Monday, 27 May 2019

श्रद्धांजलि


श्रद्धांजलि

श्रद्धांजलि, सहानुभूति , मुआवज़ा - जैसे महत्वपूर्ण शब्द मात्र राजनैतिक-सामाजिक औपचारिता होकर रह गए हैं । किसी घटना के बाद इन ' शब्द-जालों ' का धड़ल्ले से प्रयोग, इनके आगे-पीछे की जिम्मेवारियों से मुक्ति का ही मुख्य संकेत प्रायः देता है । श्रद्धांजलि देने के बाद, देने वाला स्वयं को बिलकुल भार-मुक्त सा अनुभव कर लेता है । श्रद्धांजलि दे देना, सहानुभूति प्रकट कर देना स्वयं को स्वयं से संवेदनशील होने का प्रमाण-पत्र दे देने से रत्ती भर भी अधिक नहीं है ।

विभिन्न कोचिंग-संस्थान-संघों द्वारा दी जा रही श्रद्धांजलियांँ इसका ताजा उदाहरण हैं ।

अभी हाल में गुजरात के एक कोचिंग संस्थान में भयानक अग्निकांड की हृदयविदारक घटना के पश्चात यहां-वहां कई शहरों में अग्निशामक विभाग सक्रिय हुए है । उन्हें अपनी जिम्मेवारियां याद आयी , कर्तव्यबोध हुआ । शहरों में कुकुरमुत्त की तरह पसरे कोचिंग संस्थानों की जाच की जा रही है , जिनमें ज्यादातर संस्थान नियम-कानून, माजिकता, मानवता, संवेदनशीलता आदि को धत्ता बताते हुए सिर्फ अपनी जेब भरने पर तुले हैं । अपवाद स्वरुप कुछ गिने चुने को छोड़कर, अधिकांश संस्थानों में मानक शिक्षकों का भी अभाव ही रहता है । योग्य शिक्षक के स्थान पर सिर्फ बेरोजगारों और नवसिखुओं की भीड़ होती है ।
कोचिंग संस्थान ही नहीं, अन्य शिक्षण संस्थान भी- जहां हमारे नौनिहाल गदहे की हाल में अपने वजन से दुगना भार ढो, कमर और गर्दन झुकाये रोज भेजे जा रहे हैं- वहा की भीतरी हालात भी लगभग ऐसी ही हैं , जैसा अभी अखबार की सुर्खिया कह रही हैं ।
जेब से भारी और अक्ल से पैदल ' मेकाले की औलादें ' आँखें मूद कर इन संस्थानों का भरण-पोषण करती हैं । इनके नाज-नखरे सहती हैं, जहा सिर्फ शोषण ही शोषण है । ये संस्थानें सिर्फ शिक्षा का व्यापार नहीं करती, ल्कि शिक्षा की आड़ में किताब-कापियां, स्टेशनरीज, कपड़े, जूते सब कुछ मुहैया कराती है- ऊँची शिक्षा के नाम पर- कई गुने ऊँचे दामों पर, साथ ही अभिभावकों के लिए मुफ्त में ' टेशन के गिफ्ट ' भी व्यवस्था हती है । गौरतलब है कि च्चस्तरीय शिक्षा से कहीं ज्यादा अति महत्वाकांक्षी बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है- ज्यादातर संस्थानों में । बौद्धिक विकास कोई खास मायने नहीं रखती , जितना कि ' ड्रेसकोड ' अहमियत रखता है ।
मुझे समझ नहीं आता कि खास कर ऐसे देश में जहाँ प्याज और दाल की बढ़ती कीमत से सरकारें गिरने-डगमगाने लगती हैं,वहां शिक्षण-संस्थानों के बहुआयामी शोषण के विरोध में इतने मौन क्यों हैं हम !

