Wednesday, 22 February 2017

एक सूचना
प्रिय बन्धुओं!
पिछले 36पोस्टों में अब तक आपने नाड्योपचारतन्त्रम् नामक मेरे शोधग्रन्थ का अवलोकन किया। ये आपके अतिशय स्नेह का ही परिणाम है कि बहुत कम समय में ही मेरे इस ब्लॉग पर 49,823 लोग आ चुके हैं। अन्य ब्लॉगों पर भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। भविष्य में भी इसी तरह आपका स्नेह मिलता रहेगा,ऐसी ही मेरी आशा है। 
मेरा हमेशा प्रयास रहता है कि विविध लोकहितकारी  मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक विषयों को आपके लिए प्रस्तुत करता रहूं। 
अगले महीने के तेरह ता.को होली का त्योहार मनाया जायेगा। उसके पन्द्रह दिनों बाद नया सम्बत् शुरु होगा। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी नये सम्बत् का राशिफल प्रस्तुत किया जायेगा। और उसके बाद मैं अपने वायदे के मुताबिक अपना उपन्यास- अधूरामिलन को पूर्व की भांति कई कड़ियों में प्रस्तुत करुंगा। उपन्यास का कम्पोजिंग कार्य पूरा हो चुका है,इसलिए आपको अधिक इन्तजार नहीं करना पड़ेगा।
 ज्ञातव्य है कि अब तक इस ब्लॉग पर मेरे तीन उपन्यास- निरामय,पुनर्भव,अधूरीपतिया के साथ साथ-साथ तन्त्रयोगसाधना पर आधारित उपन्यास बाबा उपद्रवीनाथ का चिट्ठा पढ़ चुके हैं, साथ ही अन्य विविध आलेख,कहानियां भी।साथ ही पुण्यार्क वनस्पतितन्त्रम् एवं पुण्यार्कवास्तुमंजूषा भी पोस्ट किया जा चुका है,जिसे क्रमिक लेबलों में देखा जा सकता है।

धन्यवाद।

Sunday, 19 February 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...
(अन्तिम किस्त)
                       अष्टादश अध्याय
                            उपसंहार

  चिर अभिलषित नाड्योपचार पद्धति का संकलन सम्पन्न हुआ,और इस प्रकार गुरुदेव के प्रति दिए गये वचन और मानस-संकल्प-पूर्ति का सुखानुभूति-लाभ प्राप्त करने में समर्थ हुआ। गुरुदेव से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात लम्बे समय तक देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करते हुए,स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्पर्क कर, सामुदायिक रुप से शिविर लगा कर,तथा बहुत बाद में विष्णुनगरी गयाजी में स्थायी तौर पर प्रशिक्षण एवं उपचार कार्य करते हुए , यत किंचित व्यावहारिक अनुभव जो प्राप्त किया,उन सारे विषयानुभवों को यथा सम्भव समेट कर यहाँ इस संकलन के रुप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया हूँ। विषयवस्तु को अधिकाधिक स्पष्ट करने हेतु यथासम्भव विभिन्न चित्रों का प्रदर्शन भी यथास्थान किया गया है,इनमें अधिकांश गुरुदेव के संग्रह से लिए गये फोटोकॉपी हैं,कुछ स्वविवेक निर्मित चित्र भी हैं। पुस्तक के अन्त में कुछ और उपयोगी चित्रों का संकलन भी प्रस्तुत है,जिनके स्रोत के बारे में मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि कब-कैसे-कहां से प्राप्त हुए। सन् 1980-85 के दौर में ही ये सब मेरे संग्रह में समाहित हुए। अतः उन अज्ञात स्रोतों के प्रति भी आभार व्यक्त करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। इनमें प्रायः मेरे अनुभूत हैं। अतः पाठकों को इसे निशंक होकर प्रयोग में लाना चाहिए।
पुस्तक के अध्ययन-मनन-प्रयोग से आमजन का कल्याण होगा,ऐसी मेरी आशा है,और प्रयोगकर्ता बन्धुओं से निवेदन करना चाहता हूँ कि भारतवर्ष की भूली-बिसरी इस पद्धति को स्वरुप सहित  अपनायें,और निज लाभ सहित जनकल्याण की भावना से प्रयोग करें। पैसे कमाने के तो अन्य भी बहुत से स्रोत हैं,कम से कम इस पद्धति को तो बक्शें। स्वयंसेवी संस्थायें और सरकारी पदासीनों से आग्रह करना चाहूंगा कि इसके प्रचार-प्रसार में सहयोगी बने। इसकी सीमायें और सामर्थ को सही रुप से समझते हुए लोककल्याण में जुटें।
          सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

      सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःखभाग्भवेत् ।।
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Friday, 17 February 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin of Accupressure)

गतांश से आगे...

                            सप्तदश अध्याय
                            सामर्थ्य और सीमा

नाड्योपचार पद्धति के सम्बन्ध में अब तक के विविध अध्यायों में दिए गये विवरण के आधार पर स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि यह एक अत्युत्तम निरापद चिकित्सा-पद्धति है, जिसका उपयोग निःशंक रुप से आबालवृद्ध,पुरुष-स्त्री,साक्षर-निरक्षर सभी कर सकते हैं। सबको लाभ ही मिलेगा। आधि हो या व्याधि,नवीन हो या जीर्ण,जटिल हो या सरल,सभी स्थितियों में यह पद्धति कारगर है।
यह काफी समर्थ है हर प्रकार के रोग-निवारण में, साथ ही रोग-प्रतिरोधन में भी। किन्तु इसका भी खास दायरा है,सीमा है।
अस्थि-भग्न को जोड़ देने का दावेदार एक्युप्रेशर विशेषज्ञ उपहास का ही पात्र होगा। टूटी हड्डी जोड़वाने के लिए कोई रोगी उसके पास जायेगा भी नहीं। किन्तु इसका यह मतलब भी नहीं है कि हड्डी को जोड़ने में एक्युप्रेशर उपचार का कोई योगदान ही नहीं है। अन्य उपचार एवं औषध-सेवन के साथ-साथ अस्थिसंस्थान पर काम करने वाले प्रतिबिम्ब केन्द्रों को नियमित रुप से उपचारित किया जाय तो त्वरित लाभ अवश्य होगा,इसमें जरा भी संदेह नहीं। इसी भांति अन्य ऐसी व्याधियां,जिसमें औषधि मात्र से काम चलने को नहीं है,वरन शल्य चिकित्सा की आवश्यकता है,वैसी स्थिति में भी अन्यान्य उपचारों के साथ नाड्योपचार का प्रयोग करना उचित ही कहा जायेगा। हर हाल में यह पद्धति सहायक ही सिद्ध होगी। वैसे एक व्यक्ति ने दावा किया था कि वे कैंसर को भी ठीक कर सकते हैं,किन्तु मेरे अनुभव में आज तक ऐसा मामला नहीं आया है। हां,इतना जरुर कह सकता हूँ कि कैंसर और एड्स जैसे घातक बीमारियों में भी इसे सहयोगी चिकित्सा के रुप में प्रयोग किया जा सकता है। सुख प्रसव में इस पद्धति को कई बार आजमाया है मैंने,और आशातीत सफलता भी मिली है।

पद्धति के सम्बन्ध में प्राचीन साहित्य लुप्त प्राय हैं। नवीन वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा इसके पुनर्जागरण का प्रयास सतत जारी है। आशा है आने वाले समय में मानव जाति के कल्याण के लिए नयी चेतना का संदेश ले आयेगा,जिसके फलस्वरुप नाड्योपचार पद्धति के सामर्थ्य और सीमा का विस्तार हो सकेगा। अस्तु।
क्रमशः...

Monday, 13 February 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...

                                 षोडश अध्याय
                             ज्ञातव्य और ध्यातव्य

नाड्योपचार(एक्युप्रेशर) के सम्बन्ध में पूर्व अध्यायों में काफी कुछ कहा जा चुका है। उन्हीं में से कुछ खास बातों को यहां सूत्रवत प्रस्तुत किया जा रहा है—
              1)एक्युप्रेशर चिकित्सा के बारे में आम धारणा है कि जहां अन्य चिकित्सा पद्धतियां असफल हो जाती हैं,वहां भी यह चमत्कारी सिद्ध होता है। किन्तु वस्तुतः बात ये है कि अन्य पद्धतियों से थक-हार कर जब निराश हो जाते हैं,तब इस पद्धति की याद आती है। या सोचते हैं—अब जरा इसे भी आजमा लें। हमें चाहिए कि समय पर(प्रारम्भ में ही)इसे अपना लिया जाय,ताकि समय,श्रम,और अर्थ के साथ-साथ कष्ट भी कम झेलना पड़े। सीधे कहें कि इसे अन्तिम पद्धति न मान कर प्रथम पद्धति कहना (मानना) अधिक श्रेयस्कर है।

          2)चिरकालिक व्याधियों में सावधानी,धैर्य और सततता पूर्वक,धीरे-धीरे चिकित्सा प्रारम्भ करके,पहले रोगी का विश्वास प्राप्त करना उचित है। चिकित्सक का प्रधान कर्तव्य है—रोगी का विश्वास,न कि थके-हारे इन्सान से धन-मोचन। नाड्योपचार को धन कमाने का एकमात्र जरिया न बनायें,प्रत्युत इसे सेवा भाव से लोककल्याणार्थ करें। सेवा के एवज में कुछ न्यूनतम शुल्क लिया जाय,ताकि सेवा का दुरुपयोग भी न हो। क्यों कि मुफ्त की सेवा लेने वालों की भी कमी नहीं है।

            3)आपात्कालिक,गम्भीर और घातक बीमारियों में आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान का सहयोग लेना भी आवश्यक है—सवारी की सुविधा रहते पद-यात्रा कोई बुद्धिमानी नहीं। इन स्थितियों में नाड्योपचार को सहयोगी चिकित्सा के रुप में ग्रहण किया जाय,न कि मुख्य चिकित्सा के रुप में।

            4)नाड्योपचार पद्धति इतना सामर्थ्यवान है कि अनुभवी विशेषज्ञ बिना किसी मशीनी जांच-परख के ही काफी हद तक निदान का सच्चा सूत्र पकड़ ले सकता है।  किन्तु उपलब्ध यान्त्रिक विधि से भी परीक्षण करा लेना रोगी और चिकित्सक दोनों के हक में अच्छा है।

