Saturday, 21 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-104

गतांश से आगे...अध्याय अठारह भाग उनीस

10.सामुदायिक भवन(विवाह-भवन,पंचायत-भवन आदि)- आजकल व्यावसायिक वास्तु में कुछ नये अध्याय जुड़ गये हैं।गणतान्त्रिक देश में पंचायती राज्य व्यवस्था के तहत हर पंचायत में पंचायत भवन बनाये जा रहे हैं।सच पूछा जाय तो ये व्यावसायिक भवन नहीं हैं, और न आवासीय ही हैं।इनपर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार नहीं है।मुखिया-सरपंच का परिवार भी इसमें वास नहीं करता,और न सरकारी या व्यक्तिगत आय के स्रोत ही है ये।किन्तु इनका ढांचा सामुदायिक भवन जैसा ही होता है।जिसमें गोष्ठी-कक्ष,कार्यालय,वरामदा,शौचालय, नलकूप आदि मुख्य रुप से होते हैं।ये प्रायः एक ही तल(भूतल)पर होते हैं।इनके निर्माण में वास्तु के मुख्य नियमों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।ऐसा न कि सबकुछ वास्तु विपरीत ही कर दिया जाय।
      दूसरी ओर, इनसे बिलकुल भिन्न उद्देश्य से,बड़े सामुदायिक भवन बनाये जाते हैं,जिनका पूर्णतः व्यावसायिक उपयोग होता है- शादी-विवाह,अन्य समारोह आदि के लिए किराये पर लगा कर।सामान्य आवासीय वास्तु से काफी भिन्नता होती है।होटल-रिसोर्ट के ढांचे से भी मेल नहीं खाता।कार्यालय आदि से तो बिलकुल ही भिन्न प्रकृति का होता है। स्थिति और आवश्यकता के अनुसार सामुदायिक भवनों के आकार छोटे-बड़े हुआ करते हैं।इन सारी बातों का ध्यान रखते हुए तदहेतु कुछ वास्तु नियम सुझाये जाते हैं।यथा-
v     अपेक्षाकृत बड़े भूखण्ड का चयन करना चाहिए,जिसमें मुख्य भवन के अतिरिक्त परिसर अवश्य हो।
v     भूखण्ड तक पहुँचने का मार्ग सुलभ और प्रसस्त होना अनिवार्य है,ताकि समीप तक गाड़ियां(कार वगैरह)जा सकें।यानी संकरी गली में न हों।
v     अधिकाधिक गाड़ियों के पार्किंग की सुविधा भी अत्यावश्यक है,जो सामने,पीछे,या दांये-बायें सुविधानुसार बनायी जायें।यहाँ पार्किंग के लिए प्रसस्त वायुकोण वाले नियम का बन्धन अनिवार्य नहीं है।
v     बिलकुल भीड़-भाड़ वाली जगह पर ऐसे सामुदायिक भवन न बनाये जायें, और न बहुत दूर- शहर से हट कर ही,जहाँ पहुँचने में आमलोगों को कठिनाई हो।
v     सामुदायिक भवन का प्रवेश दक्षिण मुख कदापि न रखें।शेष कोई भी मुख्य दिशा(विदिशा नहीं) हो सकती है।
v     भवन के साथ प्रसस्त स्थान भी अनिवार्य रुप से होना चाहिए,जो कि सामने ही हो तो अधिक अच्छा है।
v     भवन की ऊँचाई(मंजिलें)बहुत अधिक न हो।सामान्य तौर पर दो से चार मंजिले उचित कही जा सकती हैं।
v     भवन की वाह्याभ्यन्तर साज-सज्जा आकर्षक और मनोहर हो।
v     होटलों के लिए बताये गये प्रायः नियम सामुदायिक भवनों के लिए भी समान रुप से ग्राह्य हैं।
v     ब्रह्मस्थान की मर्यादा को यथोक्त रुप से पालन करते हुए भवन में एक से अधिक बड़े कमरे(हॉल) रखे जायें,जिनका उपयोग एकाधिक परिवार(पक्ष)के लिए सुलभ हो सके।
v     बड़े कमरे(कमरों)के अतिरिक्त छोटे-छोटे(दो-तीन-चार वेड वाले)कमरों की भी पर्याप्त संख्या हो।
v     प्रत्येक मंजिल पर शौचालय स्नानागार की समुचित व्यवस्था हो।
v     सेप्टीटैंक भवन के पिछले हिस्से(द्रष्टव्य- सेप्टीटैंक-व्यवस्थाध्याय) में हो तो अधिक अच्छा है।
v     बोरिंग समुचित स्थान पर हो (उत्तर-ईशान-पूरब)(द्रष्टव्य जलस्रोतअध्याय), जिससे जुड़ी जल-वितरण-व्यवस्था भवन के पूरे भाग में(प्रत्येक कमरों में) सुचारु रुप में हो।
v     सामुदायिक भवन में भू-स्वामी का हरदम उपस्थित रहना अनिवार्य नहीं होता,फिर भी एक कक्ष नैऋत्य कोण में अवश्य होना चाहिए,जिसे समयानुसार कार्यालय के रुप में उपयोग किया जा सके।
v     हवा और रौशनी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
v     सामुदायिक भवनों में कूड़ेदान भी कई जगह पर होने चाहिए(द्रष्टव्य- शुभाशुभ ऊर्जा-प्रवाह अध्याय)।
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(इसके साथ ही आवासीय वास्तु की चर्चा समाप्त हुयी।आगामी पोस्ट में औद्योगिक वास्तु पर विचार करेंगे।)
क्रमश.....

