Monday, 29 September 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-59

गतांश से आगे...
अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार- भाग तीन 
ऊपर के(गत पोस्ट) चित्रांक "ग"और "छ" में आंशिक अन्तर है- दक्षिण और उत्तर दिशा में,शेष समान हैं।वैसे देखा जाय तो इन सभी चक्रों में किंचित ही भिन्नता है। अन्तिम चक्र छ मुहूर्तगणपति के श्लोक ९३,९४ के अनुसार है-
आयामे नवधा भक्ते द्वारमेंकांश मानतः।
प्राच्यां तूर्ये तृतीयेवा रुद्रकोणाद् विधीयते।।
याम्यां षष्ठे तृतीये वा तुरीयेंशेऽथ पञ्चमे।
उदीच्यां च प्रतीच्यां वा सव्यमार्गेण धीमता।।
हालांकि मुख्य द्वार-स्थापन में मतान्तर भी बहुत है।यही कारण है कि  इस महत्त्वपूर्ण बात के लिए हमें एक स्वतन्त्र अध्याय की आवश्यकता प्रतीत हुयी।
वास्तुशात्रों में मुख्यद्वार निर्णय के लिए सिर्फ वास्तुमंडल के पदों का ही नहीं, प्रत्युत गृहस्वामी की राशि,वर्ण,तथा ध्वजादि आय से भी द्वार चयन का निर्देश है।आगे इसे विभिन्न सारणियों के माध्यम से अधिकाधिक स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है,किन्तु सबसे पहले कोणों के निर्देश को जान लें।वैसे तो पूर्ब प्रसंगों में कोणों की चर्चा हुयी ही है,फिर भी पुनः इसकी वरीयता का ध्यान दिलाया जा रहा हैः-
विभिन्न कोनों पर बने मुख्यद्वार का परिणाम
ईशान
धनलाभ,किन्तु पिता-पुत्र में तनाव
अग्नि
अकारण तनाव
नैऋत्य
रोग,प्रेतवाधा,भ्रम
वायु
उद्वेग,वायुविकार,उच्चाटन










ऊपर की सारणी में विभिन्न कोणों में भवन के प्रवेश द्वार की चर्चा की गयी।अब अागे प्रवेश की चर्चा...

क्रमशः... 

Sunday, 28 September 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-58

गतांश से आगे...
अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार (भाग दो)
इस प्रकार, दी गयी सूची का अनुशरण करने से लाभ ही लाभ है।यथासम्भव मतान्तर वाले स्थानों से भी परहेज करना चाहिये।यहाँ कुछ चित्रों के माध्यम से इसे स्पष्ट किया जा रहा है-






