Wednesday, 27 September 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- सत्रहवां भाग

गतांश से आगे....

          १२.    ऐतिहासिक शिलालेखीय प्रमाण

 मेरे पूज्य पितृव्य पं.बालमुकुन्द पाठक जी (व्याकरणादिअष्टतीर्थ) (साधना-भूमि काशी, और कर्मभूमि कलकत्ता) के परम मित्र, वेद-व्याकरणतीर्थ पं.विश्वनाथ शास्त्रीजी (कलकत्ता) के दर्शन का सौभाग्य किशोरावस्था में ही प्राप्त हुआ था । उनसे समय-समय पर काफी कुछ जानकारियां मिली थी । अपने स्मृतिगह्वर से, तथा पूर्वजों के धरोहर से कुछ निकालने के प्रयास में हूँ । उसकी कुछ बानगी यहाँ प्रस्तुत हैः-
१)—मि.कनिंघम (सुख्यात अंग्रेज अफसर) को गया जिले के गोविन्दरपुर ग्राम से शक संवत् १०५९ (वर्तमान शक १९३९) यानी अब से ८८० वर्ष पूर्व का एक शिलालेख मिला था, जो कलकत्ता अजायबघर में सुरक्षित है, जिसका विशद विवरण कनिंघम आर्कियोलॉजी सर्वे रिपोर्ट के सोलहवें भाग में दर्ज है - में मगब्राह्मणों के सम्बन्ध में १४३ पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं, जिनका किंचित उपलब्ध  अंश मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ –
देवोजीयात्रिलोकीमणिरयमरुणोयन्निवासेन पुण्यः शाकद्वीप सदुग्धाम्बुनिधिबलयितो यत्रविप्रोमगाख्या वंशस्तत्रद्विजानां भ्रमि लिखित तनोर्भास्वतः स्वाङ्ग(जातः)शाम्बो यामानिनायस्वयमिह महितास्ते जगत्यांजयन्ति तेषां यः प्रथमः समस्त निगम ज्ञानात्म विद्यापदं बुद्ध्या व्यापृत एव नित्ययजन व्यापार पारीनया पूर्वेस्तयोभिरथ सुप्तसवैर्यशोभिः यत्रापरे परमतत्व विदोडन विद्यावदातमतयः पतयोः द्विजानाम।नन्देषुव्योमेन्दु(१०५९) समे शकाब्दे रुद्रात्मजश्चोद्धरगस्यनप्त्वा।इमां शिलां शिल्पिवरः प्रशस्तिं स शूलपाणिः स्वयमुच्चरेवान।।  
         अर्थात् देवताओं के आदिदेव तीनों लोकों के मणिमय हैं, उन अरुण देवता का जय जयकार हो। वह  अपने निवास से जिस स्थान को पवित्र करते हैं, वह शाकद्वीप दुग्ध सागर से घिरा है। उस शाकद्वीप के ब्राह्मण मग नाम से जगत में प्रसिद्ध हैं । ये मग ब्राह्मण चक्र द्वारा छंटवाये गये- भगवान सूर्य के तेज से(अमैथुनी)आविर्भूत हुए हैं। ये मग ब्राह्मण विमान द्वारा शाम्ब से बुलवाये गये हैं। ये अपने आत्मतेज से सर्वदा जय-युक्त होते हैं। ये लोग अपनी विद्या,तपस्या और प्रगतिकारी अपने यशों से सुशोभित पहले से ही होते आये हैं । जिन मगों से बचा हुआ कोई भी तत्त्ववाद का रहस्य नहीं है । विद्या, विनय और विवेक में ये द्विजातियों के स्वामी हैं । ये लोग नीति-निपुण,व्यवहार-कुशल और क्रियाकाण्ड(कर्मकाण्ड) के विलक्षण पारदर्शी हैं। इस शिलालेख के उद्धरण न्यस्तकारी रुद्रतनय शूलपाणि ने इसे शकसंवत् १०५९में उत्कीर्ण कराया है। इति।।
साभार- पं.विश्वनाथशास्त्रीसंग्रह, श्री गोपाल पुस्तकालय, मैनपुरा, अरवल,बिहार

२)— मगोत्कर्ष विवरण-प्रसंग में पं.विश्वनाथशास्त्रीजी का एक लेख मिला है —

                 ऐतिहासिक सत्य के शाकद्वीपीय ब्राह्मण

भारत,पाकिस्तान,नेपाल में वर्तमान में हम शाकद्वीपीय सनातन वैदिक ब्राह्मण पाते हैं। इनका प्रमाणिक इतिहास मिलता है। पन्द्रह सौ से अधिक वर्ष पूर्व जीवितगुप्त (द्वितीय) के समय का एक शिलालेख है,जिसमें लिखा गया है कि मगधदेश (बिहार)के गया जिले(सम्प्रति औरंगावाद जिला) के देववरुणार्क ग्राम के सूर्य मन्दिर की पूजा-अर्चना हेतु भोजक नाम शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्यमित्र को देवोत्तर भूमि दी गयी थी। गुप्तकाल का शासन नष्ट होने पर बालादित्यदेव ने भी भोजक सूर्यमित्र (ध्यातव्य है कि भोजक शाकद्वीपीय का पर्याय है) को उक्त ग्राम देवोत्तर रुप में प्रदान किया । बालादित्यदेव के बाद वर्मन राजाओं का अधिकार हुआ । वर्मन राजाओं ने भी उक्त भूमि को ज्यों का त्यों रहने दिया । बाद में महाराज सर्ववर्मा (वर्मनराजा) ने उक्त देवोत्तर भूमि को भोजक हंसमित्र को समर्पित किया । उसके बाद राजा अवन्तीवर्मा ने भोजक ब्राह्मण ऋषिमित्र को दिया । शिलालेख के क्रमिक इतिहासों के अनुशीलन से पता चलता है कि भोजकों ने इसे कई राजवंशों से लागातार प्राप्त कर प्रतिष्ठा पायी । (सर्ववर्मा का काल ५०७ से ५७५ तक का है)।
    इसी लेख के दूसरे भाग में ब्राह्मोत्तर की चर्चा है और किशोरवाट ग्राम का भी उल्लेख है । तत्कालीन गया जिले(वर्तमान औरंगावाद) के देव सूर्यमन्दिर से एक मील की दूरी पर किशोरवाट गांव है। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ हर्षचरित में वर्म वंशीय मगध राजाधिपति सूर्यवर्म और ईशानवर्म का नाम मिलता है।
(ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार गुप्तशासन ३२०ई.से आरम्भ हुआ। सर्ववर्मा का काल ५६०-५७५ ई. तक का है। इस प्रकार उक्त शिलालेख चौथी शताव्दी का है।)
(Fleets.INSCRIPTIONS OF GUPTA KINGS,VOL.III Page-217.)
) गुजरात प्रान्त के मोरवी नामक स्थान में ५८५ संवत् यानी ५२८ ई.सन् का एक शिलालेख मिला है,जिसमें एक शाकद्वीपीय ब्राह्मण को अपने पितर की सद्गति के लिए भूमिदान देने की घोषणा की गयी है। शिलालेख काफी बड़ा है। उसका किंचित अंश यहां प्रस्तुत है— ब्राह्मण अग्रहर वास्तव्य...शाण्डिल्य स गोत्र मैत्रायणीय स ब्रह्मचारी ब्राह्मण...जाञ्चकाभ्यां  सौहादित्य सुताभ्यां पयः पूर्वया शशांक तपनार्णव स्थिते सन्तानोपभोग्य तया मार्तण्ड मण्डलाश्रायिणि स्वर्भानोबलि चरु वैश्वदेवाय स, ब्रह्म (क्रिं) यार्थं पितरोरात्मनाश्च पुण्य शोभि वृद्वे.....गौप्तेदवादोनृपः सोप रागेऽर्क मण्डले रभसद्वर्ण्णालीकं सुमुचितं पद न्यासरुचिर सदाग्न्यायेनाग्रनृगनधु (हु) ष कल्पस्यनृपतेः । मुखस्थेनाभातं द्विज मिव शिव स्वस्ति वचसा लिखञ्जूजागयोदरः । शुचित (र) मनाः शाशन मिति सम्वत् ५८५ फाल्गुन सुदी ५ स्वहस्तोयंश्रीजाइंकस्य शंकरसुत देद्द केसु (नों) त्किरितम् ।।
.....शाण्डिल्यगोत्रीय सौहादित्य के हम दोनों पुत्र अपने पिता की मृत्यु पर उनकी सद्गति और सूर्यमण्डल में आश्रय के वास्ते,मैत्रायणी गोत्र ब्रह्मचारी यज्वन ब्राह्मण को नृपनहुष के समान गति पाने के लिए यह दानलेख उत्कीर्ण करते हैं....।    ( ध्यातव्य है कि ब्रह्मचारी और यज्वन शब्द भी शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त होता है- ब्रह्मयामल—भूमध्ये ब्रह्मचारी स्यात्....)।
( पूरा विवरण – इण्डियन एन्टीक्यूरी भाग 2 का पृष्ठ 2-257 द्रष्टव्य)।

