Friday, 25 August 2017

शाकद्वीपीय ब्राह्मणःलघुशोध--पुण्यार्कमगदीपिका भाग आठ

गतांश से आगे...
सातवें अध्याय का उत्तरार्द्ध

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्य तेजोत्पन्न हैं, इस कारण इन्हें सौर भी कहते हैं। दिव्य एवं  साध्य संज्ञा भी व्यवहृत होती है इनके लिए— 
यो हि मगेति वै प्रोक्तो मगो दिव्यो द्विजोत्तम ।      दिव्याश्चैते स्मृताः विप्राः आदित्याङ्ग समुद्भवाः ।।  भूयिष्ठ, महिर, भूदेव,दिव्य,सूर्यविप्र,सूर्यद्विज,वाचक, ऋतव्रत आदि सम्बोधन भी इनके लिए प्रयुक्त हुए है । शब्दकल्पद्रुम नामक शब्दकोश में ऋतव्रत शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का पर्याय कहा गया है । ये सद्विप्र परम त्यागी, वेदज्ञ, अति श्रेष्ठ, गुणी, सच्चरित्र और सुशील थे - ऐसा प्रसंग श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध के ६४ वें अध्याय में है— स्वलंकृतेभ्यो गुणशील वद्भ्यः सीदत् कुटुम्बेभ्यः ऋतव्रतेभ्यः । तपः श्रुत ब्रह्म वदन्य सद्भ्यः प्रादां युवभ्यो द्विज पुङगवेभ्यः ।।

शाकद्वीपियों के गुणवाचक नामरुप अनेक हैं, किन्तु सर्वाधिक प्रचलित है—मग,याजक,भोजक,ऋतव्रत,उर्ध्वरेतस, सूर्यद्विज,सत्यव्रत,वेदव्रत,श्रोत्रेय,पंक्तिपावन,सामग, देवब्राह्मण,दिव्यद्विज,देवर्षि,ब्रह्मर्षि,पूजक,मृग,सेवक,सेवग इत्यादि।

  मग । मग शब्द की व्याख्या कई प्रकार से की गयी है । मन्त्रोत्पादक और गुरु अर्थबोधक है । से मार्तण्ड और  से पूजक व प्रकाशक अर्थबोध भी होता है । ये दोनों अर्थ वैदिक और पौराणिक रुप से मान्य हैं । अझरं चैव ओंकारं सार्धमात्रा द्वयेस्थिताम । वदन्ति चार्ध मात्रस्थं मकारं व्यंजनात्मकम् ।। ध्यायन्ति च मकारं ये ज्ञानं तेषां मद्यत्मकम् । मकार ध्यान योगाश्च मगाः ह्येते प्रकीर्तिताः ।। (भविष्यपुराण ब्राह्मणपर्व अध्याय २७) ।

भोजक धूपमाल्यैर्जपैश्चापि ह्यपहारै स्तथैव च । भोजयन्ति सहस्त्रांशुं तेनते भोजकाः स्मृता  ।। (भविष्यपुराण ब्राह्मणपर्व अध्याय ११७)  धूप,माल्य, नाना प्रकार के नैवेद्यों,उपहारों तथा वैदिक मन्त्रों के जप पूर्वक भास्कर को नैवेद्य अर्पण करके स्वयं भोजन करने वाला होने के कारण शाकद्वीपियों की भोजक संज्ञा भी है। तथा च— नाभोज्यं भुंजते यस्मात्तेनासौ भोजको मतः । (उक्त- श्लोक ५५) ये कदापि अभोज्य भोजन नहीं करते। इस प्रकार त्रिविध अन्नदोष के भागी नहीं होते।

याजक – यज्ञ-निष्णात होने के कारण यज्जन और यज्ञ सम्पादित कराने के कारण याजक भी कहे गये हैं । धूपमाल्यैर्जपैश्चापि ह्यपहारै स्तथैव च । ये यजन्ति सहस्रांशुं तेन ते याजकाः स्मृताः ।। (साम्बपुराण) धूप,माल्य, नाना प्रकार के नैवेद्यों, उपहारों तथा वैदिक मन्त्रों के जपपूर्वक भास्कर का यजन करते हैं,इसलिए याजक कहे गए ।
