Sunday, 1 February 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-99

गतांश से आगे....अध्याय अठारह...भाग चौदह 

 5.होटल,रिसोर्ट,कटलरी शॉप आदिः- व्यावसायिक वास्तु में होटल,रिसोर्ट आदि अति महत्वपूर्ण हैं।पहले की तुलना में,आधुनिक युग में इसकी उपयोगिता काफी बढ़ गयी है।बहुत से वैसे काम जो पहले घरों में किये जाते थे,उसके लिए भी आजकल लोग होटलों की ही तलास करते हैं।ऐसी स्थिति में इसका वास्तुगत महत्व और भी बढ़ जाता है।
    इसके निर्माण में अपेक्षाकृत काफी धन-व्यय होता है,साथ ही सामाजिक परिवेश,शासकीय और कानूनी दावपेच का भी बहुत ध्यान रखना पड़ता है।
    होटल किसी का स्थायी आवास नहीं होता,फिर भी सुखसुविधा के साधन घर से भी अधिक होते हैं,और व्यावसायिक दृष्टि से होना भी चाहिए,ताकि इसे बनाने का उद्देश्य सफल हो सके।घर में जो सुख-सुविधा-साधन उपलब्ध नहीं हैं,उन सुविधाओं की भी लोग अपेक्षा करते हैं यहाँ आकर।अल्पकालिक प्रवास, विश्राम,मनोरंजन,ऐश-मौज-मस्ती,शादी-विवाहादि विभिन्न कृत्य,व्यावसायिक-गैर व्यावसायिक वैठकें, आदि विभिन्न उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग किया जाता है।इस कारण अपने आप में इसकी स्थापना और सम्यक् संचालन किंचित कठिन दायित्व का काम है।अतः,जहाँ तक सम्भव हो, इसे वास्तु के नियमों का ध्यान रखते हुए ही बनाना चाहिए।यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण बातों पर एक नजर डालते हैं-
Ø अच्छे होटल निर्माण के लिए विस्तृत भूखण्ड की आवश्यकता होती है। बहुत छोटी जगह में अच्छा होटल नहीं बनाया जा सकता।
Ø होटल बनाने के लिए इलाके(क्षेत्र) का चुनाव सबसे अहम् बात है।रेलवे स्टेशन,एयरपोर्ट,पर्यटन-स्थल,औद्योगिक क्षेत्र,शहर के मुख्य भाग जैसे क्षेत्रों में इसका अधिक उपयोग होता है- इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
Ø प्राकृतिक सुरम्य वातावरण- नदी,पहाड़,झरने आदि आसपास में हों तो अधिक अच्छा है।
Ø नदी आदि जलस्रोत उत्तर-पूर्व दिशा में,तथा पहाड़ दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही होने चाहिए।विपरीत स्थिति में होटल-व्यवसाय पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
Ø होटल प्रायः एक ही विशालकाय/बहुमंजिले भवन में हुआ करता है,जिसके कई अन्तः विभाग होते हैं।
Ø पंचसितारा होटलों में तरणताल(Swimmingpool) बनाना हो तो इसे मुख्य भवन से कुछ(कम से कम सात फीट) हटकर,उत्तर,पूर्व,पूर्वोत्तर(ईशान)क्षेत्र  में ही बनाना चाहिए।
Ø मुख्य जलस्रोत(बोरिंग) भी उक्त दिशा में ही कराना चाहिए,किन्तु उसके लिए भवन से दूरी सीमा नहीं है।वास्तुमंडल के अन्दर ही ईशान क्षेत्र में रहे तो अच्छा है।
Ø होटलों में वाहनों का आना-जाना निरंतर होता रहता है।कुछ निजी(होटल  के)वाहन भी होंगे।इन सबके लिए पार्किंग की उचित जगह चाहिए।मुख्य रुप से वाहन पड़ाव वायुकोण में होना चाहिए,किन्तु भूखण्ड के प्रवेश और परिसरीय स्थिति पर भी निर्भर करता है कि उसे कहाँ खड़ा किया जाय। (द्रष्टव्य- वाहन अध्याय)।
Ø  भोजनालय(रसोई)के लिए पूर्व से लेकर अग्नि तक का क्षेत्र सुविधानुसार चुना जा सकता है(द्रष्टव्य- भवन में रसोई-अध्याय)।
Ø होटल के कर्मचारियों के आवास आग्नेय क्षेत्र में(सुविधानुसार किसी भी मंजिल पर)होना चाहिए,ताकि उन्हें अपना दायित्ववोध हमेशा रहे।
