Wednesday, 30 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-160

गतांश से आगे....अध्याय 27 भाग 2

आगे के चित्र में मोबाइल टावर के ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाह को भवन की ओर आने से रोकने के लिए, उस दिशा में ईंगित (फोकश) करते हुए त्रिशूल का चित्र दिखलाया गया है। विजली के उच्चशक्ति वाले टावरों के लिए भी इसी भांति त्रिशूल का प्रयोग किया जाना चाहिए। हालाकि इन दोनों के ऊर्जा-प्रवाह-क्षेत्र में काफी अन्तर है,फिर भी लाभ अवश्यमभावी है। पाश्चात्य चिन्तन इन बातों को स्वीकारे, या न स्वीकारे,किन्तु भारतीय विज्ञान का यह अमोघ अस्त्र है-  इसे न भूलें।


२.वास्तुवंशी-प्रयोग-साधना — इसकी थोड़ी चर्चा २६वें अध्याय  में ही की जा चुकी है। यहाँ इसकी साधना की बात करते हैं। ध्यातव्य है कि वाँसुरी बाजार से सीधे खरीद कर,लगानी नहीं है,बल्कि विधिवत प्राण- प्रतिष्ठा-पूजा करके लगायी जाये। पूजा की विधि सामान्य सी है,अन्य पूजा की तरह ही। वंशी में श्रीकृष्ण की भावना करके पूजा करनी है, और पूजा के बाद कम से कम एकसौआठ बार प्रत्येक वाँसुरी के लिए (वाँसुरी की संख्या के अनुसार) ऊँ श्रीकृष्णाय नमः मन्त्र का जप अवश्य कर लिया जाय। अधिक जप से अत्यधिक ऊर्जा मिलेगी- इसमें दो राय नहीं। हो सके तो अधिकाधिक जप किया जाय। किसी शुभ दिन(पंचाग शुद्धि विचार करके)क्रिया की जा सकती है।आगे दो चित्रों के माध्यम से इसके प्रयोग को दर्शाया गया है।पहले चित्र में कई संख्याओं में वंशी लगायी गयी है,जिनका क्रम एक दूसरे से विपरीत दिशा में है। वंशी की संख्या वीम(शहतीर)की लम्बाई पर निर्भर है,जो विषय संख्या में ही होनी चाहिए। और दूसरे चित्र में सिर्फ दो ही वंशी है- जिसे प्रवेश द्वार पर लगाना है। किसी गोल पतले डण्डे में चित्रानुसार बांध देना है। ध्यातव्य है कि अगले भाग में दोनों वंशियों के बीच की दूरी सिर्फ दो अंगुल होगी,और पिछले भाग की दूरी नौ अंगुल।अतः आधारभूत डंडा भी उसी हिसाब से बड़ा-छोटा लेना चाहिए। पीले रंग के रिबन से बाँध कर प्रवेश द्वार पर इसे लटका देना है। स्वाभाविक है कि हवा में हिलता हुआ वंशी का जोड़ा अपनी दिशा भी बदलता रहेगा,किन्तु इसकी चिन्ता नहीं करनी है।बस ध्यान रहे कि बन्धन ऐसा डाला जाय कि अधिक समय तक मुखभाग (दोअंगुल वाला) बाहर ही हो। नकारात्मक ऊर्जा को बाहर भेज कर सकारात्मक ऊर्जा को अन्दर लाना इसका कार्य है। जैसे शरीर के दो नासाछिद्र अपना कार्य करते हैं।


क्रमशः...

Monday, 28 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-159

गतांश से आगे....
            अध्याय २७ वास्तुदोष-निवारण-साधन- भाग एक               
    
पिछले अध्याय में चार प्रकार के वास्तुदोषों की चर्चा की गयी। प्रसंगवश तत्सम्बन्धी कुछ उपाय भी सुझाये गये।यहाँ, इस अध्याय में उन उपायों की चर्चा होगी,जो किसी न किसी तरह की साधना पर आधारित हैं। वास्तुदोषनिवारणयन्त्र की चर्चा की जा चुकी है,किन्तु उसे कैसे तैयार करेंगे- बतलाना शेष है। इसी तरह की कुछ और भी क्रियायें हैं,जो सीधे साधना सम्बन्धी हैं।
१.     वास्तुदोषनिवारक वर्छी(अंकुश) और त्रिशूल-साधना—
    भवन की अन्तःवाह्य सुरक्षा के लिए सुरक्षाकवच की चर्चा तेरहवें अध्याय में परिसर-प्रसंग में की जा चुकी है।इसकी निर्माण-विधि भी वहीं बतलायी जा चुकी है(द्रष्टव्य-अध्याय १३,परिसर-प्रसंग)। आवश्यकतानुसार इसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए। किसी भी भवन के लिए यह एक अमोघ उपाय है। दोष और परेशानी न होते हुए भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। दोष यदि हो तो पहले वास्तुशान्ति कर लें। (इस क्रिया के लिए गृहप्रवेशवास्तुशान्ति पद्धति,अध्याय-२३ का अवलोकन करना चाहिए)  उसी क्रम में वास्तु बन्धन की क्रिया भी की जाये,यानी घर की सफाई करके,कूड़ाकरकट बाहर फेंकने के बाद दरवाजा बन्द किया जाता है,ऐसा नहीं कि पहले दरवाजा ही बन्द करलें।ध्यातव्य है कि विधिवत साधित लोहे की दस बर्छियों में दस दिक्पालों को स्थापित करके,दशों दिशाओं में छत के ऊपरी भाग पर लगा दिया जाना चाहिए।
     वर्छी की भांति ही(किंचित भिन्न रुप से) त्रिशूल की स्थापना का भी विधान है।कलोहे की गोल,चिकने छड़ से गृहस्वामी के हाथ से कम से कम सवाहाथ,वा सताइस अंगुल नाप का त्रिशूल किसी शनिवार को ही बनवायें। त्रिशूल दण्ड में अठारह अंगुल के बाद ही तीनों शूल लगाये जायें।  दण्ड और शूल का आपसी संतुलन भी महत्त्वपूर्ण है- इसका ध्यान रखें।  



    विधिवत निर्मित त्रिशूल को लोहार के यहाँ से संध्या काल में घर लाकर पंचगव्य(गाय का गोबर,मूत्र,दूध,दही,घी) से शुद्ध करने के बाद गंगाजल एवं कुशोदक से भी शुद्ध करें। तत्पश्चात् नवीन लाल वस्त्र का आसन देकर पंचोपचार पूजन करें,पुनः ॐ शं शनैश्चराय नमः मन्त्र का तेइस माला जप करें। जप के बाद घी से तेइस आहुतियां भी उक्त मंत्र से डालें। यह क्रिया शनिवार की रात्रि में ही की जाय। पुनः सोमवार आने पर प्रातः या सुविधानुसार सायं काल में उस त्रिशूल में भूतभावन भोलेनाथ का आवाहन करके पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात् ॐ नमः शिवाय मन्त्र का ग्यारह माला जप करें।जप के बाद उक्त मन्त्र से ही एकसौआठ आहुतियां भी प्रदान करें।इस प्रकार उपयोग के लिए त्रिशूल तैयार हो गया।जप की यह संख्या एक त्रिशूल के लिए है।अधिक के लिए जप की संख्या भी बढ़ानी होगी।पूजन आदि कार्य एकत्र रुप से
अधिकाधिक मात्रा में किया जा सकता है।
   आवश्यकतानुसार एकाधिक त्रिशूल का प्रयोग एक ही भवन के लिए किया जा सकता है।जैसे,मान लिया भवन के एक ओर मोबाइल टावर है, दूसरी ओर कोई मन्दिर,मस्जिद,मजार आदि,तीसरी ओर भी ऐसा ही कुछ अवांछित निर्माण है,जिससे ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाहित हो रही है,तो ऐसी स्थिति में विभिन्न दिशाओं में इस साधित त्रिशूल का प्रयोग कर सुरक्षित हुआ जा सकता है।ईशानकोण से वायुकोण के बीच भवन से सटे(सातफीट के अन्दर)यदि विजली का ट्रान्सफर्मर है,तो ऐसी स्थिति में भी इस साधित त्रिशूल का प्रयोग करके निरापद हुआ जा सकता है।विभिन्न प्रकार के द्वारवेध में भी यह समानरुप से उपयोगी है।
     ध्यातव्य है दिक्पाल स्थापन-बन्धन वाली बर्छी त्रिशूल से बिलकुल भिन्न चीज है। इन दोनों का अलग-अलग कार्य है। हाँ,एक साथ इन दोनों अस्त्रों का प्रयोग किया जा सकता है। बाहर से आकर, भवन को प्रभावित करने वाली ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाह को रोकने के लिए ये दोनों बड़े ही अद्भुत उपाय हैं।

क्रमशः.....

