Monday, 23 April 2018

रजोधर्मःज्योतिषीय दृष्टि


रजोधर्मःज्योतिषीय दृष्टि

            प्रायः अज्ञानवश हम ग्रहों को ही कर्ता मान लेते हैं,जबकि बात ऐसी बिलकुल नहीं है। वस्तुतः इस पञ्च तत्त्वात्मक सृष्टि में सूर्यादि नवग्रहों को काल-संकेतक के रुप में स्वीकार किया गया है । महाभारत अनुशासनपर्व,अध्याय  १४५ में स्पष्ट कहा गया है – 
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभ निवेदिका । 
मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ।।
प्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिंप्रति । 
अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ।।
किन्तु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते ।
दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ।।        
केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोतु शुभाशुभम् । 
सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ।।
अर्थात ग्रहनक्षत्रादि मनुष्य को शुभाशुभ की सूचना देते हैं । वे स्वयं कोई काम करते नहीं,प्रत्युत प्रजाजन के हितार्थ ज्यौतिषचक्र के द्वारा कालत्रय (भूत,वर्तमान,भविष्य) में घटित होने वाले फलाफल का बोध मात्र कराते हैं। शुभकर्मफल हेतु शुभग्रहों से संकेत मिलता है और पापकर्मफल हेतु पापग्रहों से । मूल में जो भी है, वो सब अपना ही किया-कराया है । और इस प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मानव-जीवन के समस्त क्रिया-कलाप,उतार-चढ़ाव,सुख-दुःख,आधि-व्याधि सबकुछ ग्रहों से ही संकेतित होते हैं ।

यदि ऐसा ही है तो स्त्रियों का रजोधर्म यानी मासिकचक्र क्यों अछूता रह सकता है इनसे ! भारतीय ज्योतिर्विदों ने इसपर भी गहन प्रकाश डाला है । उन्हीं आलोकों में आज इसपर थोड़ी चर्चा करते हैं ।

            शाकद्वीपीय कुलभूषण आचार्य वराहमिहिर ने अपनी पुस्तक- बृहज्जातक ४-१ में संकेत दिया है—      
  कुजेन्दुहेतुः प्रतिमासमार्तवं गते तु पीडर्क्षमनुष्णदीधितौ ।  अतोन्यथास्थे शुभपुंग्रहेक्षिते नरेण संयोगमुपैति कामिनी ।।
             
सूचना-संकेत हेतु सभी ग्रहों का अपना-अपना क्षेत्र और विषय विभाजित है । प्रायः किसी एक बात की सूचना का संकेत एकाधिक ग्रह-राशियों द्वारा होता है । सूक्ष्म विचार करने हेतु ग्रहस्थिति,बलाबल,राशि,दृष्टि,युति,तत्व, स्वरुपादि अनेक बातों का एक साथ ध्यान रखना पड़ता है । किसी एक लक्षण (संकेत) से फलाफल का विनिश्चय करना बिलकुल हास्यास्पद है।

          उपर्युक्त प्रासंगिक विषय में विचारणीय विन्दु है - स्त्री का आर्तव निःसरण । आर्तव के निर्माण और निःसरण के लिए स्त्री-शरीर में गर्भाशय,डिम्बाशय,डिम्बनलिका,योनिपथ इत्यादि जिम्मेवार हैं । इन सभी अंग-उपागों के बारे में विभिन्न ग्रहों द्वारा शुभाशुभ स्थिति की सूचना मिलती है- जातका की जन्मकालिक ग्रह-स्थिति तथा गोचर संचरणादि से ।

      ध्यातव्य है आर्तव रक्त का ही एक विशिष्ट अंश है । वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्पष्ट है कि रक्त का नब्बे प्रतिशत भाग जल तत्त्व है, जिस पर चन्द्रमा का आधिपत्य है और शेष दश प्रतिशत ठोस भाग अग्नितत्त्व हैं । यहां तक कि रक्त का जो लाल रंग है वो भी अग्नितत्त्व का सूचक है । अग्नितत्त्व (पित्त) मंगल का क्षेत्र है । रक्त का अल्पांश (रक्तवर्ण) ही प्रकटित है हमारी आँखों के समक्ष और घनीभूतता के कारण व्यापक जलतत्व गौण सा हो जाता है । वस्तिप्रदेश में त्रिकास्थि के भीतर सुरक्षित गर्भाशयादि अंगों पर क्रमशः बुध,शनि,शुक्रादि का भी प्रभाव है । पेड़ू और जननांग बुध की कन्याराशि के आधिपत्य में आते हैं । मंगल की वृश्चिकराशि की भी यहां अच्छी भूमिका है । कामेच्छा और वासना में चन्द्रमा के साथ मंगल का भी योगदान  है । शुक्रग्रह का योगदान शरीर के सप्तमधातु – शुक्र (वीर्य) पर है। ध्यातव्य है स्त्री-शरीर में आर्तव (रज) ही शुक्र के स्थान पर है । यही उसका सप्तम धातु है । इन्द्रिय जनित सभी पदार्थों पर शनि के बिना तो काम ही नहीं चल सकता । नियम,व्यवस्था और मर्यादा में लाने के लिए शनि की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण है ।

         चन्द्रमा जल(रक्त) है और मंगल अग्नि (पित्त) है- ये स्पष्ट हो चुका है । मंगल से जब चन्द्रमा क्षुभित होता है यानी पित्त् से जब रक्त क्षुभित होता है, तब स्त्रियों को रजोदर्शन होता है— रजोदर्शन का यही ज्योतिषीय नियम है । ( ध्यातव्य है कि गर्भिणी,रोगिणी,बालिका,वृद्धादि इस नियम के अपवाद में हैं ।)
जैसे—किसी स्त्री के जन्मांकचक्र में वृश्चिक राशि के पांच अंश पर मंगल हैं । विचारणीय समय में चन्द्रमा यदि सिंहराशि पर है, तो हम चन्द्रगति क्रम से आकलन करके सहज ही जान सकते हैं कि अब से कितने समय बाद इस स्त्री का मासिकधर्म शुरु हो सकता है ।