साधक — ब्रह्मयामल नामक ग्रन्थ में कहा गया है— शरद्वीपे च वेदाग्निः शाकद्वीपे च साध्यकः । भूमध्ये  ब्रह्मचारी च दैवज्ञो द्वारिकापुरे ।। शाकद्वीपीय ब्राह्मण स्थान भेद से भिन्न नामों से जाने जाते हैं- गन्धमादन पर्वत क्षेत्र में वेदाग्नि,शाकद्वीप में साधक,मध्यदेश में ब्रह्मचारी तथा द्वारकापुरी में दैवज्ञ नाम से प्रचलित हैं । (रुद्रयामल अध्याय १४ में भी उक्त श्लोक का उत्तरार्द्ध यथावत है)
हेमाद्रिकल्पतरु में कहा गया है कि ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं- एक दिव्य और दूसरा भौम । द्विविधा ब्राह्मणा राजन् ! दिव्या भौमास्तथैव च । भोजकादित्य- जाताहि दिव्यास्ते परिकीर्तिता ।। (भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व अध्याय १३९) जम्बूद्वीपीय विप्रों के लिए भौम संज्ञा है और शाकद्वीपीयों के लिए दिव्य । भोजयेत् ब्राह्मणान् दिव्यान्भौमाश्चापि सदक्षिणाम् ।। तथा च दिव्याश्चैते स्मृताः विप्रा आदित्यांग समुद्भवाः ।। (भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व)
अन्यश्च— मगाश्च भोजकश्चैव याजको वाचकस्तथा । वेदाङ्गचैव दिव्यश्च सौरः सूर्य ऋतव्रतः ।। यज्वी जापक इत्येते शाकद्वीप निवासितः । (भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व) मग,भोजक,याजक,वेदाङ्ग,दिव्य,सौर,ऋतव्रत,याज्वी, जापक इत्यादि संज्ञायें हैं शाकद्वीपियों के लिए ।
  मगाश्चब्राह्मणाः पूर्वे निःसृताः सूर्यमण्डलात् । ज्वलदर्क प्रतीकाशाः शाकद्वीपमवातरन ।। (मगब्राह्मण पहले सूर्यमण्डल से जाज्वल्यमान सूर्य जैसे शाकद्वीप में प्रकट हुए।) इसी भांति स्कन्दपुराण के बल्लार्क चरित प्रसंग में आया है— मगाश्चैनेस्मृता विप्रा आदित्यांग समुद्भवाः । दिव्यास्ते ब्राह्मणाज्ञेया वशिष्ठा- गिंरसादयः ।। (सूर्य के अंग से निःसृत वशिष्ठ आंगिरस आदि दिव्य मग ब्राह्मण हैं।) यज्ञकल्पलता में कहा गया है— सूर्यांगसम्भवा विप्राः शाकद्वीपनिवासिनः । मगाब्राह्मण भूयिष्ठाः सर्वयज्ञेषु पूजिताः ।। (शाकद्वीप में रहने वाले सूर्यांग से निकले हुए सर्वश्रेष्ठ मग ब्राह्मण सभी यज्ञों में परम पूज्य हैं।) विप्रपूजनपद्धति में भी कहा गया है— भास्करांगभवा विप्राः शाकद्वीपनिवासिनः । सर्वपूज्याः सर्वमान्या सर्वलोकनमस्कृताः ।। (सूर्य के अंग से निःसृत शाकद्वीपीय ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ, सर्वमान्य, सर्वलोक नमस्कृत हैं।)