Tuesday, 17 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-103

गतांश से आगे...अध्याय अठारह...भाग अठारह

9.विजली और इलेक्ट्रोनिक शॉपः-तात्विक रुप से विचार करने पर इन सामानों की स्थिति(प्रयोग और स्थापन)में भेद के अनुसार तत्वभेद लक्षित होता है। उदाहरण के लिए विजली से चलने वाला हीटर,गीजर,मोटर,टी.वी.कम्प्यूटर, प्रिन्टर,वासिंगमशीन,मोबाइलफोन आदि समस्त उपकरणों में विभिन्न धातुओं (सोना भी)के साथ-साथ प्लास्टिक का प्रचुर प्रयोग हुआ करता है।किसी भी प्रकार के मिश्रण पर शनि की हिस्सेदारी परोक्ष और अनिवार्य रुप से हो ही जाती है,चाहे वह कुछ भी,किसी की भी वस्तु क्यों न हो- यह गौर करने वाली बात है- जैसे चावल पर चन्द्रमा का अधिकार है,चने की दाल वृहस्पति का क्षेत्र है,मसूर पर मंगल का,उड़द पर शनि-राहु का आधिपत्य है;किन्तु चावल के साथ सिर्फ चने की दाल मिलाकर प्रयोग(एकत्र पकाने का काम)जैसे ही करते हैं,शनि अनिवार्य रुप से वहाँ प्रविष्ट हो जाते हैं।इसी भांति किसी भी मिश्रण में शनि का हिस्सा होगा ही।राहु तो मौजूद हैं ही इलेक्ट्रोनिक में।यहाँ गौर तलब है कि जैसे ही इन्हें विजली(वैटरी भी विजली का ही रुप है)से सम्बन्ध स्थापित होता है- वैसे ही मंगल और अग्नि का साम्राज्य शुरु हो जाता है।वे दोनों हावी हो जाते हैं- शनि और राहु पर।ध्यातव्य है कि इनके कोप(अवांछित ऊर्जा-प्रवाह)को संतुलित करने का काम मंगल(सेनापति)ही कर सकते हैं।इन सारी बातों का ध्यान रखते हुए बिजली और इलेक्ट्रोनिक के सम्बन्ध में यहाँ कुछ वास्तु नियमों पर ध्यान दिलाया जा रहा है।यथा-
*       सामान्य नियमों से विपरीत- यानी पूरब-उत्तर को छोड़ कर अन्य दिशाओं में मुख वाली दुकानें अधिक उन्नत होंगी।नैऋत्यकोणमुखी भी रखी जा सकती है- ये द्वितीय श्रेणी में होगी।
*       अपेक्षाकृत भारी सामानों को दक्षिण-पश्चिम में ही रखना चाहिए,जैसा कि अन्य जगहों के लिए वास्तु नियम है।
*       प्रदर्शनमंजूषा(Showcase)में शीशे का अधिकाधिक उपयोग फायदेमन्द होगा।
*       ईशान और वायुकोण में विशेष सामग्री न रखे जायें।न रखने का कारण- उक्त दिशाओं का हल्कापन नहीं,प्रत्युत तात्विक विपर्यय है।यानी उद्देश्य है-जल और वायु से अग्नि को अलग रखना।
*       अग्नि-दक्षिण-नैऋत्य-पश्चिम क्रम से वस्तुओं को दुकान में सजायें।
*       विजली के तार में तांबे की प्रधानता होती है,लोहा,अल्युमीनियम,जस्ता, शीशा(लेड)भी होता है।इनमें मंगल की प्रधानता के साथ राहु-शनि का समावेश है।तदनुसार अग्निकोण से बाद के स्थानों (पश्चिम पर्यन्त) का चयन करना चाहिए।
*       चीनी मिट्टी के हीटर-प्लेट आदि अपेक्षाकृत वजनी हैं,राहु की प्रधानता है।अतः नैऋत्य में ही रखे जायें।
*       गल्ला(कैश-बॉक्स)या अन्य बातों के लिए अन्यान्य दुकानों वाला नियम ही लागू होता है।(द्रष्टव्य-इसी अध्याय का दुकान,शोरुम)।