४)  देव सूर्य-मन्दिर का शिलालेखः-
औरंगावाद (बिहार) मण्डलान्तरगत, शाकद्वीपियों का प्रमुख तीर्थ – देव का महान सूर्य मन्दिर है, जिसकी ख्याति के सम्बन्ध में कुछ भी कहना- सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। इसकी स्थापना के विषय में लोकचर्चा है कि विश्वकर्मा ने इसे बनाया था। उपलब्ध शिलालेख में एक श्लोक उत्कीर्ण है-
शून्यव्योम नभोरसेन्दुकरभू हीने द्वितीये युगे। माघे वाण तिथौ सिते गुर दिने देवे दिनेशालयम्।। प्रारेभे दृषदाञ्चयै रचयितुं सौम्यादी लायाम्भवो। यस्यासीत्सनराधिपः प्रभुतया लोको विशोको भुवि।।(‘अंकस्यवामागति’ नियमानुसार उक्त श्लोक का अर्थ होता है- शून्य = शून्य, व्योम=शून्य, नभ = शून्य, रस= छः, इन्दु= एक, कर= दो, भू= एक । इस प्रकार प्राप्तांक हुआ—१२१६००००> जिसे द्वितीय युग यानी त्रेतायुग के मान में से हीन करना है। त्रेता का मान >,२९,६०,००० वर्ष है। इसमें १,२१,६०,००० घटाने पर होगा ८०,००० वर्ष। यानी अस्सीहजार वर्ष त्रेतायुग शेष था, उस समय माघ शुक्ल पंचमी गुरुवार को  देव मन्दिर की स्थापना हुयी थी । इसप्रकार वर्तमान गणित होगा—     शेष त्रेता - ८०,००० वर्ष + द्वापर मान- ८,६४,००० वर्ष + वर्तमान सम्वत्-२०७४(ई.सन् २०१७) तक गतकलि का मान- ५११८ वर्ष = ९,४९,११८ वर्ष यानी नौ लाख उनचास हजार एकसौ अठारह वर्ष । यह मन्दिर राजा ऐल का बनवाया हुआ है । शिलालेख में आगे एक शब्द है-‘ईलायाम् भवः’ अर्थात् ऐलः। ईला मातृनाम है। अस्तु।

५) उमगा मन्दिर का शिलालेखः-                                
उमामहेशं सहितं गणेशम्....उ+म+गा=उमगा > एक पवित्र मगस्थली है—बिहार प्रान्त के औरंगावाद जिले में मदनपुर के समीप पूर्णाडीह ग्राम, जहाँ एक से एक मगविभूति तान्त्रिक, ज्योतिषी,कर्मकाण्डी,आयुर्वेदज्ञ आदि हुए हैं। विन्ध्यगिरि की श्रृंखलाओं से जुड़े प्राकृतिक छटाओं से ओतप्रोत सिद्धस्थली उमगा में भगवती उमा, भूतभावन भोलेनाथ के साथ विघ्नेश्वर गणेश का भी अद्भुत मन्दिर है।
उपलब्ध शिलालेख— जाते तर्क नवाम्बुधीन्दु गुणिते संवत्सरे वैक्रमे। वैशाखे गुरुवासरे सित तरे पक्षे तृतीये तिथौ । रोहिण्याम्पुरुषोत्तममं हलभृतं भद्रांसु भद्रान्तथा। प्रत्यष्ठापयदेकदैव विधिना श्री भैरवेन्द्रो नृप ।। अर्थात् विक्रमसंवत् १४९६(यानी ई.सन् १४३९) में इसकी स्थापना वैशाख मास के अक्षय तृतीया को राजा भैरवेन्द्र द्वारा हुयी थी।
उमगा पर्वतश्रृंग के गौरीशंकर मन्दिर की स्थापना उक्त मन्दिर की स्थापना के चार वर्षों बाद यानी विक्रमाब्द १५०० में हुयी,उक्त राजन् भैरवेन्द्र द्वारा ही,  जिसका शिलालेख है- खखेषु चन्द्रे खलु विक्रमाब्दे ज्येष्ठेसिते मास तिथौ च चन्द्रे प्रत्यष्ठिपद्भैरव एक भूपः।। अस्तु।
                 (साभार-पूर्णाडीह मगविप्रवंशावली, संकलक- पं.गुप्तेश्वर पाठक(वि.स.२०१३)

) शाहाबाद(आरा)के देववरुणार्क (देववरणा) नामक स्थान में शाकद्वीपियों के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। वरुणार्क पुर वालों का मूलस्थान इसे ही माना गया है। एक शिलालेखीय प्रमाण है—
विज्ञापित श्री वरुणावासि भट्टारक प्रतिबद्ध भोजक सूर्यमित्रेण उपरिलिखित...ग्रामादि संयुक्तं परमेश्वर श्री बालादित्यदेवेन स्वशासने न भगवच्छीवरुणासिभट्टारक...परिवाहक ...भोजक हंसमित्रस्य समापत्य यथाकाला ध्यासिभिश्च एवं परमेश्वरश्री सर्ववर्म...भोजक ऋषिमित्र पत्तकं एवं परमेश्वरश्री मवन्तिवर्मणां पूर्वद्त्त कमवलम्ब्य...एवं महाराजाधिराज परमेश्वर...शासन दानेन भोजक...धर मित्रस्यानुमोदितेन...भुज्यते...। (रिक्त स्थान अपाठ्य है) (Inscriptions of Gupta Kings Vol, iii pg.217)
            उक्त शिलालेख का आशय है कि देववरुणार्क  ग्राम में बहुत पहले से भोजक (शाकद्वीपीय)ब्राह्मण को बसाया गया था । सूर्यदेव की पूजा के लिए मगध पति बालादित्य ने भोजक ब्राह्मण सूर्यमित्र को ग्राम दान दिया। बाद में वर्मा भूपालों का शासन होने पर सर्ववर्मा ने भोजक हंसमित्र को उक्त ग्राम दिये (यानी शासक बदल जाने पर भी उनसे लिया नहीं गया)। इसके बाद अवन्ती वर्मा ने भोजक ऋषिमित्र को दिया। (द्वितीय जीवितगुप्त का ये शिलालेख सातवीं शताब्दी का है।
(डॉ.रविन्द्र कुमार पाठक (पाली विभाग,मगध विश्वविद्यालय) ने इसके विषय में अपने चर्चित ब्लॉग- मगसंस्कृति में विस्तृत चर्चा की है।)  

