Thursday, 29 May 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-42

                    २०. लक्ष्मणा
         लक्ष्मणा एक सुपरिचित वनस्पति है,जो कटेरी की तरह होता है।डाल,पत्ते,फल सभी वैसे ही होते है।अन्तर सिर्फ फूलों के रंग का है- इसके फूल नीले के वजाय सफेद होते हैं।रेगनी,कंटकारी आदि इसके अन्य प्रचलित नाम हैं।आयुर्वेद में कफ-पित्त शामक औषधियों में इसका उपयोग होता है।आकार भिन्नता से इसके दो प्रकार हैं- बड़ी कटेरी और छोटी कटेरी।कुछ लोगों का विचार है कि लक्ष्मणा इन चारों से भिन्न,विलकुल ही अलग प्रकार की वनस्पति है।आयुर्वेद का प्रसिद्ध औषध- फलघृत का यह विशिष्ट घटक है।
    तान्त्रिक प्रयोग हेतु लक्ष्मणा को ग्रहण करने का विधान अन्य वनस्पतियों की तुलना में थोड़ा निराला है- रविपुष्य(विशेष कर सूर्य के पुष्य नक्षत्र में पड़ने वाले रविवार) योग की पूर्व संध्या को विधिवत जलाक्षतादि से आमंत्रण दे आना चाहिए।फिर अगले दिन(मुहूर्त वाले दिन) ब्रह्ममुहूर्त में अन्य पूजन सामग्रियों के साथ एक सहयोगी और खनन-उपकरण लेकर उस स्थान पर पहुंचे।स्वाभाविक है कि उस वक्त अन्धेरा रहेगा,अतः साथ में रौशनी का साधन भी जरूरी है।पौधे के समीप पहुंच कर पूजन सामग्री पास में रख दें,और स्वयं विलकुल निर्वस्त्र हो जाए।इसी अवस्था में पौधे की पंचोपचार पूजा करें।
   पूजन-मन्त्र- ऊँ नमो भगवते रुद्राय सर्ववदनी त्रैलोक्य कास्तरणी ह्रूँ फट् स्वाहा ।
इस मंत्र को बोलते हुए सभी सामग्री अर्पित करें,और पूजा समाप्ति के पश्चात्  मम कार्यं सिद्धिं कुरु- कुरु स्वाहा- कहते हुए पौधे को समूल ऊखाड़ लें।
   घर लाकर अन्य वनस्पतियों की तरह ही इसे भी शुद्ध जल,गंगाजल आदि से शोधन करके,नवीन पीले वस्त्र के आसन पर रख कर प्राण-प्रतिष्ठा पूर्वक पंचोपचार पूजन करें।पुनः पूर्वोक्त मंत्र का सहस्र जप करें,दशांश होमादि विधान सहित।इस प्रकार प्रयोग के योग्य सिद्ध लक्ष्मणा को सुरक्षित रख दें।
    इस वनस्पति को दीपावली,नवरात्रि आदि विशेष अवसरों पर भी सिद्ध किया जा सकता है।मंत्र और विधान समान ही होगा।हां,विशेषकर दीपावली के अवसर पर सिद्ध किये जाने वाले लक्ष्मणा का प्रयोग काफी महत्त्वपूर्ण होता है। दीपावली की रात्रि में उक्त विधि से पूर्व साधित लक्ष्मणा को पुनः   एक अन्य मंत्र से जागृत करना चाहिए- देवी नवार्ण के तीसरे बीज से।इस मंत्र का कम से कम तीन हजार या अधिक से अधिक नौ हजार जप कर लें।इस क्रिया से उसमें अद्भुत शक्ति आजाती है।
    तान्त्रिक प्रयोग-
v साधित लक्ष्मणा का पंचाग जल में पीस कर गोलियां बना लें।इन गोलियों का प्रयोग आकर्षण और वशीकरण के लिए किया जा सकता है।प्रयोग के समय अमुकं आकर्षय आकर्षय को तीसरे बीज से सम्पुटित कर सात बार उच्चारण करते हुए एक गोली अभीष्ट व्यक्ति को खिला देना चाहिए।
v सन्तान की इच्छा वाली स्त्री मासिक स्नान के पांचवें दिन से प्रारम्भ कर इक्कीश दिन तक नित्य प्रातः-सायं दो-दो गोली उक्त लक्ष्मणा वटी को गोदुग्ध के साथ सेवन करे तो निश्चित ही सुन्दर,सुपुष्ट सन्तान की प्राप्ति होती है।हां यदि पुरुष में भी कोई कमी हो तो उसकी चिकित्सा भी अनिवार्य है।उसे भी यही गोली चौआलिस दिनों तक सेवन कराना चाहिए,साथ ही रोग-लक्षणानुसार इस पुस्तक के अन्य प्रसंग में बतलायी गई तन्त्रौषधियों का प्रयोग भी करना चाहिए।
v साधित लक्ष्मणा-पंचांग के साथ अन्य विशिष्ट वनस्पतियों के मिश्रण से घृतपाक विधान से फलघृत तैयार कर सेवन करने से विभिन्न वन्ध्यत्व दोषों का निवारण होकर सन्तान-सुख प्राप्त होता है।फलघृत की सामग्री-सूची भैषज्यसंग्रग में देखना चाहिए।बाजार में उपलब्ध फलघृत खरीद कर उसे भी नवार्ण एवं मन्मथ मंत्र से साधित कर प्रयोग किया जा सकता है।
v स्वस्थ-सामान्य स्त्री-पुरुष भी साधित लक्ष्मणा पंचांग को चूर्ण या वटी रुप में उक्त विधि से सेवन कर अत्यधिक कामानन्द की प्राप्ति कर सकते हैं।सहवास-सुख में वृद्धि(स्तम्भन,वाजीकरण)
लक्ष्मणा का विशिष्ट गुण है।


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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-41