कोई बड़ी घटना घट जाती है तब बच्चों के अभिभावक से लेकर लोकतन्त्र के चारों अभिभावक तक की आँखें खुलती हैं ,थोड़े दिनों के लिए श्रद्धांजलियों का कोरम पूरे करने के बाद, बातें आयी-गयी होकर रह जाती है
सरकारें तो सोयी रहने की आद हैं । नियामक विभाग भी सरकारी गतिविधि से वाकिफ है, किन्तु क्या पहला कर्तव्य बच्चों के अभिभावकों का ये नहीं है कि जिन स्कूलों या कोचिंग संस्थानों में अपने बच्चों को भेज रहे हैं उनकी अन्तः-वाह्य व्यवस्था कैसी है- इसकी जा-पड़ताल करें ? उनकी नाज़-नखरे सहने की अपेक्षा उन पर पैनी नजरें रखें ।
किन्तु ये ठीक वैसी ही बात है जैसे बीमार होकर डॉक्टर के पास गये हुए रोगी की इस बात में दिलचस्पी नहीं रहती कि डॉक्टर प्रैक्टिस के लिए ऑथोराइज़्ड है कि नहीं । यही कारण है कि प्रशासन के नाक के नीचे भी ' क्वैकों ' की ज़मात मौज करते रहती है ।
दरअसल हम सिर्फ भीड़ देखत है -- अस्पताल की भीड़ हो या कि स्कूल क या कहीं और क । भीड़ ही ऑथेंटिक हो जाता है ; क्यों कि ' भीड़ ' बिलकुल बाहर से दीख जाने वाली चीज होती है, हां किसी और प्रमाण की गुंजाश ही नहीं होती ।
और सबसे बड़ी बात होती है कि हम अधिक गरज़मन्द होते हैं- हमारी ख्वाहिश़ें होती है बड़े संस्थानों में अपने बच्चों को दाख़िला दिलाने की, बड़े डॉक्टर से अपना इलाज कराने की । किन्तु सच्चाई ये है कि बड़ा होने का जो पैमाना है, जो मापदण्ड है वो सही नहीं है हमारे पास । व्यवसाय-बहुल लफाज़ी विज्ञापनबाजी के युग में चमक-दमक, तड़क-भड़क, नाज-नखरे और भीड़ से हम मूल्यांकन करते हैं- अच्छे-बुरे का । और बाजारवाद का सिद्धान्त कहता है कि गरज़मन्द का शोषण जितना किया जा सके, िया जाना चाहिएये भी एक कटु सत्य है कि मानवतावाद के कब्र पर ही पूँजीवाद की मीनार खड़ी हो पाती है ।
ध्यान रहे - ये पश्चिम सोच है -- हम ' पश्चिमी संस्कृति के गुलामी के दस्तावेज़ ' भोजन-वस्त्र-आवास के बाद हमारे यहा शिक्षा और स्वास्थ्य जन्मसिद्ध अधिकार माना गया है । ये दोनों अति पुनीत कार्य कहे गए हैं , इनका व्यापार नहीं होता था जबकि आज ठीक इसके विपरीत स्थिति है । शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर हमारा सर्वाधिक शोषण हो रहा है । वर्तमान समय में शिक्षक, गुरु और चिकित्सक नहीं, अपितु शिक्षा और चिकित्सा माफ़ियों की भरमार है । योग्य गुरु और चिकित्सक मिलना भगवान मिलने जैसा है । आधुनिक शिक्षा नीति और व्यवस्था ने हमें पंगु बना दिया है, जड़ बना दिया है , संवेदनशून्य बना दिया है । काबिल बनाने के बजाय परवश, विवश, अपाहिज़ और बेवकूफ बना दिया है
अतः हमें गुलामी की इस जंजीर से मुक्ति पाने का संकल्प लेना होगा और प्रतिज्ञ करन होग । इन संस्थानों को ध्वस्त कर अपने गुरुकुल परम्परा की पुनर्स्थापना करनी होगी । योग, आयुर्वेद और गुरुकुल तीनों संस्थानों को विकसित करना होगा किन्तु इनके लिए सर्वप्रथम अपनी मानसिकता बदलन होग । अन्यथा श्रद्धांजलियों और मुआवज़े का सिलसिला जारी रहेगा और हम तमाशबीन बने रहेंगे । अस्तु ।
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Friday, 17 May 2019

