Monday, 8 September 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-45

अध्याय १३(ख)संरचना सम्बन्धी विशेष बातें   
   विभिन्न कमरों की संरचना के बारे में पूर्व प्रसंग में काफी कुछ कहा गया।वास्तुमंडल की अन्तःवाह्य संरचना में और भी बहुत सी बातें हैं,जिनपर वास्तु विशेषज्ञ को ध्यान देना अति आवश्यक है।ये बातें आवासीय वास्तु के अतिरिक्त अन्य वास्तु संरचनाओं के लिए भी समान रुप से उपयोगी होंगी।अतः इन्हें यहाँ क्रमशः स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा हैः-
१.              भूगर्भ खण्ड,तहखाना(वेसमेन्ट,अण्डरग्राउण्ड)- पहले रजवाड़ों में संकट और सुरक्षा की दृष्टि से सुरंगपथ,तहखाने आदि बनाने की अनिवार्यता थी,जो आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है;किन्तु आजकल ज्यादातर स्थानाभाव वश यह काम किया जा रहा है।इस सम्बन्ध में सीधा सा वास्तु निर्देश है कि यदि पूरे वास्तु मंडल में भूगर्भ खण्ड बनाना है,तब तो कोई खास बात नहीं है,क्यों कि वस्तुतः वह भी एक मंजिल की तरह हो गया।अन्य मंजिलों की जैसी योजना विधि है, वैसी ही उसकी भी होगी- थोड़ी भिन्नता सहित।सिर्फ इतना ही ध्यान रखने से काम चल जायेगा कि भूतलमंडल की ऊँचाई से अष्टमांश कम गहराई रखा जाना चाहिए।किन्तु यदि पूरे भूखण्ड को भूगर्भीय नहीं बनाना है,वैसी स्थिति में कुछ विशेष नियम अपेक्षित होंगे।तत्त्व और दिशा के अनुसार जैसे ऊपरी ऊँचाई, निर्माण,और वस्तुस्थापन आदि का नियम है,ठीक वैसा ही यहाँ भी पालनीय होगा।
     दक्षिण-पश्चिम को नीचा नहीं होना चाहिए यानी इन्हें गहरा भी नहीं होना चाहिए।केवल केन्द्रीय भाग को छेड़ना तो सर्वाधिक अनिष्टकर है।ईशान,पूरब,उत्तर आदि को भूगर्भीय कक्ष के रुप में बनाया जा सकता है।फिर वहाँ वस्तुओं के रख-रखाव में भी वास्तु के वे ही सारे नियम लागू होंगे।आगे एक चित्र के माध्यम से इसे स्पष्ट किया जा रहा है।चित्र में हरे रंग से प्रथम श्रेणी के निरापद क्षेत्र को, एवं पीले रंग से द्वितीय श्रेणी के निरापद क्षेत्र को दर्शाया गया  है।लाल रंग वाले क्षेत्रों को सर्वथा छेडछाड से मुक्त रखने का निर्देश है।

क्रमशः...

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