Wednesday, 25 November 2015

एक सूचना

प्रिय पाठकों,और ब्लॉग के अवलोकियों,
आप सबके अतिशय स्नेह ने ही मुझे उत्साहित किया,यहां तक पहुँचने के लिए।इसके लिए आपलोगों का हृदय से आभारी हूँ।
गत पोस्ट के साथ ही पुण्यार्कवास्तुमंजूषा का सिलसिला समाप्त हुआ।आगे कुछ दिनों के लिए इस ब्लॉग पर नये पोस्ट आपको नहीं मिल सकेंंगे।
मेरी अगली योजना है- अपना पूर्व प्रकाशित आंचलिक उपन्यास अधूरीपतिया को यहां क्रमवार पोस्ट करने का। उपन्यास प्रेमियों को इसके लिए सप्ताह भर इन्तजार करना पडेंगा।
धन्यवाद।सुखी रहें,प्रसन्न रहे- इसी कामना के साथ-

आपका ही- कमलेश पुण्यार्क,
गया,बिहार,भारत(मो.8986286163)

Monday, 23 November 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-183

गतांश से आगे...
                    अध्याय ३१— उपसंहार

      सुदीर्घ काल के श्रम की सार्थकता आज सिद्ध होने की स्थिति में आयी है। अनेकानेक विघ्न-बाधाओं को लांघकर, मेरी यह वास्तुमंजूषा इस योग्य हो पायी कि आप, सुधी पाठकों के कर कमलों में अर्पित कर सकूँ। सतत प्रयास के पश्चात् भी निश्चित ही काफी त्रुटियां रह गयी होंगी, जिसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। पूर्व में भी घोषणा कर चुका हूँ- मैं कोई विद्वान नहीं हूँ। सिलसिलेवार किसी विषय की शिक्षा भी ग्रहण नहीं कर पाया हूँ। बस जो कुछ है,ईश्वर की महती कृपा और गुरुजनों तथा पूर्वजों का आशीर्वाद। मंजूषा आपके लिए किंचित भी उपयोगी सिद्ध हुयी तो मैं अपने श्रम को सार्थक समझूं।
    किसी प्रकार के सुझावादेश का स्वागत है ,निम्न पतों पर-
Mb.08986286163                                                                           निवेदक
                                                    कमलेश पुण्यार्क
उमाचतुर्थी,ज्येष्ठशुक्ल,सम्बत् २०७२,
तदनुसार- २२ मई,२०१५ई.सन्
  