                                  १९. बहेड़ा
                त्रिफला समूह का एक घटक – बहेड़ा का संस्कृत नाम विभीतक है।हिन्दी में इसे बहेरा कहते हैं। इसका एक तान्त्रिक नाम भूतवृक्ष भी है।मान्यता है कि बहेरा के वृक्ष पर आरुढ़ होकर,अथवा इसके तल में आसन लगाकर साधना करने से विशेष लाभ होता है- क्रिया शीघ्र फलीभूत होती है।इसके विशालकाय वृक्ष जंगलों में बहुतायत से पाये जाते हैं।बहेड़ा के फलों के त्वक भाग को विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयोग किया जाता है।बड़े मटर सदृश कठोर बीज के अन्दर की गिरि का भी औषधीय उपयोग होता है।खाने में कुछ-कुछ चिनियां वादाम जैसा स्वाद होता है इस अन्तः मज्जा का।तन्त्र शास्त्र में बहेड़ा के मूल,त्वक और पत्र भाग का उपयोग किया जाता है।मंत्र शास्त्र में साधना के योग्य निर्दिष्ट अन्य स्थानों के साथ बहेड़े की भी  चर्चा है।किसी जलाशय(नदी-तालाब) के समीप बहेड़ा का वृक्ष हो तो रात्रि में उसके नीचे बैठ कर तान्त्रिक क्रियायें(जपादि) करने से आशातीत सफलता मिलती है।योगिनी और यक्षिणी साधना में बहेड़े की शाखा पर आरुढ़ होकर जप करने का विधान है।समान्य आसन और स्थान की तुलना में विभीतक-शाखारुढ़ साधना अनन्त गुना फलदायी होती है।सीधे विभीतक-साधना भी करने का विधान है- इसमें चयनित विभीतक वृक्ष को ही तान्त्रिक क्रिया द्वारा साधित कर लिया जाता है,जिसका उपयोग साधक अपनी आवश्यकतानुसार करता है।इस प्रकार एक साधित विभीतक वृक्ष से सौकड़ों-हजारों लोगों का कल्याण किया जा सकता है।किन्तु उस साधित वृक्ष की मर्यादा की सुरक्षा एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी हो जाती है- उस साधक के लिए।क्यों कि जाने-अनजाने यदि किसी अन्य व्यक्ति ने उसका प्रयोग कर लिया तो भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।मेरे एक सम्बन्धी सज्जन ने अपने घर के समीप विधिवत तालाब खुदवाया।उसके पिंड पर चारोंओर विभिन्न उपयोगी वनस्पतियों को स्थापित किया।नैऋत्य कोण पर विभीतक वृक्ष लगाये।समुचित विकास के बाद उसकी विधिवत साधना सम्पन्न की।जीवन भर काफी लाभ उठाये- नाम,यश,कीर्ति,लोक कल्याण – सब कुछ बटोरा,किन्तु शरीर थकने पर वृक्ष की मर्यादा का घोर उलंघन हुआ,भारी दुरुपयोग भी;और इसका परिणाम भी सामने आया- रहा न कुल में रोअन हारा।अस्तु।
       किसी भी वनस्पति का सीधे उपयोग करने से उसके औषधीय गुण तो प्राप्त होते ही हैं,किन्तु ग्रहण- मुहूर्त और अन्य विधान के साथ उपयोग करने पर चमत्कारिक रुप से गुणों में वृद्धि हो जाती है- ऐसा हमारे मनीषाओं का अनुभव रहा है।पुराने समय में आयुर्वेदज्ञ इस बात को जानते थे,और सम्यक् रुप से पालन भी करते थे,यही कारण था कि औषधियां बलवती होती थी;किन्तु आज हर वस्तु का वाजारीकरण हो गया है, जिससे मांग बढ़ गयी है,और पूर्ति के लिए नियमों की धज्जियां ऊड़ायी जा रही है।फलतः अविश्वास का बोलबाला है।दूसरी बात है कि लोभ-मोहादि दुर्गुणों का बाहुल्य हो गया है।अनाधिकारियों के हाथ लग कर
वस्तु हो या शास्त्र- अपनी मर्यादा खो चुका है।अतः इन बातों का सदा ध्यान रखना चाहिए।
      बहेड़ा के वृक्ष की साधना विभिन्न(बारहो महीने के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त) नवरात्रियों में करनी चाहिए।किसी खास अंग(मूल,पत्र,फल,त्वकादि) का प्रयोग करना हो तो किसी रविपुष्य,सोमपुष्य का चयन कर लेना चाहिए,जो भद्रादि कुयोग रहित हो।
विशिष्ट मंत्र- ऊँ नमः सर्व भूताधिपतये ग्रस-ग्रस शोषय-शोषय भैरवीं चाज्ञायति स्वाहा
   पूर्व संध्या को जलाक्षतादि सहित निमंत्रण देकर आगामी प्रातः पंचोपचार पूजन करके प्रयोज्यांग ग्रहण करें। अंग-ग्रहण करते समय उक्त मंत्र का निरंतर मानसिक जप चलता रहे।घर लाकर विधिवत- पीत या रक्त नवीन वस्त्र का आसन देकर पुनः पंचोपचार पूजन करे,तदुपरान्त श्री शिवपंचाक्षर मंत्र तथा सोम पंचाक्षर मंत्रों का कम से कम ग्यारह-ग्यारह माला जप करें।पूरे वृक्ष की साधना करनी हो तो उक्त मंत्रों के जप के बाद लागातार चौआलिस दिनों तक देवी नवार्ण मंत्र का जप दशांश होमादि सहित सम्पन्न करना चाहिए।इस प्रकार सिद्ध विभीतक के ऊपर आरुढ़ होकर,अथवा तल में आसन लगाकर यथेष्ट योगिनी मंत्र का जप करना चाहिए।योगिनी साधना के सम्बन्ध में विशेष बातें फिर कभी किसी अन्य पुस्तक में करने का प्रयास करूंगा।
प्रयोगः-
Y     साधित बहेड़ा का पत्ता और जड़ भण्डार,तिजोरी,बक्से आदि में रखने से धन-धान्य की वृद्धि होती है। यह निश्चित प्रभावशाली और सरल प्रयोग है।पांच-सात-नौ पत्ते और थोड़े से मूल भाग पर साधना करके यह प्रयोग किया जा सकता है।
Y     उदर-विकारों- मन्दाग्नि,अपच,उदर-शूल,कोष्टवद्धता, आदि के निवारण में साधित बहेड़ा-मूल का चमत्कारिक लाभ लिया जा सकता है।प्रयोग के लिए अन्य औषधियों की तरह इसे खाना नहीं है,बल्कि खाते समय पवित्र आसन(पीढ़ा,कम्बल आदि)पर बैठ जाये और पुरूष अपनी दायीं जंघा के नीचे,तथा स्त्रियां अपनी वायीं जंघा के नीचे इसके साधित मूल को दबा कर बैठ जायें।भोजन के बाद मूल और आसन दोनों को मर्यादा पूर्वक उठाकर रख दें।पुनः भोजन के वक्त उसका उसी प्रकार उपयोग करें।ऐसा कम से कम सात-नौ या ग्यारह दिन लागातार करना चाहिए।विशेष परिस्थिति में इक्कीश दिन तक भी करना पड़ सकता है।तन्त्र-प्रभाव से भोजन सुपाच्य हो जाता है।प्रभावित अंग की क्रिया-विकृति में शनैः-शनैः सुधार हो जाता है।
Y     धातु क्षीणता के रोगी ताजे बहेड़ा के फलों को एकत्र करें अथवा लाचारी में बाजार से खरीद कर ही लायें।उक्त विधि से साधना सम्पन्न करें।अब तोड़कर फल के त्वक भाग को अलग करलें,और चूर्ण
या क्वाथ के रुप में उसका प्रयोग इक्कीश दिनों तक करें।साथ ही कठोर बीज को भी पुनः फोड़ कर अन्दर की मज्जा को बाहर निकालें।चार-छः मज्जा नित्य प्रातः-सायं गोदुग्ध के साथ सेवन करें।अद्भुत लाभ होगा।

