Friday, 29 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारणःःभाग आठ

गतांश से आगे...

कालसर्पयोग के अन्य प्रकार— ()
कुछ विद्वानों ने कालसर्पयोग के कुछ अन्य प्रकारों को भी दर्शाया है । वस्तुतः ये प्रकार कुछ नया नहीं है, प्रत्युत पूर्व वर्णित मुख्य बारह में ही कुछ खास है ।

पूर्व प्रसंगानुसार यहां भी दो विभाग किये गए हैं, किन्तु स्थिति बिलकुल भिन्न है। एक को दृश्यगोलार्द्ध और दूसरे को अदृश्यगोलार्द्ध कालसर्पयोग नाम दिया गया है । इन स्थितियों को निम्नांकित कुण्डलियों से स्पष्ट किया जा रहा है—


 ऊपर की पहली कुण्डली में हम देख रहे हैं कि मेषस्थ राहु और तुलस्थ केतु के दाहिनी ओर सूर्यादि सभी ग्रह हैं, यानी राहु की वक्रगति के अधीन हो रहे हैं, जब कि दूसरी कुण्डली में पंचमस्थ राहु और एकादशस्थ केतु के अधीन सूर्यादि सभी ग्रह तो पूर्ववत ही हैं, किन्तु  द्वादशभाव गत ग्रहों की अवस्थिति दायें के बजाय बायें हो गयी है । भावभेद से इस स्थिति में किंचित और ग्रहस्थितियां भी मिल सकती है, जो इसी प्रकार (श्रेणी) में रखे जायेंगे । यथा— लग्न वा बारहवें स्थान में राहु की अवस्थिति, तदनुसार सप्तम वा षष्ठम में केतु की स्थिति, तथा शेष ग्रहों को इनके प्रभाव-क्षेत्र में आजाने की स्थिति को दृश्यगोलार्द्ध कालसर्पयोग नाम दिया गया है । वस्तुतः इसे उदित का ही स्थान-भेद कहना चाहिए । और ये भी ध्यान रखने की जरुरत है कि प्रथम में उदित का स्थान-भेद है, किन्तु दूसरे में अनुदित का स्थान-भेद नहीं है । यानी कि इस उदाहरण में दिखाये जा रहे दोनों प्रकार उदित के ही हैं ।

किन्तु हां, भावगत परिवर्तन के कारण जातक पर होने वाले परिणामों में पर्याप्त अन्तर पाया जायेगा । इस प्रकार के योग में उत्तम रोजगार, धार्मिक प्रवृत्ति के साथ-साथ अकस्मात दुर्घटना और व्यावसायिक नुकसान, मानहानि, व्ययाधिक्य आदि की आशंका बनी रहती है । जीवन के पूर्वार्द्ध में धन-मान-सम्मान आदि की प्राप्ति तो हो जाती है, किन्तु जीवन के उत्तरार्द्ध में सब कुछ छिन्न-भिन्न होने लगता है और स्थिति पूर्ववत दयनीय हो जाती है ।

इसी तरह इसके ठीक विपरीत राहु-केतु की स्थिति को अदृश्यगोलार्द्ध कालसर्पयोग नाम दिया गया है । किन्तु ध्यान देने की बात है कि दोनों स्थितियों में सूर्यादि शेष ग्रह राहु के शिकंजे में ग्रसित हैं । फर्क इतना ही है कि राहु-केतु की स्थिति बदल गयी है, साथ ही ग्रहों की स्थिति भी पूरे तौर पर बदल गयी है- सभी ग्रह दाहिने से बायें हो गये हैं और इस प्रकार राहु का प्रभाव दोनों में समान रुप से बना रह गया है ।

कुछ विद्वानों का किंचित परिहार पूर्वक  मत है कि लग्न, चतुर्थ, द्वादश, पंचम एवं नवम स्थान से बनने वाले अदृश्यगोलार्द्ध कालसर्पयोग का परिणाम प्रायः निष्फल होता है, यानी दोष बिलकुल न के बराबर रह जाता है, किन्तु यह गहन परीक्षण और अन्वेषण का विषय है । बिलकुल दावे के साथ इसे स्वीकारा नहीं जा सकता और दूसरी ओर, इस बात का दावा किया जा सकता है कि कालसर्पदोष चाहे जिस किसी भी प्रकार का हो, न्यूनाधिक कष्टप्रद तो होगा ही । भले ही किसी में समयानुसार सुखकारी परिवर्तन हो जाये । कालसर्पयोग (दोष) पूर्व जन्मार्जित दुष्कर्मों का इह जन्म में संकेत है, इसे कदापि नकारा नहीं जा सकता ।

कालसर्पयोग के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का कथन है कि प्रथम दृष्ट्या दोष दीखने के बावजूद वास्तविक दोष नहीं होता । बहुत बार अर्द्धचन्द्रयोग को भी हम कालसर्पयोग घोषित करने की जल्दवाजी कर जाते हैं । प्रसिद्ध ज्योतिष-ग्रन्थ मानसागरी पद्धति में अर्द्धचन्द्रयोग की चर्चा है—
लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतःखमध्यात्सप्तर्क्षगैर्नौरथकूटसंज्ञः ।
छत्रंधनुश्चान्यगृहप्रवृत्तैर्नौपूर्वको योग इहार्द्धचन्द्रः ।।

कालसर्पयोग जैसा दीखने वाला ही अर्द्धचन्द्रयोग जातक की सुख-समृद्धि में सहयोगी हुआ करता है । यथा—
भूमीपालप्राप्तचञ्चत्प्रतिष्ठःश्रेष्ठःसेनाभूषणार्थाम्बराद्यैः ।
चेदुत्पत्तौ यस्य योगोऽर्द्धचन्द्रश्चन्द्रःस्यादुत्सर्वार्थं जनानाम् ।।  (अर्द्धचन्द्र योग-युक्त जातक किसी अन्य बड़े राजा से महती प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला, सेना, रत्नाभूषणादि-युक्त, सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हुआ करता है ।)

दूसरे, छठे, आठवें, बारहवें स्थान में राहु-केतु हों और एक ही गोलार्द्ध में शेष ग्रह ग्रसित हों तो कालसर्पयोग बनेगा और ठीक इसके विपरीत ग्रह-स्थिति होने पर अर्द्धचन्द्रयोग बनता है, जो सुखकारी है । यथा—
.सभी ग्रह क्रमशः प्रथम से सप्तम के बीच हों तो नौकायोग बनता है ।
. सभी ग्रह क्रमशः सप्तम से प्रथम के बीच हों तो छत्रयोग बनता है ।
.सभी ग्रह चतुर्थ से दशम स्थान में हों तो कूटयोग बनता है ।
.सभी ग्रह दशम से चतुर्थ स्थान में हों तो धनुयोग बनता है ।
.सभी ग्रह दशम से चतुर्थ स्थान में हों तो सर्पयोग (शुभद) बनता है(मतान्तर से)

(सर्पयोग का एक और प्रकार भी है, इसे आगे अशुभयोग क्रम में देखें)

अतः इन विविध योगों का भी ध्यान रखना चाहिए।

क्रमशः...

कालसर्पयोगःःकारण और निवारणःःभाग सात

गतांश से आगे...


कालसर्पयोग के अन्य प्रकार— ()
 अब तक के प्रसंग में मुख्य बारह प्रकार के कालसर्पयोगों की चर्चा की गयी । हालाकि इस अध्याय के प्रारम्भ में ही स्पष्ट किया जा चुका है कि १२ x १२ = १४४ और फिर उसके विपरीत क्रम विचार से पुनः १२ x १२ = १४४ यानी कुल २८८ प्रकार के कालसर्पयोग हुआ करते हैं । कुछ विद्वानों के मत से किंचित अन्यान्य स्थितियां भी बन सकती हैं और इस प्रकार कुल संख्या इससे भी अधिक कही जा सकती हैं, किन्तु इनमें मूल उक्त बारह ही रहता है । वस्तुतः इस दोषपूर्ण योग के बनने के पीछे मुख्य रुप से राहु-केतु का ही योगदान है और राहु केतु की इतनी ही स्थितियां हो सकती है ।

परन्तु यहां आगे किंचित गम्भीरता पूर्वक विचार करते हुए कुछ खास ग्रह-स्थितियों पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ, जिनके प्रभाव स्वरुप कालसर्पयोग की भयावहता वा सौम्यता निर्भर करती है । सच पूछा जाये तो कालसर्पयोग का ये कोई अतिरिक्त प्रकार नहीं है, प्रत्युत द्वादश भावगत ग्रह-स्थितियों को दर्शित कर रहा है सिर्फ, जिन्हें ध्यान में रखते हुए ही योग की सिद्धि-असिद्धि का निर्णय किया जाना चाहिए ।  

विभिन्न विद्वानों ने ग्रह-स्थितियों के योगायोग से  प्रभावित जातकों के जीवन का अध्ययन और जन्मकुण्डली-विश्लेषण करते हुए पाया कि ये सत्य है कि राहु-केतु के चुम्बकीय प्रभाव-क्षेत्र में सूर्यादि शेष सात ग्रहों का आ जाना ही कालसर्पयोग का कारण बनता है, फिर भी उनकी मुख्य दो स्थितियां विशेष द्रष्टव्य हैं—
१.ग्रहों की अधीनस्थता राहु से केतु के बीच है अथवा
२. केतु से राहु के बीच ।