 योगाभ्यास में सदा रत रहने के कारण योगीन्द्र नाम भी सार्थक है। मन्त्रों का सस्वर गायन (योगविधि से) करने में दक्ष होने के कारण तथा अमर विद्या का ज्ञाता होने के कारण मृग नाम से भी विभूषित किया गया है। मनुस्मृतिकार का कहना है कि हिरण्यगर्भ मनु के जो मरीचि,अंगिरा,अत्रि,पुलस्त्य, पुलह, क्रतु,वशिष्ठादि सात पुत्र सौरकुल के ही हैं । प्रचेतस,भृगु आदि भी इसी कोटि में आते हैं । शाकद्वीप के साध्यगण में और भी बहुत से नाम हैं । यथा— भारद्वाज,गौतम,शाण्डिल्य,रोहित, गर्ग,शातातप,सनत्कुमार,सत्यवद,भार्गव,पराशर,पौण्डिक,शंकक्रतु,दक्ष,काश्यप, जमदग्नि, कार्तिकेय, कुम्भ योनि इत्यादि । (ध्यातव्य है कि कुछ नाम अन्यत्र भी अन्य रुप से प्रयुक्त हुए हैं।) भूमि पर अति पूज्य होने के कारण भूदेव संज्ञा तो आधिकारिक तौर पर बनती ही है, जिनका चरण-रज ग्रहण करने को योगेश्वर श्रीकृष्ण भी तत्पर रहते हैं । उन्हीं की कृपा-प्रसाद से जम्बूद्वीप को मगविप्रों का स्थायी वास-लाभ प्राप्त हो सका ।

अल्ल— संस्कृत में अल्ल् शब्द है,जो भूषण का द्योतक है— अलंकरोति इति अलंकारः । अल्ल शब्द का प्रयोग भी शाकद्वीपियों के लिए होता है । ये स्वयं को अल्लवंशीय मानते हैं, जिनका गोत्र  महर्षि है।  पंच प्रवर, शुक्ल ययुर्वेदीय, माध्यंदिन शाखा, दक्षिण शिखा धारी हैं, जिनके कुलदेवता जमनाजी (यमुनादेवी) हैं ।   पंजाब तथा मध्य प्रदेश में इस शब्द का प्रयोग करने वाले मूलतः मगद्विज ही हैं, जो स्वयं को महर्षि गोत्र का बताते हैं । उनके क्रिया कलापों पर ध्यान दिया जाय, उनका इतिहास जाना जाये , तो बात स्पष्ट होगी । कंचन, कंवल, साधन, अरियेदी, लक्खी, लखी, इकबन्ने, अक्षौणी, सोढ़ल, लोई, बिंजू, आदि प्रकार को ये स्मरण रखे हुए हैं। (साभार—मगबन्धु के मगविशेषांक में प्रकाशित पं.गंगासहाय का लेख- संग्रहकर्ता महर्षिगोत्रीय पं.मदनलाल मिश्र एवं नारायण महर्षि, उदयपुर,राजस्थान)

सेवक/सेवाग/सेवग— विक्रमसंवत् १९८८ के आषाढ़ अंक में शाकद्वीपीय ब्राह्मणबन्धु नामक चर्चित पत्रिका में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें लेखक का नाम स्पष्ट नहीं है। लेख में सेवग और भोजक संज्ञक मगविप्रों के बारे में चर्चा है, जो प्रायः ओसवालों के जैन मन्दिरों की सेवा में रहे। फलतः सेवग वा सेवक कहलाये । पुर-गोत्रादि के स्थान पर ये खाप का प्रयोग करते हैं, जो सोलह खापों में बंटे हुए हैं। जोधपुर, जयपुर,जैसलमेर,बीकानेर आदि क्षेत्रों में ये विशेष रुप से बसे हुए हैं । लेखक महोदय ने बड़े आग्रह पूर्वक लिखा है कि सभी शाकद्वीपियों को आपसी भेद सूचक उपनानों से बचना चाहिए । क्यों कि ये मूलतः एक ही हैं। (मगबन्धु, मग विशेषांक)
