Tuesday, 16 September 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-50

गतांश से आगे...
अध्याय १३.वास्तु मण्डल-(ख)अन्तःवाह्य संरचना(कहां क्या?) भाग छः

८.स्तम्भ(पीलर)- मुख्य द्वार या भीतर-बाहर के वरामदे,वालकनी आदि की सुरक्षा,सुन्दरता और मजबूती के लिए तरह-तरह के स्तम्भ(खम्भे) बनाये जाते हैं।इनका आकार चौकोर,गोल,षटकोण,अष्टकोण आदि हुआ करता है।खम्भे को खड़ा करने के लिए उसकी कुर्सी(प्लिंथ),और ऊपरी भाग में तोरण/मेहराब (Arch)आदि बनाते हैं। खम्भों के सभी पहल विलकुल समान होने चाहिए,जरा भी त्रुटि न हो इनकी बनावट में।कुर्सी गृहस्वामी के बित्ते से कम कदापि न हों, अधिक की स्थिति में अंगुल की संख्या विषम होना चाहिए।ऊपरी मेहराब तिकोना न बनायें।मेहराब की बनावट पर भी ध्यान देना जरुरी है।एक सौ अस्सी डिग्री से अधिक न हों।यहाँ आगे चित्र में इनके कुछ विधि और निषेध दिखलाये जा रहे हैं।इनके अतिरिक्त भी अनेक तरह के तोरण हो सकते हैं,जिनके निर्माण में इन्हीं मूल तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए।पूर्वकाल में इन स्तम्भों की सजावट के लिए मणि-मुक्ताओं का प्रयोग होता था।आज तो ये अंगूठी और लोलक (लॉकेट) तक सिमट आये हैं।इनके स्थान पर सेरेमिक टाइलें प्रयुक्त होने लगी हैं।टाइल्स लगाने में ध्यान रखना चाहिए कि स्तम्भ आईना न बन जाँय- बहुत परावर्तन वाले टाइल का प्रयोग न किया जाय।बहुत जगह दुकानों आदि में पीलर को छिपाने या सजाने के उद्देश्य से उन पर सीधे दर्पण का प्रयोग कर देते हैं।यह भी दिशा और परावर्तन का ध्यान रखते हुए ही करना चाहिए।गलत दिशा का परावर्तन काफी हानिकारक हो सकता है। 

क्रमशः...

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