Sunday, 23 June 2019

पढ़ुए की पहचान

पढ़ुए की पहचान

 एक अनपढ़-भोलेभाले देहाती को एक पढ़े-लिखे, तेज-तरार शहरी आदमी से मुलाकात हुयी । भोले ग्रामीड़ पर अपनी धाक जमाते हुए उसने शहरी-संस्कृति और पढ़ाई-लिखाई के बारे में बहुत कुछ उपदेश दिया, जिसका अन्तिम निचोड़ था –
तुम तो निरक्षरभट्टाचार्य रह गए । जीवन गुजार दिए निरे देहात में हल-बैल,गाय-भैंस के साथ । कम से कम अपने बच्चे को तो शहर भेज कर अच्छी शिक्षा दिलाओ । कहो तो तुम्हारे वेटे को शहर भेजने,रहने-खाने,पढ़ने की व्यवस्था करा दूं । मेरे कई मित्र हैं शहरों में । विश्वासी घरेलू नौकरों की बहुत कमी रहती है शहरों में । किसी बंगले पर रखवा दूंगा । जरुरत की सारी व्यवस्था मिल जायेगी । खाली समय में कुछ पढ़-लिख भी लेगा । हो सकता है होशियारी करे और मितव्ययिता वरते तो कुछ पैसे बचा कर तुम्हारे लिए भी भेज दे ।
देहाती तो देहाती होता है – भीतर-बाहर बिलकुल निर्मल । शहरी बाबू की बातों में आ गया । अगले ही दिन शहर जाने की तैयारी हो गयी । रोती-कलपती माँ और मुरझाये चेहरे वाले बाप का पंवलग्गी कर बेटा शहर चला गया । हाँ जाते-जाते इतना जरुर कहा कि यदि वह पढ़-लिख कर काबिल बन गया तो माँ-बाप,भाई-बहन सबको लेकर शहर चला जायेगा ।
खुद चिट्ठियां लिखने तो आती नहीं थी, इस कारण अपने मालिक से ही हालचाल लिखवाकर हर दस-पन्द्रह दिनों पर दे दिया करता । करीब छः महीने तक ये सिलसिला जारी रहा । फिर धीरे-धीरे चिट्ठियों का अन्तराल बढ़ने लगा ।
पूरे दो साल बाद बेटा घर आया । माँ-बाप,भाई-बहन सबके लिए कुछ न कुछ जरुरी सामान लेकर आया । कुछ नगदी माँ के हाथों में दिए । बड़ा खुशमिज़ाज दीखा ।
देहाती पिता के एक देहाती मित्र ने शहर से आए वेटे का हालचाल पूछा— इतने दिनों पर शहर से आया है । बाबुआ कुछ पढ़ा-लिखा ?”
बाप ने सहज भाव से उत्तर दिया— मैं अनपढ़-गंवार उसकी पढ़ाई-लिखाई की जाँच कैसे करुँ ? मुझे कुछ खास समझ नहीं  है, किन्तु इतना फर्क जरुर देख रहा हूँ कि पहले कहीं बाहर से लौटता था तो दोनों हाथों से दोनों पैर छूकर पंवल्लग्गी करता था । इस बार आया तो ठेहुना छूआ । और हाँ, दूसरी बात ये गौर कर रहा हूँ कि जो पहले कहीं किनारे एकान्त में जाकर बाकायदा बैठ कर पेशाब करता था । इसबार देखता हूँ खड़े-खड़े मुतैया कर रहा है । और तीसरी बात ये देख रहा हूँ कि पहले यहां रहता था तो पाटी पर साथ-साथ बैठ कर खाना खाता था । इस बार देखता हूँ कि हाथ में थाली लेकर घूम-घूम कर खाता है । मां ने पूछा तो कहने लगा कि शहर में लोग ऐसा ही करते हैं । लगता है कुछ तो जरुर पढ़-लिख गया इतने दिनों में ।
समय गुजरा । शहरी बेटा अगले वर्ष फिर वापस गांव आया । देहाती लोग समाचार के लिए कुछ ज्यादा ही उत्सुक रहा करते हैं । इस बार कई ग्रामिड़ों ने हालचाल पूछा । सीधे-साधे बाप का सीधा-साधा जबाव मिला—
इस बार आया तो एक हाथ उठा कर दूर से ही सलाम बोला । न कोई सामान लेकर आया किसी के लिए और न माँ के हाथ में पैसे ही दिया । विशेष पूछने पर झंझुआकर बोला –  बकबक मत कर बुढ़िया । ज्यादे टें-टें करबें त टेंटुआ दबा देबऊ । अपन शादी-वादी के जुगाड़ में पैसा जुटा रहल हिओ । तोहनी के उहईं वृद्धाश्रम में रहे के इन्तजाम करवा देबऊ ।  ”
देहाती बाप के आँखों में बुझते दीये वाली अजीब सी चमक थी – अब पक्का विश्वास हो गया कि बाबुआ एकदम पढ़-लिख गया है ।
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Sunday, 16 June 2019