यानी जन्म कुण्डली में जिस राशि पर मंगल हो चन्द्रमा वहां गति करते हुए पहुंच जाये,तभी आर्तवदर्शन होंगे । चन्द्रमा लगभग सताइश दिनों में भचक्र पूरी करता है । यही कारण है कि स्वस्थ और सामान्य स्थिति में स्त्रियों का मासिक चक्र भी इसी भांति चलता है । 

चन्दमा और मंगल की स्थिति (बलाबलादि) जन्मकुण्डली में अच्छी नहीं है, वे किसी तरह से पीड़ित, क्षुभित, बलहीन हैं यदि, तो निश्चित ही जातका को आर्तव सम्बन्धी विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा । पंचम,सप्तम, लग्न, एकादश आदि भावों पर भी विचार करना होगा, ताकि भावी स्थिति और परिणाम—सन्तानादि पर इसका क्या-कैसा प्रभाव है ।

आमतौर पर ऐसी बातों का विचार करना जरुरी नहीं होता और न वो ज्योतिषी के पास प्रश्न लेकर ही आती है, किन्तु असामान्य परिस्थितियों (रजोरोध,रजसाधिक्य,कष्टरज आदि व्याधियों) में ज्योतिषीय विचार की आवश्यकता अवश्य होती है, ताकि कारण जान कर उसका सही निवारण हो सके । हालाकि ऐसे मामले में लोग सीधे चिकित्सक के पास जाते हैं। जाना भी चाहिए । किन्तु वहां से थकने-हारने के बाद ज्योतिषी की भूमिका शुरु होती है । ज्ञातव्य है कि ऐसी समस्याओं का सरल निदान और उपचार है ज्योतिष के पास । अस्तु ।

Sunday, 22 April 2018

पृथ्वीदिवस — असहयोग न करने का संकल्प

पृथ्वीदिवस — असहयोग न करने का संकल्प

 आये दिन तरह-तरह के दिवस मनाने का चलन है । दिवस मनाने की इस परम्परा में स्थिति और सुविधा के अनुसार हम प्रायः एक कोरम भर पूरा कर लेते हैं । दिवस यानी दिन यानी वो एक दिन जिसे साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में से किसी एक दिन को हम किसी एक के नाम कर देते हैं । कुछ देर के लिए बैठक हो जाती है । इसी बहाने थोड़ा मिलना-जुलना हो जाता है । कुछ भाषणवाजी हो जाती है । व्यवस्था रही तो खाना-पीना भी हो जाता है । और फिर किसी अगले दिवस की योजना बनती है । दिवसों की उसी सूची में एक है—  पृथ्वी दिवस भी ।

पृथ्वी को हमारे यहां माता कहने-मानने की परम्परा रही है । वैसे तो हम मातृदिवस भी माना ही लेते हैं, भले ही माँवों को वृद्धाश्रम में क्यों न छोड़ आये हों । पुराणों में कथा मिलती है कि पृथ्वीवासियों के कर्मों से क्षुब्ध होकर पृथ्वी गौ का रुप धारण करके लोकपालक शेषशायी विष्णु के पास गुहार लगाती है । उसके दुःख से द्रवित होकर दयासिन्धु,करुणासागर विष्णु आश्वासन देते हैं—भूभार हरण करने का ।

पृथ्वी के आर्तनाद का ये सिलसिला प्रायः चलते रहता है और विष्णु द्वारा विभिन्न प्रकारों से उसके उद्धार का भी । इस घटना का आभास हमें श्रीकृष्ण के श्रीमद्भगवद्गीतान्तर्गत उद्घोष में मिलता है—
यदायदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे ।

अद्यतनकाल में पृथ्वी पर अनेक समस्यायें हैं, जिनमें ज्यादातर हमारी अपनी ही बनायी हुयी है । खैरियत ये है कि सृष्टि के पञ्चमहाभूत – आकाश,वायु,अग्नि,जल और पृथ्वी के सूक्ष्म स्वरुपों पर हमारा नियन्त्रण कदापि नहीं हो सकता , अन्यथा उसे भी नहीं बकसते । स्थूल घटकों को तो बरबाद करने में हमने कोई कसर छोड़ा ही नहीं है । निरन्तर विनाश की ओर घसीटे जा रहे हैं और इसे ही विकास कहे जा रहे हैं ।

 सच्चाई ये है कि पांच तत्त्वों में कोई भी शुद्ध नहीं रह गया है और इन सबकी अशुद्धि के लिए मुख्य रुप से हम स्वयं ही जिम्मेवार हैं । इस गैरजिम्मेवारी को यदि हम महसूस करते हैं और अपनी गलती कबूल करते हैं, तो हमारा एक मात्र कर्तव्य होता है कि हम इन अशुद्धियों को दूर करने का प्रयास करें ।

ध्यान रहे- प्रकृति स्वयं सब कुछ करने में समर्थ है । इसे किसी के सहयोग की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है । वस मेरा कर्तव्य सिर्फ इतना ही है कि प्रकृति के कार्य में असहयोग न करें , क्यों कि असहयोग न करना, सहयोग करने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हुआ करता है । 

पेड़ नहीं लगा सकते कोई बात नहीं, पेड़ न काटने का संकल्प तो ले ही सकते हैं । पृथ्वी की उत्पत्ति जलतत्त्व से हुयी है, यानी जल ही उसका आधार है । जल नाम की सार्थकता इसी से सिद्ध होती है क्यों कि  ज+ल से बनने वाले इस तत्व से ही हमारा जीवन शुरु होता है, चलता है और इसी में लय यानी विलीन भी हो जाता है । पृथ्वी की आत्मा जल में संनिहित है । पृथ्वी पर फैली पड़ी नदियां ठीक उसी तरह हैं जैसे हमारे शरीर में नस-नाडियां । नस-नाड़ियों के बिना क्या हम जीवित रह सकते हैं ? 

