Friday, 30 January 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-98

गतांश से आगे...
अध्याय अठारह-भाग तेरह

4.चिकित्सालय(अस्पताल,नर्सिंगहोम),दवा-दुकानः-चिकित्सा से सम्बन्धित भवनों के लिए सुन्दर,साफ-सुथरा,प्राकृतिक वातावरण वाला परिवेश होना चाहिए। सामान्य चिकित्सा(प्राथमिक या माध्यमिक स्तर)के लिए शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके भी ठीक हैं,जहाँ यथाशीघ्र चिकित्सा सुलभ हो,किन्तु बड़े स्तर के अस्पताल शहर की आवादी से थोड़ा हट कर ही होना चाहिए,क्यों कि वहाँ विभिन्न तरह के संक्रमण का अंदेशा रहता है।वाह्य प्रदूषण से मुक्त होने के साथ साथ,अस्पताल के निज प्रदूषण का भी ध्यान रखना जरुरी है,क्यों कि आन्तरिक प्रदूषण भी कुछ कम नहीं होता।बड़े अस्पतालों के लिए विस्तृत भूखण्ड की आवश्यकता होती है,जहाँ एक ही परिसर में चिकित्सा के अनेक विभाग, विभागिये कर्मचारियों और चिकित्सकों आदि के आवासन,रोगियों के रहने की समुचित व्यवस्था,अभिभावकों के लिए सुविधा,दवाई की उपलब्धि,विजली-पानी की सम्यक् व्यवस्था आदि बहुत सी बातों का ध्यान रखना होता है।बड़े अस्पतालों में सिर्फ समीप के ही नहीं,बल्कि दूर-दराज(देश के कोने-कोने) से लोग स्वास्थ्य कामना से आते हैं।आसपास में सामान्य बाजार की उपलब्धि भी आवश्यक है,यानी विलकुल वीरान में अस्पताल बनाना भी उचित नहीं कहा जा सकता।चिकित्सालय से सम्बन्धित यहाँ कुछ विशेष वास्तुसम्मत बातों की चर्चा कर रहे हैं-
*   चिकित्सालय जीवन-मृत्यु-संघर्ष-स्थल है।अतः व्यक्तिगत आवास से भी कहीं अधिक आवश्यक है कि इसका निर्माण वास्तुसम्मत हो। जहाँ तक सम्भव हो इसका सम्यक् पालन हो।
*   सर्वथा प्रदूषण रहित सुरम्य वातावरण का चुनाव करें।
*   भूखण्ड से पश्चिम-दक्षिण में ऊँचे पहाड़-पहाड़ियों का सिलसिला हो तो अति उत्तम।
*   उत्तर-पूर्व में प्राकृतिक जलस्रोत(नदी,झरना)या कृत्रिम जलस्रोत(तालाब, वावली,कुण्ड,वापी आदि)हों तो अच्छी बात है।
*   खुला मैदान,हरी-भरी झाड़ियाँ(विशाल दरख्त नहीं)उत्तर-पूर्व में होना अच्छी बात है।
*   परिसर चतुरस्र(वर्गाकार या आयताकार)होना चाहिए।अन्य दोषपूर्ण आकार हों तो मध्य में विभाजक दीवारों से सुधार लिया जाय।
*   दूषित,निषिद्ध और त्याज्य भूमि पर चिकित्सालय का निर्माण कदापि न करें।(द्रष्टव्य- भूमि-चयन अध्याय)
*   भवन आवश्यकतानुसार वहुमंजिले बनाये जा सकते हैं,किन्तु निर्माण में वास्तु के ऊँचाई-नियम की अवहेलना न की जाय- यानी दक्षिण-पश्चिम को उत्तर-पूर्व की अपेक्षा नीचा कदापि न रखा जाय।
*   अस्पताल में कई प्रकार के छोटे-बड़े सह-भवनों की आवश्यकता पड़ती है। इन्हें बनाने में दिशा-नियमों का पालन किया जाना चाहिए।
