Wednesday, 27 July 2016

गयाश्राद्धःसंक्षिप्त विवेचन

                                     गयाश्राद्धःसंक्षिप्त विवेचन       


 श्राद्ध कहते किसे हैं?
श्रद्धा शब्द से श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है।यथा- ‘श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्’, ‘श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम्’, ‘श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छ्राद्धम्’, ‘श्रद्धया इदं श्राद्धम्’। इस प्रकार मृत पितृगण (पितरों) (मृत बन्धु-बान्धओं) के उद्देश्य से,सविधि,श्रद्धापूर्वक किये गये कर्मविशेष को ही श्राद्ध कहते हैं-श्रद्धया पितृन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्। इसका एक नाम पितृयज्ञ भी है। इस सम्बन्ध में मनुस्मृति आदि विविध धर्मशास्त्र,वायु,कूर्म, पद्मादि विविधपुराण, वीरमित्रोदय, श्राद्धकल्पलता,श्राद्धतत्त्व,पितृदयिता आदि ग्रन्थों में इसका विशद वर्णन है। महर्षि पराशर कहते हैं- देश,काल,पात्र में हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म दर्भ(कुश),तिल,यवादि तथा मन्त्रों से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाय,वही श्राद्ध है। यथा- देशे काले च पात्रे च विधिना हविषा च यत्। तिलैर्दर्भैश्च मन्त्रैश्च श्राद्धं स्याच्छ्रद्धया युतम्।। महर्षि बृहस्पति,एवं पुलस्त्य के अनुसार- संस्कृतं व्यञ्जनाद्यं च पयोमधुघृतान्वितम्। श्रद्धया दीयते यस्माच्छ्राद्धं तेन निगद्यते।। इसी भांति ब्रह्मपुराण में कहा गया है- देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्। पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम्।। पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मणों को दिया जाय वही श्राद्ध है। यानी द्रव्य,भोजन,वस्त्र,शैय्यादि उपस्कर जो कुछ भी प्रदान किये जायें।
इस परिभाषा की जानकारी के बाद कई प्रश्न उठते हैं- 1) इसे वे(दिवंगत प्राणी)प्राप्त कैसे करेंगे,और 2) श्राद्ध करने वाले को क्या लाभ। कुछ और भी प्रश्न उठ सकते हैं।

पितरों को श्राद्धीय वस्तु की प्राप्ति कैसे-किस रुप में-
ध्यातव्य है कि श्राद्धकर्म पूर्वजन्म /पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर आधारित है। यदि पूर्वजन्म में आस्था नहीं है,तो श्राद्ध का कोई मतलब नहीं। हम पहले भी कुछ थे,पुनः भी कुछ होंगे- यह सिद्धान्त ही हमें श्राद्धकर्म की प्रेरणा देता है। सर्वाधिक प्रमाणिक, लोकास्था का ग्रन्थ- श्रीमद्भगवत्गीता के वचन हैं- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽथे न त्वं शोचितुमर्हसि।।(२-२७) जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है,और जो मरा है उसका जन्म भी निश्चित है। यह एक शास्वत नियम है। विशेष क्रिया-साधना द्वारा जब तक प्राणी की मुक्ति नहीं हो जाती,तब तक जीवन-मृत्यु का यह चक्र चलता ही रहता है। अपने शुभाशुभ कर्मानुसार प्राणी स्वर्ग, नरक, देव,मानव,पशु,कीटादि विभिन्न चौरासीलाख योनियों में भटकता है। इन्हीं योनियों में पितरयोनि और प्रेतयोनि भी है। इन सबका भरण-पोषण विश्वम्भर प्रभु का कार्य है। जो जहां है,जिस स्थिति में है,जैसी उसकी आवश्यकता है,जितना उसके लिए विहित है- उसके कर्मानुसार,तदनुरुप ही उसे सारी व्यवस्था मिलती है- इस महाव्यवस्थापक प्रभु के द्वारा, इसमें कोई दो राय नहीं है। श्राद्धकर्म में नाम,गोत्र, सम्बन्ध,स्थान, वस्तु आदि का खास महत्त्व है। इसमें त्रुटि कदापि नहीं होनी चाहिए,अन्यथा कार्य और उद्देश्य व्यर्थ हो जायेगा। किसने, किसके लिए, कब, कहां, क्या,कैसे प्रदान किया इन बातों के सहारे उसके अधिष्ठाता(विश्वेदवा,अग्निष्वातादि)उस प्राणी तक पहुँचाने का कार्य करते हैं- ठीक वैसे ही जैसे डाकिया किसी स्थान विशेष से किसी वस्तु विशेष को किसी व्यक्ति विशेष तक पहुंचाने का कार्य करता है।यह महान डाकिया(वाहक) सामान्य डाकिया से कहीं अधिक सक्षम और कार्यकुशल है। यहां खास बात ये भी है कि वस्तु को समुचित वस्तु में परिवर्तित करके उपलब्ध कराया जाता है। जैसे हमने जौ के आटे का पिंड प्रदान किया। जूता,छाता,तोषक,कम्बल प्रदान किया।और प्राप्त करने वाला यदि अभी पशुयोनि में है, तो उसे उसके अनुरुप वस्तु- तृणादि के रुप में ही प्राप्त होगा। देवयोनि में है,तो अमृतरुप में प्राप्त होगा,यक्षयोनि में है तो पान रुप में, प्रेतयोनि में है तो सु-वायु रुप में प्राप्त होगा, इत्यादि। इस सम्बन्ध में मार्कण्डेयपुराण, वायुपुराण,श्राद्धकल्पलता आदि ग्रन्थों में कहा गया है- नाममन्त्रास्तथा देशा भवान्तरगतानपि। प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान्। देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः। तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेऽप्यनुगच्छति।। मर्त्यत्वे ह्यन्नरुपेण पशुत्वे च तृणं भवेत्। श्राद्धान्नं वायुरुपेण नागत्वेऽप्युपतिष्ठति।। पानं भवति यक्षत्वे नानाभोगकरं तथा।। इसी क्रम में पुराणकार कहते हैं कि जैसे भूला हुआ बछड़ा अपनी मां को किसी न किसी प्रकार ढूढ़ ही लेता है, उसी भांति मन्त्र और क्रिया द्वारा शोधित वस्तु समुचित प्राणी तक पहुँच ही जाता है, चाहे वह कहीं भी हो--यथा गोष्ठे प्रणष्टां वै वत्सो विन्देत मातरम्। तथा तं नयते मन्त्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठते। नाम गोत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नं नयन्ति तम्। अपि योनिशतं प्राप्तांस्तृप्तिस्ताननुगच्छति।।(वा.पु.उ.८३-११९,१२०) नामगोत्रं पितृणां तु प्रापकं हव्यकव्ययोः। श्राद्धस्य मन्त्रतस्तत्त्वमुपलभ्येत भक्तितः।।  अग्निष्वात्तादयस्तेषामाधिपत्ये व्यवस्थिताः। नामगोत्रास्तथा देशा भवन्त्युद् भवतामपि।।  प्राणिनः प्रीणयन्त्येतदर्हणं समुपागतम्।।(पद्मपुराण,सृष्टिखंड,१०-३८,३९) यहां ध्यान देने योग्य बात है कि इस अन्तराल में कितने ही योनि क्यों न व्यतीत(परिवर्तित) हो गये हों,प्रदत्त वस्तु की प्राप्ति अवश्य होती है।प्रायः नास्तिक लोग ये संशय करते हुए आपोप लगाते हैं कि प्रत्यक्षतः दिया गया वस्तु तो दानादि ग्रहण करने वाले ब्राह्मण ले जाते हैं,और ये भी ठिकाना नहीं है कि दान जिसके लिए दिया गया वह प्राणी अभी कहां किस अवस्था में है। शास्त्र के उक्त वचनों से यह प्रमाणित हो जाता है कि वस्तु का रुपांतरण सहित स्थानान्तरण होता है। जैसे हम किसी बैंक या डाकघर में रकम या वस्तु जमा करते हैं,और अन्यत्र बैठे व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है,वशर्ते कि पता सही हो,उसी भांति यहां भी श्राद्धीय सामग्री का स्थानान्तरण होता है,और इस विशेषता के साथ कि यहां आवश्यक रुपान्तरण भी सम्भव है। आज के वैज्ञानिक युग में बहुत सी बातों को प्रमाणित करना सरल हो गया है,पहले की अपेक्षा। कुछ और भी बातें(सिद्धान्त)आने वाले समय में विज्ञान-सम्मत प्रमाणित हो जायेंगे, निश्चित ही। विज्ञान स्वीकारता है कि पदार्थ और ऊर्जा दो ही चीजें हैं। अध्यात्म इसे ही द्वैत कहता है। यह भी विज्ञान सिद्ध है कि पदार्थ का ऊर्जा में और ऊर्जा का पदार्थ में निरंतर परिवर्तन हो रहा है- प्राकृतिक रुप से,और सायास,सविधि भी परिवर्तन करना सम्भव है,अतः इन शास्त्रीय सिद्धान्तों को स्वीकारने में कोई आपत्ति और संशय नहीं होना चाहिए। श्राद्धकर्म निहायत व्यावहारिक प्रयोग है,क्रियात्मक प्रयोग है।अतः इसमें किसी प्रकार की जरा भी त्रुटि नहीं होनी चाहिए। प्रयोगशाला में जल का निर्माण करने के लिए सुनिश्चित मात्रा में सुनिश्चित विधि से हाईड्रोजन और ऑक्सीजन की मात्रा मिलानी होती है,तभी कार्य (प्रयोग) सफल होता है।  वैसे ‘अस्ति और नास्ति’ का सम्यक् ज्ञान तो ज्ञानचक्षु के खुलने से ही हो सकता है,उसके पूर्व तो आर्षप्रमाणों पर ही भरोसा करना होगा।अस्तु।

श्राद्ध करने से श्राद्धकर्ता को क्या लाभ ?
आज की दुनियां अर्थ-प्रधान होगयी है। हम सभी वैश्य हो गये हैं,ब्राह्मण-क्षत्रिय वाली सोच रह ही नहीं गयी है। किसी कार्य में ‘वणिक-प्रणाली’ का प्रयोग करते हैं। यानी कि हानि-लाभ के प्रश्न के साथ,उसी मापदण्ड से किसी कार्य को देखा-परखा जाता है। जप,तप,पूजा,पाठ,तीर्थ,व्रत भी यही सोच कर करते हैं। तभी तो थोड़े ही दिनों में हानि-लाभ का ‘बैलेन्ससीट’ बनाने लगते हैं- इतने दिनों से कर रहे हैं,कुछ तो लाभ नहीं दीखता...। श्राद्ध को भी हम इसी नजर से देखते हैं। श्राद्ध करना परम हमारा कर्तव्य है- इसे नहीं समझते। अतः जरा इसे समझने का प्रयास करें—
‘पुन्नामनरकात् त्रायते इति पुत्रः’- पुन्नामक नरक से जो त्राण(रक्षा)करे,वही पुत्र कहलाता है- इस वाक्य का सामान्य अर्थ यही है कि सिर्फ पुत्र ही उक्त नरक से उद्धार करा सकता है,किन्तु इसी वाक्य में यह अर्थ भी छिपा हुआ है,कि वे सभी जो इसके अधिकारी हैं,श्राद्धकर्म करने के,और कल्याण कर सकते हैं,उद्धार कर सकते हैं- अपने पितरों का,वे सभी पुत्र कहे जाने योग्य हैं। जैसा कि पूर्व प्रसंग में श्राद्ध के अधिकारियों की चर्चा की गयी-वे सभी इस संज्ञा के योग्य हैं। उक्त पुत्रों के लिए तीन मुख्य कर्म कहे गये हैं- जीवितो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात् । गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता।। (श्रीमद्देवीभागवत ६-४-१५)- अर्थात् जीवित अवस्था में माता-पिता की आज्ञा का पालन करे,मृत्यु के पश्चात् श्रद्धापूर्वक,सामर्थ्यानुसार श्राद्धकर्म करे,तथा ब्राह्मण-भोजन करावे,एवं समयानुसार पितरों के निमित्त गयाश्राद्ध भी करे। इसके वगैर वह पूर्णरुप से पितृऋण से मुक्त नहीं हो सकता। यमस्मृति,गरुड़पुराण,श्राद्धप्रकाश आदि ग्रन्थों में श्राद्धकर्ता का लाभ दर्शाया गया है- आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम् । पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।। कूर्मपुराण के वचन हैं- योऽनेन विधिना श्राद्धंकुर्याद् वै शान्तमानसः। व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः।। इस सम्बन्ध में महर्षि सुमन्तु के वचन हैं- श्राद्धात् परतरं नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम् । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद्विचक्षणः।। मार्कण्डेय पुराण के वचन हैं- आयुः प्रजां धनं विद्या स्वर्गं मोक्षं सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः।। इस प्रकार संकेत मिलता है कि इस जगत में श्राद्ध से श्रेष्ठ कोई अन्य कल्याणकारी उपाय नहीं है। श्राद्ध करने से आयु,आरोग्य,पुत्र,यश,धन,स्वर्ग,कीर्ति,पुष्टि,बल,विद्या,पशु, सौख्य, धान्य आदि की प्राप्ति होती है। श्राद्ध से सन्तुष्ट(तृप्त)होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को आशीष देकर उक्त वस्तुयें प्रदान करते हैं। देवगुरु बृहस्पति ने तो यहां तक कह दिया है कि- उपदेष्टानुमन्ता च लोके तुल्यफलौ स्मतौ। यानी जो श्राद्ध करता है,विधि-विधान को जानता है,श्राद्ध करने हेतु किसी को प्रेरित करता है,अनुमोदन करता है,उसे भी श्राद्ध का फल मिलता है। अत्रिसंहिता, श्राद्धानुष्ठान आदि ग्रन्थों में भी श्राद्ध के लाभ को बतलाया गया है।