हम इस जल को दूषित होने से तो बचा ही सकते हैं अपनी कोशिश और बुद्धि से । नदियों की सफाई के नाम पर शोर मचाने से, गोष्ठियां और सेमीनार करने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होता कि हम दृढ़ संकल्पी होते—आगे से इन्हें गन्दा न करते  । और पक्की बात है कि हमसे कहीं अधिक तेजी से प्रकृति स्वयं ही इसे स्वच्छ कर देगी, यदि इसके साथ असहयोग करना हम बन्द कर दें ।

 कल्पना करें कि क्या हम अन्तःस्रावीग्रन्थियों ( Endocrine glands)  के बिना जिन्दा रह सकते हैं ? नहीं न । तो फिर  कंकरीट के जंगल बनाने की होड़ में पहाड़ों को नष्ट क्यों किये जा रहे हैं ? अंगुलीमाल को बुद्ध ने यही कह कर कायल किया था न कि यदि तुम एक टहनी को जोड़ नहीं सकते तो फिर तुम्हें क्या हक है कि किसी पेड़ को काटो ! पहाड़ों में पलीते लगाकर विस्फोट करके हर्षित होते हैं हम , किन्तु पलक झपकने भर के लिए भी पृथ्वी डोलती है यदि तो त्राहिमाम्-त्राहिमाम् होने लगता है । ये विरोधाभास कबतक चलेगा ! इसके लिए तो कुछ ठोस कदम उठाने ही होंगे न ?

अपराधी प्रायः अपना चेहरा छुपा कर चलते हैं । हम भी तो कुछ वैसा ही कर रहे हैं । तरह-तरह के     मॉस्क लगा कर सड़कों पर निकलते हैं, फिर भी सेनाटोरियम पटे पड़े हैं फेफड़ों के मरीज़ों से । परमात्मा का दिया हुआ सुन्दर मुखड़ा इस तरह से कब तक ढकते रहेंगे ?

अन्तरिक्ष तक को हमने बक्शा नहीं। विकास की अन्धाधुन्ध दौड़ में सेटेलाइटों की नुमाइश लगा रखें हैं । विश्वशान्ति पर संगोष्ठियां करते हैं और स्वयं में भयभीत, ब्रह्भोसों की तैयारी में जुटे हैं । ये तरह-तरह की मिसाइलें बनाकर किसे डरा रहे हैं या कहें खुद डरे हुए हैं और अपने भीतर के डर को छिपाने के लिए बाहरी डर पैदा करने का क्षुद्र प्रयास कर रहे हैं ?

.ये दिवस मनाने भर से कुछ होने-जाने को नहीं है । शेष तीनसौचौंसठ दिन तो फिर वही होगा न जो करते आ रहे हैं ?
अतः संकल्पी होना होगा— प्रकृति के साथ खिलवाड़ न करने का । अन्यथा वो महाशक्ति हमें कतयी माफ नहीं करेगी । अस्तु।  