*   परिसर में पांचो तत्वों के सम्यक् संतुलन का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।यथा- बोरिंग ईशान कोण में ही किया जाय,विजली के ट्रान्सफर्मर अग्नि कोण में लगाये जायें,मध्य में खुला भाग अवश्य रखा जाय,इत्यादि।
*   सूर्य की रौशनी की पर्याप्त सुविधा हो।(द्रष्टव्य- शुभाशुभ ऊर्जा-प्रवाह)।स्वच्छ वायु का सम्यक् संचार हो(द्रष्टव्य- परिसर की साज-सज्जा)।
*   व्यावसायिक वास्तु खण्ड में निर्दिष्ट वास्तु नियमों का यथासम्भव पालन करते हुए कार्यालय,स्वागत-कक्ष,प्रशासनिक भवन,आदि को सुव्यवस्थित
करना उचित होगा।
*   अस्पतालों में नित्य भारी मात्रा में प्रदूषित पदार्थ निकलते रहते हैं।इन्हें यथाशीघ्र निष्पादित करना चाहिए।तात्कालिक संरक्षण के लिए अशुभ-ऊर्जा-प्रवाह-क्षेत्रों में स्थान नियत करना चाहिए,न कि सुविधानुसार कहीं भी रख छोड़ा जाय।(द्रष्टव्य- शुभाशुभ ऊर्जा-प्रवाह)।
*   छोटे अस्पतालों में रोगियों के लिए कक्ष(पेसेन्ट वार्ड) उत्तर दिशा में(ईशान और मध्य उत्तर के बीच)बनाये जांये तो उत्तम है।बड़े अस्पतालों में जहाँ सैकड़ों-हजारों रोगियों के आवासन की बात है,स्वतन्त्र रुप से रोगियों के लिए अलग बिल्डिंग बनाने की बात हो तो भी, परिसरीय दिशा के इसी नियम का पालन करना चाहिए- यानी परिसर के उत्तर में वार्ड बनायें।
*   प्रसूति कक्ष(Labour room)पूरब और ईशान के बीच में बनाना चाहिए।बड़े अस्पतालों में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था करनी हो तो इसी दिशा में परिसरीय ध्यान रख कर प्रसूतिभवन का निर्माण किया जाना उत्तम होगा।
*   स्त्रीरोग(Gynaecology )विभाग राहु के अधीन होने के कारण इसे नैऋत्य कोण में रखने का प्रावधान है,किन्तु वहाँ भी प्रसूति-कक्ष ईशान-पूर्व में ही रखना उचित होगा।
*   गर्भवती स्त्रियों की शैय्यायें स्त्रीरोगविभाग के दांयी ओर हों तो अच्छा है।
*   जांच के लिए लेटने पर स्त्री का सिर दक्षिण दिशा में हो तो अच्छा है। दूसरा विकल्प पूरब दिशा है।उत्तर और पश्चिम दोनों दिशायें वर्जित हैं। यह नियम अन्य रोगियों के लिए भी है।
*   सामान्य शल्यकक्ष(O.T.)पश्चिम से लेकर नैऋत्य होते हुए दक्षिण के मध्य भाग तक बनाया जा सकता है।वैसे मध्य पश्चिम सर्वोत्तम है।
*   हड्डीरोग(Orthopedic)विभाग सीधे शनि का क्षेत्र है,अतः इसे मध्य पश्चिम में होना चाहिए।
*   आँख,कान,गले(ENT)विभाग उत्तर दिशा में होना चाहिए।
*   सभी अंग्रेजी दवाइयाँ मुख्य रुप से रासायनिक पद्धति से बनी होती हैं। रसायन पर मंगल का अधिकार है।अतः इनके भंडारण का स्थान दक्षिण दिशा में होना चाहिए।
*   आयुर्वेदिक दवाइयाँ चन्द्रमा के अधिकार क्षेत्र में आती है,अतः इनका भंडारण वायुकोण में होना चाहिए।
