Thursday, 31 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-16

                  अध्याय ११ - वास्तु-भूमि-  
                                           
  (क)चयन
    
गेहारम्भात्प्राग्विचारणीया विषयाः-(वास्तुरत्नाकर-भूमिपरिग्रहप्रकरण-११)
      किसी भी वास्तुकार्य का आधार है- भूमि।भूमि पर ही तो किसी प्रकार का निर्माण कार्य किया जा सकता है।अतः इसका सम्यक् चयन सर्वप्रथम आवश्यक है।इस सम्बन्ध में वास्तुशास्त्रियों ने कई बातों पर ध्यानाकर्षित किया है। 'देश' शब्द के व्यापक अर्थ का प्रयोग किया गया है- किस व्यक्ति को किस स्थान पर, किस नगर/ग्राम के, किस दिशा में वास करना चाहिए- आदि बातों का ध्यान रखा गया है। इसके लिए व्यक्ति के नाम,राशि,वर्ण के साथ-साथ नगर/ग्राम आदि के नाम,राशि,वर्ण का भी विचार किया जाना चाहिए;साथ ही भूमि के रंग/वर्ण भेद का भी विचार किया जाना चाहिए।परिवेश,प्लवत्व(ढलान), पार्श्व,आकार,अन्तरिक्ष,भूगर्भ आदि सभी विन्दुओं पर गहराई से विचार करने की बात कही गयी है- वास्तुशास्त्रों में।
    परन्तु,वर्तमान परिवेश में इनमें बहुत सी बातें अप्रासंगिक,कठिन या व्यर्थ सी प्रतीत होती हैं।सर्वप्रथम उन्हीं बातों पर एक नजर डाल लें-
    भूमि-चयन सम्बन्धी उक्त वास्तु-नियमों के अनुपालन में व्यावहारिक कठिनाइयां कई विन्दुओं पर झलकती हैं।भवन-निर्माण के मूल उद्देश्यों में भी बदलाव  आ गया है।"जननी,जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयशी" की गरिमा-युक्त वास का महत्त्व था। इस विचार से मकान बनाये जाते थे कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुख-शान्ति से वास करेगी वहाँ; किन्तु,आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है- दादा तो दूर,पिता के बनाये हुये मकान में पुत्र रहेगा ही- कोई जरुरी नहीं।मानव-जीवन अर्थ प्रधान हो गया है- जो सभी 'अनर्थों' का जड़ है।जीवन जीविका-प्रधान हो गया है।जीविका-प्रदाता के छांवतले ही बहुतों का अनमोल जीवन गुजर जाता है- क्वाटरों और फ्लैटों में,या फिर किराये के कबूतरखाने में।संयुक्त परिवार विखंडित हो चुका है- "हम दो हमारे दो के"  बुलडोजर से ध्वस्त होकर;तो दूसरी ओर जीवकोपार्जन में उलझी कितनी जिन्दगियाँ महानगरों के खाली पड़े गटरों (ह्यूमपाइप) में गुजर जाती हैं।उनके लिए 'वास्तु' महज मजाक बन कर रह जाता है।प्रायः देखा जाता है कि लोग जहां नौकरी करने जाते हैं, थोड़ी भी स्थिति अनुकूल हुयी तो वहीं बस जाते हैं। ऐसे में नगर/ग्राम, नाम/राशि का कहाँ औचित्य रह जाता है? रंग/वर्ण सब व्यर्थ। दिशा और क्षेत्र भी अर्थहीन हो जाते हैं।