बूढ़े पीपल की पीड़ाभरी चेतावनी


                            
                           बूढ़े पीपल की पीड़ाभरी चेतावनी

उस बूढ़े पीपल से आँख मिलाकर बात करने की जरा भी हिम्मत नहीं होती मेरी, जो पितामहेश्वरघाट पर लम्बे समय से अविचल खड़ा है । लम्बी-लम्बी बाहें  पसारे नारियल के दो दरख्तों के बीच मेरे किराये के घर की एक छोटी सी खिड़की उस ओर ही खुलती है । उसकी सलाखों की आड़ लेकर कभी-कभार साहस जुटाकर बस झांकभर लेता हूँ उसे, जिसकी शाखा-प्रशाखाओं में अगनित छोटी-बड़ी घटिकायें लटकी पड़ी होती हैं । हररोज कई फोड़ी जाती हैं उनमें और कई नयी घटिकायें लटकायी भी जाती हैं । ये परम्परागत सिलसिला कब से जारी है, कुछ कहा नहीं जा सकता ।  हां, इतना जरुर कह सकता हूँ कि जैसे ही उस पीपल की शाखायें कुछ भार सम्भालने लायक हो गयी होंगी, घटिकायें लटकनी शुरु हो गयी होंगी और ये भी पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि आने वाले दिनों में भी ये क्रम जारी रहेगा, जबतक उन शाखाओं में भारवहन की क्षमता रहेगी ।

पितरों की पवित्रभूमि, प्राणियों की सद्गति और मोक्ष की नगरी गया जिसे श्रद्धावनत लोग गयाधाम भी कहते हैं । इस नगरी में ही पितामहेश्वर—पितामहों के ईश्वर (न कि महेश्वर के पिता) का एक अति प्राचीन स्थान भी है ।     
यूँ तो गयाश्राद्ध जनित पिण्डदान का एक प्रधान वेदी है - पितामहेश्वर, किन्तु गयाश्राद्धीय पिंडदानी से कहीं अधिक संख्या में,  अनन्तंशिवसन्निधौ... आप्तवाक्य से प्रभावित प्रायः शहरभर के लोग यहीं आकर, इसी पीपल के आसपास विशेषकर दशगात्रकर्म सम्पन्न करते हैं । मान्यता है कि दस दिनों पूर्व जिस प्रियजन का अग्निसंस्कार करके पार्थिव शरीर को विलीन कर देते हैं, उसे ही दशगात्र के पावन वैदिक मन्त्रों से पुनर्निर्मित करने का प्रयास करते हैं । श्राद्धीय (श्रद्धायुक्त) पिण्ड-शरीर तो निर्मित हो जाता है, किन्तु, क्या वो आत्मीय प्राणी स-प्राण लौट आ सकता है- ऐसा करने से ? नहीं न । परन्तु हम ऐसा करते हैं । भारतीय संस्कृति और परम्परा ऐसा करने का हमें निर्देश देती है । हम उसका अनुपालन करते हैं ।

इस पीपलवृक्ष के पत्ते-पत्ते पर अगनित रुदन और करुणा की ध्वनितरंगें अवशोषित हैं । हो सकता है आने वाले समय में कोई ऐसे डिवाइस का हम  प्रयोग कर पायें, जो इन अवशोषित तरंगों को डिकोड कर हमें फिर से सुना सके । 

हालाकि मैं इन्हें बिना डिकोडिंग के ही सुनता हूँ, रोज सुनता हूँ । और यही कारण है कि उस पीपल से आँख मिलाकर संवाद करने की साहस नहीं है मुझमें । वह सिर्फ दिवंगत प्राणी के परिजनों का क्रन्दन ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ सुनाते रहता है, क्यों कि उसे भी पता है कि मैं उसकी बातों को ध्यान से सुनता हूँ, भले ही कुछ कर नहीं पाता – न उसके बावत, न अपने लिए और न रोती-विलखती दुःखी दुनिया के लिए ही ।

सुनने-सुनाने से भी मन से पीड़ा का बोझ शायद कुछ कम होता है, जब कि कहा गया है—रहिमन निजमन की व्यथा मन ही राख्यो गोय...।