) इक्यावन शक्ति पीठों में हिमालय प्रदेश में अवस्थित ज्वालादेवी का नाम सर्व विदित है। उस क्षेत्र का एक चर्चित प्रसंग है कि महाराज भूमिचन्द्र जी ने उस दिव्य स्थान का दर्शन किया। घोर वन में मन्दिर का निर्माण करवाया और देवी की पूजा-अर्चना के लिए शाकद्वीपीय भोजक संज्ञक दिव्य विप्रों- पं. श्रीधर तथा पं. कमलापति को नियुक्त किया । उन्हीं के वंशज आज भी वहां पुजारी हैं।

) एपिग्रेफिया इण्डिका,जिल्द 2 पृ.33 पर बेवर महोदय का एक लेख है मगव्यक्ति ऑफ कृष्णदास । वस्तुतः शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के महत्त्व पर आधारित एक प्राचीन पुस्तक है मगव्यक्ति ,जिसके लेखक है पं.श्रीकृष्णदासजी ।

)  I. Journal Asiatic Research Society(Paris) June 1887,Pg.701,
     II. Alberuni’S Indian Vol. I,Pg.121
     III. Cunningham’s Ancient Geographical Indian Pg. 233.
     IV. Cunningham’s Archeological Survey of India Vol.I Pg.111  इन जगहों पर भी शाकद्वीप और शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के विषय में देखा जा सकता है।
मगबन्धु (अखिल) के मग विशेषांक में प्रकाशित वाराणसी के  प्रो. मुरलीधर मिश्रजी का एक लेख है - शाकद्वीपी ब्राह्मणों का गौरवशाली इतिहास, जिसमें इस बात की चर्चा करते हुए मिश्र जी कहते हैं कि उनके पास उक्त पुस्तक की एक प्रति अति जीर्णावस्था में थी,जिसे उन्होंने गंगाराम संस्कृत विद्यापीठ, वाराणसी के प्रो. श्रीमती शैलकुमारी मिश्र को दे दिया। यह पुस्तक मगों के विषय में बहुत कुछ स्पष्ट जानकारी देती है।
इस प्रकार मगों की ऐतिहासिकता असंदिग्ध है । वेद,पुराण,इतिहास, शिलालेखादि सर्वत्र इसके प्रमाण उपलब्ध हैं।


                  ---)ऊँ श्री आदित्यायार्पणमस्तु(---
क्रमशः...

Saturday, 23 September 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- सोलहवां भाग

गतांश से आगे...

          ११.पुर-गोत्र-प्रवरादि विचार और औचित्य

    पिछले अध्यायों में सृष्टि क्रम विस्तार से लेकर शाकद्वीपियों की उत्पत्ति, उत्कर्ष और शाकद्वीप से जम्बूद्वीप आगमन की चर्चायें हुयी, जिनसे स्पष्ट है कि सूर्यांश दिव्यजन्मा मग ब्राह्मण स्थायी तौर पर जम्बूद्वीप में आ बसे। जम्बूद्वीप के भविष्य को देखते हुए, नारद-कृष्ण लीला और यजमानों की कृपा से वासार्थ भूमि दी गयी, जहां पूरे व्यवस्थित रुप से (पुर-गोत्र-प्रवरादि विचार सहित) वसते हुए कुल बहत्तरपुरों और अठारह उपकिरणों के नाम से ख्यात हुए । समयानुसार स्थान परिवर्तन और अन्य विविध कारणों से ७२+१८=९० की संख्या में भी किंचित मतान्तर मिलता है । कई तरह की सूचियाँ मिल जाती हैं, जो संशययुक्त और विरोधाभासी भी हैं, किन्तु जो भी हो, मूल बात यह है कि पुर-उपकिरणादि नाम की प्रधानता ही शाकद्वीपियों की असली पहचान बनी । ये परम्परा जम्बूद्वीपीय गैर शाकद्वीपीय ब्राह्मणों में कदापि नहीं है। अतः अपनी पहचान को बनाये रखने हेतु पुर-परम्परा का सम्यक् ज्ञान अनिवार्य है इनके लिए।

कभी-कभी ऐसा प्रश्न भी उठाया जाता है (विशेष कर गैर मगों द्वारा) कि क्या इनकी मूल पहचान- पुरपरम्परा वहां शाकद्वीप में भी थी?
यह प्रश्न अपने आप में बेतुका है । पिछले सभी अध्यायों का अवलोकन करने के बाद  किसी के मन में ऐसी आशंका शेष रहेगी- ऐसा मुझे नहीं लगता। सीधी सी बात है कि इस परम्परा में ये जम्बूद्वीप में आने के पश्चात् ही बंधे । वहां शाकद्वीप में तो सब एक समान थे।
अब प्रश्न ये उठता है कि इनका वैवाहिक सम्बन्ध किस आधार पर होता है, या होना उचित है- जैसा कि जम्बूद्वीप की परम्परा है- गोत्रादि विचार करके विवाहादि सम्बन्ध करना । जम्बूद्वीपीय (गैर मग) ये मानते हैं कि गोत्र परम्परा सन्तति परम्परा का सूचक है। इस अज्ञान या अधूरे ज्ञान का समाधान भी पिछले अध्यायों में करने का प्रयास किया गया है। पुर,गोत्र,प्रवरादि विषयक शास्त्र-सम्मत विशेष परिभाषायें भी दी गयी हैं।    संक्षेप में पुनः कह सकते हैं कि गोत्र परम्परा सन्तति परम्परा नहीं है, और विवाहादि सम्बन्ध करने में सपिण्ड,सगोत्र,सप्रवर वर्जना की बात की जाती है और की जानी चाहिए भी। समान गोत्र,समान प्रवर और समान पुर वाली कन्या-वर का विवाह कदापि नहीं होना चाहिए । जैसा कि शास्त्र वचन है—
असपिण्डा च या मातुर सगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार कर्माणि मैथुने ।। (मनुस्मृति ३-५)
हालाकि सपिण्ड की मर्यादा(सीमा) व्यासस्मृति ने पितृकुल में सात पीढ़ी तक और मातृकुल में पांच पीढ़ी तक ही मानी है। इसी सिद्धान्त का तर्क देती है आज की पीढ़ी कि काफी दूरी हो जाने पर विवाह करने में क्यों वर्जना है ?
किन्तु व्यासस्मृति की सीमा का ये अर्थ कदापि नहीं लिया जाना चाहिए । यहां संदर्भ-दोष माना जाना चाहिए । वस्तुतः ये बात जननाशौच-मरणाशौचादि निवृत्ति के प्रसंग में कहा गया है न कि विवाहादि सम्बन्ध के विषय में । शौच विचार में स्मृतिकारों ने छूट दी है कि क्रमशः अधिक दूरी (एक-तीन-पांच-सात) बनते जाने पर शौचाचार की मात्रा (अवधि) में अन्तर आते-आते अन्ततः लोप हो जाता है। ध्यातव्य है पाणिनी,पतञ्जलि, कात्यायन आदि ने ‘ लोप ’ शब्द को कैसे व्याख्यायित किया है- अदर्शनः लोपः कह करके । लोप याने नष्ट नहीं, दर्शन (मात्रा) की न्यूनाधिकता । प्रत्यक्ष (स्थूल) जल अग्नि या वायु में विलीन हो जाता है, इसका ये अर्थ कदापि नहीं कि जल तत्त्व ही नष्ट हो गया । वस्तुतः वह उपस्थित है । मात्र उसका दर्शन लोप हुआ है । इसी तरह महर्षियों ने किसी तरह के पक्षपात रहित होकर,सहज द्रष्टा भाव से विचार करते हुए सारी व्यवस्थायें दी हैं। शाकद्वीपियों की पुर-व्यवस्था भी उन्हीं में एक है। अतः इन्हें मानना हमारा धार्मिक कर्तव्य है। वैवाहिक सम्बन्ध में पितृपुर के साथ-साथ मातृपुर विचार भी अनिवार्य माना जाना चाहिए।
   ये आधुनिक विज्ञान(Science)सम्मत भी है कि वैवाहिक सम्बन्ध जितने दूर होंगे, भावी सन्तति उतनी बलवती होगी। रक्त की समीपता कई कारणों से वर्जित किया गया है। आज के क्रॉसब्रिड के जमाने में इसे और भी स्पष्ट तरीके से प्रमाणित करने का प्रयास किया जा रहा है वैज्ञानिकों द्वारा। किन्तु इसका ये अर्थ तो नहीं कि कुछ को कुछ से जोड़ कर कुछ नये का सृजन कर दिया जाय । समीपता की भी एक सीमा होनी चाहिए और दूरी की भी । सामान्य (TC,DC…)रक्त-परीक्षण से काफी आगे बढ़कर, आज का विज्ञान DNA परीक्षण तक पहुंच चुका है । हो सकता है आने वाले समय में इससे भी अधिक गहन परीक्षण करने में सक्षम हो जाये, और तब उस दिन ज्ञात हो कि हमारे मनीषियों की परख कितनी पैनी थी । जो बात या सिद्धान्त समझ में न आवे, उसे सीधे नकार देना कोई बुद्धिमानी नहीं । बुद्धिमानी इसमें है कि उस पर विचार करे, और जब तक स्पष्ट न हो जाये तब तक तो ऋषि-वाक्य मान कर स्वीकारने में ही भलाई है।
हालाकि गोत्र-प्रवरादि काफी उलझे हुए,किन्तु गहन विषय हैं। इनके बारे विशेष जानकारी के लिए विविध धर्मसूत्र और गृह्यसूत्रों का अध्ययन करना चाहिए। यथा—आश्वलायन,आपस्तम्ब,बोधायन,पारस्कर,कात्यायन,लौगाज्ञ,सत्याषाढ़ादि । इन ग्रन्थों में विशद रुप से इनकी चर्चा है । जिज्ञासुओं को इन मूल ग्रन्थों का अवलोकन अवश्य करना चाहिए। अस्तु ।