Friday, 25 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-158

गतांश से आगे...अध्याय 26 भाग 6

(4) व्यवस्था दोष- कमरों की आन्तरिक व्यवस्था में कई तरह की गड़बड़ी पायी जाती है-जैसे पलंग,ड्रेसिंग टेबल,डायनिंग टेबल,रसोई घर में चूल्हे की दिशा,सिंक,कूड़ादान इत्यादि। इन सब बातों के लिए पूर्व अध्यायों में बताये गये नियमों का सही पालन करना ही बुद्धिमानी है। कमरों की आन्तरिक साजसज्जा के बारे में जो भी नियम बतलाये गये हैं,उनका यथासम्भव पालन करना चाहिए। किसी दोषनिवारण का उपाय लाचारी में ही करना चाहिए,यानी परिवर्तन और सुधार कदापि सम्भव न हो तब।किसी प्रकार के वास्तुदोषनिवारण का प्रयोग एक दवा की तरह है,और दवा खाकर स्वस्थ रहना अन्तिम उपाय है।अतःउचित है कि निर्दिष्ट नियमों का पालन किया जाय।
          

 विभिन्न पौधों से उत्पन्न वास्तुदोषः- गृह-समीप-वृक्ष-विचार नामक सत्रहवें अध्याय में कहा गया है,कि वृक्षों का सामीप्य भी वास्तुदोष पैदा करता है,(द्रष्टव्य उक्त अध्याय)। अवांछित या दोषपूर्ण वृक्ष को विधिवत विसर्जित करने की बात उसी प्रसंग में बतलायी गयी है,साथ ही अपरिहार्य स्थिति में दोष निवारण हेतु मध्य में अन्य शुभ वृक्ष-स्थापन की भी चर्चा की गयी है।जैसे पश्चिम में बरगद का वृक्ष हानिकारक है, किन्तु उसके बीच यानी भवन और वटवृक्ष के बीच पीपल का वृक्ष लगा दिया जाय तो वटवृक्ष का दोष समाप्त हो जाता है। तुलसी का पौधा भी विविध वास्तु दोषों का शमन करने में सक्षम है। पादप-दोष परिहार में इसका प्रयोग बहुत ही उत्तम है। वृक्षजनित दोषों के परिहार स्वरुप वृक्षों का ही प्रयोग करना चाहए। अस्तु।

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Wednesday, 23 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-157

गतांश से आगे...अध्याय 26 भाग 5

१.                 विपरीत दिशा में निर्माण दोष- यह भी एक आम दोष है-भवन में आगे की ओर दिखावे के लिए ऊँचा निर्माण कर लेते हैं,और पीछे नीचा रह जाता है।यदि यह दिशा विपरीत(दक्षिण-पश्चिम) हुयी तो बहुत अनिष्टकारी होती है।गृहस्वामी का विकास अवरुद्ध होकर,नाना प्रकार की अवांछित समस्याओं का सामना करना पड़ता है,और स्थिति ये होती है कि चाह कर पुनर्निर्माण सम्भव नहीं होपाता। उचित है कि किसी प्रकार पुनर्निर्माण कर के पूरे मंडल को समान ऊँचाई प्रदान करें।यदि ऐसा सम्भव नहीं हो तो कम से कम नीचे पड़ने वाले भाग के दोनों छोरों पर लकड़ी की वल्ली/बांस खड़ा करके, वास्तुमन्त्रसाधित तांबे के तार से अलगनी की तरह बन्धन करदें,मानों काल्पनिक दीवार समान ऊँचाई की खड़ी कर दी गयी। ताम्रवेष्ठन क्रिया विधि सताइसवें अध्याय में आगे बतायी जायेगी।
२.                छप्पर वा छत की विपरीत ढालदोष- टीन,करकट या किसी प्रकार के छप्पर की ढाल दक्षिण-पश्चिम नहीं होनी चाहिए।प्रायः ऊपरी मंजिल पर सीढ़ी की छावनी इस तरह से लोग कर दिया करते हैं।ढलान दोनों ओर(उत्तर-दक्षिण,या पूरब-पश्चिम) हो तो कोई हर्ज नहीं,किन्तु विपरीत दिशा में एक ओर नहीं होना चाहिए। पश्चिम की तुलना में सिर्फ दक्षिण का ढाल अधिक हानिकारक है। विपरीत दिशा से गिरनेवाला बरसात का पानी नुकसान देय होता है।इसके निवारण के लिए ढलान के निचले छोर पर खड़ी ईंट की दीवार लगा दें,साथ ही छप्पर के नीचे वास्तुयन्त्र स्थापित कर दें।

३.                छत में दोषपूर्ण बीम- बड़े आकार के कमरों के बीचोबीच बीम का गुजरना अभियान्त्रिकी विवशता है,किन्तु वास्तु-सम्मत नहीं है। पहले मोटी-मोटी लकड़ियों के बीम हुआ करते थे,जो कि आजकल छड-सीमेंट-कंकरीट के बनाये जा रहे हैं। वस्तुतः दोष इन लटकते हुए बीमों से है।अब कोई कह सकता है कि छत की ढलाई में भी छड़ आड़े-तिरछे बिछाये गये हैं,तो क्या वे भी दोषपूर्ण हैं? सूक्ष्म विचार करें तो दोषपूर्ण अवश्य हैं,किन्तु आधुनिक युग की विवशता है। इसके बिना घर बन ही नहीं पायेगा।फिर भी कमरे में लटकती हुयी बीम तो अत्यधिक हानिकारक है।उसका दूषित ऊर्जा-प्रभाव बड़ा ही घातक होता है। लोग लोहे के गार्टर को सीमेन्ट से ढक कर निश्चिन्त हो जाते हैं,किन्तु दोष कहीं जाता नहीं, वहीं छिपा मौजूद रहता है। इसके निवारण के लिए सर्वोत्तम है- बांस की बासुरी पूरे बीम पर लम्बाई के अनुसार- पांच,सात,नौ,ग्यारह की विसम संख्या में लगायी जाये। ध्यान देने योग्य है कि सभी बांसुरी का मुंह एक ही तरफ न होकर,एक के बाद एक विपरीत दिशा में होनी चाहिए। जैसे मान लिया कमरे में उत्तर से दक्षिण की ओर ग्यारह फीट लम्बा बीम गुजर रहा है। इसमें एक-एक फीट की दूरी पर बांसुरी लगाना है,तो पहली बांसुरी का मुंह पूरब की ओर,दूसरी का मुंह पश्चिम की ओर रहेगा,पुनः तीसरी का मुंह पूरब की ओर और चौथी का मुंह पश्चिम की ओर रहना चाहिए। इसी भांति दिशा बदलते हुए सभी बाँसुरियों को बीम में किसी क्लिप के सहारे जड़ देंगे।
     
अब तक, नौ विन्दुओं में संरचनादोष की चर्चा हुयी।उससे पहले प्रधान तीन प्रकार के दोषों की बात की गयी थी। अब दोषों का आखिरी प्रकार व्यवस्थादोष की चर्चा करते हैं-
 (4) व्यवस्था दोष- कमरों की आन्तरिक व्यवस्था में कई तरह की गड़बड़ी पायी जाती है-जैसे पलंग,ड्रेसिंग टेबल,डायनिंग टेबल,रसोई घर में चूल्हे की दिशा,सिंक,कूड़ादान इत्यादि। इन सब बातों के लिए पूर्व अध्यायों में बताये गये नियमों का सही पालन करना ही बुद्धिमानी है। कमरों की आन्तरिक साजसज्जा के बारे में जो भी नियम बतलाये गये हैं,उनका यथासम्भव पालन करना चाहिए। किसी दोषनिवारण का उपाय लाचारी में ही करना चाहिए,यानी परिवर्तन और सुधार कदापि सम्भव न हो तब।किसी प्रकार के वास्तुदोषनिवारण का प्रयोग एक दवा की तरह है,और दवा खाकर स्वस्थ रहना अन्तिम उपाय है।अतःउचित है कि निर्दिष्ट नियमों का पालन किया जाय।
 क्रमशः...