                      000--इत्यलम्--000
                               


Saturday, 21 November 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-182

गतांश से आगे..
अध्याय तीस का छठा भाग


अब आगे मरुदेशीय जलस्रोत के लक्षण कहते हैं—
Ø मरुदेश में ऊंट की गर्दन की तरह ऊँची-नीची शिरायें होती हैं,यहाँ सामान्य से काफी अधिक गहराई में जल मिलता है।ऐसे स्थान में पीलु के वृक्ष से ईशानकोण में वल्मीक होतो, उससे साढ़ेचार पश्चिम,पांच पुरुष नीचे उत्तरवाहिनी शिरा होती है।वहाँ खुदाई करने पर पहिले पुरुष में मेढ़क,फिर कपिल वा हरित मिट्टी,थोड़े पत्थर मिले तो जल का संकेत जाने।
Ø उक्त स्थान में पीलु वृक्ष से पूरब,वल्मीक हो तो वृक्ष से साढ़े चार हाथ दक्षिण,सात पुरुष नीचे जलस्रोत जाने।यहां दक्षिण शिरा होती है।
Ø करीर वृक्ष से उत्तर वल्मीक होतो,उस स्थान से साढ़ेचार हाथ दक्षिण,दश पुरुष खोदने पर मधुर जल मिलेगा।
Ø रोहितक वृक्ष के पश्चिम में वल्मीक होतो,तीन हाथ दक्षिण, बारह पुरुष नीचे खारे जल वाली पश्चिमी शिरा  मिलेगी।
Ø अर्जुन(कहुआ)के पेड़ के पूरब में दीमक की बॉबी हो तो,उस वृक्ष से एक हाथ पश्चिम चौदह पुरुष खोदने पर जल मिलेगा।
Ø यदि धतूरा के पौधे के वाम भाग में वल्मीक हो तो उससे दो हाथ दक्षिण,पन्द्रह पुरुष नीचे जल मिलेगा,जिसका स्वाद खारा होगा।आधा पुरुष नीचे तांम्रवर्णी पत्थर,फिर लाल मिट्टी के पश्चात् दक्षिण शिरा वाला जलस्रोत मिलेगा।
Ø बेर और रोहिड़ा के वृक्ष एकसाथ उगे हुए दीख पड़ें तो,उनसे तीन हाथ पश्चिम,सोलह पुरुष नीचे,पहले दक्षिण शिरा,और फिर  उत्तरशिरा के वहन का संकेत है।यहाँ प्रचुर जल होता है।
Ø यदि करीर और बेर के वृक्ष साथ-साथ हों तो उससे तीन हाथ पश्चिम,अठारह पुरुष नीचे ईशानशिरा होती है।
Ø पीलु और बेर का वृक्ष एकत्र हो तो उससे तीन हाथ पूरब,बीस पुरुष नीचे खारा जल होता है,किन्तु कभी सूखता नहीं।
Ø कहुआ और करीर के वृक्ष जहाँ एकत्र हों,तो उनसे दो हाथ पश्चिम ,पच्चीस पुरुष नीचे जल होता है।
Ø वल्मीक के ऊपर कुश उगा हुआ हो,वैसे स्थान पर इक्कीस पुरुष नीचे जल होता है।
Ø जहाँ कदम्ब का पेड़ हो,और वल्मीक के ऊपर दूब उगा हुआ हो,ऐसे स्थान से दो हाथ दक्षिण,पच्चीस पुरुष नीचे जल होता है।
Ø अलग-अलग तीन वल्मीकों के ढूह के बीच भिन्न-भिन्न प्रकार के तीन वृक्ष उगे हों,साथ ही रोहिड़ा का वृक्ष भी यदि हो,तो ऐसे स्थान पर रोहिड़े से चार हाथ,सोलह अंगुल उत्तर,चालीस पुरुष नीचे कठोर शिला को हटाने पर जल अवश्य प्राप्त होगा।
Ø  जहाँ बहुगांठों वाला शमी का वृक्ष हो,और उसके उत्तर में दीमक की बॉमी भी हो,तो शमी से पांच हाथ पश्चिम,पचास पुरुष नीचे जल होता है।
Ø एक ही स्थान पर अनेक वल्मीक हों,तो मध्य स्थान पर पचपन पुरुष नीचे जल की शिरा का संकेत मिलता है।
Ø जहाँ पलाश और शमी के वृक्ष एकत्र हों,तो उससे पांच हाथ पश्चिम में साठ पुरुष नीचे जल होता है।कुछ नीचे जाने पर सर्प भी मिल सकता है,और फिर पीली मिट्टी मिलती है।
Ø जहाँ वल्मीक से घिरा हुआ श्वेत रोहिड़ावृक्ष हो,उससे एक हाथ पूरब,सत्तर पुरुष खोदने पर जल मिलता है।
Ø जहाँ कांटेदार वृक्षों के बीच श्वेतशमी का पौधा हो,तो उससे एक हाथ दक्षिण,पचहत्तर पुरुष नीचे जल होता है।


अब अनूपदेश में जलस्रोत-लक्षण कहते हैं—
Ø अनूप देशों में प्रायः तीन पुरुष नीचे जलस्तर होता है। कहीं-कहीं तो जलस्तर और भी ऊपर रहता है। जहाँ आसानी से अस्थायी कच्चे कुंए की खुदाई कर सिंचाई कार्य किये जाते हैं।
Ø जहाँ की स्निग्ध भूमि बालु और रेतदार हो,पैर रखने से ही शब्द हो,जहाँ के वृक्ष भी बहुत ही स्निग्ध हों,वहाँ जल की मात्रा भी और अधिक कहनी चाहिए।
Ø बहुत से वृक्षों में कोई एक वृक्ष विकृत हो,तो उससे चार पुरुष नीचे जल होगा।
Ø जहां भूमि पर विविध प्रकार के कीड़े दिखायी दें, वहां मात्र एक वा डेढ़ पुरुष नीचे जल होता है।
Ø जहां आसपास की भूमि गरम हो,पर एक स्थान शीतल हो,या इसके विपरीत- आसपास शीतल हो,और एक स्थान उष्ण हो,तो ऐसे स्थान पर तीन पुरुष नीचे जल होगा।
Ø इन्द्रधनुषी मछली,और वल्मीक प्रचुर मात्रा में हों तो मात्र चार हाथ नीचे जल होता है।
Ø अनूप वा जांगल देश में वल्मीकों की कतार हो,जिसमें एक ढूह सबसे ऊंचा हो तो,वहां मात्र चार हाथ नीचे जलशिरा होगी।
Ø वट,पीपल,गूलर या पाकड़ यदि एकत्र हों तो मात्र तीन हाथ नीचे जल होता है।ऐसे स्थानों में प्रायः उत्तर शिरा होती है।
    