मातृमहिमा


                                          मातृमहिमा
                                      (मातृशक्तिशरणागति)
            माता की महत्ता और गरिमा पर प्रकाश डालना शब्द-सामर्थ्य-परे है । विविध शास्त्र-पुराणादि इसके वर्णन से पटे पड़े हैं । सूक्ष्म जीव को स्थूल शरीरधारी  बनाकर संसार में लाने का एकमात्र माध्यम माता ही है । दत्तात्रेय,कृष्ण,राम,परशुराम,बलरामादि अवतारी पुरुषों को भी माता का आलम्ब लेना ही पड़ा है । ध्यातव्य है कि सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा ने मानसी सृष्टि ही की थी, किन्तु वे पूर्णतः सफल नहीं हो पाये । अन्ततः लाचार होकर उन्हें मैथुनी सृष्टि का सहारा लेना पड़ा । मैथुनी-सृष्टि के लिए एक ही तत्व को दो भागों में विभक्त करना पड़ा- नारी और पुरुष यानी शक्ति और शक्तिमान । स-शक्त पुरुष ही सृष्टि का ' वपक ' होता है । मूलतः एक ही शक्ति द्विधा विभक्त होकर बीज और क्षेत्र दोनों बन जाती है । दूसरे शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि केवल ईक्षणशक्ति से काम नहीं चल सकता । स्रजन हेतु क्रियाशक्ति की भी आवश्यकता होती है । मैथुनीक्रिया से ही सृष्टि का विस्तार सम्भव हो पाया ।  शक्ति को धारित करने वाला कोई अन्य घटक अनिवार्य ही नहीं अपरिहार्य है ।  मातृगर्भ की उर्वरा भूमि में पितृबीज वपन मात्र से काम चलने को नहीं, प्रत्युत उसके पालन-पोषण की भी आवश्यकता होती है । अन्तः - वाह्य उभय रुप में पोषण का ये कार्य सम्पन्न होता है, तब कहीं सृष्टि का वास्तविक विस्तार हो पाता है । 
            तन्त्र हो या योग मातृका-रहस्य को सम्यक रुप से समझे-बूझे-साधे वगैर काम नहीं चल सकता ।  सामान्य तौर पर सामान्य जन के लिए, जो योग और तन्त्र की साधना नहीं कर सकते, करने में सक्षम नहीं हैं, या करना जिनका अभीष्ट नहीं है, उनके लिए कर्मकाण्ड की व्यवस्था सुझायी गयी है । इसे यों भी कह सकते हैं कि प्रारम्भ में विविध कर्मकाण्डीय व्यवस्था और क्रियायों से गुजर कर, मन और शरीर को परिपक्व बनाकर, अन्ततः उच्च साधना में अग्रसर हुआ जा सकता है । कर्मकाण्डीय क्रियाओं से सामान्य सांसारिक मल दग्ध हो जाते हैं और उत्तरोत्तर विकास का मार्ग प्रशस्त होता है । अज्ञानवश कुछ लोगों को ये कर्मकाण्डीय जंजाल व्यर्थ या उलझनपूर्ण प्रतीत होता है । किन्तु इसे अक्षरारम्भ की " खड़िया-पट्टिका " कहें तो अधिक स्पष्टी हो । हालाकि कर्मकाण्ड के रास्ते से भी मोक्ष-द्वार तक पहुँचा जा सकता है ।
            कर्मकाण्ड में मातृका-पूजन को सर्वोपरि रखा गया है । यही कारण है कि छोटे-बड़े किसी भी पूजन का प्रारम्भ गौरी-गणेशपूजन से ही होता है । मातृशक्ति गौरी और विघ्नेश्वर गणेश । यहां इस संशय में न रहें कि ये आद्यपूज्या गौरी तो गणेशमाता पार्वती हैं, फिर ये माता और पुत्र के एकत्र पूजन का क्या औचित्य ! वस्तुतः यहां " मूलप्रकृति और पुरुष " की बात है । सांख्य वाले पुरुष । पुराण - शैली में कहें तो कह सकते हैं कि सीधे राधा और श्रीकृष्ण की पूजा है ये ।
            गौरी-गणेशपूजन के पश्चात् षोडशमातृकाओं की पूजा की बात आती है, भले ही सूर्यादि नवग्रहों, गणेशादि पंचलोकपालों एवं इन्द्रादि दशदिकपालों का समावेश भी हो जाता है पूजनक्रम में ; किन्तु मुख्य उद्देश्य होता है— विविध मातृकापूजन । यथा- गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया । देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः।। धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवताः ।। गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धौ पूज्यास्तु षोडशः ।। कर्मादिषु च सर्वेषु मातरः सगणाधिपाः ।  पूजनीयाः प्रयत्नेन पूजिता पूजयन्ति ताः ।। पुनः श्री आदि सप्तघृतमात्रिका, तृणमात्रिकादि का पूजन होता है । इसी क्रम में आगे चतुःषष्टियोगिनीमातृका के पूजन का भी विधान है । कार्यान्त में अग्निपूजन के पश्चात् अग्निपत्नी स्वाहा की पूजा होती है । ये स्वाहाशक्ति ही कृत कर्मों की वाहिका हैं । ध्यातव्य है कि पितृकार्यों में पितृ-पत्नी स्वधा का स्मरण और प्रयोग बारम्बार होता है ।
            इस प्रकार हम पाते हैं कि देवकार्य वा पितृकार्यों के विविध कर्मकाण्डों के मूल में मातृ-शक्ति की ही महत्ता प्रतीत होती है ।