लगभग दिनभर दशगात्रकर्मियों का रोना-धोना गूंजते रहता है पीपल के आसपास—विशेष कर अपने लाल खोयी माताओं का करुण क्रन्दन और सुहाग खोयी अबलाओं की चीत्कार सुनते-सुनते सिर झनझनाने लगता है । 
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्माद परिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।-- जो जन्मा है वो मरेगा ही और जो मर गया है वो जन्म भी जरुर लेगा । ऐसे में किसी तरह के शोक की क्या आवश्यकता यानी शोक न करे—कृष्ण ने तो कह दिया । पूरी गीता कंठाग्र भी है, किन्तु इससे क्या ? केवल कहने भर से क्या होता है ? सुनने भरसे क्या कहीं ज्ञान-लब्ध हो जाता है कोई ? जानकारी और ज्ञान के बीच बहुत बड़ी खाई  है और वो खाई जबतक पटेगी नहीं, तबतक सिर तो झनझनायेगा ही न !

दिन ढलने पर शाम होती है, फिर लम्बी रात का सिलसिला शुरु होता है । उस समय क्रन्दन-चीत्कार तो नहीं होते, पर उनका अनुगूंज वहीं का वहीं मौजूद होता है । बूढ़ा पीपल मुस्कुराता है, खीझता भी है । और कभी-कभी बिलकुल कूटस्थ और स्थितप्रज्ञ प्रतीत होता है । सुनने की उत्सुकता हो तो संवाद भी खूब करता है । हमदोनों एक दूसरे के एकान्त का सम्बल बन जाते हैं अकसर ।   

एक दिन कहने लगा—

देखते हो, दुनिया की दशा—अपने को फ़िकरमन्द तो खूब लगाता है, पर है बिलकुल बेपरवाह...स्वार्थी और निर्लज्ज भी । हालाकि उसे पता है कि जो ऑक्सीजन लेता है और कार्बन उगलता है, उसे मैं ही संतुलित करता हूँ अपने साथियों के साथ, किन्तु धड़ल्ले से नष्ट करते जा रहा है हमें और हमारे साथियों को । कंकरीट के जंगल खड़े करता जा रहा है—पहाड़ों और जंगलों ही नहीं खेत-खलिहानों को भी दैत्य की तरह निगलते हुए । भूगर्भ का तेल ही नहीं पानी भी सोख लिया मूर्खों और स्वार्थियों ने । उन्मुक्त नीले आकाश तक को वक्शा नहीं । मिट्टी, पानी, धूप और हवा सब प्रदूषित कर चुका है फिर भी सन्तोष नहीं है । धरती तो सम्हला नहीं और  चाँद,मंगल,बृहस्पति, शनि पर छलांग लगाने की तैयारी में जुटा है मूरख । अमरता और सम्प्रभुता के सपने देखता, भीतर से भयभीत इन्सान इन्सानियत को कबका खो चुका है । जल-थल-वायु चारों ओर बारुदी सुरंगें बिछी-पटी हैं ।

साल में एक दिन पर्यावरणदिवस मनाता है और बाकी दिन पर्यावरण का विध्वंसक बनता है । मदर्सडे, फादर्सडे, चिल्ड्रन्सडे, ओमेन्सडे, फैमिलीडे- सब मनाता है, किन्तु कॉन्वेट और वृद्धाश्रम भी दिन दूने रात चौगुने की गति से बढ़ते जा रहे हैं । नौ महीने पेट में रख कर बच्चा पालने का धैर्य नहीं, फुरसत भी नहीं, बूढ़ों को भला कौन सम्भाले !  
 कॉन्वेन्ट का कॉन्सेप्ट उस हृदयहीन स्वार्थी समाज के मन का ही तो फितूल था, जो आज पूरी जवानी में है । कॉन्वेन्ट में बच्चों का दाखिला कराना अपना परम कर्तव्य समझता है । मूरख को  कॉन्वेन्ट का असली अर्थ और उद्देश्य भी नहीं मालूम । वारिश को भी लावारिश बना छोड़ा है आधुनिकों ने । और फिर भला कुकुरमुत्ते की तरह नये पनपे उस कॉन्वेन्टी समाज से आशा ही क्या रखना ? कॉन्वेन्टी चाँद-सूरज पर जाकर भले ही झंडा गाड़ आये, चाबुक से हुकूमत चलाले, परन्तु इन्सानी दिलपर झंडा गाड़ना और उस पर राज करना उसकी फितरत नहीं, ख्वाहिश भी नहीं । क्यों कि इस कला को वो भूल चुका है ।