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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-40

                  १८. गोरखमुण्डी
      गोरखमुण्डी एक सुलभप्राप्य वनस्पति है।इसके छोटे-छोटे पौधे गेहूं,जौ,रब्बी आदि के खेतों में बहुतायत से पाये जाते हैं।प्रायः जाड़े में स्वतः उत्पन्न होने वाले ये बड़े घासनुमा पौधे गर्मी आते-आते परिपक्व होजाते हैं।दो-तीन ईंच लम्बी दांतेदार पत्तियों के ऊपरी भाग में, गुच्छों में छोटे-छोटे घुण्डीदार फल लगते हैं,जो वस्तुतः फूल के ही सघन परिवर्तित रुप हैं।ये पौधे यदाकदा जलाशयों के जल सूखजाने के बाद वहाँ भी स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं।आयुर्वेद में रक्तशोधक औषधी के रुप में इसका उपयोग होता है।
     ऐसी मान्यता है कि इसके तान्त्रिक प्रयोगों के जनक तन्त्र गुरू गोरखनाथजी हैं,और उनके नाम पर ही सामान्य मुण्डी गोरखमुण्डी हो गया।पूर्व अध्यायों में वर्णित विधि से इसे ग्रहण करके उपयोग करने से कई लाभ मिलते हैं।
Y     तन्त्र-सिद्ध गोरखमुण्डी को (पंचाग) सुखा कर चूर्ण बनालें।इसे शहद के साथ नित्य प्रातः-सायं एक-एक चम्मच की मात्रा में खाने से बल-वीर्य,स्मरण-क्षमता,चिन्तन और धारणा तथा वाचा-शक्ति का विकास होता है।
Y     इसके चूर्ण को रात भर भिगोकर,सुबह उस जल से सिर धोने से केश-कल्प का कार्य करता है।
Y     गोरखमुण्डी के ताजे स्वरस को शरीर पर लेप करने से ताजगी और स्फूर्ति आती है।त्वचा की सुन्दरता बढ़ती है।
Y     गोरखमुण्डी के चूर्ण को जौ के आटे में मिलाकर(चार-एक की मात्रा में),रोटी बनाकर,गोघृत चुपड़ कर खाने से बल-वीर्य की बृद्धि होकर वुढ़ापे की झुर्रियां मिटती हैं।शरीर कान्तिवान होता है।
Y     गोरखमुण्डी का सेवन दूषित रक्त को स्वच्छ करता है।विभिन्न रक्तविकारों में इसे सेवन करना चाहिए।
उक्त सभी प्रयोग सामान्य औषधि के रुप में भी किये जा सकते हैं,किन्तु तान्त्रिक विधान से ग्रहण करके,साधित करके उपयोग में लाया जाय तो लाभ अधिक होगा यह निश्चित है।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-39