    पुनः ,जल सम्बन्धी कुछ और महत्त्वपूर्ण बातों की चर्चा करते हुए आचार्य वराहमिहिर कहते हैं कि
v गृह,ग्राम,नगर के अग्निकोण में कुआँ(लक्षणार्थ-अन्यजलस्रोत) हो तो सदा अग्नि भय बना रहता है।
v नैर्ऋत्यकोण में कुआँ हो तो बालकों को हानि(क्षय)होता है।
v वायव्य कोण में कुआँ हो तो स्त्रियों को परेशानी होती है।
v उक्त तीन को छोड़कर,शेष पांच दिशाओं में कुआँ आदि जलस्रोत शुभ कहे गये हैं।
v वृक्ष,गुल्म,वल्ली जिस भूमि में स्निग्ध हों,पत्तियां छिद्रहीन हों (सुन्दर,विकार-रहित) ऐसे स्थान पर तीन पुरुष नीचे जल होता है।
v भूमिकमल,गोखरु,खस,कुश,काश,नलिकादि तृण,खजूर,जामुन,अर्जुन, वेत,या दूधदार वृक्ष(महुआ,वट,पीपल,गूलर,पाकड़),तथा नागकेशर, कदम्ब,नक्तमाल,सिंदुआर,बहेड़ा,मदयन्तिका आदि सुन्दर वृक्ष-पादप आदि हों ऐसे स्थान में तीन पुरुष नीचे जल होता है-ऐसा मनु महाराज ने संकेत किया है।
v जहाँ एक पर्वत के ऊपर दूसरी पर्वत-श्रृंखला हो,तो ऐसे पर्वत के मूल में तीन पुरुष नीचे जल प्राप्त हो सकता है।
v मूंज,काश,कुशादि युक्त कंकड़ीली,नीली मिट्टी जलस्रोत का संकेत देती है। ऐसे वानस्पतिक लक्षणों से युक्त काली वा लाल मिट्टी भी जलसंकेतक है।
v पत्थर के कणों से युक्त ताम्रवर्णी भूमि में कसैले जल का स्रोत होता है। उक्त लक्षण वाली कपिल भूमि हो तो खारा जल मिलता है। पांडुरंग भी लवण जल का संकेत है,परन्तु नीलवर्ण मधुर जलस्रोत का लक्षण बताता है।
v शाक,अश्वकर्ण,अर्जुन,बिल्व,सर्ज,श्रीपर्णी,अरिष्ठा,शीशम इत्यादि वृक्ष, तथा लाता-गुल्मादि भी छिद्रयुक्त पत्तियों वाले हों,तो ऐसे स्थान में जलस्तर काफी नीचे कहना चाहिए।
v यदि भूमि सूर्य,अग्नि,भस्म,ऊँट,गर्दभ आदि के रंगों वाली हो तो उसे जलहीन जानें।
v लालरंग की भूमि में लालरंग के अंकुरवाले करीर वृक्ष हों तो उन वृक्षों के आसपास जल की सम्भावना होती है।
v वैदूर्य मणि,मूंग,मेघ,पक्वउदुम्बर, आदि के वर्णों वाली शिला के नीचे बहुत अधिक जल  होता है।
v यदि शिला का रंग परावतपक्षी,सोमलता,शहत,घृत,अलसी आदि की तरह हो तो अक्षय जल का संकेत समझें।
v ताम्र,नील,रक्तवर्णी शिला को निर्जल की सूचना जानें।
v चन्द्रमा की प्रभातुल्य,स्फटिक,मोती,सुवर्ण,इन्द्रनीलमणि,सिंगरफ आदि के रंगों वाली शिला को शुभ समझना चाहिए।ऐसे शिलाओं को तोड़फोड़ कर नष्ट नहीं करना चाहिए। ऐसी शिलायें जिन भूभागों(राज्यों) में होती हैं,वहाँ धन-धान्य-सुख-समृद्धि होती है।इन शिलाओं को यक्षों और नागों से रक्षित जान कर, उनकी रक्षा करें।
v कूपादि खोदने के समय कठोर शिलाओं का अवरोध आजाने पर उनके भंजन हेतु ढाक और तेन्द की लकड़ी को जलाकर,शिला को गरम करे,फिर कलीचूने के घोल का छिड़काव करे- इस क्रिया से कठोर शिला भी आसानी से टूट जाती है।
v मरुवावृक्ष की भस्म मिला कर जल को औंटावे,पुनः उसमें शर का खार मिलाकर,पूर्व विधि से तपायी गयी शिला पर छिड़काव करने से टूट जाती है।
v छाछ,कांजी,मद्य,कुलथी,बेर के फल- इन सबको मिलाकर,सात रात्रि तक किसी पात्र में रख छोड़े।फिर पूर्व रीति से तपायी गई शिला पर इनका छिड़काव करने से शिला आसानी से टूट जाती है।
v नींम की पत्ती,नींम की छाल,तिल की खल्ली,अपामार्ग,तेन्दु के फल, और गिलोय- इन सबका भस्म बनाकर,गोमूत्र में घोलकर पूर्व रीति से तपायी गई शिला पर इनका छिड़काव करने से शिला आसानी से टूट जाती है।
v हुडुमेष की सींग को भस्म बनाकर,कबूतर और चूहे की बीट के साथ पीस कर,अकवन के दूध में मिलाकर शस्त्र पर लगादे।वह शस्त्र इतना मजबूत हो जाता है कि शिला का भी भेदन कर दे।
v कदली(केला)की पत्तियों का भस्म छाछ में मिलाकर,यदि शस्त्र को धार दिया जाय,तो लोहे और पत्थर को भी काट दे।

