Thursday, 19 November 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा- 181

 गतांश से आगे....
अध्याय तीस,भाग पांच

     उक्त उदकार्गल प्रयोग में,आचार्य वराहमिहिर ने जलपरीक्षण हेतु भूमि को तीन कोटि में बांट कर विचार किया है 1) अनूपक देश, 2) जांगल देश, और 3) मरुदेश। मरुदेश यानी जहाँ जल का नितान्त अभाव हो,जांगल देश यानी जहाँ जलस्तर,और जलकोटि सामान्य हो,तथा अनूपक देश यानी बहुत अधिक मात्रा में जल हो ,साथ ही जलस्तर भी भूपटल से बहुत समीप हो।
      उक्त तीन भूमि-प्रकारों में वाह्य लक्षण की समानता होने पर भी जल-स्तर की गहराई भिन्न-भिन्न होगी।स्वाभाविक है कि जांगल देश में जो जलस्तर होगा,मरुदेश में कदापि नहीं हो सकता।सामान्य तौर पर इसे १ : : के अनुपात में देखा-परखा जाना चाहिए।      
    वराहमिहिर की इस उदकार्गल विधि को ठीक से समझने के लिए,वनस्पतितन्त्र (यहां तन्त्र शब्द सिस्टम में अर्थ में प्रयुक्त है) का ज्ञान होना अति आवश्यक है।अपने अनुभव और ज्ञान को व्यक्त करने के लिए आसपास के वृक्ष,पादप,गुल्म,लताओं के साथ-साथ तत्प्राप्त जीव-जन्तुओं को भी आधार बनाया हैं आचार्यश्री ने। वृक्षों में अर्जुन(कहुआ), बेल,श्योनाक(सोना- पाठा),बहेरा(विभीतक),बदरी(बेर),निर्गुण्डी(सिन्दुआर)शेफालिका, सप्तपर्णी (कोविदार),वेंत,पीलू,कुरैया,भिलावा,तेन्द,जम्बू(जामुन),करील आदि को प्रधानता दी गयी है। जन्तुओं में सर्प,गोह(सांडा),मछली,छिपकिली,मेढ़क, नेवला आदि के साथ-साथ वल्मीक(दीमक)की बॉबी को जलपरीक्षण हेतु विशेष महत्त्व दिया गया है। इनकी अवस्थिति से विविध संकेत मिलते हैं।
    जलस्तर के मापन हेतु पुरुष-प्रमाण को लिया गया है,जो १२० अंगुल मान्य है। सामान्य पुरुष द्वारा अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा देने पर जो माप बनता है,उसे ही आम प्रचलन में तत्कालीन पुरुष-प्रमाण कहा जाता था।
    आचार्यश्री ने वास्तुमंडल की मुख्य आठ दिशाओं की तरह भूगर्भ में भी इन्हीं आठ दिशाओं के आधार पर आठ जल-शिराओं की अवस्थिति माना है। साथ ही नौंवी (पातालीय मध्यशिरा)की अवधारणा भी समाहित है।इस मध्यशिरा को महाशिरा भी कहा जाता है। यह महाशिरा पृथ्वी के लगभग मध्य में सीधे पाताल से, बहुत ही बेग से उठकर, ऊपर की ओर आती है।
    जिस प्रकार मानव शरीर में विभिन्न रक्तवाहिकायें(छोटी-बड़ी) होती  हैं, तद् भांति भूमि में भी स्रोतस्विनी जलशिरायें प्रवाहित हैं।
     पूर्वादि चारो दिशाओं से प्रवाहित होने वाली जलशिरायें शुभ कही गयी हैं। पातालीय(मध्यशिरा)को भी शुभ कहा गया है। तथा ईशानादि चारो कोनों से प्रवाहित होने वाली जलशिराओं को अशुभ(अग्राह्य)माना गया है। इन नौ महाशिराओं के अतिरिक्त अनेक लघु(क्षुद्र)शिरायें भी हैं, जो विभिन्न दिशा-विदिशाओं में सर्प की भांति भूगर्भ में रेंगती रहती हैं। इन्हें आगे एक चित्र के माध्यम से स्पष्ट किया गया है-