                      १७. अपामार्ग
         अपामार्ग का प्रचलित नाम चिड़चिड़ी है।लटजीरा,चिरचिटा,और ओंगा आदि नामों से भी इसे जाना जाता है।क्षुप जातिय यह एक सर्वसुलभ वनस्पति है,जिसका अंकुरण बरसात के प्रारम्भ में होता है,और कई वर्षों तक पुष्पित-पल्लवित होते रहता है।अंकुरण के दो-ढाई महीने बाद पुष्पित होता है,और जाड़ा आते-आते सभी फूल परिपक्व फल में परिणत हो जाते हैं।फलों के तुष भाग को रगड़ कर अलग करने पर सावां की कन्नी की तरह छोटे-छोटे चावल निकलते हैं,जिनका आयुर्वेद और तन्त्र में विशेष प्रयोग होता है।साधु-संतो के बीच इसका बड़ा ही महत्त्व है,क्यों कि क्षुधा-तृषा पर नियंत्रण रखने में बहुत ही कारगर है। गहरे हरे रंग की एक ईंच गोलाई वाली चिकनी पत्तियां वड़ी मनोहर लगती हैं।ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह की यह संमिधा माना गया है।रंग-भेद से अपामार्ग प्रायः दो प्रकार का होता है- श्वेत और रक्त।सामान्य तौर पर यह भेद स्पष्ट नहीं होता,किन्तु गौर से देखने पर पत्तियों और डंठल में किंचित रंगभेद दीख पड़ता है।इसके पौधे प्रायः एक वर्ष में ही सूख जाते हैं,किन्तु कुछ पौधे कई वर्षों तक पुष्पित-पल्लवित होते हुए भी देखे गये हैं। ये पौधे बड़े और पुराने होने पर झाड़ीनुमा हो जाते हैं ।आयुर्वेद और तन्त्र में इसके पंचागों का अलग-अलग प्रयोग है।
     अपामार्ग को किसी रविपुष्य योग में(भद्रादि रहित) ग्रहण किया जा सकता है,किन्तु सूर्य जब पुष्य नक्षत्र में हों,स वक्त मिलने वाले रवि या सोमवार को ग्रहम करना विशेष लाभदायक माना गया है।कुछ लोग सौर्यपुष्य के बुधवार को भी ग्रहण करना उचित समझते हैं।अन्य वनस्पतियों की तरह (जो पुस्तक के प्रारम्भिक अध्यायों में स्पष्ट है) ही इसे भी पूर्व संध्या को आमंत्रण सहित अगले दिन विधिवत पंचोपचार पूजन कर घर लाना चाहिए। पूरे पौधे को जड़ सहित उखाड़ कर ,घर लाकर हरे रंग के नवीन कपड़े पर आसन देकर पंचोपचार पूजन करना चाहिए।तदुपरान्त श्री शिवपंचाक्षर,सोम पंचाक्षर,एवं बुध पंचाक्षर मंत्रों का कम से कम एक-एक हजार जप- दशांश होमादि सहित सम्पन्न करें।इस प्रकार अब अपामार्ग प्रयोग के योग्य तैयार हो गया।
     अपामार्ग के कतिपय प्रयोगः-
Ø रक्त अपामार्ग के डंठल से नियमित दातुन करने से वाणी में अद्भुत चमत्कार उत्पन्न हो जाता है। प्रयोग-कर्ता की वाचा-सिद्धि हो जाती है।
Ø लाल ओंगा की जड़ को भस्म करके, नियमित गो दुग्घ के साथ एक-एक ग्राम सेवन करने वाले दम्पति को सन्तान सुख की प्राप्ति होती है।
Ø अपामार्ग के बीजो को साफ करके चावल निकाल लें।उन चावलों के दश ग्राम की मात्रा लेकर आठ गुने गोदुग्ध में पूर्णिमा की रात को मिट्टी के नवीन पात्र में पकावे।पूरी पाक-प्रक्रिया में सोमपंचाक्षर का जप मानसिक रुप से चलता रहे।तैयार पाक को चन्द्रमा को नैवेद्य अर्पण करके श्रद्धा-प्रेम सहित ग्रहण करें।इस पाक में अद्भुत क्षमता है।क्षय,दमा जैसी फेफड़े की विभिन्न वीमारियां दो-चार बार के प्रयोग से समूल नष्ट हो जाती हैं।
Ø उक्त विधि से तैयार पाक को ग्रहण करने से बल-वीर्य की बृद्धि के साथ क्षुधा-तृषा पर चमत्कारिक रुप से नियंत्रण होता है।किसी लम्बे अनुष्ठान में इस पाक का प्रयोग किया जा सकता है।एक सुपुष्ट विस्तृत पौधे से दो-सौ ग्राम तक चावल प्राप्त किया जा सकता है,जो की बार प्रयोग करने हेतु पर्याप्त है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को पास में(पर्स आदि में) रखने से अप्रत्याशित धनागम के स्रोत बनते हैं।अन्य कल्याणकारी लाभ भी होते हैं।
Ø  साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को ताबीज में भर कर लाल,पीले या हरे धागे मे गूथकर गले वा वाह में धारण करने से शत्रु,शस्त्र,अन्तरिक्ष आदि से रक्षा होती है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को जल में घिस कर तिलक लगाने से प्रयोग कर्ता में सम्मोहन और आकर्षण गुण आ जाता है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को चूर्ण करके हरे रंग के नवीन कपड़े में लपेट कर वर्तिका बना,तिल तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करे।उस दीपक को एकान्त में रखकर उसकी लौ पर ध्यान केन्द्रित करने से वांछित दृश्य देखे जा सकते हैं।मान लिया किसी चोरी गई वस्तु की,अथवा गुमशुदा व्यक्ति के बारे में हम जानना चाहते हैं,तो इस प्रयोग को किया जा सकता है।आपका ध्यान जितना केन्द्रित होगा, दृश्य और आभास उतना ही स्पष्ट होगा।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को उक्त विधि से दीपक तैयार कर, दीपक के लौ पर कज्जली(काजल) तैयार करे। हांथ के अंगूठे के नाखून पर लेप करके किसी वालक को आहूत करे,और वांछित प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयास करे।अंगूठे पर लगे काजल में झांककर वालक दूरदर्शन के पर्दे की तरह दृश्य देख कर बता सकता है, जो काफी सटीक होता है।इस क्रिया को करने के लिए साबर तन्त्र के कज्जली मंत्र को साध लेना भी आवश्यक है,तभी सही लाभ मिलेगा।वैसे सामान्य आभास इतने मात्र से ही हो जायेगा।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को जल में पीस कर शरीर पर लेप करने से शस्त्राघात का प्रभाव न के बराबर होता है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग की पत्तियों को जल के साथ पीस कर दंशित स्थान पर लेप करने से विच्छु- दंश का कष्ट निवारण होता है।इस प्रयोग में  साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को भी ग्रहण करना चाहिए- इसे आतुर को सुंघाते रहना चाहिए।दोनों प्रयोग एक साथ करने  से शीघ्र लाभ होता है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल और पत्तियों को जल के साथ पीस कर ,अथवा चूर्ण बनाकर एक-एक चम्मच की मात्रा में ग्रहण करने से विभिन्न पितज व्याधियां नष्ट होती हैं।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग पंचाग को आठ गुने जल में डाल कर अष्टमांश क्वाथ बनावे।फिर उस क्वाथ को तैलपाक विधि से तिल तेल में पका कर,सिद्ध तेल को छान कर सुरक्षित रख ले।इसके लेपन का प्रयोग शरीर के अंगों के जल जाने पर ,या अन्य व्रणों के रोपण में करने से आशातीत लाभ होता है।मैंने इस प्रयोग को सैंकड़ों बार किया है- जलने का दाग तक मिट जाता है।त्वचा के अन्याय रोगों में भी इस अपामार्ग तेल का प्रयोग किया जा सकता है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग पंचाग के भस्म को दंत-मंजन की तरह प्रयोग करने से दन्त,जिह्वा,तालु,कंठ-स्वर मंडल आदि के विभिन्न रोगों का नाश होता है।
Ø साधित श्वेत अपामार्ग-मूल को लाल धागे में बांध कर प्रसव-वेदना पीड़िता के कमर में बांध देने से सुख प्रसव हो जाता है।कुछ लोग इस मूल को सीधे योनी में रखने का सुझाव देते हैं,किन्तु व्यवहारिक रुप से यह उचित नहीं प्रतीत होता।मूल को कमर में ही बांधे और ध्यान रहे कि प्रसव होते के साथ,(तत्क्षण) ही कमर से खोल दे,अन्यथा अपनी तीव्र शक्ति के प्रभाव से गर्भाशय को भी बाहर खींच सकता है।

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Friday, 23 May 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-38