किंचित अन्य—
v     पूर्व-पश्चिम की लम्बाई वाले वापी में जल अधिक काल तक रहता है। इसके विपरीत उत्तर-दक्षिण का परिणाम जाने।
v     यदि उत्तर-दक्षिण की लम्बाई वाला पुष्करणी बनाना चाहे तो जल-ताड़न को रोकने के लिए किनारों को ईंट-पत्थर से पाट कर अधिक दृढ़ करना पड़ेगा।
v     पुष्करणी के किनारों पर अर्जुन,वट,पीपल,कदम्ब,जामुन,निचुल, बेत नीम,ताल,अशोक,महुआ,मौलश्री आदि वृक्ष लगाने चाहिए।
v     कूपादि के गन्दले जल को शोधित करने हेतु सुरमा,मोथा,खस, राजकोशातकी(बडी तोरई),आमला,निर्मली आदि का चूर्ण डालना चाहिए।इनके प्रयोग से जल का स्वाद भी ठीक हो जाता है।
v     हस्ता,मघा,अनुराधा,पुष्य,धनिष्ठा,तीनों उत्तरा,रोहिणी और शतभिषा नक्षत्रों में कूपारम्भ करना चाहिए। आरम्भ करने से पूर्व सामान्य रीति से गणपत्यादि पूजन के साथ वरुणादि पूजन ,और बलिकर्म भी करना चाहिए।
v     सबसे अन्त में आचार्य ने उदकार्गल शब्द को स्पष्ट किया है— हलायुधकोष के अनुसार नारं नीरं भुवनमुदकं जीवनीयं दकं च- उदक यानी जल,और अर्गल यानी अवरोध।इस प्रकार जल के अवरोध को ईंगित करने वाला वचन- उदकार्गल कहलाया।
     
    आचार्यश्री ने उदकार्गल के लक्षणों को मनु,सारस्वत आदि विभिन्न मनीषियों के अनुभव और ज्ञान से संग्रहित करके लोककल्याण हेतु प्रकाशित किया है। इनके द्वारा दिये गये निर्देश(संकेत) वस्तुतः वैसे ही हैं,जैसे किसी अनजान सड़क पर स्थान-सूचक मार्ग-दर्शिका,और दूरी का संकेतक-स्तम्भ होते हैं। किन्तु जैसा कि हम प्रायः पाते हैं- उन स्तम्भों पर कोई जाहिल, स्वार्थी अपना इस्तेहार चिपका देता है,या कोई असामाजिक तत्व रगड़ कर उस लिखावट को ही मिटा देता है। आधुनिकता के दौर में कंकरीट के जंगल खड़े करने को आतुर मानव भी कुछ ऐसा ही कर रहा है आज। प्रकृति के इन संकेताक्षरों(वृक्षों,पहाड़ों,लता, गुल्मों)को बरबरता पूर्वक नष्ट करता जा रहा है। ऐसी स्थिति में जब संकेताक्षर ही न होंगे तो दिशा-निर्देश भी कैसे होगा ? परिणामतः हम भटकने और दुःख पाने को विवश होंगे,और आने वाली पीढ़ी हमसे पूछ सकती है कि आखिर हमने उसके लिए छोड़ा क्या ? अस्तु।
   

