Friday, 17 May 2019

बूढ़े पीपल की पीड़ाभरी चेतावनी


                            
                           बूढ़े पीपल की पीड़ाभरी चेतावनी

उस बूढ़े पीपल से आँख मिलाकर बात करने की जरा भी हिम्मत नहीं होती मेरी, जो पितामहेश्वरघाट पर लम्बे समय से अविचल खड़ा है । लम्बी-लम्बी बाहें  पसारे नारियल के दो दरख्तों के बीच मेरे किराये के घर की एक छोटी सी खिड़की उस ओर ही खुलती है । उसकी सलाखों की आड़ लेकर कभी-कभार साहस जुटाकर बस झांकभर लेता हूँ उसे, जिसकी शाखा-प्रशाखाओं में अगनित छोटी-बड़ी घटिकायें लटकी पड़ी होती हैं । हररोज कई फोड़ी जाती हैं उनमें और कई नयी घटिकायें लटकायी भी जाती हैं । ये परम्परागत सिलसिला कब से जारी है, कुछ कहा नहीं जा सकता ।  हां, इतना जरुर कह सकता हूँ कि जैसे ही उस पीपल की शाखायें कुछ भार सम्भालने लायक हो गयी होंगी, घटिकायें लटकनी शुरु हो गयी होंगी और ये भी पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि आने वाले दिनों में भी ये क्रम जारी रहेगा, जबतक उन शाखाओं में भारवहन की क्षमता रहेगी ।

पितरों की पवित्रभूमि, प्राणियों की सद्गति और मोक्ष की नगरी गया जिसे श्रद्धावनत लोग गयाधाम भी कहते हैं । इस नगरी में ही पितामहेश्वर—पितामहों के ईश्वर (न कि महेश्वर के पिता) का एक अति प्राचीन स्थान भी है ।     
यूँ तो गयाश्राद्ध जनित पिण्डदान का एक प्रधान वेदी है - पितामहेश्वर, किन्तु गयाश्राद्धीय पिंडदानी से कहीं अधिक संख्या में,  अनन्तंशिवसन्निधौ... आप्तवाक्य से प्रभावित प्रायः शहरभर के लोग यहीं आकर, इसी पीपल के आसपास विशेषकर दशगात्रकर्म सम्पन्न करते हैं । मान्यता है कि दस दिनों पूर्व जिस प्रियजन का अग्निसंस्कार करके पार्थिव शरीर को विलीन कर देते हैं, उसे ही दशगात्र के पावन वैदिक मन्त्रों से पुनर्निर्मित करने का प्रयास करते हैं । श्राद्धीय (श्रद्धायुक्त) पिण्ड-शरीर तो निर्मित हो जाता है, किन्तु, क्या वो आत्मीय प्राणी स-प्राण लौट आ सकता है- ऐसा करने से ? नहीं न । परन्तु हम ऐसा करते हैं । भारतीय संस्कृति और परम्परा ऐसा करने का हमें निर्देश देती है । हम उसका अनुपालन करते हैं ।

इस पीपलवृक्ष के पत्ते-पत्ते पर अगनित रुदन और करुणा की ध्वनितरंगें अवशोषित हैं । हो सकता है आने वाले समय में कोई ऐसे डिवाइस का हम  प्रयोग कर पायें, जो इन अवशोषित तरंगों को डिकोड कर हमें फिर से सुना सके । 

हालाकि मैं इन्हें बिना डिकोडिंग के ही सुनता हूँ, रोज सुनता हूँ । और यही कारण है कि उस पीपल से आँख मिलाकर संवाद करने की साहस नहीं है मुझमें । वह सिर्फ दिवंगत प्राणी के परिजनों का क्रन्दन ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ सुनाते रहता है, क्यों कि उसे भी पता है कि मैं उसकी बातों को ध्यान से सुनता हूँ, भले ही कुछ कर नहीं पाता – न उसके बावत, न अपने लिए और न रोती-विलखती दुःखी दुनिया के लिए ही ।

सुनने-सुनाने से भी मन से पीड़ा का बोझ शायद कुछ कम होता है, जब कि कहा गया है—रहिमन निजमन की व्यथा मन ही राख्यो गोय...।