सामान्यतया इस गम्भीरता की ओर लोगों का ध्यान नहीं जाता और इसका परिणाम होता है कि फलकथन (कालसर्पदोष का परिणाम कथन) में भारी चूक हो जाती है । और फलकथन में हुयी त्रुटि का कलंक ज्योतिषशास्त्र पर लगता है । आधुनिक समाज में ज्योतिष की निन्दा होने लगती है । तरह-तरह के तर्क दिये जाने लगते हैं । कुछलोग तो यहां तक कहते हैं कि कालसर्पयोग एक शुभकारी योग है क्यों कि विश्व में बहुत से ऐसे महान लोग हुए हैं, जिनकी जन्मकुण्डली में ये योग रहा है....इत्यादि । उन बन्धुओं की बातों का पूर्णरुपेण समर्थन करते हुए मैं पुनः कहना चाहूंगा कि योग में बनने वाली ग्रह-स्थितियों का गहन विचार करें, फिर निर्णय लें कि परिणाम सुखद होगा वा दुःखद । क्यों कि उक्त दोनों स्थितियां व्यवहार में देखी-सुनी गयी हैं । विश्व की अनेकानेक  विभूतियां इस योग से ग्रसित पायी गयी हैं और दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इसयोग के परिणामस्वरुप नारकीय जीवन गुजारने को विवश हुए हैं । अतः सामान्य तौर पर एक सी दीखने वाली ग्रह-स्थिति में ऐसा क्या रहस्य छिपा है जो परिणाम में इतना अन्तर ला देता है ।

इसे ठीक से हृदयंगम करने हेतु पहले आप नीचे दिए जा रहे दो जन्मांकों का अवलोकन करें । इन दोनों के बीच के अन्तर को समझें ।



गौरतलब है कि ऊपर दिये गए दोनों जन्मांकों में काफी समानता है । सामान्य ज्योतिषी धड़ल्ले से इन दोनों को भयावह कालसर्पदोष-ग्रसित घोषित कर देगा । किन्तु जरा गहराई से विचारें तो दोनों में भारी अन्तर है— दोनों कुण्डियों में लग्न कन्या ही है, और सूर्यादि सभी ग्रह समान रुप से तत्तत भावों में विराज रहे हैं, परन्तु मौलिक अन्तर है राहु और केतु की विलकुल विपरीत अवस्थिति । हम देख रहे हैं कि प्रथम कुण्डली में लग्न में केतु बैठे हैं, जब कि दूसरी कुण्डली में राहु लग्नस्थ हैं । इस प्रकार कालसर्पयोग के नामकरण में भी पर्याप्त भेद है । किन्तु सामान्य ज्योतिषी यही कहेंगे कि ये दोनों तो स्पष्ट रुप से कालसर्पदोषयुक्त है ही । प्रथम में तक्षक नामधारी कालसर्पयोग है और द्वितीय में अनन्त नामधारी । ऐसी स्थिति में दोष तो हावी रहेगा ही दोनों में—किंचित परिमाण और परिणाम-भिन्नता सहित ।

अब यहां इन दोनों के सम्बन्ध में कुछ गहन बातों पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ, जिन पर सामान्य जन ध्यान ही नहीं देते और किसी भी प्रकार का (नाम का) कालसर्पदोष क्यों न हो घिसे-पिटे उपचारों को निपटा डालते हैं । ऐसी स्थिति में उपचार-कर्ता की मोटी कमाई तो हो जाती है, परन्तु जातक की परेशानी ज्यों के त्यों बनी रहती है या  व्यर्थ का अतिरिक्त व्यय-भार वहन करने को विवश होता है ।

ऊपर दिये गए दोनों जन्मांक चक्रों में आप स्पष्ट देख रहे हैं कि ग्रहों के साथ-साथ तीर के भी निशान हैं । ये तीर एक खास दिशा में ईंगित हैं, जो राहु-केतु के चुम्बकीय प्रभाव-क्षेत्र को दर्शाते हैं । इसे स्पष्ट करने हेतु राहु-केतु के सम्बन्ध में कुछ विशेष बातों की जानकारी आवश्यक है ।

ज्ञातव्य है कि सूर्यादि नवग्रहों में राहु-केतु  सदा वक्रगति करते हैं, यानी मीन से अगली राशि मेष में न जाकर विपरीत राशि कुम्भ में गतिशील होंगे । और फिर इसी तरह पीछे और पीछे क्रमशः मकर-धनु-वृश्चिक-तुलादि राशि पर संक्रमित होते हुए भचक्र पूरा करेंगे । ठीक इसके विपरीत सूर्य और चन्द्रमा ये दो ऐसे ग्रह हैं जो कभी भी (कदापि) वक्रगति नहीं करते । उक्त इन चार को छोड़कर शेष यानी मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि ये पांच ग्रह समयानुसार कभी वक्री, तो कभी मार्गी हुआ करते हैं ।

            पूर्व प्रसंग में ही राहु-केतु की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक कथा की चर्चा की जा चुकी है । आपको ज्ञात है कि राहु-केतु एक ही मूल कायसौष्ठव के दो टुकड़े हैं । श्रीहरि के चक्र से खंडित होकर सिरोभाग राहु कहलाया और कबन्ध (धड़) केतु कहलाया । इनकी स्थिति अन्तरिक्ष में सदा १८०डिग्री  पर बनी रहती है । यही कारण है कि जन्मांक चक्र में एक और सात की दूरी बनाये हुए विचरण करते हैं । इस प्रकार सदा आमने-सामने रहते हैं ।

दूसरी बात राहु-केतु के सम्बन्ध में जानने योग्य ये है कि इनमें चुम्बकीय प्रभाव राहु से केतु की ओर प्रवाहित होता है, न कि केतु से राहु की ओर । ऊपर के दोनों चक्रों में तीर के निशान से इस बात को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है ।
हम देख रहे हैं कि पहली कुण्डली में सप्तमस्थ राहु से लग्नस्थ केतु की ओर चुम्बकीय प्रवाह गतिशील है । दूसरी कुण्डली में लग्नस्थ राहु से सप्तमस्थ केतु की ओर चुम्बकीय प्रवाह गतिशील है । प्रवाह तो सदा राहु से केतु की ओर ही होगी - ये सुनिश्चित है, किन्तु प्रवाह-क्षेत्र में ग्रह आ रहे हैं या नहीं - ये बात समझने और ध्यान देने जैसी है । यही मौलिक अन्तर है । शेष ग्रह राहु-केतु के चुम्बकीय प्रवाह में हैं यदि तभी दोष विशेष रुप से हावी होगा, अन्यथा नहीं या कहें बिलकुल न के बराबर । 

विद्वानों ने पहली स्थिति को उदितगोलार्द्ध और दूसरी स्थिति को अनुदितगोलार्द्ध संज्ञित किया है । बहुत से विद्वान तो दूसरी स्थिति को कालसर्पदोष कदापि स्वीकारने को ही राजी नहीं हैं । उनका स्पष्ट कथन है कि राहु के चुम्बकीय प्रवाह में शेष ग्रह हैं ही नहीं, फिर दोष कैसा ? इस सम्बन्ध में एक और तर्क द्रष्टव्य है कि राहु के दक्षिण पार्श्व में काल और वामपार्श्व में सर्प हैं (पूर्व अध्याय में दिए गए अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता-चक्र और श्लोक द्रष्टव्य) । इस प्रकार भी राहु की ही प्रधानता हुयी इस नामकरण में ।

इन दोनों मतों का समादर करते हुए मेरा मन्तव्य है कि प्रथम प्रकार (उदित) में कालसर्पदोष की दशाकालिक प्रबलता होगी, जबकि द्वितीय प्रकार (अनुदित) में गोचर स्थिति में प्रबलता होगी । दूसरी विशेषता या अन्तर  ये होगा कि उदित स्थिति में दोष का प्रभाव प्रायः जन्म से ही लक्षित होने लगेगा और गोचर संचरण से जैसे-जैसे क्रमिक रुप से सभी ग्रह ग्रसित होते जायेंगे, परिणाम कष्टकर होता चला जायेगा । और आगे गोचर संचरण में जब राहु बाहर निकल जायेगा, तब कहीं जाकर जातक को राहत मिलेगी ।  दूसरी स्थिति में राहु का चुम्बकीय प्रभाव चुंकि विपरीत दिशा में पड़ रहा है, इस कारण जन्म के प्रारम्भ से ही कठिनाई न होकर उम्र के साथ-साथ क्रमिक रुप से लक्षित होगी । यथा—शिक्षा-विघ्न, विवाह-विघ्न, रोजगार-विघ्न, धन-विघ्न, रोग-विघ्न, यश-विघ्न इत्यादि झेलते हुए जातक का जीवन प्रायः संघर्ष पूर्ण ही व्यतीत हो जाता है । फलादेश में इन बारीकियों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । सीधी सी बात है कि राहु के आधिपत्य वाला दोष अपेक्षाकृत अधिक कष्टकारक हुआ करता है, जबकि केतु के आधिपत्य वाला दोष अपेक्षाकृत काफी न्यून कष्टदायी होता है । ध्यातव्य है कि राहु को सर्प का सिर और केतु को पूंछ माना गया है । इस प्रकार ये भी कह सकते हैं कि सिर से पूंछ की ओर ग्रसन-स्थिति अधिक कष्टप्रद एवं चुंकि पूंछ से सिर की ओर ग्रसन-संचरण सम्भव नहीं, अतः इसका दुष्प्रभाव भी आपेक्षिक न्यून हुआ करता है ।

क्रमशः...