            सामान्य सांसारिक जीवन में भी माता की सर्वाधिक श्रेष्ठता की बात कही जाती है । माता का स्थान पिता और गुरु से भी ऊपर है- 
सर्वेषामपि पूज्यानां पिता वन्द्यो महान् गुरुः ।
पितुः शतगुणैर्माता गर्भधारणपोषणात् ।।
माता च पृथिवीरुपा सर्वेभ्यश्च हितैषिणी ।
नास्ति मातुः परो बन्धुः सर्वेषां जगतीतले ।। (ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्रीकृष्णजन्मखण्ड-७२-११०,१११)
संक्षेप में कह सकते हैं कि  पिता की तुलना में माता सौगुना पूज्या है, वन्दनीया है । दीक्षागुरु के चयन- प्रसंग में यहां तक कहा गया है कि पिता को गुरु बनने का यानी गुरुमन्त्रदीक्षा का अधिकार नहीं है, किन्तु माता को है । माता सर्वोत्कृष्ट और सर्व निरापद गुरु हो सकती है किसी भी साधना-क्षेत्र में । यहां ये प्रश्न उठ सकता है कि योग वा तन्त्र-मार्ग में माता की वास्तविक (शैक्षणिक व व्यावहारिक) योग्यता यदि अनुकूल नहीं होगी तो क्या होगा ? वस्तुतः वैसी स्थिति में माता को साक्षी मान कर सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान अन्य स्रोत से ग्रहण किया जाना चाहिए ।
सच पूछें तो संसार के सभी ऋणों से मुक्त हुआ जा सकता है, परन्तु मातृऋण से मुक्ति असम्भव है। मातृशक्तिशरणागति ही एकमात्र मुक्ति का उपाय है मातृऋण से । यही कारण है कि गयाश्राद्धादि के समय पार्वणक्रिया में पिता-मातादि द्वादश प्रधान पिण्ड-कार्य सम्पन्नता के पश्चात् माता के लिए अतिरिक्त षोडश पिण्ड देने की अनिवार्यता कही गयी है-   
आगर्भज्ञानपर्यन्तं पालितो यत्त्वया ह्यहम् । 
आवाहयामि ताः मातृृर्दर्भपृष्ठे तिलोदकैः ।। (श्राद्धपारिजातादि श्राद्धीय ग्रन्थ)   
उक्त मन्त्रोच्चारण पूर्वक पुनः अतिरिक्त कुशा पर आवाहन करके प्रतिज्ञा और स्मरणमूलक सोलह मन्त्रों से पिण्डदान किया जाता है ।
वर्तमान समय में सद्गुरु का मिलना अत्यन्त दुरुह है । जहां देखें बाजारवादी गुरुओं का नानाविध जाल पसरा हुआ है, जहां " कनफुकवा " शिष्यों की भीड़ के अतिरिक्त और कुछ लब्ध होने को नहीं है । ऐसे में मातृशक्तिशरणागति ही सरलतम मार्ग प्रतीत होता है । भूतल पर माता से बढ़ कर और कोई नहीं हो सकता । गर्भधारण करके जन्मदेने वाली माता के पश्चात् जिस भूमि(देश,राष्ट्र) में हम वास करते हैं वो पावन भूमि गरीयशी कही गयी है- " जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयशी "
            मातृमहिमा प्रसंग में जन्मदात्री माता के अतिरिक्त अन्य पन्द्रह माताओं की बात कही जाती है । इस प्रकार माताओं (माता और माता तुल्य) की कुल संख्या सोलह हो जाती है। इस प्रकार षोडशमातृकायें यहां प्रत्यक्ष संसार में भी प्रकट हो जाती हैं । यथा-
 गर्भधात्री स्तनदात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।
 अभीष्टदेवतापत्नी च पितुःपत्नी च कन्यका ।।
 सगर्भकन्याभगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः ।
 मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा ।।
 मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च ।
 जनानां वेदविहिता मातरः षोडशस्मृताः।।(ब्रह्मवैवर्तपुराण गणपतिखण्ड अध्याय १५, श्लोक संख्या ३८ से ४०)
यहां ये स्पष्ट किया गया है कि जन्मदात्री माता के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री का स्तनपान करने पर वो भी माता ही कही जायेगी भले ही वो किसी अन्य जाति की क्यों न हो । इसके अतिरिक्त भोजन बनाकर देनेवाली भी माता की श्रेणी में ही आती है।  गुरु की पत्नी तो माता है ही  । जिस देवता की हम आराधना करते हैं उनकी शक्ति भी माता ही हैं । यथा- सीतामाता,पार्वतीमाता इत्यादि । पिता की अन्य पत्नियाँ (सौतेलीमाँ), माता की माता (नानी), पिता की माता (दादी) , पिता की बहन (फूआ), अपनी बहन, मामा की पत्नी (मामी), पत्नी की माता (सास) के अतिरिक्त पुत्रबधु, बेटी, भाई की पत्नी आदि भी माता की श्रेणी में ही हैं । एक अन्य प्रसंग में ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्रीकृष्ण जन्मखण्ड अध्याय ५९ श्लोकसंख्या ५५-५६ में उक्त माताओं के अतिरिक्त राजपत्नी(रानी),माता की बहन(मौसी) और नौकरानी को भी माता की श्रेणी में ही रखा गया है । यथा—  
गुरुपत्नी राजपत्नी देवपत्नी तथा बधूः 
पित्रोःस्वसा मित्रपत्नी भृत्यपत्नी च मातुली ।।
पितृपत्नी भ्रातृपत्नी  श्रश्रूश्च भगिनी सुता ।
गर्भधात्रीष्टदेवी च पुंसां षोडश मातरः ।।