Friday, 20 April 2018

भीड़तन्त्र की वाम साधना


भीड़तन्त्र की वाम साधना
     जैसा कि आप सभी जानते हैं — तन्त्र अनेक हैं । बल्कि यूं कहें कि तन्त्र ही अनेक नहीं हैं, तन्त्र के अर्थ भी अनेक हैं । इतना ही नहीं इस अर्थ के भी अनेक अर्थ हैं— हिन्दीवाला,अंग्रेजीवाला,इकोनोमिक्शवाला,साहित्यवाला... । ज़ाहिर सी बात है कि जहां अर्थ होगा अनर्थ भी होगा ही । अर्थ और अनर्थ का सम्बन्ध करीब-करीब चोली-दामन जैसा है ।
  बात हम तन्त्र की कर रहे थे । वो जो पुराना वाला तन्त्रशास्त्र है न, वहां दो तरह से साधना करने की बात कही जाती है- वो दाहिना वाला और वायां वाला । अंग्रेजीवाले इसी को लेफ्टिस्ट और राइटिस्ट कहते हैं ।  
 आदमी महाकाली तो है नहीं , जो इसके अठारह हाथ और अठारह पैर होंगे । अच्छा ही हुआ कि आदमी केवल आदमी हुआ और बनाने वाले ने इसे सिर्फ दो हाथ और दो ही पैर दिये ।  काली-दुर्गा नहीं, संयोग से यदि विष्णु भी हो जाता - चार हाथों वाला तो पता नहीं क्या से क्या कर गुज़ारता । ख़ैरियत है कि सिर्फ आदमी ही हुआ ।  वैसे गौर से देखें यदि तो आदमी भी कहां है ? आदमी जैसा दीखता है भर है ।  वो भी जब भीड़तन्त्र की साधना में आ जुटता है,तब थोड़ा-बहुत दीखने वाला आदमी वाला रुप भी ग़ायब हो जाता है । भीड़ का हिस्सा बनते ही तत्काल दो पैर और उग आते हैं और फिर भेंड़ बन जाता है । और आप जानते ही हैं कि भेंड़ एक बे-चारा सा प्राणी है, जिसे सदा गड़ेरिये के इशारे पर चलना होता है । वो खाता है प्रकृति का घास । रहता है खुले आकाश के नीचे । परन्तु मूड़-माड़कर सब छीन लेता है - वो कम्बलवाला ।  और इसके पास सिर्फ मिमियाने के सिवा और कुछ बचा नहीं रहता । किन्तु एक खास़ियत भी है- बड़ी जल्दी ही सब भूल-भाल जाता है । फिर वही घास,वही आकाश ।
   ये भीड़तन्त्र की साधना है न, आजकल बहुत पनप रही है— भक्तों की भीड़,फॉलोवरों की भीड़,गुरुओं की भीड़,चेलों की भीड़,सत्याग्रहियों की भीड़,असत्याग्रहियों की भीड़, क्रान्तिकारियों की भीड़,आतंकियों की भीड़,साधुओं की भीड़,सवाधुओं की भीड़...भीड़...भीड़...भीड़ ।
   ऐसा न सोचें कि इस तन्त्र में दक्षिण-साधना है ही नहीं । अरे भाई ! इसकी दक्षिण-साधना तो बिलकुल संविधान-सम्मत है । शुरु तो हुयी थी ये साधना दक्षिण विधि से ही । एक दुबले-पतले लकुटिवाले ने सिखाया था सबको कि कब आसन मारना है, कब आँखें मीचना है, कब खोलना है, कब आहुति देनी है...। 
 आदत वहीं से लगी, या कहें लगायी गयी,जो भी हो । मुख्य बात है कि लोकतन्त्र के सेहत के लिए इसे सर्वाधिक अच्छा समझा गया । किन्तु धीरे-धीरे हवा का रुख बदलता गया। और फिर दक्षिण को वाम बनने में देर ही कितनी लगती है ? लेफ्ट-राइट का डिफरेन्श ही कितना है, जब कि परिणाम में आसमान-जमीन का फ़र्क है । एक ओर आशुकारी चमत्कार की पूरी-पूरी सम्भावना है, तो दूसरी ओर प्रतीक्षा की अवधि ही अनिर्धारित है । ऐसे में वाम के विकास पर लोकतन्त्र के नायकों ने ज्यादा ध्यान दिया । और अब तो ऐसा लगता है कि इसके बिना लोकतन्त्र के प्राण ही नहीं बचेंगे।  जाहिर है कि इसमें चमत्कार जल्दी होता है । चमत्कार को नमस्कार करना, किसे अच्छा नहीं लगता ?   
वर्तमान में भीड़तन्त्र की एक मात्र साधना विधि रह गयी है - वाम वाली ही । दक्षिणवाली बिलकुल आउटडेटेड हो गयी है। एक्पायर्ड कहना ज्यादा अच्छा होगा ।
   दक्षिण वाली विधा में गुरु आगे-आगे होता था और चेला पीछे-पीछे । वाम का मतलब ही होता है ठीक उल्टा यानी चेला आगे,गुरु पीछे । हालाकि गुरु का पीछे रहना भी कोई जरुरी नहीं । दूरभाष और दूरदर्शन के जमाने में क्या साथ, क्या आगे, क्या पीछे ! यही कारण है कि वामतन्त्र में नवसिखुओं को सदा आगे रखा जाता है । ऐसा नहीं कि कमजोर विद्यार्थी को पिछली वेंच पर विठा दिया जाये । दरअसल यहां बैकबेन्चर कोई होता ही नहीं । कोई होना भी नहीं चाहता । पीछे रहेगा तो मीडिया के कैमरे में समायेगा कैसे ?
   समाजशास्त्री कहते हैं कि आदमी एक सामाजिक प्राणी है । वो अकेला रह ही नहीं सकता । और आजकल तो और भी खतरा है अकेले रहने में, क्यों कि पहले भालू-भेड़िये जंगलों में  रहते थे और आदमी गांवों में । पर अब सब गडमड हो गया है । नये वाले संविधान ने छूट दे दी है - कोई भी कहीं भी रह सकता है – सर्व भूमि गोपाल की जहां चाहिए ठौर...। अतः सामाजिक प्राणी होने के नाते भीड़ में शामिल होना आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य हो गया है ।
   अन्य तन्त्रों की वाम साधना में सुनते हैं कि तत्काल दंड है । किन्तु भीड़तन्त्र की वामसाधना बिलकुल निरापद है । किसी तरह का कोई नियम-संयम,कायदा-कानून यहां लागू ही नहीं होता । फिर दण्डविधान का सवाल ही कहां उठता है । क्या आपने देखा है अब तक,सुना है कहीं भी कि भीड़ ने कुछ किया और उस पर किसी तरह की कारवायी हुयी ?
   असल में भीड़ कोई व्यक्ति तो है नहीं । हां, भीड़ की अभिव्यक्ति होती है सिर्फ । और शक्ति तो अभिव्यक्ति में ही निहित है न । अनुभवी लोग कहते हैं कि भीड़तन्त्र की सिद्धि ही लोकतन्त्र की मर्यादा है । लोक का तन्त्र । लोक मतलब – भीड़ , जिसके पास दिमाग नाम की कोई डिवाइस होती ही नहीं ।  रिमोट की वटन की तरह - कहीं बैठे रहो,काम कहीं होता रहे ।
     अब जरा इस साधना की सुपात्रता का भी विचार कर लें । वो गदहपचीसी वाली बात तो ध्यान में होगी ही । हर कोई जीवन में एक दफ़ा इस दौर से ज़रुर गुज़रा करता है । साधना की दृष्टि से ये अब्बल दर्जे का समय है । इस दौर के चेले बनाने में गुरु की सफलता शत प्रतिशत सुनिश्चित है । इधर नये दौर में बराबरी के दर्ज़े का ख्याल रखते हुए महिलाओं को भी पहली सूची में ऱखने का प्रावधान कर दिया गया है । भीड़तन्त्र की वामसाधना में इसके कई लाभ हैं- गुरु को भी और चेले-चेलियों को भी । महिला को आगे रखने का लाभ जब कुन्ती नन्दन अर्जुन को मिल सकता है,फिर औरों को क्यों नहीं ! साधक-पात्रता की तीसरी सूची में आते हैं वैसे साधक जो लम्बे समय से निठल्लू जीवन गुज़ारते हुए,किसी झुरमुट में,नदी किनारे के एकान्त-निर्जन स्थानों पर या किसी खाली पड़े लावारिश से मकानों में छोटी-छोटी टोली बनाकर, बावनपत्तों की साधना में निरन्तर रत रहते हैं । कुछ ऐसे लोग भी पात्रता-सूची में आते हैं जो दिन में तो खूब पसीना बहाते हैं, परन्तु शाम होते-होते पसीने के मोल को बोतलों या कहें पाउचों से तौलनें में जरा भी नहीं हिचकते । घर-गृहस्थी,चूल्हा-चौका से उन्हें ज्यादा वास्ता नहीं रहता । पीठ-पूजा के डर से बीबी रोटियां तो दे ही देती हैं । हालाकि वो बीबियां भी अब चतुर हो गयी है थोड़ी। भीड़तन्त्रसाधना उन्हें भी भा रही है।
       तो आइये,लोकतन्त्र की मर्यादा की रक्षा करें । भीड़तन्त्र की वामसाधना की दीक्षा जल्दी ले लें । अन्यथा भीष्म-द्रोण की तरह आप भी गुनहगार साबित हो सकते हैं । आपके अपने लोग ही नोच-नोच कर बांट-बूंट लेंगे- अपने-अपने हिस्से की भीड़ । क्यों कि चीरहरण अब पांडवों के जिम्मे है । कौरव तो नाहक बदनाम हैं ।।
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Thursday, 19 April 2018