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क्रमशः.....

Saturday, 14 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-102

गतांश से आगे...अध्याय अठारह,भाग सत्रह

8.ब्यूटीपॉर्लर,ज्वेलरी शॉप- कुछ खास बातें-
*   शुक्र प्रधान व्यवसाय होते हुए भी अग्नि और दक्षिण मुखी न हों,भले ही इसमें राहु-मंगल का भी योगदान है।
*   ज्वेलरी की दुकान में विभिन्न प्रकार के रत्नों के साथ सोने-चांदी के आभूषण भी रखे जाते हैं,इस सम्बन्ध में पूर्व अध्यायों में वर्णित नियमों का पालन करना चाहिए(धातु-रत्न-ग्रह-सारणी द्रष्टव्य)।
*   रत्नाभूषण की दुकान पूर्व-उत्तर मुखी ही उत्तम है।परिसर के अग्नि कोण पर हो सकता है,किन्तु अग्निमुखी नहीं।
*   लॉकर समुचित स्थान पर ही रखा जाय(मध्योत्तर- कुबेर की दिशा में)।
*   माप-तौल के उपकरण अपने से सामने या दाहिने हो,न कि बायें।
*   दुकान की आन्तरिक सज्जा में राशिरंगयोजनाध्याय में कथित नियमों का सम्यक् पालन होना चाहिए।
*   व्यूटीपार्लर- पुरूष एवं स्त्रियों के लिए आजकल काफी चलन में हैं,जहाँ साजश्रृंगार के साथ-साथ बालों की कटाई-छंटाई भी आवश्यक रुप से होती है- राहु-शनि का योग हो जाता है।विभिन्न रसायनों का उपयोग भी काफी मात्रा में किया जाता है।यथासम्भव वास्तु नियमों का पालन अपेक्षित है।
*   ग्राहकों के बैठने की सीटें चारों ओर से हों तो कोई बात नहीं,किन्तु किसी एक या अधिक दिशाओं में हो तो दक्षिण मुख से बचें।
*   गर्म पानी के उपकरण(हीटर,गीजर,इमर्सन आदि)अग्निकोण में हो तो अच्छा है।
*   पानी का नलका उत्तर-ईशान-पूरब पर्यन्त कहीं भी सुविधानुसार रखाजाय।
*   प्रसाधन(मेकअप) के सामान सीधे शुक्र की वस्तुयें हैं,जिनमें मंगल का भी प्रचुर योगदान है।इन्हें अग्नि कोण से लेकर दक्षिण पर्यन्त कहीं भी रखा जाय।
*   कटे-छंटे बालों के लिए दक्षिण और नैऋत्य के बीच,तथा नैऋत्य और पश्चिम के बीच के भाग में कूड़ादान रखा जाय,और नित्य उसकी सफाई अनिवार्य रुप से की जाय,अन्यथा दुकान पर राहु-केतु-शनि का प्रकोप होगा।
*   दुकान में हल्दी-फिटकिरी-नमक के मिश्रण(या अकेले-अकेले)को पानी में घोल कर नित्य पोंछा लगाया जाय।
*   दुकान के प्रवेश-द्वार पर अभिमंत्रित वास्तु वंशी लगान बहुत ही लाभदायक होता है।(द्रष्टव्य वास्तुदोषनिवारण प्रयोगाध्याय)।
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क्रमशः... 