                 १६. सहदेई
सहदेई का एक और प्रचलित नाम सहदेवी भी है।क्षुप जातीय बलाचतुष्टय(बला,अतिबला,नागबला, और सहदेई) समूह की यह वनस्पति प्रायः ग्रामीण इलाकों में सर्व सुलभ है,भले ही अज्ञानता वस उपेक्षित    प्रायः है।घास-फूस के श्रेणी में माना जाने वाला सहदेई आयुर्वेद और तन्त्र में बहुत ही उपयोगी है।अनेक प्रकार के लोकोपकारी प्रयोग हैं इसके।
ग्रहण विधि- सर्वप्रथम किसी रविपुष्य योग का चयन करें,जो भद्रादि रहित हो।अब उसके पूर्व संध्या यानी शनिवार की संध्या समय जल-अक्षत और सुपारी लेकर श्रद्धा पूर्वक उक्त वनस्पति के समीप जाकर निवेदन करें - " कल प्रातः लोक-कल्याणार्थ मैं आपको अपने घर ले चलूंगा।" और अगले दिन प्रातःकाल शुचिता पूर्वक उसे उखाड़ कर घर ले आयें।ध्यातव्य है कि ग्रहण से लेकर घर पहुंचने पर्यन्त निम्नांकित मन्त्र का सम्यक् उच्चारण करते रहना चाहिए।मार्ग में किसी से बातचीत न हो।एकाग्रता और उद्देश्य-स्मरण सतत जारी रहे।
मन्त्र- ऊँ नमो रूपावर्ती सर्वप्रोतेति श्री सर्वजनरंजनी सर्वलोक वशकरणी सर्वसुखरंजनी महामाईल घोल थी कुरुकुरु स्वाहा। (यह एक का साबर मंत्र है,अतः भाषायी विचार में न उलझें)
घर आकर सहदेई पंचाग को पवित्र जल से धो कर पुनः पंचामृत स्नान,एवं शुद्ध स्नानादि क्रिया सम्पन्न करें, तथा पंचोपचार वा षोडशोपचार पूजनोपरान्त उक्त मंत्र का अष्टोत्तर सहस्र जप भी सम्पन्न करें। पूरी क्रिया बिलकुल एकान्त में, और गोपनीय ढंग से सम्पन्न करने का हर सम्भव प्रयास करें।क्रियात्मक तन्मयता के साथ-साथ दृष्टि-दोष से भी बचना जरुरी है।
सूर्य-चन्द्रादि ग्रहण,विभिन्न नवरात्रियाँ, खरमास रहित किसी भी महीने की आमावश्या आदि काल में रविपुष्य योग मिल जाये तो अति उत्तम,या फिर सूर्य के पुष्य नक्षत्र में आने पर जो शुद्ध रविवार मिले उसे भी सहदेई-साधना के लिए ग्रहण किया जा सकता है।
साधित सहदेई के विभिन्न तान्त्रिक प्रयोग-
v सहदेई के मूल भाग को लाल वस्त्र में वेष्ठित कर तिजोरी,आलमीरे या अन्नागार में स्थापित करने से अन्न-धनादि की वृद्धि होती है।पुराणों में विभिन्न अक्षय पात्रों की चर्चायें मिलती हैं। वहां भी कुछ ऐसा ही चमत्कार-योग है।
v सहदेई के मूल को गंगाजल में घिसकर नेत्रों में अञ्जन करने से प्रयोगकर्ता की दृष्टि में सम्मोहन-क्षमता आ जाती है।
v सहदेई के मूल को तिल तेल में घिस कर प्रसव-वेदना-ग्रस्त स्त्री की योनि पर लेप करने से शीघ्र ही प्रसव-पीड़ा सुख-प्रसव में बदल जाती है,यानी प्रसव हो जाता है।
v सहदेई के मूल को लाल धागे में बांध कर प्रसव-वेदना-ग्रस्त स्त्री के कमर में बांध देने से शीघ्र ही प्रसव-पीड़ा सुख-प्रसव में बदल जाती है,यानी प्रसव हो जाता है।ध्यातव्य है कि प्रसव होते ही कमर में बंधा मूल यथाशीघ्र खोल कर रख दें,और बाद में कहीं विसर्जित कर दें।
v साधित सहदेई-पंचाग को चूर्ण करके गोघृत के साथ मासिक धर्म से पांच दिन पूर्व से प्रारम्भ कर पांच दिन बाद तक(पांच-छः महीने तक) सेवन करने से सन्तान-सुख प्राप्त होता है।
v साधित सहदेई-पंचाग को चूर्ण करके पान में डाल कर गुप्त रुप से सेवन करा देने से अभीष्ट व्यक्ति साधक के वशीभूत हो जाता है।
v साधित सहदेई-पंचाग को चूर्ण करके जल-मिश्रित तिलक लगाने से प्रयोगकर्ता के मान-प्रतिष्ठा की बृद्धि होती है।सामाजिक-प्रतिष्ठा-लाभ के लिए यह अद्भुत प्रयोग है।
v साधित सहदेई-मूल को लाल धागे में बांध कर बालक के गले में ताबीज की तरह पहना देने से थोड़े ही दिनों में गण्डमाला रोग नष्ट हो जाता है।
v सहदेई को विधिवत ग्रहण कर घर के वायव्य वा ईशान क्षेत्र में जमीन वा गमले में स्थापित कर नित्य पूजन कर कम से कम एक माला पूर्व कथित मन्त्र का जप करते रहने से गृह-कलहादि की शान्ति होती है,और वास्तु दोषों का निवारण होता है।
v साधित सहदेई-पंचाग को चूर्ण करके गोदुग्ध अथवा जल के साथ नित्य सेवन करने से स्त्रियों के श्वेत प्रदर एवं रक्त प्रदर में अद्भुत लाभ होता है।
v सहदेई के अन्य आयुर्वेदिक प्रयोगों को आयुर्वेद-ग्रन्थों में देखना चाहिए।बस सिर्फ इस बात का ध्यान रखना है कि प्रयोग करने के लिए साधित सहदेई का ही उपयोग हो ताकि अधिक लाभार्जन हो।
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Thursday, 22 May 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-37