            5)नाड्योपचार विशेषज्ञ के लिए सिर्फ प्रतिबिम्ब-केन्द्रों की तालिका  रट लेना ही पर्याप्त नहीं। पूर्ण विशेषज्ञ वही कहा जा सकता है,जिसे शरीर-विज्ञान और शरीर-क्रिया- विज्ञान(anatomy  & physiology)के साथ-साथ योगशास्त्र का यथाविध ज्ञान और अनुभव हो। हां,आम आदमी किंचित  प्रतिबिम्ब-केन्द्रों की सामान्य जानकारी रख कर भी काम चला ले सकता है। ऐसा नहीं कि पूरा जाने वगैर कुछ करने का अधिकार ही नहीं। क्यों कि अन्य उपचार पद्धतियों की तरह इसका प्रतिप्रभाव या खतरा न के बराबर है।
     6)नाड्योपचार के लिए भी पथ्यापथ्य का विचार रखना अत्यावश्यक है,ताकि पूर्ण लाभ मिल सके। ऐसा न समझा जाए कि दवा तो खानी नहीं है,फिर पथ्य-अपथ्य का परहेज क्यों । क्यों कि पुरानी कहावत है—सौ दवा ना एक परहेज।

      7)नाड्योपचार में सिर्फ व्याधि(शारीरिक रोग) का ही उपचार नहीं होता,प्रत्युत आधि(मानसिक रोग)का उपचार भी सम्भव है,क्यों कि इसका उद्भव ही योगशास्त्र है।

      8)स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा एवं अस्वस्थ को स्वास्थ्य लाभ प्रदान कराना किसी भी चिकित्सा पद्धति का मूल उद्देश्य है। एक्युप्रेशर के साथ भी यह बात पूर्ण घटित होता है। अतः सिर्फ रोगी ही नहीं,स्वस्थ्य व्यक्ति भी इसे अपना कर लाभान्वित हो सकता है।

      9)नाड्योपचार की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह पूर्णतया दुष्प्रभाव रहित(without any side effect or side effect less) पद्धति है। अतः निःशंक अपनाया जा सकता है।

    10)नाड्योपचार बच्चे,बूढ़े,जवान,स्त्री,पुरुष सबके लिए समान गुणकारी है। साथ ही सरल और सुगम भी।

     11)नाड्योपचार अर्थ का मुहताज नहीं,अतः निर्धनों के लिए वरदान की तरह है।

   12)किसी भी रोग के उपचार में प्रत्येक बैठक के प्रारम्भ में मुख्य स्नायुसंस्थान का नियंत्रक स्थल(हाथ के चारो प्रथम चैनलों-चित्रांक 22-1,और 23-6)सर्वप्रथम उपचारित करने से त्वरित लाभ होता है। इसी भांति उपचार बैठक की समाप्ति (क्रमांक 26,चित्रांक 22,23) को उपचारित करके ही करना चाहिए, ताकि अधिक लाभ मिल सके। रक्तवह- संस्थान, एवं मूत्रवह-संस्थान की बीमारियों में तो ऐसा अवश्य ही करना चाहिए।

स्नायुसंस्थान केन्द्र (चैनलों)पर प्रारम्भिक उपचार पूरे स्नायुसंस्थान को चैतन्य(सजग) कर,शीघ्र आरोग्य लाभ का द्वार खोल देता है,तो गुर्दे के केन्द्रों पर किया गया समापन उपचार रक्तवहसंस्थान की शुद्धता और स्वच्छता में सहयोगी होता है। उपचार काल में (या पूर्व में) रक्त-परिभ्रमण-पथ में आए किंचित अवांछित तत्त्व गुर्दे के उपचार से धक्के खाकर,बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं।

13)गर्भवती एवं अति संवेदनशील महिलाओं का उपचार थोड़ी सावधानी से करनी चाहिए । गर्भकाल में जननांगों से सम्बन्धित  प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर सीधे उपचार सामान्यतया नहीं करना चाहिए। इसके लिए विशेष दक्षता की जरुरत है।

14)आगन्तुज व्याधि—चोट,मोच,व्रण आदि पर सीधे उपचार कदापि न किया जाय, प्रत्युत तत्सम्बन्धी अन्यान्य केन्द्रों को उपचारित करके,आवश्यक लाभ प्राप्त करना चाहिए।

15)नाड्योपचार में अद्भुत गुण है- रोग-प्रतिरोधी-क्षमता उत्पन्न करने की। फलतः किसी बीमारी से वचने के लिए एहतियात के तौर पर,इसका उपयोग बड़ा कारगर होता है। वर्तमान युग की सर्वाधिक घातक व्याधि—कैंसर और एड्स से भी बचा जा सकता है इसके प्रयोग से।

16)उपचार काल में रोगी का शरीर एकदम ढीलाढाला रहे। किसी प्रकार का तनाव न हो। नसों का स्वाभाविक ढीलापन उपचार के लिए अधिक प्रभावी होता है।

17)मानसिक एवं कायिक स्वाभाविकता हेतु उपचार प्रारम्भण के पूर्व पीठ के बल (शवासन)लेटकर या आराम से पलथी जमाकर,बैठकर,आँखें बन्द कर,गहरी सांस लेते-छोड़ते हुए अधिक से अधिक 100 तक गिनती गिने। इससे तत्काल लाभ मिलता है। शरीर और मन उपचार-ग्रहण के योग्य बन जाता है।

18)उपचार प्रारम्भ करने से पूर्व आवश्यक केन्द्र के आसपास तेल,पाउडर,क्रीम आदि कोई स्नेहक पदार्थ का व्यवहार कर देने से उपचार का प्रभाव तीव्र और गहन हो जाता है,साथ ही त्वचा पर अत्यधिक दाब जनित दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ता।

19)उपचार प्रारम्भ करने पर रोग का लक्षण और उग्र हो जाये तो इससे घबराना नहीं चाहिए,बल्कि यह शुभ संकेत है,यानी प्रकृति रोग जनित विषाक्तता का परिष्कार करना कबूल कर ली है।

20)उपचार काल में घबराहट,बैचैनी,सुस्ती,मूर्छा आदि किसी प्रकार का संकट आ जाय तो,तत्क्षण उपचार बन्द कर देना चाहिए। रोगी को विश्राम हेतु लिटा कर सभी चैनलों पर आहिस्ते-आहिस्ते दबाव देना चाहिए। कृपाचक्र या शक्तिचक्र नामक उपकरण उपलब्ध हो तो, हथेली और तलवों में 5-10 मि. फिराना चाहिए।

21)किसी दवा का सेवन किये हों तो आध-एक घंटे बाद ही उपचार लिया जाना उचित है।

उक्त सूत्रों को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा करने से रोगी एवं चिकित्सक दोनों को ही लाभ है। अतः निर्देशों,संकेतों,नियमों का यथासम्भव पालन करना अनिवार्य है।अस्तु।

क्रमशः...

Saturday, 11 February 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...
नाड्योपचारतन्त्रम् का तेैंतीसवां भाग ,
पन्द्रहवां अध्याय 