श्राद्ध न करने से हानि क्या ?-
अब इसके हानि-पक्ष को भी देख लें।लाभ का ठीक उल्टा हानि होता है।सीधा सा उत्तर है,न करने वाले उक्त लाभों से वंचित रह जायेंगे।अपने कर्म सौभाग्य से यदि पितरगण स्वर्गादि उच्च लोकों को चले गये हैं,तब तो कोई बात नहीं,अन्यथा हानि ही हानि है। और स्वर्ग जाने की तुलना में अन्यान्य लोकों में जाने की(फंसे रहने की),अपेक्षाकृत  अधिक आशंका है।ब्रह्मपुराण के वचन हैं कि पितरों का श्राद्ध न करने वाले मोहवश, उनके रक्तादि का पान करते हैं,और क्षुब्ध पितर गण निरन्तर उन्हें शापित करते हैं – श्राद्धं न कुरुते मौहात् तस्य रक्तं पिबेन्ति ते....पितरस्तस्य शापं दत्त्वा प्रयान्ति च।। तैतरीयउपनिषद कहता है- देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्..। अर्थात् देव-पितृकार्यों में प्रमाद-आलस्य न करें।क्यों कि इससे प्रत्यवाय- विपरीत फल होता है- न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुषः। न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम्। तथा च श्राद्धमेतन्न कुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते। (हारीत एवं विष्णुस्मृति)
पितरों के शाप से अभिशप्त परिवार विभिन्न प्रकार के ज्ञात-अज्ञात,अकारण कष्ट पाते रहता है। पितरों के क्षुब्ध होने से उसके यहां या तो सन्तान पैदा ही नहीं होती,या पैदा होकर मर-मर जाती है,या रोगी होती है। इतना ही नहीं उसके जीवन में सभी कर्म निष्फल से हो जाते हैं। व्यवहारिक जगत में हम प्रायः देखते हैं कि काफी श्रम करने पर भी समुचित यश,धन,सुख प्राप्त नहीं कर पाते। शारीरिक,आर्थिक,सामाजिक,पारिवारिक, व्यावसायिक विभिन्न तरह की वाधाओं,और कष्टों का सामना करते रहते हैं। इसके पीछे अन्य,अनेक  कारण होते हैं,किन्तु पितृदोष(शाप)जनित कारण भी प्रधान होता है।बहुत बार ऐसा होता है कि पितृकार्य विधिवत सम्पन्न कर देने पर सुख-शान्ति मिलने लगती है।विविध बाधायें आश्चर्यजनक रुप से दूर होने लगती हैं।
जातक की जन्म कुण्डली में भी इसका संकेत प्रायः मिल जाता है। जिसके कुल में पितर क्षुब्ध,त्रसित होते हैं,उसके यहां जन्म लेने वाली सन्तानों की कुण्डली से इसे जांचा-परखा जा सकता है। जन्म कुण्डली में दसवां भाव पिता का होता है,इसे कर्मभाव भी कहते हैं,और नवें भाव को धर्म भाव कहा जाता है,तथा पांचवे को सन्तान भाव।इन भावों में कहीं भी सूर्य के साथ राहु,शनि,केतु का संयोग दीखे तो इससे पितृदोष का संकेत मिलता है। इन्हीं भावों में बृहस्पति या बुध हों और साथ में उक्त तीनों- राहु,शनि,केतु का संयोग दीखे तो भी पितृदोष कहा जाता है। इनमें भी दशमभाव की स्थिति सर्वाधिक प्रत्यक्ष संकेत है। कारण है पिता के घर में, पिता के साथ पापग्रहों का सानिध्य होना। ज्ञातव्य है कि सूर्य,बृहस्पति और बुध को दशमभाव का कारक माना गया है। ये तो हुआ स्थिरकारक के अनुसार विचार करने का तरीका। इन्हीं बातों को चरकारक के अनुसार भी विचार करना चाहिए।ज्ञातव्य है कि चरकारक नियम के अनुसार, जन्म कालिक ग्रह स्पष्टी में अंशादि क्रम में पांचवें स्थान पर होने वाला ग्रह पुत्र और पिता का कारक होता है। जिस प्रकार ग्रह और गोचर दोनों का विचार किया जाता है,उसी भांति चर और स्थिर दोनों प्रकार से पुत्र और पितृ कारक ग्रहों का विचार करना चाहिए। किंचित ज्योतिर्विदों के मत से तो जन्मकुण्डली में कहीं भी,किसी भी भाव में उक्त तीनों- राहु,शनि,केतु का संयोग सूर्य,बुध,गुरु से होगा तो आंशिक रुप से उक्त भाव का फल बाधित होना ही है। यदि कुण्डली में ये दोष है,तो लाख उपाय किये जायें,सुख-शान्ति नहीं मिल सकती। उसका एकमात्र उपाय होता है- पितरों को तुष्ट करना।पितरों को प्रसन्न करने के कई उपाय है,जिनमें गयाश्राद्ध सर्वोत्तम है।
प्रेतवाधा,सन्तान वाधा आदि के लिए वोधगया, धर्मारण्य स्थित रहटकूप वेदी पर श्राद्ध किया जाता है।यहां दो तरह का श्राद्ध होता है- एक तो सामान्य गयाश्राद्ध के क्रम में,और दूसरा त्रिपिण्डी श्राद्ध। कभी-कभी घोर संकटनिवारण के लिए ये दोनों कार्य अलग-अलग सम्पन्न करने होते हैं।
इन सभी बातों पर ध्यान देने पर, गयाश्राद्ध के लाभ-हानि-पक्ष पर किसी तरह की शंका नहीं रह जाती।

गयाश्राद्ध का महत्त्व और उपादेयता
कांक्षंति पितरः पुत्रान् नरकाद्भयभीरवः। गयां यास्यति यः पुत्रः स नस्त्राता भविष्यति।। गया प्राप्तं सुतं दृष्ट्वा पितृणामुत्सवो भवेत्। पद्भ्यामपि जलं स्पृष्ट्वा सोऽस्मभ्यं किन्नदास्यति।। एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्। यजेद्वा चाश्वमेधेन नीलं वृषभमुत्सृजेत्।। गयां गत्वान्नदाता यः पितरस्तेन पुत्रिणः। पक्षत्रयनिवासी च पुनात्यासप्तमं कुलम्।। नेतेत्पंचदशाहं वा सप्तरात्रं त्रिरात्रकम्। महाकल्पकृतं पापं गयां प्राप्य विनश्यति।।
वायुपुराण, श्रीश्वेतवाराहकल्प में गयामहात्म्य विषयक आठ अध्याय हैं,जिनमें प्रथम अध्याय के इन कुछ श्लोकों से ही गयाश्राद्ध की महत्ता सिद्ध हो जाती है। यूं तो पद्म,अग्नि,नारद, कूर्म, गरुड़, ब्रह्माण्डादि विविध पुराण गयाश्राद्ध की महिमा को विवेचित किये हैं; किन्तु वायुपुराण इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहा है। वायुपुराण के अन्य अध्यायों में भी श्राद्धविषयक पर्याप्त प्रसंग हैं। उक्त पुराणों में कहा गया है कि मृत्यु के पश्चात् प्राणी पितरलोक में वास करते हैं- विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति...। अपने कर्मानुसार स्वर्ग,नरक,मृत्युलोकादि में कहीं  वास करते हुए भी आंशिक रुप से पितरलोक में भी वास होता ही है। इस सिद्धान्त से जिनकी सद्गति होगयी है,उनके लिए भी और सद्गति नहीं भी हुयी है,उनके लिए भी गयाश्राद्ध अनिवार्य है। गया में अपने पुत्रादि को आया देखकर पितरलोग उत्सव मनाते हैं।गयाधाम में श्रद्धापूर्वक रखा गया एक-एक कदम भी अश्वमेधयज्ञ के तुल्य होता है।
मुख्य रुप से गयाश्राद्ध त्रिपक्षीय(पूर्व-परयुक्त)यानी गत मास की पूर्णिमा,इस मास की प्रतिपदा से अमावश्या तथा पुनः शुक्लपक्ष की प्रतिपदा- कुल सत्रह दिनों की क्रिया है,जिसके अन्तर्गत अनेक वेदियों पर घूम-घूम कर एक ही तरह की क्रिया करने का विधान है। इसमें पार्वण विधि से श्राद्ध किया जाता है,जिसमें प्रत्येक वेदी पर ढाई से तीन घंटे का कर्मकाण्ड होता है। संक्षिप्त रीति से, तीर्थविधि से भी करने का विधान है,जिसमें प्रत्येक वेदी पर सवा घंटे का समय अनिवार्य रुप से लगता ही है।
प्राचीन समय में चन्द्रमा की वार्षिक ३६० कलाओं को आधार बनाकर, ३६० वेदियों पर पिण्डदान करने का नियम था,जो कालान्तर में सिमट कर सीधे १५६ हो गया। ध्यातव्य है कि चन्द्रमा की कला तो वही की वही रही,हमने कर्मकाण्ड को समेट दिया। पञ्चक्रोसं गया प्रोक्तं- शास्त्रीय रुप से गया का विस्तार पांच कोस यानी पन्द्रह किलोमीटर में माना गया है, जिसके विभिन्न भागों में ये ३६० वेदियां अवस्थित थी। वर्तमान में इनकी संख्या सिमट कर मात्र ४५ रह गयी है,उनमें भी अधिकांश की स्थिति अति दयनीय है,और सही रुप से उनका परिचय और स्थान निर्धारण भी कठिन प्राय है। भले ही गयापाल लोग अपने-अपने ढंग से स्थान की प्रमाणिकता सिद्ध करते हैं। बहुत सी वेदियों को विष्णुपद प्रांगण और आसपास में ही मान लिया गया है।
पौराणिक प्रसंग के अनुसार गयासुर नामधारी राक्षस के विशाल शरीर को देवताओं द्वारा गिराकर,दबाया गया। जिस-जिस अंग पर जो-जो देवता दबाव डालकर बैठे,वह-वह वेदी (स्थान) उनके नाम से जाना गया। कथा काफी विस्तार में है। इस पर फिर कभी चर्चा हो सकती है।
समय के अनुसार एक ओर संसाधनों का विकास हुआ है,तो दूसरी ओर श्रद्धा-भक्ति और समय का अभाव भी होता गया। भविष्य-द्रष्टा ऋषियों ने इस दुर्गति को समझते हुए ऐसी व्यवस्था भी दे दी कि संक्षिप्त रुप से (पूरा ना के जगह थोड़ा हाँ वाले सिद्धान्त से) गयाश्राद्ध की क्रिया सात,पांच, या तीन दिनों में भी सम्पन्न किया जा सकता है। वो भी सम्भव न हो तो एक दिवसीय कर्म करें। कथन क्रम में यहां तक कह दिया गया कि आंवले या शमी के पत्ते यानी बहुत छोटे से अंश में भी यदि गया-विष्णुपद में पिंडदान दे दिया जाय तो पितर तृप्त हो जाते हैं।