     वर्षा का जल लगभग एक समान होता है,किन्तु भूमि की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है,जिसके कारण जल के स्वाद और रंग,तथा गुण में भेद हो जाता है।(भूमिशोधन अध्याय में भूमि के प्रकार में रंग,गन्ध,स्वाद आदि की चर्चा की गयी है।)
   

भूपटल पर विचरण करता हुआ जलपरीक्षक,भूगर्भीय जलशिराओं को कैसे पहचाने- इसके लिए आसपास के वृक्षों और अन्यान्य प्राकृतिक लक्षणों(चिह्नों)का सहारा लिया है। आगे  क्रमशः इनकी चर्चा की जा रही है—
Ø भूतल पर जहाँ कहीं जामुन का वृक्ष दीखे,तो उससे तीन हाथ उत्तर,दोपुरुष नीचे खुदाई करने पर पूर्वजलशिरा मिलती है।वहाँ की मिट्टी का रंग और गन्ध लोहे जैसा होता है।जामुन वृक्ष से पूरब में यदि सर्प की बॉबी दीख पड़े, तो उस वृक्ष से तीन हाथ दक्षिण,दोपुरुष नीचे मधुर जल का भण्डार होने की पूरी संभावना होती है। ऐसे स्थान पर आधा पुरुष खोदने पर एक विशेष की तरह की मछली मिलेगी(ध्यातव्य है कि कुछ मछलियां ऐसे स्थान पर भी रहती हैं)।
Ø निर्जल देश में जहाँ गूलर का वृक्ष हो,तो उससे तीन हाथ पश्चिम,ढाई पुरुष नीचे,जाने पर एक स्वेत सर्प मिल सकता है, उससे नीचे जाने पर अंजन सदृश्य काला पत्थर मिलेगा, जिसके नीचे शीतल जल का विशाल स्रोत मिलेगा।
Ø अर्जुन वृक्ष से तीन हाथ उत्तर यदि दीमक की बॉबी हो तो,उस वृक्ष से तीन हाथ पश्चिम खुदाई करने पर साढेतीन पुरुष नीचे जल मिलेगा।
Ø वल्मीक(दीमक)युक्त निर्गुण्डी(सिन्दुआर)वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण सवादो पुरुष नीचे मधुर और अक्षय जलस्रोत की संभावना होती है।थोड़ा खोदने पर यहां एक मछली भी मिलेगी,तथा मोटे कणों वाला वालू मिलेगा।कपिल या पांडुर रंग की मिट्टी हो सकती है- ये सब जल की सूचनायें हैं।
Ø बेर का पेड़ यदि दीमक से युक्त हो तो,उससे तीन हाथ पश्चिम तीन पुरुष नीचे जल अवश्य होता है।
Ø निर्जल देश में पलाश(ढाक)और बेरी का वृक्ष एकसाथ मिले तो उससे पश्चिम तीन हाथ जाकर,सवातीन पुरुष खुदाई करे।थोड़ा नीचे जाने पर एक निर्विष सर्प मिल सकता है,यह जल का निश्चित प्रमाण है।
Ø बेल और उदुम्बर(गूलर) का वृक्ष एक साथ हो तो,उससे तीन हाथ दक्षिण,तीन पुरुष नीचे जल अवश्य होता है।
Ø आकगूलर का वृक्ष वल्मीक से आक्रांत हो तो उसी के नीचे सवातीन पुरुष खोदने पर पश्चिमी जलशिरा मिलती है।यहाँ की मिट्टी पांडुरंग की होगी,और गोरस का दीखने वाला पत्थर भी यहाँ मिलेगा।
Ø निर्जल देश में कपिल वृक्ष के तीन हाथ पूरब,तीन पुरुष नीचे दक्षिण जलशिरा होती है।वहाँ नीलकमल जैसी मिट्टी होगी, फिर थोड़ा अन्दर जाने पर कबूतर की तरह रंग वाली मिट्टी होगी जिससे चकोर सा दुर्गन्ध निकलता होगा।ऐसे स्थान को खारे जल का स्रोत जाने.