Thursday, 28 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारणःःभाग छः

गतांश से आगे ....

(११) विषाक्त कालसर्पयोग—  जन्मकुण्डली के पंचम भाव में केतु , तदनुसार एकादश में राहु की स्थिति से बनने वाले योग को विषाक्त कालसर्पयोग कहते हैं । इस स्थिति को नीचे के चित्र से स्पष्ट किया गया है—

 ध्यातव्य है कि केतु शिक्षा और सन्तान भाव में तथा राहु आय भाव में हैं । अतः इस प्रकार के जातक को शिक्षा, सन्तान और आय सम्बन्धी किसी न किसी प्रकार की समस्या झेलनी ही पड़ती है । एक और विशेष बात ऐसे जातकों में ये देखी जाती है कि अपने जन्मस्थान के समीप आजीविका का साधन कदापि नहीं बन पाता, यानी काफी दूर जाना पड़ता है । भले ही आज के जमाने में दूरी कोई महत्त्व नहीं रखती , फिर भी परिवार से दूरी यत्किंचित कारणों से बने रहना कोई नहीं चाहता । इस प्रकार पारिवारिक सुख में बाधा तो आ ही जाती है । सहोदरों से प्रायः विवाद बना रहता है । कोर्ट-कचहरी तक की स्थिति प्रायः बनी रहती है । विशेष करके यदि कोई बड़ा भाई है तो उससे कदापि नहीं पटती । जटिल नेत्ररोग, हृदयरोग, विशेष प्रकार की अनिद्रा आदि मानसिक रोगों का शिकार भी होना पड़ता है । इस प्रकार जातक का शरीर जर्जर और रोगी हो जाता है । सबसे बड़ी बात ये है कि इस योग से पीड़ित जातक की मृत्यु बड़े रहस्यमय ढंग से होती है ।  

(१२) शेषनाग कालसर्पयोग— जन्मकुण्डली के षष्ठम भाव में केतु और द्वादश भाव में राहु की अवस्थिति से बनने वाले योग को शेषनाग कालसर्पयोग के नाम से जाना जाता है । इसे नीचे के चित्र से समझा जा सकता है—
 
ध्यातव्य है कि सिर विहीन पापग्रह केतु रोग-शत्रु भाव में बैठे होते हैं तदनुसार  राहु व्यय भाव में । दोनों की परस्पर दृष्टि संयोग भी सदा बना ही रहता है । परिणाम स्वरुप गुप्त रोग और परोक्ष शत्रु का प्राबल्य प्रायः बना रहता है । द्वादश भाव वायीं आँख का प्रतिनिधित्व करता है । जहां राहु विराजमान हैं । इसके परिणाम स्वरुप आर्थिक असंतुलन तो बना ही रहता है, साथ ही बायीं आँख की शल्यक्रिया जीवन में अवश्य होने की आशंका रहती है, क्यों कि इस पर रोगभावस्थ केतु की पूर्ण दृष्टि का योग होता है । इस योग के जातक प्रायः जीवन भर अपमान और वदनामी या कि गुमनामी की स्थिति में रह सकते हैं । किन्तु हां मृत्यु के पश्चात अचानक कुछ ऐसी स्थिति आती है कि अपयश यश में बदलने लगता है । परन्तु उससे दिवंगत प्राणी को क्या लाभ – क्या वर्षा जब कृषि सुखानी ? अस्तु ।
क्रमशः...

Saturday, 23 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारण-- भाग पांच

गतांश से आगे....


() शंखनाद कालसर्पयोग— तृतीय भाव में केतु और नौंवे भाव में राहु की अवस्थिति होने पर शंखनाद नामक कालसर्पयोग का सृजन होता है । यह स्थिति वासुकि नामक काल सर्पयोग के ठीक विपरीत की है । इसे नीचे की कुण्डली में स्पष्ट देखा जा सकता है—


भाग्यहीनता सर्व प्रधान दुर्गुण है ऐसे कालसर्पयोग वाले जातक का । कर्म तो खूब करता है । सही दिशा में भी करता है, किन्तु भाग्य बार-बार उससे छल करते रहता है । कर्मवादी को जोरदार झटका लगता है । और थकहार कर भाग्य को कोसना पड़ता है । पिता का सुख न के बराबर मिलता है । पिता या तो असमय में ही गुजर जाता है, या फिर पिता से उचित स्नेह-सम्बन्ध नहीं रहता । व्यापार, व्यवसाय, नौकरी आदि जो भी आजीविका का क्षेत्र हो प्रायः वाधा या विवाद की स्थिति बनी रहती है । अधिकारियों से तालमेल नहीं बैठती प्रायः । कानूनी या प्रशासनिक कठिनाइयां बारबार झेलनी पड़ सकती है । सामान्य सुख-प्राप्ति हेतु भी ऐसे जातक को काफी संघर्ष करना पड़ता है ।

       (१०) पातक कालसर्पयोग— जन्मकुण्डली के चतुर्थ भाव में केतु , तदनुसार दशम भाव में राहु की स्थिति के कारण बनने वाले कालसर्पयोग को पातक नाम से जाना जाता है।

 इस प्रकार की कुण्डली में ध्यान दें तो पायेंगे कि केतु भूमि, भवन, वाहन, माता आदि के प्रतिनिधित्व करने वाले भाव में है और उधर पिता स्थान में राहु हैं । ये तो निश्चित है कि राहु-केतु का परस्पर दृष्टियोग सदा बना रहता है ।  इस प्रकार दो प्रधान भाव सीधे इनसे प्रभावित हुआ करते हैं ।
इसे आगे दिए गए चित्र से समझा जा सकता है—



   पातककालसर्पदोष-ग्रस्त जातक सन्तान और शिक्षा के मामले में दुर्बल होता है । इनकी प्राप्ति में अड़चनें आती रहती हैं । सन्तान होने के बावजूद उसका निरन्तर बीमार रहना - सदा कष्टकारी होता है । माता-पिता दोनों या फिर दोनों में किसी एक का असामयिक वियोग सहन करना पड़ सकता है । अपने भाग्यवशात् यदि वे जीवित हुए भी तो परस्पर स्नेह का तो आत्यन्तिक अभाव रहता है । आजीविका का क्षेत्र नौकरी हो या कि व्यवसाय- सन्तोषजनक नहीं रहता । नाना-नानी, दादा-दादी के लाढ़-दुलार का सुखभोग भी प्रायः नसीब नहीं होता । या तो वे जातक के जन्मग्रहण के शीघ्र बाद ही पृथ्वी छोड़ चुके होते हैं या फिर अकारण उनसे विलगाव की स्थिति बन जाती है ।


क्रमशः...

Thursday, 21 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारण- भाग चार

गतांश से आगे...
दूसरे अध्याय का शेषांश...


()  तक्षक कालसर्पयोग— सप्तम स्थान में राहु और लग्न में केतु के विराजमान होने से केतु और राहु के गिरफ्त में जब शेष भाव आते हैं, तब तक्षक नामक कालसर्पयोग का सृजन होता है । यह ठीक विपरीत स्थिति है अनन्तकालसर्पयोग से । यानी सप्तम में सिर है और प्रथम में पूंछ या कहें कबन्ध भाग । इसे नीचे की कुण्डली में देखा जा सकता है—




   इस प्रकार की कुण्डली में सप्तम स्थान विशेष पीड़ित है । पीड़ित तो लग्न भी है । जीवन-साथी का सुख प्रायः नहीं ही मिल पाता । वैवाहिक सम्बन्ध वाधित होता है, या विवाह होता ही नहीं । यदि हुआ भी तो अनुकूल स्थिति नहीं बन पाती । दोनों एक दूसरे पर चरित्रहीनता का आरोप लगाते हुए जीवन गुजारते हैं । ऐसे जातक पुरुष प्रायः परायी स्त्री में अनुरक्त होते हैं । पूरा जीवन अस्त-व्यस्त और संघर्षमय होता है । हो सकता है एकाधिक बार जेल-यात्रा भी करनी पड़े । शत्रुपक्ष की सदा प्रबलता बनी रहती है । जननांगों के रोग पीड़ित करते हैं । और कुछ नहीं भी तो कम से कम मधुमेह (सूगर) की बीमारी तो अवश्य होगी ही । मौत का कारण भी ऐसे लाइलाज रोग ही होंगे । लेन-देन के मामले में सदा धोखा उठाना पड़ेगा । उधार दिया हुआ पैसा प्रायः डूब जायेगा । इस कारण ऐसे जातकों को उधार देने से बंचना चाहिए । जीवनसाथी का विलगाव ही नहीं जीवन में आनेवाले साझेदारों, मददगारों से भी नुकसान ही उठाना पड़ सकता है । ऐसे लोग यदि व्यापार करते हैं, तो उन्हें बहुत सोच-समझ कर कार्य करना चाहिए । एकल व्यापार ही करें तो ज्यादा अच्छा है । क्यों साझेदारी में हानी की अधिक आशंका होती है ।

