Sunday, 31 August 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-37

गतांश से आगे...
अध्याय १३.वास्तु मण्डल-(क)अन्तःवाह्य संरचना(कहां क्या?) 5

२.पूजाघर- आधुनिक समय में पूजा और पूजाघर एक फैशन की तरह हो गया है।पहले के समय में सभी वर्णों के मकान में मात्र कुलदेवता(कुलदेवी)का अनिवार्य रुप से स्थान होता था।समयानुसार उनकी पूजा होती थी।उनके मर्यादा का बड़ी गम्भीरता से पालन परिवार का हर सदस्य करता था।इसके अतिरिक्त पर्व-त्योहार,उत्सव आदि विशेष समय में,या कुछ लोग, नियमित रुप से भी ग्रामदेवी,क्षेत्रपाल(डिहवार),आदि की पूजा-अर्चना,आसपास के अन्य देवस्थलों में जाकर किया करते थे।सामान्य गृहस्थ के घर में वैसे भी विशेष मूर्ति की स्थापना शास्त्रसम्मत नहीं है।घर के अन्दर मन्दिर-निर्माण तो बिलकुल ही निषिद्ध है।द्विज वर्गों में साम्प्रदायिक भेद से शालग्राम,शिवलिंग,काली,गणेश, आदि की छोटी(अधिकतम आठ अंगुल)की मूर्ति रखने का विधान या चलन है, जिसकी विशिष्ट मर्यादा का निर्वहण किया जाता था,किया जाना भी चाहिए। किन्तु आज पूजा भी फैशन और प्रदर्शन बन गया है।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहंकारसंयुक्ता कामरागबलान्विताः।।(श्रीमद्भगवद्गीता १७/५)
     तदनुसार तरह-तरह के आडम्बरी की भरमार है।असंख्य नये देवी-देवता उत्पन्न हो गये।शास्त्र और नियम भी अपने-अपने अंदाज में गढ़े जा रहे हैं।पूजा शब्द का अर्थ और अभिप्राय भी विखण्डित हो गया है।अस्तु।
    यहां मेरा अभिप्राय सिर्फ यही है कि कोई आवश्यक नहीं है कि हर घर में पूजाघर बनाया ही जाय,और यदि बनाते हैं तो उसकी सम्यक् मर्यादा का ख्याल रखें।ध्यान,जप,भजन,कीर्तन घर के किसी भी मनोनुकूल स्थान में बैठकर किया जा सकता है(कुछखास अपवाद को छोड़कर)।
    दूसरी बात यह कि आये दिन अल्पज्ञ तथाकथित वास्तुकारों से उलझना पड़ जाता है। मेरे विचार से, कोई जरुरी नहीं कि पूजाघर ईशान में ही हो।
इसके लिए वास्तुमंडल में अन्य क्षेत्र भी हो सकते हैं।हाँ, ईशानपति शिव के आराधकों के लिए ईशान कोण आवश्यक है।सूर्य,विष्णु,गणेश,दुर्गा,काली आदि के लिए ईशान की अनिवार्यता नहीं है।मगब्राह्मणों में कुलदेवता का स्थान अग्नि कोण में विहित है(अग्निकोण में,पश्चिमी दीवार में,ताकि देवता पूर्वाभिमुख हों, पूजक पश्चिमाभिमुख हो)।वैसे भी शास्त्रों का स्पष्ट संकेत है- स्थायी-स्थापन पूर्वाभिमुख एवं अस्थायी स्थापन(आवाहन)पश्चिमाभिमुख होना चाहिए।कुछ स्थानों में आश्चर्यजनक चलन भी है- कुलदेवता का स्थान नैऋत्य कोण में, दक्षिणी दीवार या पश्चिमी दीवार में स्थापित हैं।राजस्थान के रजवाड़ों में भी कहीं-कहीं यह नियम देखा जाता है।इसका अपना एक अलग रहस्य है।तामसिक शक्तियों के उपासक अपना पूजास्थल नैऋत्य में ही रखें तो अच्छा है।सामान्य जन के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्था- नीचे के चित्र से स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है- 