श्राद्ध करने में सावधानी-
श्राद्ध के सम्बन्ध में एक बडा ही महत्त्वपूर्ण सूत्र है- पितरःवाक्यमिच्छन्ति, भावमिच्छन्ति देवता। श्रद्धा शब्द से श्राद्ध शब्द की संगति बैठा दी जाती है। किन्तु ध्यान देने की बात है कि सिर्फ श्रद्धा और भक्ति से श्राद्ध कदापि पूरा नहीं हो सकता। संत तुलसी के कथन — भाय-कुभाय अनख आलस हूँ,नाम जपत मंगल दिसि दस हुँ— भगवान की भक्ति के लिये भले ही शतप्रतिशत सही हो सकता है,किन्तु पितृ-कार्य के लिए इतने भर से काम नहीं चलने को है। पितृ-कार्य देव-कार्य से भी अधिक सावधानी वाला कार्य है। यहां भाव शुद्धि,क्रियाशुद्धि,द्रव्यशुद्धि,वाक्यशुद्धि सब कुछ समान रुप से अनिवार्य है। इन घटकों में एक का भी अभाव होगा तो आपका प्रयोग व्यर्थ हो जायेगा। जिस प्रकार किसी व्यक्ति से सम्पर्क करने के लिए उसका सही आईडी आवश्यक है, एक अक्षर या मात्रा की भी भूल होगी,तो सम्पर्क नहीं हो पायेगा,उसी भांति नाम,गोत्रादि के साथ सभी वैदिक मन्त्रों का सही ध्वनि-तरंग बनना चाहिए, तभी कार्य सिद्ध होगा, अन्यथा नहीं। अस्तु।

गयाश्राद्ध से उद्धार किनका ? -
शास्त्रवचन हैं कि गयाश्राद्ध करने से सात कुल के एकसौ एक वंश(पीढ़ी) का उद्धार होजाता है।ज्ञातव्य है कि ये सात कुल और एकसौ एक वंश क्या हैं। वायुपुराण, श्रीश्वेतवाराहकल्प,गयामहात्म्य,प्रथम अध्याय में कहा गया है-उद्धरेत्सप्तगोत्राणि कुलमेकोत्तरं शतम्। पिता माता च भार्या च भगिनी दुहितुः पतिः।। पितृष्वसा मातृष्वसा सप्तगोत्राणि तारयेत्। चतुर्विंशश्च विंशश्च षोडशद्वादशैव च।। रुद्रा दश वसुश्चैव कुलमेकोत्तरं शतम्। एकतः सर्ववस्तूनि सर्वतिक्तमधूनि हि।। (वायुपुराण,श्रीश्वेतवाराहकल्प,गयामहात्म्य,प्रथमअध्याय- ३५,३६,३७) तथा धर्मसिन्धु में भी उक्त आशय किंचित भिन्न शब्दों में व्यक्त किये गये हैं- पिता माता च भार्या च भगिनी दुहिता तथा। पितृमातृश्वसा चैव सप्तगोत्राणि वै विदुः।। उक्त सात गोत्रों के एकसौएक कुलों को निर्णयसिन्धु ने इस प्रकार परिगणित किया है- तत्त्वानि विंशति नृपा द्वादशैकादशा दश। अष्टाविति च गोत्राणां कुलमेकोत्तरं शतम्।।अर्थात् पिता का कुल,माता का कुल,पत्नी का कुल,पिता की बहन यानी फूआ का कुल,माता की बहन यानी मौसी का कुल,अपनी बहन का कुल,बेटी का कुल- ये सात कुल(गोत्र)कहे गये हैं।अब इन सातों में क्रमशः पूर्व-वंशोद्धार की बात कह रहे हैं-पिता की चौबीस पीढ़ी,माता की बीस पीढ़ी,पत्नी की सोलह पीढ़ी,अपनी बहन की बारह पीढ़ी,बेटी की ग्यारह पीढ़ी,बुआ की दस पीढ़ी,और मौसी की आठ पीढ़ी- कुल मिलाकर एकसौएक पीढ़ियों का तरण होता है गयाश्राद्ध से।
प्रसंगवश पुनः गणना करते हैं कि गयाश्राद्ध-काल में किन बन्धु-बान्धवों को तृप्ति दिलायेंगे- ताताम्बात्रितयं सपत्नजननी मातामहादित्रयं सस्त्रि स्त्रीतनयादि तातजननीस्वभ्रातरः तत्स्त्रियः। ताताम्बाऽऽत्मभगिन्यपत्यधवयुग् जायापिता सद् गुरुः शिष्याप्ताः पितरो महालयविधौ तीर्थे तथा तर्पणे।।--पिता,पितामह(दादा),प्रपितामह(परदादा),माता,पितामही(दादी),प्रपितामही (परदादी), विमाता (सौतेलीमाँ),मातामह(नाना),प्रमातामह (परनाना), वृद्धप्रमातामह(छरनाना),मातामही(नानी),प्रमाता- मही (परनानी), वृद्धप्रमातामही(छरनानी),स्त्री,पुत्र-पुत्री,चाचा-चाची, चचेरा भाई, मामा-मामी, ममेरा भाई, अपना भाई-भाभी, भतीजा, फूफा-फूआ, फूफेरा भाई,मौसा-मौसी,मौसेरा भाई,बहन-बहनोई,भगिना,सास-श्वसुर,गुरु-गुरुपत्नी,शिष्य, संरक्षक और सेवक- इन सभी को पिंड-प्रदान करना चाहिए। इन प्रधान बन्धुओं के अतिरिक्त अन्याय लोगों(जिनसे यत्किंचित बान्धत्व है)को भी पिण्ड देना चाहिए।

गयाश्राद्ध सा उचित समय-
यूं तो गयाश्राद्ध कभी भी किया जा सकता है - गयायां सर्वकालेषु पिण्डं दद्यात् विचक्षणः। (वायुपुराण १०५-१८),पुनः कहते हैं- अधिमासे जन्मदिने चास्तेऽपि गुरुशुक्रयोः। न त्यक्तव्यं गयाश्राद्धं सिंहस्थेऽपि वृहस्पतौ। चन्द्रसूर्यग्रहे चैव मृतानां पिण्डकर्मसु।।(वायुपुराण १०५-१८-१९) यानी किसी तरह की वर्जना नहीं है,फिर भी तुलनात्मक दृष्टिभेद है। ज्ञातव्य है कि साल के बारहों महीने का कृष्णपक्ष पितृपक्ष होता ही है। इस पक्ष में पितरों के निमित्त कहीं भी कुछ भी कार्य करना प्रसस्त है,गयाधाम की बात ही क्या कहना।किन्तु फिर भी कुछ खास अवसर सुझाये गये हैं गयाश्राद्ध के लिए,जो अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण हैं- मीने मेषे स्थिते सूर्ये कन्यायां कार्मुके घटे। दुर्लभं त्रिषु लोकेषु गयायां पिंडपातन्म्।। मकरे वर्तमाने च ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः। दुर्लभं त्रिषु लोकेषु गयायां पिंडपातन्म्।। (तथा, गयायां दुर्लभं लोके वदन्ति ऋषयः सदा। एवं,  दुर्लभं त्रिषुलोकेषु गयाश्राद्धं सुदुर्लभं। वाक्यभेद से भी वचन हैं-वायुपुराण १०५-४७) इस प्रकार सूर्यराशियों के विचार से गयाश्राद्ध के लिए अनुकूल चन्द्रमास होता है- चैत्र,वैशाख,आश्विन,पौष और फाल्गुन। साथ ही मकर संक्रान्ति,तथा सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहणकाल में भी गया में पिंडदान का विशेष महत्त्व है।यहाँ संक्रान्ति शब्द में सूर्य की अन्य संक्रान्तियां भी समाहित समझना चाहिए-गयाश्राद्धं प्रकुर्वीत संक्रान्त्यादौ विशेषतः। गयाश्राद्ध की महिमा का वखान करते हुए सनत्कुमार जी, नारदजी से कहते हैं- गयायां पिंडदानेन यत्फलं लभते नरः। न तच्छक्यं मया वक्तुं कल्पकोटिशतैरपि।। सौ करोड़ कल्पों तक लागातार वर्णन करते रहने पर भी गयाश्राद्ध का महात्म्य पूरा नहीं हो सकता। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार जीवन में एक बार गयाश्राद्ध तो कर ही लेना चाहिए।

गयाश्राद्ध सम्बन्धी भ्रान्तियाँ-
प्रायः लोग यह समझ लेते हैं कि गयाश्राद्ध जीवन में सिर्फ एक बार ही करने वाला कर्म है,और इतना ही नहीं एक बार कर लेने से हमेशा-हमेशा के लिए कार्य सम्पन्न हो जाता है,और आगे अब पितरों के निमित्त कभी भी कुछ भी नहीं करना है—यह बहुत बड़ी भ्रान्ति है।लोग कहते हैं- मैंने पितरों को गया में बैठा दिया- ये बिलकुल बेतुकी बात है। पितरों को बैठाने-उठाने का कोई तुक नहीं है। गयाश्राद्ध जीवन में एकबार अवश्य करना चाहिए- इस वाक्य का ये अर्थ कदापि नहीं है। ये वचन श्राद्ध की महत्ता के संदर्भ में कहे गये हैं,न कि भावी निषेध अर्थ में। तात्पर्य यह है कि एकबार गयाश्राद्ध तो अवश्य कर ले,आगे जिससे जितना हो सके, करते रहे। पिंडदान न भी कर सके तो आगे कम से कम जलादि दान तो करे ही- यानी पितृतर्पण कर्म अवश्य करे।

गयाश्राद्ध में मुंडनकर्म का निषेध-
किसी भी पितृकार्य में मुंडन अत्यावश्यक है। काशी,प्रयाग, हरिद्वारादि अन्य तीर्थो में जाने पर भी उस स्थान पर मुंडन की शास्त्र-सम्मत परम्परा है;किन्तु गयाधाम में मुंडन वर्जित है। वायुपुराण के उक्त प्रसंग(१/२३) में ही कहा गया है- मुण्डनं चोपवासश्च सर्वतीर्थेष्वयं विधिः। वर्जयित्वा कुरुक्षेत्रं विशालां विरजां गयाम्।।  अर्थात् सभी तीर्थों में मुंडन कराना आवश्यक है,किन्तु कुरुक्षेत्रतीर्थ,विरजातीर्थ, वद्रीधाम तीर्थ, और गयाधाम तीर्थ में मुंडन न करावे।–इस आदेश(संकेत)का भी अधूरा अर्थ लगा लिया जाता है। ध्यातव्य है कि कहीं भी श्राद्धकर्म का पहला कर्म (अंग) है- मुंडन। यहीं से मानसिक संकल्प बनाता है श्राद्धक्रिया का। ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि फिर उक्त शास्त्र-वचन का क्या औचित्य है ? कथन का अभिप्राय समझना जरुरी है। ध्यान देने योग्य बात ये है कि सांगोपांग गयाश्राद्ध सत्रहदिवसीय कर्म है,जो अपने मूलनिवास से प्रारम्भ करके, पुनः मूलनिवास पर ही जाकर समाप्त करना है। गयाश्राद्ध निमित्त पहला पार्वण-पिण्ड अपने कुलदेवता के पास बैठ कर ही किया जाना चाहिए। यहाँ भाव ये है कि हम अपने कुलदेवता से आदेश और आशीष प्राप्त करते हैं- गयाश्राद्ध हेतु। तत्पश्चात् ग्रामदेवी को परिक्रमा पूर्वक प्रणाम करके उनसे भी आशीष और आदेश लेते हैं। तब गयाधाम की यात्रा करते हैं। अगला यानी दूसरा पिण्ड वस्तुतः गया में प्रवेश का ‘पारपत्र’ है। इसके लिए सुविधानुसार समीप में जहां भी पुनपुननदी मिले(गया में प्रवेश से पूर्व) उसे पार करने से पहले ही पिंड देना होता है। प्रसंगवश यहां स्पष्ट कर दूं कि पश्चिम दिशा से गया नगर में प्रवेश करने वालों को गया से ६७कि.मी.पश्चिम में अनुग्रहनारायण रेलवे स्टेशन के समीप पुनपुननदी मिलती है,और उत्तर की ओर से आने वालों को पटना के पास पुनपुन का दर्शन होता है। वहां उतर कर एक पार्वणश्राद्ध करने के बाद ही आगे गया की ओर बढ़ने का विधान है। और तब गया शहर में प्रवेश करके, गयाधाम के अपने तीर्थपुरोहित(गयापाल) का आदेश लेना होता है- श्राद्धकर्म हेतु। तत्पश्चात् गया स्थित फल्गुस्नान और जल-तर्पण करके श्राद्धीय मुख्यकार्य प्रारम्भ होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि गयातीर्थ में प्रवेश से पूर्व ही,गया से बाहर ही,अपने मूलस्थान पर ही मुंडन कार्य सम्पन्न कर लिया गया है। अब यहाँ एक और शंका हो सकती है- कि जो लोग गया शहर के ही मूल वासी या प्रवासी हैं,वे क्या करें? ध्यातव्य है कि उन्हें भी तो एक पिण्ड पुनपुननदी तट पर जाकर देना ही है- आदि गंगा पुनःपुनाः के सिद्धान्तानुसार- क्यों कि पुनपुन ही आदिगंगा है। भले ही गयावासी इसे आलस्य वश अव्यावहारिक कहकर छोड़ देते हैं,या कि पुनपुन निमित्त पिंड भी फल्गु में ही दे देते हैं।