()  कर्कोटक कालसर्पयोग— द्वितीय भाव में केतु और अष्टम भाव में राहु का होना कर्कोटक कालसर्पयोग का सृजन करता है । यह ठीक विपरीत स्थिति है- कुलिककालसर्पयोग की । यानी अष्टम में सिर है और द्वितीय में पूंछ । इसे नीचे की कुण्डली में देखा जा सकता है—




   ऐसे जातक का भाग्य सदा सोया ही रहता है । सोना छूने पर भी मिट्टी होने जैसी स्थिति जीवन में कई बार बनती है । जिसके कारण निराशाओं का सामना करना पड़ता है । नौकरी पेशा में यदि हो तो अकारण कई बार पदोन्नति के वजाय पदावन्नति की स्थिति आ जाती है, जिसे सम्भालना मुश्किल होता है । नौकरी बिलकुल छूट भी जा सकती है । आरोपों का सामना करना पड़ता है । आरोप भी प्रायः अकारण हुआ करते हैं, जिसे प्रमाणित करना कठिन होता है । पैतृक सम्पदा या तो होती ही नहीं, या होती भी है, तो उचित भोग-लाभ नहीं हो पाता । भाइयों में विवाद वश सम्पत्ति का भारी क्षय होता है । संयोग से यदि पैतृक सम्पदा हाथ लग भी जाए तो आगे चल कर ऐसी स्थिति बनती है कि वह अपने ही हाथों उसे नष्ट कर देता है, या ऐसी स्थिति बनती है कि सम्पत्ति से हाथ धोना पड़े । ऐसी स्थिति काफी कष्टकर होती है । अपनी कमाई न के बराबर हो सकती है, जिसके कारण सामान्य जीवनयापन भी कठिन हो जाता है । किसी तरह अन्य ग्रह-प्रभावों से कुछ कमा-खा भी लिया तो संचय का खाता तो शून्य ही बना रहता है । बहुत प्रयास करके यदि कुछ जोड़-बटोर लेता है यदि तो भाग्य झिट्टी मार कर छीन लेता है, यानी विवश होकर जमापूंजी को खर्च कर देना पड़ता है ।

   ऐसे जातकों को चाहिए कि बिलकुल नगद या चल सम्पदा के रुप में संचय कदापि न करें । चतुर्थ भाव (भूमि भाव) यदि किंचित अनुकूल हो तो अचल सम्पत्ति बनाने का प्रयास करें और वो भी जीवनसाथी या सन्तान के नाम पर रखे ताकि किंचित स्थायित्व आ सके ।
क्रमशः...

Tuesday, 19 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारण भाग तीन

(गताश से आगे....दूसरे अध्याय का शेषांश)


   ()   वासुकिकालसर्पयोग—  जन्मकुण्डली के तृतीय स्थान से नवम स्थान तक राहु-केतु के शिकंजे में होना, यानी तीसरे भाव में राहु हो और तदनुसार नौवें भाव में केतु हो तो वासुकि नामक कालसर्पयोग का सृजन होता है । इस स्थिति को नीचे के चित्र से दर्शाया गया है—


   चुंकि इस योग में जन्मकुण्डली का तीसरे से लेकर नौंवें भाव तक राहु-केतु के अधीन रहता है यानि पराक्रम या सहज भाव से लेकर धर्मभाव तक प्रभावित रहता है, इस कारण वासुकि नामक कालसर्पयोग का जातक भाई-बहनों के साथ-साथ अन्य पारिवारिक सदस्यों से भी सदा कष्ट पाता है । मित्रता का सुखलाभ भी नहीं मिल पाता है सही ढंग से । नौकरी पेशे में, या अन्य कार्यों में भी सदा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । नौकरी मिलने में (अनूकूल रोजकार में) कठिनाई तो होती है, बार-बार पदोन्नति या नीचे गिरावट की स्थिति भी बनती है । सीधे कहें कि पराक्रमी तो होता है, पर सफलता नहीं मिलती । मूल निवास स्थान से दूर रहते हुए नाना प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं । हो सकता है कि अन्य सुग्रहयोग के कारण विदेश की यात्रा कर ले, किन्तु वहां भी सुख-शान्ति, अर्थलाभ, मान-प्रतिष्ठा की सम्यक् प्राप्ति दुर्लभ ही होती है । कानूनी मामलों में भी फंसना-उलझना पड़ सकता है । धर्मस्थान में पापग्रह केतु जो कि स्वभाव से मंगल की तरह है, धार्मिक मामलों में भी पीछे ही रखता है । या कहें नास्तिक स्वभाव का होता है । पराक्रम भाव में बैठा राहु मिहनत तो कराते रहता है किन्तु सातवें बैठा केतु उसकी सफलता में बाधा भी उतनी ही उत्पन्न करता है । उधर धर्म भाव पर राहु की पाप दृष्टि नास्तिक या फिर बिलकुल अन्धभक्त की स्थिति भी बना देता है । कुल मिलाकर देखा जाये तो ऐसे जातक को जीवन भर, खास कर राहु-केतु के शासन काल में विशेष कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।

()    शंखपाल कालसर्पयोग— चतुर्थ स्थान से दशम स्थान (मातृ / सुख भाव से कर्म भाव) तक राहु-केतु के प्रभाव क्षेत्र में होने की स्थिति वाली जन्म-कुण्डली में शंखपाल नामक कालसर्पयोग सिद्ध होता है । इसे नीचे के चित्र से देखा-समझा जा सकता है—


    ध्यान देने की बात है कि ऐसी कुण्डली में जातक के सुख और कर्म दोनों पापग्रह पीड़ित होते हैं । भूमि, भवन, वाहन, माता, सुख, सौभाग्य, पिता, कर्म, नौकर-चाकर, अनुगामी इत्यादि की स्थिति प्रायः प्रतिकूल रहती है । नौकरी पेशा वाले ऐसे जातक को जरा भी स्थिरता नहीं मिलती । सदा यहां-वहां भटकने, किसी एक नौकरी में न टिक पाने,स्वयं छोड़ देने या निकाल देने जैसी स्थिति प्रायः बनती रहती है । व्यापार-क्षेत्र में यदि जातक आगे बढ़ना चाहता है तो वहां भी ऐसी ही स्थिति बनती है । कभी कुछ, कभी कुछ व्यवसाय परिवर्तन करते रहता है और सबमें निराशा और घाटे का ही सामना करना पड़ता है । पढ़ाई-लिखाई के समय भी तरह-तरह की बाधायें आती है । अग्रशिक्षा भी सन्तोषजनक नहीं मिल पाती । स्वास्थ्य भी प्रतिकूल बना रह सकता है ।

      ()     पद्मकालसर्पयोग—  पंचम यानी शिक्षा-सन्तान आदि के भाव से लेकर एकादश (आय) स्थान तक राहु-केतु के अधीन होने वाले योग को पद्मकालसर्पयोग के नाम से जाना जाता है । इसे नीचे के चित्र से देखा-समझा जा सकता है—


   पंचम यानी शिक्षा और सन्तान ये दोनों या फिर इनमें कोई एक तो अवश्य ही वाधित रहेगी । हालाकि ये परिणाम इस पर विशेष रुप से निर्भर करता है कि राहु के साथ और कौन है या भाव में राहु अकेला है । भावगत राशि क्या है - ये भी अति महत्त्वपूर्ण है । ऐसे दोष से पीड़ित जातक को पारिवारिक सुख का पूर्ण अभाव रहता है । अन्य ग्रहस्थिति यदि साथ दी तो हो सकता है कि वह परिव्राजक भी हो जाये । परिवार को त्याग कर चल दे । हालाकि वहां भी शान्ति-लाभ उसे नहीं मिलेगा । सन्तान या तो होगी ही नहीं या होगी तो दुःखदायी ही होगी । सन्तान से सुख की आशा नहीं ही रखी जा सकती । खासकर वृद्धावस्था (राहु-केतु काल) तो विशेषकर सन्तान के कारण कष्टदायी हो सकता है । कारावास की भी स्थिति बन सकती है । अन्य कानूनी मामलों में उलझना पड़ सकता है । कदम-कदम पर शत्रुओं का सामना करना पड़ सकता है । किसी बड़े षड़यन्त्र का शिकार होना पड़ सकता है । परवश जातक स्वयं भी षड़यन्त्रकारी हो सकता है । ऐसी कुण्डली वाले जातकों की पत्नी शायद ही सही चरित्र वाली हो । सौभाग्यवश चरित्रवती हुयी यदि तो भी सच्चा स्नेह उससे मिलने की आशा कम ही रहती है । विशेषकर यदि सप्तम भाव भी किसी प्रकार पीड़ित हुआ तो स्थिति और भी चिन्ताजनक हो सकती है । आय स्थान में बैठा केतु जुए, सट्टे, शेयर बाजार की ओर घसीट कर भारी नुकसान पहुँचा सकता है । गुप्तरोगों का भी शिकार होना पड़ सकता है । किसी रोग के हो जाने पर उसका निदान और चिकित्सा भी सहज नहीं हो पाता ।

