Tuesday, 29 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-15

अध्याय१०.

वास्तु-भूमि-प्राप्ति-अनुष्ठान-प्रयास
     

     प्राणिमात्र अपने सुखमय आवास-व्यवस्था का आकांक्षी है। मनुष्य सृष्टि का अपेक्षाकृत श्रेष्टतम प्राणी है,फलतः उसकी आकांक्षा भी श्रेष्टतम होती है। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान तक, प्रायः मानव सुख-सुविधा सम्पन्न आवास के लिए चेष्टित रहता है।पहले की अपेक्षा आज के समय में वास-भूमि की प्राप्ति काफी कठिन हो गयी है,जिसके कई कारण हैं।भीषण मंहगाई और जनसंख्या का बढ़ता भार योग्य वास-भूमि को दुर्लभ सा बना दिया है।बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाख प्रयास के पश्चात् भी योग्य भूखंड की प्राप्ति नहीं हो पाती है। इसके लिए कुण्डली के ग्रह ही मुख्य रुप से जिम्मेवार होते हैं।अतः सर्वप्रथम उन्हें गृहादियोग का विचार- योग्य ज्योतिर्विद से कराना चाहिए,एवं प्रतिकूल ग्रहों का समुचित उपचार करना चाहिए।वास सम्बन्धी परेशानी का विचार और उपचार सिर्फ निज भवन-निर्माण के लिए ही नहीं,बल्कि किराये के मकान की तलाश और बारबार की विफलता की स्थिति में भी किया जाना चाहिए। दुनियाँ की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा किराये के मकान में ही जीवन गुजार देता है;और संतोषजनक किराये के मकान में भी स्थिरता पूर्वक वांछित समय तक टिक पाने में भी प्रायः दिक्कतें आती रहती हैं।अतः उन्हें भी इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।प्रसंगवश,वास्तु-प्राप्ति के ज्योतिषीय पक्ष पर थोड़ा विचार कर लें।
वास्तु-प्राप्ति के ज्योतिषीय पक्ष
प्रायः देखा जाता है कि समुचित धन रहते हुए भी निज भवन की व्यवस्था नहीं हो पाती;या भवन के नाम पर संचित धन किसी न किसी कारण से बरबाद हो जाता है,लोग धोखे के शिकार हो जाते हैं;या सुदीर्घ प्रयास के पश्चात् घर की व्यवस्था तो हो जाती है,पर उसका सुखभोग नहीं हो पाता। आँखिर क्यों?
    इसके लिए वास्तु-प्राप्ति के ज्योतिषीय पक्ष(ग्रह स्थिति)पर विचार अति आवश्यक है।कुण्डली में भवन-प्राप्ति और भवन-सुख दोनों होना चाहिए,अन्यथा पानी पर लकीरें खींचते रह जायेंगे।
    भूमि का कारक ग्रह होता है भूमिपुत्र- मंगल,और जन्म कुण्डली का चतुर्थभाव इसके विषय में संकेत देता है।साथ ही वास्तु-सुख पर विचार करने के लिए लग्न और लग्नेश का भी विचार करना जरुरी है,तथा दशमेश,नवमेश, लाभेश का सहयोग भी अपेक्षित है।
कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रह-स्थितियों पर एक नजर –
Ø चतुर्थेश उच्च,उच्चाभिलाषी,स्वक्षेत्री,मित्रक्षेत्री,केन्द्रस्थ,मूलत्रिकोणस्थ,शुभग्रह युत-दृष्ट हो तो वास्तु-प्राप्ति अवश्य होती है।
Ø भूसुत- मंगल की सुदृढ़ स्थिति के साथ-साथ लग्न,लग्नेश,दशमेश,नवमेश, लाभेश का सहयोग हो तो सुखमय वास्तु-प्राप्ति अवश्य होती है।
Ø लग्नेश चतुर्थस्थ और चतुर्थेश लग्नस्थ हो तो निज पराक्रम से भवन निर्माण होता है।
Ø जन्मांक चक्र के चतुर्थ भाव में दो शुभग्रह- चन्द्रमा और शुक्र हों,अथवा चतुर्थ भाव में कोई उच्चस्थ ग्रह हो,अथवा चतुर्थेश केन्द्र-त्रिकोण में हो तो सुन्दर सुसज्जित कलात्मक भवन का स्वामी होता है।
Ø चतुर्थेश और लग्नेश दोनों यदि चतुर्थस्थ हों तो अकस्मात् वास्तु-प्राप्ति योग बनता है।ऐसी स्थिति में बिना परिश्रम या अल्प प्रयास से ही बने-बनाये घर की प्राप्ति हो जाती है।
Ø चतुर्थ भाव चतुर्थेश और लग्नेश युत हो तो वास्तु प्राप्ति होती है।
Ø चतुर्थेश कर्मेश से युत होकर केन्द्र वा त्रिकोण में हो तो वास्तु प्राप्ति होती है।