श्राद्ध का अधिकारी कौन-
याज्ञवल्क्यस्मृति के वचन हैं- पुत्रः पौत्रश्च तत्पुत्रः पुत्रिका-पुत्र एव च,पत्नीभ्राता च तज्जश्च पितामाता स्नुषा तथा। भगिनी भागिनेयश्च सपिण्डः सोदरस्तथा,असन्निधाने पूर्वेषामुत्तरे पिण्डदाः स्मृताः।। यानी पुत्र,पौत्र,प्रपौत्र, दौहित्र(नाती-बेटी का पुत्र),श्यालक (पत्नी का भाई),साला का पुत्र,पिता,माता, पुत्रवधु, बहन, भगिना, सहोदर, अन्य गोत्रज- ये सभी क्रमशः पिंड के अधिकारी कहे गये हैं। कुछ ऐसे ही वचन वृद्धहारीस्मृति के भी हैं- पुत्रः पौत्रश्च तत्पुत्रः पुत्रिकापुत्र ह्येव च। पत्नी च भ्रातरश्चैव पिण्डं दातुं यथाक्रमम्।। अर्थात् पुत्र,पौत्र,प्रपौत्र,दौहित्र,पत्नी, भ्राता इत्यादि क्रमशः पिण्ड के अधिकारी हैं। उक्त दोनों वचनों में किंचित भेद है। याज्ञवल्क्य ने पत्नी को ग्रहण नहीं किया है,और श्यालक(साला)को कर लिया है। जबकि वृद्धहारीत ने पत्नी को समुचित स्थान दिया है,और अन्य की चर्चा नहीं किये हैं। एक अज्ञानता पूर्ण लोकरीति है कि पुत्री (बेटी)को पिण्डदान का अधिकार नहीं है। वस्तुतः यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कुरीति का संकेत है। परासरस्मृति के वचन हैं- पितुः पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया। पुत्राभावे हि पुत्री च तदभावे च सहोदरः।। इसका समर्थन हेमाद्रि ने भी किया है- पुत्रो वाप्यथवा पुत्री गयाकृत्यं समाचरेत्। अर्थात् पुत्र को पिता का पिंडदान करना चाहिए।पुत्र के अभाव में(यहां अभाव का दोनों अर्थ हो सकता है- पुत्र हो ही नहीं,या कि पुत्र किसी कारणवश समर्थ न हो श्राद्ध हेतु)पुत्री को अधिकार है कि वह श्राद्ध करे। पुत्री भी न हो वैसी स्थिति में सहोदर को अधिकार मिलता है। इन वचनों से स्पष्ट है कि लोक में ये कुरीति बाद में आयी। स्मृतियों की मान्यता के सम्बन्ध में कहा गया है कि कलियुग में परासरस्मृति के अनुसार ही चलना चाहिए,न कि अन्य स्मृति। चारो युग के लिए चार प्रधान स्मृतियां हैं- सतयुग के लिए मनुस्मृति,त्रेता के लिए याज्ञवल्क्य स्मृति, द्वापर के लिए शंख-लिखितस्मृति(ज्ञातव्य है कि शंख और लिखित नामक दो भाई थे,अतः शंख द्वारा लिखित--ऐसा अर्थ न लगाया जाय) और कलियुग के लिए परासरस्मृति-...कलौपारासरस्मृतौ। अधिकार के क्रम में कुछ और बातों पर भी ध्यान देना जरुरी है। शास्त्रों ने यहाँ तक कह दिया है कि कोई किसी के लिए पिण्डदान कर सकता है। अतः लोकरीति का ध्यान रखते हुए,सुविधानुसार कार्य करना चाहिए।

गयाश्राद्ध की वर्तमान विडम्बना-
विडंम्बना ये है कि लोगों ने इस डायभरसन को ही मुख्य रास्ता समझ लिया गया है। आज की दुर्गति ये है कि कादये से एक भी पिण्ड सही नहीं हो रहा है। प्रत्येक वर्ष कई लाख लोग गया आकर पिण्डदान करते हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनमें शुद्ध श्राद्ध की संख्या अति न्यून है- हजार में एक भी मिलना मुश्किल। सोचने वाली बात है कि एक वेदी पर एक व्यक्ति को विधिवत पार्वणश्राद्ध करने में तीन घंटे लगने चाहिये,जब कि यह काम मुश्किल से पांच-दस मिनट में सम्पन्न करा देते हैं पंडा-पंडित लोग। वो भी,एकल नहीं, बल्कि समूह में बैठा कर—कहीं-कहीं तो लाउडस्पीकर लगाकर।  वैदिक या पौराणिक मन्त्रों की तो बात ही छोड़िये,सही मन्त्रोच्चारण करने वाले सर्चलाइट लेकर ढूढ़ने पर भी शायद ही मिलेंगे। यहां तो सीधे क्षेत्रीय भाषा में चिल्ला-चिल्लाकर पंडित-पंडा बोलते जायेंगे भेड़-बकरियों की तरह समूह में बैठा कर, और आप आंटे की गोलियां डालते जाइये पत्तलों पर—यही है गयाश्राद्ध की वर्तमान स्थिति।
सामान्य लोग तो अज्ञानी हैं,उन्हें क्या पता,पंडित जो करा देंगे, करके चले जायेंगे। किन्तु पेशेवर पंडित को सिर्फ अपना दक्षिणा सूझ रहा है। धर्म और क्रिया से उसे कोई वास्ता नहीं ! इसका ये अर्थ भी नहीं है कि मगध-क्षेत्र में,या खास गयानगर में विद्वान कर्मकाण्डी नहीं हैं। किन्तु जो असली विद्वान हैं,वो इस पेशे से प्रायः दूर रहना चाहते हैं,क्यों कि यहां मूर्खो और ठगों की जमात में उनकी कोई कदर नहीं है।
अतः मैं तो कहता हूँ कि इससे बेहतर है कि आप गयाश्राद्ध ही ना करें। इतनी श्रद्धा से,इतना खर्च करके,समय देकर गयाजी आते हैं श्राद्ध करने, और श्राद्ध के नाम पर ठगे जाते हैं। प्रेम से किसी भूखे को भोजन करा दें,किसी नंगे को वस्त्रदान कर दें,जिस दिन आपके पितरों की तिथि हो। यदि सही मृत्यु-तिथि भी ज्ञात न हो तो अमावश्या को। मूढ़ लोग मेरे इस कटु सत्य से कुपित अवश्य होंगे,किन्तु सत्य तो सत्य होता है— अन्यान्य धार्मिक कृत्यों की तरह गयाश्राद्ध भी आडम्बर,व्यवसाय और ठगी का धंधा बन कर रह गया है। यह कह कर,जता कर मैं किसी को आहत नहीं कर रहा हूँ। ये मेरे दिल का दर्द है,जो पिछले पचीस बर्षों से गयाधाम में रहकर झेल रहा हूँ। आज से बारह वर्ष पहले जब मैं स्वयं गयाश्राद्ध करने को इच्छुक हुआ, तो अच्छे जानकार को ढूढ़ने लगा इस शहर में,और उन्हें अपने मापडण्ड से परखने लगा,किन्तु दुर्भाग्य कि एक दो जो सही थे, वो मेरे औकाद से बाहर निकले, और बाकी तो भेडों की भीड थी। अन्ततः तीन महीने का कठिन परिश्रम करके मैंने स्वयं ही अध्ययन किया श्राद्धविषय का, और तीर्थ-पुरोहित को सिर्फ साक्षी रख कर स्वयं ही, सारी क्रिया सम्पन्न किया,मन्त्र-वाचन से लेकर पिंड-दान-क्रिया तक।

गयाश्राद्ध का अनुभव-पक्ष
ऊपर के विविध प्रसंगों में गयाश्राद्ध के विविध पक्षों पर थोड़ी चर्चा की गयी। श्राद्धीय अधिकार और कर्तव्य पर विचार किया गया। इन सबमें एक बात तो निर्विवाद रुप से कहा जा सकता है कि इस कार्य के लिए श्रद्धा और आस्था अत्यावश्यक है। संसार में बहुत सी वस्तुयें अज्ञात और अदृष्य हैं, किन्तु उन्हें हम स्वीकारने को विवश हैं। सूक्ष्म जगत को जानने,समझने,परखने के लिए सबसे पहले सूक्ष्म जगत के प्रति आस्था होना आवश्यक है। आस्था ही पहला कदम है इस जगत के ज्ञान और अनुभव के लिए।फिर श्रद्धा की बात आती है,और तब शुरु होता है क्रियात्मक पक्ष- लगन और तत्परता सहित। ये सभी घटक जब प्रचुर मात्रा में,शुद्ध रुप से संघीभूत होते हैं,तब अनुभूति-जगत का द्वार स्वतः,शनैः-शनैः खुलने लगता है। यह निहायत व्यावहारिक खेल है। सिद्धान्तों से सिर्फ समीप पहुंचाया जा सकता है- अनुभूति के चौखट तक। अनुभूति प्रकोष्ट में जाना तो स्वयं ही होगा,और बिलकुल स्वार्थीभाव से,अकेले-अकेले। आस्था और श्रद्धा रुपी दो पैरों से,लगन और तत्परता के हाथों से क्रिया में संलग्न हो जायें। अनुभूति का द्वार खुलना शुरु हो जायेगा। इसमें जरा भी विलम्ब नहीं होगा- ऐसा मेरा विश्वास है,और अनुभव भी। और अनुभव की प्रायः बातें गुह्यतम होती हैं। गुह्य होने के पीछे एक बड़ा सा कारण ये भी होता है कि अनुभूति को अभिव्यक्ति देना लगभग असम्भव है। गूंगा गुड़ के बारे में क्या कहेगा? अन्यथा वेद नेति-नेति पर ही ठहर न जाते,कुछ आगे की भी बातें होती। अस्तु।