                         ---)ऊँ श्री भास्कारय नमः(---

Thursday, 21 September 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका-- पन्द्रहवां भाग

 गतांश से आगे...

दशवें अध्याय का चौथा भाग

एक प्रश्न त्रेतायुग वाली पुरतालिका की प्रमाणिकता पर कुछ कहने से पूर्व एक प्रश्न उठता है, जिसका सीधा सम्बन्ध शाकद्वीपियों के पुनरागमन(द्वापर में) से है। जैसा कि प्रमाणिक तौर पर कहा जाता है कि पितृशाप/नारदीय छल आदि के परिणाम स्वरुप कुष्ट-व्याधि-ग्रसित साम्ब को आरोग्य प्रदान करने हेतु एक मात्र उपचार था- सूर्ययाग, और इसके लिए तत्कालीन जम्बूद्वीपीय ब्राह्मण सक्षम नहीं हुए, क्यों कि वे सब ऋषि गौतम के शाप से निस्तेज हो चुके थे। सूर्यावाहन होने पर मार्तण्ड के तीव्र रश्मि-पुञ्ज को सह नहीं सके, उठकर भागने लगे । निराश, हताश साम्ब को, सूर्य की अमैथुनी सृष्टि से उत्पन्न सूर्योपासक शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को बुलाने हेतु विष्णुवाहक- गरुड़ को भेजना पड़ा । दान-दक्षिणा न लेने की प्रतिज्ञा पूर्वक वैनतेय खगेश उनके अठारह कुलों (परिवार) के वाहक बने । ध्यातव्य है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण दान नहीं लेते- ये उनका दृढ़ संकल्प है । स्कन्दपुराण के प्रभास खंड में इसका विशद वर्णन है- ‘‘मैं भिक्षुक ब्राह्मण नहीं हूँ प्रत्युत शाकद्वीपीय हूँ । दान न लेना हमारा स्वभाव है। इसके इच्छुक अन्य जो हैं, उन्हें दे दें । हमें तो बस वरदान दें कि मुझे देवत्व प्राप्त हो ।’’

       वैदिक मर्यादा का उलंघन कर एक जन्म में देवत्व दे सकने की विकट समस्या का निराकरण स्वयं शिव को आकर करना पड़ा था । शिव ने कहा - आज से शाकद्वीपीय ‘देवता’ हैं । इन्हें विष्णु के साथ-साथ विश्वेदेवा(पितरों वाले विश्वेदेवा नहीं) नाम से यज्ञांश दिया जायेगा....अस्तु ।

        स्कन्दपुराण के इसी प्रमाण को उधृत कर लोग भ्रमित होते हैं, और गलत अर्थ लगाकर कहते हैं कि मग तो त्याज्य हैं, इन्हें दान-दक्षिणा का अधिकार ही नहीं है ।

   प्रश्न यहाँ ये है कि जब त्रेतायुगीन मग यहाँ जम्बूद्वीप में पहले से थे ही, फिर साम्ब को क्यों कठिनाई हुयी सूर्य-प्रतिमा-प्रतिष्ठा में ?
उत्तर दो ही हो सकता है- 1.शाकद्वीपीय ब्राह्मण यहाँ स्थायी रुप से थे ही नहीं, या 2. थे, तो यहाँ के ब्राह्मणों की तरह वे भी निश्तेज हो चुके थे - दान-दक्षिणा ले-लेकर, जैसा कि कृष्ण के महज पांच हजार एक सौ सात वर्ष व्यतीत होते-होते आज मगों की स्थिति हो गयी है। प्रवास और वास में अन्तर होता है। आना-जाना और स्थायी वास करना बिलकुल भिन्न बात है। ऐसा ही कुछ हुआ होगा । पुराण अगाध है, गहन मन्थन का विषय है । शायद कहीं प्रसंग मिला हो, जिसके आधार पर श्रद्धेय भँवर जी ने मिहिरमहिमा में चर्चा की हो । अस्तु।                              
       डॉ.सुधांशु शेखर मिश्रजी द्वारा संपादित, राँची (झारखंड) से प्रकाशित मगबन्धु(अखिल)पत्रिका के सौजन्य से कुछ सूचनायें मिली,जिन्हें साभार यहां उद्धृत कर रहा हूँ। पत्रिका के परम्परा-संस्कार अंक में स्वामी गोपाल आनन्द बाबा द्वारा संकलित एक गोत्र-प्रवर तालिका है। यथा—