*   घातक रसायन आग्नेय,ईशान,या वायव्य कोण पर रखे जा सकते हैं,किन्तु नैऋत्य में कदापि न रखें।वहाँ रखने से राहु-मंगल के संयोग से अंगारक योग बनकर,तोड़-फोड़ तथा आग्नेय दुर्घटनाओं की आशंका रहेगी।
*   पुराने(Expired)स्टॉक नैऋत्य में होना उचित है।
*   लेबोरेट्री में विशेषज्ञ(जांचकर्ता)को दक्षिणाभिमुख ही बैठना चाहिए।
*   भारी संयत्र,एक्सरे मशीनें आदि नैऋत्य क्षेत्र में रखे जायें।
*   डॉक्टरों को बैठने के लिए दक्षिण या पश्चिम दिशा भी अनुकूल ही है। पूर्वोत्तर की अनिवार्यता नहीं है।
*   किसी भी कार्य के लिए विहित ग्रह-क्षेत्र में कार्यव्यवस्था कठिन हो तो उनके मित्र-ग्रह-क्षेत्र में स्थान चयन किया जा सकता है।वशर्ते कि अति विपरीतधर्मी स्थिति न हो।जैसे रसायनिक दवाइयाँ मंगल की दिशा(दक्षिण) में न रख सकें तो उनके मित्र चन्द्रमा,सूर्य,वृहस्पति की दिशा में रख सकते हैं।शत्रु ग्रह की दिशा से सर्वथा बचना चाहिए।(द्रष्टव्य-ग्रह-राशि-मित्रामित्र प्रसंग)।
*   डॉक्टरों,या अन्य चिकित्सा सेवकों(नर्स,कम्पाउण्डर,ड्रेसर)आदि के लिए स्वच्छ-धवल वस्त्र की अनिवार्यता है।काले,गहरे नीले,धूम्रवर्णी,गहरे लाल वस्त्रों का धारण करना उचित नहीं।चन्द्रमा,वृहस्पति,बुध,सूर्य,शुक्र आदि के रंगों का चुनाव उचित है।(द्रष्टव्य- ग्रह-राशि-रंग योजना)।
*   अस्पताल के पर्दे हरे रंग(या हरे का सेंडिंग)के हों तो अच्छे हैं।
*   रोगियों की शैय्या प्रायः लोहे की ही वनी होती हैं।इन पर हल्का नीला रंग चढ़ाना उचित है।काले रंग कदापि न चढ़ायें।
*   शैय्या की चादरें,तकिया-गिलाफ आदि स्वेत,हरे,दूधिया आदि रंगों के होने चाहिए।
*   आरोग्य के अधिष्ठाता भगवान धन्वन्तरि,महर्षि पतंजलि,चरक,सुस्रुत आदि के चित्रों को अस्पताल की दीवारों पर लगाना,या परिसर में ईशान से पूर्व की(देवदिशा) में अनुकूल स्थान पर मूर्ति लगाना अति उत्तम है।
*   होमियोपैथी दवाइयाँ सीधे शुक्र का क्षेत्र है,क्यों कि उनका आधार ही विशुद्ध शराब है।इसके लिए शुक्र की दिशा(अग्नि कोण) सर्वाधिक अनुकूल कही जा सकती है।शुक्र के मित्र बुध,शनि,मंगल हैं।इनके स्थानों में भी होमियोपैथिक औषधालय बनाये जा सकते हैं।ईशान पति वृहस्पति से शुक्र को समता है,किन्तु गुरु को शत्रुता,अतः ईशान मुखी,ईशान-क्षेत्री होमियोपैथी कार्य उचित नहीं।पूर्व और वायव्य(सूर्य-चन्द्रमा)दिशा तो विलकुल त्याज्य है।होमियोपैथी चिकित्सक पूर्वाभिमुख न बैठे तो अच्छा है।
मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में शव-गृह,पोस्टमार्टम रुम आदि की आवश्यकता होती है।इसे मुख्य भवन से काफी हट कर(कम से कम २१फीट)रखना चाहिए।इसके लिए मध्य-दक्षिण से नैऋत्य होते हुए अर्द्धपश्चिम तक का क्षेत्र उचित है।भवन दक्षिणमुख ही होना चाहिए।अस्तु।

क्रमशः...