ऊपर के चित्रांक "क" और "ख" में क्रमांक समान है,यानी सीमावर्ती क्षेत्रों में वास करने वाले देवताओं की संख्या बत्तीस ही है,किन्तु गौरतलब है कि ग्रहों की स्थापना का क्रम भिन्न है।चित्रांक "क" में सूर्य की अवस्थिति ईशान कोण में है,और क्रमिक रुप से दक्षिणावर्त परिभ्रमण क्रम से शेष नौग्रहों की स्थापना हुयी है,जबकि चित्रांक "ख" में सूर्य की अवस्थिति अग्निकोण में है,और तद्भांति ही क्रमिक रुप से दक्षिणावर्त परिभ्रमण क्रम से शेष नौग्रहों की स्थापना हुयी है। परिभ्रमण का प्रारम्भण क्रमशः ईशान और अग्नि से होने के कारण ग्रहों का स्थान बिलकुल ही बदल गया है,किन्तु गौरतलब है कि गुरु की स्थिति यथावत है।
 द्वारस्थापन का नियम है कि किसी भी दिशा में बुध,गुरु और शुक्र के स्थान में
ही द्वार होना चाहिए।अपवाद स्वरुप दक्षिण दिशा में (चूंकि गुरु के इस स्थान में ही यम भी हैं) निषेध किया गया है,जबकि कुछ विद्वान इसे भी प्रसस्त ही मानते हैं।
    प्रश्न ये है कि सूर्य की स्थिति दो तरह से क्यों?वस्तुतः इसका दो कारण है- एक तो दो विद्वानों का मत है,और दूसरी बात है- उत्तरायण और दक्षिणायण सूर्य की स्थिति,यानी यदि निर्माण कार्य उत्तरायण सूर्य की स्थिति में करते हैं, तो द्वारस्थापन हेतु चित्रांक "क" का पालन करें,और दक्षिणायण सूर्य में चित्रांक "ख" का।हालांकि इससे अन्तर कोई खास नहीं आता,द्वार की स्थिति वही रह जाती है,सिर्फ अधिष्ठाता ग्रह में परिवर्तन होता है(वह भी गुरु में नहीं)।
वास्तुरत्नाकर-द्वारप्रकरण में विस्तृत रुप से इसकी चर्चा है।सर्वप्रथम वास्तुमंडल के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित बत्तीस देवताओं के नाम और उन स्थानों में बनाये जाने वाले मुख्यद्वार का फलविमर्श प्रस्तुत करते हैं,जिन मूल निर्देशों के आधार
पर ऊपर की सारणी और तत्पूर्व का विवरण प्रस्तुत किया गया।यथा-
शिखिपर्यन्यजयन्तेन्द्रसत्या भृशोऽन्तरिक्षश्च।
ऐशान्यादि क्रमशो दक्षिणपूर्वेऽनिलः कोणे।।
पूषावितथबृत्क्षतयमगन्धर्वाख्यभृङ्गराजमृगाः।
पितृदौवारिकसुग्रीवकुसुमदन्ताऽम्बुपत्यसुराः।।
शोषोऽथ पापयक्ष्मा रोगः कोणे ततोहिमुख्यौ च।
भल्लाटसोमभुजगास्ततोऽदितिदितिरिति क्रमशः।।(वास्तुरत्नाकर८-१८,१९,२०)
एकाशीपद वास्तुमंडल के वाह्य सीमापर अवस्थित उक्त बत्तीस देवों के नाम ऊपर के श्लोकों में गिनाये गये।
अब आगे उन स्थानों में द्वारफल कहते है-
नवगुणसूत्रविभक्तान्यष्टगुणेनाऽथ वा चतुःषष्ठेः।
द्वाराणि यानि तेषामनलादीनां फलोपनयः।।
अनिलभयं स्त्रीजननं प्रभूतधनतां नरेन्द्रवाल्लभ्यम्।
क्रोधपरता नृतत्वं क्रौर्यं चौर्यं च पूर्वेण।।
अल्पसुतत्वं प्रैष्यं नीचत्वं भैक्ष्यपानसुतवृद्धिः।
रौद्रं कृतघ्नमधनं सुतवीर्यघ्नं च याम्येन।।
सुतपीड़ा रिपुवृद्धिर्न सुतधनाप्तिः सुतार्थफलसम्पत्।
धनसम्पन्नपतिभयं धनक्षयो रोग इत्यपरे।।
वधवन्धो रिपुवृद्धिः सुतधनलाभः समस्तु गुणसम्पत्।
पुत्रधनाप्तिर्वैरं सुतेन तौषाः स्त्रियां नैस्व्यम्।।(वास्तुरत्नाकर ८-२३ से २७)
   द्वार स्थापन सम्बन्धी कुछ और भी आवश्यक बातें जानने योग्य है।भवन का मुख्यद्वार सिर्फ भवनद्वार ही नहीं है,प्रत्युत वास्तुशास्त्र के नियमानुसार गृह स्वामी की सफलता का भी द्वार है।वास्तुशास्त्रियों का कथन है कि भवन निर्माण सर्वविध सही होने पर भी यदि मुख्यद्वार(प्रवेशद्वार)किसी निषिद्ध स्थान पर स्थापित हो गया तो नानाविध संकटों को आमन्त्रित कर देगा।अतः इस कार्य में बहुत सावधानी की आवश्यकता है।
    ज्योर्निबन्ध में बड़ा ही सुगम निर्णय दिया गया है-
     नवभागं गृहं कुर्यात् पञ्च भागं तु दक्षिणे।
     त्रिभागमुत्तरे कृत्वा शेषे द्वारं प्रकल्पयेत्।।
अर्थात् जिस दिशा में मुख्यद्वार बनाना हो उसकी लम्बाई को नौ भागों में बाँट दे।अब इसमें पांच भाग दाहिने और तीन भाग बांयें छोड़ दे।शेष भाग में द्वार स्थापन करे।
    अब यहाँ एक शंका होगी कि दाहिने-बांये किसका? किधर से?इसके लिए लोगों में वैचारिक मतभेद है।कोई कहते हैं- भवन में घुसते समय दांयें ज्यादा हो,और बांयें कम(यानी अधिक लेकर घर में प्रवेश करें,और कम लेकर बाहर निकलें,अर्थात संचय हो)किन्तु यह बचकानी बात है।इसका सरल निर्णय है कि भवन का मुख विचार करना है।यहाँ आय-व्यय का विचार नहीं हो रहा है।इस प्रकार भवन यदि पूर्वाभिमुख है तो हम पूरब मुख करके खड़े हो जायें-यानी भवन की ओर पीठ करके।अब मेरा जो दायां-बायां हो वही भवन का दांया-वायां हुआ,और इसी हिसाब से ऊपर से सूत्र को लागू करें।
    कुछ ग्रन्थों में इसी नौ विभाग को मानते हुए भी भिन्न दिशाओं में भिन्न भाग को स्वीकृति देते हैं।इसकी चर्चा वास्तुरत्नाकर में भी है-
दैर्घ्ये नवांशात्पदमत्र सव्याद्द्वारं शुभं प्राक् त्रिचतुर्थभागे।
चतुर्थषष्ठे दिशि दक्षिणस्यां पश्चाच्चतुः पञ्चमके तथोदक्।
अर्थात् पूरब दिशा में लम्बाई के तीसरे और चौथे नवांश में,दक्षिण दिशा में चौथे और छठे नवांश में,तथा पश्चिम और उत्तर दिशा में चौथे और पांचवें नवाश में मुख्य द्वार बनाना चाहिए।इसे नीचे के चित्र में स्पष्ट किया जा रहा है।साथ ही कुछ मतान्तर चित्र और सारणियाँ भी प्रस्तुत हैं।

