आकार-प्रकार बहुत कुछ शक्तिसंचारपथों (meridians) जैसा ही है। इन सूक्ष्म नलिकाओं का सम्बन्ध विभिन्न अवयवों से जुड़ा होता है। संवेदित केन्द्रविन्दु पर जब दबाव डाला जाता है,तब उसके ठीक नीचे स्थित वॉन्गहानकोश प्रभावित होजाते हैं,और फिर उन कोश से जुड़ी नलिकायें (जिन्हें बाद में मेरीडियन मान लिया गया) भी प्रभावित हो जाती है,और इस प्रकार प्रभाव-गमन का एक चक्र पूरा हो जाता है। जैसा कि पूर्व उदाहरण में कहा गया है- विद्युत वटन (वॉन्गहानकोश) से विद्युत उपकरण  ( वॉन्गहान अवयव) तक वॉन्गहाननलिकाओं (मेरीडियन) रुपी तारों द्वारा विद्युतधारा पहुंचकर एक चक्र पूरा कर लेती है,फलतः समुचित आवश्यक कार्य जारी हो जाता है। इसे  यहां स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है— चित्रांक 21-क —


इस प्रकार यिन और यांग (ऋणात्मक और धनात्मक) शक्ति-संचार का संतुलन हो जाने पर शरीर की कार्य-प्रणाली ठीक हो जाती है। योग की भाषा में इसे कहें तो शायद अधिक स्पष्ट हो- जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है- भारतीय परम्परा योग की रही है। योगशास्त्र प्राणऊर्जा को प्रधान मानता है,फलतः प्राण के संयम पर अधिक जोर दिया है योगियों ने। प्राणी संज्ञा भी इस प्राण के औचित्य और महत्त्व को ही ईंगित करता है। इस प्राण के संयमन से प्राणी सबकुछ पा सकता है- भोग भी और मोक्ष भी। फिर निरोग रहना-होना कौन सी बड़ी बात है। प्राण के नियंत्रण और संयमन की कला को ही प्राणायाम कहा गया है। प्राचीन योगीजन प्राण के नियमन,संयमन,संप्रेषण आदि द्वारा ही नैरुज्यता (आरोग्य) और दीर्घायु प्राप्त करते थे। दोष-दूष्य सिद्धान्त पर आधारित आयुर्वेदशास्त्र भी प्राण (वायु) को ही प्रधान मानता है,जैसा कि इस श्र्लोक से स्पष्ट है-
कफः पंगु पितः पंगु पगवो मल धातवः। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र वर्षन्ति मेघवत ।।   
अर्थात कफ और पित्त नामक दोनों दोष तो पंगु अर्थात् जड़ हैं। चेतना है मात्र वायु  में, जो स्वयं क्रियाशील रहते हुये अन्य दो (कफ-पित्त) को भी अपनी ही तरह क्रियाशील बना लेता है। अतः मुख्य रुप से इस वायु का ही नियमन होना चाहिए, तभी शरीर स्वस्थ हो सकेगा। आयुर्वेदशास्त्र के इस   वायु को ही योगशास्त्र ने प्राण कहा है, और इसे ही जीवन का मुख्य आधार बतलाया गया। प्राण ही शक्ति है, शक्ति ही प्राण है। यही पूरे शरीर के बहत्तरहजार नाड़ियों में निरन्तर प्रवाहित हो रहा है, निर्वाध रुप से। इसका निर्विघ्न प्रवाह ही स्वस्थ का सूचक है,और विघ्न (अवरोध) ही व्याधि का संकेत। अतः जैसे भी हो वाधा को दूर करना आवश्यक है।
          इस सम्बन्ध में ईंगलैंड के डॉ.फॉलिक्समॉन के विचार भी ध्यान देने योग्य हैं। डॉ.मॉन एक्यूप्रेशर के प्रभाव को प्रतिक्षिप्त क्रिया मानते हैं। इनका कहना है कि रोग-ग्रस्त होने पर तत्काल ही उसका प्रतिक्षिप्त प्रभाव (Reflex effect) कुछ खास स्थानों पर होने लगता है। उन विशिष्ट स्थानों (reflex centre) पर दर्द का अनुभव होता है। दर्द-युक्त उस विन्दु पर दबाव देने या सूई चुभोने से विशेष प्रकार की विद्युत तरंगें (electric wave) उत्पन्न होकर रोग-ग्रस्त अवयव तक पहुँच कर शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता पैदा करती है। इस प्रकार के प्रभावोत्पादकता के लिए स्वायत्त ज्ञानतन्त्र (Autonomous nervous system) ही जिम्मेवार है।