    इन चार बातों (नगर/ग्राम,नाम/राशि,रंग/वर्ण,और दिशा) को जरा नजरअन्दाज कर सिर्फ शुद्ध भूमि की बात सोचें, तो भी अनेक समस्या सामने आती हैं- शहर के आसपास के व्यर्थ पड़े गड्ढों को शहर के कूड़े-कचरे से भर कर(जो सैकड़ों वर्षों में भी गलने-सड़ने वाले नहीं हैं) भूमाफियाओं और सरकारों द्वारा विक्रय/आवंटन किया जाना कहां तक उचित कहा जा सकता है वास्तु-नियमों से? क्या 'शल्योद्धार' करेंगे उस विकृत भूमि का? कदम-कदम पर खड़े विद्युतचुम्बकीय तरंगों (electromagnetic wave) का जहर उगलते लौह-दैत्यों से कहाँ तक बचेगा आज का मानव? आज से पचीस वर्ष पूर्व एक वास्तु-व्याख्यान में जब मैंने मोबाइल और विजली के हाई टेनशन खम्भों की चर्चा की थी, तो बहुतों ने हँसी उड़ायी थी मेरी बातों पर,भले ही अब विदेशियों को सूझ गया तब, दबी जुबान सभी स्वीकारने लगे हैं- इस तथ्य को।अब उन्हें भौंरों और मधुमक्खियों का रास्ता भटकना भी समझ में आने लगा है।
    इसी भांति, भूमि-चयन-परीक्षण के बाद पंचतत्त्वों के संतुलन की बात भी आती है।संयोग से १४×१० फीट के एक प्लॉट के वास्तु-परामर्श का प्रस्ताव आया- एक जानेमाने वास्तुकार(आर्किटेक्ट) ने पांच मंजिले इमारत का नक्शा बना कर भेजा था मेरे पास उस भूमि के लिए।पूरी जगह सेफ्टीटैंक से थोड़ा ही अधिक है।अब भला उसमें पंचतत्त्वों को कैसे और कितना संतुलित किया जाय- सिर्फ निर्माण की दृष्टि से ? आधुनिक फेंगशुयी के बेजान प्लास्टिक-पिरामिड और 'लाफिंगबुद्धा' कितना परिमार्जन करेंगे विकृति के पिटारे का? इसी भांति महानगरीय कंकरीट के जंगलों में एक अदना सा फ्लैट 'हीरे के मोल' खरीदकर पंचतत्त्व-संतुलन कितना बनाया जा सकता है- एक अहम सवाल है, और वास्तुशास्त्र में आस्था न रखने वालों के लिए एक तर्कपूर्ण करारा जबाब भी। अस्तु....।
    किन्तु यथासम्भव विचारणीय हैं- ऋषि-प्रणीत वे सारे नियम, इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता।मनीषियों ने लम्बे समय के ज्ञानानुभव से इन बातों को निश्चित किया है।अतः भले ही युगानुरुप न हो,फिर भी बिलकुल व्यर्थ कैसे कहा जा सकता है?
    ऊपर दर्शायी गयी कुछ समस्यायें- विशेषकर शहरी भूमियों के लिए,और अत्याधुनिक पाश्चात्य विचारधारा वाले लोगों के लिए है।आर्यावर्त की आत्मा- जो मुख्य रुप से गावों में बसती हैं,वहां वैसी समस्या नहीं है,और सबसे बड़ी बात यह है कि जिन्हें नियम-पालन में आस्था है,उनके लिए हजार रास्ते भी निकल जाते हैं,और नियम के खंडक-भंजकों को लाख बहाने भी मिलते रहते हैं।
    यहाँ हम पहले ऋषि-प्रणीत विधानों पर गहराई से सोच-विचार कर लें,पुनः यथास्थान असम्भव और कठिन विधानों का कोई सामयिक हल ढूढने का प्रयास करेंगे।इस लघु पुस्तिका में ऐसी कुछ ज्वलन्त समस्याओं का समाधान यथास्थान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