     यहाँ वास्तुमंडल को नौ खंडों में विभाजित करके अनुकूल पूजा-क्षेत्र को दिखलाया गया है।पीले रंग वाले क्षेत्र को प्रथम श्रेणी में रखा गया है,और नीले रंग वाले क्षेत्र को द्वितीय श्रेणी में।गौरतलब है कि पीले रंग में केन्द्रीय भाग- ब्रह्मस्थान भी समाहित है।यहाँ पूजा स्थल रखने से इस महत्त्वपूर्ण स्थल की मर्यादा की विशेष रक्षा भी हो जायेगी।अस्तु।
पूजाघर से सम्बन्धित एक और बात का ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि अति सामान्य ढंग से इसे व्यस्थित करें।व्यर्थ के कैलैण्डरों, तस्वीरों और मूर्तियों की भीड़ न लगायें।खंडित,जीर्ण तस्वीरें और मूर्तियाँ घर में वास्तुदोष पैदा करती है।प्रायः,काली का मुण्डमात्र(शीर्षभाग)मूर्ति-चित्र लोग घरों में रखते हैं,इस सम्बन्ध में मूर्तिकार तो अनभिज्ञ है,वास्तुकार को समझना जरुरी है। छिन्नमस्ता की मूर्ति रखना और बात है,और काली का मुण्डमात्र बिलकुल अलग बात - इस रहस्य को समझने का प्रयास करें।
  पूजाघर अधिक बड़ा भी न रखें।आम तौर पर पूजाघर में ही पुराने पीतल, तांबे,फूल,कांसे आदि के वरतन,जो बहुत कम ही व्यवहृत होते हैं,पड़ें रहते हैं। उनकी साफ-सफाई भी नियमित नहीं होती है।ये सब अनजाने में वास्तु-दोष पैदा करते रहते हैं।अतः पूजा के खास सामान,और पात्र के अतिरिक्त व्यर्थ का जमावड़ा पूजाघर में न लगायें।
 पूजाघर में देवी-देवताओं की मूर्ति-चित्र आदि ऐसे व्यवस्थित करें ताकि आप पूर्वाभिमुख उनके सामने बैठ सकें।तख्त,चौकी आदि इस तरह से भी रख सकते हैं,कि आवश्यकतानुसार उत्तराभिमुख भी बैठा जा सके।सायं कालीन की नियमित पूजा उत्तर या पश्चिम मुख बैठकर ही करना चाहिए। हाँ,विशेष अवसर की पूजा रात्रि में भी पूर्वाभिमुख ही होनी चाहिए।
   
   पूजाकक्ष में आवश्यक सामग्री रखने के लिए पश्चिमी या दक्षिणी भाग का उपयोग किया जाना चाहिए।प्रज्वलित दीपक,हवन कुण्ड आदि अग्निकोण में हों तो उत्तम है।धूप-अगरबत्ती वायुकोण में रखें(ध्यातव्य है कि इसमें अग्नि के परोक्ष में वायुतत्व की प्रधानता है)।
आजकल दरवाजे पर चौखट गायब होते जा रहे हैं।इसका भवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।पूजाघर के दरवाजे पर चौखट अवश्य लगायें।किवाड़ दो पल्ले का हो तो अधिक अच्छा है।एक पल्ले की लाचारी हो तो इतना ध्यान रखें कि दक्षिणावर्त(Clockwise) खुले।
पूजाघर के ऊपर या बगल में  शौचालय ,एवं शौचालय के ऊपर या बगल में पूजाघर कदापि न बनायें।             

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क्रमशः...

Friday, 29 August 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-36

गतांश से आगे....
अध्याय १३.वास्तु मण्डल-(क)      अन्तःवाह्य संरचना(कहां क्या?)
पुनः किंचित अद्यतनः-
   आधुनिक भवन-योजना के अन्तर्गत वास्तु-मंडल के नौ खण्डों में कक्ष-विन्यास को नीचे के चक्र क्रमांक "घ" में प्रदर्शित किया जा रहा है।छोटे आकार के भूखण्डों के लिए यह योजना अधिक उपयोगी हो सकती है।
    वा.            उत्तर                 ई.
  बैठक
बालकक्ष
पूजा,जल
भोजनकक्ष
लॉबी/आँगन
स्नान
विविधभण्डार
शयनकक्ष
रसोई




                              

नै.                       दक्षिण                            अ.

