Wednesday, 29 October 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-68

गतांश से आगे...
अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार - भाग बारह

मुख्यद्वारशाखा(चौखट) स्थापनः-

ध्यातव्य है कि शुभमुहूर्त में शिलान्यास करके भवन-निर्माण-कार्य आरम्भ किया जाता है,और फिर नियमित रुप से जारी कार्यों के लिए कुछ भी मुहूर्त-विचार करने की आवश्यकता नहीं होती;किन्तु मुख्यद्वार का कार्य करने के लिए पुनः मुहूर्तविचार की आवश्यकता है।क्योंकि मुख्य द्वारशाखा(चौखट) स्थापन प्रसस्त तिथियों में ही करनी चाहिए,अन्यथा दुष्परिणाम होंगे।हालांकि आजकल इसके औचित्य और महत्त्व को बिलकुल ही नजरअन्दाज कर दिया जा रहा है।जबकि इसका पालन अत्यावश्यक है। 
   यूँ तो मुहुर्त सम्बन्धी सभी बातों की चर्चा अन्य अध्यायों में की जायेगी, किन्तु विशेष कारणवश द्वारशाखा-स्थापन-मुहूर्त की सभी बातों को यहीं स्पष्ट कर दिया जा रहा है।
अश्विनी चोत्तरा हस्तपष्यश्रुतिमृगेषु च।
रोहिण्यां स्वातिभेऽन्त्ये च द्वारशाखां प्ररोपयेत्।।(पीयूषधारा)(वास्तुरत्नावली८-६५)
अर्थात् अश्विनी,तीनों उत्तरा,हस्ता,पुष्य,श्रवण,मृगशिरा,रोहिणी,स्वाती,और रेवती- इन ग्यारह नक्षत्रों में ही द्वारशाखा(चौखट)बैठाना चाहिए।
इस सम्बन्ध में मुहूर्तमुक्तावली में कुछ विशेष रुप से कहा गया है,तथा वास्तुरत्नावली में भी उद्धृत है-
 भवेत्पूषणी मैत्रपुष्ये च शाक्रे,करे दस्रचित्राऽनिले चादितौ च।
 गुरुश्चन्द्रशुक्रार्कसौम्ये,च वारे,तिथौनन्दपूर्णाजयाद्वारशाखा।।  (वास्तुरत्नावली८-६६)
अर्थात् रेवती,अनुराधा,पुष्य,ज्येष्ठा,हस्ता,अश्विनी,स्वाती,पुनर्वसु- इन नौ नक्षत्रों में,वृहस्पति,चन्द्र,शुक्र,सूर्य,बुधवारोंमेंनन्दा(प्रतिपदा,षष्ठी,एकादशी)पूर्णा(पंचमी, दशमी,पूर्णिमा),और,जया(तृतीया,अष्टमी,त्रयोदशी)तिथियों में द्वारशाखा(चौखट)का स्थापन करना अति उत्तम कहा गया है।वहीं पुनः कहते हैं-
पंचमी धनदा नित्यं मुनिनन्दवसौ शुभम्।
                प्रतिपत्सु न कर्तव्यं कृते दुःखमवाप्नुयात्।।
द्वितीयायां द्रव्यहानिः पशुपुत्रविनाशनम्।
              तृतीया रोगदा ज्ञेया चतुर्थी भङ्गकारिणी।।
कुलक्षयस्तथा षष्ठ्यां दशमी धननाशिनी।
     विरोधकृदमा पूर्णा न स्याच्छाखावरोपणम्।।(वास्तुरत्नाकर८/६७-६९)
तिथियों का शुभाशुभफल उक्त श्लोक और निम्न सारणी में स्पष्ट किया गया है—
तिथियाँ
दुष्परिणाम
प्रतिपदा
दुःखप्राप्ति
द्वितीया
पुत्र,पशु,धननाश
तृतीया
रोग-व्याधि
चतुर्थी
विघ्न-विनाश
षष्ठी
कुलनाश
दशमी
धननाश
पूर्णिमा
अकारण बैर,शत्रुता
आमावश्या
अकारण बैर,शत्रुता
तिथियाँ
सुपरिणाम
पंचमी
धनदायक
सप्तमी
शुभदायक
अष्टमी
शुभदायक
नवमी
शुभदायक










अर्थात् मुख्य द्वार का चौखट पंचमी,सप्तमी, अष्टमी,और नवमी तिथियों में ही लगाना चाहिये,अन्य का परिणाम सुखद नहीं है।
क्रमशः...