बेपरवाह तो वो था ही, विज्ञान ने और भी बेपरवाह और आलसी बना दिया । सगे-सम्बन्धी, नाते-रिश्ते, यार-दोस्त सबके सब फेशबुक-वाट्सऐप पर सिमट आये, जिसका नतीजा है कि दूर-दराज वालों से मिलना-जुलना तो दूर, एक विस्तर पर पड़े पति-पत्नी भी 63 के वजाय 36 बने, अपने-अपने सोशलसाइटों पर व्यस्त दीखते हैं । व्यस्त हैं- बीजी विदाउट विजनेस । असल में व्यस्त नहीं, अस्त-व्यस्त है । निजता छिन गयी है । एकान्त खो गया है । कभी भी, कहीं भी, किसी समय कोई अचानक किसी की निजता और एकात्मता पर धावा बोल बैठता है- मोबाइल रिंगटोन वा नोटिफिकेशन हावी हो जाता है और खुद को काबिल समझने वाला इन्सान, यन्त्र की तरह, आदेशपाल की तरह हरकत करने को वाध्य हो जाता है । इन्सान अपनों से ही नहीं, बल्कि अपने आप से भी पलायन कर रहा है । अपनों को ही नहीं अपने आपको भी धोखा दे रहा है ।

बूढ़ा पीपल सूख रहा है ।

दूर-दराज गावों में पड़े गरीब-असहाय या भीड़भरे कोलाहल के बीच वृद्धाश्रम में पड़े वृद्धजन  की कातर आँखें निहार रहीं हैं अपनों को । इन्तजार कर रही है—फेमिलीडे, फादर्सडे, मदर्सडे का ।

बूढ़ा पीपल मुस्कुरा रहा है । हांक लगा रहा है । चेतावनी भी दे रहा है –घटिका टांगने आओगे मेरे पास ही...घड़ियाली आँसू बहाओगे मेरे पास ही...मैं निर्विकार खड़ा रहूँगा उस दिन भी , जैसे तुम निर्लज्ज खड़े हो आज ।

अरे मूर्ख कॉन्वेटियों ! पीपल की ये शाखायें सिर्फ घटिका टांगने के लिए नहीं हैं, उसके नीचे सिर्फ खड़े होकर आँसू बहाने के लिए नहीं है । इसकी सघन हरियाली तुम्हें सिर्फ छांव ही नहीं दे रहा है, सिर्फ जैविक ऊर्जा ही नहीं दे रहा है, बल्कि और भी बहुत कुछ मिल रहा है इसके ज़रिये ।

दरवाजे पर या घर के एक कोने में बैठा बूढ़ा सिर्फ खांय-खांय ही नहीं कर रहा है, बल्कि और भी बहुत कुछ कर रहा है, अब भी बहुत कुछ दे रहा है तुम्हें । किन्तु तुम्हारी आँखें देख नहीं पा रही हैं । तुम्हारी मन्द बुद्धि समझ नहीं पा रही है ।

पीपल की शाखायें और बूढ़े की बाहें,पीपल की पत्तियां और बूढ़े की हथेली लगभग एक जैसा ही काम कर रही है, पर मन्दबुद्धि में समाये ये बातें तब न ।