Tuesday, 22 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-156

गतांश से आगे... अध्याय 26 भाग 4

सीढ़ियों का वास्तुदोष- वास्तुमंडल में कहाँ-क्या नामक अध्याय में सीढ़ियों का उचित स्थान दर्शाया गया है।नैर्ऋत्य कोण को भारी होना चाहिए- ऐसा मानकर लोग प्रायः इस कोण पर सीढ़ियाँ बना देते हैं,किन्तु यह उचित नहीं है।इससे नीचे-ऊपर दोनों मंजिलें दोषपूर्ण होजाती हैं। ईशानकोण की सीढी सर्वाधिक हानिकारक है।सीढ़ी कहीं भी हो,सुविधा के लिए उसके नीचे ईन्जीनियर की राय से शौचालय या सेप्टीटैंक बन जाता है,तो और भी हानिकारक हो जाता है। प्रायः जगह की कमी से या आदतन लोग सढ़ियों पर सामान रख देते हैं,इससे भी वास्तुदोष पैदा होता है। सीढ़ियाँ बिलकुल खाली और साफ-सुथरी रहनी चाहिए। ईशान कोण की सीढ़ी का कोई सही परिहार नहीं है,इसे हर हाल में हटाना ही चाहिए। वैसे ठीक विपरीत नैर्ऋत्यकोण को भारी करके इसका आंशिक हल निकाला जा सकता है। सम्भव हो तो नैर्ऋत्यकोण की जमीन खोद कर भारी मात्रा में कुछ वोल्डर यहाँ गाड़ दिये जायें,इससे भी कुछ परिहार होजाता है।अन्य स्थान पर बनी दोषपूर्ण सीढ़ी के निवारण के लिए(तोड़ना यदि सम्भव न हो तो)सीढ़ी के नीचे, प्रत्येक चढ़ाई पर वास्तुदोष निवारणयन्त्र लगाना चाहिए। इसे नीचे के चित्र में स्पष्ट किया जारहा है-
यहाँ दो चित्र दिये गये हैं- एक तो सीढ़ियों का सही स्थान दर्शाता है,और दूसरा है सीढियाँ यदि दोषपूर्ण स्थिति में हों ते उनके नीचे वास्तुदोषनिवारण यन्त्र कहाँ स्थापित करें।(यन्त्र निर्माण की विधि इसी पुस्तक में अन्यत्र मिल जायेगा)     


               विधिवत प्राणप्रतिष्ठित किये हुए तांबें या पीलल के यन्त्र को सीढ़ी के तल में जड़ दें। इसे प्रत्येक तल में(हरमोड़पर)लगाना चाहिए।ध्यातव्य है कि यह यान्त्रिक उपाय ईशान कोण की सीढ़ी का दोष कदापि नहीं मिटा सकता।सीढ़ी के वास्तुदोष को दूर करने के वास्तुवंशी का भी प्रयोग किया जाता है,जो काफी लाभदायक सिद्ध होता है।पीतल की बनी वंशी के जोड़े को खास तरीके से बाँध कर सीढ़ी के प्रवेश और निकास द्वार पर लटका दिया जाता है।आगे इसी अध्याय में दोषनिवारणसाधना क्रम में इसकी चर्चा करेंगे। सीढ़ियों का व्यतिक्रमित होना,यानी सभी की ऊँचाई-चौड़ाई एक समान न होना भी दोषपूर्ण माना गया है।एक और गड़वड़ी यहाँ पायी जाती है- सुन्दरता या सुविधा की दृष्टि से कारीगर मोड़पर के पायदान को तिरछा (सिंघाड़े जैसा) कर देता है।यह भी वास्तुसम्मत नहीं है।इन सभी दोषों के निवारण के लिए वास्तुवंशी या वास्तुयन्त्र का प्रयोग किया जाना चाहिए।अज्ञानता में प्रायः लोग वामावर्त(anticlockwise)सीढ़ी बना देते हैं। यह बहुत ही हानिकारक है।यदि गलत स्थान में गलत ढंग(विपरीत)से बना हुआ होगा तो दोष भी ज्यादा होगा। हो सके तो इसे तोड़कर पुनः सही ढंग से बनायें।न सम्भव हो तो उक्त यन्त्र की शक्ति और संख्या को बढ़ाकर प्रयोग कर सकते हैं।


मुख्यद्वार का वास्तुदोष- पिछले अध्यायों में मुख्यद्वार पर काफी चर्चा की गयी है।वास्तु रुपी शरीर का यह मुंह है।अतः इसका दोषपूर्ण होना बहुत हानिकारक है। इसमें मुख्य रुप से चार दोष पाये जाते हैं- स्थानदोष,दिशादोष,आकारदोष और वेधदोष।सही दिशा में,किन्तु गलत स्थान में मुख्यद्वार का होना स्थान दोष कहलाता है।यूँ तो किसी भी कोण पर,किसी भी दिशा का मुख्यद्वार हानिकारक है,किन्तु नैर्ऋत्य कोण पर (पश्चिम या दक्षिण मुख)द्वार सर्वाधिक दोषपूर्ण है।इसका कोई सही और ठोस निवारण भी नहीं है। अतः हर हाल में इसे बन्द करना ही चाहिए।मध्य दक्षिण भी सर्वाधिक हानिकर श्रेणी में है।परिवर्तन का कोई विकल्प यदि न हो तो ऐसी स्थिति में ऐसे द्वार के समीप ही(दीवार से सटे,एक छोटा सा घरौंदा बनावे,और उसमें मिट्टी की दो मूर्तियों(पुरुष-स्त्री)को विधिवत स्थापित कर दे।यह क्रिया रात्रि के दूसरे प्रहर में (नौबजे के बाद)करनी चाहिए। समय-समय पर उसकी पूजा-अर्चना भी की जाय। हर साल इन मूर्तियों का विधिवत विसर्जन भी किया करे,और पुनः नयी मूर्ति की स्थापना की जाय। इस उपचार से काफी लाभ होता है,किन्तु ध्यान रहे यह अन्तिम अस्त्र है। कोई उपाय(विकल्प)न हो तब इसे प्रयोग करें।अन्य दिशा में गलत स्थान पर मुख्यद्वार हो तो गणेशजी की मूर्ति स्थापित कर दोष निवारण हो सकता है,किन्तु एक बार मूर्ति रख देने भर से काम नहीं चलेगा, नियमित उनकी पूजा-अर्चना भी होनी चाहिए। सामान्य त्रृटि की स्थिति में वास्तुदोषनिवारण यन्त्र स्थापित करने से भी दोष कट जाता है। प्रवेशद्वार पर ही सेप्टीटैंक बना हो,जिस पर से गुजरे बिना अन्दर नहीं जाया जा सके,ऐसी स्थिति में उच्चशक्ति का ताम्रवेष्ठन(दाबकयन्त्र) किंचित कारगर हो सकता है।इसके निर्माण की चर्चा अध्याय आगे किया जायेगा।मुख्यद्वार का आकार भवन के आकार के अनुसार निश्चित किया जाता है। इसकी चर्चा पिछले अध्यायों में की जा चुकी है।आकार अनुकूल न हो तो वास्तुदोषनिवारणयन्त्र स्थापित करके लाभ लिया जा सकता है।द्वारवेध की चर्चा भी पिछले प्रसंग में की जाचुकी है(इसका पुनरावलोकन किया जा सकता है)।प्रवेशद्वार किसी प्रकार से वेधित न हो,इसका ध्यान रखे।बीच में कोई सार्वजनिक मार्ग आता हो तो वेध स्वयमेव कट जाता है।वेध की दूरी सातफीट से अधिक हो तो भी दोष कम हो जाता है।वेध को निर्मूल करना,हटाना,दूर करना सम्भव न हो (जैसे वेध दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हो) ऐसी स्थिति में विघ्नेश्वर गणेश की स्थापना बहुत ही सहायक सिद्ध होती है।वास्तुदोष निवारण यन्त्र भी लगाया जा सकता है। यन्त्र की ऊर्जा दोष की स्थिति और मात्रा पर निर्भर है। विधिवत स्वस्तिक स्थापन भी मुख्यद्वार के लिए अति उपयोगी साधन है।इसकी स्थापनाविधि की चर्चा आगे सताइसवें अध्याय में होगी।

क्रमशः...