वास्तु-भूमि-चयन
                

भवन निर्माण के लिए सर्वप्रथम भूमि की व्यवस्था करनी होती है।भूमि कहाँ हो,कैसी हो आदि बातें, ध्यान देने योग्य हैं।वास्तु शास्त्र इस सम्बन्ध में कुछ विशेष बातों पर ध्यान दिलाता है।
कहाँ हो ? इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप निम्न विंदुओं पर विचार करना चाहिये:-                        
१.ग्राम/नगर विचार-
  (क) इसके लिए एक सूत्र सुझाया गया है- ग्रामाक्षर की गणना करके उसमें चार से गुणा कर दें,तत्पश्चात् नामाक्षर की भी गणना करके प्राप्त गुणनफल में जोड़ कर, सात से भाजित कर दें। लब्धि को त्याग दें।शेष पर विचार करें- १.सन्तान-लाभ, २.धन-लाभ, ३.धन-हानि, ४.आयु-नाश, ५.शत्रु-भय, ६. राज्य-लाभ,७ यानी शून्य शेष हो तो मृत्यु।
 उदाहरण- कमल नाम के व्यक्ति को पटना में भवन बनाने का विचार है।
अतः कमल = ३, पटना = ३
  इसलिए ३ × ४ = १२
 अब   १२ + ३ = १५
 अब   १५ ÷ ७ = २ लब्धि, १ शेष
 एक शेष यानी सन्तान-लाभ।इसी भांति स्थान विचार करना चाहिए।
  (ख) ज्योतिषीय गणना से अपने नाम और ग्राम की राशियों की गणना करें। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि व्यक्ति को अपने प्रचलित नाम की राशि का क्रमांक लेना चाहिए ,न कि जन्म कुण्डली की राशि का।यथा- कमल की राशि है- मिथुन यानी तीन, और पटना की राशि है- कन्या यानी छः।
          अब, नाम राशि से गिनती करके ग्राम राशि तक जाये।इस प्रकार मिथुन से कन्या- चौथी राशि हुयी।इसी भांति गणना करे।
राशि-गणना का फल- २,५,९,१०,११- अति उत्तम
                                    ४,८,१२-  रोग भय
                                          १,७-   शत्रु भय
                       ३,६-  हानि
मतान्तर से उक्त राशि गणना का फल-२,५,९,१०,११- उत्तम- प्रथम श्रेणी ग्राह्य
                                                       १,३,४,७- मध्यम- द्वितीय श्रेणी ग्राह्य
                                                         ६,८,१२- अधम -सर्वथा त्याज्य
     