पीपल बचाओ...पीपल लगाओ...पर्यावरण बचाओ...लौट जाओ अपने बुजुर्गों के पास...अपनी विरासत के पास...अपनी संस्कृति के पास ...अपने भारत के पास...अपने आर्यावर्त के पास...अन्यथा ये इण्डिया लील जायेगा तुम्हें और तुम्हारे कुनबे को भी । जिस दिन ये बूढ़ा पीपल नहीं रहेगा , उस दिन तुम भी नहीं रहोगे- पक्की बात है... समझ लो इसे ठीक से, वरना रोने के लिए आंसू भी न बचेंगे, उसे भी बोतलों में बन्द कर तुम्हें ही पिला देंगे - थोड़ा कलर, फ्लेवर, एसेन्स मिलाकर, ये हुनरमन्द व्यापारी ।
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Friday, 10 May 2019

हम और हमारी परम्परायें

हम और हमारी परम्परायें

हम शाकद्वीपीय ब्राह्मण हैं- सूर्यांश । वैसे तो सृष्टि में जो कुछ भी है, एक और एकमात्र ब्रह्म का ही अंश हैसर्वंऽखिलमिदंब्रह्म, फिर हमारी विशेषता क्या हुयी जो बारम्बार अपनी ही पीठ थपथपाये जा रहे हैं— है न जरा सोचने वाली बात !

किन्तु अपनी विशेषताओं पर विचार करके अपने अहं को और पुष्ट करने से बेहतर है कि कुछ उन चीजों को याद करें, कर्मों और कृत्यों को याद करें, उन बातों और परम्पराओं को याद करें—जिन्हें हम निरन्तर खोते चले जा रहे हैं और वर्तमान समय में सिर्फ बतकही का विषय बन कर रह गया है । इतिहास के पन्नों में कैद होते जा रहे हैं हम और हमारी परम्परायें ।

सूर्यांशों का सर्वाधिक मुख्य कृत्य- उपाकर्म-श्रावणीकर्म क्या हमें ज्ञात है- क्या होता है ये ? (हालाकि ये ब्राह्मणमात्र का मुख्य कर्म है) । दान-चन्दा बटोर कर किसी तरह रथसप्तमी-अचलासप्तमी मना लिए – बस हो गया मग-धर्म का कोरम पूरा !  द्विजत्व का आधार—शिखा-सूत्र, संध्या-गायत्री- हममें कितनों ने साध रखा है ? प्रतिशत निकालने चलेंगे तो ये ‘ % का चिह्न दशमलव पश्चात् कई शून्यों के बाद लगाना पड़ेगा ।

हमारी तत्परता है सिर्फ- नवरात्र के नाम पर एक साथ पांच-दस यजमानों का सप्तशती-पाठ-संकल्प ले लेना- कुछ बांच-बूंच लेना, कुछ धोती-साड़ी उगाह ले आना, यजमनिका के नाम पर भोज-भात कराकर मरियल बाछी और सड़ियल शैय्यादान वटोर लाना । संयोग से समाज में विद्वता का डंका बज गया यदि तो भागवत भी तोड़मरोड़ कर बांच लेना या फिर बहुकुण्डीय यज्ञों के नाम पर कुछ और भी हसोत-बटोर ले आना । यदि थोड़े और साहसी हुए तो स्वयं को जातिस्मर वैद्य, तान्त्रिक और ज्योतिर्विद घोषित कर देना । जब कि सच्चाई ये है कि ज्यादातर तिथि-सूचक से आगे हम हैं नहीं । ज्योतिष पढ़ने-गुनने का फुर्सत कहां है । कमाने-खाने-ठगने भर आही गया है । क्या होगा ज्यादा पढ़-लिख कर ।

आँखिर कितना कूड़ा बटोरेगे मेरे भाई ! कबतक बटोरते रहोगे ?  सूर्यांशों का क्या यही कर्म है समाज का कूड़ा बटोरना ?

इतिहास के पन्नों में दमतोड़ती सिसकती परम्परायें । देखादेखी के चक्कर में सबकुछ विसरता-खोता जा रहा है हमारा । समाज के अन्याय वर्गों में जो कुछ हो रहा है, बिना सोचे-विचारे उसे हम बड़ी तेजी से अंगीकार करते जा रहे हैं और मजे की बात ये है कि हम उसे मजबूरी और लाचारी का नाम  देकर दायित्व-मुक्त हो जा रहे हैं ।

अब भला बतायें— कायदे से पैर छूकर प्रणाम करने में कौन सी लाचारी आगयी ? क्या कमर में दर्द है या कि रीढ़ की हड्डियों में कुछ खराबी आगयी है, या बदरंग-टाइट जींस फटने का डर है, जो टखना-घुटना छूकर कर्तव्य-निर्वाह कर ले रहे हैं  ?