मातृशक्तिशरणागति से इह लोक और परलोक दोनों सध सकता है । यथेच्छ भोग और मोक्ष दोनों लब्ध हो सकते हैं । अतः निर्द्वन्द्व भाव से मातृशक्ति का शरण ग्रहण करने की आवश्यकता है । यथा— शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ।। (श्रीदुर्गासप्तशति) अस्तु ।।
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पुराणपरिचय


                                    पुराणपरिचय

            भारतीय संस्कृति का प्राण- अष्टादशपुराण सामान्य जन के बीच प्रायः शंका, उलझन और तर्क-वितर्क का विषय बन कर रह जाता है । सबसे पहले सवाल उठता है कि पुराण लेखन है या संकलन-सम्पादन ?  यदि ये किसी एक व्यक्ति का लेखन है तो फिर इतनी पुनरुक्तियाँ क्यों ? एक ही आख्यान-उपाख्यान, गाथादि अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग ढंग से क्यों ? अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग देवताओं की सर्वश्रेष्ठता क्यों ? भाव, भाषा, शैली इत्यादि में भी पर्याप्त भिन्नता क्यों ? इनके अतिरिक्त अन्यान्य कई तरह के आक्षेप युक्त प्रश्न भी उठा करते हैं ।
            आजकल अनुवाद और सरलीकरण के नाम पर अनेक लेखकों द्वारा रचित पुराणों की भिन्न-भिन्न भाषाटीकायें भी बाजार में आगयी हैं, जो अपने-अपने मतों, विचारों की सम्पुष्टी हेतु रची गयी हैं प्रायः। मूल तत्व से काफी दूर, प्रायः लोग इन टीकाओं का ही अवलोकन करते हैं । परिणामतः शंका निर्मूल होने के बजाय सुपुष्टमूल हो जाती हैं ।
            हालाकि ये शंकायें ज्यादातर वे लोग ही उठाते हैं, जिन्होंने पुराणों का सिर्फ नाम भर सुन रखा है । पुराण के सम्बन्ध में सिर्फ उड़ती-पड़ती ऊपरी बातें सुन-जान रखा है- बिलकुल टुकड़े-टुकड़े में, अलग-अलग व्यक्तियों (प्रवचनकर्ता,कथावाचक आदि) द्वारा, अलग-अलग स्थानों में, भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में । किन्तु पुराणों के अध्येता, गवेषक, अनुशीलक ये भलीभांति जानते-समझते हैं कि पुराण का विषय निःशंक है । आवश्यकता है इसे ठीक से हृदयंगम करने की ।
            पुराण का सामान्य अर्थ होता है-  पुराना । पुरा परम्परां वक्ति पुराणं तेन वै स्मृतम् । (वायुपुराण-१-२-५३) जहां पुरानी बातों का संकलन हो, पूर्व परम्परा का वर्णन हो- उसे ही पुराण कहते हैं । निरुक्त ग्रन्थों में  " पुरा नवम् पुराणम् ", " पुरार्थेषु आनयतीति पुराणम् " इत्यादि अनेकविध निरुक्तियाँ उपलब्ध होती हैं । अर्थानुबन्धिनी होने के कारण इस दूसरी निरुक्ति को उत्तम कह सकते हैं ।
प्रकृति और पुरुष का परिणाम ही ये जगत है । जड़-चेतनात्मक दोनों के परिणाम-परम्परा विषयक ज्ञान उपलब्धि में अनन (प्राणन्) करने के कारण ही पुराण  " पुराण " शब्द से अभिहित हुआ । श्री रुप गोस्वामीजी ने भी उक्त निरुक्तियों के तुल्य ही विवेचना की है- " पुरा नयनीति पुराणम् " ।
            पुराण की प्राचीनता के सम्बन्ध में मत्स्यपुराण ५३-३ में स्पष्ट संकेत है— पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणास्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।। अर्थात् पुराण सभी शास्त्रों से पुराना है । सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी ने पहले पुराणों का ही स्मरण किया, तत्पश्चात वेदों का । स्मरण किया- इस कथन से स्पष्ट है कि पुराण किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं, प्रत्युत नित्यसिद्ध हैं । वैदिक साहित्य की तरह पुराण भी अपौरुषेय हैं । इसकी पुष्टि अथर्ववेद-११-७-२४ के इस उल्लेख से स्पष्ट है- ऋचःसामानि छन्दान्सि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाब्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिताः ।। - यज्ञ के उच्छिष्ट से ययुर्वेद सहित ऋग्वेद,सामवेद,छन्द और पुराण प्रकट हुए । वृहदारण्यकोपनिषद में भी कहा गया है कि परमात्मा के निःश्वास से चारो वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराणादि निःसृत हुए हैं । विविध ब्राह्मणग्रन्थों से भी इन्हीं बातों की पुष्टि होती है।