  प्रसंगवश अब यहां भारत में पाये जाने वाले शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के नाम भेद की चर्चा करते हैं । यह प्रसंग ब्रह्मयामल के चौदहवें अध्याय में आया है— शरद्वीपेच वेदाग्निः शाकद्वीपेच साध्यकः । भूमध्ये ब्रह्मचारी च देवलो द्वारिकापुरे । कलिङ्गे ज्ञानविप्रस्यादाचार्यो गौडदेश के । धर्माणे धर्मवक्ताच पांचाले शास्त्रिसंज्ञकः । सारस्वते शुभमुखो गान्धारे चित्र पंडितः । कर्णाटे शुभ मुखश्चैव नैपाले देवविप्रकः ।। (शरद्वीप में वेदाग्नि,शाकद्वीप में साध्य,भूमध्य में ब्रह्मचारी,द्वारिकापुरी में देवज्ञ, कलिंग (उड़ीसा) में ज्ञानी विप्र, गौड़ (बंग प्रान्त) आचार्य, धर्मारण्य (अमरकंटक) में धर्मवक्ता, पंजाब में शास्त्री, सारस्वत (काश्मीर) में शुभमुख, गन्धार में चित्रपंडित, कर्नाटक (मैसूर) में सुब्रमण्यम्, और नेपाल में देवब्राह्मण कहे जाते हैं । ध्यातव्य है कि ये स्थानिक नाम भेद है, न कि आन्तरिक विशेष भेद।
 श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में ही त्रेतायुग का एक प्रसंग है—इक्ष्वाकु पुत्र राजा नृग ने ऋतव्रत संज्ञक ब्राह्मणों को गोदान दिया था । इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में भी शाकद्वीपीय ब्राह्मण जम्बूदीप में थे । किन्तु हां, इस प्रसंग से ये प्रमाणित नहीं हो रहा है कि वे यहां स्थायी रुप से बसे हुए थे ।  हां, द्वीपान्तर यात्रायें तो होती ही थी- जैसा कि आज भी एक स्थान का ब्राह्मण दूसरे स्थान पर जाकर यज्ञादि कर्म सम्पन्न करता-कराता है ।
  भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व के ११७ वें अध्याय में एक प्रसंग ऐसा भी है— अति प्रारम्भ में शाकद्वीप में भी तीन ही वर्ण थे- क्षत्रिय,वैश्य एवं शूद्र ।  यानी कि ब्राह्मण का अभाव था । शाकद्वीप के अधिपति प्रियव्रत पुत्र मेघातिथि के प्रति सूर्य के वचन से लक्षित होता है— क्षत्रियादि त्रयो वर्णाः द्वीपेऽस्मिन नात्र संशयः । ते च नार्हन्ति मे पूजां न प्रतिष्ठां कदाचन ।। ऐसी स्थिति में मेघातिथि ने सूर्य से प्रार्थना की कि आपके पूजन योग्य ब्राह्मणों को उत्पन्न किया जाय । उनके अनुनय पर सूर्य ने ध्यान लगाया । और तब सूर्य के ललाट से दो,वक्ष से दो,पैर के ऊपरी भाग से दो, तथा पादतल से दो यानी कुल आठ ब्राह्मण उत्पन्न हुए—   
अथ मे चिन्त्यमानस्य स्वशरीराद् विनिःसृताः ।  शशिकुन्देन्दु संकाशाः संख्ययाष्टौ महाबलाः ।। ललाट फलकाद् द्वौतु द्वां चान्यां वक्षसस्तथा । चरणाभ्यां तथा द्वौतु पादाभ्यां द्वौ तथा खग ।।
इस प्रकार सूर्यांश से उत्पन्न अष्ट विप्रों के वाम भाग से पुनः स्त्री एवं दक्षिण भाग से पुरुष की उत्पत्ति हुयी ।  सृजामि प्रथमं वर्णं मग संज्ञमनौपम् – मग नामधारी इन्हीं युग्मों (जोड़ों) से आगे ब्राह्मणों की सृष्टि हुयी।