पैर छूने और छुलाने की भी विधि होती है- जानकर आश्चर्य होगा बहुतों को ।

मोमबत्तियां बुझाकर,अंडे से बना केक काटकर और उपस्थित जनों को जूठन खिलाकर हैपीवर्थडे और मैरेज एनवर्सरी हम मनाने लगे हैं, पर जातकर्म संस्कार की विधि  और औचित्य को विसार दिये । परम्परागत संस्कार चालीस से सिमट पर सोलह हुए । अब उसमें भी आदि-मध्य-अन्त तक ही सिमट जाने की नौबत है । यज्ञोपवीत बनाना तो भूल ही गए हैं, पहनने में भी बोझ लग रहा है । दूसरों की देखादेखी, विवाह में रिंगसेरेमनी और जयमाला को अपनाकर अतिरिक्त व्यय-बोझ बढ़ा लिए । डीजे-डांस के बिना बारात निकल ही नहीं पाती । नट-भड़ुओं की तरह कमर मटकाने में घंटों सड़क जाम किये रहते हैं- अपने समय का तो भान नहीं, ऐम्बुलेन्स और दमकल को भी गर्व से रोके रहते हैं- आम रास्ते को अपनी ज़ागीर समझकर, और दूसरी ओर धूआपानी, गोड़धो, जनवास-पूजा आदि मंगलाचरण में भी समय की बरबादी लगने लगती है । शास्त्र-पुराण पढ़ने की परम्परा लुप्त हो गयी है, वैसे में शास्त्रार्थ का औचित्य ही क्या रह जाता है ? सुनने-समझने का धैर्य और क्षमता भी तो चाहिए । सौंफ-गोलमिर्च-गुलाब-केवड़ा का ताजा-तरीन शर्बत गायब हो गया । प्रेज़र्वेटिव ज़हर वाला माजा-फ्रूटी, पेप्सी-कोला भाने लगा है ।  पलथी मारकर पंगत लगाने की तो बात ही बेमानी होगयी । क्यों कि नयी परिपाटी में दोनों को मजा है- खानेवाले को भी, खिलाने वाले को भी । बफेडीनरी व्यवस्था में आप खायें या भांड़ में जायें...कार्ड दिये हैं, लिफाफा देते जाइयेगा...।

कितना विलक्षण दृश्य हुआ करता था- बातबात में गौरी-गणेश वन्दना...मंगलम् भगवान विष्णु का सस्वरोच्चारण...सुदीर्घ शान्तिपाठ, सुसंस्कृत शुभेच्छुओं द्वारा बारबार अक्षताभिषेक और क्या ही आनन्ददायक क्षण हुआ करता था गृह रमणियों द्वारा गीतगोविन्द, यदुकुलज्योनार, ब्रह्मज्योनार,गंडनमंडन,बहत्तरपुर आदि के साथ-साथ  सुमधुर लोकगीत-गायन । सच पूछें तो उन दिनों की वो गालियां भी  पुष्पहार और बुके से कहीं ज्यादा मनमोहक लगती थी । ज्यादा प्रीतिकर होती थी ।

किन्तु ये सब इतिहास की बतकही बन गयी है । भोंड़े रॉक-पॉप के कर्कश स्वर के सामने कोकिलाकंठ कुमारियों का स्वर सपना हो गया है । फिल्मी गानों को छोड़कर लोकगीतों को याद रखना भी आधुनिकाओं के बस की बात नहीं । उन दिनों उन्हें अभ्यास करना पड़ता था, गाना पड़ता था- गले में चूना लगाकर,मुलहठी-कुलंजन से गला साफ कर-करके । अब तो ब्यूटीपॉर्लर से लौटने के बाद भी सारा समय घर में डेंटिंग-पेंटिग, साड़ी-सूट मैचिंग में ही निकल जाता है ।  समय ही कहां मिल पाता है बेचारियों को ।   