Saturday, 7 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-101

गतांश से आगे...अध्याय अठारह भाग  सोलह

7.सिनेमाघर,स्टूडियो,थियेटर,नृत्यशाला,मदिरालय आदि- इन सभी प्रकार के व्यावसायिक भवनों की प्रकृति(ग्रहदृष्टि से) काफी हद तक समान है-शुक्र सर्वत्र हैं;राहु,चन्द्रमा,बुध आदि का मिला-जुला योगदान है।किन्तु आन्तरिक संरचना में काफी अन्तर है।इन सबके लिए बड़े आकार के भूखण्ड की आवश्यकता होती है। मदिरालय को छोड़कर शेष के लिए,मुख्य भवन के साथ-साथ परिसर भी अनिवार्य होता है।मदिरा-शराब सम्बन्धी कुछ आवश्यक निर्देश होटलों की चर्चा में भी आ चुका है।स्वतन्त्र रुप से मदिरालय बनाने के लिए उन्हीं आधारभूत नियमों में थोड़ा और विचार मात्र आवश्यक है(इसे वहीं देखें)।आम तौर पर शराब की दुकानें दोतरह की होती हैं-एक,जो सिर्फ दुकान होती हैं,जहाँ बैठकर पीने की व्यवस्था नहीं होती;और दूसरा वह,जहाँ बैठने और पीने की व्यवस्था होती है।यहाँ इनसे सम्बन्धित कतिपय विशेष वास्तु-नियमों की चर्चा की जा रही है-
·       शराब की दुकान पूरब या उत्तरमुखी नहीं होना चाहिए।नैऋत्य,दक्षिण, आग्नेय आदि दिशायें अनुकूल हैं।
·       आम दुकानों की तरह यहाँ लक्ष्मी-गणेश की स्थापित मूर्ति न रखी जाय।
·       समय-समय पर नवग्रह-होम मात्र ही पर्याप्त है।
·       स्कूल,अस्पताल,मन्दिर आदि धार्मिक स्थलों से काफी दूर हट कर बनायें
उचित है।
·       परिसर रखने की सुविधा हो तो पीछे की ओर रखा जाय।दक्षिण-पश्चिम का खुलापन मदिरालय आदि के लिए निषिद्ध नहीं है,क्यों कि यह तो मुख्यतः तमोगुणी स्थान है।
·       नृत्यशाला,थियेटर,बड़े स्तर के स्टूडियो आदि(शुक्र के साथ-साथ जहाँ चन्द्रमा और बुध की प्रधानता है)दक्षिण मुखी न बनाये जायें।उत्तर,वायु कोण आदि अनुकूल दिशा है।
·       मुख्य प्रवेश दक्षिण को छोड़कर,किसी भी दिशा में हो सकता है।
·       आगे-पीछे पर्याप्त परिसर की सुविधा होनी चाहिए।परिसर पूरब-उत्तर की तुलना में पश्चिम-दक्षिण में कम रखना चाहिए,जैसा कि सामान्य वास्तु नियम है।
·       इन सब स्थानों में एक बड़ा सा हॉल अनिवार्य रुप से होता ही है,अतः आकाश तत्व का संतुलन स्वतः हो जाता है।शेष तत्वों के यथासम्भव संतुलन का ध्यान रखना चाहिए।बोरिंग ईशान से पूरब पर्यन्त कहीं भी हो सकता है।
·       टिकट-काउण्टर,रिसेप्सन,पार्किंग आदि सुविधानुसार पूर्ब-उत्तर-पश्चिम दिशा में बनाये जायें।
·       ऐसे भवनों में कई दरवाजे होने चाहिए- प्रायः चारो दिशाओं में हों तो अधिक अच्छा है।
आन्तरिक साज-सज्जा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।इनकी प्रकृति के अनुकूल रंगों(दूधिया-सफेद चमकीला,हरा,हल्का पीला आदि)का चयन उत्तम है।गहरे लाल,काले रंगों का कम से कम प्रयोग किया जाय। लालकाले का मिश्रण कत्थई(मेरुन) रंग भी ग्राह्य है।   ---++---