उक्त नियम सम्बन्धी किंचित आर्ष-वचनः-
        ग्रामनामाक्षरं ग्राह्यं चतुर्भिगुणयोत्ततः।
       नरनामाक्षरं योज्यंसप्रतभिर्भागमाहरेत्।।(मुहूर्तरत्नाकर,वास्तुरत्नाकर)
       स्वनाराशितो ग्रामराशिद्वर्यङ्केषुदिक्शिवैः।
       सम्मितश्चेत्तदा तस्य तद्ग्रामे वास उत्तमः।।
      रोगोऽष्टद्वादशे तुर्ये वैरमाद्ये च सप्तमे।
      हानिः ष्ष्ठे तृतीये च ग्रामराशौ स्वनामभात्।।(मु.ग.१८-१,२)
        यद्ग्रामभं द्व्यङ्कसुतेशकाष्ठा-
      मितं भवेल्लाभमतः शुभः सः।
      यद्मम् शशाङ्काग्निनगाब्धितुल्यं,
      मध्योष्टषट्कार्कमितं निषिद्धः।। (वास्तुप्रदीप)

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Tuesday, 29 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-15

अध्याय१०.

वास्तु-भूमि-प्राप्ति-अनुष्ठान-प्रयास
     

     प्राणिमात्र अपने सुखमय आवास-व्यवस्था का आकांक्षी है। मनुष्य सृष्टि का अपेक्षाकृत श्रेष्टतम प्राणी है,फलतः उसकी आकांक्षा भी श्रेष्टतम होती है। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान तक, प्रायः मानव सुख-सुविधा सम्पन्न आवास के लिए चेष्टित रहता है।पहले की अपेक्षा आज के समय में वास-भूमि की प्राप्ति काफी कठिन हो गयी है,जिसके कई कारण हैं।भीषण मंहगाई और जनसंख्या का बढ़ता भार योग्य वास-भूमि को दुर्लभ सा बना दिया है।बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाख प्रयास के पश्चात् भी योग्य भूखंड की प्राप्ति नहीं हो पाती है। इसके लिए कुण्डली के ग्रह ही मुख्य रुप से जिम्मेवार होते हैं।अतः सर्वप्रथम उन्हें गृहादियोग का विचार- योग्य ज्योतिर्विद से कराना चाहिए,एवं प्रतिकूल ग्रहों का समुचित उपचार करना चाहिए।वास सम्बन्धी परेशानी का विचार और उपचार सिर्फ निज भवन-निर्माण के लिए ही नहीं,बल्कि किराये के मकान की तलाश और बारबार की विफलता की स्थिति में भी किया जाना चाहिए। दुनियाँ की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा किराये के मकान में ही जीवन गुजार देता है;और संतोषजनक किराये के मकान में भी स्थिरता पूर्वक वांछित समय तक टिक पाने में भी प्रायः दिक्कतें आती रहती हैं।अतः उन्हें भी इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।प्रसंगवश,वास्तु-प्राप्ति के ज्योतिषीय पक्ष पर थोड़ा विचार कर लें।
वास्तु-प्राप्ति के ज्योतिषीय पक्ष
प्रायः देखा जाता है कि समुचित धन रहते हुए भी निज भवन की व्यवस्था नहीं हो पाती;या भवन के नाम पर संचित धन किसी न किसी कारण से बरबाद हो जाता है,लोग धोखे के शिकार हो जाते हैं;या सुदीर्घ प्रयास के पश्चात् घर की व्यवस्था तो हो जाती है,पर उसका सुखभोग नहीं हो पाता। आँखिर क्यों?
    इसके लिए वास्तु-प्राप्ति के ज्योतिषीय पक्ष(ग्रह स्थिति)पर विचार अति आवश्यक है।कुण्डली में भवन-प्राप्ति और भवन-सुख दोनों होना चाहिए,अन्यथा पानी पर लकीरें खींचते रह जायेंगे।
    भूमि का कारक ग्रह होता है भूमिपुत्र- मंगल,और जन्म कुण्डली का चतुर्थभाव इसके विषय में संकेत देता है।साथ ही वास्तु-सुख पर विचार करने के लिए लग्न और लग्नेश का भी विचार करना जरुरी है,तथा दशमेश,नवमेश, लाभेश का सहयोग भी अपेक्षित है।
कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रह-स्थितियों पर एक नजर –
Ø चतुर्थेश उच्च,उच्चाभिलाषी,स्वक्षेत्री,मित्रक्षेत्री,केन्द्रस्थ,मूलत्रिकोणस्थ,शुभग्रह युत-दृष्ट हो तो वास्तु-प्राप्ति अवश्य होती है।
Ø भूसुत- मंगल की सुदृढ़ स्थिति के साथ-साथ लग्न,लग्नेश,दशमेश,नवमेश, लाभेश का सहयोग हो तो सुखमय वास्तु-प्राप्ति अवश्य होती है।
Ø लग्नेश चतुर्थस्थ और चतुर्थेश लग्नस्थ हो तो निज पराक्रम से भवन निर्माण होता है।
Ø जन्मांक चक्र के चतुर्थ भाव में दो शुभग्रह- चन्द्रमा और शुक्र हों,अथवा चतुर्थ भाव में कोई उच्चस्थ ग्रह हो,अथवा चतुर्थेश केन्द्र-त्रिकोण में हो तो सुन्दर सुसज्जित कलात्मक भवन का स्वामी होता है।
Ø चतुर्थेश और लग्नेश दोनों यदि चतुर्थस्थ हों तो अकस्मात् वास्तु-प्राप्ति योग बनता है।ऐसी स्थिति में बिना परिश्रम या अल्प प्रयास से ही बने-बनाये घर की प्राप्ति हो जाती है।
Ø चतुर्थ भाव चतुर्थेश और लग्नेश युत हो तो वास्तु प्राप्ति होती है।