जबतक लड़की व्याहनी होती है, समाज का कोढ़—दहेज-दानव का रोना रोते हैं और जैसे ही लड़के की बारी आते है, अचकन-पगड़ी सम्भालने लगते हैं— हम खानदानी लोग ठहरे...सामाजिक प्रतिष्ठा-निर्वाह में खर्च तो होगा ही...लड़के को पढ़ाने-लिखाने, नौकरी दिलाने में बहुत खर्च हो जाता है...। मजे की बात तो ये है कि कौवे-गदहे को भी अप्सरा उर्वशी ही चाहिए..., कम्पटीटिव लाइफ में उच्च शिक्षा और गुण  के बिना काम कैसे चलेगा...और इसके साथ-साथ सांगोंपांग दहेज तो लड़केवालों का जन्मसिद्ध अधिकार है... एक से एक नाज़-नखरे सुनते-सुनते कान से मवाद आने लगता है । प्रबुद्ध समाज के नाम से उबकायी आने लगती है । जिनकी प्रबुद्धता सिर्फ मंचों पर झलकती है- एक से एक आह्वान, एक से एक संकल्प—वचने किं दरिद्रता...।

सवाल है कि ब्लूब्लड क्या केवल लड़के वाले ही होते हैं और लड़कियों की उँची डिग्रियाँ कूड़ेदान में पड़ी मिल जाती हैं क्या ?  

       विवाह को स्टेटससिम्बल क्यों बना लेते हैं हम- वो भी लड़की वाले के बदौलत ? औकाद है तो दिखाना चाहिए किसी गरीब-लाचार की बेटी को बहू बना कर । हां, अकसर देखने को मिल जाता है- कुरुप-बेडौल को भी सोने से मढ़ाकर विदा होते । भारीभरकम दहेज सात खून भी माफ कर देता है ।

हम ये भूल जाते हैं कि वैभव-प्रदर्शन वैश्य का कर्म है और शौर्य-प्रदर्शन क्षत्रिय का । हम तो ब्राह्मण हैं- ब्रह्मणत्व कितना उतर पाया है हमारे भीतर- ये विचारणीय है ।

            विवाह एक परम्परागत अनिवार्य मांगलिक कृत्य है, जिसमें दो कुल-परिवार मिलकर दो शरीरों व दिलों के मिलन का तानाबाना बुनते हैं । जहां दोनों के समान अधिकार हैं, तो दोनों के समान कर्तव्य भी । समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो कहना चाहिए कि दो परिवार मिलकर एक भावी परिवार का शिलान्यास करते हैं । अतः दोनों का समान योगदान होना चाहिए । बेहतर तो ये होगा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में चौदहआना जिम्मेवारी वरपक्ष की होनी चाहिए । कन्या तो अपना कुल-परिवार-गोत्र-पहचान  सबकुछ छोड़कर जाती है ।

            कृत्य,कर्म,परम्परायें जब लुप्त होंगी,तो संस्कारहीनता तो आनी ही आनी है । इसे भला कैसे रोका जा सकता है ? मन्त्रण देकर, आहूत किया है हमने ।

इन सब बातों की याद दिलाकर, ये नहीं कहता कि ट्रेन-बस छोड़कर बैलगाड़ी से चलें । पर इतना तो जरुर कहना बनता है कि जड़ के आधार पर ही तने और शाखायें हैं । कोंपलों का सौन्दर्य जड़ की वजह से ही है । जड़ से बिलकुल बिलग होकर कदापि जीया नहीं जा सकता- विलुप्त होना अवश्यमभावी है- आज हो, कल हो, या कि वरषों बाद हो । नष्टे मूले न पत्रं नैव शाखा । अस्तु ।

(नोटः-आलेख के किंचित अंशों को परिवर्तित कर दिया जाये तो समाज के अन्य वर्गों पर भी समान रुप से घटित हो सकता है )