क्रमांक
गोत्र
प्रवर ऋषि
१.
अंगिरा/ आंगिरस
आंगिरस,ब्रार्हस्पत्य,वसिष्ठ
२.
अत्रि
आत्रेय,आर्चनान,श्यावाश्व
३.
काश्यप
काश्यप,अवत्सार,असित
४.
कौशिक/विश्वामित्र
विश्वामित्र,देवरात,औदल
५.
पुलस्त्य
पुलस्त्य,विश्वश्रवक,दम्भोलि
६.
जमदग्नि/ जामदग्न्य
जामदग्न्य,और्व, वसिष्ठ
७.
वसिष्ठ
वसिष्ठ,इन्द्रपमद,भरद-वसु
८.
भरद्वाज
भरद्वाज,बार्हस्पत्य,आंगिरस
९.
अगस्त्य
अगस्त्य,माहेन्द्र,मायोभुव
१०
कण्व
आंगिरस,अडमीढ,काण्व
११
कौण्डिण्य
कौण्डिण्य,वसिष्ठ,मित्रावरुण
१२
गौतम
गौतम,वसिष्ठ,बार्हस्पत्य
१३
वत्स/वच्छ
जामदग्न्य,अप्तुवान,च्यवन,भार्गव,और्व
१४
मुद्गल
मौद्गल,आंगिरस,तार्क्ष्य
१५
वासुकि
वासुकि,अनन्त,अक्षोम्य
१६
शाण्डिल्य
शाण्डिल्य,कश्यप,अवत्सार
१७
शुनक
शुनक,सोनहोत्र,गार्त्समद
१८
शोनक
शुनक,धर्मवृद्ध,गृत्समद
१९
गर्ग
गार्ग्य,आंगिरस,सैन्य
२०
हरित/हारित
आंगिरस,अम्बरीष,युवनाश्व
२१
विष्णुवृद्ध
आंगिरस,पोरुकुत्स,त्रासदस्य
२२
कुत्स
आंगिरस,मान्धात,कौत्स
२३
पराशर
परासर,शक्ति,वसिष्ठ
२४
पूतिमास
अंगिरा,उशिज,सूव चोतथ्य
२५
माण्डव्य
भृगु,तण्डि,मत्स्यगंध
२६
कपिल
विरुप,वृषार्वा
२७
याज्ञवल्क्य
आर्टाबन,पार्ष्णिन,वीरणिन
२८
व्यास
पेल,वाष्कल,सन्यश्रवस
२९
लोमश
कालशिख,गोरवृषा,कैलाप
३०
मंकिन
मंकिन,मंकणक,मंकण
३१
दुर्वासा
दुर्वासा,आत्रेय,दत्तात्रेय
३२
नारद
नारद,काण्व,पर्वत,नारदिन
३३
प्रह्लाद
विरोचन
३४
बकदालभ्य
ग्लाबमैत्र,दालभ्य

(नोट- उक्त तालिका को मैंने यथावत रख दिया है । हालाकि नाम और प्रवर-क्रम में किंचित संशय है। किन्तु जब तक ठोस प्रमाण नहीं मिल जाता,परिवर्तन कैसे किया जाय ? पाठक बन्धु ! जिन्हें जानकारी हो, मेरा संशय दूर करने का प्रयास करें। ताकि आगामी संस्करण में सुधारा जा सके।)

पूर्वचर्चित-- पुर,गोत्र,आम्नाय,आस्पद,प्रवर,वेद,उपवेद,शाखा,सूत्र,शिखा, पाद,छन्द,देवतादि बोधक सारिणी –
(इस सारिणी को शाकद्वीपियों के सर्वमान्य अठारह गोत्रों के अनुसार सजाया गया है। जिन गोत्रों में पुरों की संख्या अधिक है उन्हें सारणीवद्ध किया गया है, शेष यानी जिनमें संख्या कम है, सीधे-सीधे वर्णन कर दिया गया है। )
(१)       मौद्गल गोत्र—मुद्गल ऋषि इसके प्रवर्तक हैं। इस गोत्र वालों का प्रवर- त्रिप्रवर होता है (मौद्गल,आंगिरस,और भार्ग्यश्व । सामवेद और ययुर्वेद इनका वेद है । तद्नुसार उपवेद है- गन्धर्ववेद और धनुर्वेद । शाखा इनकी माध्यन्दिनी और कौथुमी है । सूत्र कात्यायनी और गोभिल है । छन्द है त्रिष्टुप् तथा जगति । शिखा एवं पाद दक्षिण है । रुद्र और विष्णु इनके देवता हैं । आम्नाय- 1. अर्क (१-१७), पुर-पुण्यार्क, मूल स्थान पण्डारक, पटना ।  2.किरण- (१-१७), पुर- पुनरखिया, मूलस्थान- बाढ़,पटना ।  3. अथोपकिरण- (१-१), पुर- भुजादित्य, भुजडीहा । मूल स्थान- वासौ, भोजपुर।

(२)       अत्रिगोत्र— अत्रिऋषि इसके प्रवर्तक कहे गये हैं । अत्रिगोत्र वाले पञ्चप्रवर हैं । यथा— अत्रि,कृष्णात्रि,अर्चि, अचनिनस और श्यावाश्य । इनका वेद है ऋग्वेद । उपवेद है आयुर्वेद । शाखा शाकल, सूत्र आश्वलायन । छन्द गायत्री, शिखा और पाद दक्षिण तथा देवता हैं- ब्रह्मा । इनके अन्तर्गत मात्र एक पुर है— किरण आम्नाय वाला देवहापुर, जिनका मूलस्थान देव, गया है।

(३)       अंगिरस(अंगौरा) गोत्र— अंगिरा ऋषि इसके प्रवर्तक हैं । इस गोत्र वालों का प्रवर- त्रिप्रवर होता है। सामवेद और ययुर्वेद इनका वेद है । तदनुसार उपवेद है- गन्धर्ववेद और धनुर्वेद । शाखा इनकी माध्यन्दिनी और कौथुमी है। सूत्र कात्यायनी और गोभिल है। छन्द है त्रिष्टुप् तथा जगति । शिखा एवं पाद दक्षिण है। रुद्र और विष्णु इनके देवता हैं । आम्नाय- किरण (१-१७), पुर- मुकुरमेराव / कुरमेराव, मूल स्थान- यवना(आरा)तथा किरण (१-१७) पुर अवधियार/औधियार,अरवल, बिहार

(४)       भारद्वाज गोत्र— भारद्वाज ऋषि इसके प्रवर्तक हैं । प्रवर तीन हैं (अंगिरस, भारद्वाज और वृहस्पति), यानी त्रिप्रवर कहे जाते हैं । तात्पर्य ये है कि उक्त तीन ऋषियों को स्थापित किया जायेगा यज्ञोपवीत की गांठों में । इनका वेद  ययुर्वेद है, तदनुसार उपवेद हुआ – धनुर्वेद । शाखा माध्यन्दिनी है और सूत्र कात्यायनी । छन्द है त्रिष्टुप् तथा शिखा एवं पाद दक्षिणइस गोत्र वालों के देवता रुद्र हैं । आगे जिन-जिन पुरों के भारद्वाज गोत्र हैं, उनकी सूची आम्नाय और मूलस्थान सहित सारणी रुप में प्रस्तुत है-