Saturday, 19 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-155

गतांश से आगे...अध्याय 26 भाग 3

1)    संरचना दोष- भवन बनाते समय, अज्ञानता वश या लाचारी में वास्तुनियमों की अवहेलना होकर,अनुचित स्थान पर निर्माण हो जाना, संरचना-दोष कहलाता है।जैसे रसोई घर अग्नि क्षेत्र में होना चाहिए,जलस्रोत ईशान में होना चाहिए,दक्षिण-पश्चिम में ऊँचा निर्माण हो- पूरब-उत्तर की तुलना में,या चारो ओर समान ऊँचाई हो,सेप्टीटैंक सही स्थान पर हो,ब्रह्मस्थान रिक्त हो... इत्यादि नियमों का पालन न हो पाना इस दोष के अन्तर्गत आता है। इन विविध दोषों का सही परिहार बड़ा ही कठिन होता है। यहाँ ऐसे ही कुछ दोषों की अलग-अलग चर्चा करके,उसका उपचार भी सुझाया जा रहा है।यथा—
१.      पीड़ित ब्रह्मस्थान-दोष- भवन के अन्दर यह सर्वाधिक धातक दोष है। वास्तुनियम है कि ब्रह्मस्थान पूर्णतः रिक्त,भारमुक्त, अवाधित,स्वच्छ और खुला हो। निर्माण काल में यदि इन बातों का ध्यान नहीं दिया गया,और इस भाग में कोई स्तम्भ (पीलर)(बीम नहीं)गुजर रहा है,अथवा किसी प्रकार का भारी निर्माण कर दिया गया,या तुलनात्मक रुप से यह स्थान ऊँचा होने के वजाय नीचा हो गया,बोरिंग,कुआं आदि बना दिया गया, सेप्टीटैंक इस भाग में बन गया- इस प्रकार के दोषों से त्राण पाना बड़ा ही कठिन हो जाता है। और सच पूछा जाय तो इन दोषों का स्थायी हल भी शायद ही हो पाता है। एक मात्र ऑपरेशन यानी दोष को पूर्णतः दूर करना ही सही उपाय है। जैसे बोरिंग,कुआं आदि है तो उसे हटा कर सही स्थान पर ले जायें। सेप्टीटैंक का होना तो सबसे अधिक हानि कारक है, उसे तो हर हाल में हटाना ही होगा। स्तम्भ सिर्फ ऊपर-ऊपर और ईंट का है,तो कम हानि कारक है,किन्तु यदि लोहे के छड़ और कंकरीट का पीलर जमीन के भीतर पांच-दस फीट धंसा हुआ है,तो उसका सही निवारण बड़ा ही कठिन है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी मनुष्य के हृदय में भाला चुभोया हुआ हो। अब भला उस मनुष्य को कितना हूँ बड़ा हृदयरोग विशेषज्ञ कैसे ठीक कर सकता है- यानी ऑपरेशन करना ही होगा,कुछ दिन दवा भी चलानी ही होगी।सर्वोत्तम है कि इस स्थान पर सूर्य की रौशनी आये,खुले आकाश को इस स्थान से देखा जा सके। यदि ये सभी उपाय सम्भव न हों तो अति
उच्चशक्ति का वास्तुदोषनिवारणयन्त्र इस स्थान पर लगाना चाहिए।(यन्त्र निर्माण की चर्चा इसी अध्याय के अन्त में की जायेगी)
२.    सेप्टीटैंक का अनुचित स्थान- वास्तुमंडल में सेप्टीटैंक के लिए कुछ खास स्थान ही नियत किये गये हैं(द्रष्टव्य-वास्तुमंडल में कहाँ-क्या)। वस्तुतः यह मल का भण्डारण है,अतः किसी भी शुभ ऊर्जा वाले क्षेत्र में इसका होना अनुचित है। किसी कोण पर,मध्य में,प्रवेशद्वार पर,या ऐसी जगह पर बना हुआ हो जिससे होकर ही घर में प्रवेश करना लाचारी हो तो उसका स्थानान्तरण अनिवार्य है। प्रायः लोग सीढ़ी के नीचे टैंक बना देते हैं,इससे पूरा वास्तुमंडल प्रभावित हो जाता है।इसे तोड़कर दूसरे स्थान पर लेजाना भी काफी खर्चीला है। साथ ही बने मकान में उचित स्थान भी नहीं दीखता जहाँ हटाया जा सके। ऐसी स्थिति में कुछ उपाय सुझाये जाते हैं।हालाकि यह स्थायी निवारण नहीं है,और किस व्यक्ति के लिए,किस स्थान पर, कितना कारगर होगा- दावे के साथ कहा भी नहीं जा सकता। प्रायोगिक अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि कहीं-कहीं सामान्य उपचार भी काफी सफल सिद्ध हो जाता है,और कहीं विशेष उपचार भी व्यर्थ हो जाता है।आगे सत्ताइसवें अध्याय में दोषनिवारणसाधनाक्रम में इसकी पुनः चर्चा की जायेगी।
३.    कुआँ,बोरिंग,चापाकल आदि जलस्रोतदोष- ज्ञातव्य है कि इनका सर्वोत्तम स्थान ईशान कोण है। मध्य पूर्व,मध्य पश्चिम,मध्य उत्तर भी ग्राह्य है। किन्तु इनके अतिरिक्त अन्य स्थान दोषपूर्ण हैं। अन्य स्थानों का तो परिहार हो सकता है,परन्तु नैर्ऋत्य और दक्षिण का कोई ठोस परिहार भी नहीं है। उसे वहाँ से हटाना ही पड़ेगा या कहें बन्द करना ही एकमात्र उपाय है। अग्नि,वायु आदि कोणों पर हो तो उसके परिहार स्वरुप सही स्थान- ईशान या मध्य पूर्व में एक और जलस्रोत बना दें। अशुभ स्थान पर कुआँ यदि है,तो परिहार स्वरुप शुभ स्थान में कम से कम चापाकल लगा देने से भी दोष कट जायेगा। कुंए के सम्बन्ध में एक अज्ञानतापूर्ण चलन प्रायः देखते हैं कि उसे मजबूती से ढक दिया जाता है। सच पूछें तो यह खुला रहने से भी अधिक घातक है।गलत स्थान में बने कुँएं को ढक कर दोष को कई गुना बढ़ा देना है। इसे विधिवत विसर्जन करके,शुद्ध मिट्टी या बालू से भर देना चाहिए। वरुण विसर्जन अति आवश्यक है।कभी-कभी लोग जलस्रोत के प्रतीक रुप मटके(कलश)में जल भर कर ईशानकोण में रखने का सुझाव दे देते हैं,यह बिलकुल बचकानी हरकत है।इससे कुछ लाभ नहीं। पुराना बोरिंग,चापाकल आदि को बन्द करने या हटाने का सही तरीका ये है कि अन्दर में धंसे लोहे या प्लास्टिक के पाइप को पूरी तरह निकाल दिया जाय,न कि उसी में पड़ा रहने दिया जाय। पाइप को निकालने के बाद रिक्त स्थान में बालू भर देना चाहिए।आधुनिक मतावलम्बी तथाकथित वास्तु शास्त्री किसी भी दोष के परिहार स्वरुप उसके प्रतीकों का उपयोग करते हैं। यह बिलकुल नादानी है।उपचार उपचार है। सही तरह से होने पर ही कारगर होगा- मान्त्रिक हो या भौतिक। क्या कोई बीमारी दवा की गोली खाने के बजाय दवा की तसवीर रखने से ठीक हो सकती है ? खाद्य पदार्थों की तसवीर देखने से भूख जा सकती है ? तो फिर प्रतीकात्मक प्रयोग से क्या होना है- समझने वाली बात है।
    रसोईघर का अनुचित स्थानदोष- रसोई घर वास्तु मंडल का अग्नि-संतुलक है,पाचन संस्थान है। मानव शरीर में पाचन संस्थान(Digestive System) का जो महत्त्व है,कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति वास्तुमंडल में रसोईघर की है। रसोईघर यदि मध्य दक्षिण या नैर्ऋत्य कोण में बना हुआ है,तो इसका कुछ भी सही परिहार नहीं है।इसे यहाँ से हटाना ही होगा।यम और राहु के स्थान में रहकर रसोईघर कभी सुरक्षित नहीं होसकता।मध्य पश्चिम यानी शनि के स्थान में हो तो खाना बनाने की दिशा का परिवर्तन किंचित परिहार हो सकता है।इस स्थान के रसोई घर की आन्तरिक व्यवस्था में नियमानुसार सुधार करके सही परिहार निकाला जा सकता है।इसी भांति वायुकोण या अन्य स्थानों के भी परिहार-नियम होंगे।पिछले अध्यायों में रसोईघर की संरचना पर प्रकाश डाला गया है। वहाँ कुछ वैकल्पिक सुझाव भी दिये गये हैं।विशेष जानकारी के लिए वहाँ दिये गये चित्रों का अवलोकन करना चाहिए। रसोई घर में अन्नपूर्णा की नियमित पूजा,और उक्त कक्ष के अग्निकोण में नित्य सायं घी का दीप जलाना काफी लाभदायक होता है।सुविधानुसार कभी भी रसोईघर में ही संक्षिप्त रुप से वास्तुहोम,नवग्रहहोम,अग्नि के निमित्तविशेष होमादि क्रिया करने से रसोईघर का वास्तुदोष शमित होता है।अग्नि का रंग लाल है,अतः इस रंग का अधिकाधिक प्रयोग रसोई घर की आन्तरिक साजसज्जा में करने से लाभ होता है। लालरंग के बल्व जलाना भी किंचित लाभदायक हो सकता है।

क्रमशः...