                                  पञ्चदश अध्याय
                            नाड्योपचार और योगासन
       
महर्ष पतञ्जलि प्रणीत योगदर्शन , भारतीय छः आस्तिक दर्शनों में एक है। इसके मुख्य आठ अंग हैं,जिसे अष्टांगयोग के नाम से जाना जाता है। यथा—यम,नियम,आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान और समाधि। वस्तुतः ये आठ सीढ़ियां हैं,जिन पर शनैःशनैः ऊपर बढ़ते हुए,साधक अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करता है। योगासन इसका ही तीसरा पायदान है।
         स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास हो सकता है। मन का पूर्णतया स्वस्थ, स्वच्छ,और शान्त होना ही लक्ष्य प्राप्ति का करण है। शरीर और मन जब दोनों स्वस्थ होंगे, तभी हम पूर्ण स्वस्थ कहला सकते हैं। यथा—समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः, प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनाः स्वस्थित्य भिधीयते ।। यानी कि मन भी जब पूर्णतया स्वस्थ होगा,तभी साधना हो सकेगी। चाहे वह धर्म की साधना हो,या कि अर्थ की,काम की,या मोक्ष की। तात्पर्य यह कि पुरुषार्थ चतुष्टय के लिए स्वस्थ रहने की आवश्यकता है, और स्वास्थ्य की बहुत बड़ी कुञ्जी है- योगासन।
            शरीर की परिशुद्धि एवं अन्तः शुद्धि(कुल मिलाकर- विशुद्धि) अति आवश्यक है। इसके लिए स्रष्टा की स्वनियोजनान्तर्गत अद्भुत व्यवस्था है। शरीरगत विभिन्न विकारों का निरन्तर निर्हरण,शरीर के विभिन्न मार्गों –नथुने,कान,आँख,मुंह,गुदा,मूत्रेन्द्रिय तथा त्वचा द्वारा नियमित रुप से होते रहता है। मिथ्या आहार-विहार के कारण उक्त उत्सर्जनों ( excretion)में किंचित भी व्यवधान आ जाने से शरीर रोगी हो जाता है,यह योग-शास्त्र के साथ-साथ स्वास्थ्य-विज्ञान की भी मान्यता है। नाड्योपचारतन्त्र चुंकि इस योग-शास्त्र से बिलकुल अभिन्न है,अतः यहां भी रोगोत्पत्ति का मूल कारण अवरोध को ही माना गया है। वर्तमान एक्युप्रेशर इसी का आधुनीकिकरण है,अतः सिद्धान्त-साम्य कदापि संदेहास्पद नहीं है। रक्तवह-प्रणाली या तन्त्रिका-प्रणाली या कहें उत्सर्जन-प्रणाली का किंचित अवरोध ही रोगोत्पति का मूल कारण बनता है। स्पष्ट रुप से कह सकते हैं कि योग रुप विशाल वृक्ष की एक मोटी शाखा है- नाड्योपचारतन्त्रम्— एक्युप्रेशर। प्रत्यक्षतः (व्यवहार में) भी हम पाते हैं कि  इस पद्धति में , अवरोध दूर करना ही चिकित्सक का पहला कर्तव्य होता है। अवरोध गया, कि बीमारी गयी। इस अवरोध को दबाव देकर(धक्के)दूर करते हैं,एवं योग विधि में कायगत अवरोध(जकड़न)आदि को दूर करने के लिए शरीर द्वारा विभिन्न मुद्राओं(आसनों) का उपयोग करते हैं,जिसके परिणामस्वरुप अंग-प्रत्यंगों पर खास-खास ढंग से तनाव, संकोच, लचक, दबाव आदि का प्रभाव पड़ता है। कहीं-कहीं तो दोनों पद्धतियां—योगासन और नाड्योपचार एकदम अविभाज्य रुप से एक दूसरे में समाहित प्रतीत होती हैं।
यथा—
        1)नमस्कारासन(प्रणाममुद्रा) में कुछ देर स्थिर बैठने पर,या खड़ा रहने पर अपूर्व रुप से मानसिक शान्त मिलती है। इस स्थिति के सम्बन्ध में एक्युप्रेशरीय दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि प्रणाम-मुद्रा में दोनों हथेलियों को मिलाकर (हल्के दबाव सहित) रखने के क्रम में सभी अंगुलियों के अग्रभाग स्थित मानसिक नस वाले प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर सामान्य उपचार स्वतः होने लगता है,फलतः मानसिक शान्ति मिलती है।
          योगानुसार उक्त मुद्रा का विवेचन किया जाय तो स्पष्ट होता है कि दोनों हाथों की पांचों अंगुलियाँ,जो क्रमशः आकाशादि पांच महाभूतों(तत्त्वों)की संग्राहिका हैं,आपस में मिलकर विशिष्ट प्रकार की जैविक ऊर्जा का सृजन करती हैं,जिसका सुप्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है। उक्त प्रभाव वश मस्तिष्क में अल्फा और वीटा तरंगों का बनना शिथिल पड़ जाता है, फलतः तत्काल मानसिक शान्ति मिलने लगती है।
       योगशास्त्र सिर्फ सामान्य स्पर्श को ही महत्त्व देता है,जबकि एक्युप्रेशर में उक्त स्पर्श को अधिक जोरदार बनाते हैं—दबाव देकर।
            2)पद्मासन या अन्य सुखासन रीति से बैठकर दोनों हाथ की तर्जनी और अंगुष्ठ को मिलाने की परिपाटी योग-साधकों में विशेष कर पायी जाती है,क्यों कि उत्तम ध्यान के लिए एक विशिष्ट मुद्रा है यह। इस स्थिति में वैसा ही प्रभाव पड़ता है जैसा कि क्रमांक 1 में ऊपर स्पष्ट किया गया है।
                       3)वकासन,तुलासन,लोलासन,कुक्कुटासन,उत्थितपद्मासन,उत्तमांगासन,द्विहस्त- भुजासन आदि योगासनों में पूरी हथेली पर विशेष प्रकार का दबाव पड़ता है,जिसके कारण एक साथ कई प्रतिबिम्ब-केन्द्र स्वयमेव उपचारित हो जाते हैं।
            4)मयूरासन में दोनों कुहनियों का विशिष्ट दबाव उदर प्रदेश के खास स्थलों पर पड़ता है,जहाँ उदर पटल पर एक्युप्रेशर के प्रधान प्रतिबिम्ब-केन्द्र हैं। इनके उपचारित होने से एक ओर तो पाचन क्रिया का परिष्कार होता है,कब्ज का निवारण होता है,और परोक्ष रुप से शुक्र-स्तम्भन होकर, व्रह्मचर्य का अद्भुत विकास होता है,जिसका मनोदैहिक प्रभाव नित्य- अभ्यासी को काफी लाभान्वित करता है। इस आसन में भी हथेली के अधिकांश प्रतिबिम्ब-केन्द्र उपचारित हो जाते हैं,जिनका परोक्ष प्रभाव बड़े सुन्दर ढंग से स्वास्थ्य पर पड़ता है।
            5)सिद्धासन में बैठने से सीवनी प्रदेश के विशिष्ट प्रतिबिम्ब-केन्द्र पर समुचित दबाव पड़ता है,जिसके फलस्वरुप विभिन्न वीर्य-विकारों का परिमार्जन होकर स्तम्भन शक्ति का अद्भुत विकास होता है। चित्त का उद्वेलन कम होता है। साथ ही अनिद्रा,प्रलाप आदि का शमन होकर,मानसिक  और वौद्धिक शक्ति को बल मिलता है।
            कहने का तात्पर्य यह है कि नाड्योपचार के अभ्यास के साथ-साथ योगासनों का, अथवा योगासनों के अभ्यास के साथ-साथ नाड्योपचार के विशिष्ट प्रतिबिम्ब-केन्द्रों का दाब अभ्यास यदि जारी रखा जाये तो दोनों ही प्रकार के अभ्यासियों को पहले(एक)की अपेक्षा अधिक लाभ होगा।
योगासनों में सूर्यनमस्कार एक विशिष्ट आसन-समूह है,जिसका कम से कम तीन चक्र
नित्य प्रातः-सायं अभ्यास करने के बाद 5-10 मि.शवासन में विश्राम के पश्चात कोई भी नाड्योपचार लिया जाय तो आशातीत लाभ मिलता है। यानी जिन लोगों को लम्बे समय तक     प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर उपचार लेना हो किसी लम्बी (जटिल) बीमारी में तो वे ऐसा करके अधिक लाभ ले सकते हैं।
  वस्तुतः आसन और शिरादाब(नाड्योपचार)दोनों ही योग के अंग हैं। योगासनों के अभ्यास से एक्युप्रेशरीय बहुत सा उपचार स्वतः होते रहता है। तो दूसरी ओर हम कह सकते हैं कि नाड्योपचार का प्रयोग करने पर विविध योगासन(मुद्रायें)अनजाने में ही सम्पन्न होती रहती हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक के समान है। इनके समग्र स्वरुप को अंगीकार करके ही हम अपने परम लक्ष्य को लब्ध हो सकते हैं,जो मनुष्य मात्र का अधिकार और परम कर्तव्य भी।

(नोट- योगासनों के सम्बन्ध में विशेष जानकारी किसी अधिकृत योग-पुस्तक से करनी चाहिए। बाजार में कचरे बहुत भरे हुए हैं,जहां आसन-मुद्राओं का सही दृश्यांकन नहीं हुआ है। गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित स्वामी ओंमानन्द जी की टीका सहित योगदर्शन नामक पुस्तक में कतिपय आसनों से परिचय कराया गया है। बिहार योगविद्यालय मुंगेर से भी योग की अधिकृत पुस्तकें प्राप्र की जा सकती हैं। )


                                       क्रमशः... 

Monday, 6 February 2017

नाड्योपचारतन्त्रम् (The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...

                    चतुर्दश अध्याय—लाभालाभ

          लाभ— पूर्व अध्यायों में नाड्योपचार के सम्बन्ध में काफी कुछ कहा जा चुका है। उन सबका सम्यक् अध्ययन,मनन,अवलोकन और विश्लेषण करने पर इस तथ्य पर आसानी से पहुँचा जा सकता है कि एक्युप्रेशर उपचार से काफी लाभ है। इन लाभों पर एकबार पुनः विहंगम दृष्टिपात कर लिया जाए। नाड्योपचार से मिलने वाले लाभों को वर्तमान एक्युप्रेशर के कार्यों और प्रभावों के नजर से परखा जाय तो अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट होगा।
        मानव का मूल धन है—स्वास्थ्य,जिसके प्रति आधुनिक भाग-दौड़ वाले जीवन में काफी लापरवाही और उदासीनता वरती जा रही है। स्वास्थ्य और आरोग्य पर विचार, प्रायः पराया विषय सा हो गया है। बीमार होकर,नर्सिंगहोम में भर्ती होकर,अपने स्वास्थ्य की कुंजी डॉक्टर और नर्स के हाथों सौंप कर निश्चिन्त हो जाना लाचारी और फैशन दोनों हो गया है। आहार-विहार का भयावह विपर्यय (उल्टा-पल्टा) अनेकानेक जटिल व्याधियों को उत्पन्न कर दिया है,जिनसे त्राण पाना मुश्किल पड़ रहा है। इस बुरी और चिन्ता-जनक स्थिति में अपनी आदतों में सुधार(परिष्कार)लाने के लिए अवसर देना—नाड्योपचार पद्धति का अहम कार्य है। इस पद्धति के प्रभाव और चमत्कार से प्रभावित होकर अभिज्ञान की प्राप्ति (गलत भटकाव से वापसी) नाड्योपचार पद्धति का दूसरा महत्त्वपूर्ण लाभ है।
      नाड्योपचार(एक्युप्रेशर)पद्धति के त्वरित दृश्यमान प्रभावों में वेदना-निवारण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। सिर का दर्द हो या कि सन्धि-स्थलों (joints pain) का ,दांत का दर्द हो या कि कमर की पीड़ा,या चोट-मोच जनित पीड़ा हो, एक्युप्रेशर उपचार से फौरन लाभ मिलता है।
       एक्युप्रेशर उपचार तन्द्राकारक प्रभाव (sedative effect) उत्पन्न करता है,जिसका प्रमाण E.E.G.(Electro encephalo gram) जांच से प्राप्त किया जा सकता है। कुछ विशिष्ट विन्दुओं पर उपचार करके देखा गया है कि मस्तिष्क में डेल्टा और थीटा तरंगे कम हो जाती हैं,जिससे प्रमाणित होता है कि मन को शान्ति मिली। वर्तमान समय में (अन्य कालों में भी) मानसिक शान्ति सर्वाधिक अनमोल वस्तु है,जिसे नाड्योपचार के सामान्य अभ्यास से भी प्राप्त किया जा सकता है।
           आहार-विहार विपर्यय,पर्यावरण और खाद्य सामग्रियों की आधुनिकतापूर्ण विकृति आदि कारणों से मनुष्य में रोग-प्रतिरोधी-क्षमता का ह्रास दिनानुदिन काफी  तेजी से होता जा रहा है। परिणामतः रोग-प्रभाव का क्षेत्र पूर्वापेक्षा अधिक गहराता जा रहा है। इस जटिल समस्या का भी सहज समाधान है नाड्योपचार के पास। रोग-प्रतिरोधी-क्षमता को मजबूत करने में एक्युप्रेशर चिकित्सा पद्धति काफी लाभकारी सिद्ध हुआ है।
           चुंकि एक्युप्रेशर उपचार पूर्णरूपेण प्राकृतिक नियमों पर आधारित है, इस कारण विशिष्ट जीवनी-शक्ति प्रदान कर रोग-रिपु से लड़ने में सहायक है।
        चुंकि यह सिर्फ उपचार नहीं है,बल्कि अभ्यास भी है,जिसके नियमित पालन से
        मनुष्य बीमार होने से बचा रह सकता है। नियमित अभ्यास से शारीरिक सुधार के साथ-साथ मानसिक सुधार भी होता है। नयी चेतना का संचार होकर,अद्भुत स्फूर्ति प्राप्त होती है। कायगत अवांछित तत्त्वों का परिमार्जन होता है। अस्थि-संस्थान( Skelton system) में सुदृढ़ता आती है। मांसपेशियाँ सबल होती हैं। अन्तःस्रावीग्रन्थियों ( endocrine glands)की कार्य-प्रणाली में सुदृड़ता आती है। और इन सबके परिणाम स्वरुप नित्य अभ्यासी का कायाकल्प हो जाता है।
            नाड्योपचार अत्यन्त सरल और सहज ग्राह्य है। नर-नारी,आबालवद्ध इसे बड़ी आसानी से अपना सकते हैं। घर बैठे,अपने हाथों से आवश्यक रोगोपचार के साथ-साथ रोग-रक्षण भी हो जाता है। और सबसे बड़ी बात है कि पैसे की बरबादी और प्रति-प्रभावों का खतरा भी नहीं रहता। और न अन्य किसी चिकित्सा पद्धति से किसी तरह का टकराव ही है, यानी रोगी यदि चाहे,तो किसी पद्धति की कोई दवा खाते रहते हुए भी इस अभ्यास को जारी रख सकता है। अतः निर्द्वन्द्व भाव से इसे अंगीकार किया जा सकता है।

