Monday, 8 September 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-44

गतांश से आगे...
अध्याय १३.वास्तु मण्डल(क)अन्तःवाह्य संरचना(कहां क्या?)बारहवां भाग

११.आँगन-प्रायःलोग आँगन और खुलाभाग को एक दूसरे का विकल्प मान लेते हैं,किन्तु बात ऐसी नहीं हैं।किसी भी क्षेत्र का खुलाभाग आँगन का विकल्प कदापि नहीं हो सकता।आँगन का औचित्य और महत्त्व है- वास्तुमंडल के आकाश तत्त्व का संतुलन,जो कि मंडल के मध्य में ही हुआ करता है;जबकि खुला भाग मंडल के अन्य खण्ड में भी हो सकता है।इसके बारे में पिछले अध्यायों में ब्रह्मस्थान और आकाश तत्त्व के वर्णनक्रम में काफी कुछ कहा जा चुका है।इसकी मर्यादा की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए।वास्तुशास्त्र में इस अति मर्मस्थल के बनावट पर गहराई से विचार किया गया है।यथा-
दीर्घविस्तारसङ्ख्यैक्यं चन्द्रैश्च गुणितं तथा।
नवभिस्तु हरेद्भागं शेषमाजिरमुच्यते।।
दाता विचक्षणो भीरुः कलहो नृपदानवौ।
क्लीवश्चौरो धनी चेति नामतुल्यं फलं स्मृतम्।।(वास्तुरत्नाकर५-८९)
अर्थात् आँगन की लम्बाई-चौड़ाई के हस्तप्रमाणों को जोड़कर एक से गुणा करके नौ से भाग देकर, शेष से क्रमशः नामानुसार फल विचार करना चाहिए। शेषों के नाम- १.दाता,२.विचक्षण,३.भीरु,४.कलह,५.नृप,६.दानव,७.नपुंसक,८.चोर, और ९.धनी।
उक्त श्लोक में एक से गुणा करने का औचित्य समझ नहीं आता।फिर भी यथावत इसे मान लेने में कोई गणितीय भूल नहीं है।
एक अन्य प्रसंग में कहा गया है-
दीर्घविस्तारहस्तैक्यं वसुभिर्गुणितं तथा।
नवभिर्भाजिते शेषं वदेद् गेहाङ्गणं सुधीः।।
तस्करः भोगि विचक्षण दाता नृपतिर्नपुंसको धनदः।
दारिद्रो भयदाता नामसमाना फलप्रदास्ते स्युः।।(वास्तुरत्नाकर५-९०,९१)
अर्थात् आँगन की लम्बाई-चौड़ाई के योग को आठ से गुणा करके,नौ से भाग देने पर क्रम से शेष १.तस्कर,२.भोगी,३.विचक्षण(पंडित),४.दाता, ५.नृपति, ६.नपुंसक,७.धनद,८.दरिद्र,और ९.भयद- नामानुसार प्रभावकारी होता है।गौरतलब है कि दोनों श्लोकों में क्रिया और शेष क्रम की भिन्नता है।पूर्व की अपेक्षा इस श्लोक का प्रयोग अधिक स्पष्ट और तर्कसंगत है।
आँगन की बनावट पर वास्तुशास्त्र का कथन है-
मध्ये निम्नं त्वङ्गणाग्रं तथोच्चैः,शश्वच्चैवं पुत्रनाशाय गेहम्।(वास्तुराजवल्लभ- ९-४,तथाच वास्तुरत्नाकर-५-९२)
अर्थात् बीच में नीचा और चारो ओर ऊँचा आँगन पुत्रनाशक होता है।तद्विपरीत यानी बीच में ऊँचा और चारो ओर नीचा आँगन अतिशुभद होता है।
ब्रह्मस्थान में बनाये गये आँगन को आजकल सुरक्षा की दृष्टि से लोहे की पट्टियों से जालीदार बनाकर ढक देते हैं,यह भी ब्रह्मस्थान पर बुरा प्रभाव डालता है।लोहे के वजाय मजबूत और टिकाऊ लकड़ी(सखुआ,पानन,करासन आदि)से यह सुरक्षा दी जाय तो अच्छा है।यदि लोहा ही रख रहे हैं,तो कम से कम उसके रंग का चुनाव सही करें- आकाश का रंग हो या फिर ब्रह्मा का पीला रंग- ताकि दोष में कमी हो।
भवन के अन्तर्गत खुलाभाग(जहाँ सीधे आकाश दर्शन हो सके)रखने में सावधानी बरतनी चाहिए।इसके लिए वास्तुमंडल में ऊर्जा-प्रवाह नामक पिछले अध्याय में दिये गये निर्देशों का पालन करना चाहिए।
वरामदा,वालकनी,आदि के लिए पूरब,उत्तर,ईशान,वायव्य आदि दिशायें सही है।
इसके लिए गत चित्रांकों और विवरणों का सहयोग लिया जाना चाहिए।
नोटः- कार्यालय,कार्याशाला,औषधालय,देवालय,विद्यालय,व्यावसायिक प्रतिष्ठान, कल-कारखाने आदि की निर्माण-योजना पर आगे अठारहवें अध्याय(विविध गृह प्रकार)में चर्चा होगी।
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