आम्नाय
पुर
मूलस्थान
आर १-२४
उरवार/उरुवार
ऊर, टेकारी,गया
आर १-२४
मखपवार
मखपा,टेकारी,गया
आर १-२४
देवकुलियार/देवकरियार
देवकली,देव,गया
आर १-२४
पडरियार
पड़ारी,विक्रम,पटना
आर १-२४
अदईयार
अदई,कोंच,गया
आर १-२४
पवईयार/पेवईयार
पवई,औरंगाबाद,बिहार
आर १-२४
वरवार
वारा,परइया,गया
आर १-२४
छत्रवार
बेलागंज,गया
आर १-२४
जम्बुवार
जमुआर,टेकारी,गया
आदित्य १-१२
वेलासी/विलुशैय्या/विलसैया
बेलासी,बरसड़ा,गाजीपुर
आदित्य १-१२
गनिया/गड़वार/गंडार्क
गंगटी,गया
आदित्य १-१२
देवडीहा/दवड़ीहार्क
डीहा,देवकुली,गया
आदित्य १-१२
गुनसैया/गनैया
गंगही,गया
किरण १-१७
देव वरुणार्क
देवचन्दा,पीरो,आरा
किरण १-१७
पंचकंठी/पंचकंठ
पचमो,ईमामगंज,गया
किरण १-१७
देवयार
देव,टेकारी,गया
किरण१-१७
गंडार्क
गंगटी,गोह,गया
किरण१-१७
स्वेतभद्र
रामपुर,वस्ती,यू.पी.
किरण१-१७
डुंडइयार/डुडरियार
खडराही,गया
उपकिरण१-१८ 
धर्मादित्य
देवकुली,छपरा
उपकिरण१-१८ 
हुंड़रियार / हुणरियार
हुणराही,टेकारी,गया
उपकिरण १-१८ 
सप्तार्क
सेतपुर,छपरा,उ.बिहार
उपकिरण १-१८ 
देवबालार्क
.....
मण्डल १-१२
भेंड़ापाकर/भड़रियार
भंडरिया,गया
मण्डल १-१२
डिहिक / डिहक
डीह,पटना

 नोटः-1.हुड़रियार अपना मूल स्थान पाण्डेपुर, बरिआवां, जिला औरंगाबाद(बिहार) भी बतलाते हैं । वर्तमान समय में वहां काफी संख्या में ये लोग हैं । मालीराज के आसपास के अन्य गांवों(बरिआवां,बेनी,पंडितविगहा,पोखराही इत्यादि) में भी हुड़रियारों की काफी संख्या है । इससे लगता है कि उनका मूल स्थान पांडेपुर ही रहा होगा ।
         2. विलसैया(वेलासी)पुर गर्ग गोत्र में भी मिलते हैं । क्षत्रसार पुर कौशिक गोत्र में भी मिलते हैं । जम्मुआर क्रमशः वत्स, गर्ग और शाण्डिल्य गोत्र में भी मिलते हैं । गुनसैया कौशिक गोत्र में भी मिलते हैं । देवबालार्क शाण्डिल्य और कौशिक दोनों गोत्र में मिलते हैं । मखपवार पुर मिहिरगोत्र में भी मिलता है । ध्यातव्य है कि तदनुसार ही उनका प्रवरादि भी होना चाहिए ।

(५)          कौण्डिन्य गोत्र — कौशिक गोत्र वाले त्रिप्रवर हैं - वशिष्ठ,मित्रावरुण और कौण्डिन्य । इनका वेद सामवेद है । उपवेद है गंधर्ववेद। शाखा-कौथुमी। सूत्र गोभिल । छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम है, तथा देवता हैं विष्णु । इस गोत्र सूची में निम्नांकित पुर आते हैं—
आम्नाय
पुर
मूलस्थान
आर १-२४
केरियार
कटैया,औरंगाबाद,बिहार
आर १-२४
ओडरियार/ यौतियार
ओड़ो,हिसुआ,नवादा,गया
आर १-२४
खंटवार
खनेटा,बेलागंज,गया
आर १-२४
कुरैयार/वरोचियार
कुर्था,बेलागंज,गया
आर १-२४
सिवौरियार
वेरी,मदनपुर,औरंगाबाद,बिहार
आर १-२४
भलौडियार
भड़ौरी,परइया,छपरा
किरण १-१७
वेरियार/विडौरा
कुटेप,वारा,गया
अर्क १-
कोणार्क
कोना,मदनपुर,औरंगाबाद,बिहार
मण्डल १-
खण्डसूप/ खणासूपक
खनेटी,टेकारी,गया
आदित्य१-
कुण्डार्क
कुन्डवा,गोह,गया
आदित्य१-
वरुणार्क
पटना

(६)  काश्यप गोत्र— काश्यप गोत्र वाले त्रिप्रवर हैं- कश्यप,देवल और असित । इनका वेद सामवेद है । उपवेद इनका है गंधर्ववेद । शाखा- कौथुमी। सूत्र गोभिल । छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम है, तथा देवता हैं विष्णु । इस गोत्र सूची में निम्नांकित पुर आते हैं—

आम्नाय
पुर
मूलस्थान
आर१-२४
छेरियार
छेरियारी,मखदुमपुर,गया
आर १-२४
कुरैयार/कुरैचियार
कुराइच,रोहतास,बिहार
आर १-२४
भलुनियार
भलुनी,रोहतास,बिहार
आदित्य१-
डोमरौर/डुमरौर
डुमरा,हसनपुर,गया
आदित्य१-
सर्पहार्क/सपहा
सपट्टा,बाबा का बाजार (अस्पष्ट
आदित्य१-
महुरसिया/मुरसिया
मोहरस देव,गया
उपकिरण १-१८ 
अरिहंसिया
ऐयारी,देव,गया
उपकिरण१-१८ 
गोरक्षपुरिया
गोरखपुर,उत्तर प्रदेश
उपकिरण१-१८ 
बेलयार
बेलगांव,छपरा,बिहार
उपकिरण१-१८ 
श्यामवौर
सोमारी,आजमगढ़,उत्तर प्रदेश
उपकिरण १-१८ 
मृगहा
मृगा,वासो,गाजीपुर,उत्तर प्रदेश
किरण १-१७
सियरियार/सियरी
सियारी,मौआवार,गोरखपुर
किरण १-१७
मोरियार
जमीरा,मलमा,गया
किरण १-१७
पठकौलियार
पठकौली,वस्ती,उत्तरप्रदेश
किरण १-१७
पंचहाय
पंचाननपुर,टेकारी,गया
किरण १-१७
सौरियार
सैदाबाद,पटना
किरण १-१७
कुकरौंधा
कुकरौधा,गया
किरण १-१७
जुट्टीवरी/जुट्ठीवरी
जुट्ठी,डेहरी
आर१-२४
पुण्यार्क
पंडारक,पटना
मण्डल १-
चंडरोह/चंदरोटी
चाँदपुर,पटना
मण्डल १-
खजुराहा
खजुरी,गया

नोट- ध्यातव्य है कि भलुनियार पुर शाण्डिल्य गोत्र में भी हैं, और श्यामबौरपुर कौशिक गोत्र में भी हैं । अतः तदनुसार ही उनका प्रवरादि होगा ।

(७)          शाण्डिल्य गोत्र — इस गोत्र के दो उपभेद हैं- श्रीमुखशाण्डिल्य और गर्धमुखशाण्डिल्य। दोनों त्रिप्रवर ही हैं, किन्तु ऋषि नाम भिन्न है। श्रीमुख त्रिप्रवर में शाण्डिल्य,असित और कश्यप है,जब कि गर्धमुख त्रिप्रवर में शाण्डिल्य, असित और देवल हैं। शेष सब समान हैं । वेद साम है । उपवेद गंधर्ववेद है। शाखा कौथुमी,सूत्र गोभिल, छंद जगति,शिखा और पाद बाम तथा देवता विष्ण हैं। इस गोत्र में मात्र छः पुर आते हैं। यथा—
आम्नाय
पुर
मूलस्थान
आर१-२४
भलुनियार
भलुनी,दीनारा,आरा
अर्क १-
वालार्क
अयोध्या
अर्क १-
वालार्क
देवकुली,गया
अर्क १-
कोणार्क
कोना,मदनपुर,औरंगाबाद
आर१-२४
जुम्बी(संदिग्ध)
दुर्गावती
मण्डल१-१२
पट्टिस
पिसनारी,पटना