रहते कहाँ हो ?


रहते कहाँ हो ?

अकसर ये सवाल मन को झकझोरता  है ।

रहते कहां हो ? - सवाल ही इस बात की ख़बर है कि   होना तो मंजूर है , पर रहने की जगह में संदेह है या कहें रहने का सही ठिकाना मालूम नहीं ।  बड़े-बुज़ुर्गों की कही बातें, मोटी-मोटी किताबों की तरह-तरह की बातें और इन सब के उलट-पुलट, टटोल-मटोल के बाद दिल-वो-दिमाग में उठने वाले बेहिसाब बवण्डर, बाप रे बाप !

            लोगों की देखा-देखी, सुनी-सुनायी युक्तियों के सहारे ढूढ़ने-जानने का कई बार प्रयास किया, किन्तु हर बार निराशा ही हाथ लगी । आख़िर क्यों ?

क्या मैंने गलत जगह में ढूढ़ा ? गलत तरीके से ढूढ़ा ? या कि कहने-बतलाने वाले ने ही गलत बतला दिया - कुछ कह नहीं सकता । हां, साथ में एक और सवाल भी उठा— बतलाने वाले ने क्या कभी देखा ? मिला ? कुछ बातचीत भी हुयी उससे ? या यूं ही वो भी सुनी-सुनायी बातें बक गया ?

 किन्तु इतने भाग-दौड़,खोज-बीन के बाद जो कुछ समझा-जाना, वो सिर्फ इतना ही कि उन सारे जगहों में वो बिलकुल नहीं है, अकसरहां जिसके बारे में लोग कहा करते हैं ।  
और इसी उधेड़बुन में हिचकोले खाता,शरीर और मन से थका-मादा,विस्तर पर औंधे मुंह गिर पड़ा । न जाने कब आँखें लग गयीं । 

आँखें लग जाने का सामान्य अर्थ होता है नींद के आगोश में समा जाना,किन्तु इसे पक्के तौर पर नींद भी कैसे कहूं ? सपना है - मानने को मन गवाही नहीं दे रहा । बहुत बार ऐसा होता है कि सपने और सच के बीच अन्तर करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है । जैसे कि वो पुरानी वाली किताबों में कुछ अनुभवियों ने लिखा है कि ये संसार ही सपना है...। जीता-जागता, दौड़ता-भागता ये इऽत्ताऽ बड़ा सा संसार जब सपना हो सकता है, फिर बाकी की बातें...!

मैंने देखा...नहीं, देखा कैसे ? देखने के लिए तो आँखों का खुला होना जरुरी होता है न ?  सुना । ऐसा लगा मुझे— हाथ पकड़ कर कोई मुझे उठा रहा है — उत्तिष्ठ !...जाग्रत !...वाले अन्दाज में—उठो,जागो,देखो...।

मेरे चारों ओर अज़ीब तरह की रौशनी थी । ऐसी रौशनी पहले कभी देखा नहीं था । रौशनी भी ऐसी हो सकती है - सोचा भी नहीं था । उस खास तरह की रौशनी के सिवा कहीं कुछ और न था या हो भी यदि तो मेरी आँखें देख न पा रही थी,किन्तु कान सुन पा रहे थे ।