Thursday, 17 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-154

गतांश से आगे...अध्याय 26 भाग 2

प्रलम्ब का ठीक विपरीत संकोच दोष होता है,यानी भूखण्ड का कोई अंश कटा हुआ होना। पिछले अध्यायों में भूआकृति के विविध चित्रांकन प्रस्तुत किये गये हैं।(द्वष्टव्य- भूआकृति)। जैसा कि अगले चित्र में दर्शाया गया है-भूखण्ड का एक कोना कटा हुआ है,जिसे लाल रंग से दिखलाया गया है। दोष किसी भी दिशा-विदिशा में हो, सबका उपचार समान रुप से ही किया जाना चाहिए,क्यों कि सभी संकोच दोषों का दुष्प्रभाव समान है। ज्ञातव्य है कि प्रलम्ब की तुलना में संकोच अधिक दोषपूर्ण होता है। यहाँ भी लोगों में भ्रांतियां हैं- जैसे पूरब-ईशान के प्रलम्ब को लोग शुभ मान लेते हैं,उसी प्रकार नैर्ऋत्य के कटान को भी शुभ कहते हैं,किन्तु बात ऐसी नहीं है। शरीर का कोई अंग खंडित होगा,दोषपूर्ण ही होगा। अन्तर सिर्फ दोष की मात्रा का होगा,जैसे कि एक आँख न होना या एक अंगुली न होना- समान नहीं कहा जासकता। संकोच दोष को भी कांट-छांट कर ही शुद्ध करना चाहिए। दिये गये उदाहरण चित्र में कटे हुए लालअंश के समानान्तर ही सफेद अंश को भी काटकर शुद्ध हराअंश निकाल लिया गया।अन्य तीन दिशाओं में भी थोड़ी जगह छोड़ी गयी। ध्यातव्य है कि पूरब>उत्तर>पश्चिम>दक्षिण क्रमशः कम जगह छोड़नी चाहिए। यहाँ एक और बात का ध्यान रखना है कि उक्त नियमानुसार अधिक खुलापन अग्नि से नैर्ऋत्य पर्यन्त यदि हो रहा है,तो यह परिहार व्यवस्था लागू नहीं होगी। क्योंकि ऐसा करने से दक्षिण में खुलापन ज्यादा हो जायेगा,जो दूसरे तरह का दोष पैदा करेगा।उसके लिए दूसरे ढंग से वास्तुमंडल बांधना होगा।


आकृतिजनित दोष का एक और उदाहरण चित्र प्रस्तुत किया जा रहा है।आड़ा-तिरछा,त्रिकोना किसी भी प्रकार की आकृति हो,समूचा भूखंड त्याज्य नहीं हो सकता। उसमें से शुद्ध वास्तुमंडल का चयन किया जा सकता है। आगे दिये गये चित्र में हम देख रहे हैं कि अंडाकार भूखण्ड में से काट कर तीन शुद्ध वास्तुमंडल का निर्माण किया जा सकता है। साथ की अन्य आकृति में हरे रंग से कई शुद्धवास्तुमंडलों को दर्शाया गया है। कथन का अभिप्राय ये है कि विविध आकृति जनित दोषों को निर्माण-काल में ही सुधार लिया जाना चाहिए। निर्माण होजाने के बाद मामला पेचीदा हो जाता है। किसी प्रकार की बीमारी न हो,यह अधिक महत्त्वपूर्ण है,बनिस्पत कि दवा खा-खाकर रोग को दूर करें।  


क्रमशः...


Wednesday, 16 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-153

गतांश से आगे...        

अध्याय २६— वास्तुदोष-निवारण
    
पिछले अध्यायों में वास्तु नियमों की विशद चर्चा हुयी है। उन नियमों का पालन न करने, या पालन करना सम्भव न होने की स्थिति में ही वास्तुदोष उत्पन्न होता है। इस अध्याय में उन्हीं बातों की चर्चा होगी। दोषों को समझने के पश्चात् ही उनका निवारण किया जा सकता है।
    वास्तुदोषों के कई प्रकार होते हैं।मुख्य रुप  से इन्हें चार भागों में रखा जा सकता है।यथा—1)अवस्थिति दोष, 2) आकृति दोष, 3) संरचना दोष, और 4) व्यवस्था दोष।
    यहाँ इन सब पर अलग-अलग चर्चा करते हुए, निवारण हेतु सुविधा जनक उपाय सुझाये जायेंगे। साथ ही ऐसी विधि की चर्चा करेंगे, ताकि वास्तुगत कोई दोष न होते भी वास्तु की सम्यक् सुरक्षा हो,यानी बाहरी किसी प्रकार के भौमान्तरिक्षीय प्रभावों से भवन की सुरक्षा हो सके।
1)    अवस्थिति दोष — अवस्थिति दोष मुख्यतः प्राकृतिक दोष है,जिसे सुधारना असम्भव सा है। जैसे कोई भूखण्ड भूस्खलन क्षेत्र में है,तो किसी प्रकार इसे सुधारा नहीं जा सकता। हाँ,तदनुसार निर्माण के समय सतर्कता रखनी होगी,और विशेषज्ञों की राय की अवहेलना कदापि नहीं होनी चाहिए। इसी तरह किसी भूखण्ड के पूरब में ऊँचे पहाड़ या ढूह हो, दक्षिण में नदी या अन्य जलस्रोत हो- ऐसी स्थिति को चाह कर भी बदला नहीं जा सकता। अतः भूमिचयन के समय ही इसका विचार करना चाहिए। ऐसी विपरीत वास्तुभूमि का चयन ही न किया जाय; किन्तु यदि पूर्वजों ने ऐसी दोषपूर्ण भूमि ले रखी है,या ऐसे स्थान में ही वास करना लाचारी है,ऐसी स्थिति में निर्माण के समय काफी सतर्कता वरतनी होगी। पांच तत्वों के संतुलन का विशेष ध्यान रखना होगा। क्यों कि छोटी से छोटी त्रुटि का भी बड़ा दुष्प्रभाव झेलना पड़ सकता है, जैसे-  किसी भूखंड के पूरब में पहाड़ है, और पूरब की तुलना में पश्चिम का निर्माण नीचा करते हैं,दक्षिण में प्राकृतिक जलस्रोत है, और भवन में ईशान के बजाय बोरिंग अन्य दिशा में कर देते हैं,ऐसी स्थिति में उस भवन पर सामान्य की अपेक्षा दोष कई गुना अधिक प्रभावी होगा। इसका सर्वोत्तम उदाहरण हमारा भारतवर्ष है,जिसके उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिन्द महासागर है। इन दोनों का दुष्परिणाम देश को भुगतना पड़ा है। पौराणिकभूगोल(आसमुद्रातु वा पूर्वा,वा समुद्रातु पश्चिमा, हिमयोर्विन्ध्योर्मध्ये आर्यावर्त विधुर्विधु...) वाली सीमा जैसे-जैसे सिमटी है,भारत का संकट बढ़ा है। हालांकि,पूर्व का समुद्री विस्तार और उत्तर की हरीतिमा तथा ग्लैसियर वास्तुगत रुप से हमारी रक्षा भी करते रहे हैं। गौर तलब है कि जंगलों की कटाई(हरीतिमा का हनन) हमें भारी नुकसान भी पहुँचाया है,क्यों कि जाने-अनजाने हमने अपने रक्षकों का हनन किया है। जो कुछ भी गौरव और सुरक्षा हमें प्राप्त है,उसके पीछे भारतवासियों का अपेक्षाकृत अधिक धर्मप्राण होना अहम कारण है। पश्चिमी सम्यता का अंधानुकरण हमारी तबाही के द्वार खोल रहा है- इसे नजरअन्दाज न किया जाय।
आकृतिदोष- सूर्यवेध,चन्द्रवेध,प्रलम्ब,संकोच,प्लवत्व,विविध प्रकार की आकृतियाँ- ये सब आकृतिदोष के अन्तर्गत आते हैं। इनका सर्वोत्तम उपाय है- निर्माण के समय ही काट-छांट कर,समतल कर, संस्कारित कर सर्वविध अनुकूल भूखण्ड तैयार कर लेना।जैसा कि दिये गये चित्र में स्पष्ट है- समूचा भूखण्ड पूरब-पश्चिम अधिक लम्बाई वाला है,जिसे सूर्यवेध दोष कहते हैं। इसमें से अनुकूल माप निकाल कर वास्तुमंडल को शुद्ध कर लिया गया। 

 
इसी भांति अगले चित्र में हम देख रहे हैं कि भूखण्ड का एक कोण प्रलम्बित है।यहाँ प्रलम्ब को लालरंग से दिखाया गया है।चाहे जो कोण प्रलम्बित हो, नियमतः उसे छांट कर अलग कर दिया जाना चाहिए।छांटा गया भाग उपयोग भर हो तो वहाँ स्वतन्त्र निर्माण कर लिया जा सकता है,जिसका मुख्य मंडल से सम्बन्ध न हो। निर्माण कार्य वास्तुसम्मत मंडल बांध कर ही किया जाना चाहिए। ध्यातव्य है कि किसी भाग(कोण,दिशा)का प्रलम्ब दोष- युक्त ही कहा जाता है,भले ही दोष की मात्रा न्यूनाधिक हो। कुछ लोग ईशान और पूरव के विस्तार को अच्छा मानते हैं,किन्तु यह सही नहीं है। सही यह है कि अन्य दिशा-विदिशा की तुलना में ईशान-पूर्व कम दोषी है,किन्तु दोष मुक्त नहीं है।द्रष्टव्य नीचे का चित्र-





क्रमशः...