Ø चतुर्थेश कर्मेश से युत होकर केन्द्र वा त्रिकोण में हो तो वास्तु प्राप्ति होती है।
Ø लग्नेश एवं सप्तमेश लग्नस्थ हों,तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø लग्नेश-चतुर्थेश लग्नस्थ हों तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø चतुर्थेश उच्च,स्वगृही,मूलत्रिकोणस्थ हो,साथ ही नवमेश केन्द्रस्थ हो तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø लग्नेश-सप्तमेश लग्नस्थ या चतुर्थस्थ हो, तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø सुखेश यदि दशमेश के साथ केन्द्र,त्रिकोण में हो तो उत्तम कोटि के भवन की प्राप्ति होती है।
Ø चतुर्थेश स्वगृही,स्वनवांश,उच्चस्थ हो तो भूमि,भवन,वाहन,माता आदि का प्रचुर सुख प्राप्त होता है।
Ø चतुर्थ भाव या चतुर्थेश दोनों यदि चर राशि में हों,चतुर्थेश शुभग्रह-युत-दृष्ट हो तो एक से अधिक भवन का योग बनता है।किन्तु इसमें एक दोष यह है कि स्थायित्व का अभाव हो जाता है- यहां-वहां वास परिवर्तन होते रहता है,भले ही अपना मकान ही हो।परन्तु यदि उक्त स्थिति स्थिर राशि में हो तो मकान तो कई होंगे,पर वास स्थिरता पूर्वक कहीं एक स्थान पर ही होगा।
Ø चतुर्थेश-दशमेश की युति शनि-मंगल के साथ हो तरह-तरह के मकानों का स्वामी होता है।
Ø  चतुर्थेश-दशमेश की युति चन्द्रमा और शनि से हो तो विचित्र भवन योग बनता है।यानी जातक के मकान में कुछ विशेषता(विचित्रता) होगी जो और से विलकुल भिन्न होगी।
वास्तु-प्रतिबन्धक योग कुण्डली में कुछ ऐसे दुर्योग भी होते हैं,जो बना-बनाया खेल बिगाड़ देते हैं।पहले से प्राप्त वास्तु-सुख भी अचानक बाधित हो जाता है,या लाख कोशिश के बावजूद वास्तु-प्राप्ति नहीं होती।
v चतुर्थेश संयोग से द्वादशस्थ हो,तथा पापग्रहों से युत वा दृष्ट हो तो ऐसी स्थित का सामना करना पड़ सकता है।
v चतुर्थेश का नवांशपति द्वादशस्थ हो, पापग्रहों से युत वा दृष्ट हो तो ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।   
v लग्नेश और चतुर्थेश छठे,आठवें,बारहवें स्थान में हो तो वास्तु-प्राप्ति में विशेष रुप से विघ्न पैदा करता है।
अतः ऐसी स्थिति में पीड़क ग्रहों की विशेष शान्ति अवश्य करानी चाहिए।
    कुण्डली के ग्रहों के विचार-उपचार के पश्चात् कुछ अन्य क्रियायें भी करने का निर्देश है शास्त्रों में,यथा-
    एक पौराणिक प्रसंगानुसार,पृथ्वी का उद्धार भगवान वराह ने किया था।अतः शास्त्रों में वाराहोपासना का निर्देश है।स्कन्धपुराण के वैष्णवखण्ड में प्रसंग है कि भूमि-प्राप्ति हेतु ऊँ नमः श्रीवराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा- मंत्र का जप, पूर्ण अनुष्ठानिक विधि से सम्पन्न करें।इसकी जप संख्या चार लाख बतलायी गयी है। उतना न सम्भव हो,तो भी कम से कम सवालाख जप तो अवश्य करें।जप के बाद मधु-घृत मिश्रित हविष्य से होम भी करना अति आवश्यक है।श्रद्धा-विश्वास पूर्वक किये गये अनुष्ठान का फल अति शीघ्र प्राप्त होता है- इसमें जरा भी संशय नहीं।एक बात का ध्यान रखा जाय कि महावराह शुद्ध-सात्त्विक देव हैं। अतः इनकी उपासना तमोगुणी आहार-विहार वाले व्यक्ति कदापि न करें।हां,वे योग्य सात्विक ब्राह्मण से अपने निमित्त अनुष्ठान करा लें।इस अनुष्ठान का फल संवत्सर के भीतर ही प्राप्त हो जाता है- इसमें दो राय नहीं।
    एक और अपेक्षाकृत सरल उपाय है- वास्तुप्राप्तियन्त्र का स्थापन-पूजन।शुभ मुहूर्त में योग्य ब्राह्मण से इस यन्त्र की स्थापना करा कर इच्छुक व्यक्ति सपत्निक नित्य पंचोपचार पूजन करें,एवं वास्तु देवता से श्रद्धावनत निवेदन करे। क्रिया प्रारम्भ करने के वर्ष भर के भीतर ही कार्य सिद्धि हो जाती है।यह कार्य स्वयं करना सम्भन न हो तो योग्य ब्राह्मण से (समुचित दक्षिणा देकर) कराया जा सकता है।
   यन्त्र की स्थापना का विधान सामान्य यन्त्रोपासना-विधि के अनुसार ही है। कोई विशेष झंझट नहीं है।वैसे बाजार में यह यन्त्र तांबे या पीतल का बना-बनाया भी मिलता है,जिसे खरीद कर मात्र स्थापन-विधान पूरा कर देना होता है। भोजपत्र पर अष्टगन्ध से यन्त्र लेखन कर स्थापना करना अधिक और आशु लाभकारी होता है।यहाँ नीचे इस यन्त्र का चित्र प्रस्तुत किया जा रहा है-