Monday, 27 October 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-67

गतांश से आगे.... 
अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार -भाग ग्यारह

बहुद्वार विशेषः-   बहुद्वारेष्वलिन्देषु न द्वारनियमस्मृतः।
                तथोपसदने जीर्णे द्वारे सन्धारणेऽपि च।।(वास्तुरत्नाकर ८-५१)
अनेक कमरों वाले भवन में विशेष द्वार नियम लागू नहीं होता,अर्थात् वांछित स्थान पर द्वार बनाया जा सकता है,तथा मुख्यसदन के अतिरिक्त सदनों में भी ये सुविधा है।
   कथन का अभिप्राय यह है कि एक बड़े से परिसर में मुख्यभवन के अतिरिक्त कई सहभवन होते हैं।मुख्यभवन भी बहुमंजिल-बहुकक्षीय होता है।ऐसी स्थिति में द्वार-नियम काफी लचीला हो जाता है।सिर्फ मुख्यद्वार उचित स्थान पर बना कर शेष द्वार रुचि-अनुसार बनाये जा सकते हैं;किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं कि वास्तु-नियम की धज्जी उड़ा दी जाय।जहाँ तक सम्भव हो सके, यथोचित वास्तु नियमों का पालन अन्य दरवाजों की स्थापना के लिए भी करना चाहिए।विशेष लाचारी की स्थिति में ही नियम भंग किया जाय,तथा उसके परिणाम और दोष निवारण का भी उपाय अवश्य कर लिया जाय।  
मुख्यद्वार का नाम(दिशानुसार)-
दिशा
नाम
फल
पूर्व
विजयद्वार
अतिशुभ,सुख और विजयदायी
दक्षिण
यमद्वार
संघर्षपूर्ण,स्त्रियों के लिये विशेष कष्टकर
पश्चिम
मकरद्वार
दुर्जेय किन्तु आलस्यकारी
उत्तर
कुबेरद्वार
शुभद,सुखद,समृद्धिदायक

मुख्यद्वार के बाद भीतर का दूसरा द्वार-
 भवन में प्रवेश के बाद आंगन,बरामदा,कक्ष आदि में जाने का भी विचार जरूरी है।इसके लिए भी वास्तु सम्मत मार्गदर्शन हैं।अन्तःप्रवेश की मुख्य चार स्थिति
के आधार पर चार प्रकार कहे गये हैं।यथाः-
§  उत्संग द्वार -सर्वोत्तम है कि दूसरा अन्तःद्वार मुख्यद्वार के सम्मुख हो।इसे उत्संग द्वार कहते हैं।इससे धन-धान्य,सुख-समृद्धि आती है।
§  सव्य द्वार- अन्तःद्वार-प्रवेश मुख्यद्वार से दाहिने हो तो सव्यद्वार कहलाता है।यह भी उक्त फलदायी है।
§  अपसव्य द्वार - प्रवेश से बायीं ओर पड़ने वाला अपसव्य द्वार नानाक्लेश-रोगादि का निमंत्रक है।अतः इससे सदा परहेज करना चाहिए।
§  पृष्ठभंग द्वार- मुख्यद्वार में प्रवेश के बाद विपरीत दिशा में होकर अन्तः प्रवेश हो तो उसे पृष्ठभंग द्वार कहते हैं।वस्तुतः यह परिसर प्रवेश और मुख्यद्वार के आपसी सम्बन्ध को ईंगित करता है।यह स्थिति गृहस्वामी के लिए अति अमंगलकारी है।

    उक्त चार प्रकार के द्वारों का विचार समान रुप से परिसर प्रवेश के क्रम में भी करना चाहिए,यानी परिसर में प्रवेश के बाद मुख्यभवन में प्रवेश किस भांति हो रहा है। वास्तुराजवल्लभ,मत्स्य पुराण आदि ग्रन्थों में स्पष्ट निषेध किया गया है।जहाँतक हो सके भवन में सभी तरह के वामावर्त कार्यों से सर्वथा बचना ही चाहिए।चाहे वह पीलर खड़ा करने की बात हो या सीढ़ी बनाने की बात या कोई अन्य निर्माणकार्य।जैसा कि कहा गया है- सव्यावर्तःप्रशस्यते—अपसव्यो विनाशाय.....।

क्रमशः....