Ø लग्नेश एवं सप्तमेश लग्नस्थ हों,तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø लग्नेश-चतुर्थेश लग्नस्थ हों तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø चतुर्थेश उच्च,स्वगृही,मूलत्रिकोणस्थ हो,साथ ही नवमेश केन्द्रस्थ हो तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø लग्नेश-सप्तमेश लग्नस्थ या चतुर्थस्थ हो, तथा चतुर्थ भाव पर शुभग्रह-प्रभाव हो तो अनायास वास्तु-प्राप्ति हो जाती है।
Ø सुखेश यदि दशमेश के साथ केन्द्र,त्रिकोण में हो तो उत्तम कोटि के भवन की प्राप्ति होती है।
Ø चतुर्थेश स्वगृही,स्वनवांश,उच्चस्थ हो तो भूमि,भवन,वाहन,माता आदि का प्रचुर सुख प्राप्त होता है।
Ø चतुर्थ भाव या चतुर्थेश दोनों यदि चर राशि में हों,चतुर्थेश शुभग्रह-युत-दृष्ट हो तो एक से अधिक भवन का योग बनता है।किन्तु इसमें एक दोष यह है कि स्थायित्व का अभाव हो जाता है- यहां-वहां वास परिवर्तन होते रहता है,भले ही अपना मकान ही हो।परन्तु यदि उक्त स्थिति स्थिर राशि में हो तो मकान तो कई होंगे,पर वास स्थिरता पूर्वक कहीं एक स्थान पर ही होगा।
Ø चतुर्थेश-दशमेश की युति शनि-मंगल के साथ हो तरह-तरह के मकानों का स्वामी होता है।
Ø  चतुर्थेश-दशमेश की युति चन्द्रमा और शनि से हो तो विचित्र भवन योग बनता है।यानी जातक के मकान में कुछ विशेषता(विचित्रता) होगी जो और से विलकुल भिन्न होगी।
वास्तु-प्रतिबन्धक योग कुण्डली में कुछ ऐसे दुर्योग भी होते हैं,जो बना-बनाया खेल बिगाड़ देते हैं।पहले से प्राप्त वास्तु-सुख भी अचानक बाधित हो जाता है,या लाख कोशिश के बावजूद वास्तु-प्राप्ति नहीं होती।
v चतुर्थेश संयोग से द्वादशस्थ हो,तथा पापग्रहों से युत वा दृष्ट हो तो ऐसी स्थित का सामना करना पड़ सकता है।
v चतुर्थेश का नवांशपति द्वादशस्थ हो, पापग्रहों से युत वा दृष्ट हो तो ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।   
v लग्नेश और चतुर्थेश छठे,आठवें,बारहवें स्थान में हो तो वास्तु-प्राप्ति में विशेष रुप से विघ्न पैदा करता है।
अतः ऐसी स्थिति में पीड़क ग्रहों की विशेष शान्ति अवश्य करानी चाहिए।
    कुण्डली के ग्रहों के विचार-उपचार के पश्चात् कुछ अन्य क्रियायें भी करने का निर्देश है शास्त्रों में,यथा-
    एक पौराणिक प्रसंगानुसार,पृथ्वी का उद्धार भगवान वराह ने किया था।अतः शास्त्रों में वाराहोपासना का निर्देश है।स्कन्धपुराण के वैष्णवखण्ड में प्रसंग है कि भूमि-प्राप्ति हेतु ऊँ नमः श्रीवराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा- मंत्र का जप, पूर्ण अनुष्ठानिक विधि से सम्पन्न करें।इसकी जप संख्या चार लाख बतलायी गयी है। उतना न सम्भव हो,तो भी कम से कम सवालाख जप तो अवश्य करें।जप के बाद मधु-घृत मिश्रित हविष्य से होम भी करना अति आवश्यक है।श्रद्धा-विश्वास पूर्वक किये गये अनुष्ठान का फल अति शीघ्र प्राप्त होता है- इसमें जरा भी संशय नहीं।एक बात का ध्यान रखा जाय कि महावराह शुद्ध-सात्त्विक देव हैं। अतः इनकी उपासना तमोगुणी आहार-विहार वाले व्यक्ति कदापि न करें।हां,वे योग्य सात्विक ब्राह्मण से अपने निमित्त अनुष्ठान करा लें।इस अनुष्ठान का फल संवत्सर के भीतर ही प्राप्त हो जाता है- इसमें दो राय नहीं।
    एक और अपेक्षाकृत सरल उपाय है- वास्तुप्राप्तियन्त्र का स्थापन-पूजन।शुभ मुहूर्त में योग्य ब्राह्मण से इस यन्त्र की स्थापना करा कर इच्छुक व्यक्ति सपत्निक नित्य पंचोपचार पूजन करें,एवं वास्तु देवता से श्रद्धावनत निवेदन करे। क्रिया प्रारम्भ करने के वर्ष भर के भीतर ही कार्य सिद्धि हो जाती है।यह कार्य स्वयं करना सम्भन न हो तो योग्य ब्राह्मण से (समुचित दक्षिणा देकर) कराया जा सकता है।
   यन्त्र की स्थापना का विधान सामान्य यन्त्रोपासना-विधि के अनुसार ही है। कोई विशेष झंझट नहीं है।वैसे बाजार में यह यन्त्र तांबे या पीतल का बना-बनाया भी मिलता है,जिसे खरीद कर मात्र स्थापन-विधान पूरा कर देना होता है। भोजपत्र पर अष्टगन्ध से यन्त्र लेखन कर स्थापना करना अधिक और आशु लाभकारी होता है।यहाँ नीचे इस यन्त्र का चित्र प्रस्तुत किया जा रहा है-