कक्षों की आन्तरिक संरचनाःःविशेष विचारः-
अब आगे क्रमशः, कमरों की आन्तरिक संरचना पर कुछ विचार कर लें,किन्तु सबसे पहले सर्वाधिक विचारणीय है- सेफ्टीटैंक।
१.सेफ्टीटैंक-वास्तुशास्त्र प्राकृतिक नियमों पर आधारित एक सनातन शास्त्र है। अरण्य सभ्यता से नगरीय सभ्यता तक का विवेचन है इस शास्त्र में;किन्तु घोर परिवर्तित आधुनिक समय में समुचित भूखण्डों के अभाव,और रहन-सहन के तौर-तरीके में विशेष परिवर्तन के कारण पुराने वास्तु नियमों का सम्यक् पालन बहुत कठिन पड़ रहा है।सेफ्टीटैंक के लिए तो मुख्य वास्तु मंडल के वाह्य परिसर(बाउण्ड्री) में ही(मुख्य मंडल से कम से कम सात फीट हट कर) उपयुक्त स्थान का चयन होना चाहिए,किन्तु छोटे आकार के भूखण्ड में सबसे बड़ी समस्या होती है,जहाँ परिसर का सवाल ही नहीं है।किसी तरह जोड़-तोड़ कर, गुजारा करने के लिए चार दीवारें और छत बना लेना है। फिर भी इसके निर्णय में जरा भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए।
मैंने अपने अनुभव में पाया है कि ९०%छोटे मकान इस समस्या से ग्रस्त होते हैं,और बने-बनाये मकान में इसका स्थायी निदान ढूढ़ना भी लगभग असम्भव सा होता है। सामान्य तौर पर किए जाने वाले वास्तुदोष निवारण के कठोर तान्त्रिक उपचार भी दीर्घकालीन सफलता नहीं दे पाते।दोष का अंकन भी एक समान तो होता नहीं, न्यूनतम नौ खण्ड करके विचार करें,तो भी नौ तरह के दोष हो सकते हैं, जिनका दुष्प्रभाव क्षेत्रानुसार होता है।अतः निर्माण के समय ही बारीकी से सोच-विचार कर सेफ्टीटैंक का निर्धारण करना चाहिए। इसके लिए सारणी-ग का सहयोग लेना उचित होगा।प्रसंगवश यहाँ एक बात और भी स्पष्ट कर दूँ कि मूल समस्या सेफ्टीटैंक की ही है,शौचालय(पैन) को तो थोड़ी देर के लिए बच्चों का पॉटी मान ले सकते हैं,जैसे कि सुविधानुसार कहीं भी रखकर बच्चों को शौच के लिए बैठा दिया जाता है।किन्तु इसका यह अर्थ भी न लगाया जाय कि रसोई घर,या पूजाघर से सटे दीवार में शौचालय रख दिया जाय।आधुनिक समय में प्रत्येक कमरे में संलग्न शौचालय का चलन है।यह बहुत बुरा नहीं तो कोई खास अच्छा भी नहीं है।शौचालय की साफ-सफाई,दरवाजे का बार-बार खुलना आदि क्रियायें संलग्न शयनकक्ष के अन्तः वास्तु को एक बार झकझोरता तो जरुर है।अतः ऐसे संलग्न शौचालय के रख-रखाव पर विशेष ध्यान रखना जरुरी है।सुरक्षा के तौर पर एक काम अवश्य किया जाय कि ऐसे संलग्न शौचालय के दरवाजे पर (कमरे की ओर से) कत्थई(मेरुन)(लाल और काला का मिश्रित रंग)का थोड़ा मोटा पर्दा लगाया जाय,और हो सके तो सप्ताह में दो बार उसे धोया जाय।
ऊपर की सारणी "ग",और तत्पूर्व के विवरण में कुछ स्थानों को वरीयता क्रम से सेफ्टीटैंक के लिए निर्धारित किया गया है।प्रयास यह हो कि प्रथम क्रम को ही ग्रहण किया जाय।यहां एक चित्र के माध्यम से इसे स्पष्ट और सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया जा रहा है- 