()  महापद्मकालसर्पयोग— षष्टम भाव से द्वादश भाव तक राहु-केतु के अधीन होने पर महापद्म नामक कालसर्पयोग का सृजन होता है । इसे नीचे की कुण्डली से स्पष्ट किया गया है—

इस श्रेणी के जातक का चरित्र प्रायः संदेहास्पद होता है । प्रेम-प्रसंगों में प्रायः बाधायें आती हैं । किसी एक के साथ आजीवन दाम्पत्य निर्वाह असम्भव सा होता है । जीवनसाथी के चुनाव में एकाधिक बार धोखा हो सकता है । इसके लिए जातक स्वयं जिम्मेवार होता है, न कि उसका जोड़ीदार । प्रेम का हाथ बढ़ाना और थोड़े ही दिनों में पीछे हट जाना, या उसे धोखा देना ऐसे जातक की आदत सी होती है । सच पूछें तो ऐसे जातक को स्वयं पर भी भरोसा नहीं होता । जीवन में बार-बार विभिन्न मामलों में निराशा हाथ लगती है । शत्रु वहुतायत से होते हैं और प्रायः शत्रुओं से उसे हार खानी पड़ती है । रोग-व्याधि के मामले में भी ऐसी ही स्थिति बनी रहती है । कोई न कोई व्याधि हमेशा ग्रसित किए रहती है । रोग का सही निदान भी कठिन होता है । छोटा, सामान्य सा दीखने वाला रोग भी आगे चल कर भयानक हो जाता है । रोग-शत्रु आदि के कारण आर्थिक क्षति भी काफी उठानी पड़ती है ।  यूं कहें कि महापद्मकालसर्प पीड़ित जातक आजीवन रोग और शत्रुओं से घिरा रहता है । एक से किसी तरह पिंड छुड़ाता है , तब तक दूसरा आ घेरता है । परिणामतः निराशा होती है । हताशा होती है । और कभी-कभी तो आत्महत्या करने का भी मन बना लेता है । किन्तु षष्ठस्थ राहु आत्महत्या भी करने नहीं देता । पत्नी वियोग (पति वियोग) का सामना करना पड़ सकता है । लम्बे समय तक विरह वेदना में गुजारने के पश्चात यदि कोई रास्ता (विकल्प) सूझता भी है तो उसमें सफलता नहीं मिल पाती । पति-पत्नी की मनोनुकूलता बिलकुल नहीं होती । हमेशा अकारण बैरभाव, विपरीत विचारों की स्थिति बनी रहती है । धन का अकारण अपव्यय होता रहता है । आय भी सन्तोषजनक नहीं होती । सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, शारीरिक प्रायः हर प्रकार से दुःख ही दुःख झेलना पड़ता है ।

            ध्यातव्य है कि अबतक लग्न से लेकर षष्ठम भाव तक राहु का परिभ्रमण हो चुका है— अलग-अलग जातकों की जन्मकुण्डली में । तदनुसार केतु की स्थिति सप्तम भाव से परिभ्रमण करते हुए द्वादश भाव तक क्रमशः बनी है । अब तक द्वादशभाव चक्र की आधी परिक्रमा हो चुकी है । अब आगे ठीक विपरीत सी स्थितियां बनने जा रही है । जैसा कि हम अगले जन्मांक में ही देखेंगे—छः घर पीछे राहु की जो स्थिति थी, वही स्थिति अब केतु की होने जा रही है । इस प्रकार पुनः छः , पूर्व छः के ठीक विपरीत स्थितियां हमारे सामने होंगी । अब क्रमशः केतु वहां होगें जहां राहु हुआ करते थे पहले और राहु वहां होंगे जहां केतु हुआ करते थे । भाव तो वही होंगे, किन्तु भावस्थ ग्रह विपरीत होते जायेंगे ।
क्रमशः जारी.........

Monday, 18 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारण भाग दो


(दूसरे अध्याय का पहला भाग )
                           
                         द्वितीय अध्याय 

             कालसर्प योग के प्रकार और परिणाम

गत प्रसंग में कालसर्पदोष नामक ग्रह-योग से परिचय कराया गया । अब यहां इसके प्रकारों की चर्चा की जायेगी । व्यावहारिक रुप से विभिन्न कुण्डलियों में इन्हें यथास्थान रख कर स्पष्ट भी किया जायेगा ।

राशिचक्र में बारह राशियां हैं । ये राशियां ही उदय-क्षितिज पर लग्न संज्ञित होती हैं । राशीनामुदयो लग्नः वचनानुसार लग्न सारिणी में लग्न भी बारह ही कहे गए हैं । इस प्रकार बारह लग्नों के बारह प्रकार के कालसर्पयोग बनेंगे । और आगे १२x१२=१४४ प्रकार भी हो जायेंगे । अब अनुक्रम से देखें तो जिस तरह राहु के पक्ष से विचार करने पर उक्त १४४ स्थितियां बनी, उसी भांति केतु के पक्ष से विचार करने पर भी वैसी ही १४४ स्थितियां भी बनेंगी ही । इस प्रकार कुल मिलाकर २८८ प्रकार के कालसर्प घटित हो सकते हैं । थोड़े और गहराई में जायें तो कह सकते हैं कि  ग्रह-कक्षा में संपात विन्दुओं को यदि जिम्मेवार मानते हैं, तो ऐसी अनेक- अगनित स्थितियां भी बन सकती हैं । किन्तु इनमें अति विशिष्ट बारह प्रकारों की ही चर्चा की जाती है और फलादि विचार एवं उपचार क्रम में इनका ही प्रयोग होता है । 

यथा— अनन्त, कुलिक, वासुकि, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखनाद, पातक, विषाक्त और शेषनाग नामक कालसर्पयोग ।

अब यहां आगे किंचित उदाहरण से विचार करें— मेषलग्न की कुण्डली में क्रमशः मेषादि द्वादश राशियों में वामावर्त परिभ्रमण कराते हुए राहु को मीनराशि (बारहवें भाव) तक ले जाते हैं । स्वाभाविक है इससे ठीक सातवें घर में बैठा केतु भी इसी तरह दक्षिणावर्ती परिभ्रमण करेगा क्रमशः तुला से वृश्चिकादि बारह राशियों में । और इस प्रकार छः+छः=बारह प्रकार के अनन्तादि कालसर्पयोग बन जायेंगे । पुनः यदि ऐसी ही क्रिया वृष को लग्न मानकर करेंगे तो इसी प्रकार (इसी विधि से) छः+छः=बारह प्रकार के कालसर्पयोगों का सृजन हो जायेगा । और फिर इसी तरह बढ़ते हुए मीन तक चले जायें और फिर मीन से विपरीत क्रम से भी ऐसे ही चलें तो सभी प्रकार स्पष्ट होते चले जायेंगे । राहु-केतु की इन स्थितियों को आगे दो चित्रों के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है । पहले चित्र में राहु लग्न में बैठा है और क्रमशः द्वितीय से षष्ठम् पर्यन्त उसकी सात स्थितियां दीख रही है । इसी भांति सप्तम से द्वादश पर्यन्त केतु की स्थिति दीख रही है । तथा दूसरे चित्र में सारी स्थितियां ठीक विपरीत स्थिति में हैं ।


चुंकि मुख्य रुप से सारे प्रयोग और उपचार बारह प्रकारों पर ही है, इस कारण आगे इन्हीं बारहों की विशेष चर्चा की जायेगी ।

(१)        अनन्त कालसर्पयोग— लग्न में राहु और सप्तम में केतु की अवस्थिति से बनने वाले योग को अनन्त कालसर्प योग कहते हैं । नीचे दी गयी कुण्डली में हम देख सकते हैं कि लग्न में मेष राशि पर राहु बैठे हैं और सप्तमस्थान (भाव) में तुलाराशि पर केतु बैठे हैं । अब इन दोनों के बीच में यदि शेष सातों ग्रह कहीं न कहीं बैठ जायें तो कालसर्प योग की स्थिति बन ही जायेगी ।
 