Tuesday, 27 January 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-97

गतांश से आगे...अध्याय अठारह भाग बारह


3.शिक्षण संस्थानः-शिक्षण संस्थान समाज और राष्ट्र का मेरुदण्ड होता है।भारतवर्ष की परम्परा रही है- गुरुकुल व्यवस्था,जहाँ उच्चातिउच्च शिक्षा और सम्यक् स्वास्थ्य- समदोषः समाग्निश्च,समधातु मलक्रियः, प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ्य इत्यभिधीयते।(सुश्रुतसंहिता १-२-४४) के अनुसार सर्वांगीण स्वास्थ्य की बात की जाती थी- वह भी सेवाभाव से।शिशा और स्वास्थ्य की जिम्मेवारी राजा की होती थी;किन्तु आज पूर्णरुपेण इनका व्यापारीकरण हो चुका है।उच्च और आधुनिक शिक्षा के नाम पर लूट मचा है,और समझदार कहे जाने वाले वर्ग ही सबसे अधिक लुटे जा रहे हैं।यहाँ मेरा अभीष्ट इसे व्यापारिक खाचें में रखकर वास्तुसम्मत विचार देने मात्र से है।
   शिक्षण-संस्थान के लिए बड़े भूखण्ड की आवश्यकता होती है,तदन्तर्गत कार्यालय,कक्षाएँ,सभागार,छात्रावास,नाट्यशाला,क्रीड़ास्थल,शिक्षक तथा शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के आवास,सामान्य औषधालय,भोजन-जलपानादि के लिए अलग-अलग छोटे-बड़े भवनों का निर्माण अपेक्षित होता है।इतना ही नहीं, शिक्षण-संस्थान का परिवेश भी अपने आप में काफी महत्त्व रखता है।भीड़-भाड़-प्रदूषणादि से मुक्त,प्राकृतिक मनोरम वातावरण ही विद्या की अधिष्ठात्री देवी

 सरस्वती को प्रिय है,जहाँ योग्य और अनुशासनमय शिक्षा दी जा सके। शान्तिनिकेतन,नेतरहाट,देहरादून आदि कुछ ऐसे ही वर्तमान शिक्षण संस्थान के उदाहरण हैं।
    शिक्षण संस्थान का निर्माण पूर्णतया वास्तुसम्मत होना चाहिए।यहाँ कुछ खास बातों की चर्चा की जा रही है-
v पूर्व या उत्तर में सिंहद्वार रखते हुए चारो ओर से (किनारों पर)भवन योजना उत्तम है,जिसमें कक्षों के साथ प्रसस्त वरामदा भी हो,ताकि किसी भी मौसम की बाधा झेले वगैर पूरे मंडल में सुविधापूर्वक भ्रमण किया जा सके।
v वरामदे भीतर के साथ-साथ बाहर से भी बनाये जा सकते हैं।
v भवन आवश्यकतानुसार बहुमंजिला(तीन से पांच मंजिल) हो सकता है।इससे अधिक मंजिल भी उचित नहीं।
v मध्य का भाग पूर्णतया रिक्त रहना चाहिए।
v उत्तर और पूर्व में पर्याप्त खाली जगह हो,जिसे क्रीड़ास्थल या अन्यान्य उपयोग में लिया जा सके।इन भागों में किनारे-किनारे मनोरम पुष्पादि लगे हों।
v सिंहद्वार पर लताअशोक(दोनों ओर)लगाये जायें।
v आधुनिक फैशन वाले "पाम" आदि लगाने हों तो पश्चिम-दक्षिण परिसर में (कोनों की ओर)लगाये जा सकते हैं।