 

नोटः-  

 ऊपर के यन्त्र में तकनीकि कठिनाई के कारण सभी अंक अंग्रेजी में दिये गये हैं।इसके अतिरिक्त कहीं भी अंग्रेजी अंकों के प्रयोग का कारण यही है।पेन्ट में काम करने में अंग्रेजी अंकों का प्रयोग लाचारी वस मुझे करना पड़ रहा है।अतः पाठकों/दर्शकों से निवेदन है कि देवनागरी के अंकों का ही उपयोग किया करें।अंग्रेजी के अंकों का यान्त्रिक-प्रयोग आपके कार्य को कदापि सफल नहीं होने देगा।आधुनिक शिक्षापद्धति ने नयी पीढ़ी को इतना संकुचित कर दिया है कि वे मूल पथ से अनजान रह गये है।देवनागरी के अंकों का ज्ञान और पहचान भी लुप्त सा हो गया है।चूंकि मेरी ये कठिनाई सिर्फ पेंन्ट में है, एम.एस.ऑफिस में नहीं,अतः अनभिज्ञ पाठकों की सुविधा के लिए दोनों प्रकार के अंकों का नमूना यहां प्रस्तुत कर दे रहा हूँ।

1-१
2-२
3-३
4-४
5-५
6-६
7-७
8-८
9-९
10-१०
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Monday, 28 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-14

नवम् अध्याय का शेषांश...2

अब आगे के चित्रों में इन्हीं दोनों मंडलों की रंग-योजना प्रस्तुत की जा रही है।रंगयोजना का उपयोग विशेष अवसरों पर वास्तुपूजनार्थ किया जाता है।






















आगे एकाशीपद वास्तुमंडल की रंग योजना दो चित्रों(क-ख) में दर्शायी गयी है। इसका मुख्य कारण अलग-अलग पुस्तकों का मतान्तर है,जिनमें चित्रांक 'क' अपेक्षाकृत अधिक व्यावहारिक और तर्कसंगत प्रतीत हो रहा है।इस सम्बन्ध में विद्वान बन्धु अपने विवेक से काम लें- यही मेरा निवेदन है।


 उक्त पदों में अंग-विन्यास और मर्म-विन्यास की विशेष चर्चा पिछले अध्यायों में की जा चुकी है।अतः प्रसंगवश यहां सिर्फ विन्यस्त चित्रों की पुनरावृत्ति की जा रही है-

       ऊपर के सभी चित्रों को देख कर  मर्मों और अंगों का विचार करते हुये कोई भी निर्माण कार्य करना चाहिए।अतिमर्मों की मर्यादा की रक्षा तो हर स्थिति में करनी ही है,सामान्य मर्मो का भी विचार आवश्यक है।स्वतन्त्रतापूर्वक सामान्य और निरापद क्षेत्रों में ही काम किया जा सकता है,वह भी वास्तु के अन्यान्य नियमों(तत्व,ऊर्जा) का ध्यान रखते हुए।सीधे अर्थों में हम कह सकते हैं कि पूरे वास्तु मंडल में तिल भर भी स्थान नहीं है, जहाँ हम मनमानी करें।          
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पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-13

नवम् अध्याय का शेषांश... 

अब उक्त कोष्टकों में एक से लेकर पैंतालिस तक निर्धारित पदों को स्थापित किया जा रहा है- अगले चित्रों में।ध्यातव्य है कि किसी भी क्रमांक को चौंसठ पद में अपेक्षाकृत कम स्थान मिलेंगे,एकाशी पद की तुलना में।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है- ७×७ से १४×१४ कोष्टक वाले वास्तुमंडल यथावश्यक बनाये जाते हैं।इस प्रकार वर्गों(खंडों) की संख्या न्यूनतम उनचास हो, या अधिकतम एक सौ छियानबे,स्थापित देवादि संख्या सभी में पैंतालिस ही होगी, और वाह्य सीमा पर आठों दिशाओं में चरक्यादि अष्ट शक्तियां ही स्थापित होंगी।अन्तर सिर्फ प्रत्येक को मिलने वाले हिस्से का ही होता है।

अतः यहां सबकी चर्चा न करके,मुख्य रुप से प्रयोग में आने वाले चौंसठ एवं एकाशी पद पर ही सभी चर्चायें की जा रही हैं।

      यहाँ दर्शाये गये (ऊपर और नीचे)दोनों चित्रों(चौंसठ एवं एकाशी खंडों वाले वास्तुमंडल)में दिये गये सारणी के अनुसार पैंतालिस देव-पदों को स्थापित करना चाहिए।
    

Sunday, 27 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-12

    अध्याय ९. विभिन्न वास्तु-चक्र(६४पद,८१पद)
         