ध्यातव्य है कि यहां मेषलग्न को आधार मान कर राहु-केतु की स्थिति दर्शायी गयी है । इसी प्रकार लग्न में वृष से मीन पर्यन्त की कोई भी राशि होगी, तो भी बनने वाला योग कालसर्पयोग ही कहलायेगा । मुख्य कारण स्पष्ट है कि राहु-केतु के गिरफ़्त में बाकी के सभी ग्रहों का आ जाना ही कालसर्पदोष का सृजन कर देता है । किन्तु हां,यह भी ध्यान रखने योग्य है कि भिन्न-भिन्न राशियों या भिन्न-भिन्न भावों के अन्तर से बैठने वाले ग्रहों की स्थिति पर जातक के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव बिलकुल भिन्न होंगे । कहने का तात्पर्य ये है कि अनन्तकालसर्पदोष प्रभावित सभी जातकों का जीवन एक समान सुखमय या कि दुःखमय कदापि नहीं हो सकता । क्यों कि उनकी अन्यान्य ग्रह, भावादि, बलादि, दृष्ट्यादि तो बिलकुल भिन्न होंगे । किन्तु हां, दोष-प्रकार का नाम सबका एक ही कहा जायेगा – अनन्तकालसर्पदोष ।     

इस योग की स्थिति में जातक अस्थिर बुद्धि, दुष्टचित्त, मानसिक रुप से बिलकुल अशान्त, कपटी, लम्पट, मिथ्या भाषी एवं षड़यन्त्रकारी स्वभाव का होता है । ऐसे जातक का लगभग पूरा जीवन न्यायिक विसंगतियों में व्यतीत होता है । पारिवारिक जीवन काफी दुःखमय हुआ करता है । नौकरी, पद, प्रतिष्ठा,व्यवसाय आदि सभी कार्य क्षेत्रों में काफी श्रम करने के पश्चात् भी अनुकूल सफलता नहीं मिलती । स्वयं तो मिथ्याचारी होता ही है, अन्य मिथ्याचारियों के षड़यन्त्र का भी शिकार अकसर हो जाया करता है ।

 ()   कुलिक कालसर्पयोग— द्वितीय स्थान से अष्टम स्थान तक राहु-केतु के आगोश में अन्य सभी ग्रहों के आने से कुलिक नामक कालसर्पयोग बनता है । इस स्थिति को नीचे की कुण्डली में देखा जा सकता है । वृष राशि में राहु हैं और तदनुसार उससे सातवें भाव में- वृश्चिक राशि पर केतु विराजमान होकर कालसर्प दोष की स्थिति पैदा कर रहे हैं ।

  कुलिक नामक कालसर्पयोग  में चुंकि द्वितीय और अष्टमभाव (धन एवं आयु) सीधे प्रत्यक्ष तथा इस बीच के अन्य भाव अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित होते हैं, इस कारण इसका सीधा प्रभाव जातक के धन-सम्पदा और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, या कहें वाधित करता है । धन का संचय तो प्रायः दुर्लभ और दुरुह हो ही जाता है, सामयिक व्यय- व्यवस्था हेतु भी प्रायः चिन्ताजनक स्थिति बन जाती है । लगभग आजीवन संघर्ष-पूर्ण व्यतीत होता है । सामाजिक अपयश और अपमान का सामना करते हुए, अवांछित, अकारण कलह और कौटुम्बिक विविध परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है । पारिवारिक, यहां तक कि दाम्पत्य जीवन भी सुखमय नहीं होता । या तो विवाह होने में ही अनेक वाधायें आती हैं, या यदि विवाह हो भी जाये तो कभी-कभी तो विच्छेद तक की स्थिति भी उत्पन्न हो जासकती है- खास कर राहु-केतु वा सप्तमेश के शासन कालों में—ऐसी आशंका विशेष रुप से बन सकती है । जातक की वाणी और व्यवहार में भी कठोरता आ जाती है, क्यों कि वह सदा विषम परिस्थितियों से गुजरता रहता है । पुरुष कुण्डली में इस प्रकार के योग होने पर स्त्री (पत्नी) कुरुप, कटुभाषिनी, झगड़ालू प्रकृति और कभी-कभी तो चरित्रहीना भी मिल जाती है । विश्वासघातिनी, अनपढ़, गवांर, अति कामी स्वभाव वाली और निर्मोही होने की स्थितियां प्रायः लक्षित होती हैं । सन्तान सुख या तो प्राप्त ही नहीं होता या फिर सन्तान होकर भी मनोनुकूल नहीं होती । इस प्रकार सन्तान-पक्ष से भी येन-केन-प्रकारेण पीड़ादायी स्थिति ही होती है । इस प्रकार जातक प्रायः टूट सा जाता है जीवन-संघर्ष करते-करते । स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट होते रहता है । मूत्रवह संस्थान के रोग, धातुक्षीणता, गुर्दे की व्याधि, शरीर में अत्यधिक मस्से आदि होना भी प्रायः ऐसे जातकों में देखा जाता है । जातक स्वयं भी चरित्रहीनता की ओर अग्रसर होता जाता है । अनेक स्त्रियों से शारीरिक संम्पर्क भी बन सकते हैं । बदचलन  के कारण सामाजिक अप्रतिष्ठा कई बार झेलनी पड़ती है । पारिवारिक, कौटुम्बिक, मित्रवर्गादि से भी सदा अनबन बना करता है । पति का वियोग भी असमय में झेलना पड़ सकता है । या तो पिता की मृत्यु अल्पावधि में (अल्पवय में) होजाती है, या पिता से विशेष तनाव की स्थिति बन जाती है । कुल मिलाकर जातक अपने जीवन से उबने लगता है ।
क्रमशः जारी....

Sunday, 17 June 2018

कालसर्पयोगःःकारण और निवारण भाग एक

(नोट इसके पूर्व के पोस्ट में प्राक्कथन और विषयसूची दी जा चुकी है । )


                                प्रथम अध्याय
                 कालसर्प योग :: परिचयात्मक इतिवृत

         प्राक्कथन क्रम में ही किंचित स्पष्ट किया जा चुका है कि नवग्रहों में दो अप्रधान—छायाग्रह—राहु-केतु , जो वस्तुतः एक ही ग्रह के शीर्ष और कबन्ध खण्ड हैं, के सम्यक् प्रभाव-क्षेत्र में जन्मकालिक सभी (शेष सात सूर्यादि) ग्रहों के आ जाने से जो योग बनता है, उसे ही आधुनिक ज्योतिष में कालसर्पयोग नाम से प्रचारित किया जा रहा है । जी हां, आधुनिक ज्योतिषीय पुस्तकों में, न कि प्राचीन ज्योतिषीय ग्रन्थों में । आधुनिकता और प्राचीनता का काल निर्धारण अपने आप में किंचित विवाद का विषय है । वैदिक-पौराणिक काल के प्राचीन ग्रन्थ में सीधे इस नाम के योग का न पाया जाना ही इसे संशय के घेरे में ला खड़ा किया है । परिणामतः पक्ष-विपक्ष के विचारों की अनुगूंज स्वाभाविक है । वर्तमान में स्थापित ज्योतिषियों का एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो इसे परले सिरे से नकारता है और सीधे ठगी का स्रोत करार दे देता है, तो ठीक इसके विपरीत बहुसंख्यक आधुनिक ज्योतिषी ऐसे भी हैं, जो इसके बड़े जोरदार  समर्थक हैं ।

    हालाकि महर्षि परासर रचित ‘ वृहत्पारासरहोराशास्त्र  के  अध्याय ३६– ७-२३ में सहस्राधिक योगों की चर्चा क्रम में  सर्प नामक योग की चर्चा है, जिसमें कहा गया है कि केन्द्र में अशुभग्रहों की अवस्थिति हो और शुभग्रहयोग न हों तो सर्पनामक योग बनता है, जिसके परिणाणस्वरुप जातक दरिद्र, कुटिल, परवश, पराश्रित, रोगी, दुःखी आदि होता है । ‘ भृगुसंहिता  योगवल्याध्याय तथा वराहमिहिर के ‘ जातक नभ संयोग में सर्पयोग की चर्चा है । कल्याण वर्मा ने अपनी पुस्तक सारावली में  भी सर्पयोग को उद्धृत किया है । शान्तिरत्नम् एवं जैन ज्योतिष में भी वर्णन मिलता है । वादरायण, गर्गाचार्य,मणित्थ आदि ने भी इस योग को नाम भेद से गिनाया है । कुछ दशक पूर्व (१९३७ से १९५२ ई.सन्) रचित आचार्च पंडित रुपचन्द जोशीजी की बहुचर्चित पुस्तक ‘ लालकिताब  में भी कालसर्पदोष के निवारण के सरल उपाय सुझाये गए हैं ।  ‘ व्यावहारिक ज्योतिष तत्त्वम्  तथा ‘ जन्मांक फल विचार  जैसी  पुस्तकों में भी दोष निवारण के उपाय सुझाये गए हैं । यथा—
          अग्रे वा चेत् पृष्ठतो प्रत्येक पार्श्वे भाताष्टके राहुकेत्वोन खेटः । यो प्रोक्ता सर्पश्च तस्मिन् जीतो जीतः व्यर्थ पुत्रर्ति पीयात् ।। राहुकेतु मध्ये सप्तो विघ्ना हा कालसर्प सारिकः सुतयासादि सकलादोषा रोगेण प्रवासे वरणं ध्रुवं । कालसर्पयोगस्थ विषविषाक्त जीवणें भयावह पुनः पुनरपि  शोकं च योषने रोगान्ताधिकं पूर्वजन्मकृतं पापं ब्रह्मशापात् सुतक्षयः किंचित ध्रुवम् ।।  
        