                        १५. विजया
             
विजया का प्रचलित नाम भांग(भंग) है।इसका एक व्यंगोक्ति नाम शिवप्रिया भी है- क्यों कि शिव को विशेष प्रिय है।शिवाराधन में अन्य पूजनोपचारों के साथ विल्वपत्र और विजया अनिवार्य है। विल्वपत्र का प्रयोग तो अन्य देवों के पूजन में भी होता है,किन्तु विजया एकमात्र शिवप्रिया ही है।प्रायः सर्व सुलभ क्षुप जातीय इस वनस्पति के रोपण हेतु सरकारी आज्ञापत्र की आवश्यकता होती है,क्यों कि इसके सर्वांग में मादकता गुण है।वैसे जंगली वूटियों की तरह प्रायः जहां-तहां अवांछित रुप से उग भी जाता है।भांग की पत्तियों को पीस कर गोली बनाकर या शर्बत के रुप में लोग पीते हैं।नशे के विभिन्न पदार्थों में विजया का  नशा अपने आप में अनूठा ही है।वैसे यह शाही घरानों से जुड़ा रहा है।विजया का प्रयोग आयुर्वेद के विभिन्न औषधियों में होता है।इसके कुछ तान्त्रिक प्रयोग भी हैं,जो खासकर स्वास्थ्य से ही सम्बन्धित हैं। भांग को एक खास विधि से खास समय में प्रयोग करने से गुण में काफि वृद्धि हो जाती है।प्रयोग पूर्व की विधि अन्याय वनस्पतियों जैसी ही है।
        बाजार से यथेष्ठ मात्रा में भांग की सूखी पत्तियाँ खरीद लायें।उतित होगा कि यह कार्य श्रावण महीने में किसी सोमवार को किया जाय।झाड़-पोंछ कर स्वच्छ करने के बाद नवीन लाल वस्त्र का आसन देकर स्थापित करें और कम से कम ग्यारह हजार शिव पंचाक्षर मंत्र का जप करें।जप के पूर्व शिव की पंचोपचार पूजन अवश्य कर लें।साथ ही भांग की पोटली की भी पूजा करें- उसमें शिव को आवाहित करके।इस प्रकार प्रयोग के लिए बूटी तैयार हो गयी।
       भांग के प्रयोग के लिए कुछ सहयोगी घटक भी अनिवार्य हैं, यथा- सौंफ,कागजी बादाम,काली मिर्च, छोटी इलाइची,गुलाब की पंखुड़ियां,केसर,दूध और शक्कर(मिश्री)। भांग की मात्रा (सामान्य जन के लिए) नित्य एक ग्राम से अधिक नहीं हो।वैसे नशे के आदि लोग तो पांच से दश ग्राम तक सेवन कर लेते हैं।पर यह उचित नहीं है।समुचित मात्रा में साधित विजया का नियमित प्रयोग मेधा शक्ति को बढ़ाने में काफी कारगर है। साल के बारह महीनों में विजया प्रयोग के लिए अलग-अलग अनुपान का महत्व तन्त्रात्मक आयुर्वेद में बतलाया गया है,जो निम्नलिखित हैं-
*   चैत्र- ऊपर निर्दिष्ट घटकों के साथ प्रयोग करें। चिन्तन,धारणा,स्मरण-शक्ति को विजया से काफी बल मिलता है।
*   वैशाख- ऊपर निर्दिष्ट घटकों के साथ प्रयोग करें। चिन्तन,धारणा,स्मरण-शक्ति के लिए गुणकारी है।स्नायु संस्थान के लिए अति उत्तम है।
*   ज्येष्ठ- इस महीने में उक्त घटकों के साथ विजया-पेय तैयार कर, सूर्योदय के जितने समीप ग्रहण कर सके, उतना लाभदायी है- शारीरिक बल-कान्ति-सौन्दर्य के लिए।
*   आषाढ़- इस महीने में विजया का नियमित सेवन केश-कल्प का कार्य करता है।प्रयोग की विधि बदल जाती है।उक्त महीनों की तरह पेय के रुप में न लेकर,चूर्ण के रुप में लेना चाहिए साथ में चित्रक का चूर्ण भी समान मात्रा में मिलाकर धारोष्ण दूध या सामान्य गरम दूध के साथ लेना चाहिए।
*   श्रावण- इस महीने में विजया-चूर्ण के साथ शिवलिंगी-बीज के चूर्ण को मिलाकर दूध या उक्त घटक के साथ पेय के रुप में सेवन करने से बल-वीर्य-कान्ति की बृद्धि होती है।(शिवलिंगी के सम्बन्ध में विशेष जानकारी शिवलिंगी अध्याय में देखें)।
*   भादो- इस महीने में विजया-चूर्ण को रुदन्ती-फल-चूर्ण के साथ समान मात्रा में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से मानसिक अशान्ति दूर होकर चित्त की एकाग्रता में बृद्धि होती है।सुविधा के लिए इसे गोली बनाकर भी उपयोग किया जा सकता है।
*   आश्विन- इस महीने में विजया के पत्तों को समान मात्रा में ज्योतिष्मति(मालकांगनी) के साथ चूर्ण बनाकर दुग्ध के साथ सेवन करने से तेजबल की बृद्धि होती है।
*   कार्तिक- इस महीने में विजया के पत्तों को समान मात्रा में ज्योतिष्मति(मालकांगनी) के साथ चूर्ण बनाकर बकरी के दूध के साथ सेवन करने से तेजबल की बृद्धि होती है।यानी अन्य बातें वही रही जो आश्वन की थी,किन्तु अनुपान बदल गया।ध्यातव्य है कि आयुर्वेद में अनुपान-भेद से एक ही औषधि अनेक रोगों में प्रयुक्त होती है।तन्त्र में भी क्रिया भेद से प्रयोग और प्रभाव में अन्तर हो जाता है।
*   अगहन- इस महीने में विजया-चूर्ण को घी और मिश्री के साथ सेवन करने से समस्त नेत्र रोगों में लाभ होता है।स्वस्थ व्यक्ति भी नेत्र-ज्योति की रक्षा के लिए इस प्रयोग को कर सकते हैं।
*   पौष- इस महीने में विजया-चूर्ण को काले तिल के चूर्ण के साथ सेवन करने से नेत्र-ज्योति बढ़ती है।अनुपान गरम जल का होना चाहिए।कुछ लोग दूध का अनुपान सही बताते हैं,किन्तु मेरे विचार से काले तिल के साथ दूध सर्वथा वर्जित होना चाहिए।इससे एक लाभ तो हो जायेगा,पर अनेक हानि के द्वार भी खुलेंगे।अतः इस निषेध का ध्यान रखना जरुरी है।
*   माघ- इस महीने में विजया-चूर्ण को नागरमोथा-चूर्ण के साथ मिलाकर दूध या गरम जल से सेवन करना चाहिए।इससे शरीर का भार बढ़ता है(मोटे लोग इसका प्रयोग न करें)।
*   फाल्गुन- इस महीने में विजया को चार गुने आंवले के साथ मिलाकर चूर्ण बनाकर,गरम जल के साथ सेवन करने से अद्भुत स्फूर्ति आती है।वात,रक्त,नाड़ी सभी संस्थानों का शोधन होकर शरीर कान्ति-शक्तिवान होता है।
इस प्रकार साल के बारह महीनों में अलग-अलग घटकों और अनुपान भेद से विजया कल्प का प्रयोग किया जा सकता है।

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Wednesday, 21 May 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-36

                     १४.नागदमनी 
    
   वनस्पति-जगत में अनेकानेक पौधे हैं,जिन सबका विस्तृत गुण-धर्म-संकलन किसी एक भाषा की पुस्तक में एकत्र कर देना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। आयुर्वेद का निघण्टु संग्रह काफी हद तक इस क्षेत्र में काम किया है।आधुनिक वनस्पति विज्ञान भी नित  नूतन शोध में जुटा है;किन्तु मुझे लगता है कि पुराने को ही नये अन्दाज में देखने भर-का जितना प्रयास किया जा रहा है- उतना किसी नये पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।असंख्य वनस्पतियाँ अभी भी उपेक्षित हैं हमारे चारों ओर।नागदमनी भी कुछ वैसा ही वनस्पति है।
   अपनी हरीतिमा और दण्डाकार संरचना में शोभायमान नागदमनी महज बाढ़ लगाने के काम तक सिमट कर रह गया है।कहीं-कहीं एकाध गमले में भी दीख पड़ता है।नागदमनी के पत्ते गहरे हरे रंग के,तनिक लंबाई वाले,तदनुसार चौड़ाई भी थोड़ी ही- ऊर्ध्वमुखी शाखाओं पर अल्प संख्या में ही होते हैं।कम जल और किसी भी वातावरण में जीवित रहने वाला नागदमनी के डंठल को तोड़-काट कर भी आसानी से लगाया जा सकता है।एक और विशेषता यह भी है कि पशु इसे खाते नहीं- यही कारण है कि घेरेबन्दी में सुरक्षित-उपयोग होता है।नागदमन,दर्पदमन,नागपुष्पी,वनकुमारी के साथ सर्पदमन नाम से भी जाना जाता है।मान्यता है कि इसके आसपास सर्प नहीं आते।यही कारण है कि जानकार लोग गमलों में सम्मान पूर्वक स्थान देते हैं।तन्त्र-ग्रन्थों में महायोगेश्वरी नाम से ख्यात है।