नोट- ध्यातव्य है कि जुम्बी पुर भारद्वाजगोत्र में भी जम्बुआर पुर के नाम से आया है । तदनुसार उनका प्रवरादि भेद भी हो जायेगा ।   

(८)           भृगुगोत्र— भृगुगोत्र वाले पञ्चप्रवर कहलाते हैं । यथा—भार्गव,और्व, च्याव,जामदग्न्य और आप्नवान । इनका वेद है ऋग्वेद । उपवेद है आयुर्वेद । शाखा शाकल है, सूत्र आश्वलायन । छन्द गायत्री, शिखा और पाद दक्षिण तथा देवता हैं- ब्रह्मा । इनके अन्तर्गत निम्नांकित सात पुर आते हैं—

आम्नाय
पुर
मूलस्थान
आर१-२४
डुम्बरियार
डुमरी,रोहतास,बिहार
आर१-२४
वद्धवार
बधवा,पहलेजा,गया
आर१-२४
वडवार
परैया,गया
अर्क १-
उल्लार्क
परैया,गया
अर्क १-
लोलार्क
काशी
किरण १-१७
शुण्डार्क
ककरही,टेकारी,गया
मण्डल १-१२
बलिबाघ/बलिबागव
बंधवा,गया

(९)          कौशिकगोत्र— कौशिकऋषि इसके प्रवर्तक कहे गए हैं। इस गोत्र वाले त्रिप्रवर कहे जाते हैं । यथा- कौशिक, विश्वामित्र और अघमर्षण । सामवेद इनका वेद है और गन्धर्ववेद उपवेद । शाखा- कौथुमी । सूत्र गोभिल। छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम है, तथा देवता हैं विष्णु । इस गोत्र सूची में निम्नांकित पन्द्रह पुर आते हैं—

आम्नाय
पुर
मूलस्थान
आर१-२४
छत्रवार
छतियाना,बेला,गया
आर१-२४
सिकौरियार/शिकरौरियार
सिकरौरा,डुमरांव,शाहाबाद
आर१-२४
रहदौलियार/रहयार
रहदौली,भुज
आर१-२४
मलौडियार/मौलियार
मलवां,गया
आदित्य१-
गुनसैया/गुलशैय्या
मगही,औरंगाबाद,बिहार
आदित्य१-
देवलसिया
देव,औरंगाबाद,बिहार
आदित्य१-
हरिहसिया/हरहसिया
हरिहोस,हुसैनगंज,छपरा
आदित्य१-
मल्लोर
मलवां,गया
किरण १-१७
कौशिक
जगदीशपुर,भोजपुर
किरण १-१७
अवधियार या औधियार
अरवल,बिहार
किरण १-१७
महोशवार
नृसिंहपुर,मौआवर,गोरखपुर
किरण १-१७
गोरहा
गोह,गया
किरण १-१७
सरइयार/सौरियार/पुरैयार
सैदाबाद,सीरंगपुर,पटना
उपकिरण१-१८ 
श्रीमौरियार/श्रीमौर
गोरखपुर
उपकिरण१-१८ 
श्याममोरियार/सोमरी
आजमगढ़,उत्तरप्रदेश

नोट— अवधियार पुर आंगिरस गोत्र में भी हैं, तथा गुनसैंया भारद्वाज गोत्र में भी हैं। तदनुसार उनका प्रवरादि भी भिन्न हो जायेगा।

(१०)    वत्सगोत्र— वत्सगोत्र में तीन और पांच दोनों प्रकार के प्रवर की परम्परा है। यथा- आंगिरस, गर्ग, ब्राहस्पत्य,भारद्वाज और शैन्य । सामवेद इनका वेद है और गन्धर्ववेद उपवेद । शाखा- कौथुमी । सूत्र गोभिल । छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम है, तथा देवता हैं विष्णु । इस गोत्र सूची में निम्नांकित पुर आते हैं—
आम्नाय  

पुर  
मूलस्थान
आर१-२४
ओडरियार/यौतियार
ओड़ो,हिसुआ,नवादा,गया
आर१-२४
जम्बूयार/जमूयार
जमुआर,टेकारी,गया
उपकिरण१-१८ 
सत्यवाक(सप्तार्क)
सैतपुर,छपरा
आदित्य१-
बिलसैया/बिलशैय्या
वैलासो,बडसरा,गाजीपुर
अर्क १-
मार्कण्डेयार्क
देवकुली,गया
मण्डल १-
कपित्थक(कैथुआ)
....

 नोट- जम्बूयार/जमूयार तथा बिलसैया/बिलशैय्या ये दोनों भारद्वाज गोत्र में भी मिलते हैं । अतः उनका प्रवरादि तदनुसार ही होना चाहिए ।

(११)    परासर गोत्र— महर्षि परासर इस गोत्र के प्रवर्तक हैं । इस गोत्र वाले त्रिप्रवर धारी होते हैं- परासर, वशिष्ठ और शक्ति ।  इनका वेद ययुर्वेद और उपवेद है धनुर्वेद। शाखा माध्यन्दिनी, सूत्र कात्यायनी,छन्द त्रिष्टुप्, शिखा एवं पाद दक्षिण तथा देवता हैं रुद्र । इस गोत्र में आठ पुर हैं। यथा—

आम्नाय
पुरनाम
मूलस्थान
आर१-२४
योतियार
पवई,औरंगाबाद,बिहार
आर१-२४
ऐआरो
गजहनी,आरा,बिहार
आर१-२४
सरैयार
गजहनी,आरा,बिहार
आर१-२४
उरुवार
ऊर,टेकारी,गया
उपकिरण१-१८ 
पिपरहा
पिपरहा,छपरा,बिहार
मण्डल १-
पारसम/तेरहपरासी
परसन,भोजपुर,बिहार
किरण १-१७
कुकरौंधा
कुकरौंधा,टेकारी,गया
किरण १-१७
गण्डार्क
विनायक,टेकारी,गया

नोट—ऐयार पुर रहदौरी गोत्र में भी हैं,कुकरौंधा काश्यप गोत्र में भी हैं, उरुवार भारद्वाज गोत्र में भी हैं । अतः तदनुसार ही उनका प्रवरादि भेद हो जायेगा।