       प्रतिक्षिप्त क्रिया की प्रभावोत्पादकता-परीक्षण करने हेतु पेइचिंग मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ.हान-चि-शेन्ग ने कुछ खरगोशों पर प्रयोग किया। दस खरगोशों की आँखों पर पट्टियां बांध कर,उनके नथुनों पर इन्फ्रारेड किरणें डाली गयी। ऐसा करने पर गर्मी से बचने के लिए सभी खरगोश अपना सिर दूसरी ओर घुमा लिए। डॉ.हान-चि-शेन्ग ने प्रतिक्रिया का यह समय अंकित(नोट) कर लिया। पुनः दश खरगोशों की दूसरी टुकड़ी पर यही प्रयोग दुहराया गया। किन्तु इन्फ्रारेड किरणें डालने से पहले उनके शरीर के विशेष विन्दु सु-सेन-ली पर सूई चुभोया गया,यानी उस केन्द्र को एक्युपंक्चर विधि से उत्तेजित (जागृत) (चैतन्य) किया गया। उनके सिर घुमाने की प्रतिक्रिया का यह दूसरा समय भी अंकित किया गया। पुनः एक अन्य समूह पर यही प्रयोग किया गया। किन्तु उनके शरीर के क्वेन-लुन नामक विन्दु को दाब विधि(एक्यूप्रेशर)से उपचारित करके,तब किरणें प्रक्षेपित की गयी। प्रतिक्रिया का यह समय भी अंकित किया गया। इस तरह के प्रयोगों के पश्चात डॉ.हान-चि-शेन्ग इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पहले समूह के खरगोश सर्वाधिक शीघ्रता से अपना सिर हटा लेते थे। प्रथम की तुलना में द्वितीय समूह की प्रतिक्रिया में कुछ विलम्ब हुआ,यानी सहनशीलता बढ़ी। एवं तृतीय समूह द्वितीय से भी अधिक सहनशील साबित हुआ- प्रतिक्रिया में सर्वाधिक विलम्ब हुआ। इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि अनुपचारित खरगोश-समूह सबसे कम गर्मी सहन कर पाया। एक्युपंक्चर विधि से उपचारित समूह द्वितीय श्रेणी में रहा,और एक्यूप्रेशर विधि से उपचारित समूह प्रथम श्रेणी में गया,क्यों कि उसमें सहनशीलता सबसे अधिक पायी गयी। डॉ.हान-चि-शेन्ग के इस प्रयोग ने यह भी सिद्ध कर दिया कि दाबविधि तुलनात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट रही। खरगोशों के शरीर में सहनशीलता (संघर्ष-शक्ति)की वृद्धि हुयी,तो ऐसा ही अन्य प्राणियों में भी हो सकता है।
         उक्त प्रयोग के पश्चात डॉ.हान-चि-शेन्ग स्पष्ट करते हैं कि एक्यूप्रेशर वा एक्युपंक्चर विधि के प्रयोग से मस्तिष्क के न्यूरोट्रान्समीटर में प्रभाव पड़ता है। फलतः तकलीफ में कमी या तकलीफ की पूर्ण समाप्ति होती है। यह न्यूरोट्रान्समीटर ‘ सीरोटोनीन या नॉरएड्रीनलीन ’ हो सकता है। उनके इस कथन की पुष्टी वाट्समेन इन्सटीट्यूट फॉर न्यूरोकेमेस्ट्री के प्रोफेसर वर्कमेयर ने भी किया है।
            एक्यूप्रेशर उपचार के आन्तरिक प्रभाव के सम्बन्ध में कुछ विशेषज्ञों का मत है कि दाब उपचार से शरीर में एनडॉर्फिन्स या एन्सीफॉलिन्स नामक रासायनिक पदार्थों का स्राव होता है। जिसके परिणामस्वरुप तकलीफ में कमी आती है। कुछ विद्वान मानते हैं कि रोगोत्पादक जीवाणुओं के संक्रमण से त्राण पाने के लिए शरीर एन्टीबॉडीज या फॉगोसाइट्स  बनाता है,जो कि शरीर का स्वाभाविक कार्य है,किन्तु मानसिक तनाव वा अन्य कारणों से उक्त प्रतिरोधी क्षमताओं