            हानि— स्थूल रुप  से विचार करने पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के सिर्फ लाभ ही लाभ नजर आते हैं,हानि के नाम पर कुछ भी नहीं मालूम पड़ता। वस्तुतः इसकी हानियाँ हैं भी नहीं,किन्तु लाभ को गुण और हानि को दोष मानकर सूक्ष्म विचार करें तो किंचित दोष अवश्य मालूम पड़ेंगे। यथा—
1.वर्तमान समय में मानव जीवन जटिलताओं और संघर्ष से परिपूर्ण है। ग्रामीण परिवेश की अपेक्षा,शहरी परिवेश,विशेष कर महानगरीय वातावरण में व्याधियों का वाहुल्य है, किन्तु दुर्भाग्यवश समय का भी पर्याप्त अभाव है। हर कुछ मशीनी हो गया है। परिणामतः मानव भी मानव न रह कर मशीन बन गया है। समय भी यन्त्रवत हो गया है। ऐसी स्थिति में एक्यूप्रेशर जैसी स्व-उपचार पद्धति ,जो दीर्घ समय-साध्य पद्धति है,इसके लिए समुचित उपचार हेतु समय निकालना कठिन ही नहीं असम्भव सा है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य रक्षात्मक अभ्यास तो दूर की बात है,रोग निवारण उपचार भी नियमित रुप से कर पाना हर कोई के वश की बात नहीं है। सामान्य से सिर दर्द को दूर करने के लिए शरीर के दो-चार स्थलों पर इत्मिनान से बैठ कर दबाते रहने से बेहतर लगता है- चटपट दर्द-निवारक कोई टिकिया खा लेना। और आम आदमी यही करता भी है। इस प्रकार इसे एक उबाऊ पद्धति कह सकते हैं।
2.प्रायः रोगों के उपचार हेतु एक साथ कई प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर ,नित्य कई बार दाब उपचार करना पड़ता है। समय भी काफी लगता है(घंटे भर या इससे भी अधिक)जो बिलकुल ही उबाऊ प्रक्रिया है। फलतः रोगी प्रारम्भ तो चिकित्सक के सुझाव और प्रभाव में आकर अभ्यास शुरु भी करता है,किन्तु लम्बे समय तक उसका निर्वाह कर पाना कठिन हो जाता है। परिणामतः उपचार सुचारु रुप से चल नहीं पाता,जिसके कारण रोग-मुक्ति भी नहीं होती,
और रोगी को लगता है कि हम नाहक ठगे गये।
3.कुछ ही व्याधियाँ ऐसी हैं ,जिनमें त्वरित लाभ परिलक्षित होता है,अन्य बीमारियों में काफी समय तक(2-4-6 माह)उपचार करना पड़ता है,जब कि रोगी आतुर होता है— शीघ्र आरोग्य प्राप्ति हेतु। रोगी को तो त्वरित लाभ चाहिए,भले ही उसका प्रतिप्रभाव(side effect) क्यों न हो, या कि उपचार अधिक खर्चीला ही क्यों न हो।
4.वस्तुतः यह बुद्धिजीवी वर्ग की चिकित्सा पद्धति बन कर रह गयी है। सामान्य जन को पद्धति के प्रति आकर्षण और विश्वास जम नहीं पाता।
5.आधुनिक व्यावसायिकता-प्रधान युग में जहां कि सभी चिकित्सा पद्धतियां पूर्णरुप से व्यावसायिक बन कर रह गयी हैं,(जबकि चिकित्सा अपने आप में सेवा-कार्य है,होना भी चाहिए)। इसका प्रभाव इस निःशुल्क सेवा पद्धति पर भी संक्रामक रुप से पड़ा है। आये दिन देखने-सुनने को मिलता है कि एक्युप्रेशर के नाम पर भारी भरकम अर्थमोचन कर रहे हैं इसके जानकार लोग। दवा तो नहीं,पर मशीनी चिकित्सा बना दिये हैं लोग। यह बड़ी ही भयावह और घृणास्पद स्थिति है। इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि रोगी को भी सोचना चाहिए कि कोई मेरे लिए अपना श्रम और समय दे रहा है,उसे कुछ तो चाहिए ही सेवा के बदले। हां,राजकीय स्तर पर यदि पहल किया जाय तो कुछ कल्याण हो- जनता का भी और पद्धति का भी। प्रसंगवश यहां मैं अपना एक कटु अनुभव बताना चाहता हूँ—एक बार एक सेमीनार में मुझे आमन्त्रित किया गया। देश के विभिन्न भागों से एक्युप्रेशर के जानकार लोग आये थे,जो अपना अनुभव शेयर कर रहे थे मंच पर,साथ ही कुछ परिचय और निर्देश भी दे रहे थे। किन्तु मुझे यह जान-देख कर बहुत क्षोभ हुआ कि मूल नाड्योपचार से कोसों दूर की बातें वे कर रहे थे। अनधिकृत रुप से आयुर्वेद की दवाइयों और बूटियों का प्रयोग सुझाये जा रहे थे,साथ ही उपकरणों के प्रयोग पर भी जोर दे रहे थे। इतना ही नहीं आधुनिक ढंग से उपचार केन्द्र (क्लीनिक) सजाने और समुचित शुल्क की भी बात कर रहे थे। सच पूछा जाय तो आधुनिक ढंग से क्लीनिक खोले बैठे एक्युप्रेशर उपचारकों का शुल्क किसी जाने-माने डॉक्टर से कम नहीं है। और कुल खर्च भी उसी हिसाब से पड़ जाता है।

निष्कर्ष— उपर्युक्त लाभ-हानियों(गुण-दोषों) पर गम्भीरता पूर्वक तटस्थ होकर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि नाड्योपचार के गुण(लाभ) ही प्रधान हैं। किंचित दोष जो दीख रहे हैं,वो वास्तव में पद्धति के नहीं,प्रत्युत पालक (उपचारक) के हैं। नाड्योपचार एक प्राकृतिक उपचार पद्धति है। स्रजनात्मक पद्धति है। पोषणात्मक क्रिया है। सुव्यवस्थात्मक क्रिया है। ध्यातव्य है कि सृजन,पोषण, सुव्यवस्था—अपने आप में समय-साध्य तो होता ही है। आतुरता और यान्त्रिकता का परिणाम अच्छा नहीं कहा जा सकता । अर्थलोलुप पद्धति के तथाकथित प्रेमियों (प्रयोगकर्तोंओं) में किंचित विचार-परिवर्तन हो जाय,मानवता का अनमोल रत्न पहचान में आ जाये,और पद्धति को सेवा भाव से (सामान्य शुल्क पर) जनसामान्य तक पहुँचाया जाय, तो मानवता का बहुत ही कल्याण हो। इसके लिए स्वयंसेवी संस्थायें और साथ ही सरकार भी आगे आये और पहल करे। अस्तु।

क्रमशः...

Wednesday, 1 February 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...
  