मैं सुन रहा था—
‘‘ देखो,ये सब इमारतें देख रहे हो न ! ये गोल गुम्बद वाली...ये मेहराब़ वाली...और ये शंकू वाली...और ये वाली और ये वाली भी...चारो ओर शोर है—कोई कहता है - ये वाला मेरा घर है...कोई कहता है वो वाला मेरा घर है...कोई कहता है वो वाला मेरा घर है...। ये वाला सबसे बढ़िया है...ये वाला सबका सिरताज है...इमारतों की श़क्लें ज़ुदा-ज़ुदा हैं, परन्तु सभी बने हुए हैं एक सी ही ईंट-गारों से । बनाने वाले हाथ भी एक जैसे ही हैं- पांच उँगलियों वाले । बस, फ़र्क इतना ही है कि बनने के साथ ही उनका अलग-अलग नाम हो गया है । और जानते हो— असल झमेला इन सारे नामों से ही है । तुम्हारे जनमने के पहले तुम्हारा कोई नाम था क्या ? तुम्हारा कोई घर था क्या ? जहां जनमे वही घर हो गया न । जिस नाम से पुकार लिए गए - वस वहीं भर होकर रह गए तुम । रत्ती भर भी इधर-उधर नहीं हो पाये । इन नामों ने जकड़ लिया तुम्हें । इन बेतुके नामों की खूँटियों पर टंग गए तुम । इन चारदीवारों ने कैद कर लिया तुम्हें । और इस कैदखाने को ही घर समझ लिया तूनेमेरा घर...अपना घर । दरअसल, इन सारी इमारतों में  न कोई तुम्हारा घर है और न मेरा ही । इन चारदीवारों में न कोई तुम्हें कैद कर सकता है और न मुझे ही । ये बिलकुल तय मान लो कि इन इमारतों में मैं रहा ही नहीं कभी । क्यों कि यहां बहुत शोर-श़राबा है । बहुत झगड़े-फस़ाद हैं । यूं कहो कि दुनिया के सारे फ़सादों की जड़ ये इमारतें ही हैं और साथ ही है वो तुम्हारा वाला नाम जिसे तुम्हारे अपने कहे जाने वाले लोगों ने दे दिया था, ज़बरन थोप दिया था — अपने निजी स्वार्थ में । और तुम भी फंस गए उनकी जाल में । तुमने कभी कोशिश भी नहीं की ये जानने की  कि मैं कौन हूँ ? तुम पक्के तौर पर जान लो कि तुम वही हो जो मैं हूँ ।  मैं, तुम और वो का झमेला खत्म करो । और सबसे बड़ी बात यह कि मुझे ढूढ़ने की कवाय़द बिलकुल फ़िजूल है । मेरा कोई घर नहीं । मेरा कोई अता-पता ठिकाना नहीं । कहां ढूढ़ोगे ? किसी की मत सुनो । ये सबके सब तुम्हें अपने-अपने मक़सद के लिए बरगलाया है सिर्फ । तुम जहां हो, जैसे हो, जिस हाल में हो बस थिर हो जाओ । बहुत भाग-दौड़ कर लिए रेगिस्तानी चश़्मे की तलाश़ में । अब चुप बैठ जाओ । मैं यहीं रहता हूँ...बिलकुल तुम्हारे पास ही...तुम्हारे ही भीतर...तुम्हारी ही सांसों की डोर से बंधा हुआ सा।
                                              ---)(---

Sunday, 8 April 2018

परजीवीदर्शन




                         परजीवीदर्शन

  आपकी उत्सुकता और आशंका का त्वरित समाधान करते हुए मैं पहले ही कह देना चाहता हूँ कि ये बिलकुल नया वाला दर्शन है। अथक प्रयास के बावजूद षडदर्शनों में इसे अभी तक स्थान नहीं मिल पाया है और भविष्य तो मैंने देखा नहीं। हालाकि प्रयास जारी है। विद्वानों से आग्रह किया जा रहा है। आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि निकट भविष्य में पुराने पड़ चुके सारे दर्शनों को निरस्त करके, एक मात्र इसी महान दर्शन की स्थापना हो जायेगी। दुनिया का गुरु और अग्रणी होने के कारण हमारे देश को ही इसका परम श्रेय मिलना भी बिलकुल तय है।  

अपने देश की बूढ़ी हो रही भाषा में यदि आप यक़ीन नहीं रखते हों, इसे बोलने-लिखने में मानहानि मूहसूस करते हों तो आपकी सुविधा के लिए मैं इसका अनुवाद भी बतला ही देता हूँ। अंग्रेजी में इसे फिलॉस्फी ऑफ पैरासाइट या                पैरासाइटिक फिलॉस्फी कह सकते हैं । हालाकि इस शब्द को अभी किसी डिक्शनरी में ढूढ़ने का ज़हमत मत मोलिएगा । वनस्पति-विज्ञान में कस्कूटारिफ़्लेक्सा के नाम से जाने जाने वाले पौधे को आयुर्वेद में अमरबेल या  अमरलता कहते हैं। सदा दूसरे के रस से रसवान होना इसका प्रधान गुण है।  यह अद्भुत वनस्पति ही आधार है इस नये दर्शन का ।

 ये न तो नास्तिक दर्शन समूह का सदस्य है और न आस्तिक दर्शन समूह का ही । 
यावत जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत वाला सिद्धान्त शायद चार्वाक दर्शन का है। हालाकि मैंने कभी इसे पढ़ा नहीं, किन्तु इस नये वाले दर्शन का सिद्धान्त इसी दर्शन के मूलतत्त्वों पर आधारित है - ये मैं पूरी तरह से जानता हूँ ।
इसका प्रणयन ठीक वैसे ही हुआ है , जैसे पूरी दुनिया के कानूनों का कतरन हमारे अपने वाले कानून का,जिसे बड़े ज़तन से बनाया था हमारी पिछली वाली पीढ़ी ने, इस आशा और विश्वास के साथ कि लम्बी गुलामी से मुक्त होने के बाद राष्ट्र को नयी ऊर्जा मिलेगी और चहुमुखी विकास होगा । सौभाग्य है हमारा कि ये विकास सत्तर वर्षों में भी अभी वालिग नहीं हुआ है । विशेषज्ञों की राय है कि इसका चिर युवा वा किशोर ही रहना,देश के सेहत के लिए फायदेमन्द है ।

इस नये वाले दर्शन यानी परजीवीदर्शन का नवीन अनुगृहित वाक्य है — यावत जीवेत सुखं जीवेत, 
                        परजीवी रुपेण घृतं पिवेत । 
परजीवी रुपेण घृतं पिवेत का ये मौलिक सिद्धान्त जबसे सुना हूँ, पता नहीं क्यों मुझे बहुत भा रहा है और पिछले कई दिनों से अनवरत इस पर ही चिन्तन-मनन में लगा हूँ । और एक गूढ़ बात बताऊँ आपको ? इस पर लागातार चिन्तन करने में बड़ा ही सुकून मिल रहा है । परमात्म-चिन्तन से भी कहीं ज्यादा ।