प्रसंगवश शाकद्वीपियों के लिए सूर्यांश शब्द का प्रयोग यदाकदा किया गया है और आगे भी किया जाता रहेगा । सूर्यांश संज्ञा से कदापि भ्रमित होने की  आवश्यकता नहीं है और न इसे सूर्यवंशी समझने-मानने की भूल करने की जरुरत है। वंश शब्द विशेषकर अपत्यार्थक होता है, जब कि अंश शब्द इससे बिलकुल भिन्न है। अभी-अभी ऊपर के प्रसंग में ....स्वशरीराद् विनिःसृताः...कहा गया है। अंश का एक अर्थ रश्मि या किरण भी होता है। किरणों का स्वामी(स्रोत) होने के कारण सूर्य को अंशुमाली भी कहा जाता है । इस प्रकार सूर्यतेजोद्भूत हैं मग । अंश और वंश में एक गहन अन्तर ये भी है कि अंश अमैथुनी सृष्टि का द्योतक है,जबकि वंश मैथुनी सृष्टि का। अंश और अंशी का कैसा विलक्षण सम्बन्ध है- श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों के पाठक इसे अच्छी तरह जानते-समझते हैं । किसी शब्द विशेष को एकतरफा पकड़ कर खींच-तान करने पर स्वाभाविक है कि भ्रम पैदा होगा । अर्थ का अनर्थ होगा । अतः शब्दों की अनेकार्थक शक्ति और प्रयोग का ध्यान रखना आवश्यक है । आगे एक प्रसंग में शक-शाक-शाकद्वीपीय,भोज-भोजक जैसे भ्रामक शब्दों को जोड़ने के प्रयास  का प्रमाणिक खण्डन किया गया हैवहां भी ऐसा ही शब्दजाल पैदा किया गया है मगनिन्दकों द्वारा। अस्तु।
  
पुनः मूल प्रसंग पर आते हैं । शाकद्वीप के मग गणों में ही अंगिरा का नाम आता है—  अंगिरा मुखतोऽक्षणोऽत्रिमरीचिर्मनसोऽभवत्...। (श्रीमद्भागवत ३-१२) सृष्टि के आदिदेव साध्य ब्राह्मण शाकद्वीपीय हैं । इस विषय पर बहुत ही स्पष्ट रुप से ब्रह्मयामल के चौदहवें अध्याय में कहा गया है—शाकद्वीपेच साध्यकः...। वेदोक्त सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात...(पुरुषसूक्त) वैदिक और सनातन धर्म की रीढ़ है, जहां सृष्टि के प्राण-विकास के क्रम और उसके तत्त्व हैं । इस सूक्त में स्पष्ट किया गया है कि आदित्य ब्रह्म विराट के मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति हुयी है । साम्बपुराण अध्याय २७ में कहा गया है—होमं ये मन्त्रतः कृत्वा परं होमे पिवन्तिते । ऋडमयं मण्डलं तच्च दिव्यं ह्यमरमव्यम् ।।   
यज्जन कहे जाने वाले शाकद्वीपीय ब्राह्मण मान्त्रिक विधि से अग्नि में आहुति देते हैं, पुनः समन्त्र उसे पान करते हैं, जिसके परिणाम स्वरुप उन्हें अमरत्व प्राप्त होता है । इसी भांति इनके विषय में औशनस स्मृति, शंखस्मृति, आंगिरसस्मृति, तथा कपिल स्मृति में कहा गया है कि इन सद्विप्रों को हव्य-कव्य, श्राद्धादि में भोजन कराने का अति महत्त्व है । ऐसे दिव्य जन्मा अग्निहोत्री मग को समक्ष