क्रमशः....

Thursday, 5 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-100

गतांश से आगे...अध्याय अठारह -भाग पन्द्रह

6.क्लब,जिम,कसीनो आदिः-क्लब,जिम,कसीनो(जूआखाना) आदि मुख्य रुप से शुक्र,राहु,शनि,और आंशिक रुप से मंगल,एवं अत्यल्प रुप से चन्द्रमा के अधिकार क्षेत्र के व्यवसाय हैं।क्लब के कई स्तर हैं।यथा-बड़े अफसरों,व्यापारियों, विद्यार्थियों,महिलाओं आदि के लिए प्रायः अलग-अलग क्लब हुआ करते हैं।स्तर के मुताबिक ही उनका आन्तरिक कार्य-कलाप होता है।सामान्य मिलने-जुलने, इनडोर गेम्स खेलने से लेकर निम्न स्तरीय क्रियायें भी प्रायः क्लबों में होती हैं। पीने-पिलाने का दौर भी चलता है।
   क्लबों का संचालन प्रायः अनार्थिक(अव्यवसायिक) दृष्टि से  होता है,जहाँ सदस्यता लेकर लोग जुड़ते हैं,और व्यवस्था का व्यय-वहन मिलजुल कर करते हैं।इससे बिलकुल भिन्न प्रकृति और उद्देश्य वाला होता है- जिम,जहाँ आधुनिक स्वास्थ्य-रक्षण के गुर सीखने-सिखाने की व्यवस्था होती है।प्राचीन अखाड़ों का आधुनिक और किंचित विकृत रुप इसे कहा जा सकता है।यह औषधालय नहीं है,योगालय भी नहीं है।यह है-व्यायामशाला।बॉडी-बिल्डिंग के लिए प्राचीन से लेकर आधुनिक व्यायाम के साधन यहाँ उपलब्ध होते हैं।यह भी प्रायः दो तरह का होता है-एक मासिक शुल्क वाला,और दूसरा- क्लबनुमा सदस्यता शुल्क और व्यवस्था-व्यय वहन कर।
  जुआखाना विशुद्ध रुप से व्यावसायिक है।वैसे जुआरियों के भी क्लब हुआ करते हैं।
सामान्य तौर पर देखा जाय तो इन सब बातों में वास्तु-विचार कौन करता है ! किन्तु वास्तुशास्त्री तो प्रत्येक वास्तु का विचार करेगा ही।यहाँ इनसे सम्बन्धित कुछ नियमों की चर्चा की जारही है-
§  सामान्य तया क्लब का प्रवेश-द्वार दक्षिण को छोड़ कर किसी भी दिशा में रखा जा सकता है।
§  प्रबन्धक को नैऋत्य कोण में सुविधानुसार बैठना चाहिए।उसका मुख-दिशा ईशान की ओर हो तो अच्छा है,यानी कोने में तिरछे या गोलाकार काउण्टर पर बैठा जा सकता है।