प्रायोगिकक्रिया- 

    रविपुष्य योग में नागदमनी की जड़ विधिवत(पूर्व अध्यायों में कथित विधि से) ग्रहण कर जलादि शुद्धि-संस्कार करके नवीन लाल वस्त्र का आसन देकर पीठिका पर स्थापित कर यथोपचार पूजन करना चाहिए।पूजन के पश्चात् कम से कम ग्यारह माला श्री शिवपंचाक्षर मंत्र एवं नौ माला देवी नवार्ण मंत्र का जप कर,पुनः पंचोपचार पूजन करना चाहिए।तथा सामान्य साकल्य(काला तिल,तदर्घ चावल,तदर्ध जौ,तदर्घ गूड़, तदर्ध घृत) से कम से कम अष्टोत्तरशत तततत मंत्रो से होम भी अवश्य करें।इतनी क्रिया से तान्त्रिक प्रयोग के लिए नामदमनी तैयार हो गया।इसके प्रयोग अति सीमित हैं।यथा-
Ø मेधा-शक्ति-वर्धन- मन्दबुद्धि बालकों को साधित नामदमनी मूल को भद्रादि रहित किसी रविवार या मंगलवार को ताबीज में भर कर लाल धागे में पिरोकर गले या बांह में बांध देने से अद्भुत लाभ होता है।सामान्य बालकों के बौद्धिक विकास हेतु भी यह प्रयोग किया जा सकता है।
Ø सम्मान-यश-विजय-प्राप्ति हेतु- आये दिन हम देखते हैं कि अकारण ही प्रायः लोगों को अयश और असम्मान का सामना करना पड़ता है।हालाकि उसके अनेक कारण हैं।कारण चाहे जो भी हों,ऐसी स्थिति में नामदमनी का प्रयोग बड़ा ही लाभकारक होता है।करना सिर्फ यही है जो ऊपर के प्रयोग में बतला आए हैं- यानी ताबीज में भर कर धारण मात्र।
Ø धन-वृद्धि हेतु-  रविपुष्य योग में आमन्त्रण विधि से(पूर्व अध्यायों में वर्णित) नागदमनी का पौधा घर में ले आयें और नये गमले में रोपण करके,ऊपर बतलायी गयी विधि से स्थापन पूजन-जप-होमादि सम्पन्न करें।(ध्यातव्य है कि गमले में रोपण करने से पूर्व थोड़ा सा मूलभाग तोड़कर अलग रख लें,और सारी विधियाँ साथ-साथ उसके लिए भी करते जाएं)।इस प्रकार साधित नामदमनी के पौधे को घर के मध्योत्तर भाग में स्थापित कर दें और नित्य जलार्पण कर प्रणाम करके,कम से कम एक माला श्री महालक्ष्मी मंत्र का जप सुविधानुसार खड़े या बैठ कर कर लिया करें।साधित जड़ को ताबीज में भर कर लाल धागे में पिरोकर गले या बांह में बांध लें।आप अनुभव करेंगे कि थोड़े ही दिनों में धनागम के नये स्रोत खुल रहे हैं,साथ ही पहले के होते आरहे धन का प्रतिकूल प्रवाह भी रुक गया है।
Ø ग्रह-दोष-निवारण- उक्त विधान से साधित नागदमनी की जड़ को ताबीज में भरकर धारण करन से विभिन्न ग्रहदोषों का निवारण होता है,साथ ही अन्तरिक्ष वाधाओं का भी शमन होता है।घर में पूर्व विधि से स्थापित करने से मकान पर पड़ने वाला ग्रहों का प्रतिकूल प्रभाव भी नष्ट होता है।ध्यातव्य है कि मकान की रक्षा के लिए नागदमनी का स्थापन-पूजन तो पूर्व विधि से ही होगा,किन्तु गमले का स्थान मुख्य द्वार की सीध में होना आवश्यक है।सुविधा हो तो मुख्य द्वार के दोनों ओर एक-एक गमले रख सकते हैं।दूसरी बात ध्यान में रखने योग्य है कि यदि पहले से आपका मकान भूत-प्रेत-वाधाओं से ग्रसित है,तो वैसी स्थिति में नागदमनी की स्थापना के पूर्व विशेष जानकार वास्तुशास्त्री से परीक्षण कराकर,शान्तिकर्म अवश्य करा लें,अन्यथा उलटा प्रभाव हो सकता है।इस बात को यों समझें कि घर में अवांक्षित का प्रवेश है यदि, तो पहले उसे बाहर करलें,तब दरवाजा बन्द करें।नामदमनी का सुरक्षा कवच अपनी स्थापना के बाद अवांछित को आने नहीं देगा,किन्तु पहले से जो घर में उपस्थित है उसे बाहर नहीं करेगा,और दूसरी ओर मुख्यद्वार नागदमनी-कवच से अवरुद्ध हो जाने के कारण अवांछित पदार्थ चाह कर भी बाहर नहीं निकल पायेगा।परिणाम यह होगा कि वह घर के अन्दर ही उतपात मचाता रहेगा।अतः सावधानी से इसका प्रयोग करना चाहिए।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-35