लगभग दिनभर दशगात्रकर्मियों का रोना-धोना गूंजते रहता है पीपल के आसपास—विशेष कर अपने लाल खोयी माताओं का करुण क्रन्दन और सुहाग खोयी अबलाओं की चीत्कार सुनते-सुनते सिर झनझनाने लगता है । 
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्माद परिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।-- जो जन्मा है वो मरेगा ही और जो मर गया है वो जन्म भी जरुर लेगा । ऐसे में किसी तरह के शोक की क्या आवश्यकता यानी शोक न करे—कृष्ण ने तो कह दिया । पूरी गीता कंठाग्र भी है, किन्तु इससे क्या ? केवल कहने भर से क्या होता है ? सुनने भरसे क्या कहीं ज्ञान-लब्ध हो जाता है कोई ? जानकारी और ज्ञान के बीच बहुत बड़ी खाई  है और वो खाई जबतक पटेगी नहीं, तबतक सिर तो झनझनायेगा ही न !

दिन ढलने पर शाम होती है, फिर लम्बी रात का सिलसिला शुरु होता है । उस समय क्रन्दन-चीत्कार तो नहीं होते, पर उनका अनुगूंज वहीं का वहीं मौजूद होता है । बूढ़ा पीपल मुस्कुराता है, खीझता भी है । और कभी-कभी बिलकुल कूटस्थ और स्थितप्रज्ञ प्रतीत होता है । सुनने की उत्सुकता हो तो संवाद भी खूब करता है । हमदोनों एक दूसरे के एकान्त का सम्बल बन जाते हैं अकसर ।   

एक दिन कहने लगा—

देखते हो, दुनिया की दशा—अपने को फ़िकरमन्द तो खूब लगाता है, पर है बिलकुल बेपरवाह...स्वार्थी और निर्लज्ज भी । हालाकि उसे पता है कि जो ऑक्सीजन लेता है और कार्बन उगलता है, उसे मैं ही संतुलित करता हूँ अपने साथियों के साथ, किन्तु धड़ल्ले से नष्ट करते जा रहा है हमें और हमारे साथियों को । कंकरीट के जंगल खड़े करता जा रहा है—पहाड़ों और जंगलों ही नहीं खेत-खलिहानों को भी दैत्य की तरह निगलते हुए । भूगर्भ का तेल ही नहीं पानी भी सोख लिया मूर्खों और स्वार्थियों ने । उन्मुक्त नीले आकाश तक को वक्शा नहीं । मिट्टी, पानी, धूप और हवा सब प्रदूषित कर चुका है फिर भी सन्तोष नहीं है । धरती तो सम्हला नहीं और  चाँद,मंगल,बृहस्पति, शनि पर छलांग लगाने की तैयारी में जुटा है मूरख । अमरता और सम्प्रभुता के सपने देखता, भीतर से भयभीत इन्सान इन्सानियत को कबका खो चुका है । जल-थल-वायु चारों ओर बारुदी सुरंगें बिछी-पटी हैं ।

साल में एक दिन पर्यावरणदिवस मनाता है और बाकी दिन पर्यावरण का विध्वंसक बनता है । मदर्सडे, फादर्सडे, चिल्ड्रन्सडे, ओमेन्सडे, फैमिलीडे- सब मनाता है, किन्तु कॉन्वेट और वृद्धाश्रम भी दिन दूने रात चौगुने की गति से बढ़ते जा रहे हैं । नौ महीने पेट में रख कर बच्चा पालने का धैर्य नहीं, फुरसत भी नहीं, बूढ़ों को भला कौन सम्भाले !  
 कॉन्वेन्ट का कॉन्सेप्ट उस हृदयहीन स्वार्थी समाज के मन का ही तो फितूल था, जो आज पूरी जवानी में है । कॉन्वेन्ट में बच्चों का दाखिला कराना अपना परम कर्तव्य समझता है । मूरख को  कॉन्वेन्ट का असली अर्थ और उद्देश्य भी नहीं मालूम । वारिश को भी लावारिश बना छोड़ा है आधुनिकों ने । और फिर भला कुकुरमुत्ते की तरह नये पनपे उस कॉन्वेन्टी समाज से आशा ही क्या रखना ? कॉन्वेन्टी चाँद-सूरज पर जाकर भले ही झंडा गाड़ आये, चाबुक से हुकूमत चलाले, परन्तु इन्सानी दिलपर झंडा गाड़ना और उस पर राज करना उसकी फितरत नहीं, ख्वाहिश भी नहीं । क्यों कि इस कला को वो भूल चुका है ।