§  पेयजल(नलका,वेसिन,फिल्टर आदि)ईशान में रखे जायें।किन्तु फ्रिज रखना हो तो अग्नि या फिर विलकुल विपरीत- वायुकोण में रखे।
§  आधुनिक उपकरण- कम्प्यूटर,फोन,फैक्स आदि नैऋत्य के काउम्टर पर भी रखे जा सकते हैं।
§  विलियर्ड,टेबल-टेनिस आदि के वोर्ड को विलकुल मध्य से बचाकर,वहीं आसपास किसी ओर रखा जा सकता है।
§  अन्य मेजों को सुविधानुसार चारों ओर सजा सकते हैं।चारों ओर किनारे से कुर्सियाँ सजायी जा सकती हैं,जिन्हें आवश्यकतानुसार सभागार (meeting hall)के रुप में व्यवहृत किया जा सके।
§  पीकदान,कूड़ादान समुचित स्थान पर रखे जायें(द्रष्टव्य- शुभाशुभ ऊर्जा-प्रवाह-क्षेत्र)।
§  टी.वी.पश्चिम,दक्षिण के दीवारों पर लगाया जा सकता है।
§  व्यायामशाला में भारी सामानों को दक्षिण-नैऋत्य-पश्चिम पर्यन्त रखे जायें।
§  व्यायाम करते समय मुंह पूर्व-उत्तर हो तो अच्छा है।पश्चिम द्वितीय श्रेणी में आता है,और दक्षिणमुख से तो सदा बचना चाहिए।
§  पंखे के ठीक नीचे व्यायाम कदापि न करें।
§  सायकलिंग,जॉगर आदि विभिन्न उपकरण वायुकोण से उत्तर पर्यन्त रखना अनुकूल है।
§  जिम-इनट्रक्टर का नियत स्थान पश्चिम दिशा(पूर्वाभिमुख)होना चाहिए। वहीं से उठकर आवश्यकतानुसार प्रशिक्षुओं के पास जाया करें।
§  जुआखाने पर सीधे शुक्र का और आंशिक, राहु का आधिपत्य है,अतः इसे आग्नेय,दक्षिण या नैऋत्यमुखी भी रखने में कोई हर्ज नहीं है।
§  जुआखाने का कोई भी महत्वपूर्ण काम उत्तर-पूर्व में न हो तो अति उत्तम, अन्यथा भारी संकट(तोड़फोड़,लड़ाई-झगड़े),कानूनी शिकंजा झेलना पड़ सकता है।
§  जुआखाने के टोकन प्रबन्धक के मेज पर रखा जाय,जिसका काउण्टर नैऋत्य क्षेत्र में हो।
§  अग्निकोण में लकड़ी के टुकड़े पर दुधिया कपड़ा विछा कर, चांदी का एक सिक्का रखे और नित्य उसकी यथारीति पूजा करे तो काफी लाभदायक रहेगा।
§  नैऋत्य कोण में लाल कपड़ें में बांधकर, गोमूत्र-सिक्त जौ की बड़ी पोटली रख दे या लटका दें।यह टोटका भी बहुत लाभदायक है।
§  सभी प्रकार के सट्टेवाजी शुक्र और राहु के ही विषय हैं।
                        --+-
क्रमशः...