वैठा कर सत्कार पूर्वक भोजन कराना चाहिए । विविध धर्मशास्त्र इनकी प्रशस्ति गाथा से भरे पड़े हैं । मगों को श्रद्धा-भक्ति पूर्वक आमन्त्रित करके भोजन करावे, तथा यथाशक्ति सहर्ष दान देवे । ऐसा करने से पूर्व-पर दस-दस पीढ़ियों का उद्धार होता है— मगांनां भोजनं भक्तया शक्तया दानं प्रकल्पयेत् । दशपूर्वान्दशपरानात्मना सहभारत ।। (महाभारत) देव पूजन, पर्व,उत्सव,श्राद्धादि अन्य पुण्यकालों में सूर्य की उपासना करे, और सूर्योपासक भोजक संज्ञक विप्रों (मगविप्रों) को आहूत कर, भोजन कराने से सूर्यलोक की प्राप्ति होती है ।  क्यों कि सभी प्राणियों में उत्तम मनुष्य है। मनुष्यों में भी ब्राह्मण श्रेष्ठ है । ब्राह्मणों में भी विद्वान श्रेष्ठ है । विद्वानों में भी तत्त्वानुरागी श्रेष्ठ है । तत्वानुरागियों में भी तत्त्वज्ञानी श्रेष्ठ है । तत्त्वज्ञानियों में भी योगी श्रेष्ठ है । कोटि-कोटि योगियों से भी एक भोजक (मग) श्रेष्ठ हैसर्वेषामेव भूतानामुत्तमाः पुरुषास्मृताः । पुरुषेभ्यो द्विजः   श्रेष्ठो द्विजेभ्योग्रन्थ पारगः ।। ग्रन्थिभ्यो वेदविद्वांसस्तेभ्यस्तत्वार्थचिंतकाः । अर्थविद्भ्यश्च ज्ञानार्थं प्रतिबुध्ये विशिष्यते ।। ज्ञानार्थं विदां कोटिभ्यो वरिष्ठः योगिनोस्मृताः । योगिनां कोटि कोटिभ्यो भोजकश्चोत्तमेः भवेत् ।। योगिह्यायोग निष्ठाश्चपितरो योग सम्भवः । भोजिते भोजके सर्वे प्रीताः  स्युस्ते न संशयः ।।  (भविष्यपुराण ब्रा.प.१७२)
साम्बपुराण में कहा गया है— मेघाच्छन्नो यदा सूर्यः श्राद्धादौ यज्ञ कर्मणिः । शाकद्वीपद्विजस्तत्र स्थापनीयः प्रयत्नतः ।।
तथा च –  लुप्ते सूर्य वह्नि हीने शाकद्वीप द्विजस्थिते । तत्र यज्ञादिकं कर्म करणीयं न दोषभाक् ।। -
श्राद्धादि शुभाशुभ कर्मों में, जहां सूर्य रहते कर्म समाप्ति का नियम है, किसी कारण वश विलम्ब हो जाये, तो सूर्य के अभाव में सूर्योपासक सूर्यांश मगविप्र को साक्षी मान कर कर्म सम्पन्न किया जाना चाहिए । इस प्रकार सूर्य का विकल्प कहा गया शाकद्वीपीय ब्राह्मण को ।
तथा च – साम्ब को सूर्य का आदेश - मम पूजा करंगत्वा शाकद्वीपादि हानय...।
किंचित भिन्न वाक्य - तान मगान् मम पूजार्थं शाकद्वीपायहानय । आरुह्य गरुडं साम्बः शीघ्रं गत्वाऽविचारयन् ।।   (भविष्यपुराण अ.१३९ श्लोक ८२, साम्बपुराण अ.२६, ब्रह्मपुराण ३५-४०)
तथा च – भविष्यपुराणे ब्राह्मपर्वणि सप्तमीकल्पेएकोनचत्सारिंशदुत्तरशत तमाध्याये सूर्यवाक्यं साम्बमुद्दिश्य-– तान मगान् मम पूजार्थं शाकद्वीपायहानय । आरुह्य गरुडं साम्बः शीघ्रं गत्वाऽविचारयन् ।। मगाब्राह्मणभूयिष्ठा मानगाः क्षत्रियास्तथा । वैश्यास्तु मानसा ज्ञेया शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः ।।