Saturday, 25 October 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-66

गतांश से आगे.... 
अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार -भाग दश


द्वारप्रमाणः-
षष्ट्यावाऽथ शतार्धसप्ततियुतैर्व्यासस्य हस्ताङ्गुलै-
र्द्वारस्योदयको भवेच्च भवने मध्यं कनिष्टोत्तमौ।
दैर्घ्यार्धेन च विस्तरः शशिकलाभागोधिकः शस्यते,
दैर्घ्यत्त्र्यंशविहीनमर्धरहितंमध्यं कनिष्ठं क्रमात्।(वास्तुराजवल्लभ,वास्तुरत्नाकर)

अर्थात् भवन के चौड़ाई के माप(गृहस्वामी के हाथ को अंगुल प्रमाण करके) उसमें पचास अंगुल जोड़ने से जो संख्या आवे वह कनिष्ट(तृतीय श्रेणी) द्वार की ऊँचाई होती है,साठ अंगुल जोड़ने से द्वितीय श्रेणी और सत्तर अंगुल जोड़ने से प्रथम श्रेणी के द्वार की ऊँचाई होती है। यथा- मान लिया कि गृहस्वामी के हाथ से बत्तीस हाथ चौड़ाई है घर की,तब बत्तीस हाथ को बत्तीस अंगुल मान लेंगे, और सत्तर अंगुल जोड देने से एकसौदो अंगुल प्रमाण हुआ उत्तम कोटि के द्वार की ऊँचाई का,बानबे अंगुल मध्य श्रेणी का और बयासी अंगुल निम्न श्रेणी का।तथा ऊँचाई का आधा + तदषोडषांश = उत्तम द्वार की चौड़ाई, ऊँचाई का आधा + तृतीयांश = मध्य श्रेणी का चौड़ाई,और ऊँचाई के आधे के तुल्य अधम श्रेणी द्वार की चौड़ाई कही गयी है।यानी उत्तम ऊँचाई १०२अंगुल का आधा = ५१ अंगुल में सोलवां हिस्सा यानी छः अंगुल से कुछ अधिक यानी ५१ + ६ = ५७ अंगुल उत्तम द्वार की चौड़ाई होनी चाहिए।इसी भांति अन्य श्रेणियों की गणना करें।
  किन्तु इस श्लोक के प्रमाण से मुख्यद्वार का आकार सन्तोष जनक प्रतीत नहीं हो रहा है। ऊपर के उदाहरण में बत्तीस हाथ भवन की चौड़ाई मानी गयी है, (औसत हाथ १४-१५ईँच का होता है,यानी २३-२४अंगुल) यानी करीब चालीस फीट चौड़ाई वाले भवन का मुख्य द्वार करीब पांच फीट होगा,जो उचित नहीं है।इससे भी कम चौड़ाई वाले भवन की क्या स्थिति होगी- सोचनीय है।
    मत्स्यपुराण में अपेक्षाकृत अधिक सुलभ सूत्र सुझाया गया है,जिसकी चर्चा वास्तुराजवल्लभ-५-२८,एवं वास्तुरत्नाकर८-४५ में भी है।
दशधाद्वाराणिः-  दैर्घ्ये सार्धंशताङ्गुलं च दशभिर्हीनं चतुर्धा विधिः
               प्रोक्तंश्चाऽथ शतं त्वशीतिसहितं युक्तं नवत्या शतम्।
          तद्वत्षोडशभिः शतं च नवभिर्युक्तं  तथाऽशीतिकं
          द्वारं मत्स्यमताऽनुसारि दशकं योग्यं विधेयं बुधैः।।
यहाँ ११०अंगुल से प्रारम्भ कर,दस-दस अंगुल बढ़ाते हुए १५०अंगुल तक का प्रमाण उत्तमोत्तम क्रम में दिया गया है।यहां किसी अन्य तरह का गणित भी नहीं करना है; किन्तु यह प्रमाण भी बहुत सन्तोष जनक नहीं प्रतीत होता। अधिकतम- एक सौ पचास अंगुल यानी साढ़े छः फीट करीब,और न्यूनतम एक सौ दश अंगुल यानी साढ़ेचार फीट करीब।आमतौर पर घर के भीतरी दरवाजों के लिए यह नाप सही हो सकता है,मुख्यद्वार के लिए कदापि नहीं।
 वहीं आगे सिंहद्वार के लिए सन्तोषजनक प्रमाण मिल रहे हैं-
ज्येष्ठा प्रतोली तिथिहस्तसंख्या प्रोक्तोदये विश्वकरा च मध्या।
कनिष्टिकारुद्रकराक्रमेणव्यासेष्टसप्तैव चरागसंख्या।।  (वास्तुराजवल्लभ५-१४)
यानी सदरफाटक पन्द्रह हाथ ऊँचा,आठ हाथ चौड़ा उत्तम;तेरह हाथ ऊँचा,सात हाथ चौड़ा मध्यम,तथा ग्यारह हाथ ऊँचा,छःहाथ चौड़ा अधम है।
अब आगे कहते हैं- प्रधानद्वारमपहाय सर्वाणि द्वाराणि तुल्यप्रमाणानिविधेयानि-
अर्थात् प्रधान द्वार को छोड़कर,शेष द्वार एक समान होने चाहिए।यानी
न्यूनाधिक नहीं।
तथाच-     मूलद्वारं नान्यैरभिसन्दधीत रुपर्द्ध्या।
          घटफलपत्रपमथादिभिश्च तन्मङ्गलैश्चिनुयात्।। (वास्तुरत्नाकर ८-४०)
अर्थात् मुख्यद्वार की अपेक्षा अन्य दरवाजों को  रुप-सज्जा-सुसज्जित नहीं करना चाहिए(यहाँ गूढ़ार्थ है कि मुख्यद्वार को विशेष सजावट- मांगलिक कलश,नारियल, शंख,पत्र-पुष्पादि उत्कीर्ण करके बनावे)और शेष दरवाजों को सामान्य ही रखें।                              
अब मुख्य द्वार के आकार और स्थिति का विचार करते हैं।क्यों कि इनका प्रभाव भी गृहवासियों पर गहरे रुप से पड़ता है।ध्यातव्य है कि द्वार निर्माण में हुयी त्रुटियों का प्रभाव,या फिर निर्माण के कुछ काल पश्चात् मौसम आदि के प्रभाव से प्रभावित मुख्यद्वार का क्या परिणाम हो सकता है गृहवासियों पर- यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है अगली सारिणी से। यथा-
मुख्यद्वार का आकार                     
परिणाम
त्रिकोणाकार
स्त्री -पीड़ा
शकटाकार
भय और पीड़ा
सूर्पाकार
धननाश
धनुषाकार
कलह
मृदंगाकार
धननाश                    
वृत्ताकार
कन्या सन्तति