                     -----)()(----

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा का अन्तिम किस्त- उपसंहार- अगले पोस्ट में।

Thursday, 19 November 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा- 181

 गतांश से आगे....
अध्याय तीस,भाग पांच

     उक्त उदकार्गल प्रयोग में,आचार्य वराहमिहिर ने जलपरीक्षण हेतु भूमि को तीन कोटि में बांट कर विचार किया है 1) अनूपक देश, 2) जांगल देश, और 3) मरुदेश। मरुदेश यानी जहाँ जल का नितान्त अभाव हो,जांगल देश यानी जहाँ जलस्तर,और जलकोटि सामान्य हो,तथा अनूपक देश यानी बहुत अधिक मात्रा में जल हो ,साथ ही जलस्तर भी भूपटल से बहुत समीप हो।
      उक्त तीन भूमि-प्रकारों में वाह्य लक्षण की समानता होने पर भी जल-स्तर की गहराई भिन्न-भिन्न होगी।स्वाभाविक है कि जांगल देश में जो जलस्तर होगा,मरुदेश में कदापि नहीं हो सकता।सामान्य तौर पर इसे १ : : के अनुपात में देखा-परखा जाना चाहिए।      
    वराहमिहिर की इस उदकार्गल विधि को ठीक से समझने के लिए,वनस्पतितन्त्र (यहां तन्त्र शब्द सिस्टम में अर्थ में प्रयुक्त है) का ज्ञान होना अति आवश्यक है।अपने अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करने के लिए आसपास के वृक्ष,पादप,गुल्म,लताओं के साथ-साथ तत्प्राप्त जीव-जन्तुओं को भी आधार बनाया हैं आचार्यश्री ने। वृक्षों में अर्जुन(कहुआ), बेल,श्योनाक(सोना- पाठा),बहेरा(विभीतक),बदरी(बेर),निर्गुण्डी(सिन्दुआर)शेफालिका, सप्तपर्णी (कोविदार),वेंत,पीलू,कुरैया,भिलावा,तेन्द,जम्बू(जामुन),करील आदि को प्रधानता दी गयी है। जन्तुओं में सर्प,गोह(सांडा),मछली,छिपकिली,मेढ़क, नेवला आदि के साथ-साथ वल्मीक(दीमक)की बॉबी को जलपरीक्षण हेतु विशेष महत्त्व दिया गया है। इनकी अवस्थिति से विविध संकेत मिलते हैं।
    जलस्तर के मापन हेतु पुरुष-प्रमाण को लिया गया है,जो १२० अंगुल मान्य है। सामान्य पुरुष द्वारा अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा देने पर जो माप बनता है,उसे ही आम प्रचलन में तत्कालीन पुरुष-प्रमाण कहा जाता था।
    आचार्यश्री ने वास्तुमंडल की मुख्य आठ दिशाओं की तरह भूगर्भ में भी इन्हीं आठ दिशाओं के आधार पर आठ जल-शिराओं की अवस्थिति माना है। साथ ही नौंवी (पातालीय मध्यशिरा)की अवधारणा भी समाहित है।इस मध्यशिरा को महाशिरा भी कहा जाता है। यह महाशिरा पृथ्वी के लगभग मध्य में सीधे पाताल से, बहुत ही बेग से उठकर, ऊपर की ओर आती है।
    जिस प्रकार मानव शरीर में विभिन्न रक्तवाहिकायें(छोटी-बड़ी) होती  हैं, तद् भांति भूमि में भी स्रोतस्विनी जलशिरायें प्रवाहित हैं।
     पूर्वादि चारो दिशाओं से प्रवाहित होने वाली जलशिरायें शुभ कही गयी हैं। पातालीय(मध्यशिरा)को भी शुभ कहा गया है। तथा ईशानादि चारो कोनों से प्रवाहित होने वाली जलशिराओं को अशुभ(अग्राह्य)माना गया है। इन नौ महाशिराओं के अतिरिक्त अनेक लघु(क्षुद्र)शिरायें भी हैं, जो विभिन्न दिशा-विदिशाओं में सर्प की भांति भूगर्भ में रेंगती रहती हैं। इन्हें आगे एक चित्र के माध्यम से स्पष्ट किया गया है-