Ø स्योनाक(सोनापाठा) वृक्ष से दो हाथ वायव्य कोण पर जाकर, तीन पुरुष नीचे खुदाई करने से सुन्दर जल शिरा मिलेगी।
Ø विभीतक(बहेरा)वृक्ष के समीप बमई(दीमक की बॉमी)हो तो उससे दो हाथ पूर्व,डेढ़ पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।और यही बमई यदि बहेरे से पश्चिम में हो तो,उस वृक्ष से एक हाथ उत्तर साढ़ेचार पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।प्रथम डेढ़पुरुष पर भी एक पश्चिमी शिरा मिलेगी,किन्तु उसका जल स्थायी नहीं होता,अतः खुदाई साढ़ेचार पुरुष ही करे।
Ø कोविदार(सप्तपर्णी)वृक्ष के ईशान कोण में वल्मीक से आक्रांत कुश हो तो,उन दोनों के मध्य स्थान में साढ़ेपांच पुरुष नीचे जल स्रोत होता है।
Ø निर्जल देश में बमई से युक्त कोविदार का वृक्ष होतो,उससे एक हाथ उत्तर पांच पुरुष नीचे जल रहता है।यहाँ आधापुरुष खोदने पर हरे रंग का मेढ़क(चिह्नस्वरुप)मिलेगा,साथ ही हरिताल के समान पीले रंग वाली मिट्टी भी मिलेगी।आगे खोदने पर वादल के रंग का पत्थर मिलेगा,जिसके नीचे जलस्रोत होगा।
Ø घने वृक्षों के बीच किसी भी वृक्ष के नीचे मेढ़क का वास होतो उस वृक्ष से एक हाथ उत्तर,साढ़ाचार पुरुष नीचे जल होता है।एक पुरुष नीचे नेवला का घर मिल सकता है,क्रमशः नीली पीली,सफेद मिट्टी भी मिलेगी,जो जलस्रोत का संकेत है।
Ø यदि करंजवृक्ष के दक्षिण में वल्मीक दिखाई पड़े तो,उस वृक्ष से दो हाथ दक्षिण साढ़ेतीन पुरुष नीचे शिरा होती है।आधे पुरुष नीचे जाने पर कछुआ मिलेगा,जो पूर्वशिरा का संकेत है,और जरा नीचे जाने पर उत्तर शिरा भी वहीं पर है।
Ø महुए के वृक्ष से उत्तर वल्मीक हो तो उस वृक्ष से पश्चिम पांच हाथ छोड़कर,साढ़ेआठ पुरुष नीचे जल होता है।पहले पुरुष तक की खुदाई में सफेद सर्प मिल सकता है।धूम्र रंग की मिट्टी,के बाद कुलथी के रंग की मिट्टी मिलेगी,उसके बाद पूरब शिरा होगी,जिसमें प्रचुर मात्रा में झागदार जल होगा।
Ø तिलक के वृक्ष से दक्षिण कुशा और दूर्वा का स्नेहिल(ताजा) वल्मीक स्थल दिखे तो उस वृक्ष से पांच हाथ पश्चिम,पांच पुरुष नीचे पूर्वशिरा का जलस्रोत होता है।
Ø कदम्ब वृक्ष के पश्चिम में बमई(दीमक का वास) हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण,पौने छःपुरुष नीचे उत्तरशिरा होती है,जहाँ जल तो बहुत होता है,किन्तु लोहे का गन्ध होता है उसमें, जिस कारण ग्रहण-योग्य नहीं कहा जा सकता।
Ø बमई से घिरा हुआ ताड़ अथवा नारियल का वृक्ष होतो,तो उस वृक्ष से छः हाथ पश्चिम चारपुरुष नीचे दक्षिण शिरा होती है।
Ø कपित्थ(कैथ- बेल के सदृश्य,खट्टे-मीठे स्वाद वाला एक फल) वृक्ष से दक्षिण वल्मीक होतो,उससे सात हाथ उत्तर,पांच पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।यहाँ काली मिट्टी,परतदार पत्थर,स्वेत मिट्टी क्रमशः मिलते है,जिसके नीचे उत्तरशिरा होती है।
Ø अश्मन्तक वृक्ष के बायीं ओर बेर का वृक्ष अथवा वल्मीक होतो उससे छःहाथ उत्तर,साढ़े तीन पुरुष नीचे जल कहना चाहिए। प्रथम पुरुष भर की खुदाई में कछुआ,फिर धूसर रंग की मिट्टी,पत्थर,रेत आदि मिलेंगे,जिसके नीचे सर्वग्राह्य दक्षिणी शिरा होगी। यहाँ थोड़ा और नीचे जाने पर ईशानकोणीयशिरा भी मिलेगी,जो अग्राह्य कही गयी है।