Sunday, 13 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-152

गतांश से आगे...अध्याय 25 (सम्पूर्ण)

               अध्याय २५—विदिशा भूखण्ड पर निर्माण-योजना
    विदिशा भूखण्ड- आधुनिक वास-व्यवस्था की विकट समस्या है। प्राचीन काल में वास्तुसम्मत-योजनावद्ध रुप से ग्राम-नगर वसाये जाते थे। आजकल योजनावद्ध वसाव(टाउनशिप आदि) तो होते हैं,किन्तु वास्तुनियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं,क्यों कि कुछ लोग इसे मानते हैं,कुछ अवैज्ञानिक कह कर आलोचना करते हैं,तो कुछलोग मानते तो हैं,पर आज के लिए व्यावहारिक नहीं समझते।परन्तु सच्चाई यह है कि कोई सत्य किसी के मानने न मानने पर निर्भर नहीं करता।कोई शक्ति(ऊर्जा) किसीकी  मान्यता का मुंहताज नहीं।आप माने या न माने,सूर्य का काम हैं रौशनी और ताप देना,तो वह देगा ही। विजली की नंगी तार छूयेंगे तो झटका लगेगा ही। यह उसका धर्म है;और धर्म अपने ढंग से चलता है,किसी के कर्म पर आश्रित होकर नहीं।

   विदिशा भूखण्ड का अर्थ है- जिसमें दिशायें अपने सही स्थान पर न हों,यानी आड़ा-तिरछा भूखंड। बड़े भूखण्ड को खरीद कर,प्लॉटिंग करके, रास्ते आदि निकाल कर,विक्री किये जाते हैं,या उन पर बहुमंजिली ईमारतें खड़ी कर बेंची जाती हैं। इनमें शायद ही कोई भूखण्ड सही दिशा-विदिशा युक्त होता है। भूखण्ड के लिए यह एक बहुत बड़ा दोष माना गया है। दोष की मात्रा न्यूनाधिक भी हो सकती है। यह दोष कम्पासीय अन्तर(घुमाव) पर निर्भर है।यानी दिशा-विदिशा का जितना ही विचलन होगा, दोष उतना ही अधिक माना जायेगा। आगे एक चित्र के माध्यम से इसे स्पष्ट किया जा रहा है—



   ऊपर के चित्र में हम देख रहे हैं कि जहाँ पूरब दिशा होनी चाहिए वहाँ कम्पासीय परीक्षण से ईशान कोण आ रहा है।इसी भांति सभी दिशायें और कोण अपने स्थान से विचलित हैं। विचलन की यह मात्रा(अन्तर) कुछ भी हो सकती है- कम या अधिक। शहरों में वनाये जा रहे शायद ही मकान सही दिशा-विदिशा युक्त हों। विचलन यदि सीधे-सीधे हों,जैसा कि ऊपर के चित्र में स्पष्ट है,तो भी निर्माण में बहुत समस्या नहीं होगी।कम्पासीय जाँच करके,मुख्य चार तत्व(आकाश छोड़कर,क्यों कि आकाश तो यथावत रहेगा ही अपने स्थान पर।उसमें कोणिक अन्तर का प्रभाव नहीं होता)को सुव्यवस्थित कर देंगे,यानी कोणों का काम दिशा में करेंगे,और दिशा का काम कोणों में करेंगे।जैसा कि ऊपर के चित्र में स्पष्ट है कि जहां पूर्व दिशा होनी चाहिए थी वहाँ पर कम्पास ईशान कोण बता रहा है। निर्माणकर्ता को चाहिए कि मुख्य वास्तु नियमानुसार इस स्थान पर बोरिंग कर दे।अग्निकोण पूर्वदिशा में आगया है,तो इस स्थान पर रसोईघर बनादें।इस भांति वास्तु-नियम के अनुसार शेष सारी स्थापनायें करेंगे।किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी।
   
    विदिशाभूखण्ड की मुख्य चार स्थितियाँ हो सकती हैं, जो मार्ग की स्थिति पर निर्भर है।यथा—ईशानमुखी,अग्निमुखी,नैर्ऋत्यमुखी,और वायव्यमुखी। इन चारो में मूल वास्तुनियमों का ध्यान रखते हुए सभी निर्माण आसानी से कर लेंगे; किन्तु परेशानी तब आयेगी, जव कोणात्मक अन्तर न्यूनाधिक होगा। आगे दिये गये चित्र में एक सही भूखंड के साथ क्रमशः ९०के अन्तर पर तीन और चित्र दिखलाये गये हैं।


इसके बाद के एक अन्य चित्र में हम देख रहे हैं कि ऋणात्मक घुमाव ४५करने पर दिशा और कोण सही स्थान पर आरहे हैं।यथा—


 इसी भांति अन्य प्रकार के कोणिक विचलन भी हो सकते हैं। ५,१०,१५, २०,२५,३० किसी भी डिग्री का विचलन हो सकता है। १० तक का अन्तर (विचलन) क्षम्य माना जा सकता है; किन्तु अधिक का अन्तर हानिकारक होता है। ऐसी स्थिति में वास्तुदोष निवारण-उपायों का सहारा लेना ही एक मात्र उपाय रह जाता है।


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Thursday, 10 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-151

गतांश से आगे...अध्याय 24 भाग 2 (इस अध्याय का अन्तिम भाग)