   ज़ाहिर है कि जिस विषय का चिन्तन ही इतना शान्ति-सन्तोषप्रद है, वो अपने आप में कितना आनन्ददायक होगा ! सोच कर ही सिहरन हो रहा है । सुख,शान्ति और आनन्द यदि सौभाग्य से तीनों उपलब्ध हो जाये,फिर परमात्मा को पाने वाली समस्या भी खतम हो जाये । मैं समझता हूँ कि देश के विकास में इससे काफी मदद मिलेगी,क्यों कि आवादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा परमात्मा को ही खोजने में लगा हुआ है,ठीक उसी तरह जैसे  कुछ वैज्ञानिक एलीयन की खोज में व्यस्त हैं। जबकि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस परजीवीदर्शन के अध्ययन,मनन,चिन्तन,प्रयोग और आत्मसात के बाद कभी कुछ खोजने की जरुरत ही नहीं रह जायेगी। हालाकि मेरा ये अनुभव अपना नहीं है। इसे कुछ परजीवीदार्शनिकों से कुछ दिनों के लिए उधार लिया हूँ।

जैसा कि मैंने कहा— मुझे अभी तक इसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी, अनुभव और ज्ञान  नहीं है , फिर भी थोड़ा कुछ प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूँ । वो इसलिए कि आजकल इसकी बहुत ही आवश्यकता है और स्कोप भी । इसके फ्यूचर स्कोप को मद्देनज़र रखते हुए महानगरों, नगरों, कस्बों में ही नहीं पंचायतीराज के कारण गांव-गांव में पैरासाइटिक इन्डस्ट्रीज़   की स्थापना हो रही है। कुल मिलाकर  कहा जा सकता है कि किसी राष्ट्र का विकास इसी दर्शन की सिद्धि-असिद्धि पर निर्भर है।

  परजीवीदर्शन का अहं तत्त्व है - अन्तःकरण या कहें अन्तरात्मा ।  कुछ लोग इसीको ज़मीर भी कहते हैं । और दूसरा तत्त्व  है—  स्वार्थ । ये वही स्वार्थ है जिसे ज्यादातर लोग जानते हैं । यानी कि ये वो वाला स्वार्थ बिलकुल नहीं है,जिसके बारे में हमारे यहां के साधु-संत बतलाते रहते हैं — स्व का अर्थ । परजीवीदर्शन के फॉलोवरों को स्व को ढूढ़ने-जानने की  जरा भी जरुरत नहीं है । ज़मीर और स्वार्थ दो ही चीजों को ठीक से समझना होता है इस नये दर्शन के विद्यार्थी को । सुविधा की बात ये है कि पहले घटक को त्याग देना होता है और दूसरे को ग्रहण कर लेना होता है । पहले का जैसे ही त्याग करते हैं, दूसरा अपने आप ग्रहण हो जाता है । उसके लिए कोई खास साधना-वाधना बिलकुल नहीं करनी होती । इसीलिये आजकल ये सरल अनुष्ठान बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है ।

  सबसे बड़ी बात ये है कि जैसे ही आप इस दर्शन में सिद्ध हो जाते हैं,फिर कुछ करने-धरने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती । सबकुछ वैसे ही होने लगता है, जैसे जेनरेटर स्टार्ट करके ऑपरेटर निश्चिन्त हो जाता है । सिर्फ सुख-सुविधा ही नहीं बल्कि ऐशोआराम की पूरी व्यवस्था हो जाती है । स्वर्ग की अप्सराओं पर तो इन्द्र ने पहले से ही कब्जा जमा रखा है,किन्तु इस लोक वालियों पर ऐसे सिद्धों का पूरा हक बनता है । ऐश्वर्य इनके चरणों का दास हो जाता है। प्रशासन ही नहीं न्याय भी इनके आगे नतमस्तक होने को विवश हो जाता है । देर रात भी दरबार बैठ सकता है, निर्णय भी सुना सकता है। माइक और कैमरा लिए लोग सदा आगे-पीछे घूमते रहेंगे । यदि मन हो तो उन्हें भद्दी से भद्दी गालियां भी दे सकते हैं और वे सिर्फ दांत निपोरते हुये, यसऽ सरऽ यसऽ सरऽ की रट्ट लगायेंगे । और रही बात विधि-विधान की ।  तो, वो तो इनके साइडपॉकेट में भरे  रहने की चीज है — पान की गिलौरियों की तरह । जब मन हो निकाल कर थोबड़े में डाल लो, जब चाहो प..ऽ..च्च से थूक दो । पीकदान की भी ज़रुरत नहीं । मेज़ के नीचे वाली जगह आखिर कारीगरों ने बनाया किस लिए है !  
   इतना ही नहीं जब चाहें, जितनी बार चाहें संसद ठप्प करा सकते हैं । संसद ठप्प कराने का रेकॉर्ड लिखने के लिए गिनीज़बुक वाले रोज दिन फोन मिलाते रहेंगे । रोडजाम, चक्काजाम ये सब तो बायें हाथ का खेल होता है इन सिद्धों के लिए । वो पुरानी वाली किताबों की जैसे मिथकीय सुनते हैं न कि देवी के भृकुटि विलास मात्र से क्या से क्या हो जाता है— सृजन भी और संहार भी...। बस समझ लीजिये कि उन सारी विभूतियों  से लैस होते हैं ये सिद्ध । घटोत्कच पुत्र बरबरीक के तरकस की तरह इनके पास भी महज दो ही तीर होते हैं — इन्फॉर्मेशन वाला और प्रोडक्शन वाला । और रही बात चाटुकारों की , तो इसकी कमी जरा भी महसूस नहीं होती कभी भी । चाहें तो       बेडरुम में भी इनसे घिरे रह सकते हैं ।

  जरा और जानिये, परजीवीदर्शनशास्त्रियों के गुण— ऐसे सिद्ध लोग महापुरुष की श्रेणी में आ जाते हैं। महाजनः ये न गतः स पंथाः ....वो जिधर चल देते हैं उधर ही रास्ता बन जाता है । जहां बैठ जाते हैं वहीं दरबार हो जाता है । इतना ही नहीं, पाप-पुण्य से बिलकुल ऊपर उठ जाते हैं ऐसे लोग । क्यों कि उनके द्वारा किये गए कर्मों का फल भोगने के लिए सदा आमजनता तत्पर रहती है । शंकर ने तो सिर्फ हलाहल पीया था । किन्तु ये महासिद्ध बड़े-बड़े पहाड़,नदी के बालू,मिट्टी,जगह-जमीन,जंगल,डीज़ल,पेट्रोल,कंकरीट,सीमेंट, अलकतरा तक सब कुछ खा-पीकर डकार भी नहीं लेते । दरअसल डकार वाला गैस तब बनता है न, जब किसी का हाज़मा खराब हो । मजबूत हाज़में वाले का गैस क्या गैसकांड भी भला क्या विगाड़ेगा !