Ø हल्दुआ वृक्ष के बायीं ओर यदि वल्मीक हो,तो उससे तीन हाथ पूरब,पांच पुरुष से थोड़ा नीचे जाने पर जलस्रोत मिलेगा।यहाँ पर एक पुरुष नीचे सर्प का वास होता है,पीली मिट्टी,हरी मिट्टी,काली मिट्टी क्रमशः मिलने के बाद पश्चिमी शिरा,और साथ ही दक्षिणी शिरा का भी यहाँ संगम होता है,जो अति ग्राह्य है।
Ø निर्जल देश में,जहाँ बहुजल देश वाले चिह्न दीख पड़ें,तो वहाँ मात्र एक पुरुष नीचे ही जलस्रोत जाने।
Ø भारंगी,निसोत,दन्ती,सूकरपादी,लक्ष्मणा,मालती आदि लतायें जहाँ भी प्रफ्फुलित दीखें,वहाँ दो हाथ दक्षिण,तीन पुरुष नीचे जलस्रोत समझना चाहिए।
Ø जहाँ स्निग्ध लम्बी शाखाओं से युक्त छोटे-छोटे,किन्तु विस्तृत सघन वृक्ष हों तो वहाँ जलस्रोत का बाहुल्य जाने,किन्तु छिद्र युक्त,जर्जर पत्तियों वाले,रुखे वृक्ष जलहीनता के सूचक हैं।
Ø जहाँ तिलक,आमड़ा,अंकोल,कंकोल,वरण,भिलावा,बेल,तेन्द,पिंडार, सिरस,अंजन,फालसा,अशोक अतिबला आदि वृक्ष स्निग्ध वल्मीक से आक्षादित हों,तो इन वृक्षों से तीन हाथ उत्तर, साढ़े चार पुरुष नीचे प्रचुर जलस्रोत होता है।
Ø जिस भूमि में आसपास तृण न हो,और किसी खास जगह पर तृण दीख पड़े,या इसके विपरीत चारो ओर लहराती घास हो,और एक खास स्थान रिक्त हो तो,उस स्थान पर साढ़ेचार पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।ऐसे स्थान की एक और विशेषता होती है कि यहाँ गुप्त धन भी हो सकता है,किन्तु उसके ज्ञान के लिए अहिबलचक्र और धराचक्र का प्रयोग सार्थक होगा।
Ø जहाँ कांटेदार वृक्ष समूह के मध्य कोई एक वृक्ष बिना कांटे वाला दीखे,या इसके विपरीत बिना कांटेवाले वृक्ष समूह के बीच कोई एक वृक्ष कांटेदार दीख पड़े तो यहाँ तो उस विशेष वृक्ष से तीन हाथ पश्चिम,एक तिहाई युक्त तीन पुरुष नीचे जलस्रोत होता है।तथा ऐसे विशिष्ट स्थान पर गुप्तधन का भी संकेत मिलता है।किन्तु यहाँ भी उसके ज्ञान के लिए अहिबलचक्र और धराचक्र का प्रयोग सार्थक होगा।
Ø जहाँ पैर से जोरदार ताड़न करने पर भूमि में गम्भीर शब्द जान पड़े,तो वहाँ साढ़ेतीन पुरुष नीचे,उत्तरशिरा जलस्रोत कहना चाहिए।
Ø यदि किसी वृक्ष की एक शाखा नीचे की ओर झुककर पीली पड़ गयी हो,तो उस शाखा के नीचे तीन पुरुष खोदने पर निश्चित ही जल मिलेगा।
Ø जिस वृक्ष के फल,फूल आदि प्रायः अकारण ही विकार ग्रस्त रहते हों,तो उस वृक्ष से तीन हाथ पूरब,चार पुरुष नीचे,पीले रंग की मिट्टी और पत्थर के तल में जल होना निश्चित जानें।
Ø जहाँ कटेरी का पौधा कांटों से रहित,और श्वेत पुष्पों वाला दीख पड़े,तो उसके नीचे, साढ़ेतीन पुरुष नीचे जल मिलता है।
Ø जिस निर्जल देश में खजूर का वृक्ष दो शिराओं वाला हो,तो उस वृक्ष से दो हाथ पश्चिम,तीन पुरुष नीचे जल रहता है।
Ø श्वेत पुष्प वाला कर्णिकार(कनैल), अथवा ढाक(पलाश)का वृक्ष जहाँ हो तो उससे दो हाथ दक्षिण तीन पुरुष नीचे जल होता है।
Ø जिस स्थान पर भाप-धुआं निकलता सा लगे,तो वहाँ दो पुरुष नीचे जल होता है।
Ø जिस भूमि पर उपज होकर बारबार नष्ट हो जाये,पीली पड़ जाय, वहाँ दो पुरुष नीचे भारी मात्रा में जलस्रोत जाने।

क्रमशः.....

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