तथा च— प्रेतादिवशं सुखं सौख्यं विनष्यति । भैरवाष्टक प्रयोगेन कालसर्पादि भयं विनश्यति...इत्यादि ।
          
 प्रश्न ये उठता है कि आँखिर ऐसा भ्रम क्यों हो रहा है ? आमजन या कि ज्योतिष का नया जिज्ञासु तो आशंका-ग्रसित हो ही जायेगा न कि सत्य क्या है ? और फिर सही जानकारी सही स्रोत से उसे नहीं मिलेगी तो, उक्त दो में से किसी एक वर्ग का हिस्सा बन कर रह जायेगा । जिज्ञासुओं में बहुत थोड़े से लोग ऐसे होंगे जो विशेष खोजबीन करना चाहेंगे और वे ही संशय-रहित सही जानकारी भी पा सकेंगे ।
          
      अतः यहां कालसर्प नामक योग की भ्रामकता का निवारण करते हुये, सत्य से साक्षात्कार कराने का प्रयास करता हूँ ।

   जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है - सीधे कालसर्पयोग नाम का योग किसी अति प्राचीन ज्योतिष-ग्रन्थ में नहीं मिलता । यानी कि ये नाम आधुनिक ज्योतिषियों द्वारा दिया गया है । सच पूछें तो  इस नये नामकरण के पीछे सिर्फ नये लेबलिंग जैसी बात है। पुरानी वस्तु पर नया लेबल चिपका देना और नये ढंग से उसकी मार्केटिंग करना । एक ऐसा ही नया लेबलिंग हुआ है आजकल पितृदोष का भी । ये भी ठीक कुछ-कुछ इसी तरह का है, बिलकुल कालसर्पदोष जैसा ही — कुछ पुराने का ही नया भ्रामक नाम, जिसकी चर्चा फिर कभी किसी प्रसंग में की जायेगी । फिलहाल तो आप कालसर्पदोष को ही समझें-जानें ।

          इस नये नाम के पीछे के तथ्य को समझें—

  ज्योतिष शास्त्र विविध गणनाओं के आधार पर मनुष्यादि के भूत-वर्तमान-भविष्यादि का कथन (संकेत) करता है । ज्योतिष का कर्मकाण्ड-पक्ष आने वाली समस्या के निदान के पश्चात् सम्यक् उपचार की बात भी करता है । सामान्य उपचार (ग्रहों से सम्बन्धित जप, दान, धारणादि) से समुचित लाभ नहीं होने पर ग्रहों के अधिष्ठाता, अधिदेवों, प्रत्यधिदेवों की उपासना की बात की जाती है । ऐसा नहीं है कि ये विशेष उपासना सिर्फ राहु-केतु की विशेष स्थिति में ही की जाती है, प्रत्युत अन्यान्य ग्रहों के मामले में भी उनके अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता की आराधरा का आदेश है शास्त्रों में । कभी-कभी तो सीधे उनके अधिष्ठातृदेव की उपासना ही प्रशस्त कही जाती है ।  ज्ञातव्य है कि सभी (नवग्रहों) के एक-एक अधिदेवता और एक-एक प्रत्यधिदेवता भी हैं । इसे निम्नांकित श्लोक एवं भावार्थस्पष्टी सारणी से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है—

स्कन्धपुराण में कहा गया है— 
शिवः शिवा गुह्ये विष्णुर्ब्रह्मेन्द्रयमकालकाः ।
                                                 
    चित्रगुप्तोऽथ भान्वादेर्दक्षिणे चाधिदेवताः ।।

   नवग्रह-पूजन-मंडल में सूर्यादि नवग्रहों के क्रमशः दक्षिण पार्श्व में उक्त—ईश्वर, उमा, स्कन्द, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, काल और चित्रगुप्तादि अधिदेवों को स्थापित-पूजित करे ।
         
     इसी भांति सूर्यादि नवग्रहों के क्रमशः वाम पार्श्व में  अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, इन्द्राणी, प्रजापति, सर्प और ब्रह्मादि प्रत्यधिदेवों को स्थापित करना चाहिए । यथा—
अग्निरापो धरा विष्णुः शक्रेन्द्राणी पितामहाः । पन्नगाः कः क्रमाद्वामे ग्रहप्रत्यधिदेवताः ।।  

नवग्रह
अधिदेवता
प्रत्यधिदेवता
सूर्य
ईश्वर
अग्नि
चन्द्रमा
उमा
अप्(जल)
मंगल
स्कन्द
पृथ्वी
बुध
विष्णु
विष्णु
वृहस्पति
ब्रह्मा
इन्द्र
शुक्र
इन्द्र
इन्द्राणी
शनि
यम
प्रजापति
राहु
काल
सर्प
केतु
चित्रगुप्त
ब्रह्मा




    




    इस शास्त्रीय आदेश से यह सिद्ध होता है कि छायाग्रह प्रधान—राहु के अधिदेवता है काल और प्रत्यधिदेवता हैं सर्प । राहु के अधिदेवता और प्रत्यधि देवता के युग्म पद को ही कालसर्प नाम दिया गया आधुनिक ज्योतिषियों द्वारा । प्रसंगवश ये भी स्पष्ट कर दें कि राहु का नक्षत्र भरणी होता है और भरणी के स्वामी हैं काल (यम) तथा केतु का नक्षत्र है आश्लेषा, जिसके स्वामी हैं सर्प । इन्हीं दोनों नक्षत्र-स्वामियों के योग से बनता है--  कालसर्पयोग ।  
   

     प्रसंगवश यहां एक और बात समझ लेने जैसी है—ये राहु नामक छायाग्रह हैं कौन ?

 एक समय, विचारकों का एक ऐसा वर्ग भी था जो राहु-केतु के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करता था, जैसे कि आज एक वर्ग कालसर्पदोष को स्वीकार नहीं कर रहा है । यानी कि मुख्य सूर्यादि सात ग्रह ही मान्य थे । उन्हीं के संचरण और प्रभाव का आकलन किया जाता था ज्योतिर्विदों द्वारा । यहां तक कि कुछ प्राचीन ज्योतिर्विद राहु-केतु का दृष्टि-विचार भी नहीं करते । कुछ ज्योतिर्विद अन्य ग्रहों की भांति ही सप्तम दृष्टि को पूर्णदृष्टि मानते हैं, किन्तु एक प्रमाणिक दृष्टि-आदेश भी मिलता है—
सुत मदन नवान्ते पूर्ण दृष्टि तमस्य, युगल दशम गेहे चार्द्ध दृष्टिं वदन्ति ।
सहज रिपु पश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्राः, निज भवन मुपेते लोचनांधः प्रदिष्टः ।।
यानी पंचम, सप्तम, नवम और द्वादश को राहु पूर्ण दृष्टि से देखते हैं । द्वितीय और दशम भाव को आधी दृष्टि से , तृतीय और षष्टम भाव को पाद (चौथाई) दृष्टि से देखते हैं, तथा एक खास बात ये है कि निज भवन (कन्या राशि) में होने पर दृष्टिहीन हो जाते हैं । ठीक यही नियम केतु के साथ भी लागू होता है । अन्तर सिर्फ निज भवन (मीनराशि) का होगा, यानी केतु मीनराशि पर होने पर अन्धे हो जायेंगे, या कहें दृष्टिदोष नहीं लगेगा उनका । स्वभाव के मामले में राहु शनि की तरह और केतु मंगल की तरह व्यवहार करते हैं । बलाबल के विचार से शनि की तरह ही ये दोनों भी संध्या बलीग्रह हैं । एक और बात पर ध्यान रखना चाहिए—भले ही राहु-केतु सदा विपरीत चलते हों, यानी अभी मेष राशि पर हैं, तो आगे मीन राशि पर चले जायेंगे, न कि वृष राशि पर । किन्तु दृष्टि विचार करते समय विपरीत गणना न करके सीधी गणना ही करनी चाहिए । ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति  देख तो रहा है सामने, किन्तु चलता हो पीछे की ओर ।

   दीर्घकालिक परिणाम-परीक्षण और अनुभव के आधार पर बहुत बाद में ज्योतिषियों द्वारा इन्हें नवग्रहों में स्थान दिया गया—छायाग्रह कहते हुए । ठीक कुछ वैसा ही जैसे कि आजकल मॉर्डेन स्ट्रॉलॉज़र अरुण, वरुण और यम (यूरेनश,नेप्चून,प्लूटो) को भी शामिल कर लिए हैं कुण्डली विचार में ।