भूमि चयन-शोधन-निर्माण,और व्यवस्था—
१.      वास्तुकार्य हेतु सर्वप्रथम कर्तव्य है- भूमिचयन,तत्पश्चात् उसका परीक्षण-शोघनसंस्कार।
२.    चातुर्वर्ण्यं मया सृष्ट चार मानवी वर्णों की तरह, भूमि के भी चार वर्ण कहे गये हैं-ब्राह्मणी,क्षत्रिया,वैश्या और शूद्रा भूमि।
३.    कुश,तुलसी,उत्तम वृक्ष लतादि जहाँ उत्पन्न हों ऐसी भूमी ब्राह्मणी कही गयी है,जिसका गन्ध उत्तम,स्वाद मधुर,रंग श्वेत होता है.
४.    मन्दिर,विद्यालय,उद्यान,जलाशय,बुद्धिजीवियों के कार्यस्थल ऐसी ही भूमि पर होने चाहिए।
५.   शरादि(सरकंडा,पतेल,काश) उत्पन्न होने वाली,रक्तगन्धा,कसैले स्वाद वाली,रक्त वर्णा भूमि को क्षत्रिया कहा गया है।आयुधादि निर्माण,रक्षाकार्य,राजगृहादि हेतु यह प्रसस्त भूमि है।
६.     कुशकाश से व्याप्त मधुगन्दवाली वैश्याभूमि किंचित पीत वर्णा होती है।ऐसी भूमि व्यापारियों एवं व्यावसायिक कार्य- बैंक,वित्तीय संस्थानादि के लिए अच्छी मानी गयी है।
७.   कंटीले तृणों वाली,मदिरागन्धयुक्ता श्याम वर्णा भूमि को शूद्रा कहा गया है।वास हेतु यह निंदित है।नीचकर्मियों के लिए उत्तम है-मांस का व्यवसाय,बूचरखाना आदि यहाँ बनाये जा सकते हैं।
८.    आजकल जैसेतैसे कूड़ाकरकट भर वासयोग्य भूमि बनाई जा रही है।ये सर्वदा त्याज्य कहे गये हैं।ऐसी भूमि में वास करके धन भले ही कमाले,किन्तु सुख-शान्ति की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती।
९.     वास्तु कार्य हेतु भूमि का प्लवत्व विचारणीय है।दक्षिण-पश्चिम-नैर्ऋत्य की ढलान वाली भूमि अच्छी नहीं होती।
१०. पूरब,उत्तर,ईशान की ढलान अच्छी कही गयी है।
११.  विपरीत ढलान को सुधार कर वासयोग्य बनाया जा सकता है।
१२.वास्तुभूमि से पश्चिम-दक्षिण-नैर्ऋत्य में पहाड़,टीले,ऊँचे बुर्ज आदि अच्छे माने गये हैं।
१३.पूरब,उत्तर,ईशान आदि दिशाओं में नदी,सरोवर,खुले मैदान आदि उत्तम माने गये हैं।
१४.   श्मशान,कब्रगाह,अस्पताल आदि के पास वास नहीं करना चाहिए।
१५.  मन्दिर,मस्जिद आदि धार्मिक स्थल भी वास हेतु अच्छे नहीं हैं। इनके समीप गृहस्थों के नहीं बसना चाहिए,जबकि समाज में विपरीत धारणा है कि मन्दिर के पास वास करना अच्छा है।
१६.  भूमि का आकार भी बहुत महत्व रखता है।वर्गाकार,आयताकार भूमि वास के योग्य श्रेष्ट है।विषमवाहु,त्रिकोण,शकट,दण्ड,व्यजन आदि आकार वाली भूमि पर वास न किया जाय।
१७.  सिंहमुखी-व्याघ्रमुखी भूमि को प्रायः अशुभ और गोमुखी को शुभ मान लिया जाता है,किन्तु सच पूछा जाय तो ये दोनों ही दोषपूर्ण हैं।न्यूनाधिक दोष का अन्तर है सिर्फ।
१८.सम्भव हो तो विषम आकार को काट-छांट कर सुधारने के बाद वास योग्य बनाया जा सकता है।
१९. भूखंड का आकार पूरब-पश्चिम अधिक होतो सूर्यवेध कहलाता है,और उत्तर-दक्षिण अधिक होने पर चन्द्रवेध।भवन सूर्यवेध और जलाशय चन्द्रवेध नहीं होना चाहिए। इससे विकाश बाधित होता है,साथ ही अन्य तरह की परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है।
२०.  भूमि के आकार में प्रलम्ब वा संकोच दोनों ही हानिकारक हैं।ये कहाँ किस कोण वा दिशा में हैं— इस पर दोष की मात्रा निर्भर है।
२१.दलदली क्षेत्र,भूकम्प प्रभावित क्षेत्र,विद्युतीयक्षेत्र,चुम्बकीय प्रभाव वाले क्षेत्र भी वास योग्य नहीं होते।
२२.  मोबाईल टावरों के समीप में वास करना कई घातक बीमारियों को आहूत करना है।
२३.  मनोनुकूल भूमि का चुनाव करने के बाद,शल्योद्धार विधि से परीक्षण भी अवश्य कर लेना चाहिए।
२४. भूगर्भीय परीक्षण भी यथासम्भव विशेषज्ञों से अवश्य करानी चाहिए।
२५. भूगर्भीय ज्ञान हेतु शल्योद्धार सहित धराचक्र एवं अहिबल चक्र का सहारा लेना चाहिए।
२६.  पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण ये चार दिशायें हैं,एवं ईशान,अग्नि,नैर्ऋत्य और वायु ये चार विदिशायें वा कोण कहे गये हैं। वास्तुशास्त्र में इनका विशेष महत्त्व है।
२७. दिशा-विदिशा मिलाकर आठ की संख्या बनती है,जिनमें सूर्यादि नवग्रहों का वास है।राहु-केतु को एकत्र ही नैर्ऋत्य कोण पर स्थान मिला है।
२८.  आठ दिशाओं के अलावा आकाश और पाताल की भी वास्तुसम्मत गणना है,यानी आठ+दो=दस की संख्या होगयी। इन दशों के स्वामी को दिक्पाल कहा जाता है।प्रादक्षिण क्रम से इन्द्र,अग्नि,यम,निर्ऋति, वरुण,वायु,कुबेर और ईशान तथा आकाश-पाताल के स्वामी क्रमशः ब्रह्मा और अनन्त कहे गये हैं। प्रत्येक वास्तु कार्य में इन दस दिक्पालों का पूजन सर्वाधिक आवश्यक है।
२९.  चार दिशायें,चार कोण,आकाश-पाताल,इन सबके स्वामी दिक्पाल और तत् तत् प्रतिष्ठित नवग्रहों की स्थिति सुदृढ़ हो तो वास्तु (भवन) को बहुत बल मिलता है।
३०.  चयनित वास्तुभूमि को समान आकार के नौ खण्डों में विभाजित कर दिशा-विदिशा,और मध्य का ज्ञान करना चाहिए।
३१.विशेष विचार हेतु इसे ही नौ गुणे नौ,वा आठ गुणे आठ यानी एक्यासी वा चौंसठ समान आकारों में विभाजित किया जाता है,जिसे वास्तुपद कहते हैं।
३२.  वास्तुमंडल (निर्माणाधीन भवन) में कहाँ क्या बनाना चाहिए इसका आधार यह वास्तुपद ही है।प्रत्येक पद के एक-एक स्वामी हैं।उनके नाम,रुप,गुण,स्वभाव आदि के अनुसार ही निर्माण करना होता है।
३३.  भवन में पांचों तत्व(आकाश,वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी)को संतुलित करना सर्वाधिक आवश्यक है।
३४. आकाश तत्व को संतुलित रखने हेतु भवन के मध्य(केन्द्रीय भाग) को यथासम्भव रिक्त,स्वच्छ,खुला रखना चाहिए। इसे ही ब्रह्म स्थान कहा गया है।
३५. ब्रह्मस्थान वास्तुपुरुष का हृदय माना गया है। यह वास्तुमंडल का सर्वाधिक संवेदनशील स्थान है,अतः इसकी मर्यादा-रक्षा परम आवश्यक है।
३६.  भवन में जल(कुआँ,बोरिंग)का स्थान ईशान क्षेत्र(पूरब-उत्तरकोण) में होना चाहिए।मध्यपूर्व,मध्यउत्तर भी द्वितीय श्रेणी में है।मध्य पश्चिम भी ग्राह्य है,किन्तु अग्नि से नैर्ऋत्य पर्यन्त पूरा दक्षिण इसके योग्य नहीं है।
३७. छत के ऊपर का पानी टंकी जलस्रोत नहीं है,यह जलभंडारण है। अतः इसका स्थान ईशान के वजाय वायु कोण होना चाहिए। किन्तु ठीक कोण पर नहीं,बल्कि उससे पश्चिम हट कर,यानी वायु और वरुण का बल लेकर।जमीन के भीतर पानीटंकी बनानी हो तो ईशान कोण पर बनायी जा सकती है।ऊँचाई के ख्याल से लोग नैर्ऋत्य कोण पर पानीटंक रख देते हैं,यह बिलकुल गलत है। जल ही जीवन है,इसे राक्षसों के कब्जे में नहीं रखना चाहिए।
३८.  भवन में अग्नि(रसोईघर)अग्निकोण(पूरब-दक्षिणकोण)में स्थापित होना चाहिए।
३९.  नैर्ऋत्यकोण(दक्षिण-पश्चिम कोण) राक्षस वा रक्षक का स्थान है। गृहस्वामी का स्थान यहीं हो तो अच्छा है।
४०.  वायुकोण(उत्तर-पश्चिमकोण)आवागमन,और हल्कापन का प्रतीक है।तदनुसार यहाँ की संरचना होनी चाहिए।
४१.   सेप्टीटैंक आज की सभ्यता का अनिवार्य अंग है,जिसे भवन में ही स्थान देना पड़ता है। इसे बहुत सोचसमझ कर बनाना चाहिए।
४२. किसी भी दिशा वा किसी कोण पर सेप्टीटैंक न बनाया जाय। ईशान और वायु दोनों कोणों के बाद, दोनों ओर एक-एक कोष्ठक इसके लिए सही स्थान है।यानी कुल चार स्थान उपयुक्त हैं।
