Sunday, 20 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-4

                     अध्याय ३.कतिपय अध्ययन केन्द्र 
   
 वास्तुशास्त्र की शिक्षा पारम्परिक रुप से संस्कृत के विद्वान पंडितों द्वारा गुरु-शिष्य-परम्परा के रुप में प्रचलित है।ज्योतिष,कर्मकाण्ड और पौरोहित्य कर्म से जुड़ें हुये ब्राह्मणों के लिए वास्तुविद्या का ज्ञान रखना भी अनिवार्य सा है। इसके बिना उनका पांडित्य अधूरा माना जायेगा।सामान्य तिथि-सूचक विप्र भी कुछ न कुछ वास्तुज्ञान रखते ही हैं।किन्तु इसके साथ-साथ पारम्परिक रुप से ज्योतिष-पाठ्यक्रम में वास्तुशास्त्र की शिक्षा को भी सदा से समाहित किया जाता रहा है।हमारे यहां जितने भी प्रमुख शिक्षाकेन्द्र हैं(खास कर जहां पारम्परिक संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था है)यथा- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय,कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति,श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ दिल्ली,राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्,एम.एस.विश्वविद्यालय बड़ौदरा, लखनऊ विश्वविद्यालय आदि में विधिवत वास्तुशास्त्र की शिक्षा एवं शोध कार्य हो रहे हैं। इसके अलावे दिल्ली,जयपुर,हरिद्वार आदि में कुछ अन्य संस्थायें भी वास्तुशास्त्र पर काम कर रहीं हैं।
    विगत कुछ वर्षों में यह शास्त्र पुनरुज्जीवित होकर उभरा है।आधुनिक भवन अभियन्ताओं(वास्तुकारों)ने भी इसके महत्व और उपादेयता को समझा है।
पिछले तेरह वर्षों से मैं भी गया एवं राँची के भवन अभियन्ताओं,एवं अपार्टमेंट निर्माताओं के सम्पर्क में हूँ।उनके बीच वास्तुविषयक व्याख्यान के अनेक अवसर मिले हैं।उनके प्रायः नक्शे विचार के लिए आते रहते हैं।उनकी प्रेरणा स्वरुप ही आज यह पुस्तक आपके सामने रखने का सौभाग्य हो रहा है।
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