            आधुनिक ग्रन्थ " पुराणोत्पत्तिप्रसंग " में स्पष्ट किया गया है कि सृ्ष्टिविज्ञान वेदों में जहाँ-तहाँ वर्णित है, प्रकरण-बन्धन से छन्दित नहीं है , इस कारण कोमल बुद्धि वालों के लिए भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने  "इदं प्रथमतया" विभिन्न विषयक वेद-वाक्यों से ज्ञान (आत्मज्ञान), विज्ञान (प्रकृतिविज्ञान) प्रतिपादक वाक्यों को पृथक् करके एक बृहदपुराणसंहिता को प्रकट किया (संपादित किया) । उस पुराण संहिता में सृष्टि के इतिहास की शुद्धि के लिए सृष्टिविज्ञान से सम्बद्ध अन्य चार विषयों का समावेश किया । श्रीउग्रश्रवासूतजी के अनुसार ये चार विषय हैं- आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः । पुराणसंहितां चक्रे भगवान् वादरायणः ।। (वैदिक पुराण की अपेक्षा वादरायणपुराण में प्रस्तुत चार विषय अधिक हैं ।)
प्रसंगवश यहां स्पष्ट कर दें कि अपने कालके दृष्ट इतिवृत्त को आख्यान कहते हैं । परोक्ष अचिर काल में वृत्त इतिहास को उपाख्यान कहते हैं । परम्परा से श्रुत-ज्ञात किन्तु जिनके कर्ता का ज्ञान (जानकारी) नहीं है- उसे गाथा कहते हैं । तथा ऐतिहासिक विषय सम्बद्ध पौराणिक इतिहास विभागमें अनुदित धर्मशास्त्रादि विषयक प्रतिपादित ज्ञान एवं कर्तव्य विषयक वचनों को कल्पशुद्धि कहा जाता है । श्रौत-स्मार्त, समयाचार, धर्मभेद, नानाविध उपासनाभेद, नीति एवं दर्शन-भेद भी कल्पशुद्धि के अन्तर्गत ही आते हैं । इन बातों से किंचित भिन्न मत प्रस्तुत करते हैं- लोमहर्षणसूतजी । उनके अनुसार पुराणों के पांच लक्षण कहे गए हैं । यथा- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशोमन्वन्तराणि च । वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ।। इस प्रकार  मन्वन्तरविज्ञान, सृ्ष्टिविज्ञान, प्रतिसृष्टिविज्ञान, वंशविज्ञान एवं वंश्यानुचरितविज्ञान का समावेश है पुराणों में । शब्दकल्पद्रुम में पुराण के दस लक्षण कहे गए हैं । यथा- सर्ग,विसर्ग,वृत्ति,रक्षा,अन्तर,वंश,वंश्यनुचरित, संख्या, हेतु और अपाश्रय ।  इन एक-एक शब्दों (पदों) की विशद व्याख्या हो सकती है ।
            संक्षेप में इतना ही कि प्रारम्भ में पुराणसंहिता मात्र एक ही थी- सौ करोड़ श्लोकों के कलेवर वाली, जिसे सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने स्मरण करके(ध्यानावस्था में देख करके)उपस्थित ऋषि-मुनियों को उपदेशित किया था । कालान्तर में युगबोधानुसार स्मरणशक्ति का ह्रास होता गया । श्रुतिपरम्परा लुप्त प्रायः होने लगी । श्रुतिगम्य ज्ञान को लिपिवद्ध करने की आवश्यकता प्रतीत होने लगी । फलतः द्वापर में इस संकट का निवारण करने हेतु भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनव्यास जी की उत्पत्ति हुयी, जिन्होंने विधिवत सम्पादन किया पूर्व प्रसंगों का । मूल वादारायणीसंहिता में अठारह विषयों के अठारह परिच्छेद (पर्व) थे । यही विशाल संहिता नैमिषारण्य में मुनि समाज के नाना प्रश्नों के उत्तर प्रसंग में क्रमभेद से वर्तमान अष्टादशमहापुराण के रुप में परिणत होकर ग्रथित हैं । इनमें आठ ग्रन्थों का सम्पादन उग्रश्रवाजी ने और शेष दस ग्रन्थों का सम्पादन लोमहर्षणजी ने किया है। शतकोटि श्लोकों में से मुख्य-मुख्य विषयों को छांट-छांट कर मात्र चारलाख श्लोकों की संख्या वाली पुराणसंहिता सम्पादित हुयी । इस संहिता का उपदेश समय-समय