४३. शौचालय सुविधानुसार कहीं रख सकते हैं- दिशा और कोण छोड़ कर।
४४. सीढ़ियाँ नैर्ऋत्य कोण पर बनायी जा सकती है,अन्य कोणों पर नहीं। पश्चिमदिशा सर्वाधिक उपयुक्त है।
४५.भवन का प्रवेशद्वार दक्षिणदिशा छोड़कर सभी ग्राह्य हैं,किन्तु किसी कोण पर न हो।
४६.  दक्षिण में ही प्रवेशद्वार अनिवार्य हो तो मध्य दक्षिण से अवश्य बचें। उससे दायें-बायें एक-एक स्थान उचित है।
४७.व्यापार केन्द्र दक्षिणमुख हो सकते हैं। बाजार में जहाँ चारों ओर दुकानें ही दुकानें हैं- उत्तर-दक्षिण का भेद नहीं माना जाता।ये नियम सिर्फ आवासीयवास्तु के लिए है।
४८. प्रवेशद्वार किसी भी दिशा का मध्य सर्वोत्तम कहा गया है।मध्य से एक भाग दायें-बायें भी ग्राह्य है।इन्हीं भागों में सहद्वार भी रखे जाने चाहिए,किन्तु दक्षिण में कदापि नहीं।
४९.  घर के भीतरी सभी दरवाजे और खिड़कियों का शीर्ष एक समान हो।तल भी समान ही होना चाहिए।
५०. भीतरी द्वारों में दक्षिणदिशा का दोष नहीं लगता,यानी उत्तर के कमरे का दरवाजा दक्षिणमुख होगा ही,इससे कोई हानि नहीं है।
५१.  भोजन का स्थान रसोई घर के यथासम्भव समीप ही हो,यानी बिलकुल विपरीत नहीं,और दूर भी नहीं।
५२. भोजन दक्षिणाभिमुख कदापि न किया जाये।
५३. शयन उत्तर सिर करके कदापि न किया जाय। वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों पक्षों से निषेध है। शरीर का चुम्बकीय प्रभाव क्षतिग्रस्त होता है,तथा मानसिक व्याधियों का खतरा रहता है। भूतप्रेतादि अन्तरिक्षीय समस्यायें भी झेलनी पड़ सकती हैं,जिसका चिकित्सकीय निदान भी ठीक से नहीं हो पाता।
५४.पूजा का स्थान ईशान से लेकर अग्नि पर्यन्त कहीं भी हो सकता है,ऐसा नहीं कि सिर्फ ईशान ही हो।
५५.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       भभवन की ऊँचाई चारो दिशाओं में समान होनी चाहिए।अन्तर यदि रखना हो तो ध्यान रहे कि दक्षिण-पश्चिम की तुलना में उत्तर-पूर्व नीचा हो। यही नियम चहारदीवारी आदि के लिए भी लागू होता है।
५६. भवन का निर्माण कार्य अग्निकोण से प्रादक्षिणक्रम(clockwise)से ही करना चाहिए,इसके विपरीत कदापि नहीं,और न बेतरतीब ढंग से ही कि कभी कहीं,कभी कहीं पीलर बना दिये या दीवार उठा दिये। ऐसा करने से कार्यवाधा और धन की हानि होती है।
५७.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       भभवन का मध्य भाग नीचा नहीं होना चाहिए। इसके खालीपन का महत्व है,न कि नीचा होने का।
५८. घर के अन्दर किसी देवता की बड़ी मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। आठ अंगुल तक की मूर्ति रखी जा सकती है।
५९. शयन कक्ष में अधिक से अधिक अपने प्रियदेवता (इष्टदेव)की मात्र एक तस्वीर पूर्वी दीवार पर रख सकते हैं।
६०.   पलंग में आइना रखने का फैशन है। यह अच्छा नहीं है।
६१. डेसिंग टेबल भी शयन कक्ष में ऐसे रखें ताकि उसका प्रतिविम्ब विस्तर पर न पड़े।सोते समय उस पर परदा डाल दें।
६२.  युद्ध,या अन्य रौद्र-वीभत्स दृश्यों को भवन में स्थान देना उचित नहीं है।
६३.  सिरकटा हुआ या सिर्फ सिर(मुण्डभाग) की तस्वीर या मूर्ति घर में शोभा के लिए भी न रखें।
६४.  घर के भीतरी रखरखाव के लिए भी पंचतत्वों के संतुलन का ही सिद्धान्त मान्य है।यानी आन्तरिक साजसज्जा के लिए भी तत्व का नियम पालन होना चाहिए।
६५. मांसाहारी परिवार में हनुमत्ध्वज की स्थापना नहीं होनी चाहिए। शाकाहारी परिवार भी हनुमत्ध्वज को ईशान,वायु या मध्यपूर्व में ही स्थापित करें।वायुकोण सर्वोत्तम स्थान है।ध्वज की ऊँचाई नौ फीट से कम न हो।
६६.   भवन को बाहरी वाधाओं से रक्षा हेतु ऊपरी मंजिल पर दशदिक्पालों के निमित्त दश वर्छियाँ(उस-उस दिशा में मुख वाली)स्थापित की जा सकती हैं।इसे पूरे वास्तुविधान से करना चाहिए।
६७. मुख्यद्वार पर विघ्नेश्वर गणेश की स्थापना करके लोग निश्चिन्त हो जाते हैं।इसका सही लाभ तभी मिलता है,जब नियमित इनकी पूजा-अर्चना हो,अन्यथा नुकसान ही होता है।
६८.  प्राणप्रतिष्ठित पीतल या तांबें का स्वस्तिक घर में लगाने से विविध वास्तुदोषों का निवारण होता है।
६९.   भवन के किसी भाग में वास्तुदोष स्पष्ट होतो उसका निवारण करना चाहिए।
७०. दोष को समाप्त करना सम्भव न हो तो उसका परिहार जनित उपाय करके काम चलाया जा सकता है।
७१.  द्वारवेध एक बहुत बड़ा वास्तुदोष है।प्रवेश द्वार के सामने विजली का खम्भा,कुआँ,कोई और गड्ढा,पेड़,अरुचिकर वस्तु आदि वेध पैदा करते हैं।किन्तु इनकी दूरी ग्यारह फीट से अधिक हो या बीच में सार्वजनिक रास्ता हो तो दोष में कमी आ जाती है।
७२. नित्य प्रातःसायं घर में देवदारधूप,गूगुल,धूना आदि जलाना चाहिए। इससे सभी प्रकार के दोषों का शमन होता है।
७३. बांस की तिल्लियों से बनी अगरबत्तियों का प्रयोग कदापि न करें,इससे सन्तान पक्ष की हानि होती है।
७४.शंख,घंटा-घंटी,वांसुरी आदि की ध्वनियां,तथा भजन-कीर्तन-संगीत भी वास्तुदोषों को दूर करता है। ठीक इसके विपरीत आधुनिक कर्कश स्वर,बेढंगे संगीत वास्तुदोष पैदा करते हैं। यह ध्वनि-विज्ञान सम्मत बात है।
७५.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       चाचारो कोनों और मध्य भाग में उच्च शक्ति का प्राणप्रतिष्ठित वास्तु दोष निवारण यन्त्र स्थापित करना चाहिए।
७६. किराये के मकान में भी नियम वही होगा जो अपने मकान में होता है।
७७.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       वावास्तुदोष-पीडित मकान को किराये पर लगाकर,निश्चिन्त नहीं होना चाहिए। मात्रा भले ही कम हो, दोष हावी रहेगा ही।
७८. आवासीयवास्तु के सभी मूल सिद्धान्त धार्मिक और व्यावसायिक वास्तु के लिए भी समान रुप से लागू होते हैं।
७९. भवन परिसर में बड़े आकार के पेड-पौधे न लगाये। फूल-पत्तियां सुविधानुसार लगायी जा सकती हैं।
८०.  आजकल शमी के पौधे का जोरदार चलन है। इसे सही स्थान पर लगाने से ही लाभ होगा,अन्यथा हानि होगी। शमी का पौधा मध्य पश्चिम यानी शनि के क्षेत्र में ही लगाना चाहिए।
८१.थूहर-(कैकटस प्रजाति) इसे घर में न लगायें। लगाना ही हो तो नैर्ऋत्यकोण में लगायें।
८२.  भवन निर्माण के प्रारम्भ में भूमिपूजन(संक्षिप्तवास्तुपूजन)अवश्य करें।
८३.  भवन तैयार हो जाने के बाद विशेषविधान से वास्तुपूजन करके ही गृहवास(प्रवेश)करें।
८४. साल में एक बार वास्तुहोम अवश्य करना चाहिए। इससे भवन की वास्तुऊर्जा हमेशा जागृत रहती है।
८५. भवन में किसी प्रकार से तोड़फोड़ बदलाव करने के बाद भी संक्षिप्त वास्तुशान्ति आवश्यक है।
८६.  गृहवासी के कर्म और संस्कार पर भी वास्तु का गुण-दोष निर्भर करता है-इसे सर्वदा याद रखें।
उक्त सूत्रावली में वास्तु परिचय,प्रयोजन,प्रकार,चयन,शोधन,निर्माण, व्यवस्था आदि उपखण्डों में (११+९+८६ सूत्रों) कुछ अत्यावश्यक वास्तुनियमों की चर्चा की गयी। ये यथासम्भव पालनीय हैं।अस्तु।
     
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क्रमशः....