क्रमशः..... 

Friday, 24 October 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-65

गतांश से आगे....
अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार -भाग नौ,


अब गेहारम्भ-तिथि के अनुसार मुख्यद्वार का चयनः-
पूर्णिमातोऽष्टमीयावत्पूर्वास्यंवर्जयेद्गृहम्।उत्तरस्यांनकुर्वीतनवम्यादिचतुर्दशीम्।।
अमातश्चाष्टमी यावत्पश्चिमास्यं विवर्जयेत्।
नवम्यादौ दक्षिणास्यं यावच्छुक्लचतुर्दशीम्।।(वास्तुरत्नाकर८-१५,१६)
अर्थात् गृहारम्भ यदि पूर्णिमा से लेकर कृष्णाष्टमी के बीच हुआ हो तो मुख्यद्वार पूर्व दिशा में न बनाया जाये।कृष्ण नवमी से चतुर्दशी के बीच हुआ हो तो उत्तर दिशा में मुख्यद्वार न बनावे।आमावश्या से शुक्लाष्टमी के बीच हुआ हो तो पश्चिम दिशा में मुख्यद्वार न बनावे;एवं शुक्ल नवमी से चतुर्दशी के बीच हुआ हो तो दक्षिण दिशा में मुख्यद्वार न बनावे।इसे निम्न चक्र में दर्शाया जा रहा हैः-
निषिद्धदिशा
गृहारम्भ की तिथि
पूरब
पूर्णिमा से कृष्णाष्टमी तक
उत्तर
कृष्ण नवमी से चतुर्दशी तक
पश्चिम
आमावश्या से शुक्लाष्टमी तक
दक्षिण
शुक्ल नवमी से चतुर्दशी तक