गौरतलब है कि ऊपर के चित्र में पूरे वास्तुमंडल को पांच गुने पांच के वर्ग में ही विभाजित किया गया है,जिनमें हरे रंग के चार क्षेत्र निरापद कहे गये हैं। पीले रंग के चार क्षेत्र अपेक्षाकृत अल्प निरापद हैं,और शेष लाल रंग के खंड सर्वथा वर्जित क्षेत्र हैं।ये तीन सिगनल के समान हैं।
दूसरे चित्र में शौचालय की आन्तरिक सज्जा दर्शायी गयी है।ध्यायव्य है कि शौच के लिए बैठते समय मुंह उत्तर-दक्षिण होना चाहिए।बाहरी व्यवस्था में यह नियम रात्रि और दिन के लिए विहित था,किन्तु कक्षीय शौचालय में जहाँ स्थायी वेसिन(कवोर्ड)का उपयोग करना है- रात और दिन के लिए दो अलग-अलग नहीं बनाये जा सकते,अतः एक ही से काम चलाना है।फिर भी इतना ध्यान रखना जरुरी है कि बैठने की मुद्रा पूरब-पश्चिम न हो।चित्र में हरे रंग को उत्तम और पीले रंग को अधम के रुप मे दर्शाया गया है। ठीक बीच में भी वेसिन रखना उचित नहीं है,चाहे उसकी कोई भी दिशा हो।अन्ततः शौचालय कक्ष के केन्द्रीय भाग को भी बचाना है।पाश्चात्य सभ्यता के हिमायती होकर कुर्सीनुमा कबोर्ड का चलन हो गया है।सच पूछा जाय तो योगशास्त्र,शरीरशास्त्र आदि के अनुसार यह मुद्गा शौच के लिए कदापि उचित नहीं है।चुकमुक बैठकर ही मलत्याग होना चाहिए।(रोगी,लाचार के लिए अलग बात है)।
प्रायः लोग सुविधा की दृष्टि से सीढ़ी,प्रवेश-द्वार और सेफ्टीटैंक तीनों के लिए एक ही स्थान का चुनाव कर लेते हैं।सीढ़ी के आधे भाग में प्रवेश-द्वार निकाल लेते हैं,सीढ़ी के दूसरे भाग में या पूरे भाग में सेफ्टीटैंक वना लेते हैं,और मोटर सायकिल आदि खड़ा करने का जगह भी निकल आता है।या शौचालय बना लेते हैं।ये सभी बातें अति हानिकारक हैं।सीढ़ी के नीचे बना सेफ्टीटैंक या शौचालच न सिर्फ निचली मंजिल को प्रभावित करता है,बल्कि ऊपरी मंजिल को पूरी तरह से वास्तुदोष पीड़ित कर देता है।टैंक पर चढ़कर भवन में प्रवेश के कारण निचला भाग भी पीड़ित होता है।इसके दोष की मात्रा और घनत्व दिशा और स्थिति पर निर्भर करती है,जिसे दिशा,ग्रह और तत्व के विवेचन वाले प्रसंग से और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
अतः सीढ़ी के नीचे सेफ्टीटैंक और शौचालय तो भूल कर भी न बनायें।सिर्फ प्रवेश द्वार रखा जा सकता है- यदि अन्य बातें अनुकूल हुयी।इसे प्रवेशद्वार मुख्य विवेचन के प्रसंग में और स्पष्ट किया जायेगा।
शौचालय के खिड़की-दरवाजे दक्षिण दिशा में न खुले तो अच्छा है।शौचालय में संगमरमर का उपयोग न किया जाय।फर्श का ढलान ईशान,पूरब,या उत्तर की ओर हो तो अच्छा है।जल व्यवस्था भी इसी दिशा में होना चाहिए।
शौच के  समय सिर अनिवार्य रुप से ढका होना चाहिए।वैसे कठोर नियम है कि ब्राह्मण का सिर सिर्फ शौच के समय ही ढका जाय,शेष समय नहीं।पूजा-कर्मकाण्ड आदि में सिर ढकना ब्राह्मणेत्तर वर्णों के लिए प्रसस्त है।
    शौच हेतु शास्त्र वचन है-
उदङ् मुखोदिवामूत्रं विपरीतमुखो निशि।(वि.पु.३/११/१३)
दिवा सन्ध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ् मुखः।
कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ च दक्षिणामुखः।।(याज्ञवलक्यस्मृति १-१६)
उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदङ् मुखः।
रात्रौ कुर्याद्दक्षिणास्य एवं ह्यायुर्न हीयते।।(वसिष्ठस्मृति ६-१०)
यह शरीरविज्ञान-सम्मत भी है कि प्रातः पूर्व मुँख एवं रात्रि में पश्चिममुख मल-मूत्रादि त्याग करने से सिर सम्बन्धि व्याधियाँ सताती हैं।
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क्रमशः...