     वर्षा का जल लगभग एक समान होता है,किन्तु भूमि की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है,जिसके कारण जल के स्वाद और रंग,तथा गुण में भेद हो जाता है।(भूमिशोधन अध्याय में भूमि के प्रकार में रंग,गन्ध,स्वाद आदि की चर्चा की गयी है।)
   

भूपटल पर विचरण करता हुआ जलपरीक्षक,भूगर्भीय जलशिराओं को कैसे पहचाने- इसके लिए आसपास के वृक्षों और अन्यान्य प्राकृतिक लक्षणों(चिह्नों)का सहारा लिया है। आगे  क्रमशः इनकी चर्चा की जा रही है—
Ø भूतल पर जहाँ कहीं जामुन का वृक्ष दीखे,तो उससे तीन हाथ उत्तर,दोपुरुष नीचे खुदाई करने पर पूर्वजलशिरा मिलती है।वहाँ की मिट्टी का रंग और गन्ध लोहे जैसा होता है।जामुन वृक्ष से पूरब में यदि सर्प की बॉबी दीख पड़े, तो उस वृक्ष से तीन हाथ दक्षिण,दोपुरुष नीचे मधुर जल का भण्डार होने की पूरी संभावना होती है। ऐसे स्थान पर आधा पुरुष खोदने पर एक विशेष की तरह की मछली मिलेगी(ध्यातव्य है कि कुछ मछलियां ऐसे स्थान पर भी रहती हैं)।
Ø निर्जल देश में जहाँ गूलर का वृक्ष हो,तो उससे तीन हाथ पश्चिम,ढाई पुरुष नीचे,जाने पर एक स्वेत सर्प मिल सकता है, उससे नीचे जाने पर अंजन सदृश्य काला पत्थर मिलेगा, जिसके नीचे शीतल जल का विशाल स्रोत मिलेगा।
Ø अर्जुन वृक्ष से तीन हाथ उत्तर यदि दीमक की बॉबी हो तो,उस वृक्ष से तीन हाथ पश्चिम खुदाई करने पर साढेतीन पुरुष नीचे जल मिलेगा।
Ø वल्मीक(दीमक)युक्त निर्गुण्डी(सिन्दुआर)वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण सवादो पुरुष नीचे मधुर और अक्षय जलस्रोत की संभावना होती है।थोड़ा खोदने पर यहां एक मछली भी मिलेगी,तथा मोटे कणों वाला वालू मिलेगा।कपिल या पांडुर रंग की मिट्टी हो सकती है- ये सब जल की सूचनायें हैं।
Ø बेर का पेड़ यदि दीमक से युक्त हो तो,उससे तीन हाथ पश्चिम तीन पुरुष नीचे जल अवश्य होता है।
Ø निर्जल देश में पलाश(ढाक)और बेरी का वृक्ष एकसाथ मिले तो उससे पश्चिम तीन हाथ जाकर,सवातीन पुरुष खुदाई करे।थोड़ा नीचे जाने पर एक निर्विष सर्प मिल सकता है,यह जल का निश्चित प्रमाण है।
Ø बेल और उदुम्बर(गूलर) का वृक्ष एक साथ हो तो,उससे तीन हाथ दक्षिण,तीन पुरुष नीचे जल अवश्य होता है।
Ø आकगूलर का वृक्ष वल्मीक से आक्रांत हो तो उसी के नीचे सवातीन पुरुष खोदने पर पश्चिमी जलशिरा मिलती है।यहाँ की मिट्टी पांडुरंग की होगी,और गोरस का दीखने वाला पत्थर भी यहाँ मिलेगा।
Ø निर्जल देश में कपिल वृक्ष के तीन हाथ पूरब,तीन पुरुष नीचे दक्षिण जलशिरा होती है।वहाँ नीलकमल जैसी मिट्टी होगी, फिर थोड़ा अन्दर जाने पर कबूतर की तरह रंग वाली मिट्टी होगी जिससे चकोर सा दुर्गन्ध निकलता होगा।ऐसे स्थान को खारे जल का स्रोत जाने.
Ø स्योनाक(सोनापाठा) वृक्ष से दो हाथ वायव्य कोण पर जाकर, तीन पुरुष नीचे खुदाई करने से सुन्दर जल शिरा मिलेगी।