तो आइये चलें, परजीवीदर्शन की अनुभूति करें ।

दरअसल मेरी भी लाचारी है । पेट में गुड़गुड़ होने लगता है,यदि न कुछ कहूं आपसे ।
        आपने अपना बहुमूल्य समय दिया मेरे इस मनोविकार को पढ़ने-सुनने में, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।

Thursday, 5 April 2018

लोकतन्त्र का लेटेस्ट सेल्फी


लोकतन्त्र का लेटेस्ट सेल्फी

     लोकतन्त्र ज्यादातर सेल्फीमोड में ही हुआ करता है । सेल्फी लेते समय सेल्फी लेने वाले की जो मनोदशा और भावदशा, या कि बॉड़ीलैंगवेज जैसा हुआ करता है, लोकतन्त्र में भी नागरिकों की प्रायः वैसी ही स्थिति होती है । आसपास-परिवेश का तो सवाल ही नहीं, खुद को भी भूल जाते हैं हम, जब सेल्फीमोड में होते हैं। फिर जिसे वज़ूद का ही पता नहीं, उसे भला औरों की क्या फ़िकर ? वैसे आप स्वतन्त्र हैं- सेल्फी का अर्थ लेने में । क्यों कि हो सकता है एक और वाला अर्थ ही किसी को अच्छा लगे। अच्छा और इच्छा की पूरी गुंजायश है यहां।

    लोकतन्त्र का एक दूसरा नाम प्रजातन्त्र भी है- आप जानते ही होंगे। वैसे मैं सिविक्स; का विद्यार्थी नहीं हूँ, किन्तु कभी किसी विद्वान लेखक की किताब  में बड़े मनोयोग से पढ़ा था कि प्रजातन्त्र का मतलब ही होता है - प्रजा की इच्छा से चलने या कहें रेंगने वाली शासन-व्यवस्था। या कहें- सदा बीमार सी रहने वाली राज्य-व्यवस्था । वैसे आपका विचार हो तो इसका सही नाम- भेड़तन्त्र  या सियारतन्त्र रखा जा सकता है। क्यों कि ये नाम खूब फबता है इस पर। वैसे भी हमने सीखा है भेड़ों और सियारों से ही झुंड बनाने की कला , हुआ-हुआ करने का हुनर और हमेशा मिमियाते रहने की आदत ।

    क्या कभी आपने दौड़ने वाला लोकतन्त्र देखा है ? नहीं न ? तो फिर चौंकिये मत । लोकतन्त्र ज्यादातर बीमार ही रहता है। कम्बल ओढ़े रहना इसकी मजबूरी है। उससे भी काम न चला तो चेहरे पर भी कुछ डाल-डूल लेना पड़ता है। वो भी एक नहीं कई, ताकि एक यदि हवा-वयार में उड़ भी जाये तो दूसरा बरकारर रहे  और असली चेहरे को किसी तरह का नुकसान न हो। चेहरा यानी पहचान बचाना- इस तन्त्र की सबसे बड़ी समस्या है और सबसे अहं कर्तव्य भी। अपना चेहरा ही न बचा तो फिर देश बच करके ही क्या होगा ? यही कारण है कि जब-जब चेहरे पर ज़रब आता है, तब-तब लोकतन्त्र खतरे में पड़ने लगता है और अपने-अपने अन्दाज में, अलग-अलग कोनों से हुआ-हुआ, या मेंऽ मेंऽ मेंऽ में करना पड़ता है। ऐसे जरुरतमन्द लोकतन्त्र को सहेजने के लिए लोकलाज,धर्म,रिवाज,जाति-पाति सबकुछ छोड़कर, एकजुट होना पड़ता है। बे-हयायी और मक्कारी की लोकतन्त्र में सबसे ज्यादे अहमियत है। इसके बिना बिलकुल काम नहीं चलता। लोकतन्त्र की लाश भी यदि सलामत रही, तो भी उसपर चर्चा, वार्ता, प्रेस-कॉन्फरेन्स करके ऐशो-वो-मौज़ की जिंदगी बसर की जा सकती है—अनुभवियों ने कुछ ऐसा ही कहा है। धर्मराज बने रहने से काम नहीं चलने वाला ! जंगलराज क्या कम लोकप्रिय हुआ हमारे यहां ? खैर ।

    हालाकि सदा सेल्फीमोड में रहना लोकतन्त्र की मजबूरी है। दो-चार को परमानेन्ट खुश रखना मुश्किल होता है, फिर यहां तो लाख-करोड़ की बात है। लाख कोशिश करके भी क्या कोई बीबी अपने स़ौहर को असालतन तौर पर खुशमिज़ाज रख पायी है आजतक ? और यही हाल क्या अभागे स़ौहरों का भी नहीं है ? तो फिर औरों को सदा खुश रखने की ज़हमत ही क्यों ? क्यों न खुद को खुश रखने का इन्तज़ाम किया  जाये। हालाकि सेल्फीमोड में खुद का दायरा थोड़ा सा बड़ा होता है, फिर भी मेरा नाम जोकर के दिल की तरह नहीं ।

  तो आइये सेल्फीमोड में । 

 धड़ाधड़ सेल्फी लीजिये । 

खटाखट सेल्फी लीजिये। 

सोशलमीडिया आपका इन्तजार कर रहा है। 

फिर वहीं मिलेंगे ।