द्वारपाल-निर्णय- द्वारदिशा-विनिश्चय के पश्चात् अब द्वारपाल की चर्चा करते हैः-
दिशश्चस्वरमादाय ग्रामनामेति गण्यते।
अष्टभिस्तु हरेद्भागं शेषं च द्वारपालकाः।।
रविश्चन्द्रःकुजःसौम्यःशनिर्जीवस्तमोभृगुः।
शुभग्रहे शुभं नित्यं पापे दुःखं प्रजायते।।(वास्तुरत्नाकर ८-३१,३२)
अर्थात् जिस दिशा में द्वार हो उस दिशा का,गृहस्वामी का,एवं ग्राम का स्वर गणना करके सबका योग करे,पुनः उस योगफल में आठ का भाग देकर शेष से द्वारपाल निश्चय करे।यथा- १.सूर्य,२.चन्द्रमा,३.मंगल,४.बुध,५.शनि,६.वृहस्पति,७.राहु एवं ८.शुक्र द्वारपाल होते हैं।केतु का इसमें स्थान नहीं है।सूर्य,मंगल,शनि,राहु द्वारपाल हों तो सदा दुःख और चन्द्रमा,बुध,गुरु,शुक्र द्वारपाल हों तो सुख की प्राप्ति होती है।
इसी भांति एक और सूत्र है-
सम्मुखे स्वरमादाय ग्रामनामसमन्वितः।
अष्टभिस्तु हरेद्भागं शेषं द्वारं विनिर्दिशेत्।।
निर्धनःधनवान् चैव दाता चैव नुपंसकः।
लक्ष्मीपतिर्धनाढ्यश्च सर्वशून्यं दरिद्रता।।(उक्त ३३,३४)
पूर्व श्लोकानुसार ही यहां भी द्वारदिशा,गृहस्वामी,और ग्राम के स्वरों का योग करके आठ से भाग देना है।शेष से फल विचार करना है,जो इस प्रकार हैं- १.निर्धन,२.धनवान,३.दाता,४.नपुंसक,५.लक्ष्मीपति(यानी विशेष धनी),६.धनाढ्य, ७.सर्वशून्य और ८.दरिद्रता।इस प्रकार एक,चार,सात,आठ शेष अशुभ और दो, तीन,पांच,सात शुभ हैं।
द्वारपाल-आनयन हेतु कुछ और भी प्रयोग है।यथा-
दक्षिणे गृहवाणघ्नं पतिनामाक्षरैर्युतम्।
नवभिस्तु हरेद्भागं शेषं द्वाराधिपाः स्मृताः।।
रवौ सन्तान हानिः स्याच्चन्द्रे कन्या कुजे शिखी।
बुधे धनं शनौ रोगं गुरौ पुत्रं त्वगौ रिपुः।।
भृगौ सौख्यं मृतिः केतो द्वारस्य नवभेदकम्।।(वास्तुरत्नाकर८-३५से३७)
अर्थात् घर में प्रवेश करते समय दाहिने(निकलते समय वांये)भाग में पिण्डशेष के माप को पांच से गुणा करे,और गृहस्वामी के नामाक्षर को जोंड़ कर नौ से भाग दे।शेष से द्वारपाल का फल विचार करे।यथा- मिथिलेश का मकान उत्तर- दक्षिण सत्ताईस हाथ है,जिसमें पूर्वाभिमुख द्वार अग्निकोण से पन्द्रहवें हाथ से अठारहवें हाथ तक है,यानी ईशान से द्वारदेश तक नौ हाथ शेष है,जो प्रवेश के समय दाहिने और निकास के समय बांयें पड़ेगा।
पुनः, ९×५=४५ में मिथिलेश का नामाक्षर ४ को जोड़ने पर ४९ हुआ।
अब ४९÷९=५ भागफल और ४ शेष आया।तदनुसार नीचे की सारणी से फल विचार करेंगे।(ध्यातव्य है कि ज्योतिषीय कार्य में शून्य का अर्थ भाजक होता है)-
शेषांक
द्वारेश
सूर्य
चन्द्रमा
मंगल
बुध
शनि
गुरु
राहु
शुक्र
केतु
फल
सन्तान
हानि
कन्या-धिक्य
अग्निभय
धनाप्ति
रोग
पुत्रलाभ
शत्रु
अतिसुख
मृत्यु


क्रमशः....