Saturday, 6 September 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-43

गतांश से आगे...
अध्याय १३.वास्तु मण्डल-(क)अन्तःवाह्य संरचना(कहां क्या?)ग्यारहवांभाग 

१०.सीढ़ी- कक्षयोजना का एक आवश्यक अंग है- सीढ़ी,चाहे मकान एक मंजिल हो या बहुमंजिल।एक मंजिल मकान में भी छत के उपयोग के लिए आवश्यक है, जबकि बहुमंजिल में वस्तुतः एक (या अनेक) नये वास्तुमंडल में प्रवेशद्वार का प्रतिनिधित्व करती है सीढ़ियाँ।हालांकि प्रवेशद्वार के सभी नियम इस पर लागू नहीं होते,फिर भी अति महत्वपूर्ण तो कहा ही जायेगा।हाँ,दक्षिण-मुख-प्रवेश की वर्जना से मुक्त है- यानी सीढ़ी पर चढ़ते समय दक्षिण होना निषिद्ध नहीं हैं। सीढ़ी का तत्व पृथ्वी है।गुण गुरुत्व।सीढ़ी के सम्बन्ध में सबसे आवश्यक है- यह ध्यान रखना कि सीढ़ी का घुमाव सदा दक्षिणावर्त(Clockwise)हो।विपरीत घुमाव बिलकुल वर्जित है।दूसरी बात यह कि बीच के किसी मोड़ पर या प्रारम्भ में ही,या कहीं भी तिकोना(सिंघाड़े के आकार का) पायदान न हो।सभी पायदान चौड़ाई और ऊँचाई में एक समान हों।तीसरी बात यह कि पायदानों की संख्या विषम हो।चौथी बात- बीच में मोड़ के जगह जो चौताल निकालते हैं,प्रयास करें कि वास्तुमंडल के अन्दर ही चौताल रहे,न कि सुविधा,और जगह बचाने के लिए इसे मंडल के बाहर निकाल दिया जाय- जैसा कि प्रायः इंजीनियर किया करते हैं। सीढ़ी के ऊपर और नीचे दोनों भाग में दरवाजे(गेट)लगाये जायें।निचले दरवाजे की तुलना में ऊपरी दरवाजा अष्टमांश छोटा(लंबाई और चौड़ाई में)हो। सीढ़ी के अन्तिम सिरे पर उचित है कि समतल छत ढाल दिया जाय,किन्तु यदि भविष्य में अभी और ऊपर जाने की योजना हो,जिस कारण ढलाई न करके करकट या टीन सेड डाल रहे हों तो ध्यान रखें कि उसकी ढाल सदा उत्तर या पूर्ब की ओर ही हो।दक्षिण या पश्चिम कदापि न हो छप्पर की ढाल,या पिरामिडनुमा छावनी करें तो ढाल किसी भी दो दिशाओं में होने में कोई हानि नहीं है।यानी उत्तर-दक्षिण, या पूरब-पश्चिम दोनों विहित है।पिरामिडनुमा छप्पर में दिशादोष नहीं लगता।आगे यहाँ एक चित्र के माध्यम से वास्तुमंडल में सीढियों का उचित स्थान दर्शाया जा रहा है।इसका सम्यक् पालन होना चाहिए। 
क्रमशः...

No comments:

Post a Comment