बेपरवाह तो वो था ही, विज्ञान ने और भी बेपरवाह और आलसी बना दिया । सगे-सम्बन्धी, नाते-रिश्ते, यार-दोस्त सबके सब फेशबुक-वाट्सऐप पर सिमट आये, जिसका नतीजा है कि दूर-दराज वालों से मिलना-जुलना तो दूर, एक विस्तर पर पड़े पति-पत्नी भी 63 के वजाय 36 बने, अपने-अपने सोशलसाइटों पर व्यस्त दीखते हैं । व्यस्त हैं- बीजी विदाउट विजनेस । असल में व्यस्त नहीं, अस्त-व्यस्त है । निजता छिन गयी है । एकान्त खो गया है । कभी भी, कहीं भी, किसी समय कोई अचानक किसी की निजता और एकात्मता पर धावा बोल बैठता है- मोबाइल रिंगटोन वा नोटिफिकेशन हावी हो जाता है और खुद को काबिल समझने वाला इन्सान, यन्त्र की तरह, आदेशपाल की तरह हरकत करने को वाध्य हो जाता है । इन्सान अपनों से ही नहीं, बल्कि अपने आप से भी पलायन कर रहा है । अपनों को ही नहीं अपने आपको भी धोखा दे रहा है ।

बूढ़ा पीपल सूख रहा है ।

दूर-दराज गावों में पड़े गरीब-असहाय या भीड़भरे कोलाहल के बीच वृद्धाश्रम में पड़े वृद्धजन  की कातर आँखें निहार रहीं हैं अपनों को । इन्तजार कर रही है—फेमिलीडे, फादर्सडे, मदर्सडे का ।

बूढ़ा पीपल मुस्कुरा रहा है । हांक लगा रहा है । चेतावनी भी दे रहा है –घटिका टांगने आओगे मेरे पास ही...घड़ियाली आँसू बहाओगे मेरे पास ही...मैं निर्विकार खड़ा रहूँगा उस दिन भी , जैसे तुम निर्लज्ज खड़े हो आज ।

अरे मूर्ख कॉन्वेटियों ! पीपल की ये शाखायें सिर्फ घटिका टांगने के लिए नहीं हैं, उसके नीचे सिर्फ खड़े होकर आँसू बहाने के लिए नहीं है । इसकी सघन हरियाली तुम्हें सिर्फ छांव ही नहीं दे रहा है, सिर्फ जैविक ऊर्जा ही नहीं दे रहा है, बल्कि और भी बहुत कुछ मिल रहा है इसके ज़रिये ।

दरवाजे पर या घर के एक कोने में बैठा बूढ़ा सिर्फ खांय-खांय ही नहीं कर रहा है, बल्कि और भी बहुत कुछ कर रहा है, अब भी बहुत कुछ दे रहा है तुम्हें । किन्तु तुम्हारी आँखें देख नहीं पा रही हैं । तुम्हारी मन्द बुद्धि समझ नहीं पा रही है ।

पीपल की शाखायें और बूढ़े की बाहें,पीपल की पत्तियां और बूढ़े की हथेली लगभग एक जैसा ही काम कर रही है, पर मन्दबुद्धि में समाये ये बातें तब न ।

पीपल बचाओ...पीपल लगाओ...पर्यावरण बचाओ...लौट जाओ अपने बुजुर्गों के पास...अपनी विरासत के पास...अपनी संस्कृति के पास ...अपने भारत के पास...अपने आर्यावर्त के पास...अन्यथा ये इण्डिया लील जायेगा तुम्हें और तुम्हारे कुनबे को भी । जिस दिन ये बूढ़ा पीपल नहीं रहेगा , उस दिन तुम भी नहीं रहोगे- पक्की बात है... समझ लो इसे ठीक से, वरना रोने के लिए आंसू भी न बचेंगे, उसे भी बोतलों में बन्द कर तुम्हें ही पिला देंगे - थोड़ा कलर, फ्लेवर, एसेन्स मिलाकर, ये हुनरमन्द व्यापारी ।
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