निर्माण के लिए विभिन्न वास्तु-चक्रों की योजना की गयी है।गृह-स्थापन के विभिन्न तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए विशेष कर दो प्रकार के वास्तु-चक्रों की आवश्यकता पड़ती है- एक में वास्तुमंडल को समान स्तर के चौंसठ खंडों में तथा दूसरे में एकाशी खंडों में विभाजित करने का निर्देश दिया गया है।पुनः इनमें रंग योजना,पद-योजना,अंग-योजना,कार्य-योजना,मर्म-योजना, उर्जा-प्रवाह-योजना,तत्त्व–योजना आदि की बातें आती हैं।
    व्यक्तिगत गृह निर्माण ही नहीं,बल्कि ग्राम/नगर स्थापन हेतु भी इन्हीं वास्तुमंडल-नियमों का पालन करना चाहिए।भवन भास्कर में कहा गया है कि ग्राम, नगर और राजगृह निर्माण के समय चौंसठ पद वास्तुमंडल का स्थापन-पूजन होना चाहिए।सामान्य व्यक्ति को गृह निर्माण करते समय इक्यासीपद वास्तुपुरुष की पूजा करनी चाहिए।देव-मन्दिर के निर्माण के समय शतपद(१००) वास्तुपुरूष का पूजन होना चाहिए,एवं पुराने गृहकार्य (जीर्णोद्धार) के समय उनचास(४९)पद वास्तु पुरूष का पूजन होना चाहिए।आधुनिक समय में तो चापाकल,और बोरिंग का चलन है।वस्तुतः यह प्राचीन कूप का ही आधुनिकी- करण है-तदनुसार नाम भी है- नलकूप।वास्तुशास्त्रों में जलस्रोत- वापी,कूप,तड़ाग आदि की स्थापना के समय भी पद-मंडल आदि का विचार करना आवश्यक कहा है।इसमें एक सौ छियानबे (१९६)पदवास्तुपुरूष के स्थापन-पूजन का विधान है।वाटिका,वन,उद्यान आदि के स्थापन हेतु भी एक सौ छियानबे पद का ही विधान किया गया है। वास्तुराजवल्लभ में ७×७ से १४×१४ कोष्टक-मंडल तक की चर्चा है।
    मत्स्य पुराण में स्पष्ट आदेश है कि सोने की शलाका से चयनित भूमि पर रेखांकन करे,तदुपरान्त पिष्टक-लेपित(चावल का आटा और हरिद्रा-चूर्ण)सूत्र के सहारे रेखांकन करे।पहले पूर्व से पश्चिम दस रेखाओं का अंकन करे,पुनः उत्तर से दक्षिण के दस रेखाओं का अंकन किया जाय,न कि कहीं से सूत्र-स्थापन(layout) शुरू कर दें।
     एकाशीतिविभागे दश-दश पूर्वोत्तरायता रेखाः।
     अन्तस्त्रयोदश सुरा द्वात्रिंशद्वाह्यकोणस्थाः।। (वाराहसंहिता-५२/४२)
पुनश्च- अष्टाष्टकपदमथवा कृत्वा रेखाश्च कोणगास्तिर्यक्।
      ब्रह्मा चतुष्पदोऽस्मिन्नर्द्धपदा ब्रह्मकोणस्थाः।।
     अष्टौ च बहिष्कोणेष्वर्द्धपदास्तदुभयस्थिताः सार्धाः।
     उक्तेभ्यो ये शेषास्ते द्विपदा विंशतिस्ते च।। (वाराहसंहिता-५२/५५,५६)
    ध्यातव्य है कि चौंसठ एवं एकाशी पदों में वास्तुखंडों की संख्या में अन्तर है- ६४और८१ का,फलतः विभाजित पदों(प्रत्येक को प्राप्त) का अन्तर हो जाना स्वाभाविक है;किन्तु दोनों ही प्रकार के मंडलों में स्थापित देवताओं की संख्या पैंतालिस(४५) ही है,जिनमें बत्तीश(३२)बाहरी क्षेत्र (किनारों पर),एवं शेष तेरह(१३) मध्य में हैं।खंड-भिन्नता के कारण पद-प्राप्ति में अन्तर है।जैसे-चौंसठ पद वास्तुमंडल में ब्रह्मा को चार पद ही मिले हैं,जब कि एकाशीपद वास्तुमंडल में ब्रह्मा को नौ पद मिले हैं।इसी भांति किसी को डेढ़,किसी को आधा आदि रुप से पद-विन्यास-भेद है।अतः इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए।प्राप्त पदों को स्पष्ट रुप से आगे के चित्रों से समझने का प्रयास करना चाहिए।
    प्रसंगवश यहां सभी (पैंतालिस) पदों के क्रमशः नाम दिये जा रहे हैं।ये नामकरण उन देवताओं के स्थान को इंगित करते हैं।साथ ही यह भी जान लेना जरुरी है कि वास्तुमंडल से बाहर मुख्य आठ दिशाओं(आकाश,पाताल को छोड़कर) में सहायिका शक्तियां भी अपना स्थान ग्रहण किये हुये हैं।ये हैं- पूर्व में स्कन्ध,अग्नि में विदारिका,दक्षिण में अर्यमा,नैऋत्य में पूतना, पश्चिम में जम्बुक, वायव्य में पापराक्षसी,उत्तर में पिलिपिच्छ एवं ईशान में चरकी।
    अब पैंतालिस देवों के नाम-(ईशान से प्रादक्षिण(clockwise) क्रम में)-