Ø विभीतक(बहेरा)वृक्ष के समीप बमई(दीमक की बॉमी)हो तो उससे दो हाथ पूर्व,डेढ़ पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।और यही बमई यदि बहेरे से पश्चिम में हो तो,उस वृक्ष से एक हाथ उत्तर साढ़ेचार पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।प्रथम डेढ़पुरुष पर भी एक पश्चिमी शिरा मिलेगी,किन्तु उसका जल स्थायी नहीं होता,अतः खुदाई साढ़ेचार पुरुष ही करे।
Ø कोविदार(सप्तपर्णी)वृक्ष के ईशान कोण में वल्मीक से आक्रांत कुश हो तो,उन दोनों के मध्य स्थान में साढ़ेपांच पुरुष नीचे जल स्रोत होता है।
Ø निर्जल देश में बमई से युक्त कोविदार का वृक्ष होतो,उससे एक हाथ उत्तर पांच पुरुष नीचे जल रहता है।यहाँ आधापुरुष खोदने पर हरे रंग का मेढ़क(चिह्नस्वरुप)मिलेगा,साथ ही हरिताल के समान पीले रंग वाली मिट्टी भी मिलेगी।आगे खोदने पर वादल के रंग का पत्थर मिलेगा,जिसके नीचे जलस्रोत होगा।
Ø घने वृक्षों के बीच किसी भी वृक्ष के नीचे मेढ़क का वास होतो उस वृक्ष से एक हाथ उत्तर,साढ़ाचार पुरुष नीचे जल होता है।एक पुरुष नीचे नेवला का घर मिल सकता है,क्रमशः नीली पीली,सफेद मिट्टी भी मिलेगी,जो जलस्रोत का संकेत है।
Ø यदि करंजवृक्ष के दक्षिण में वल्मीक दिखाई पड़े तो,उस वृक्ष से दो हाथ दक्षिण साढ़ेतीन पुरुष नीचे शिरा होती है।आधे पुरुष नीचे जाने पर कछुआ मिलेगा,जो पूर्वशिरा का संकेत है,और जरा नीचे जाने पर उत्तर शिरा भी वहीं पर है।
Ø महुए के वृक्ष से उत्तर वल्मीक हो तो उस वृक्ष से पश्चिम पांच हाथ छोड़कर,साढ़ेआठ पुरुष नीचे जल होता है।पहले पुरुष तक की खुदाई में सफेद सर्प मिल सकता है।धूम्र रंग की मिट्टी,के बाद कुलथी के रंग की मिट्टी मिलेगी,उसके बाद पूरब शिरा होगी,जिसमें प्रचुर मात्रा में झागदार जल होगा।
Ø तिलक के वृक्ष से दक्षिण कुशा और दूर्वा का स्नेहिल(ताजा) वल्मीक स्थल दिखे तो उस वृक्ष से पांच हाथ पश्चिम,पांच पुरुष नीचे पूर्वशिरा का जलस्रोत होता है।
Ø कदम्ब वृक्ष के पश्चिम में बमई(दीमक का वास) हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण,पौने छःपुरुष नीचे उत्तरशिरा होती है,जहाँ जल तो बहुत होता है,किन्तु लोहे का गन्ध होता है उसमें, जिस कारण ग्रहण-योग्य नहीं कहा जा सकता।
Ø बमई से घिरा हुआ ताड़ अथवा नारियल का वृक्ष होतो,तो उस वृक्ष से छः हाथ पश्चिम चारपुरुष नीचे दक्षिण शिरा होती है।
Ø कपित्थ(कैथ- बेल के सदृश्य,खट्टे-मीठे स्वाद वाला एक फल) वृक्ष से दक्षिण वल्मीक होतो,उससे सात हाथ उत्तर,पांच पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।यहाँ काली मिट्टी,परतदार पत्थर,स्वेत मिट्टी क्रमशः मिलते है,जिसके नीचे उत्तरशिरा होती है।
Ø अश्मन्तक वृक्ष के बायीं ओर बेर का वृक्ष अथवा वल्मीक होतो उससे छःहाथ उत्तर,साढ़े तीन पुरुष नीचे जल कहना चाहिए। प्रथम पुरुष भर की खुदाई में कछुआ,फिर धूसर रंग की मिट्टी,पत्थर,रेत आदि मिलेंगे,जिसके नीचे सर्वग्राह्य दक्षिणी शिरा होगी। यहाँ थोड़ा और नीचे जाने पर ईशानकोणीयशिरा भी मिलेगी,जो अग्राह्य कही गयी है।