का अभाव हो जाता है,जिसके परिणामस्वरुप जीवाणुओं को सफलता मिल जाती है। एक्यूप्रेशर उपचार और कुछ नहीं करता,बल्कि मानसिक तनाव को कम कर देता है,जिसके कारण प्रतिरोधी क्षमता स्वयमेव सक्रिय होजाती है,जिसके परिणाम स्वरुप शरीर निरोग(रोगमुक्त)होजाता है। ठीक इसी बात को जापानी विशेषज्ञ कुछ अन्य रुप में कहते हैं- मानसिक तनाव का मुख्य कारण है लैक्टिक एसीड का जमाव। एक्यूप्रेशर उपचार उस तनाव या थकान पैदा करने वाले यानी फेटीगएसीड को एक विपरीत धर्मी तत्त्व- ग्लाइकोजन में रुपान्तरित कर देता है,जिसके परिणामस्वरुप तनाव वा थकान से मुक्ति मिल जाती है।
           नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर)के गुण और प्रभाव पर उंगली उठाने वाले कुछ लोगों का कहना है कि  इसमें कोई विशेषता नहीं है,बल्कि यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक संमोहन मात्र है,जैसा कि देहाती अनपढ़-गंवार लोगों पर जादू-टोने-टोटके का हुआ करता है। खंडनकर्ताओं का दूसरा तर्क ये भी है कि प्रभाव होता भी है तो अति अल्पकाल के लिए,यानी स्थायी तौर पर किसी रोग का निर्मूलीकरण न होता है,और होने जैसी कोई बात ही है।
          नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर)के गुण और प्रभाव के खण्डनात्मक तर्क के सम्बन्ध में मूल रुप से सिर्फ इतना ही कहना है कि प्रत्यक्षस्य प्रमाणं किं? यह एक विज्ञान है, और विज्ञान हमेशा खोज और प्रयोग की अपेक्षा रखता है। जब सत्य प्रमाणित हो जाता है,तब उसे स्वीकारने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए किसी को,क्यों कि जो प्रत्यक्ष है,जो सत्य है,जो प्रमाणित है उस पर किसी प्रकार की आशंका या लांछन क्यों?

इस सम्बन्ध में निम्नांकित बातों पर ध्यान दिया जा सकता है—
1.    रोगी पर निद्राकर औषधियों का  प्रयोग कराकर या कृत्रिम बेहोशी उत्पन्न करने के बाद एक्यूप्रेशर विन्दुओं को उत्तेजित किया जाय,तो भी उसका उपचार कारगर होता है,यानी प्रभाव पूर्ववत ही होता है।
2.    रोग से असम्बद्ध केन्द्र पर उपचार करने पर कोई लाभ(प्रभाव) नहीं होता। उदाहरणतया किसी के सिर में दर्द है,और हम उसके कान के विन्दुओं को उपचारित करें तो उसका कोई असर नहीं मालूम पड़ेगा।
3.    रोगी के रोग सम्बन्धी सही विन्दु पर उपचार करने पर,उपचार प्रारम्भ करने के कुछ क्षण बाद स्वयं ही एक प्रकार का आन्तरिक संकेत रुग्ण स्थान पर मिलने लगता है- जो कि विन्दु-विनिश्चय की सबसे अच्छी पहचान है।
4.    प्रभाव-खण्डन के खण्डन का सबसे बड़ा तर्क तो यह है कि मनुस्येत्तर प्राणियों पर भी इसका प्रयोग किया गया (जिसके पास मनुस्य जैसी विचारणा शक्ति नहीं है) फलतः जादू- टोने,तन्त्र-मन्त्र जैसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव-जाल में आने की बात नहीं हो सकती,जैसा कि डॉ.हॉन-ची-शेन्ग द्वारा विभिन्न खरगोशों पर किये गये प्रयोग से स्पष्ट होता है।

नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर) का प्रभाव  एक्यूप्रेशर उपचार द्वारा शरीर पर निम्नांकित प्रभाव पड़ते हैं-