गयाधाम यात्रा की सावधानियां-
सावधान रहें,किसी दलाल के चंगुल में न फंसें। प्रशासन की ओर से लाख व्यवस्था रहने पर भी लोग ठगी के शिकार हो ही जाते हैं। कुछ असामाजिक तत्व ऐसे होते हैं जो तीर्थ की छवि को विकृत और वदनाम करके,अपना उल्लू सीधा करते हैं। आप कभी भी किसी सामान्य व्यक्ति से सहायता लेने के वजाय प्रशासन से सहयोग लेने का प्रयास करें।
सबसे पहले अपने क्षेत्र के तीर्थपुरोहित यानी पंडाजी का नाम पता ज्ञात कर लें,और प्रशासनिक सहयोगी से वहां तक जाने का मार्ग पूछें। क्यों कि सामान्य से जहां पूछे कि फंसे। स्टेशन पर घूमता कोई भी टीकाधारी खुद को उसी पंडे का आदमी बता देगा,और कमीशन के लिए आपको कही का कहीं पहुंचा देगा।
देश के हर क्षेत्र को गयापालों(तीर्थपुरोहित) ने आपसी सुविधा के लिए बांट लिया है,ये इनकी परम्परागत बातें हैं। आप किस राज्य के किस क्षेत्र के हैं,और आपका गयाशहर में तीर्थपुरोहित कौन है- उसकी जानकारी अति आवश्यक है। यह कार्य गया आने से पहले ही कर लें तो अधिक अच्छा है,या फिर गया पहुँच कर तो अवश्य ही कर लें,अन्यथा ठगी का शिकार होने का ज्यादा खतरा है।
अच्छा होगा कि आप कर्मकाण्ड कराने के लिए पुरोहित अपने साथ लायें,क्यों कि यहां बिलकुल व्यवसायी लोग बैठे हैं,जिन्हें कर्मकाण्ड से कोई मतलब नहीं,सिर्फ अपनी दक्षिणा से मतलब है। गया आकर यहां के तीर्थपुरोहित(गयापाल) से आदेश लें,कार्य की समाप्ति पर उन्हें उनका यथोचित सम्मान और दक्षिणा देकर सुफल आशीष प्राप्त करें। जो असली पंडा यानि गयापाल पुरोहित हैं, वे बड़े ही सज्जन हैं। किसी से मुंह खोल कर या जोर-जबरदस्ती करके कुछ मांगते नहीं। जो मिल जाय- दान-दक्षिणा खुशी से स्वीकार करते हैं। समस्या तब होती है,जब बीच में कोई दलाल पड़ जाता है। अतः सावधान रहें,सुखी रहें। मेरी यही कामना है।

गयाश्राद्ध सम्बन्धी जानकारी के लिए सर्वोत्तम पुस्तक-
ऐसे तो बाजार में अनेक पुस्तकें भरी पड़ी हैं। किन्तु गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित- गयाश्राद्धपद्धति मेरे विचार से सरल और सर्वोत्तम पुस्तक है। इसकी कीमत वर्तमान में मात्र बीस- 20 रुपये है। इसके साथ ही वेदियों आदि की जानकारी के लिए गया-महात्म्य नामक पुस्तिका भी ले सकते हैं। अस्तु।
विशेष जानकारी हेतु आप हमसे सम्पर्क कर सकते हैं- 
email- guruji.vastu@gmail.comया कॉल करें- 08986286163 पर।


                      गयाश्राद्ध-सामग्री

घर का सामान-
आटा गूथने के लिए पीतल का भगौना(टोपिया),पीतल की बाल्टी, पीतल की थाली-2 पीतल का लोटा,पीतल का पंचपात्र और आचमनी,पीतल का अखंड दीप या रक्षादीप-2, फूल की कटोरी-पंचामृत बनाने के लिए,चम्मच-2, कैंची, चाकू। सफेद कम्बल का आसनी(पति-पत्नी के लिए),

नदी में स्नान ऐसा कपड़ा पहन कर करें जिसे वहीं छोड़ दिया जाए।

प्रथम तर्पण के पश्चात् श्राद्धकर्म करने के लिए पति-पत्नी के लिए वस्त्र नया होना चाहिये। साथ ही ग्रन्थिबन्धन के लिए चादर भी जरुरी है।

बाजार का सामान-
अरवा चावल-500ग्राम,
कालातिल-250ग्राम.
जौ-100ग्रा.
कुश- एक मुट्ठा
घी-250ग्राम.
गाय का घी-50ग्रा.
तिल का तेल-100ग्रा.
अष्टगन्ध चन्दन-25ग्रा
रोली-25ग्रा
सिन्दुर-25ग्रा
अबीर-.25ग्रा
चावल का आटा250ग्रा
जौ का आटा- 2किलो
लौंग-इलाइची-25ग्रा
कपूर-25ग्रा
माचिस-2
रुईवत्ती गोल वाला 50पीस
कच्चा धागा-एक लच्छी
जनेऊ-दो बंडल(50पीस)
शहद-छोटी शीशी
गुड़-500ग्राम
जलदार नारियल 1 गोला(बिना छिलका वाला)
सूखा नारियल गोला 2 पीस
छुहारा-250ग्रा.
किसमिस-250ग्रा.
काजू-250ग्राम(कहीं-कहीं काजू का निषेध भी मिलता है)
चिरौंजी-250ग्राम
सुपारी-100ग्राम
पीला सरसो-100ग्राम
गायत्रीपूजा धूप-2पैकेट
मिट्टी का दीया-50पीस
पत्तल-एक बंडल
फल- केला छोड़ कर कोई भी मौसमी फल 40पीस (सेव,अमरुद इत्यादि,क्यों कि केला श्राद्धकर्म में निषिद्ध माना गया है।)
पेड़ा – एक किलो(50पीस)
खुदरा पैसा-सिक्का-100
नगद दक्षिणा-यथाशक्ति(2+2+2+2)कुल आठ जगह देना है।
दूध-एक पाव,
दही-50ग्रा.
पान पत्ता-50
तुलसी पता
दूर्वा-1 मुट्ठा
सादा फूल-20रु.
माला-2 या 5 पीस

नोटः- ये सामग्री विधिवत पार्वण हेतु एक दिन के लिए है। एक दिन में प्रायः दो -तीन वेदियों पर क्रिया करनी होती है। किसी किसी दिन वेदियों की संख्या अधिक भी हो जाती है। इसकी पूरी जानकारी वेदिनामा से प्राप्त होगी।

श्राद्धान्त दान के लिए सामग्रीः-धोती,चादर, गमछा, कुर्ता का कपड़ा,साड़ी,साया,व्लाउज,रुमाल, विछावन के कम्बल या तोषक,विछावन का चादर, तकिया,मच्छरदानी,छाता,जूता,चप्पल,माला, पीतल का टोपिया,कलछुल,कड़ाही,थाली,लोटा, गिलास,बाल्टी,कम्डल,चौकी,खटिया इत्यादि श्रद्धा के अनुसार।

भोजनसामग्री-चावल,आटा,घी,गुड़,चीनी,हल्दी, गरम मसाला, नमक,दाल,सब्जी,फल इत्यादि।
भोजन दक्षिणा- यथाशक्ति
सुफल दक्षिणा-तीर्थपुरोहित हेतु यथाशक्ति (सोना-चांदी हो तो अधिक अच्छा)
आचार्य दक्षिणा- यथाशक्ति(सोना-चांदी हो तो अधिक अच्छा)
                     ----)(----

इस आलेख से यदि यत्किंचित भी किसी को दिशा- 

निर्देश मिला,तो मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।


Sunday, 17 July 2016

अभ्यासी की पीड़ा

अभ्यासी की पीड़ा
साधक और अभ्यासी में बहुत बड़ा अन्तर होता है,भले ही प्रायः अभ्यासी स्वयं को साधक समझने की नादानी कर बैठता है। ये कुछ वैसा ही है जैसे LKG का बच्चा स्वयं को कॉलेज स्टूडेंट समझने लगे। हमारे यहां पहले विधिवत खल्ली छुआने की प्रथा थी। खल्ली छुआना यानि कि अक्षरारम्भ का श्रीगणेश—काठ का स्लेट,और खड़िया,जिसे विधिवत पूजा करके,अक्षरारम्भ- अ आ इ ई की शुरुआत होती थी। बहुत बाद में कॉपी-पेन्सिल,और फिर कलम पकड़ने का सौभाग्य होता था। किन्तु अब तो सब कुछ बदल गया है। शुरुआत ही होती है शानदार कॉपियों और बहुत तरह के तामझाम से।

  साधना जगत में भी कुछ ऐसी ही बात है। धर्म की बड़ी-बड़ी दुकानें सजी हैं। जैसी क्षमता है आपकी शुल्क अदायगी की,वैसा आश्रम मिल जायेगा। संस्कारों की पुरानी खूंटियां उखड़ने-उखाड़ने की बात ही बेमानी है। नयी खूँटी गाड़ दी जाती है—गुरुजी का लॉकेट गले में मंगलसूत्र की तरह लटका दिया जाता है,और एक तसवीर भी थमा दी जाती है—वस इन्हें पूजते रहो,सब कुछ मिलता जायेगा...। वैसे मिलना क्या है,दुनिया से बाहर की कोई चीज चाहिये भी किसको ! किसी को धन चाहिए,किसी को सन्तान,किसी को सरकारी नौकरी,किसी को ऊँची वाली कुर्सी और वंगला। किन्तु इन सबसे अलग हट कर,असली चीज की चाह ही कितनों के पास होती है ! और जब चाह ही नहीं है,फिर खोज क्योंकर होगी। वास्तविकता ये है कि नकली और नकलची की दुनिया में असली कहीं गुम हो गया है। किन्तु सच्चाई ये है कि वह अभी तक कहीं दूर नहीं गया है। दूर जा भी नहीं सकता है,क्यों कि हमें तो नहीं,परन्तु उसे बखूबी पता है कि दूर जाया ही नहीं जा सकता। काया से छाया की दूरी कैसे हो सकती है ! वो तो एक सुनिश्चित दूरी बनाये रहेगा,और बिलकुल पास ही होगा,अपने ही अन्तर्तम में,कहीं द्वादश-दल-पद्मों में...और हम हैं कि कस्तूरी मृग की भांति मारे-मारे फिर रहे हैं—बाहर-बाहर—ईंट-पत्थर के मन्दिरों में...तीर्थो में... यहां...वहां...वहां जहां वह कभी नहीं रहा है। अस्तु।