Ø हल्दुआ वृक्ष के बायीं ओर यदि वल्मीक हो,तो उससे तीन हाथ पूरब,पांच पुरुष से थोड़ा नीचे जाने पर जलस्रोत मिलेगा।यहाँ पर एक पुरुष नीचे सर्प का वास होता है,पीली मिट्टी,हरी मिट्टी,काली मिट्टी क्रमशः मिलने के बाद पश्चिमी शिरा,और साथ ही दक्षिणी शिरा का भी यहाँ संगम होता है,जो अति ग्राह्य है।
Ø निर्जल देश में,जहाँ बहुजल देश वाले चिह्न दीख पड़ें,तो वहाँ मात्र एक पुरुष नीचे ही जलस्रोत जाने।
Ø भारंगी,निसोत,दन्ती,सूकरपादी,लक्ष्मणा,मालती आदि लतायें जहाँ भी प्रफ्फुलित दीखें,वहाँ दो हाथ दक्षिण,तीन पुरुष नीचे जलस्रोत समझना चाहिए।
Ø जहाँ स्निग्ध लम्बी शाखाओं से युक्त छोटे-छोटे,किन्तु विस्तृत सघन वृक्ष हों तो वहाँ जलस्रोत का बाहुल्य जाने,किन्तु छिद्र युक्त,जर्जर पत्तियों वाले,रुखे वृक्ष जलहीनता के सूचक हैं।
Ø जहाँ तिलक,आमड़ा,अंकोल,कंकोल,वरण,भिलावा,बेल,तेन्द,पिंडार, सिरस,अंजन,फालसा,अशोक अतिबला आदि वृक्ष स्निग्ध वल्मीक से आक्षादित हों,तो इन वृक्षों से तीन हाथ उत्तर, साढ़े चार पुरुष नीचे प्रचुर जलस्रोत होता है।
Ø जिस भूमि में आसपास तृण न हो,और किसी खास जगह पर तृण दीख पड़े,या इसके विपरीत चारो ओर लहराती घास हो,और एक खास स्थान रिक्त हो तो,उस स्थान पर साढ़ेचार पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।ऐसे स्थान की एक और विशेषता होती है कि यहाँ गुप्त धन भी हो सकता है,किन्तु उसके ज्ञान के लिए अहिबलचक्र और धराचक्र का प्रयोग सार्थक होगा।
Ø जहाँ कांटेदार वृक्ष समूह के मध्य कोई एक वृक्ष बिना कांटे वाला दीखे,या इसके विपरीत बिना कांटेवाले वृक्ष समूह के बीच कोई एक वृक्ष कांटेदार दीख पड़े तो यहाँ तो उस विशेष वृक्ष से तीन हाथ पश्चिम,एक तिहाई युक्त तीन पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।तथा ऐसे विशिष्ट स्थान पर गुप्तधन का भी संकेत मिलता है।किन्तु यहाँ भी उसके ज्ञान के लिए अहिबलचक्र और धराचक्र का प्रयोग सार्थक होगा।
Ø जहाँ पैर से जोरदार ताड़न करने पर भूमि में गम्भीर शब्द जान पड़े,तो वहाँ साढ़ेतीन पुरुष नीचे,उत्तरशिरा जलस्रोत कहना चाहिए।
Ø यदि किसी वृक्ष की एक शाखा नीचे की ओर झुककर पीली पड़ गयी हो,तो उस शाखा के नीचे तीन पुरुष खोदने पर निश्चित ही जल मिलेगा।
Ø जिस वृक्ष के फल,फूल आदि प्रायः अकारण ही विकार ग्रस्त रहते हों,तो उस वृक्ष से तीन हाथ पूरब,चार पुरुष नीचे,पीले रंग की मिट्टी और पत्थर के तल में जल होना निश्चित जानें।
Ø जहाँ कटेरी का पौधा कांटों से रहित,और श्वेत पुष्पों वाला दीख पड़े,तो उसके नीचे, साढ़ेतीन पुरुष नीचे जल मिलता है।
Ø जिस निर्जल देश में खजूर का वृक्ष दो शिराओं वाला हो,तो उस वृक्ष से दो हाथ पश्चिम,तीन पुरुष नीचे जल रहता है।
Ø श्वेत पुष्प वाला कर्णिकार(कनैल), अथवा ढाक(पलाश)का वृक्ष जहाँ हो तो उससे दो हाथ दक्षिण तीन पुरुष नीचे जल होता है।
Ø जिस स्थान पर भाप-धुआं निकलता सा लगे,तो वहाँ दो पुरुष नीचे जल होता है।
Ø जिस भूमि पर उपज होकर बारबार नष्ट हो जाये,पीली पड़ जाय, वहाँ दो पुरुष नीचे भारी मात्रा में जलस्रोत जाने।

क्रमशः.....