पर अपने शिष्यों को व्यासजी द्वारा किया गया । कालान्तर में शिष्यों सहित महर्षि व्यास के सम्पादकत्व में पुराणों का वर्तमान स्वरुप स्थिर किया गया । ध्यातव्य है कि आख्यानों, उपाख्यानों, गाथाओं में कालभेद, स्थितिभेद, पात्रभेद, कल्पभेद आदि का भी प्रचुर प्रभाव है । विविध पुराणों के अध्ययन, अनुशीलन से ये सब बातें स्पष्ट हो जाती हैं । स्वाभाविक है कि सुनी-जानी हुयी एक ही बात को अनेक लोग पुनः प्रस्तुत करेंगे,तो उसमें किंचित भिन्नता आनी स्वाभाविक है । वक्ता और स्रोता की मनःस्थिति इसमें सर्वाधिक जिम्मवार है ।
            अब जरा पञ्चदेवों की अलग-अलग श्रेष्ठता के प्रतिपादन की बात करें तो कह सकते हैं कि विभिन्न कल्पों की मान्यता, अभिरुचि आदि का प्रभाव है इन बातों में । किन्तु सबसे बड़ी बात ये है कि अन्ततः सब कुछ तो एक ही ब्रह्म का विश्लेषण है । एक की ही उपासना की अनेक विधियां भिन्न-भिन्न पात्रों और परिवेशों के अनुसार कही गयी हैं । अतः इसमें किसी तरह का संशय नहीं होना चाहिए । वस्तुतः ब्रह्म से ब्रह्माण्ड वा ब्रह्माण्ड से ब्रह्म की ओर गमन करते हुए मूल विषय को समझना है । साधना स्थिति से संहार की ओर हो या संहार से स्थिति की ओर- वृत्तात्मक स्थितियों में कहां आदि और कहां अन्त !
            इन सारी बातों, प्रमाणों, उक्तियों के पश्चात् भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि गत कलि के ५११९ वर्ष व्यतीत होते-होते इस संक्षिप्त पुराणसंहिता(चारलाख श्लोकोंवाली)पर भी  अनेक प्रहार हुए हैं । मत-मतान्तर का समावेश भी खूब हुआ है । चिन्ताजनक छेड़छाड़ भी हुआ है मूल संहिता से । दुराग्रहग्रसितों की संख्या और बोलबाला भी कम नहीं रही है । बहुत सारी विसंगतियों का शिकार होना पड़ा है भारतीय संस्कृति को । और चतुर्दिश प्रहार निरन्तर जारी है ।
            प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में पुराणों का बड़े आदर के साथ पठन-पाठन,श्रवण,अनुशीलन होता आया है । हम भारतवासियों की बड़ी आस्था रही है पुराणों पर । भारतीय जनमानस में भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, धर्मपरायणता, वर्णाश्रम व्यवस्था, पुनर्जन्म, आत्मा-परमात्मा, परलोकआदि विषयक ज्ञान पिपासा का मुख्य श्रेय पुराणों को ही जाता है । अतः हमारा कर्तव्य होता है कि विध्वंशों-प्रहारों आदि से बच कर जो कुछ भी शेष उपलब्ध है उसे भारतीय संस्कृति के असली धरोहर के रुप में हम संजोने का प्रयास करें । व्यर्थ की टीका-टिप्पणी से विलग होकर, समय-समय पर उनका अध्ययन,मनन करें । मन्थन से कुछ तो नवनीत निकलेगा ही,जो भारत के भविष्य का पथप्रदर्शक सिद्ध होगा । अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयं । परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम् ।। अस्तु । 
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पुनश्च— पुराण-औपौरुषेयता-प्रमाण—
१. अथर्ववेद-११-७-२४ के इस उल्लेख से स्पष्ट है- ऋचःसामानि छन्दान्सि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाब्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिताः ।। - यज्ञ के उच्छिष्ट से ययुर्वेद सहित ऋग्वेद,सामवेद,छन्द और पुराण प्रकट हुए ।
२. स होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानाम् वेदम्...।(छान्दोग्योपनिषदः)
३. ...तानुपदिशति पुराणम् । वेदःसोऽयमिति । किंचित पुराणमाचक्षीत एवमेवाध्वर्युः सम्प्रेषति...(शतपथब्राह्मण १३-४-३१३)
४.एवं वारेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यद् ऋग्वेदोयजुर्वेदःसामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः इतिहासःपुराणं विद्या उपनिषदः । (वृ.दा.उ.२-४-११)