v दक्षिण-पश्चिम का परिसर उत्तर-पूर्व की तुलना में अत्यल्प हो,जिसमें कुछ पादप-मात्र लगाये गये हों।
v प्राचार्य-कक्ष,प्रशासनिक कक्ष नैऋत्य क्षेत्र में हो।
v शिक्षकों का विश्राम-स्थल,स्वागत-कक्ष आदि ईशान क्षेत्र में बनाये जायें।
v छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग प्रसाधन-शौचालय आदि मुख्य नैऋत्य को छोड़कर पश्चिम या दक्षिण में बनाये जायें।
v सेप्टीटैंक मुख्य भवन के अन्दर न होकर परिसर में पश्चिम-दक्षिण या पश्चिम-उत्तर (ठीक कोण को छोड़कर) बनाया जा सकता है,जो भीतर बने प्रसाधन-कक्ष से जुड़ा रहेगा।
v पुस्तकालय नैऋत्य क्षेत्र में ही उत्तम होता है।
v वित्तीय-कार्य-कक्ष उत्तर में प्रसस्त है।
v पाकशाला अग्निक्षेत्र में रखना उत्तम है।
v मुख्य जलस्रोत ईशान में हो।
v कक्षा में शिक्षक पश्चिमाभिमुख रहें,और पूर्वाभिमुख छात्रों को सम्बोधित करने की सुविधा हो तो अति उत्तम।ध्यातव्य है कि यह ऐसी अनुकूल व्यवस्था चारों ओर के भवनों को समान रुप से नहीं मिल पायेंगी,फिर भी यथासम्भव अनुकूलता का प्रयास करना चाहिए।
v छात्रावास में भी छात्रों को पूर्व या उत्तर मुख बैठ कर पढ़ने की सुविधा हो।
v संस्थान में शीशे और खुले रुप में लोहे का प्रयोग कम से कम किया जाय।
v भवन का रंग हल्दिया पीला(वृहस्पति का अनुकूल रंग)सर्वोत्तम है।
v प्रांगण में विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती और विघ्नेश्वर गणेश के लिए समुचित स्थान पूर्व-ईशान-उत्तर क्षेत्र में बनाया जा सकता है।
v कार्यालय,कक्षाओं तथा छात्रावास में महापुरुषों,स्वतन्त्रता सेनानियों आदि के प्रेरक चित्र यथोचित स्थान पर अवश्य लगाये जायें। प्राकृतिक दृष्यों वाले भित्तिचित्र भी बनाये जा सकते हैं।
v जगह-जगह प्रेरणादायक श्लोकों,दोहों,या काव्यात्मक पंक्तियों का भित्तिलेखन भी शिक्षण संस्थान के लिए अति महत्त्वपूर्ण है।
v शिक्षण संस्थान किसी सम्प्रदाय विशेष का नहीं, प्रत्युत राष्ट्रनिर्माता का मन्दिर है,अतः प्रांगण में अनुकूल स्थान पर राष्ट्रियध्वजारोहण हेतु व्यवस्था होनी चाहिए,जैसे कि आवासीय भवन में हनुमद्ध्वजादि हुआ करते हैं।
v शिक्षण संस्थान वृहस्पति का प्रतीक है।अतः इसके नामकरण में भी ध्यान रखना चाहिए कि तदनुकूल ही हों।आम्रपाली,मेनका,उर्वशी, गन्धर्व जैसे शुक्र का प्रतिनिधित्व करने वाले नाम न हों।महापुरुषों, संतों आदि के नाम पर विद्यालय हो सकते हैं।देवताओं के नाम भी उत्तम श्रेणी में हैं।