                           १३. कपूर
       कपूर,कर्पूर,काफूर,कैम्फर(Cinnamomum Camphora)--)---एक अति सुगन्धित, अति ज्वलनशील,उड़नशील, स्वेत-दानेदार पदार्थ है।वस्तुतः यह, 
 Cinnamomum camphorCinnamomum camphora)---एक अति सुगन्धित, अति ज्वलनशील,उड़नशील, स्वेत-दानेदार पदार्थ है।वस्तुतः यह,एक अति सुगन्धित, अति ज्वलनशील,उड़नशील, स्वेत-दानेदार पदार्थ है। यह विशालकाय, बहुवर्षायु लगभग सदावहार वृक्ष का रवादार सत्त्व है,जो वृक्ष के लगभग समग्र भाग से प्राप्त किया जाता है।इसका वृक्ष एशिया के विभिन्न भागों में पाया जाता है।भारत,श्रीलंका,चीन, जापान,मलेशिया,कोरिया,ताइवान,इन्डोनेशिया आदि देशों में बहुतायत से पाया जाता है।अन्य देशों में भी यहीं से ले जाया गया है।कपूर का वृक्ष 100 फीट से भी ऊँचे आकार का पाया जाता है।इसी तरह आयु में भी हजारों वर्ष पुराने वृक्ष पाये गये हैं।इसके सुन्दर अति सुगन्धित पुष्प और मनमोहक फल तथा पत्तियाँ बरबस ही अपनी ओर आकृष्ट करते हैं।यही कारण है कि कहीं-कहीं इसे श्रृंगारिक वृक्ष के रुप में भी अपनाया गया है।पत्तियाँ बड़ी सुन्दर,चिकनी,मोमी, लालीमायुक्त हरापन लिए होती हैं,जो आकार में- आठ से पन्द्रह सें.मी. लम्बी और तीन से सात सें.मी.चौड़ी होती हैं।कुछ पत्तियाँ किंचित गोलाकार भी होती हैं।वसन्त ऋतु में छोटे-छोटे अति सुगन्धित फूल लगते हैं।इसके फल भी बड़े मोहक होते हैं- वेरी की तरह,जिन्हें पक्षियों द्वारा खाने और यहाँ-वहाँ विखेरने के कारण मूल बृक्ष से सुदूर इलाके तक बीजों का स्थानान्तरण और तदुपरान्त समय पर अंकुरण होता है। कपूर वृक्ष की लकड़ियाँ सुन्दर फर्नीचर के काम में भी लायी जाती हैं,जो काफी मजबूत और टिकाऊ होती हैं।प्रौढ़ पौधे से प्राप्त लकड़ियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर,तेज ताप पर उबाला जाता है।फिर वाष्पीकरण और शीतलीकरण विधि से रवादार (crystalline substance ) बनाया जाता है।इसके अलावे अर्क और तेल भी बनाया जाता है;जिसका प्रयोग प्रसाधन एवं औषधी कार्यों में बहुतायत से होता है।आयुर्वेद में इसके अनेक औषधीय प्रयोगों का वर्णन है।अंग्रेजी और होमियोपैथी दवाइयों में भी कपूर का प्रयोग होता है।कपूर उच्चकोटि का कीटाणुनाशक,व्रणरोपक,ज्वरघ्न,शोथ-कोथहर,अतिसारहर,दर्द निवारक पदार्थ है।यह शीतवीर्य है। यानी ताशीर ठंढा है।विशेष मात्रा में सेवन से किंचित विषाक्त भी है।भारतीय कर्मकांड और तन्त्र में तो कपूर रसाबसा है ही।आजकल मिलावटी सामानों का बोलबाला है।दुष्ट व्यापारी इसके दानों में मोम डाल कर मोटी पपड़ीदार बना कर बेचते हैं।मोम के मिलावट से इसकी गुणवत्ता में काफी कमी आजाती है।किन्तु एक लाभ यह होता है कि इसकी उड़नशीलता में कमी आजाती है।वैसे उचित है कि कपूर को निर्वात (airtite) डब्बे में रखा जाय,और साथ में लौंग या गोलमिर्च डाल दिया जाय।इससे उड़ने की क्षमता न के बराबर होजाती है। कपूर को जलाने पर भारी मात्रा में काला धुआं(कार्बन)निकलता है।स्त्रियाँ हल्दी-चूर्ण के साथ कपूर को मिलाकर स्वच्छ कपड़ें में लपेटकर वर्तिका बना,तिलतेल या घृत दीप प्रज्ज्वलित कर कपूर-कज्जली को एकत्र कर लेती हैं।पुनः उस कज्जली में यथेष्टमात्रा में शुद्ध घृत मिश्रित कर जलधार देकर बारम्बार लेपन कर विकार-मुक्त बनाकर आंखों में लगाने हेतु काजल बनाती हैं।हल्दी-कपूर-घृत निर्मित यह कज्जली आंखों के लिए बड़ा ही गुणकारी है।
·       कपूर के विभिन्न प्रयोग-  
·       १) कपूर एक सात्त्विक पदार्थ है।तन्त्र-साधना में सात्त्विक कार्यों के लिए ही इसका विशेष प्रयोग किया जाता है।विभिन्न प्रकार के लेप और तिलक तैयार करने में कपूर का उपयोग होता है।आरती-दीप,हवनादि में भी उपयुक्त है।देवाराधन में अन्यान्य उपचारों के बाद घृतवर्तिका के वजाय कर्पूर की आरती अति महत्त्वपूर्ण माना जाता है।श्रीयन्त्र या अन्याय यंत्र-लेखन में(ध्यातब्य है कि अलग-अलग देवताओं के अष्टगन्घ भी अलग-अलग होते हैं) मसी (स्याही) निर्माण में कर्पूर का प्रयोग आवश्यक है।मसी निर्माण में कपूर मिला देने से क्रिया की गुणवत्ता बेहद बढ़ जाती है।वस्तु की तान्त्रिक गुणवत्ता में भी वढोत्तरी हो जाती है।किसी भी अनुष्ठान-पूजा-साधना में जैसे धूना या लोहवान का प्रयोग कहा गया है,वैसे ही मेरे विचार से पूजा-स्थान के आसपास कर्पूर प्रज्ज्वलित कर देना अति लाभकारी होता है।कपूर को हाथों से मसलकर आसपास विखेर देने से भी वातावरण की शुद्धि हो जाती है। पूजा-क्रम में कई बार कपूर का प्रयोग किया जाना चाहिए- प्रारम्भिक स्थान शोधन,प्रज्ज्वलन,तिलक और मसी निर्माण,जलपात्र शोधन,मुखशुद्दि ताम्बूलादि सहित,और अन्त में आरार्तिक अर्पण।
·       २) वास्तु-दोष निवारण के लिए पीले वस्त्र में वेष्ठित कर कपूर की पोटली को घर के चारों कोनों और मध्य में समुचित स्थान पर टांग देना चाहिए।
·       ३) आकर्षण-प्रयोगों के अन्तर्गत किसी मृतात्मा को आहूत करने के लिए सर्वप्रथम कक्ष में कपूर की धूल को विखेर देना चाहिए।तदुपरान्त कपूर का दीपक जला कर रख दें।कपूर के निकला धूम मृत प्राणियों को विशेष प्रिय है।ध्यातव्य है कि प्रेत-आवेशित व्यक्ति को कपूर से कष्ट होता है।प्रतांशा-प्रभाव –जांच हेतु यह नुस्खा अपनाया जा सकता है।मृतात्मा को आहूत कर मनोवांछित वार्ता का विधान भी तन्त्र का विषय है।इस क्रिया को अलग से मैं अपने संग्रह में स्थान दूंगा।जिज्ञासुओं को वहीं से ग्रहण करना चाहिए।
·       ४) यन्त्र-लेखन प्रायः भोजपत्र(वृक्ष विशेष की छाल) पर किया जाता है।यन्त्र-लेखन में प्रयुक्त मसी में कपूर का मिश्रण अवश्य करना चाहिए।कपूर को जलाकर उसकी कज्जली को घृत मिश्रित करके भी मसी तैयार की जाती है।शनि-यन्त्र-लेखन में कपूर-कज्जली का उपयोग विशेष प्रभावशाली होता है। स्थायित्व की दृष्टि से ताम्रादि धातुओं पर उत्कीर्ण विभिन्न यन्त्रों का विशेष महत्त्व है।यहाँ यन्त्र-लेखन की बात तो नहीं आती,किन्तु यन्त्र-पूजन में अष्टगन्ध निर्माण करते समय कपूर अवश्य उपयोग करना चाहिए।इससे यन्त्र की ऊर्जा में विकाश होता है।
·       ५) हस्तरेखा विशेषज्ञों द्वारा कपूर-कज्जली का उपयोग किया जाता है।

कपूर-कज्जली अथवा अष्टगन्ध निर्माण के लिए कोई भी आमावश्या(विशेष कर दीपावली) का शुभ मुहूर्त चयन करना चाहिए।रविपुष्य,गुरुपुष्यादि योग भी श्रेयष्कर हैं।विजय की कामना से देवी-अष्टगन्ध का निर्माण विजयादशमी को सायंकाल में करना उत्तम है।अन्य (या मिश्रित) उद्देश्य हेतु नवरात्रि के किसी दिनों में किया जा सकता है।
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