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-35

गतांश से आगे....
अध्याय १३.वास्तु मण्डल-(क)      अन्तःवाह्य संरचना(कहां क्या?)
इस प्रकार वास्तुमंडल को प्राकृतिक गुणधर्मो के आधार पर व्यवस्थित करने का तरीका बतलाया गया। आगे उक्त सारी बातों को ध्यान में रखते हुए, कुछ नयी योजना पर आधारित एक सारणी प्रस्तुत हैः-


क-पूजा,
ख- रसोई,
ग-भंडार,
घ-जल,
च-शौच,
छ-स्नान,
ज-शयन,
झ-सीढ़ी
ट-शौच,स्नान,
ठ-सेफ्टीटैंक,
ड-अतिथि कक्ष,
ढ-नौकर,
प-भोजन,
फ-कवाड़,
ब-छत पर पानीटंकी,
भ-वरामदा,वालकनी,
म-तहखाना,
य-गैरेज


                        भवन में कक्ष योजना-
वायु                    उत्तर                 ईशान
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....
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   १

  २

  ३
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   ८

ब्रह्मस्थान
  ४
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... ,.
  ७
  ६
  ५
...
,.
....
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...
   .
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नैऋत्य           दक्षिण                  अग्नि           






















नोट—१.पानीटंकी के सम्बन्ध में प्रायः भ्रम होता है।इसे लोग जल-स्रोत मान कर ईशान कोण में रख देते हैं।वस्तुतः यह जल-भंडारण है।अतः भंडार यानी वायु कोण में होना चाहिए।किन्तु सीधे वायुकोण पर नहीं,बल्कि दूसरे खंड में।यानी चन्द्रमा के दाहिने और शनि के बांयें कंधे पर बोझ दिया जाय। इससे चन्द्रमा और वरूण दोनों का बल मिलेगा।
    २. पश्चिम (मध्य) में रसोई हो सकता है,किन्तु उत्तर मुख होकर पाक कार्य करें।
    ३. ऊपर के चक्र में मुख्य द्वार की चर्चा नहीं है।इसके लिए आगे दिये गये मुख्यद्वार विचार चक्र का प्रयोग करना चाहिए।
    ४. चक्र "ग" में ब्रह्मस्थान के चारो ओर १ से ८ तक क्रमांक देकर छोड़ा हुआ है।इन स्थानों का उपयोग सुविधानुसार कक्ष,वरामदा,लॉबी आदि के रुप में किया जा सकता है,किन्तु निर्माण करते समय पूर्व खंडों में दिये गये वास्तु-देव अंग-विन्यास और मर्म-विन्यास की अवज्ञा नहीं होनी चाहिए।

पुनश्च ध्यातव्यः- पूर्व चक्र "क" और "ख" में किंचित भिन्नता है,जो मतान्तर भिन्नता मात्र है।सुविधानुसार किसी भी चक्र का अनुसरण किया जा सकता है। दोनों ही शास्त्र-सम्मत हैं।तीसरा चक्र "ग" विभिन्न विद्वानों के मतानुसार किंचित आधुनिक रुपरेखा में प्रस्तुत किया गया है।आधुनिक लोगों के लिए चक्र "ग" एवं उसके पूर्व का विस्तृत विवरणात्मक गृहयोजना अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

क्रमशः...