Sunday, 1 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-99

गतांश से आगे....अध्याय अठारह...भाग चौदह 

 5.होटल,रिसोर्ट,कटलरी शॉप आदिः- व्यावसायिक वास्तु में होटल,रिसोर्ट आदि अति महत्वपूर्ण हैं।पहले की तुलना में,आधुनिक युग में इसकी उपयोगिता काफी बढ़ गयी है।बहुत से वैसे काम जो पहले घरों में किये जाते थे,उसके लिए भी आजकल लोग होटलों की ही तलास करते हैं।ऐसी स्थिति में इसका वास्तुगत महत्व और भी बढ़ जाता है।
    इसके निर्माण में अपेक्षाकृत काफी धन-व्यय होता है,साथ ही सामाजिक परिवेश,शासकीय और कानूनी दावपेच का भी बहुत ध्यान रखना पड़ता है।
    होटल किसी का स्थायी आवास नहीं होता,फिर भी सुखसुविधा के साधन घर से भी अधिक होते हैं,और व्यावसायिक दृष्टि से होना भी चाहिए,ताकि इसे बनाने का उद्देश्य सफल हो सके।घर में जो सुख-सुविधा-साधन उपलब्ध नहीं हैं,उन सुविधाओं की भी लोग अपेक्षा करते हैं यहाँ आकर।अल्पकालिक प्रवास, विश्राम,मनोरंजन,ऐश-मौज-मस्ती,शादी-विवाहादि विभिन्न कृत्य,व्यावसायिक-गैर व्यावसायिक वैठकें, आदि विभिन्न उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग किया जाता है।इस कारण अपने आप में इसकी स्थापना और सम्यक् संचालन किंचित कठिन दायित्व का काम है।अतः,जहाँ तक सम्भव हो, इसे वास्तु के नियमों का ध्यान रखते हुए ही बनाना चाहिए।यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण बातों पर एक नजर डालते हैं-
Ø अच्छे होटल निर्माण के लिए विस्तृत भूखण्ड की आवश्यकता होती है। बहुत छोटी जगह में अच्छा होटल नहीं बनाया जा सकता।
Ø होटल बनाने के लिए इलाके(क्षेत्र) का चुनाव सबसे अहम् बात है।रेलवे स्टेशन,एयरपोर्ट,पर्यटन-स्थल,औद्योगिक क्षेत्र,शहर के मुख्य भाग जैसे क्षेत्रों में इसका अधिक उपयोग होता है- इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
Ø प्राकृतिक सुरम्य वातावरण- नदी,पहाड़,झरने आदि आसपास में हों तो अधिक अच्छा है।
Ø नदी आदि जलस्रोत उत्तर-पूर्व दिशा में,तथा पहाड़ दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही होने चाहिए।विपरीत स्थिति में होटल-व्यवसाय पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
Ø होटल प्रायः एक ही विशालकाय/बहुमंजिले भवन में हुआ करता है,जिसके कई अन्तः विभाग होते हैं।
Ø पंचसितारा होटलों में तरणताल(Swimmingpool) बनाना हो तो इसे मुख्य भवन से कुछ(कम से कम सात फीट) हटकर,उत्तर,पूर्व,पूर्वोत्तर(ईशान)क्षेत्र  में ही बनाना चाहिए।
Ø मुख्य जलस्रोत(बोरिंग) भी उक्त दिशा में ही कराना चाहिए,किन्तु उसके लिए भवन से दूरी सीमा नहीं है।वास्तुमंडल के अन्दर ही ईशान क्षेत्र में रहे तो अच्छा है।
Ø होटलों में वाहनों का आना-जाना निरंतर होता रहता है।कुछ निजी(होटल  के)वाहन भी होंगे।इन सबके लिए पार्किंग की उचित जगह चाहिए।मुख्य रुप से वाहन पड़ाव वायुकोण में होना चाहिए,किन्तु भूखण्ड के प्रवेश और परिसरीय स्थिति पर भी निर्भर करता है कि उसे कहाँ खड़ा किया जाय। (द्रष्टव्य- वाहन अध्याय)।
Ø  भोजनालय(रसोई)के लिए पूर्व से लेकर अग्नि तक का क्षेत्र सुविधानुसार चुना जा सकता है(द्रष्टव्य- भवन में रसोई-अध्याय)।
Ø होटल के कर्मचारियों के आवास आग्नेय क्षेत्र में(सुविधानुसार किसी भी मंजिल पर)होना चाहिए,ताकि उन्हें अपना दायित्ववोध हमेशा रहे।