Ø ज्वलनशील और रासायनिक वस्तुयें भी अग्नि-क्षेत्र के ही विषय हैं,किन्तु मंगल का भी साहचर्य है।अतः तदनुकूल क्षेत्र का चयन होना चाहिए।
Ø होटल की रसोई में घरेलू उपयोग की तुलना में काफी बड़े चूल्हे-भट्ठे, पीसने-कूंटने के संयंत्र(Mixture-Grinder)आदि रखने होते हैं।इन्हें मुख्य रसोई के बगल में सुविधानुसार पूर्वी या दक्षिणी कमरों में रखना चाहिए।
Ø सम्भव हो तो रसोई का विभाग ही मुख्य भवन से थोड़ा हटकर बनाया जाय,ताकि वहाँ वास्तुनियमों का अधिकाधिक पालन किया जा सके।
Ø कुछ विद्वानों का मत है कि होटल का रसोई-घर वायव्य कोण में भी बनाया जा सकता है।(द्रष्टव्य- भारतीय वास्तुशास्त्र-रा.सं.सं.पृ.३५)
Ø चाय-कॉफी आदि के लिए सुलभ व्यवस्था(स्प्रेशो मशीन)प्रत्येक मंजिलों पर सुविधानुसार रखी जा सकती  है- इस बात का ध्यान रखते हुए कि यह अग्नि,मंगल और शुक्र प्रधान तत्व है।मध्यपूर्व से लेकर,मध्यदक्षिण से कुछ पहले तक इसे कहीं भी स्थान दिया जा सकता है।
Ø शीतलपेय(कोल्डड्रिंक्स) के लिए फ्रिजर- चन्द्रमा,शुक्र,मंगल और वरुण के बल विचार से अनुकूल स्थान पर रखे जायें।
Ø स्वागत-कक्ष पूर्वोत्तर दिशा में होना अच्छा है।
Ø होटल के मालिक के लिए नैऋत्य क्षेत्र में(भूतल पर ही)कक्ष होना चाहिए। नीचे यदि न रखना चाहें,तो प्रथम तल पर(उक्त कोण पर ही)अवश्य रखें। अन्य मंजिलों पर,अन्य स्थानों में स्वामी-कक्ष रखना उचित नहीं है। वायुकोण पर भूल कर भी होटल मालिक अपना केबिन न बनायें।
Ø सभागार(meeting holl) के लिए भूतल ही सर्वाधिक अनुकूल है।क्यों कि इसी बहाने आकाश तत्व की प्रसस्तता उपलब्ध होगी।वैकल्पिक रुप में
किसी मंजिल के वैसे ही क्षेत्र का चुनाव किया जाना चाहिए।
Ø मनोरंजन- नृत्यगायन,सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए गन्धर्व-दिशा- उत्तर सर्वाधिक प्रसस्त है।वैकल्पिक रुप से पूर्व दिशा भी ग्राह्य है।
Ø आधुनिक संस्कृति का आवश्यक अंग बन गया है- मदिरापान।इसके वगैर उनका हर कार्य अधूरा सा रह जाता है।रासायनिक होते हुए भी मदिरा मुख्य रुप से शुक्र का क्षेत्र है।वास्तुमंडल में शुक्र अग्निकोण पर हैं,जहाँ सर्वहारी देव- अग्नि भी हैं।इसके लिए अग्निकोण का आंशिक भाग छोड़कर,दक्षिण होते हुए नैऋत्य और पश्चिम का कुछ भाग चयनित किया जा सकता है।क्योंकि इन क्षेत्रों पर तमोगुण प्रधान ग्रहों का आधिपत्य है।कुछ विद्वान उत्तर दिशा को भी अनुकूल मानते हैं,जहाँ वायें में चन्द्रमा,वायु और मध्य में राजकुमार- बुध हैं।बुध के बाद वृहस्पति का क्षेत्र आता है- ईशान वाला,जिसकी मर्यादा हर सम्भव रक्षित होनी चाहिए।पूर्व दिशा में भी मदिरापान स्थल कदापि न बनाये जायें।
Ø मदिरालय का प्रबन्धक पश्चिम वा दक्षिणमुख बैठे तो अच्छी बात है।
Ø यहाँ भरी हुयी बोतलें नैऋत्य में रखी जायें,और खाली बोतलों को दक्षिण में रखें।
Ø कांच के गिलास,मग आदि दक्षिण से नैऋत्य पर्यन्त रखे जा सकते हैं।

Ø होटल के परिसर में सुन्दर लघुउद्यान,फव्बारा,इन्डोर प्लान्ट्स आदि को भी यथास्थान सुसज्जित करना पड़ता है।इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।ये सब उत्तर-ईशान-पूर्वार्द्ध पर्यन्त हों तो अच्छे हैं।इन्डोर प्लान्ट्स सुविधानुसार कहीं भी रखे जासकते हैं।होटल-भवन के आन्तरिक भागों में कैक्ट्स के गमलों को न रखें।

क्रमशः...

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