1)    शामक प्रभाव(anesthetic effect) एक्यूप्रेशर उपचार द्वारा वात-व्याधियों (असीतिर्वातजा रोगाः)(सभी प्रकार के दर्द-पीड़ा) में तत्काल प्रभाव दृष्टि- गोचर होता है। यानी वेदना-शामक प्रभाव उत्पन्न होता है।
2)    तन्द्राकर प्रभाव (sedative effect) – नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर)उपचार क्रम में (E.E.G.-electro encephalon gram) परीक्षण करके देखने पर पाया जाता है कि मस्तिष्क में उठने वाली डेल्टा और थीटा तरंगें कम हो जाती है, जिसका तात्पर्य है कि प्रत्यक्ष मानसिक शान्ति लाभ हो रहा है।
3)    मानसिक प्रभाव(psychological effect) खास स्थल पर दाब उपचार करने से ( नियमित रुप से) अत्यधिक मानसिक शान्ति लाभ होकर,स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह  मानसिक प्रभाव उक्त तन्द्राकर प्रभाव से किंचित भिन्न है। इस प्रकार के विशेष प्रभाव का मुख्य कारण है - मस्तिष्क के खास भाग (mid brain) पर reticular formation का होना।
4)    स्नायविक प्रभाव (nervous,  muscular & skeletal system)- नाड्योपचार (एक्यूप्रेशर) उपचार का सर्वाधिक महत्त्व है स्नायविक दुर्बलता को दूर करने में। यही कारण है कि अन्य चिकित्सा पद्धति जिन स्नायविक व्याधियों में असफल सिद्ध होती है,वहां यह पद्धति पूर्ण सफलता प्राप्त करती है।
5)    जीवनी शक्ति का विकास(Homeostasis development)- चुंकि दाब-उपचार प्रक्रिया स्वास्थ्य-रक्षण की एक विशुद्ध प्राकृतिक विधि है ,फलतः जीवनी शक्ति का विकास वड़े कारगर ढंग से होता है,जिसे इस पद्धति का अद्भुत प्रभाव कह सकते हैं।
6)    प्रतिकारक प्रभाव(immune effect)- नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर)पद्धति एक ओर तो रोगों को निर्मूल करता है अपने अन्य प्रभावों के फलस्वरुप,तो दूसरी ओर शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता का विकास भी करता है। परिणातः स्वस्थ दीर्घ जीवन प्रदान करता है। यही कारण है कि अन्य औषधीय चिकित्सा पद्धतियों की तरह इसे चिकित्सा-पद्धति मानने के वजाय स्वास्थ्य-रक्षण-पद्धति कहना अधिक उचित प्रतीत होता है। उदाहरण स्वरुप रक्त में लाल कण(RBC), श्वेत कण(WBC),कॉलेस्ट्रोल, ट्रॉयग्लिसराइड्स,गामाग्लोब्युलिन आदि की मात्रा को व्यवस्थित करता है। फलतः बहुत सी घातक बीमारियों को उत्पन्न ही नहीं होने देता ,यदि स्वस्थ मनुष्य भी नियमित उपचार लेता रहे ।
7)    संयमनात्मक प्रभाव- नाड्योपचारतन्त्र प्राणी की मूल शक्ति यानी प्राण को ही संयमित करता है,फलतः मानव शरीर की अधिकांश समस्याओं का स्वमेव हल हो जाता है इसके प्रभाव-प्रयोग से। शरीर की व्याधि से भी अधिक जटिल होता है मन की व्याधि(आधि)। मन पर सीधे प्रभाव डालने वाली शक्ति है – प्राण। और प्राण का नियमन करता है- नाड्योपचार। अतः इस संयमन को सर्वोत्तम प्रभाव कहा जा सकता है।
8)    प्रतिप्रभाव का नितान्त अभाव- अन्य किसी भी चिकित्सा पद्धति में औषधि(द्रव्य) का प्रयोग किया जाता है,जिसका कमोवेश प्रतिप्रभाव(side effect) होता ही है,जब कि नाड्योपचार में किसी बाहरी द्रव्य का प्रयोग नहीं किया जाता,फलतः प्रतिप्रभाव का प्रश्न ही नहीं है। अतः  निर्भय होकर,निःसंकोच प्रयोग किया जा सकता है इसका।
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क्रमशः जारी...