Sunday, 2 June 2019

सावित्री-सोमवती-संयोग-संकल्प


                                      सावित्री-सोमवती-संयोग-संकल्प
             यम के हाथों से अपने पति को छीनकर लाने का एकमात्र पौराणिक उदाहरण मिलता है मद्रनरेश अश्वपति की पुत्री सावित्री का । वाक्चातुर्य  की इस न भूतो न भविष्यति वाली घटना के स्मरण में ही ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को सौभाग्यकांक्षीणियों द्वारा पावन पर्व वटसावित्री प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है । तदन्तर्गत प्रधानतया वटवृक्ष की पूजा सहित सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं सत्यवान-सावित्री की विधिवत पूजा तथा वटवृक्ष की परिक्रमा और सूत्रसंवेष्ठन की  परम्परा है प्रायः उत्तरीभारत में ; जबकि दक्षिणीभारत में वटसावित्री का अनुष्ठान ज्येष्ठमास की पूर्णिमा तिथि को मनाने का चलन है । पूजनोपरान्त वृटवृक्ष तले उपस्थित सभी अनुष्ठानकर्तृ स्त्रियाँ परस्पर(एक दूसरे को) अक्षय सौभाग्य कामना से सिन्दूर भी लगाती हैं । वय और वर्ण का विचार यहां सर्वथा गौंड़ हो जाता है । एक मात्र सौभाग्य-कामना और मंगल-आशीष का वातावरण रहता है इस दिन ।

ध्यातव्य है कि वटवृक्ष संहार के देवता महेश(शंकर)का प्रतिरुप है पृथ्वी पर । सामान्य  प्रलय की अवस्था में सृष्टि में सबकुछ विलीन हो जाता है, जलमग्न हो जाता है । एक मात्र विशिष्ट वटवृक्ष ही शेष रह जाता है, जिसे अक्षयवट के नाम से जाना जाता है । इसी अक्षयवट के कोमल किसलय पर भगवान बालमुकुन्द ने दर्शन दिया था अजर-अमर मुनि मार्कण्डेयजी को ।  
किसी भी महीने की अमावस्या तिथि को संयोग से सोमवार पड़ जाये यदि, तो उसे सोमवती अमावस्या के नाम से जाना जाता है । इस अवसर पर भी सौभाग्यकामना से ही अनुष्ठान किया जाता है । अन्तर होता है सिर्फ पूज्य वृक्ष का । वट के स्थान पर पीपल की पूजा होती है । पीपल साक्षात विष्णु का स्वरुप है । इस प्रकार हम पाते हैं कि सृष्टि-पालन-संहार के त्रिदेवों की आराधना प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से की जा रही है विविध अनुष्ठानों में , साथ ही वय  वर्ण विभेद भी स्पष्ट दीखता है इन अनुष्ठानों में ।