                                त्रयोदश अध्याय
                               चिकित्सा-प्रक्रिया
          नाड्योपचार(एक्युप्रेशर)पद्धति द्वारा चिकित्सा करने की मूल प्रक्रिया है—दबाव देना। व्याधि-निदान हो या चिकित्सा सर्व प्रथम और प्रधान क्रिया दबाव डालना ही है। अतः इस सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों पर प्रकाश डालना अत्यावश्यक है।
            चिकित्सा-प्रक्रिया में मुख्यतया तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है—  1. दबाव कैसे दिया जाय 2. दबाव कितना दिया जाय 3. दबाव किस स्थिति में दिया जाय। यहां उक्त तीन बातों पर किंचित प्रकाश डाला जा रहा है,ताकि चिकित्सा-प्रक्रिया स्पष्ट हो सके। यथा—
1)    प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर दबाव कैसे दिया जाय,यह विषय विचारणीय है,क्यों कि गलत ढंग से दिया गया दबाव कदापि लाभकारी नहीं हो सकता। वैसे विशेष हानि की आशंका नहीं है,किन्तु नुकसान की गुंजायश नहीं है,यह सोच कर प्रक्रिया के प्रति लापरवाही वरतना उचित नहीं है। अतः सम्यक् विधि का ज्ञान और अनुपालन अति आवश्यक है। यह दबाव कैसे दिया जाय,इस प्रश्न में भी दो बातें छिपी हैं—
(क) दबाव किस चीज से दिया जाय— किसी भी क्रिया के लिए करण आवश्यक है। एक्युप्रेशर चिकित्सा के लिए भी उक्त करण का विचार समीचीन है। इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण करण साबित हुआ- जापानी एक्युप्रेशर विशेषज्ञ का—हाथ की अँगुली द्वारा दाब उपचार। इस प्रकार शिआत्सु सार्थक हुआ। हाथ की अंगुली रुपी करण का व्यवहार इस बात का संकेत देता है कि इस पद्धति में किसी वाह्य उपकरण की आवश्यकता ही नहीं है। चीनी टिन-एन विशेषज्ञ भी हाथ की अंगुली से ही दबाव देकर उपचार करने की बात करते हैं। भारतीय शिरादाब पद्धति के प्रणेता तो योग-साधना-उपासना से जुड़े हुए हैं ही। शिरादाब की चिकित्सा व्यवस्था इनके लिए अलग से कोई क्रिया तो थी ही नहीं,क्यों कि वह  इनके दैनन्दिन में समाहित थी। तदनुसार स्थानिक आवश्यकतानुसार विभिन्न हस्त-मुद्राओं का व्यवहार किया जाता था,जिसका प्रचलन आज भी उपासना क्रम में जारी है। यौगिक मुद्राओं का विशद उपयोग(प्रयोग) है योग के साथ-साथ कर्मकांडों में भी। भारतीय आयुर्विज्ञान में मालिश की विधि का भी वर्णन है । मूल रुप से  इस मालिश में विन्दुओं का दबाव स्वयमेव समाहित है।

           दबाव-प्रक्रिया का चुनाव व्यक्ति,स्थिति और आंगिक स्थिति के अनुसार करना चाहिए। यह प्रक्रिया काफी हद तक चिकित्सक पर भी निर्भर है,क्यों कि मुख्य उद्देश्य है—उचित दबाव पड़ना, चाहे वह अँगूठे से दिया जाय,या किसी अन्य अंगुली से,या दाब-उपकरण से। आमतौर पर अंगूठा या तर्जनी ही अधिक उपयुक्त जंचता है। इनमें भी अंगूठे से दबाव देना अधिक व्यावहारिक है। दबाव देते समय अंगुठे की स्थिति प्रतिबिम्ब-केन्द्र की आधार रेखा से सीधे  के कोण पर न हो,इससे एक तो दबाव देने में असुविधा होगी,और दूसरी बात यह कि दबाव भी सही ढंग से नहीं पड़ सकेगा। अतः अंगुली और प्रतिबिम्ब-केन्द्र के बीच 40 का कोण बनाना उचित है। इस स्थिति में उचित स्थान पर सर्वाधिक अनुकूल दबाव भी पड़ता है,और अंगुली पर प्रतिकूल श्रम-भार भी नहीं पड़ता। कुछ लोगों को कुछ स्थानों पर तर्जनी या मध्यमा अंगुली से दबाव देना सुविधाजनक लगता है। इन अंगुलियों के साथ भी अंगूठे वाली स्थिति (40 का कोण)ही होनी चाहिए। कभी-कभी अधिक दबाव डालने के लिए एक साथ तर्जनी के साथ मध्यमा का भी सहयोग लिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में मध्यमा को नीचे रखते हुए,ऊपर से तर्जनी के सहयोग पूर्वक दबाव देना चाहिए। इन उभय अंगुलियों की स्थिति में भी अंगुलियों का कोण पूर्व क्रमानुसार ही बनना चाहिए। सीधी अंगुली से दबाव देने से सबसे बड़ा खतरा केन्द्र पर नाखून चुभने का होता है। लागातार के इस चुभन से प्रत्यक्षतः उस स्थान पर फफोले हो जा सकते हैं। यदि ऐसा नहीं भी होता ,तो भी स्थानीय सूक्ष्म कोशिकाओं को तो नुकसान पहुंचता ही है। अतः सीधे (यानी 90  दबाव कदापि न दिया जाए। कभी कभी किसी व्याधि में अंगुलियों का व्यवहार सामूहिक रुप से करना पड़ता है। उदाहरणतया, कब्ज आदि उदर विकारों में तर्जनी,मध्यमा और अनामिका—दोनों हाथ की तीनों अंगुलियों को एक समय में प्रयोग करना पड़ता है। यहां भी ध्यान रखना चाहिए कि अंगुलियों और उपचार किये जा रहे केन्द्रों के बीच का कोण पूर्व कथित (40  ही हो,और इस क्रम में  दबाव नाखून से नीचे, अंगुलियों के मांसल भाग से ही दिया जाए। इतना ही नहीं, चिकित्सक (उपचार-कर्ता) का नाखून हमेशा कटा हुआ (साफ-सुथरा) होना चाहिए। कभी-कभी अंगुलियों को मोड़ कर,मध्यमा के मध्य खंड से ,उल्टे तरफ से दबाव देने की प्रक्रिया भी अपनानी पड़ती है,किन्तु यह उतना लोकप्रिय नहीं है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि त्वचा की रुक्ष बनावट के कारण अथवा किसी केन्द्र विशेष पर विशेष दबाव देने के लिए एक हाथ के अंगूठे पर दूसरे हाथ के अंगूठे का सहारा देकर भी दबाव देना पड़ता है। यूं तो आजकल,एक्यूप्रेशर पद्धति के विशेष प्रचार-प्रसार को देखते हुए, व्यावसायिक बुद्धि अधिक सक्रिय है। फलतः विविध दाब-उपकरण(लकड़ी,प्लास्टिक,धातु आदि के) आ गये हैं बाजार में । उपलब्धि और सुविधानुसार उनका भी उपयोग किया जा सकता है। कभी-कभी एक साथ आसपास फैले केन्द्र समूहों को समान समय में समान रुप से उपचारित करने के लिए खास तरह के विहित उपकरण अनिवार्य हो जाता है। वैसी स्थिति में निःसंकोच रुप से उपलब्ध आवश्यक उपकरणों का व्यवहार किया जा सकता है। लकड़ी के बने उपकरणों को अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए। प्रदर्शन (दिखावे) के लिए कई विशेषज्ञ विभिन्न तरह के फिजियोथेरापी के उपकरणों को भी अपने एक्यूक्लीनिक में रखते हैं,ताकि रोगी से अधिक पैसा ऐंठा जा सके। किन्तु इससे मूल सिद्धान्त का हनन हो रहा है,साथ ही जनता का भयंकर शोषण भी। गुरुदेव मणिभाई जी ने मात्र चार-पांच उपकरणों का ही प्रयोग किया,उनमें भी मूलतः तीन ही उपकरण हैं,जिन्हें यहां चित्रांक 35 में प्रदर्शित किया जा रहा है।

ऊपर के चित्र में एक को छोड़कर,बाकी उपकरण सुन्दर,सुडौल लकड़ी से बने हैं। इनकी कीमत भी बहुत ही कम है। और आसानी से बाजार में उपलब्ध भी हैं। उचित ये है कि प्रत्येक घर में ये सारे उपकरण अवश्य रखे जायें ताकि समय पर प्रयोग किया जा सके। सबसे लम्बा सा जो उपकरण है,उसे लोग फुटरोलर कहते हैं,जिसे कुर्सी पर बैठ कर पैर के तलवे में आसानी से रोगी स्वयं चला सकता है,या फिर सामने टेबल पर रखकर,दोनों हथेलियों में भी चला सकता है। गुरुदेव ने इसके लाभ को देखते हुए इसका नामकरण किया है – कृपाचक्र । दूसरा उपकरण है शक्तिचक्र, जिसे सुविधानुसार शरीर के किसी भाग में फिराया जा सकता है। किसी प्रकार के मांसपेशियों के दर्द में इसका निरापद उपयोग है। शेष सभी विभिन्न प्रकार के प्रेशरटूल हैं, जिन्हें प्रतिबिम्ब केन्द्रों की स्थिति और आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाना चाहिए। सबसे मोटा चट्टु खास कर तलवे के कठोर चमड़ी के लिए है,और सबसे पतला धातु चट्टु सूक्ष्म विन्दुओं पर आहिस्ते से दबाव देने में उपयोगी है।  
(ख)दबाव किस तरीके से दिया जाय—दबाव किस तरीके से दिया जाए,इसे समझने के लिए रोग-निवारण-सिद्धान्त-अध्याय में वर्णित बातों पर गौर करना चाहिए,ताकि दबाव क्यों दिया जाता है यह बात स्पष्ट हो सके।