(१२)   मुर्द्धनी गोत्र— इसके प्रवर्तक मौनस ऋषि हैं । इनका प्रवर तीन है । इनका वेद ययुर्वेद और उपवेद है धनुर्वेद । शाखा माध्यन्दिनी, सूत्र कात्यायनी, छन्द त्रिष्टुप्, शिखा एवं पाद दक्षिण तथा देवता हैं रुद्र । इस गोत्र में मात्र एक पुर है—पण्डरिक , जिनका आम्नाय अर्क है । मूलस्थान पंडारक,पटना माना जाता है । ध्यातव्य है कि पुण्यार्क पुर वालों का मूल स्थान है यह, और उनका गोत्र मौद्गल है। किंचित भ्रामक स्थिति है इनके बारे में । लगता है कहीं भूल हुयी है ।
(१३)   वेतायन गोत्र— इस गोत्र के प्रवर्तक ऋषि भी स्पष्ट नहीं है । त्रिप्रवर की मान्यता है, किन्तु उसके कौन-कौन से ऋषि हैं ये भी स्पष्ट नहीं है। इनका वेद ययुर्वेद और उपवेद है धनुर्वेद । शाखा माध्यन्दिनी, सूत्र कात्यायनी, छन्द त्रिष्टुप्, शिखा एवं पाद दक्षिण तथा देवता हैं रुद्र ।  मण्डल आम्नाय के कांक्ष नामक पुर की चर्चा मिलती है, जिनका मूल स्थान खजनी, गया बतलाया जाता है। किन्तु ये कुछ भ्रामक है ।
(१४)    जमदग्नि गोत्र— जमदग्नि ऋषि इसके प्रवर्तक हैं। इस गोत्र वाले त्रिप्रवर कहे गये हैं- भार्गव,च्यावन और आप्नवाल । सामवेद इनका वेद है और गन्धर्ववेद उपवेद । शाखा- कौथुमी । सूत्र गोभिल । छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम है, तथा देवता हैं विष्णु । इस गोत्र सूची में मात्र दो ही पुर आते हैं—किरण १-१७ आम्नाय का जुत्य वा छठ्ठी नामक पुर जिनका मूल स्थान कोंच,गया है। तथा विपरोह या पिपरोहा पुर जिनका मूलस्थान पिपरोहा,गया है । ध्यातव्य है कि पिपरोहा बिहार के छपरा जिले में भी है।
(१५)   वशिष्ठ गोत्र— इस गोत्र के प्रवर्तक ऋषि वशिष्ठ हैं । ये त्रिप्रवर वाला गोत्र है। यथा- वशिष्ठ,परासर और शक्ति। ययुर्वेद इनका वेद है,धनुर्वेद उपवेद । शाखा इनकी माध्यन्दिनी है, सूत्र गोमिल,छन्द त्रिष्टुप्,शिखा एवं पाद दक्षिण,तथा देवता हैं रुद्र। इस गोत्र में मात्र एक पुर है- मण्डल १-१२ आम्नाय का वडसार वा वडसारी पुर, जो वरशांव, गया के मूल निवासी कहे जाते हैं ।
(१६)    मिहिर गोत्र— मिहिर नामक ऋषि इसके प्रवर्तक हैं। त्रिप्रवरीय इस गोत्र वालों का वेद ययुर्वेद है, धनुर्वेद उपवेद । शाखा इनकी माध्यन्दिनी है, सूत्र गोमिल, छन्द त्रिष्टुप्, शिखा एवं पाद दक्षिण, तथा देवता हैं रुद्र । इसमें तीन पुर हैं—1. किरण १-१७ आम्नाय का मिहिर वा मिहिमगौरियार पुर, जिनका मूलस्थान फुलवरिया,सारन,बिहार है । 2. उपकिरण१-१८  आम्नाय का मिहिर वा महिरमी पुर,जिनका मूलस्थान मिहिल,वस्ती, उत्तर प्रदेश है। तथा 3. आर१-२४ आम्नाय का पुर मखपवार,जो भारद्वाज गोत्र में भी पाये जाते हैं। इनका मूल स्थान मखपा,टेकारी,गया है।

(१७)    च्यवन गोत्र— सुख्यात च्यवन ऋषि इसके प्रवर्तक हैं। इसके अन्तर्गत मात्र एक पुर है-  उपकिरण१-१८  आम्नाय का चेचवार वा चैण्डवार पुर,जिनका मूल स्थान चैनपुर, छपरा, बिहार माना जाता है। ये पांच प्रवर वाले हैं । सामवेद इनका वेद है और गन्धर्ववेद उपवेद । शाखा- कौथुमी । सूत्र गोमिल । छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम , तथा देवता हैं विष्णु ।

(१८)    रहदौरी गोत्र— विश्वामित्र,कौशिक और अघमर्षण नामक तीन प्रवर हैं इस गोत्र के। सामवेद इनका वेद है और गन्धर्ववेद उपवेद। शाखा- कौथुमी । सूत्र गोभिल । छंद है जगति । शिखा एवं पाद वाम है, तथा देवता हैं विष्णु । आर१-२४ आम्नाय का पुर रहदौरियार एकमात्र पुर है इस गोत्र में । रहदौली,रहयार, भुज इनका मूल स्थान माना गया है। ध्यातव्य है कि कौशिक गोत्र में भी इस पुर वाले मिलते हैं।
नोट— उक्त अठारह गोत्रों के अलावे कहीं-कहीं गौतम गोत्र के शाकद्वीपी की भी चर्चा है।

        अबतक अष्टादश गोत्र परम्परा की चर्चा की गयी । अब आगे षोडशगोत्र परम्परा की संक्षिप्त सूची प्रस्तुत की जा रही है, जो विशेषकर मध्यप्रदेश,कर्नाटकादि दक्षिण क्षेत्रों में स्थानान्तरित हो गए हैं। ये सभी तीन प्रवर वाले हैं, और देवी के उपासक हैं। ये पांच ऋषि—  भारद्वाज, कौशिक, काश्यप, कौण्डिन्य और मिहिर गोत्र परम्परा से ही सोलह हुए हैं। यथा—कटात,देवदत्त,भरत,भौंडल्य,हटवल्य,कौडल्य,मगध्न्य,आशिवन, मधवन, मूर्द्धनी,छाप्रवेन, शाण्डिल्य, कौशिकम्, जगवन, सार्वल्य, और हरिगोन नामक गोत्र हैं। पुरों में कौरियार, देवलसिया, स्वेतभद्र, भेढ़ापाकर, हुड्डीआरा, कुरैयार, मलौरियार, हरसिया, भलुनियार, पाराशीन, मेड़तवाल, वालार्क, छत्रवादी, मल्लौड़, यामुवार, पुनरखिया, और मिहिर नाम मिलते हैं।

       इस प्रकार विविध पुर-गोत्र-तालिका का गहन अवलोकन करने पर कई विसंगतियां दीख रही हैं। नामों की पुनरावृति या अपभ्रंशात्मक नाम भी मिल रहे हैं। एक ही पुरनाम दो आम्नायों में भी मिल जा रहा है। इसी भांति एक ही पुरनाम के गोत्र भेद भी मिल रहे हैं।

       दूसरी बात ये कि मूलस्थानों की चर्चा जो की गयी है, उनमें बहुत से स्थानों में वर्तमान समय में शाकद्वीपीय है ही नहीं । पूर्व में होने जैसे कोई प्रमाण भी नहीं मिलते। इससे ऐसा भी प्रतीत हो रहा है कि सामाजिक,राजनैतिक,आर्थिक कारणों से पूरी मण्डली वहां से विस्थापित हो गयी हो। इसमें भी आर्थिक कारण की तुलना में अन्य कारण ही प्रबल प्रतीत हो रहे हैं। स्वाभाविक है कि आर्थिक कारण- वृत्ति की खोज में गांव का गांव पलायन नहीं कर सकता । नामभेद (विसंगति) में ऐसा भी प्रतीत होता है कि स्थानान्तरण/विस्थापन के पश्चात कुछ दिन तक पूर्व(मूलस्थान)के असली पुरनाम को ढोते रहे और हो सकता है कि बाद में नये वासभूमि को ही परम्परा में ले लिये हों । जो भी हो, गहन शोध की आवश्यकता है इस विषय में । किन्तु हां,अहम आवश्यकता है परम्परा को स्मरण में रखना । हम खोजने का प्रयास करेंगे, तो मिलने की सम्भावना बढ़ेगी । प्रयास ही व्यर्थ लगेगा यदि तो विसरने का अवसर भी पर्याप्त है ।  अस्तु।


                        ---)ऊँ श्री दिनकरार्पणमस्तु(---
क्रमशः....