क्रमशः...

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-57

                              अध्याय १४.मुख्य द्वार-विशेष विचार
  वास्तु-द्वार रहस्यः- जैसा कि पूर्व अध्यायों के अध्ययन से स्पष्ट है कि वास्तु मंडल के चारों दिशाओं के प्रथम पंक्ति में कुल मिलाकर बत्तीस देवताओं का वास है।किस देवता के वास-स्थान में मुख्यद्वार बनाने का क्या फल होता है- आगे की पंक्तियों में स्पष्ट किया जा रहा है।यथा-
पूरब दिशाः-
१)शिखी-इस स्थान पर द्वार बनानेसे दुःख,हानि,भय और रोग होता है।
२)पर्जन्य- इस स्थान पर द्वार बनानेसे परिवार में कन्याओं की वृद्धि,धनहानि और शोक होता है।
३)जयन्त- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन की प्राप्ति होती है।
४)इन्द्र- इस स्थान पर द्वार बनानेसे राज-सम्मान की प्राप्ति होती है।
५)सूर्य- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन प्राप्त होता है।(मतान्तर से इस स्थान पर द्वार बनानेसे क्रोध की वृद्धि होती है।उचित है कि इस स्थान से बचा जाय।
६)सत्य- इस स्थान पर द्वार बनानेसे चोरी का भय,कन्याओं की बहुलता,झूठ बोलने की प्रवृत्ति आदि का सामना करना पड़ता है।
७)भृश- इस स्थान पर द्वार बनानेसे क्रोध,क्रूरता,और पुत्र हानि होती है।
८)अन्तरिक्ष- इस स्थान पर द्वार बनानेसे चोरी का भय और धन की हानि होती है।
दक्षिण दिशाः-
९)अनिल- इस स्थान पर द्वार बनानेसे सन्तान हानि होती है।
१०)पूषा- इस स्थान पर द्वार बनानेसे गुलामी और बन्धन का सामना करना पड़ता है।
११)वितथ- इस स्थान पर द्वार बनानेसे नीच बुद्धि(नीचत्व) होती है।
१२)बृहत्क्षत- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धनागम और पुत्र लाभ होता है।
१३)यम- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन की बृद्धि तो हो सकती है,किन्तु अकारण भय,दुःस्वप्न आदि का सामना करना पड़ सकता है।अतः इस स्थान से यथासम्भव बचना ही चाहिए।
१४)गन्धर्व- इस स्थान पर द्वार बनानेसे अभय और यश की प्राप्ति होती है।
१५)भृंगराज- इस स्थान पर द्वार बनानेसे निर्धनता,तथा व्याधि और चोर का भय होता है।
१६)मृग- इस स्थान पर द्वार बनानेसे अकारण-अचानक बलहानि और रोग होता है।
पश्चिम दिशाः-
१७)पिता- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन-पुत्र की हानि,और शत्रुओं की बृद्धि होती है।
१८)दौवारिक- इस स्थान पर द्वार बनानेसे स्त्री कष्ट-वियोग और शत्रु बृद्धि होती है।
१९)सुग्रीव- इस स्थान पर द्वार बनानेसे श्री-समृद्धि आती है।
२०)पुष्पदन्त- इस स्थान पर द्वार बनानेसे पुत्र और धन लाभ होता है।
२१)वरुण- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन और सौभाग्य की बृद्धि होती है।
२२)असुर- इस स्थान पर द्वार बनाकर राजभय और दुर्भाग्य को निमंत्रित करना है।
२३)शोष- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन हानि होती है।
२४)पापयक्ष्मा- इस स्थान पर द्वार बनानेसे रोग-शोक की बृद्धि होती है।
उत्तर दिशाः-
२५)रोग- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन और स्त्री की हानि,गुलामी और बन्धन,शत्रु बृद्धि,यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है।
२६)नाग- इस स्थान पर द्वार बनानेसे रोग-शोक-शत्रु की बृद्धि,धन,बल और स्त्री की हानि होती है।
२७)मुख्य- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन-पुत्रादि का लाभ होता है।(मतान्तर से हानि का भी संकेत है।)
२८)भल्लाट- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन-पुत्रादि का लाभ होता है।
२९)सोम- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धन-सुख-समृद्धि-पुत्रादि का लाभ होता है।
३०)भुजग- इस स्थान पर द्वार बनानेसे धनकी हानि,पुत्रों से मनमुटाव,और दुःख का आगमन होता है।
३१)अदिति- इस स्थान पर द्वार बनानेसे स्त्री वर्ग का चारित्रिक पतन,शत्रु-बाधा, भय और शोक की आशंका होती है।
३२)दिति-इस स्थान पर द्वार बनानेसे निर्धनता,रोग-शोक,दुःखःसंताप,बहु विघ्न-बाधायें झेलनी पड़ती हैं।