नाड्योपचार पद्धति में दबाव का उपयोग निदान और चिकित्सा दोनों उद्देश्य से किया जाता है । जहां दुःखे वहां दबायें का मूल मन्त्र ग्रहण कर निदान  किया जाता है,और पुनः उसी प्रकार चिकित्सा भी की जाती है। प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर खास तरह का दर्द एक प्रकार का संकेत है—उपचारार्थ संकेत,तत्सम्बन्धी अवयव की विकृति यानी अनियमितता का संकेत। इन संकेतों में मुख्य रुप से दो बातें छिपी होती हैं-   (I) उपशामक संकेत और (II) उत्तेजक संकेत। अर्थात संकेत-प्रदाता-केन्द्र(विन्दु) या तो कुछ आधिक्य अनुभव कर रहा है,या अभाव,जिसका वह संकेत है। दर्द रुपी संकेत ही केन्द्र की भाषा है,जिसे समझना चिकित्सक का कर्तव्य है। उक्त दो तरह के संकेतों के आधार पर , केन्द्रों पर दिए जाने वाले दबाव भी दो तरह के होंगे,यानी दबाव देने का दो तरीका होगा—(1) केन्द्र-त्यागी(उपशामक)दबाव,और (2) केन्द्र-गामी (उत्तेजक) दबाव।  अब आगे,इन दोनों स्थितियों का विचार करना है,यानी किस स्थिति में किस, किस स्थान पर,किस प्रकार का दबाव दिया जाए।
(1)    केन्द्र-त्यागी (उपशामक) दबाव (Sedative type of pressure)- शक्ति-प्रवाह-पथ(meridian) में प्राण-शक्ति (ची ) के प्रवाह का एक खास समय-संकेत चित्रांक 20 द्वारा स्पष्ट किया गया है। तदनुसार अहोरात्र(24घंटे)के खास दो घंटों में खास मेरेडियन में शक्ति-प्रवाह अधिक पाया जाता है,जिसके परिणाम स्वरुप उस काल में उस शक्ति-प्रवाह-पथ से सम्बन्धित अवयव रोग-ग्रस्त होकर सम्बन्धित प्रतिबिम्ब-केन्द्र पर वेदना का संकेत भेजता है। उदाहरणतया- दिन में 11 बजे से 1 बजे तक हृदय शक्ति-संचार-पथ(Heart meridian) में प्राण-शक्ति का अतिरेक पाया जाता है। परिणामतः यदि उस काल में इस मेरिडियन से सम्बन्धित किसी भी प्रतिबिम्ब-केन्द्र पर दर्द की अनुभूति(उपचार संकेत)प्राप्त हो तो,उसका उपचार केन्द्र-त्यागी यानी उपशामक दबाव देकर करना श्रेयस्कर है। तात्पर्य यह है केन्द्र-त्यागी दबाव का उपयोग प्रत्येक अतिरेक की अवस्था में किया जाना चाहिए,चाहे वह मेरीडियन से सम्बन्धित हो या कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (Endocrine Glands) या किसी अन्य अवयव से। यानी किसी प्रकार के अतिस्राव,सूजन,उत्तेजना आदि को शमित करने के लिए इस प्रकार के दबाव का उपयोग किया जाना चाहिए। केन्द्र-त्यागी दबाव उत्पन्न संकट का उपशमन करता है,अवयव या ग्रन्थि की अवांछित उत्तेजना को शान्त करता है। अवयविक कार्य-प्रणाली के अतिरेक को नियमित कर, सुख-शान्ति प्रदान करता है।

केन्द्रत्यागी दबाव का तरीका—केन्द्र-त्यागी दबाव देने से पूर्व आवश्यक प्रतिबिम्ब केन्द्र की पहचान उचित रीति से कर लेनी चाहिए। तदुपरान्त केन्द्र स्थान पर जिम्मी(चट्टु) (लकड़ी या प्लास्टिक का छोटा सा दाब उपकरण-चित्रांक 35) को स्थिर कर,गहरा और भारी दबाव देना चाहिए। दबाव देते हुए जिम्मी को इस प्रकार हिलावे कि शनैः-शनैः उत्तरोत्तर वर्द्धमान वर्तुल बनता जाय,जैसा कि आगे चित्रांक 36 क-ख में स्पष्ट दर्शाया गया है। सुविधा और आवश्यकतानुसार यह क्रिया अंगुली से भी की जा सकती है,किन्तु पतली वाली जिम्मी अधिक उपयोगी होता है। जिम्मी या अंगुली को इस प्रकार घुमायें कि प्रतिक्षण एक वर्तुल बन जाए। ध्यान देने की बात है कि केन्द्र-त्यागी दाब का यह तरीका,एक समय में सिर्फ एक ही केन्द्र के लिए उपयुक्त है। अन्य केन्द्र पर आवश्यक हो तो इसी भांति पुनः क्रिया करे। ज्ञातव्य है कि शरीर के सभी प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर इस खास तरह के दाब उपचार की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।



(1)    केन्द्र-गामी(उत्तेजक) दबाव( Stimulating  type of pressure)— केन्द्र त्यागी की ठीक विपरीत स्थिति को केन्द्र-गामी कहते हैं। ज्ञातव्य है कि जिस भांति प्रति अहोरात्र(24घंटे)में किसी खास दो घंटे शक्ति-प्रवाह-पथ में अधिकतम प्रवाह होता है,उसी भांति ठीक उसके विपरीत समय में यानी बारह घंटे बाद उस खास मेरीडियन में प्राणशक्ति-प्रवाह न्यूनतम भी हो जाता है,इसे स्मरण दिलाने हेतु  गत अध्याय में दिये गये चित्रांक 20 को यहां पुनः प्रदर्शित करते हैं।


       यूं तो यह सामान्य नियम है कि अधिकतम शक्ति-प्रवाह-काल में ही किसी विकार की अधिक आशंका रहती है,किन्तु कभी-कभी इसके विपरीत भी होता है,यानी न्यूनतम शक्ति-प्रवाह काल में भी विकार उत्पन्न हो सकता है। परन्तु इस काल में उत्पन्न विकार अतिरेक मूलक न होकर,अभाव मूलक होता है। कहने का तात्पर्य ये है कि दर्द संकेत की स्थिति तो बनेगी,किन्तु वस्तुतः वह अभाव का संकेत होगा,जिसे समझ पाना जरा विकट है। वह निर्बलता या अवसाद का संकेत होगा। शक्ति-प्रवाह-सिद्धान्तों की इन बातों पर गौर करने पर दावे के साथ कहा जा सकता है कि खास तरह की व्याधि खास समय में ही उग्र रुप ले सकती है। जैसे- दिन में 11 बजे से 1 बजे के बीच उच्चरक्तचाप(High Blood Pressure) की शिकायत तेज हो सकती है,किन्तु निम्न रक्तचाप (Low Blood Pressure) की आशंका प्रायः कम ही होगी,क्यों कि यह समय हृदयसंचारपथ के उत्तेजना का काल है। अतः दबाव(चाप)बढ़ने की अधिक आशंका होती है, घटने की कम। इसी प्रकार अन्य मेरिडियनों एवं ग्रन्थियों के साथ भी लागू होता है।
   न्यूनतम  शक्ति-प्रवाह-काल में उत्पन्न अभाव(न्यूनता)संकेत को उपचारित करने के लिए जो दबाव दिया जाता है,उसे केन्द्रगामी दबाव कहते हैं।

केन्द्रगामी दबाव का तरीका—हम स्पष्ट कर चुके हैं कि केन्द्र-त्यागी-दाब के ठीक विपरीत स्थिति है केन्द्र-त्यागी-दाब। अतः इसके उपचार का तरीका भी पहले के ठीक विपरीत ही होगा। यानी केन्द्र त्यागी दाब में उत्पन्न उत्तेजना को उपशमित करते हैं,और इस केन्द्रगामी दबाव में उत्तेजना को उत्पन्न करते हैं। ध्यान देने की बात है कि इस प्रकार के दबाव की स्थिति में जिम्मी या अंगुली को मूल केन्द्र के केन्द्र में न रख कर,जरा बाहर हट कर स्थापित करेगे,और छिछला(हल्का)दबाव देते हुए,उत्तरोत्तर छोटा वर्तुल बनाते हुए,तीव्र गति से केन्द्र की ओर जायेंगे,जैसा कि चित्रांक 36 ख में स्पष्ट किया गया है। बाहर से केन्द्र की ओर आने की क्रिया एक बार पूरी हो जाने के बाद,पुनः जिम्मी को उठा-उठा कर,पूर्व क्रिया की आवृत्ति करते रहेंगे। यानी परिधि से केन्द्र की ओर। और यह काम आधे से लेकर दो मिनट तक करनी चाहिए। मानसिक अवसाद की स्थिति में आवश्यकतानुसार प्रत्येक 15 से 20 मि. पर उक्त क्रिया को सम्पन्न किया जा सकता है। ध्यान रहे- यह आपातकालिक बैठक का क्रम अन्य केन्द्रों की भांति ही होगा,जैसा कि पूर्व अध्याय में निर्दिष्ट है।
           उपर्युक्त केन्द्र-त्यागी और केन्द्र-गामी दबाव प्रक्रियाओं में (चित्रांक 36 क-ख)में ध्यान देने योग्य बात यह है कि दबाव का तरीका दक्षिणावर्त वा वामावर्त (clockwise or anticlockwise)से मतलब नहीं रखता,बल्कि केन्द्र-त्यागी दबाव देने के लिए दबाव केन्द्र से परिधि की ओर और केन्द्र-गामी दबाव के लिए दबाव परिधि से केन्द्र की ओर होना चाहिए। हां,एक में बनने वाली वर्तुल की गति तीव्र,तो दूसरे में मन्द होनी चाहिए। एक और बात का भी ध्यान रखना जरुरी है कि केन्द्र-गामी दबाव में मुख्य केन्द्र से जरा हट कर दाब-प्रक्रिया शुरु करेंगे,तो केन्द्र-त्यागी विधि में सीधे केन्द्र पर क्रिया प्रारम्भ करेंगे। यानी केन्द्रगामी में आवर्त को क्रमशः छोटा करते जायेंगे,और केन्द्र-त्यागी में क्रमशः बड़ा करते जायेंगे।
        उक्त दो प्रकार के दबाव प्रक्रिया के अतिरिक्त सामान्य तौर पर प्रायः सभी केन्द्रों के लिए व्यवहृत दबाव के लिए दो और तरीके हैं—सीधा और तिरछा दबाव। तिरछे दबाव की प्रक्रिया वस्तुतः केन्द्रत्यागी दबाव का ही विशिष्ट क्रम है, जो किसी खास केन्द्र के लिए व्यवहृत होता है। इस विशिष्ट संकेत को स्पष्ट करने हेतु कहीं-कहीं प्रतिबिम्ब-केन्द्रों के दिये गये चित्रों में विशेष संकेत भी पाया जाता है। डॉ.चु लियेन का कथन है कि कभी-कभी सौम्य उत्तेजना की आवश्यकता महसूस की जाती है, किसी केन्द्र के उपचार के क्रम में। वैसी स्थिति में हल्के धक्के देकर दबाव देना चाहिए। इस स्थिति में ध्यान रहे कि अंगुली या उपकरण सदा मुख्य स्थिति में ही टिका रहे यानी उसका स्थान परिवर्तन हर धक्के के साथ कदापि न हो। इस प्रकार के तिरछे दबाव की आवश्यकता विशेष कर शरीर के सीमावर्ती केन्द्रों पर उपचार करते समय महसूस की जाती है।
        सीधे दबाव की प्रक्रिया दबाव का सर्वाधिक सरल और लोकप्रिय तरीका है। इसमें किसी प्रकार के विनिश्चय की आवश्यकता नहीं है। यानी केन्द्र कैसा, कौन सा,दबाव कैसे दिया जाय आदि बातों के झंझट में जरा भी पड़ने की आवश्यकता नहीं होती।  सीधा दबाव प्रक्रिया में  शक्ति-प्रवाह पथ में न्यून है या अति—इसका भी विचार नहीं किया जाता। अन्य सभी विधियां विशेष अनुभव और ज्ञान पर निर्भर हैं,जब कि सीधा दबाव सामान्य अनुभवी(जानकार)भी सहज ही दे सकता है। इस क्रिया में अंगुली या उपकरण सीधे( 90 )पर न रख कर, थोड़ा तिरछे (40  रखना होता है। साथ ही ध्यान रहे—रोग, रोगी, और उसकी त्वचा की बनावट (सुकोमल,रुक्ष,क्लिष्ट आदि) पर सूक्ष्मता पूर्वक ध्यान देते हुए, यथावश्यक, यथाविधि,यथासम्भव गहरा दबाव डालना चाहिए। प्रारम्भ में दबाव कुछ तेजी से देकर,फिर धीरे-धीरे कम करते जाना चाहिए। किन्तु बाद की मात्रा अधिक होगी,सिर्फ गति कम रहेगी। दूसरी बात यह कि मसलने या रखड़ने जैसा दबाव नहीं देना चाहिए। और न दबाव देकर, लागातार अंगुली या उपकरण को रोके ही रहना चाहिए। अभिप्राय ये कि पम्प की तरह—दबाना-छोड़ना,दबाना-छोड़ना होना चाहिए। पम्पिंग की इस क्रिया को आवश्यकता और स्थिति के अनुसार 10-20-30-40-50-60-या अधिक से अधिक 100 बार तक किया जा सकता है किसी एक विन्दु पर।
                