v आजकल मुखिया,प्रमुख,राजनेता आदि अपने जीवन काल में ही निज नाम पर या अपने पूर्वजों के नाम पर शिक्षण संस्थानों की स्थापना कर देते हैं।एक जीवित व्यक्ति का स्मारक होना कितना हास्यास्पद है- इस पर प्रबुद्ध लोगों का जरा भी ध्यान नहीं।
v तन्त्र–ज्योतिष-वास्तु शास्त्र में नाम-धाम और काम(किसके द्रव्य का उपयोग हुआ)जैसी बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है।अतः नाम और व्यक्ति का ध्यान तो अवश्य रखा जाना चाहिए।कुकर्म की कमाई से कम से कम शिक्षण संस्थानों को तो बचाया ही जाना चाहिए; ताकि राष्ट्र का मेरुदण्ड नैतिक रुप से कमजोर न हो।   
v शिक्षण संस्थान का सारा काम- निर्माण पूर्व भूमिपूजन से लेकर, शुभारम्भार्थ प्रवेश-पूजन तक- वास्तुनियमों के अनुकूल किये जायें।
आगे,चित्रों के माध्यम से कुछ और स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है-
प्रथम चित्र में एक आदर्श विद्यालय का नमूना प्रस्तुत है,जिसके पूरब और उत्तर में पर्याप्त खाली जगह है।भूखण्ड के पश्चिम-दक्षिण में चारों ओर से भवन बना हुआ है,जिसमें बाहर-भीतर दोनों तरफ वरामदे और मध्य में रिक्तस्थान है। 
दूसरा चित्र चार विभिन्न हिस्सों में बने भवनों का प्रारुप है,जिन्हें अलग-अलग रंगों में क्रमांक क,ख,ग,और घ से दर्शाया गया है,जो क्रमशः अधमाधम हैं। क्रमांक घ को लाल रंग से दिखलाया गया है,क्यों कि इसमें उत्तर और पूर्व में भवन बना हुआ है।यह सर्वाधिक त्रुटिपूर्ण निर्माण है।इसकी अपेक्षा पीले रंग में दर्शित क्रमांक ग किचिंत सही कहा जा सकता है।नीले और हरे रंगों में दर्शित क्रमांक क-ख प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के विद्यालय भवन हो सकते हैं।


तीसरे और चौथे चित्र में U आकार की बनावट है,जो क्रमशः पूरब,पश्चिम,उत्तर, और दक्षिणमुखी है।इनमें पूरब और उत्तरमुख भवन को उत्तम श्रेणी में रखा जा सकता है।पश्चिम मुख वाले को मध्यम एवं दक्षिण मुख वाले भवन को अधम श्रेणी में कहना चाहिए।पश्चिम शनि की दिशा है।शनि मन्दगति वाले ग्रह हैं। फलतः एक ओर तो विद्यालय का विकास मन्द होगा,और दूसरी ओर विद्यार्थियों और शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों में लेटलतीफी की आदत पनपेगी।अतः ऐसे निर्माण से बचें।दक्षिणमुख भवन तो कतई बनाना ही नहीं चाहिए।उसमें विभिन्न तरह की परेशानियाँ आये दिन आती रहेंगी।अकारण लड़ाई-झगड़े,तोड़फोड़,कानूनी और प्रशासनिक समस्यायें,आगजनी,लापरवाही,यहाँ तक कि चारित्रिक पतन की भी आशंका है।   
चित्रांक ३ 
चित्रांक ४
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क्रमशः....