सोमवती अमावस्या का पौराणिक प्रसंग तो और भी रोचक और ध्यातव्य है, जहां शूद्रवर्णा (धोबिन) की प्रधानता और महत्व की ओर ईंगित किया गया है । सिंहलद्वीप वासिनी रजकी(धोबिन) सोमवती को कांचीपुरी आना पड़ा था एक ब्राह्मणी कन्या का वैधव्यदोष निवारण करने हेतु । उसने अपने पुण्यफल के प्रताप से ब्राह्मणी कन्या का सिर्फ वैधव्यदोष ही नहीं दूर किया ,बल्कि उसी पुण्यफल से अपने परिवार (पति,पुत्र,पुत्रवधु,पुत्री और जामाता) को  मृत्युमुख से मुक्ति दिलायी । इस रहस्यमय विधान के प्रतीकस्वरुप ही आज भी कन्या के विवाहकाल में धोबिन से सुहाग-आशीष लेने की परम्परा है देश के कुछ भागों में ।

   पुराण के ये दोनों प्रसंग— वटसावित्रीव्रतकथा और सोमवतीअमावस्याव्रतकथा के नाम से हमारी लोकचर्चा में रसीबसी है । कथायें बहुत प्रसिद्ध और चर्चित रही हैं, इस कारण कथा के विस्तार में न जाकर कथ्य पर जनमानस को आकृष्ट करना चाहता हूँ । लोककल्याण (सामूहिक कल्याण) की भावना से उत्प्रेरित  हमारे समाज की अद्भुत वर्णव्यवस्था नमनीय है । सिर्फ मानव समाज ही नहीं, समग्र प्रकृति प्रेम और पर्यावरण सुरक्षा तक को ध्यान में रख कर विभिन्न व्रत-त्योहारों की योजना दी गयी है हमारे शास्त्रों में । भारतीय संस्कृति के विविध उत्सवों,अनुष्ठानों,क्रिया-कलापों पर गौर करने पर अभिभूत हो जाना पड़ता है,जहां जीवमात्र ही नहीं चर-अचर सृष्टिमात्र के परिरक्षण पर प्रकाश डाला गया है ।

            किन्तु खेद है कि व्यक्तिगत स्वार्थ, दूषित राजनीति तथा पश्चिमी प्रभाव से आकंठ प्रभावित हमसब इन महत्वपूर्ण रीति-नीति को विसारते जा रहे हैं । सूक्ष्म विधि-विधानों की बात जाने दें, सामान्य बातें भी नजरअन्दाज कर देते हैं, व्यर्थ करार दे देते हैं- कुछ भी सोचे-विचारे बिना ही । पेयजल-संकट, भीषण गर्मी, असमय आँधी-तूफान, अव्यवस्थित पर्यावरण को लेकर खूब शोर मचा रहे हैं, गोष्ठियां और सेमीनार आयोजित कर रहे हैं, किन्तु जमीनी स्तर पर जो होना चाहिए, जो करना चाहिए वो नहीं कर पा रहे हैं । या कहें ईमानदारीपूर्वक करना नहीं चाह रहे हैं ।

 वट और पीपल की पूजा तो करनी है, पर हमारी मातायें-बहनें-बेटियां जायेंगी कहां ? आसपास कहीं पीपल और वट का वृक्ष होगा तब न । विकास और शहरीकरण के दौर में सरिया और कंकरीट के जंगल भले ही लगा लिए हों हम , किन्तु सघन छांव और हरियाली देने वाले, वर्षा और ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों को बेदर्दी से नष्ट किये जा रहे हैं । मूर्खता की हद तो ये हो रही है कि लकड़ियों का विकल्प हम फैक्ट्रियों में ढूढ़ लिये हैं - लोहे और प्लास्टिक के खिड़की-दरवाजे अधिक भाने लगे हैं, जिन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनियां बना रही हैं । जंगल-पहाड़ नष्ट करके हम उनकी फैक्ट्रियां लगा रहे हैं । दुष्परिणाम दीखने लगे हैं, किन्तु हमारी इस मूर्खता का परिणाम हमारी अगली पीढ़ी को भयावह रुप से अवश्य भुगतना पड़ेगा । अतः चेत जाने की जरुरत है ।
 आइये !  सुविधानुसार अधिकाधिक वृक्षारोपण का संकल्प लें हम । अपने आत्मीयों के लिए एल.आई.सी. का सर्वश्रेष्ठ प्रीमियम यही होगा । साधुवाद ।