(2) दबाव कितना दिया जाय— चिकित्सा-प्रक्रिया का अगला विचार विन्दु हैदबाव देने का मूल उद्देश्य ‘रोग-निवारण-सिद्धान्त अध्याय’ में स्पष्ट किया जा चुका है। उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु दबाव की मात्रा का निर्धारण करना है। दबाव देने का उद्देश्य न तो रोगी को पीड़ा पहुंचाना है,और न सुखानुभूति कराना ही। अतः दबाव उतना ही डाला जाय,जितने से मुख्य उद्देश्य की पूर्ति हो सके,यानी केन्द्रगत अवरोध,उत्तेजना या अवसाद का अन्त हो सके। दबाव की मात्रा कई बातों पर निर्भर है। यानी कि यह मात्रा समय,व्यक्ति और स्थान सापेक्ष है। अतः इन तीनों पर यहां विचार करना उचित प्रतीत हो रहा है—

(क)पात्र-सापेक्ष—  दबाव की मात्रा काफी हद तक पात्र (रोगी व्यक्ति)पर निर्भर है। यानी उपचार किये जा रहे व्यक्ति के अनुसार(उम्र,त्वचा,लिंग आदि) के हिसाव से न्यूनाधिक मात्रा तय की जानी चाहिए। एक बालक को जितनी मात्रा में दबाव दिया जाना चाहिए,स्वाभाविक है कि एक वयस्क के लिए कई गुना अधिक दाब-मात्रा होगी। इसी भांति पुरुष-स्त्री का भी भेद है- मात्रा-निर्धारण में। थोड़ी देर के लिए पात्र-सापेक्षता को उम्रगत न कह कर,त्वचा की बनावट के हिसाब से कहें तो अधिक स्पष्ट होगा। बालक की त्वचा काफी कोमल होती है,इस कारण उसे हल्के दबाव से उपचारित करना चाहिए, जब कि वयस्क को अधिक दबाव दिया जाना चाहिए तभी कारगर होगा। वृद्धों की त्वचा भी किंचित दुर्बल (सुकुमार नहीं) होती है, स्त्रियों की त्वचा बालकों की तरह सुकुमार होती है; एक बुद्धिजीवी और श्रमजीवी की त्वचा में भी अन्तर पाया जाता है —आदि बातों का ध्यान रखना जरुरी है। अन्यथा लाभ के बजाय हानि की आशंका रहेगी। हानि का कारण होगा—उपचार-कर्ता का अनुभव-ज्ञान का अभाव,और बदनामी का सेहरा बँधेगा चिकित्सा-पद्धति पर। अतः सावधान—अपनी कमी(खामी) के कारण किसी पद्धति को हानि न पहुंचायें। इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि पात्र-सापेक्षता सिद्धान्त में मुख्य चार बातें है—रोगी की उम्र,चमड़ी की बनावट,स्वास्थ्य एवं बलाबल। दबाव की विहित मात्रा का निर्धारण अनुभव से ही किया जा सकता है। हालाकि आजकल मात्रक जिम्मी भी बाजार में उपलब्ध है,जिससे यह पता चल जाता है कि हम कितना दबाव दे रहे हैं। प्लास्टिक के बने जिम्मी के नोक वाले भाग में भीतर स्प्रिंग लगी होती है,और ऊपर में निशान, जो पॉन्ड-प्रेशर का माप बताता है। इससे सहज ही पता चल जाता है कि दबाव कितना दिया जा रहा है।

(क) काल-सापेक्ष— चिकित्सा के प्रारम्भ में(निदान क्रम में भी) दबाव की मात्रा काफी कम होनी चाहिए। चिकित्सा के प्रारम्भ में (उपचार क्रम में भी)दबाव की मात्रा काफी कम(हल्की) होनी चाहिए। इस हेतु त्रिसूत्रीय विधि अपनायी जाती है। सबसे पहले प्रभावित (विनिश्चित या अनुमानित) प्रतिबिम्ब केन्द्र का स्पर्श करके(अंगुली से) अनुभव करना चाहिए। इसके बाद आहिस्ते-आहिस्ते मसलना चाहिए (squeezing system) तदुपरान्त रोग-रोगी और स्थान (वोर्ड) का विचार करते हुए,उचित मात्रा में दबाव देना चाहिए। प्रारम्भिक दबाव काफी हल्का,किन्तु गहरा होना चाहिए। फिर धीरे-धीरे स्थिति और आवश्यकतानुसार दबाव जनित अधिक बल का प्रयोग किया जा सकता है। ध्यान रहे कि नवीन व्याधियों में प्रायः प्रारम्भिक दबाव असह्य प्रतीत हुआ करता है,जबकि जीर्ण व्याधियों में केन्द्रगत संवेदनशीलता  भी बढ़ जाती है। कभी-कभी केन्द्र पर इन दोनों बातों का अपवाद भी पाया जाता है। अतः सूक्ष्म विचार(निर्णय)पूर्वक उपचार करना चाहिए।
(ख)      देश-सापेक्ष— दबाव की मात्रा देश(स्थान)सापेक्ष भी है। सच पूछा जाय तो इसका सर्वाधिक महत्त्व है। स्थान(देश)से तात्पर्य है शरीरगत विभिन्न प्रतिबिम्ब केन्द्रों से। अर्थात एक ही व्यक्ति के लिए,एक ही व्याधि हेतु अलग-अलग प्रतिबिम्ब-केन्द्र-समूहों (स्विचवोर्डों)पर दिया जाने वाला दबाव अलग-अलग)मात्रा वाला होगा। जैसे- दमा के मरीज को दमा केन्द्र पर तलवे में उपचार करने के लिए कम से कम चार पौंड का (वयस्क को) दबाव देना आवश्यक है,जब कि उक्त केन्द्र के लिए ही हथेली में तीन पौंड से अधिक दबाव कदापि उचित नहीं होगा। चेहरे और कान पर के केन्द्रों पर क्रमशः एक और आधे पौंड का दबाव ही पर्याप्त है। इसी भांति अन्य व्याधियों में भी दबाव की मात्रा-भिन्नता होगी शरीरगत विभिन्न केन्द्रों पर।
उपर्युक्त तीनों बातों का सामंजस्य बैठाते हुए,सम्यक् रुप से दबाव की मात्रा का निर्धारण करना चाहिए। अन्यथा पद्धति की लोकप्रियता को ठेस पहुंचने की आशंका हो सकती है। यहां प्रसंगवश यह बता दूँ कि दबाव की मात्रा का मापन अनुभव सिद्ध है। इसके लिए आजकल दाब-मापक उपकरण भी बाजर में उपलब्ध हैं। छोटी सी जिम्मी मे स्पिंग लगा होता है,जिसमें पौंड-मापन का चिह्न दिया रहता है। फलतः सहज ही पता लगाया जा सकता है,उपचार-कर्ता द्वारा दिया जा रहा दबाव कितना है।