                   


Saturday, 24 January 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-96

गतांश से आगे...अध्याय अठारह,भाग ग्यारह

2.कार्यालय,बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थानादिः- कार्यालय,बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए भी वास्तु के मूलभूत नियम तो वही रहते हैं,किन्तु कुछ बातों पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।यथा-
§  ये सभी सार्वजनिक स्थान(पब्लिक प्लेस) हैं,जहाँ नित्य सैकड़ों नये आभामंडल का प्रवेश और निकास होते रहता है।सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन स्थानों का साफ-सुथरा होना जरुरी है।हवा और रौशनी की पर्याप्त सुविधा होनी चाहिए।इसके अभाव में अच्छे- बुरे "ओरा" के प्रभाव से संस्थान को अनेकानेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।सार्वजनिक स्थानों में आये दिन जो समस्यायें खड़ी होती रहती हैं,उन्हें सही वास्तु-बल देकर आसानी से सुलझाया जा सकता है।कृत्रिम रौशनी और कृत्रिम हवा के युग में हम भूल जाते हैं- प्रकृति की महत्ता को,जिसका दुष्परिणाम जाने अनजाने भुगतना पड़ता है।किसी भी सार्वजनिक स्थान के लिए इनका महत्त्व व्यक्तिगत स्थान की तुलना में अधिक होजाता है। पूर्व अध्याय में शुभाशुभ ऊर्जा प्रवाह की स्थिति को एक बार गौर से देखें।इन स्थानों की क्या स्थिति है- सम्बन्धित भवन में- इसका गहराई से विचार कर यथासम्भव पालन करें।
§  मध्य के खुले स्थान पर विशेष ध्यान रखें।इस स्थान पर भारीपन ही नहीं,भरापन भी हानिकारक होगा।खाली के साथ-साथ साफ-सुथरा भी रहना जरुरी है।
§  छोटा कार्यालय हो या बड़ा,वैंक हो या अन्य वित्तीय संस्थान रिसेप्शन काउण्टर प्रवेश द्वार के समीप रखना ही व्यावहारिक है।चूँकि यह स्थायीत्व का बोधक नहीं हैं,अतः इसे वायु कोण,उत्तर या पूर्व में ही होना चाहिए।इन स्थानों पर सुविधा न हो तो कम से कम बैठने की दिशा का ध्यान अवश्य रखा जाय- रिसेप्शनिष्ट उत्तर या पूर्व मुख ही बैठे।
§  रिसेप्शनिष्ट के कपड़े बहुत भड़कीले(गहरे रंगों वाले) न हों।चन्द्रमा और बुध का यह क्षेत्र है,तदनुसार उनके "स्वरंग" या मित्र रंग ही अच्छे कहे जायेंगे।(द्रष्टव्य-राशिरंगयोजना)।
§  इस भाग में शीशे का प्रयोग न किया जाय तो अच्छा होगा।शीशा राहु के प्रभाव की वस्तु है,और यह स्थान वायु और चन्द्रमा का है। शीशे में बन्द रिसेप्शनिष्ट से ग्राहकों की बकझक अधिक होती है।
§  मुख्य प्रबन्धक/पदाधिकारी का केबिन नैऋत्य क्षेत्र में(कोण में नहीं) कोण से थोड़ा हट कर ऐसा हो ताकि पूर्व या उत्तरमुख बैठा जा सके।
§  पदाधिकारी की सीट के ठीक पीछे कोई सहद्वार या बड़ी खिड़की न हो,बल्कि थोड़ा हट कर खिड़की होना अच्छा है।
§  पदाधिकारी की सीट ऐसी जगह पर हो जहाँ से आसानी से पूरे कार्यालय पर नजर रखी जा सके।हालाकि वर्तमान समय में इसका कोई महत्व नहीं रह गया है- नजर रखने का काम सी.सी.सी.आसान कर दिया है।
§  पदाधिकारी के जलपान और विश्राम के लिए अलग स्थान हो।