   ग्रह-कक्षाओं का यदि विचार करें तो हम पाते हैं कि राहु और केतु सदा एक समान—ठीक एक दूसरे के विपरीत यानी १८०डिग्री पर अन्तरिक्ष में निरन्तर गतिशील रहते हुए १८ वर्ष ७ महीने १८ दिन और १५ घंटे में मेषादि द्वादश राशि-पथ पर परिभ्रमण कर लेते हैं, यानी किसी एक राशि से गुजरने में १ वर्ष ६ महीने १९ दिन २ घंटे १५ मिनट लगते हैं । फिर भी इनकी  गति शनि की तुलना में काफी अधिक है । क्यों कि उन्हें राशि-पथ का एक चक्कर लगाने में पूरे तीस वर्ष लग जाते हैं । एक और खास बात ये होती है कि शनि मार्गी-वक्री भी होते रहते हैं यानी आगे बढ़ते हुए पीछे भी चलने लगते हैं । जब कि राहु-केतु के साथ ऐसा कदापि नहीं होता । गति के मामले में राहु-केतु सूर्य-चन्द्रमा के ठीक विपरीत हैं, यानी कि सूर्य-चन्द्रमा कभी वक्रीगति नहीं करते और राहु-केतु कभी मार्गी गति नहीं करते । शेष सभी ग्रह वक्री-मार्गी होते रहते हैं । ग्रहों के वक्री-मार्गी होने का रहस्य भी बड़ा अद्भुत है । सच पूछें तो वे वक्री वा मार्गी होते नहीं है, प्रत्युत हमें (पृथ्वी वासियों को) ऐसा प्रतीत होता है । ठीक कुछ-कुछ वैसे ही जैसे एक्सप्रेस ट्रेन और पैसिंजर ट्रेन समान्तर रुप से अलग-अलग ट्रैक पर एक ही दिशा में चलती हुयी किसी स्टेशन पर आगे हो जाये किसी स्टेशन पर पीछे ।  इस रहस्य को स्वतन्त्र रुप से समझना होगा, क्यों कि जरा जटिल विषय है । फिलहाल तो हम राहु-केतु के जंजाल से बाहर आने की बात सोच रहे हैं । अतः उनकी ही चर्चा करें ।

   राहु-केतु छायाग्रह हैं और सदा एक दूसरे के विपरीत यानी १८०डिग्री पर ही रहते हैं । वस्तुतः ये दोनों ग्रहकक्षा में दो संपात विन्दु हैं । खगोलविदों का मानना है कि ऐसे अनेक संपात विन्दु बनते हैं या बन सकते हैं ।  तो क्या अनेक राहु-केतु कहे जायेंगे ? इन बातों की गहन जानकारी के लिए खगोलशास्त्र का अवलोकन करना चाहिए ।

   राहु-केतु की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक रोचक पौराणिक प्रसंग भी है, जिसे कथाक्रम में प्रायः लोग जानते भी हैं ।

  देवासुर संग्राम में देवताओं की सदा हार होती थी । वे मारे भी जाते थे । अतः अमृत प्राप्ति की योजना बनी ताकि अमरत्व प्राप्त हो जाए । किन्तु इस जटिल कार्य में दानवों का साथ लेना अपरिहार्य था । लाचारी भी थी । क्योंकि उनके बिना समुद्र-मन्थन जैसा दुरूह कार्य कदापि सम्भव ही नहीं था । फिर भी देवताओं ने एक कुटिल योजना बनायी । मन्द्राचल को मथानी, कश्चप को  आधार, वासुकि नाग को रस्सी बनाकर सर्पफन की ओर दानवों को और पूंछ की ओर स्वयं देवगण लग गए समुद्र-मन्थन कार्य में । बहुत से दानव तो वासुकि के फुफकार और दंश से ही काल-कवलित हो गए । पर्याप्त श्रम के पश्चात् लक्ष्म्यादि नवरत्नों के अन्त में भगवान धनवन्तरि का उद्भव हुआ अमृत कलश सहित, जिसे पान करने की होड़ लग गयी । उसी क्रम में वेष बदल कर दानव कुलजात सिंहिका-पुत्र राहु भी देवगण की पंक्ति में बैठ गया । बैठा ठीक सूर्य और चन्द्रमा के बीच में । पार्श्व संसर्ग से सशंकित होकर दद्मवेषी राहु को इन दोनों ने पहचान लिया और अमृतपान का झगड़ा मिटाते, अमृतपान कराते विष्णु के मोहिनी रुप को ईंगित भी कर दिया । ऐसा ठीक उस समय हुआ जिस समय राहु दानव की अँजलि में मोहिनी रुपधारी विष्णु द्वारा अमृत उढ़ेला जा चुका था और चट उसे पान करने हेतु अपनी गर्दन भी झुका ली थी राहु ने । अमृत की कुछ बूंदे हलक तक ऊतर चुकी थी । इसी अवस्था में विष्णु ने सुदर्शन चला दिया, जिसके परिणाम स्वरुप राहु का सिर धड़ विहीन हो गया । सुदर्शनचक्र के प्रभाव से सिर कट कर धड़ से विलग तो अवश्य हो गया किन्तु सिर और धड़ दोनों स्वतन्त्र रुप से जीवित रहे, जो आज भी सृष्टि में अपनी धाक जमाये हुए हैं । इनके विरोध में चुंकि सूर्य और चन्द्रमा का विशेष हाथ रहा, इस कारण इनके साथ स्थायी दुश्मनी बन गयी और सूर्य एवं चन्द्रग्रहण के रुप  में इनके स्पर्श की कथाएं पौराणिक चर्चा का विषय बनी हुयी है ।

  अब मूल विषय पर आते हैं । राहु-केतु १८०डिग्री पर सदा भ्रमणशील रहते हैं । इस प्रकार जन्मकुण्डली के द्वादशभाव( ३०डिग्री X १२ भाव = ३६०डिग्री ) को सीधे-सीधे दो समान भागों में  बांट देते हैं। यानी राहु यदि मेष राशि पर हुआ तो निश्चित है कि केतु तुलाराशि पर ही होगा । इस प्रकार राहु-केतु के बीच में (अधीन) कुण्डली के बारह में से सात भाव सदा रहेंगे ही ।  अब ग्रहगति संयोग से यदि किसी भाग के (इन सात के मध्य ही शेष सभी सूर्यादि ग्रह बैठ गए, यानी कि मेष से तुला के अन्दर ही या कहें तुला से मेष के अन्दर ही बैठे होंगे तो इस प्रकार हम कहेंगे कि राहु-केतु अथवा केतु-राहु के गिरफ्त में सभी ग्रह आगए हैं । इन दोनों ही स्थिति में ग्रहों एवं उन-उन भावों पर राहु-केतु का प्रभाव अवश्य पड़ेगा । न ग्रहों की स्वतन्त्र सत्ता रह जायेगी और भावों का ही अपना प्रभुत्व । पापग्रह राहु-केतु वा केतु-राहु ग्रसित सभी ग्रहों का जातक पर पड़ने वाला परिणाम अन्य स्थितियों की तुलना में बिलकुल भिन्न हो जायेगा —ये बात सुनिश्चित है । इसमें कोई दो मत हो ही नहीं सकता ।

   इस प्रकार बनने वाली ग्रह-स्थिति की जन्मकुण्डली ही कालसर्पयोग- कालसर्पदोष ग्रसित कुण्डली कही जाती है । सभी ग्रहों की अपनी-अपनी निर्धारित गतियों के अनुसार कालसर्पयोग बनाने जैसी स्थिति वर्ष में कई बार आती है । किन्तु इसमें मुख्य भूमिका चन्द्रमा की ही होती है, क्यों कि ग्रहकक्षा में ये पृथ्वी से सर्वाधिक समीप हैं । इनकी गति भी सबसे तेज है— निज परिपथ पर ।

   इसे ठीक से समझने हेतु विक्रमाब्द २०७३ के पञ्चाङ्ग का अध्ययन किया । इसमें देखा गया कि  पूरे वर्ष में सात बार ऐसी ग्रह-स्थिति बनी । १७ से २० अगस्त २०१६ के बीच ८१ घंटे १५ मिनट के लिए कालसर्पयोग की स्थिति बनी । इसी भांति आगे  सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर और जनवरी २०१७ (सम्बत् के अन्त-अन्त तक) में भी ऐसी ही स्थितियां बनी । इस विस्तृत कालावधि में जन्म लेने वाले जातक को कालसर्पदोष से पीड़ित होना पड़ा ।  और इस प्रकार बिलकुल स्पष्ट है कि प्रत्येक चान्द्रवर्ष में काफी अधिक संख्या में लोग इस दोष से प्रभावित भी होते ही हैं- यह भी स्वाभाविक है ।

  विभिन्न भावों में मेषादि राशियों को रहने के परिणाम स्वरुप कालसर्पदोष के परिणामों में भी अन्तर कहा गया है और इसे ही कालसर्प के विविध प्रकारों की श्रेणी में रखा गया है । भाव परिवर्तन और भावगत आन्तरिक ग्रह-स्थिति तथा राहु से केतु के बीच व केतु से राहु के बीच बनने वाली अनेक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए कालसर्पदोष के कई स्वरुप और तदनुसार विविध परिणाम भी होंगे ही । जिसकी चर्चा आगे अध्यायों में की जायेगी । अस्तु ।
              
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क्रमशः जारी...