(3)दबाव किस स्थिति में दिया जाय—निदान या चिकित्सा काल में रोगी की शारीरिक स्थिति कैसी हो,इस बात पर भी नाड्योपचार के अनुभवी उपचारक को ध्यान रखना जरुरी है। सामान्यतया रोग-निदान काल में रोगी की शारीरिक स्थिति यथा सुविधा रखी जा सकती है। हालाकि स्थिति का प्रभाव रोग-निदान पर अवश्य पड़ता है। अतः उस वक्त में भी ध्यान रखा जाय तो बहुत ही अच्छा है,किन्तु उपचार-काल में तो परमावश्यक है। अन्यथा पद्धति से प्राप्त परिणाम(लाभालाभ) में अन्तर आयेगा,यानी सही स्थिति में किए जाने वाले उपचार से अधिक लाभ मिलना स्वाभाविक है,गलत स्थिति में दिए गये उपचार की तुलना में।
            उपचार कालिक शारीरिक स्थिति मुख्यतया दो बातों पर निर्भर करती है— (क)रोग का प्रकार, और (ख) चुना गया प्रतिबिम्ब केन्द्र। यहां इन दोनों पर एक नजर डाल ली जाये—
(क)रोग का प्रकार— नाड्योपचार के लिए सर्वमान्य पहला नियम है- रोगी को सुखासन में रखना यानी  सोकर,बैठकर(जमीन,कुर्सी,तख्त आदि पर)जैसे भी रोगी को आराम मिले,और पूरे उपचार काल तक स्थिर,सुख से बैठ सके। किन्तु खास-खास बीमारियों में रोगी की विशेष (विहित) शारीरिक स्थिति का पालन परमावश्यक है। उदाहरणतया- स्नायुमण्डल से सीधे सम्बन्ध रखने वाली व्याधियों का उपचार करते समय रोगी को पीठ के बल,बिना तकिया के, शवासन मुद्रा में लिटा कर रखा जाना चाहिए,क्यों कि ऐसी स्थिति में अन्य मुद्राओं की अपेक्षा शवासन मुद्रा में त्वरित लाभ होगा। स्नायुसंस्थान(Nervous system) के साथ-साथ रक्तवह संस्थान (Circulatory system) भी जिन व्याधियों में मुख्य रुप से प्रभावित रहता हो,उन व्याधियों का उपचार करते समय भी वैसा ही करना चाहिए। उच्चरक्तचाप(HBP) एवं हृदय रोगों में तो शवासन ही एकमात्र उपयुक्त आसन कहा जा सकता है। श्वसनसंस्थान (Respiratory System) की व्याधियों का उपचार खंड-पश्चिमोत्तासन(आंशिक)में किया जाय तो अधिक अच्छा है। साथ ही रोगी को सुझाव दिया जाए कि जब भी आराम से बैठने की इच्छा हो,तो शशांकासन में बैठने की आदत डाले। पाचनसंस्थान(Digestive System)की बीमारियों में उपचार के लिए सर्वाधिक मुद्रा है- दीवार के सहारे सीधे खड़ा होना। यहां यह ध्यान रहे कि बिना सहारे के खड़ा होना निरापद(और उचित)नहीं है। मूत्रवहसंस्थान(Urinary System) (आधुनिक समय में इसका नाम उत्सर्जन संस्थान-Excretory System  कर दिया गया है,और क्षेत्र भी व्यापक हो गया है) का उपचार करते समय दोनों पैर मोड़कर,पूरे पांव के तलवे पर शरीर का पूरा भार देकर,यानी चुकमुक मुद्रा में बैठकर,उपचार लेने से अत्यधिक लाभ मिलता है।
            संस्थान-क्रम उपर्युक्त शारीरिक स्थितियों (मुद्रा-आसन) के अतिरिक्त एक ही संस्थान के अलग-अलग रोगों में समय-समय पर आसन या मुद्रा परिवर्तन  की भी आवश्यकता पड़ती है। इस सम्बन्ध में आगे यथास्थान संकेत दिया गया है।

(ख)प्रतिबिम्ब-केन्द्र-समूह— शरीर के किस प्रतिबिम्ब-केन्द्र-समूह(वोर्ड)पर उपचार करना है, इस पर भी रोगी की शारीरिक स्थिति निर्भर करती है। किन्तु  खंड क (रोग के प्रकार) में रोगी के लिए निर्दिष्ट मुद्राओं(आसनों) से अति विरोधाभास न हो,इसका भी ध्यान रखना उपचार कर्ता का कर्तव्य है। इन स्थितियों का चुनाव चिकित्सक अपने विवेक से आसानी से कर सकता है। अतः यहां प्रसंगवश कतिपय निषेधात्मक स्थियों का संकेत भर दिया जा रहा है—
            हृदयरोगी को पीठ के प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर उपचार करना हो तो बायीं करवट कदापि न लिटायें। इसके लिए उचित होगा अर्द्धपद्मासन या सम्भव हो तो पद्मासन में बैठाकर,दोनों हथेलियों को जरा आगे झुकाते हुए,जमीन पर टिकाकर,स्थिर अवस्था में रखकर,आहिस्ते- आहिस्ते उपचार करना। श्वसनसंस्थान की उग्र व्याधियों की  स्थिति में भी यही मुद्रा उचित है उपचार हेतु। हृदय एवं फेफड़ों के अतिरिक्त अन्य रोगों का उपचार करना हो यदि खास कर पृष्ठभाग के केन्द्रों पर तब रोगी को आराम से पेट के बल लिटा कर,उपचार करें।  इस मुद्रा में दोनों हाथ मोड़कर,उसी के सहारे,रोगी अपना सिर टिकाये रखे। चेहरे एवं वक्षस्थल समूह पर उपचार करते समय रोगी के बैठने की मुद्रा पूर्वकथित—पद्मासन या अर्द्धपद्मासन ही होना चाहिए। किन्तु हथेलियां आगे के बजाय पीछे जाकर,आधार पर टिकेंगी। तलवे के प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर उपचार करने के लिए रोगी की मुद्रा है— दोनों पैरों को सीधा सामने फैलाकर,दोनों हथेलियों को पीछे आधार पर टिकाकर,बिलकुल आराम से बैठना। तलहथियों के विन्दुओं को उपचारित करना हो तो,पैर की मुद्रा तो पूर्ववत रहेगी,किन्तु ऊपर का भाग सीधा होगा,और हथेलियां सुविधानुसार आगे रखी जायेंगी। उदर-प्रदेश के विन्दुओं पर रोगी यदि स्वयं उपचार ले रहा हो तो उचित है कि आराम से धीरे-धीरे टहलते हुए ले, एवं चिकित्सक द्वारा उपचारित किया जा रहा हो तो दीवार के सहारे खड़े होकर उपचार कराये। हाथ,पैर,सिर, गर्दन आदि अंगों पर उपचार करने के लिए सुविधानुसार किसी भी सुखासन का उपयोग किया जाना चाहिए। वैसे,शवासन सर्वोत्तम मुद्रा है,जिसमें पीठ के अतिरिक्त सभी प्रतिबिम्ब केन्द्र समूहों पर उपचार किया जा सकता है।
            उपचार-काल में शरीर के किसी भाग में (मन में भी) अवांछित तनाव न रहे,इस बात का ध्यान रोगी और उपचारकर्ता दोनों को होना चाहिए। उपचारकर्ता को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जिस विन्दु पर उपचार किया जा रहा हो,उस विन्दु,उससे सम्बन्धित अवयव(अंग) एवं प्रभावित(रुग्ण) अंग के बीच यानी त्रिकुटी सम्बन्ध यथासम्भव सीधा और तनाव-मुक्त (वाधा-रहित) हो। ऐसा करने से त्वरित लाभ की आशा काफी होती है।
            पूर्व अध्याय—चिकित्सा-काल में भी अव्यक्त रुप से रोगी की शारीरिक मुद्रा का यदा कदा निर्देशन हुआ है,जो व्यवहार काल में ध्यातव्य है। उक्त बातों के अतिरिक्त शरीरिक स्थिति और रोग का प्रकार क्रम में कुछ और भी खास बातें हैं,जिनपर रोगी से अधिक उपचार करने वाले का ध्यान रहना आवश्यक है। यथा—
            1.रोगी शारीरिक रुप से थका हुआ हो,लम्बी यात्रा- खास कर पदयात्रा,या सायकलिंग करके आया हो,मेहनत-मजदूरी,कुस्ती-कसरत करके आया हो,पसीने से लथपथ हो, सांस फूल रही हो,जोरों की भूख-प्यास लगी हो,आतंक या भयग्रस्त हो,अत्यधिक चिन्तित हो—इन स्थितियों में तत्काल उपचार प्रारम्भ कर देना,लाभ के बजाय हानिकारक ही होगा। उचित होगा कि इन स्थितियों में आवश्यकतानुसार विश्राम10-20मि.(विलम्ब करके),किंचित अन्न-जल पूरित करके ही,उपचार करे। विशेष स्थिति में सर्वप्रथम चारो चैनलों (दोनों हाथ-पैर के) पर अतिसामान्य दबाव देकर,10मि.शवासन मुद्रा में लिटा दे,फिर उपचार प्रारम्भ करे।
            2.नाड्योपचारक को मनोविश्लेषणात्मक बुद्धि रखते हुए बालकों,कोमल प्रकृतिवालों, महिलाओं आदि की चिकित्सा आते के साथ हठात प्रारम्भ न करे।
            3.महिलाओं की शारीरिक स्थिति का ध्यान (ज्ञान) रखना परम आवश्यक है। रजोदर्शन(menstruation period) में प्रजननांग केन्द्रों पर गहरा एवं केन्द्रगामी               ( stimulating type of pressure) उपचार से रज-प्रवाह बढ़ने की आशंका रहती है, जिसके परिणाम स्वरुप अवसादक स्थिति(sedative) उत्पन्न हो जा सकती है। अतः चिकित्सक को चाहिए कि दर्शन, स्पर्शन, सम्भाषण की निदान त्रिकुटी का सहारा लेते हुए,विवेक-पूर्ण कार्य करे। दुःसंयोगवश यदि अवसाद की स्थिति उत्पन्न ही हो जाये तो शीघ्र ही रुग्णा को शवासन में लिटाकर,चारो खंड के प्रथम चैनलों(अंगूठे-तर्जनी के बीच वाले मांसल भाग) पर आधे-आधे मिनट तक बारी-बारी से दबाव देना चाहिए। उपलब्ध हो तो कृपाचक्र या शक्तिचक्र नामक विशेष उपकरण का भी उपयोग किया जा सकता है।
            4.गर्भवती महिलाओं को गर्भ के प्रथम एवं अन्तिम मास में सीधे प्रजनन-तन्त्र (Re- productive  system) सम्बन्धी केन्द्रों पर उपचार यथासम्भव न किया जाए। तत्सम्बन्धी अप्रत्यक्ष केन्द्रों को ही उपचारित करके,यथोचित लाभ पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। विशेष स्थिति में यदि अत्यावश्यक प्रतीत हो,तो कम मात्रा में हल्का दबाव देकर उपचार किया जा सकता है। अप्रत्यक्ष केन्द्रों में सभी चैलन(4x4)सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहे गये हैं। विशेष कर आसन्न प्रसव की स्थिति में ही सीधे प्रजनांगों से सम्बन्धित केन्द्रों को उपचारित किया जाना चाहिए।
            5.चोट,मोच,ब्रण आदि आगन्तुज व्याधियों की स्थिति में सीधे प्रभावित अंगारुढ़ केन्द्रों पर कदापि उपचार न करे। इसके लिए अन्य विहित केन्द्रों का चुनाव कर लेना ही श्रेयस्कर है।
            6.हृदयरोगियों की चिकित्सा काफी सावधानी से करनी चाहिए। खास कर हृदय-केन्द्र को उपचारित करते समय अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। अवसादक स्थिति उत्पन्न होने पर पूर्वकथित उपचार करना चाहिए। अस्तु।

क्रमशः...