इन्हीं तथ्यों को नीचे की सारणी में दर्शाया जा रहा है,जो ऊपर दिये गये फलविमर्श से आंशिक भिन्न हैः-

क्रमांक
दिशा
देवता(पदेश)
द्वार-फल
.
ईशान
शिखि(ईश)
अग्निभय
.
पूर्व
पर्जन्य
स्त्रीपीड़ा
.
पूर्व
जयन्त
धनलाभ
.
पूर्व
इन्द्र
विजय
.
पूर्व
सूर्य
मनस्ताप
.
पूर्व
सत्य
पुत्रीकष्ट
.
पूर्व
भृश
शत्रुभय
८.
पूर्व
आकाश
चौरभय
.
आग्नेय
अग्नि
पुत्रकष्ट
१०.
दक्षिण
पूषा
परिवारिककष्ट
११.
दक्षिण
वितथ
कल्याण
१२.
दक्षिण
गृहक्षत
पुत्रलाभ
१३.
दक्षिण
यम
मृत्यु
१४
दक्षिण
गन्धर्व
अपमान
१५
दक्षिण
भृंगराज
हानि
१६
दक्षिण
मृग
पुत्रकष्ट
१७
नैऋत्य
पितृ
पुत्रनाश
१८
पश्चिम
दौवारिक
कर्णरोग
१९
पश्चिम
सुग्रीव
अर्थकष्ट
२०
पश्चिम
पुष्पदन्त
मनःतुष्टि
२१
पश्चिम
वरुण
शान्तिआरोग्य
२२
पश्चिम
असुर
हानि
२३
पश्चिम
शोष
धनहानि
२४
पश्चिम
राजयक्ष्मा
रोग
२५
वायु
वायु
मृत्यु
२६
उत्तर
नाग
शत्रुवर्द्धन
२७
उत्तर
मुख्य
सन्ततिलाभ
२८
उत्तर
भल्लाट
धनवृद्धि
२९
उत्तर
कुबेर
ऐश्वर्यलाभ
३०
उत्तर
शैल
परिजनविरोध
३१
उत्तर
अदिति
स्त्रीकष्ट
३२
उत्तर
दिति
कार्यवाधा