Sunday, 10 July 2016

न्यासःपरिचय और प्रयोग

न्यासःपरिचय और प्रयोग
          साधना जगत में संकल्प और विनियोग के बाद बात आती है न्यास की;तत्पश्चात् ही ध्यान,पटल, कवच, स्तोत्र,हृदयादि-पाठ-जपादि का विधान है। न्यास अपने आप में साधना नहीं है,प्रत्युत साधना की तैयारी है—तद्वांछित योग्यता प्राप्ति का प्रयास। संकल्प की थोड़ी गहराई में है विनियोग,और उससे भी गहरे में है न्यास। किन्तु मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि न्यास साधना-भवन का शिलान्यास है... आधारशिला है। यदि इसका स्थापन ही दुर्बल हुआ तो भवन कैसा होगा? ये बात अलग है कि विभिन्न साधनाओं में शब्दों और क्रियाओं में किंचित भेद हो,पर मूल बात वही है।
न्यास के सम्बन्ध में अबतक मैंने जो पढ़ा-समझा-जाना,अनुभव किया, उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। उच्च साधकों की दृष्टि में, यह मेरी बचकानी हरकत कही जा सकती है; किन्तु नये जिज्ञासुओं के लिए शायद बहुत उपयोगी हो जाय।
शास्त्रों में कहा गया है कि न्यास करने से साधक का शरीर साधनार्थ आवश्यक योग्यता प्राप्त करता है। साधक में देव-भाव की उत्पत्ति होती है। साधना का मूल सिद्धान्त है कि देवता जैसा बन कर ही देवोपासना की जा सकती है, की जानी चाहिए भी। न्यास-विधान इसी का क्रियात्मक स्वरुप है।
 असधातु में नि उपसर्ग लगाने पर न्यास शब्द बनता है। असधातु के मुख्यतः दो अर्थ हैं—क्षेपण करना और स्थापन करना। जिसका जो स्थान नहीं है,यदि वह वहां बैठा हो, तो उसे वहां से हटा कर, वहां के उचित स्वामी को प्रतिष्ठित करना ही न्यास है।
शास्त्र वचन है—शरीरमाद्यंखलुधर्मसाधनम्।। साधना का आदि (बुनियादी)साधन शरीर ही है। इसके अंग-प्रत्यंग का जबतक शुद्धिकरण नहीं होगा, तबतक साधना में वह सहायक कैसे हो सकेगा! स्नान, आचमन,प्राणायाम आदि क्रियाओं द्वारा शरीर का शोधन ही किया जाता है। विविध प्रकार के न्यासों का भी कुछ ऐसा ही उपयोग है। दूसरी बात है कि शरीर के प्रति ममत्व-भाव होता है—मेरा सिर,मेरा मुख...। इससे इन अंगों का वास्तविक महत्त्व वैचारिक या भावनात्क रुप से पिछड़ जाता है,जिसके कारण क्रिया में  त्रुटि आती है,फलतः सफलता-प्राप्ति में विलम्ब होता है। अतः विविध अंगों को साधनागत भाव से परिपूर्ण करना ही न्यास का उद्देश्य है।
मूलतः यह तन्त्र का विषय है,(तन्त्र का एक अर्थ विधि भी तो है)। साधक और साधना के स्तर के अनुसार इसका क्रमिक अधिग्रहण होता है। प्रारम्भ में मात्र अंगादि के स्पर्श का ही निर्देश होता है; किन्तु प्रायः लोग आजीवन यही करते रह जाते हैं-- यहीं चूक हो जाती है। खड़िया-पट्टिका लिए हुये, महाविद्यालय की ओर प्रस्थान करते हैं,और वाह्य परिसर का चक्कर लगाते रह जाते हैं। इसके आगे की क्रियाओं के साथ भी यही बात होती है। बातें गुरु-गम्य होने के कारण स्पष्ट नहीं हो पाती। प्रायोगिक पक्ष तो प्रायोगिक ही हुआ करता है। फिर भी प्रारम्भ में सैद्धान्तिक पक्ष पर चर्चा की जा सकती है। की जानी भी चाहिए, अन्यथा मूल के विनष्ट(लुप्त)होने का खतरा हो सकता है। वैसे सौभाग्य से जिन्हें योग्य गुरु  प्राप्त हों, उनके लिए सिद्धान्त गौंण हो जाता है। वे तो सीधे प्रयोग में उतर जा सकते हैं।
साधना में विविध प्रकार के न्यास की चर्चा है, यथा- )अंगन्यास(षडंगन्यास)-करन्यास,)ऋष्यादि-न्यास,)मन्त्र-न्यास,)मातृका-न्यास (वहिर्मातृका,अन्तर्मातृका),)व्यापक-न्यास,)षोढा-न्यास इत्यादि। तथाच—सारस्वत-न्यास—अस्मिन्सारस्वते न्यासेकृते जाड्यं विनश्यति।।मातृकागण-न्यास-तृतीयेस्मिन्कृते न्यासे त्रैलोक्यविजयी भवेत्।। षड्देवीन्यास—तुर्यं न्यासं नरः कुर्याज्जरा मृत्युं व्यपोहति ।। ब्रह्माख्यन्यास—कृतेस्मिन्पञ्चमे न्यासे सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।। महालक्ष्म्यादिन्यास—धनाप्ति।। बीजमन्त्रन्यास—रोगनाशक , विलोमबीजन्यास—दुःखहारी , मूलमन्त्रन्यास—स्वरुप-प्राप्ति ।। किंचित भिन्न रीति से मूलमन्त्रन्यास—कृतेस्मिनदशमे न्यासे त्रैलोक्यं वशगं भवेत्।। कवच-मन्त्र-न्यास—1.ऐं बीजयुक्त, 2.ह्रींबीजयुक्त, 3.क्लींबीजयुक्त।। तथाच— मूलषडंगन्यास,अक्षरन्यास, दिङ्गन्यास इत्यादि ।।)
यहां, इन सब पर थोड़ी चर्चा कर ली जाय—
.षडङ्गन्यास— वस्तुतः करन्यास और अंगन्यास दोनों इसके ही प्रभेद हैं। पहले दोनों हाथों की अंगुलियों का क्रमशः आपस में मन्त्र-पूरित-स्पर्श करते हैं। यथा—अंगूठा,तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा। तत्पश्चात करतल और करपृष्ठ का स्पर्श किया जाता है। प्रायः लोग यहां भ्रमित होते हैं कि ये स्पर्श कैसे हो,यानी दोनों हाथ अलग-अलग कार्य करें या कि एकत्र? मेरे विचार से अलग-अलग का कोई औचित्य नहीं है। सबका स्पर्श तो अंगूठे से कर लेंगे,किन्तु अंगूठे का स्पर्श कौन करेगा- ये बचकाना सवाल उठता है। वस्तुतः यह प्रश्न इस कारण उठता है क्योंकि अंगुलियों का रहस्य हमें ज्ञात नहीं होता।  ज्ञातव्य है पांच अंगुलियां— अंगूठा,तर्जनी,मध्यमा,अनामिका और कनिष्ठा क्रमशः आकाश,वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन पांचों का ही ऋण-धन क्रम से दाहिना-बायां,और ऊपर-नीचे(उर्ध्वांग-निम्नांग) हाथ-पैर के प्रशाखाओं के रुप में(सहयोग से) पंचतत्त्वों का नियन्त्रण होता है,और ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति—मानव-शरीर(पिण्ड) की सार्थकता सिद्ध होती है। ऋण-धन के आपस में वैधिक-मिलन से ही ऊर्जा प्रवाहित होती है। और यही तो करना है-न्यास में— ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का पिण्डीय ऊर्जा में अवतरण का प्रयास। ध्यातव्य है कि दायें हाथ के अँगूठे का स-मन्त्र बायें हाथ के अंगूठे से स्पर्श अनुभव-पूर्ण होना चाहिए। स्विच के नेगेटिव-पोजेटिव प्वॉयन्ट को  जोड़े और बत्ती न जले—इसका मतलब है कि तार जोड़ने में कोई त्रुटि रह गयी है,यानी कि ठीक से जोड़ें। और आगे, इसी भांति क्रमशः शेष चार अंगुलियों का,और फिर करतल और करपृष्ठों का एकत्र रुप में। यथा—ऊँ...अंगुष्ठाभ्यां नमः, ऊँ...तर्जनीभ्यां नमः, ऊँ...मध्यमाभ्यां नमः,ऊँ...अनामिकाभ्यां नमः,ऊँ...कनिष्ठाभ्यां नमः, ऊँ...करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। यही करन्यास कहलाया। उच्चारण और स्पर्श पूर्णतः अनुभूति पूर्ण हो,तभी न्यास सार्थक होता है। बिलकुल प्रारम्भ में सिर्फ अंगादि का स्पर्शानुभव ही पर्याप्त है,यानी अ-मन्त्र। बाद में इस क्रिया को स-मन्त्र करने का अभ्यास करे। करन्यास प्रायः सभी देवोपासना में समान ही है,सिर्फ तत्तद् देवों का मन्त्र-पाद परिवर्तित होता है। उपासना का प्रधान अंग होते हुए भी,नये अभ्यासियों को इसे स्वतन्त्र रुप से भी करने का अभ्यास करना चाहिए, ताकि साधना काल में अनुभूति और गहन हो सके।
अगले चरण में पुनः हृदयादि अंगों का क्रमशः स्पर्श किया जाता है- तत्मन्त्रों के मानसिक उच्चारण पूर्वक। किन्तु अंगन्यास में काफी भेद है,या कहें संकोच और विस्तार क्रम है। छः से लेकर चौवन तक के क्रम मिलते हैं करीब। अलग-अलग मन्त्रों, देवों,साधना-पद्धतियों में अंगादिन्यास का स्थान-वैभिन्य विविध रुप में व्यवहृत होता है। इसे ऋषियों का मतान्तर न कह कर,क्रियात्मक भेद ही समझना चाहिए। किन्तु इन सब भेदों-प्रभेदों से अलग हट कर सर्वमान्य या कहें प्रारम्भिक हृदयादि न्यास का  क्रम यही है— ऊँ...हृदयाय नमः,ऊँ...शिरसे स्वाहा, ऊँ...शिखायै वषट्, ऊँ...कवचाय हुँ, ऊँ...नेत्रत्रयाय वौषट्(कहीं नेत्राभ्यां भी मिलता है), ऊँ... अस्त्राय फट्। इस सम्बन्ध में ज्ञानार्णवतन्त्रम् में कहा गया है—हृदयं च शिरो दवि ! शिखां च कवचं ततः। नेत्रमस्त्रं न्यसेत् ङेन्तं, नमः स्वाहा क्रमेण तु ।। वषट् हुं वौषडन्तं च,फडन्तं योजयेत् प्रिये ! षडङ्गोयं मातृकायाः,सर्वपाप हरः स्मृतः।। यानी अंगन्यास में विहित मन्त्र-पाद के साथ क्रमशः नमः, स्वाहा, वषट्, हुँ, वौषट् और फट् का प्रयोग किया जाना चाहिए। कहीं-कहीं विशिष्ट निर्देश भी होते हैं कि करन्यास में भी अंगन्यास की तरह ही उक्त षट् पदों का प्रयोग किया जाय। ऐसी स्थिति में गुरु-निर्देश की ही प्राथमिकता होगी। षडङ्गन्यास के करने में इष्ट-मन्त्र-बीज को ही छः दीर्घस्वरों से युक्त करके,तत्तद् अंगों में प्रतिष्ठा करने की भावना की जाती है। कुछ मन्त्रों के षडंगन्यास में उनसे सम्बन्धित विशिष्ट देवतात्मक पदों की योजना करने की विधि भी मिलती है। हालांकि सबका उद्देश्य (लक्ष्य) मात्र एक ही है—देवमय होने का प्रयास।
अब उक्त षट् प्रयुक्त पदों को क्रमशः स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है-
(क)  हृदयादि न्यास का पहला पद है नमः,और न्यास स्थान है- हृदय। ध्यान देने की बात है कि  नमन (झुकना) में विनम्रता छिपी है,जो उदण्डता के विपरीत है। इस भावगत वृत्ति का स्थान है- हृदय। प्रेम,करुणा,विनम्रता आदि यहीं के विषय हैं। प्रेम निस्सीम होता है,यानी इसकी सीमा में सब कुछ समा जा सकता है। ध्यातव्य है कि प्रेम और भक्ति का मूल स्थान हृदय ही है। इस न्यास का उद्देश्य है- समस्त अनात्म पदार्थों से विवेक पूर्वक स्वयं को विलग करने का प्रयास। दाहिने हाथ की पांचो अंगुलियों को एकत्र करके,उसके अग्रभाग से हृदय-प्रान्त का मृदु स्पर्श करके, इस न्यास को धारित किया जाता है।