§  कार्यालय की प्रधान मेज पर कुछ भी खाना-पीना उचित नहीं।वैसे आजकल चाय और कोल्डड्रिंक्श के जमाने में इससे बचना भी आसान नहीं है;फिर भी खाना-नास्ता जैसे ठोस आहार से तो उस स्थान को मुक्त रखना ही श्रेयस्कर है।
§  अत्यावश्यक(विशेष महत्त्वपूर्ण)कागजात अपने से दांयें,थोड़ी दूरी पर सुविधानुसार रखे जायें।या दो तरफे दराजों वाली मेज की सुविधा हो तो उसके दाहिने भाग को इस तरह के काम के लिए प्रयोग करें। अपेक्षाकृत कम उपयोगी और महत्व वाले कागजातों को बायीं ओर अनुकुल स्थान पर रखें।
§  कर्मचारियों के बैठने के स्थान उत्तर या पूर्व की ओर हो तो अच्छा है।
§  कोई भी कर्मचारी बीम के नीचे न बैठे।
§  कर्मचारियों के लिए विभिन्न काउण्टर बने होते हैं,जिन पर प्रायः सामने की ओर शीशे की विभाजक दीवार बनी होती है,और कतार बद्ध मेजें सजी होती हैं।इन शीशों को लकड़ी के चौखटों के सहारे यदि खड़ा किया जाय तो वास्तु की दृष्टि से अधिक अनुकूल होगा।
§  सीधे शीशे को मात्र लकड़ी के आधार पर खड़ा करना(शेष फ्रेम का अभाव)कार्यालय में राहु को बलवान बनाता है।आजकल प्लास्टिक के फ्रेम का चलन हो गया है,जो वास्तु-दृष्टि से और भी हानिकारक है।पूरे तौर पर राहु का वर्चस्व हो जाता है।उनके बल-वीर्य को संतुलित करने में मंगल का योगदान आवश्यक है।ध्यातव्य है कि लकड़ी पर मंगल का प्रभाव है।
§  रोकड़िया(cashier)के केबिन को सुरक्षा के ख्याल से चारों ओर से शीशे और लोहे की जालियों से घेरा जाता है।ऊपर से भी लोहे का जाल होता है।ध्यायव्य है कि लोहे का रंग काला कदापि न रखा जाय।इससे शनि का कुप्रभाव पड़ेगा।मेरुन(कथ्थयी)के साथ हरे,पीले आदि रंगों का समावेश अनुकूल होगा।
§  जेनरेटर या विजली के अन्य उपकरण मुख्य रुप से अग्निक्षेत्र में ही हों।
§  भवन का जलस्रोत ईशान से पूर्व के बीच अनुकूल स्थान पर हो।(द्रष्टव्य- जलस्रोत अध्याय)
§  भवन में कैंटीन वगैरह अग्निकोण पर बनाये जायें।
§  बैंकों के स्ट्रॉंगरुम मध्य उत्तर में हों तो अति उत्तम।वायु,नैऋत्य, अग्नि आदि कोणों पर कदापि न बनाये जायें।ईशान पर मध्यम स्थिति है।
§  ल़ॉकर मध्य दक्षिण में भी बनाये जा सकते हैं,मंगल का प्रभाव क्षेत्र होने के कारण- सुरक्षा के ख्याल से,जिनके द्वार उत्तर की ओर खुलने वाले हों।स्वाभाविक रुप से खोलने वाले का मुंह दक्षिण की ओर होगा,किन्तु कोई हर्ज नहीं है इसमें।बैंकिंग व्यवस्था में यही अनुकूल है।
§  लॉकर के आसपास झाड़ू,वाईपर आदि सफाई के सामान न रखे जायें।
§  प्रहरी(सुरक्षा गार्ड)आदि के पोशाक काले न रखे जायें।नीला,खॉकी,लाल की प्रधानता वाले शेड अनुकूल होते हैं।
§  मुख्य प्रवेश द्वार से पदाधिकारी के चेंबर तक जाने का मार्ग दक्षिणावर्त(Clockwise)हो तो अति उत्तम।
§  कार्यालय आदि में खिड़की-दरवाजों के पर्दे काले रंग के कदापि न लगाये जायें। मिश्रित रंगों में काला भी हो तो कोई हर्ज नहीं।

§  भवन और वाह्य परिसर में सभी दिशाओं और विदिशाओं का समुचित ध्यान रखते हुए ग्रहों की अवस्थिति को नजरअन्दाज न करें।ग्रहों के विपरीत धर्मी पदार्थों के स्थापन से बचें।इससे कार्यालय में शान्ति,सुव्यवस्था बनी रहेगी।

क्रमशः.....