 

नोटः-  

 ऊपर के यन्त्र में तकनीकि कठिनाई के कारण सभी अंक अंग्रेजी में दिये गये हैं।इसके अतिरिक्त कहीं भी अंग्रेजी अंकों के प्रयोग का कारण यही है।पेन्ट में काम करने में अंग्रेजी अंकों का प्रयोग लाचारी वस मुझे करना पड़ रहा है।अतः पाठकों/दर्शकों से निवेदन है कि देवनागरी के अंकों का ही उपयोग किया करें।अंग्रेजी के अंकों का यान्त्रिक-प्रयोग आपके कार्य को कदापि सफल नहीं होने देगा।आधुनिक शिक्षापद्धति ने नयी पीढ़ी को इतना संकुचित कर दिया है कि वे मूल पथ से अनजान रह गये है।देवनागरी के अंकों का ज्ञान और पहचान भी लुप्त सा हो गया है।चूंकि मेरी ये कठिनाई सिर्फ पेंन्ट में है, एम.एस.ऑफिस में नहीं,अतः अनभिज्ञ पाठकों की सुविधा के लिए दोनों प्रकार के अंकों का नमूना यहां प्रस्तुत कर दे रहा हूँ।

1-१
2-२
3-३
4-४
5-५
6-६
7-७
8-८
9-९
10-१०
---------()()----


No comments:

Post a Comment