(ख) हृदयादि न्यास का दूसरा पद है- स्वाहा,जिसका आशय है आत्मा को शीर्ष स्थान पर स्थापित कर,स्वयं को उसके समक्ष समर्पित कर देना। साधक का सबसे बड़ा बाधक- अहं के विसर्जन का इससे सुन्दर और क्या उपाय हो सकता है! इसकी मुद्रा है- दाहिने हाथ की प्रशस्त हथेली का कोमल स्पर्श अपने शिरोभाग(मध्य)में करना। ध्यातव्य है कि परमगुरु का स्थान शीर्षप्रान्त ही कहा गया है। योगियों की भाषा में जो सहस्रपद्म-स्थल है।
(ग)   हृदयादि न्यास का तीसरा पद है- वषट्,और इसका स्थान है- शिखा,जो तेज का प्रतीक है। आराध्य(इष्ट)के तेज को आत्मसात करने का प्रयास है इस न्यास के द्वारा। आधुनिक भाषा में समझें तो कहा जा सकता है कि मानव-शरीर का एन्टीना है शिखा-प्रदेश। बाह्यतेज(देवतेज)का संग्रहण इसी विन्दु से होता है। भले ही आज इसकी महत्ता को लोग विसार दिये हैं। आत्मा के तेजोमय स्वरुप का अनुभव किया जाता है इस न्यास से,जिसकी मुद्रा है- दाहिने हाथ की शेष चार अंगुलियां मुट्ठी बन्द करने जैसी बन्द होंगी,और सिर्फ अंगूठा खुला रहेगा,जिससे शिखा-देश का स्पर्श किया जाना चाहिए, इस भावना के साथ कि दिव्य शक्ति का अवतरण हो रहा है हमारे अन्दर, ठीक वैसे ही जैसे एन्टीना केबल को उपकरण से जोड़ कर हम आश्वस्त हो जाते हैं कि अब वांछित दृश्य हम देख पायेंगे दूरदर्शन पर।
(घ)  हृदयादि न्यास का चौथा पद है- हुं,जिसका सम्बन्ध कवच(सुरक्षा-उपकरण,आच्छादन) से है। इस न्यास के द्वारा साधक सर्वात्मदेह से आच्छादित होकर,सर्वथा सुरक्षित होने की भावना करता है,जिसके परिणाम स्वरुप दूसरे के लिए भयप्रद और स्वयं के लिए रक्षाकारी तेजोदीप्त होता है। साधक-शरीर के बाह्य मंडल में अदृश्य सुरक्षा-कवच(घेरा)पड़ जाता है,जो अभेद्य है। इस न्यास को करने की मुद्रा है—दाहिने हाथ की कनिष्ठा मूल(अंगुली जहां हथेली से जुड़ रही है)से प्रहार करने जैसी मुद्रा में अपने बायीं बाजू का स्पर्श करना है,और ठीक ऐसी ही क्रिया बायें हाथ से दाहिने बाजू पर भी करनी है। इस प्रकार हृदय स्थल के सामने दोनों हाथों का क्रॉस बन जायेगा,जो हृदय पर भी सुरक्षा-घेरा का कार्य करेगा।
(ङ)  हृदयादि न्यास का पांचवां पद है- वौषट् और इसे न्यस्त करने का स्थान है— नेत्र-क्षेत्र। देखने को तो हमारी दो ही आँखें हैं,किन्तु योगशास्त्र हमारे एक और नेत्र की ओर इशारा करता है,जो कि भ्रूमध्य में सुप्तावस्था में पड़ा है। इसे चैतन्य करने हेतु स्मरण दिलाना ही इस न्यास का उद्देश्य है। इस न्यास में दाहिने हाथ की तर्जनी,मध्यमा और अनामिका अंगुलियों का प्रयोग करते हैं,जिनमें तर्जनी दाहिनी आंख को ईंगित करती है,अनामिका बायीं आँख को,और मध्यमा उस सुप्त नेत्र का संकेत देता है। ध्यातव्य है कि मध्यमा अग्नितत्त्व का प्रतिनिधि है,और आँख अग्नितत्त्व का ज्ञनेन्द्रिय। मध्यमा की मध्यस्थता में सुप्तनेत्र को चैतन्य करने का प्रयास किया जाता है इस क्रिया में। योगशास्त्र इस स्थान को आज्ञाचक्र चक्र कहता है,जिसका उपयोग साधकों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। आत्मतत्त्व के यथार्थ ज्ञान की कुंजी यहीं से प्राप्त होती है।
(च) हृदयादि न्यास का छठा और अन्तिम पद है—फट् । वस्तुतः यह अस्त्र है- अस् और त्रस् धातुओं से बना हुआ, जिसका अर्थ है फेंकना और जलाना। इसके द्वारा साधक त्रिविध—दैहिक, दैविक,भौतिक तापों का निवारण करता है,ज्ञानाग्नि में भस्म करने की भावना करता है। इसे न्यस्त करने की विधि है- दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा को खुला रखते हुये,यानी अनामिका और कनिष्टा को अंगूठे से दबाकर,बायीं ओर से (घड़ी की विपरीत दिशा में- anticlockwise ) घुमाकर सामने लाते हैं,और बायीं हथेली पर प्रहार करते हैं,जिससे तीब्र चटकार की ध्वनि निकलती है। ध्यातव्य है कि अग्नितत्त्व- मध्यमा और वायुतत्त्व- तर्जनी के संयोग से ये क्रिया हो रही है। वायु की मैत्री से अग्नि प्रचंड होता है,और चितादाह में चटकार की ध्वनि स्वाभाविक है। यानि प्रचंड वेग से त्रिविध तापों की चिता जलायी जारही है—यही भावना करते हैं इस महत्त्वपूर्ण न्यास में।
(नोटः- उक्त षडङ्गन्यास (करन्यास, अंगन्यास)बिलकुल प्रारम्भिक क्रिया है,और प्रायः छोटी-बड़ी सभी साधनाओं में लगभग समान रुप से व्यवहृत है; किन्तु इसके आगे के न्यास साधक और साधना के स्तर के अनुसार न्यूनाधिक रुप से प्रयुक्त होते हैं। और दूसरी बात इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि आगे प्रयुक्त न्यास क्रमशः उत्तरोत्तर साधना के भी द्योतक हैं। विशेषकर ऋष्यादिन्यास और मन्त्र-न्यास  के बाद किये जाने वाले मातृकादि न्यास तो विशिष्ट साधकों के लिए ही हैं। सामान्य पूजा में इनकी कोई खास आवश्यकता नहीं है।)
() ऋष्यादिन्यासकृतेनयेन देवस्य सारुप्यं याति मानवः।। तथाच- ऋषिच्छन्दो देवतानां विन्यासेन विना, जप्यते साधितोऽयेष तुच्छ फलं भवेत् ।। अर्थात् ऋषि, छन्द,देवता का विन्यास किए विना,जो मन्त्र-जप किया जाता है,उसका फल तुच्छ यानी न्यून हो जाता है। अतः साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए न्यास द्वारा इनसे तादात्म्य स्थापित करना परमावश्यक है। हम पाते हैं कि प्रायः मन्त्र या स्तोत्र के विनियोग में ही इन बातों की चर्चा रहती है,यानी जिस मन्त्र का हम जप करने जा रहे हैं, अथवा स्तोत्र-पाठ करने जा रहे हैं,उसके ऋषि,छन्द और देवता कौन हैं- यह जानना-करना आवश्यक है। कहीं-कहीं और भी कुछ चर्चा जुड़ी रहती है,यथा- बीज,शक्ति,कीलक,और अभीष्ट फल। यानी कहीं मात्र तीन की,तो कहीं कुल सात बातों की चर्चा रहती है। नियम है कि जहां जितनी बातों की चर्चा हो,वहां साधना में उतने का ही प्रयोग किया जाना चाहिए,अन्यथा क्रिया न्यूनाधिक दोष-युक्त(त्रुटि-पूर्ण) कही जायेगी,और परिणाम भी तदनुरुप ही होगा। पूर्व निर्दिष्ट षडंगन्यास (करन्यास-अंगन्यास) के पश्चात् सप्तांग वा त्रयंग ऋष्यादिन्यास करने का विधान है। प्रसंगवस इन सातों से थोड़ा परिचय प्राप्त किया जाय—
अ.     ऋषि- यह शब्द गत्यर्थक धातु,और षिङ् प्रापणे प्रत्यय से बना है। अभिप्राय है कि जो मन्त्र-गति से, अर्थात् त्वरित गति से परमात्मा के स्वरुप को प्राप्त करता है,वह साधक ही ऋषि है,जिसे मन्त्र-द्रष्टा ऋषि कहते हैं। किसी वस्तु का कोई न कोई मूल(आदि) स्रष्टा होता ही है-यह तय है। मन्त्र-दीक्षा लेकर,साधना-क्रम में साधक ऋष्यादि न्यास द्वारा उस ऋषि से तादात्म्य स्थापित करता है,और तब वह अपनी साधना-द्वारा उस ऋषि के ही समान मन्त्र-गति से परमात्मा तक पहुँचता है (अभीष्ट फल प्राप्त करता है)। चुँकि परमात्मा और गुरु का स्थान शिर में सर्वमान्य है,अतः मन्त्र के ऋषि का न्यास शिर में ही किया जाना चाहिए। शिर के स्पर्श की विधि(मुद्रा)पूर्व निर्दिष्ट अंगन्यास के अनुसार ही,यानी दाहिने हाथ की चारो अंगुलियों(अंगूठा रहित)के अग्रभाग से शिरोदेश का मृदु स्पर्श सानुभूति पूर्वक (सहानुभूति नहीं)।
आ.   छन्द- छन्द शब्द में इच्छा वाचक,और दानार्थक है- देने अर्थ में। इस प्रकार अभीष्ट फल देने वाला मन्त्र ही है,जो गुरु-मुख से प्राप्त होता है,शिष्य की कर्ण-गुहा में। इस क्रम में आत्मज्योति मूलाधार से उठ कर हृदयादि से होते हुए,सहस्रदलपद्म में आकर प्रतिष्ठित होती है। मन्त्रमय छन्द का न्यास मुख में किया जाना चाहिए,क्यों कि साधक द्वारा जो मन्त्रोच्चारण किया जायेगा- अक्षरों का,उसका स्थान मुख ही है। मुख में छन्द-न्यास करने की मुद्रा वैसी ही होगी,जैसे पांचों अंगुलियों को एकत्र करके हम भोज्य-ग्रास लेते हैं। इस सम्बन्ध में ध्यान दिलाना चाहेंगे कि साधक का भोजन हाथ से ही होना चाहिए,न कि आधुनिक उपकरण- कांटे-चम्मच से, क्योंकि उपकरणों की सहायता से लिया गया ग्रास पंचतत्त्वात्मक ऊर्जा से वंचित रह जाता है।
इ.      देवता- दिव धातु से बने देव शब्द में भावार्थक तल प्रत्यय या कि विस्तारार्थक तनु धातु से बने ‘त’ शब्द संयोग है। तात्पर्य है सर्वात्मना देवत्व(देव-भाव)प्राप्त करना,जिसका मूल स्थान हृदय है। अतः देवता का न्यास यहीं करना चाहिए। न्यास की यहां मुद्रा होगी- खुली हथेली से हृदय का सानुभूति पूर्वक स्पर्श।
ई.      बीज- बीज वीर्य या रज(पुरुष-स्त्री)का प्रतीक है,जिसका स्थान क्रमशः लिंग वा योनि है। यहीं आसपास मूलाधार की भी स्थिति है।( यहां आसपास शब्द से नये अभ्यासी भ्रमित नहीं होंगे,उन्हें इस कथन में कुछ विसंगति लग सकती है)। साधना क्रम में बीज के न्यास (स्थापना) का तात्पर्य है कि समुचित स्फुरण और विकास कुण्डलिनी के साथ ऊर्ध्वमुखी हो,और समुचित फल साधक को प्राप्त हो सके। इस प्रकार निश्चित है कि बीज-न्यास का स्थान पुरुष में लिंगप्रदेश,और स्त्री में योनिगुहा (उच्च साधक के लिए- सीधे मूलाधार) में ही होना चाहिए। इसकी मुद्रा होगी- दाहिने करतल को पीछे लेजाकर,गुद-प्रान्त का वाह्य स्पर्श।
उ.      शक्ति- शरीर को चलायमान बनाने का काम पैरों का है। अतः मन्त्र-शक्ति का न्यास पैरों में होना चाहिए। मुद्रा होगी- बारी-बारी से दोनों पैरों का सामान्य स्पर्श।