१.     शिखी
२.   पर्जन्य
३.   जयन्त
४.   इन्द्र
५.  सूर्य
६.    सत्य
७.  भृश
८.   अंतरिक्ष
९.    अनिल(वायु)
१०.                  पूषा
११.वितथ
१२.                 बृहत्क्षत्
१३.                 यम
१४.                 गन्धर्व
१५.                भृंगराज
१६.                  मृग
१७.                पितृ
१८.                 दौवारिक
१९.                  सुग्रीव
२०.                पुष्पदन्त
२१.                 वरुण
२२.                असुर
२३.                शोष
२४.               पापयक्ष्मा
२५.               रोग
२६.                नाग(अहि)
२७.               मुख्य
२८.                भल्लाट
२९.                सोम
३०.                भुजग
३१.                 अदिति
३२.                दिति
३३.                आप
३४.               सविता
३५.               जय
३६.                रुद्र
३७.               अर्यमा
३८.                सविता
३९.                विवस्वान
४०.                इन्द्र
४१.                 मित्र
४२.               राजयक्ष्मा
४३.               पृथ्वीधर
४४.               आपवत्स
४५.              ब्रह्मा




   ऊपर के देव-शक्ति नामावली को देख कर किंचित संशय हो सकता है कि एक ही देवता के पर्यायवाची नाम अन्य पद में भी दिये गये हैं।जैसे--इन्द्र-मित्र, सूर्य-अर्यमा-विवस्वान आदि,किन्तु ध्यातव्य है कि संस्कृत में पाये जाने वाले तथाकथित (मान्य) पर्यायवाची शब्द मूलतः पर्यायवाची नहीं हैं- अलग-अलग कृत्य और चरित्र के हिसाब से स्थान भेद से, नाम भेद भी है।अल्पज्ञता में हम उन्हें पर्यायवाची समझ लेते हैं। उदाहरणार्थ- इन्दीवर और अम्बुज दोनों नाम कमल के ही हैं,किन्तु गहरे अर्थ में पर्याप्त भेद है।इन्दीवर का अर्थ होता है- स्वेत कमल और अम्बुज का अर्थ होता है लाल कमल।इसे स्पष्ट करता है- महाकवि कालिदास के श्रृंगारतिलक का यह श्लोक-
 इन्दीवरेण नयना,मुखम्मबुजेन,कुन्देन दन्तमधरं नव पल्लवेन्,
अंगानि चम्पक दलैः सविधाय वेधा,कान्ते कथित वानुपलेन चेतः।– में नायिका के सुन्दर नेत्रों की तुलना सफेद कमल से और मुखमंडल की तुलना लाल कमल से की गयी है......।अस्तु।



पूर्व अध्यायों में अलग-अलग प्रसंगों में,इस सम्बन्ध में काफी कुछ कहा जा चुका है।कुछ शेष हैं उन पर यहां प्रकाश डाला जा रहा है।कुछ चित्रों को क्रमवार व्यक्त करने के उद्देश्य से पुनरावृत भी करना पड़ा है।सर्वप्रथम दोनों प्रकार के(चौंसठ और इक्यासी खंड)वाले मंडल का सादा खाका प्रस्तुत कर रहे हैं- इन दो चित्रों के माध्यम से-



क्रमशः.....  अगले पोस्ट में (इस अध्याय में अभी बहुत कुछ शेष है)