Ø ज्वलनशील और रासायनिक वस्तुयें भी अग्नि-क्षेत्र के ही विषय हैं,किन्तु मंगल का भी साहचर्य है।अतः तदनुकूल क्षेत्र का चयन होना चाहिए।
Ø होटल की रसोई में घरेलू उपयोग की तुलना में काफी बड़े चूल्हे-भट्ठे, पीसने-कूंटने के संयंत्र(Mixture-Grinder)आदि रखने होते हैं।इन्हें मुख्य रसोई के बगल में सुविधानुसार पूर्वी या दक्षिणी कमरों में रखना चाहिए।
Ø सम्भव हो तो रसोई का विभाग ही मुख्य भवन से थोड़ा हटकर बनाया जाय,ताकि वहाँ वास्तुनियमों का अधिकाधिक पालन किया जा सके।
Ø कुछ विद्वानों का मत है कि होटल का रसोई-घर वायव्य कोण में भी बनाया जा सकता है।(द्रष्टव्य- भारतीय वास्तुशास्त्र-रा.सं.सं.पृ.३५)
Ø चाय-कॉफी आदि के लिए सुलभ व्यवस्था(स्प्रेशो मशीन)प्रत्येक मंजिलों पर सुविधानुसार रखी जा सकती  है- इस बात का ध्यान रखते हुए कि यह अग्नि,मंगल और शुक्र प्रधान तत्व है।मध्यपूर्व से लेकर,मध्यदक्षिण से कुछ पहले तक इसे कहीं भी स्थान दिया जा सकता है।
Ø शीतलपेय(कोल्डड्रिंक्स) के लिए फ्रिजर- चन्द्रमा,शुक्र,मंगल और वरुण के बल विचार से अनुकूल स्थान पर रखे जायें।
Ø स्वागत-कक्ष पूर्वोत्तर दिशा में होना अच्छा है।
Ø होटल के मालिक के लिए नैऋत्य क्षेत्र में(भूतल पर ही)कक्ष होना चाहिए। नीचे यदि न रखना चाहें,तो प्रथम तल पर(उक्त कोण पर ही)अवश्य रखें। अन्य मंजिलों पर,अन्य स्थानों में स्वामी-कक्ष रखना उचित नहीं है। वायुकोण पर भूल कर भी होटल मालिक अपना केबिन न बनायें।
Ø सभागार(meeting holl) के लिए भूतल ही सर्वाधिक अनुकूल है।क्यों कि इसी बहाने आकाश तत्व की प्रसस्तता उपलब्ध होगी।वैकल्पिक रुप में
किसी मंजिल के वैसे ही क्षेत्र का चुनाव किया जाना चाहिए।
Ø मनोरंजन- नृत्यगायन,सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए गन्धर्व-दिशा- उत्तर सर्वाधिक प्रसस्त है।वैकल्पिक रुप से पूर्व दिशा भी ग्राह्य है।
Ø आधुनिक संस्कृति का आवश्यक अंग बन गया है- मदिरापान।इसके वगैर उनका हर कार्य अधूरा सा रह जाता है।रासायनिक होते हुए भी मदिरा मुख्य रुप से शुक्र का क्षेत्र है।वास्तुमंडल में शुक्र अग्निकोण पर हैं,जहाँ सर्वहारी देव- अग्नि भी हैं।इसके लिए अग्निकोण का आंशिक भाग छोड़कर,दक्षिण होते हुए नैऋत्य और पश्चिम का कुछ भाग चयनित किया जा सकता है।क्योंकि इन क्षेत्रों पर तमोगुण प्रधान ग्रहों का आधिपत्य है।कुछ विद्वान उत्तर दिशा को भी अनुकूल मानते हैं,जहाँ वायें में चन्द्रमा,वायु और मध्य में राजकुमार- बुध हैं।बुध के बाद वृहस्पति का क्षेत्र आता है- ईशान वाला,जिसकी मर्यादा हर सम्भव रक्षित होनी चाहिए।पूर्व दिशा में भी मदिरापान स्थल कदापि न बनाये जायें।
Ø मदिरालय का प्रबन्धक पश्चिम वा दक्षिणमुख बैठे तो अच्छी बात है।
Ø यहाँ भरी हुयी बोतलें नैऋत्य में रखी जायें,और खाली बोतलों को दक्षिण में रखें।
Ø कांच के गिलास,मग आदि दक्षिण से नैऋत्य पर्यन्त रखे जा सकते हैं।

Ø होटल के परिसर में सुन्दर लघुउद्यान,फव्बारा,इन्डोर प्लान्ट्स आदि को भी यथास्थान सुसज्जित करना पड़ता है।इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।ये सब उत्तर-ईशान-पूर्वार्द्ध पर्यन्त हों तो अच्छे हैं।इन्डोर प्लान्ट्स सुविधानुसार कहीं भी रखे जासकते हैं।होटल-भवन के आन्तरिक भागों में कैक्ट्स के गमलों को न रखें।

क्रमशः...