ऊ.     कीलक- शरीर का केन्द्र नाभिमंडल है। कीलन का कार्य यहीं किया जाता है। यह भी एक प्रकार का सुरक्षा-कवच है,किन्तु कवच से जरा भिन्न है-अवरोधात्मक रुप से। इसे केन्द्रीकरण भी कह सकते हैं। पूरी शक्ति को एकत्र कर के रख देने जैसा,जहां पूरी तरह सुरक्षा मिल जाय। इस कीलन के विपरीत की क्रिया निष्कीलन की होती है,जिसका प्रयोग विशेषरुप से कीलित मन्त्रों के लिए करना अनिवार्य होता है। निष्कीलन न्यास का अंग नहीं है। कीलक के प्रयोग के समय तत्मन्त्र का मानसिक उच्चारण करते हुये,अपनी चेतना को नाभिकेन्द्र पर केन्द्रित करना चाहिये,तथा दाहिने अंगूठे से नाभिगह्वर का स्पर्श करे।
ऋ.   अभीष्ट फल- ऋष्यादि न्यास का अन्तिम चरण है यह । वांछित क्रिया का समुचित परिणाम प्राप्त होना ही साधक का अभीष्ट होता है। वस्तुतः यह प्रार्थीभावावतरण की क्रिया है। अतः इस न्यास की मुद्रा होगी- खुली हुयी अञ्जलीद्वय(दोनों हाथ को एकत्र कर भिक्षा मांगने जैसी)को हृदय(भाव-केन्द्र)के समीप रख कर,विहित मन्त्र-पद का मानसिक उच्चारण। इस न्यास के समय साधक अनुभव करे कि इष्ट की कृपा बरस रही है उस पर।
) मन्त्र-न्यास— साधक  दीक्षा-ग्रहण के समय गुरु-प्रदत्त मन्त्र को श्रद्धापूर्वक ग्रहण करता है,जिसे समयानुसार साधा जाता है। साधना-काल में पूर्व न्यासों के सम्पन्न होजाने के बाद,दीक्षा-मन्त्र(वा अभीष्ट मन्त्र) का मानसिक उच्चारण करते हुए, स्थिर चित्त से भावना करे कि उक्त मन्त्र की दैवीऊर्जा हमारे शरीर पर बरस रही है। इस प्रकार साध्य मन्त्र से एकात्मता प्राप्त करन का प्रयास किया जाता है।
) मातृका-न्यास— जैसा कि इस न्यास के नाम से ही स्पष्ट है- इसमें मातृकाओं अर्थात् वर्णों(अक्षरों)की स्थापना शरीर के विशिष्ट अंगों में विधि पूर्वक की जाती है। अकारादि वर्णमाला का ही सांकेतिक नाम मातृका है। वर्ण या अक्षर शब्द-ब्रह्म या वाक् शक्ति के स्वरुप हैं। इनका सूक्ष्म रुप विमर्श-शक्ति के नाम से ख्यात है,जिसे परावाक् कहतें हैं, जिसमें स्फुरणा मात्र होती है। यही मातृका या चैतन्यात्मक शब्द-ब्रह्म हमारे शरीर में कुण्डलिनी के रुप में व्यक्त हुयी है। मातृका-स्वरुप-वर्ण-माला के एक-एक अक्षर का विशद वर्णन विविध तन्त्र-शास्त्रों में उपलब्ध है। मातृका शब्द यहां अपने मूल(प्रचलित)अर्थ में भी स्पष्ट है— मातृ (माँ) के बिना सृजन-प्रक्रिया असम्भव है। ज्ञातव्य है कि सृष्टि का सृजन  वर्णों (ध्वनियों) से ही हुआ है। मातृका शब्द से विश्व को उत्पन्न करने वाली नादात्मिका शक्ति का बोध होता है। अतः ये मातृकाएँ साक्षात् शक्ति-स्वरुपा हैं। भावना-योग द्वारा इन्हें शरीर के अंगों में न्यस्त करके, साधक विशिष्ट शक्ति प्राप्त करता है,या कहें— जो शक्ति सुप्त पड़ी है(प्राणीमात्र में), उसे चैतन्य (जागृत) करता है।
           प्रसंगवश उक्त वर्णमातृकाओं को विशेष रुप से जान-समझ लेना भी आवश्यक है; क्यों कि सामान्य प्रचलन से किंचित भिन्नता है यहाँ। आजकल बच्चों को जो वर्णमाला सिखाने का प्रचलन है,उससे काफी भिन्न है ये। अतः गौर से समझ लेना जरुरी है। अकादि सोलह स्वरवर्ण—अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ॠ,लृ,ॡ,ए,ऐ,ओ,औ,अं,अः(ध्यातव्य है कि यहां ऋ और लृ का दीर्घ स्वर भी व्यवहृत हुआ है), तथा क,ख,ग,घ,ङ,च,छ,ज,झ,ञ,ट, ठ,ड,ढ,ण,त,थ,द,ध,न,प,फ,ब,भ,म, य,र,ल,व,श,ष,स,ह,ळ(एक विशेष ध्वनि जो र+ल का योग है) (क्ष नहीं है यहां) इत्यादि चौंतीस व्यंजन वर्ण मिल कर कुल पचास वर्ण हुये। इन्हें अनुलोम-विलोम क्रम से (यानी प्रथम समूह मे अ से ळ तक,और फिर विपरीत क्रम से यानी ळ,स,ष,श से आ,अ तक) युक्त करने पर कुल सौ की संख्या बनी। अब इसमें अ-क-च-ट-त-प-य-श – इन अष्टमातृकाओं को युक्त करने पर १०८ की वर्णमाला बनती है। ‘क्ष’ इस वर्णमाला में सुमेरु के पद पर प्रतिष्ठित होता है। ध्यातव्य है सभी वर्णों का विन्दु-युक्त उच्चारण होना चाहिए, यानि अँ,आँ... कँ,खँ इत्यादि। एक और गूढ़ रहस्य है कि इस माला का ग्रन्थन-सूत्र ब्रह्मनाड्यन्तर्गत चित्रिणी नामक नाडी है।
            उक्त मातृका-न्यास के दो भेद हैं-1.वहिर्मातृका न्यास और 2.अन्तर्मातृका न्यास। अन्तर्मातृका के पुनः तीन उपभेद होते हैं-1.सृष्टि-मातृका-न्यास,2.स्थिति-मातृका-न्यास,3.संहार-मातृका-न्यास। सृष्टि-मातृका-न्यास में भाव-शरीर की उत्पत्ति की जाती है,स्थिति-मातृका-न्यास में उत्पन्न किये गये शरीर में देवता से तादात्म्य स्थापित किया जाता है,तथा संहार-मातृका-न्यास में साधना-विरोधी मल से आवृत भौतिक शरीर का विलयन किया जाता है। मातृका न्यास के प्रारम्भ में बहिर्मातृका-न्यास का ही अभ्यास किया जाता है,जिसमें उक्त वर्णों को शरीर के विभिन्न अंगों पर आरोह-अवरोह क्रम से न्यस्त करते हैं,और अन्तर्मातृका-न्यास में शरीर के भीतर जाकर विविध चक्रों(पद्मों)में न्यस्त करते हैं। इस प्रकार मातृका-न्यास अपने आप में अद्भुत क्रिया है,जिसे साधने से साधक दिव्यभाव को प्राप्त होता है। प्रारम्भ में हो सकता है,उसे कुछ भी अनुभूति न हो,व्यर्थ जैसा लगे,किन्तु जैसे-जैसे उसकी क्रिया घनीभूत होगी,साधना का अभ्यास होता जायेगा,अन्तर्मातृकायें चैतन्य (जागृत) होती जायेंगी,साधक का उत्तरोत्तर विकास स्वयमेव लक्षित होता जायेगा। विशेष ध्यातव्य है कि इस न्यास का अभ्यास स्थूल गुरु के निर्देशन में ही किया जाना चाहिए।
) व्यापक न्यास— यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण न्यास है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि विशेष परिस्थिति में समयाभाव वश सर्वांगन्यास करना सम्भव न हो तो,सिर्फ इस अकेले न्यास को करके ही सर्वांगता की पूर्ती हो सकती है; किन्तु इसका ये अर्थ नहीं कि सामान्य परिस्थिति में भी इतना ही करके निश्चिन्त हो लिया जाय। मूल मन्त्र-न्यास (क्रमांक ) में की गयी क्रिया को ही थोड़े व्यापक रुप सें यहां की जाती है। मन्त्र का मानसिक उच्चारण करते हुए,सिर के ऊपर से लेकर पादतल तक,चेतना-परिभ्रमण कराये—तीन,पांच,सात,नौ बार—इच्छानुसार इस क्रिया को दुहराये। ध्यातव्य है कि पहली बार सिर से पैर तक आवे,फिर पैर से सिर तक वापस जाये। ऊपर से नीचे,नीचे से ऊपर- ये दो मिल कर एक चक्र पूरा होता है। इस सम्बन्ध में एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है कि साधना में व्यवहृत      सौस्थानिक न्यास से यह बिलकुल भिन्न है। व्यापक न्यास का दूसरा गूढ़ नाम औत्थानिक न्यास है। देवभाव को आत्मसात करने में इस न्यास की बड़ी भूमिका है।
) षोढान्यास— न्यास की पराकाष्ठा है- षोढान्यास । षोढ़ा का शाब्दिक अर्थ है छः प्रकार का। यह अति गोपनीय न्यास है। इसकी विधि अलग-अलग महाविद्याओं के लिए अलग-अलग है। इसकी चर्चा श्रीकालीनित्यार्चन,श्रीकल्पद्रुम आदि ग्रन्थों में विशेष रुप से मिलती है। कहते हैं कि यह न्यास अपने आप में एक साधना तुल्य है। इसके सिद्ध होजाने पर साधक पृथ्वी,जलादि पंचतत्त्वों तक का अधिकारी बन जा सकता है। विशेष प्रचलित षोढान्यास के अन्तर्गत गणेश, सूर्यादि नवग्रह, अश्विन्यादि नक्षत्र, मेषादि राशि, शिख्यादि योगिनी, विविध पीठादि का प्रयोग किया जाता है। इसकी साधना से साधन-पथ के सारे विघ्नों का नाश होकर,साधक का उत्तरोत्तर विकास होता है। सामान्य दैवी शक्तियां भी साधक को विचलित नहीं कर पाती। इस न्यास के सिद्ध हो जाने के बाद साधक को बड़ी सावधानी से रहना पड़ता है। वह स्वयं ही इतना प्रणम्य हो जाता है कि यदि भूल से भी किसी के आगे(गुरु-मातादि को छोड़कर) सिर झुका दे(प्रणाम करने हेतु),तो तत्काल उस प्रणम्य के सिर का विस्फोट हो जाये।
       न्यास की महत्ता और उपादेयता के सम्बन्ध में विविध शास्त्रों के वचन मननीय हैं,जो कुछ इस प्रकार हैः-
(क)न्यासस्तु देवतात्मत्वात् स्वात्मनो देह कल्पना- अपने शरीर को देवतात्मक समझने(वस्तुतः देवतात्मक तो है ही)हेतु न्यास किया जाता है।
(ख) पञ्चभूतांगदेवानां न्यसनान्यास उच्यते- पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाशादि पंचमहाभूतासृत देवों की स्थापना करने से ही न्यास की क्रिया सम्पन्न होती है।
(ग) चैतन्यं सर्व भूतानां शब्द ब्रह्मेति मे मतिः । तत् प्राप्य कुण्डीली-रुपं,प्राणिनां देह-मध्यगं । वर्णात्मनाऽऽविर्भवति,गद्य-पद्यादि भेदतः।। - सभी भूतों का चैतन्य रुप शब्द-ब्रह्म ही है। वही कुण्डलिनी रुप में समस्त प्राणियों में स्थित है,जो वर्णात्मा द्वारा गद्य-पद्य रुपात्मक व्यक्त होता है।
(घ) न्यासं विना जपं प्राहुरासुरं विफलंबुधाः । न्यासात् तदात्मको भूत्वा,देवो भूत्वा तु तं यजेत्- न्यास के बिना जो मन्त्र-जप किया जाता है,वो व्यर्थ होजाता है,क्यों कि वह आसुरी होजाता है(इससे न्यास की महत्ता सिद्ध होती है । अतः न्यास द्वारा देवता बनकर,पूजन-यजन करना चाहिए।
(ङ)अकृत्वा विधिवन्नयासान् नाचार्यामधिकार वान् – विधि- सम्मत न्यास न करने वाला अर्चन (साधना) का अधिकारी नहीं होता।
इस प्रकार हम पाते हैं कि न्यास कितना महत्त्वपूर्ण है। भले ही साधना की पृष्ठभूमि है यह,किन्तु फिर भी सम्यक् न्यास मात्र से ही साधक में अद्भुत क्षमता आ जाती है। अतः इसकी महत्ता को हृदयंगम करते हुए,यथासम्भव पालन करना प्रत्येक साधक का परम कर्तव्य है। पुनः यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि न्यास अंग छूने की औपचारिकता मात्र नहीं है, प्रत्युत चेतना के अवतरण और निर्वाध प्रवाहण का आवश्यक घटक है- न्यास । अस्तु।
                                                

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