इसी प्रसंग में आगे शतानीक-सुमंतु संवाद है— तथेति गृह्य तामाज्ञां रवेर्जाम्बवतीसुतः । पुनर्द्वारवतीं गत्वा कान्त्यातीव समन्वितः ।। आख्यातवान् पितुः सर्वं स्वकीयं देवदर्शनम् ।। तस्माच्च गरुडं लब्ध्वा ययौ साम्बोऽधिरुह्य तम् ।। शाकद्वीपमनुप्राप्य संप्रहृष्टतनूरुहः । तत्रापश्यद्यथोद्दिष्टान् साम्बस्तेजस्विनो मगान् ।। एवं स आनयित्वा तु मगान् साम्बो महीपते । स महात्मा पुरा साम्बश्चन्द्रभागा सरितत्तटे ।। पुरं निवेशयामास स्थापयित्वा दिवाकरम् । कृत्वा धनसमृद्धंतु भोजकानां समर्पयेत् ।।  तत् पुरं सवितुः पुण्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।। साम्बेन कारितं यस्मात्तस्मात् साम्बपुरं स्मृतम् ।।
शाकद्वीपियों के सम्बन्ध में मगतिलक नामक शोधपुस्तिका में महुआइन ग्राम निवासी मगविभूति पं.रामधन पाठक जी कहते हैं – इह खलु भारते वर्षे आयार्वर्ते भूमौ शाकद्वीपीया नाम भूमिदेवा जयन्ति । एतेषां किल पूर्वजा भोजकापरपर्याया मगानाम कृष्णतनूजेन साम्बेन गरुड़सहायेन शाकद्वीपादानीय मित्रवने सूर्यप्रितमाप्रतिष्ठादि इतरब्राह्मणैः कर्त्तुनमशक्यं कर्म निर्वर्तयितुं पूर्वं निवासिताः। शिशुदारसहितानां दिव्यानां मगानां जीविकार्थं सुखदान्नरसाद्युत्पत्ति चणक्षेत्रा- दिसनाथीकृतानां पुराणां द्वासप्ततिं सूर्याय समर्प्य मगसात् कृतवान् साम्बः । अथ तत्र तत्र पुर उषित्वा पुरोपान्तक्षेत्रादिषूत्पन्नानि अन्नरसवसनादी नि सूर्यसमर्पितानि कृत्वा तैर्लोकयात्रां कुर्वाणाः सुतरां सुखिनः सन्तः शाकद्वीपादागता इति हेतुना शाकद्वीपीयशब्देन व्यवहृतास्ते वभूवुस्तद्वंशभवा अत्र शाकद्वीपीयपदेनाभिधीयन्ते ।

   मगप्रशस्ति में लघुश्वालायनस्मृति(११-३०) में यहां तक कहा गया है कि वैवस्वतकुलोत्पन्नौ महावीरौ सुरोत्तमौ शुनौद्वौश्याम शबलौपितृभागार्थिनौसदा ।। - वैवस्वतकुलोद्भव (सौर) महावीर उत्तम श्वान (देवता श्याम और शबल, जो पितरों के भागों के सदा अधिकारी हैं, श्राद्धीय अन्नभाग को ग्रहण कर तृप्त होते हैं। (ध्यातव्य है कि श्राद्धादि में पंचबली— गौ,काक,श्वान,पिप्पलिकादि का बहुत महत्त्व है।) अभिप्राय ये है कि सौरगणों के श्वान भी पितरों का अंशभागी है, फिर विप्रों का क्या कहना ।   भोजकानां शरीरेतु नित्यं सन्निहितो रविः । ये भोजकान् त्यजंत्यन्ते सर्व पापे स्ववस्थिताः ।। अधोमुखोर्धपादास्ते पतन्ति नरकाग्निषु । कृमिभिर्भिन्नवदना । स्तप्यमानाश्च वह्निना । पीड्यन्ते चायुधैर्घोरै यावदिंद्राश्चतुर्दश ।  (भविष्यपुराण ब्रा.प.१८८) शाकद्वीपियों के शरीर में सदा रवि का वास होता है। इनका जो अपमान या निन्दा करता है, हेय मानता है, वह अधोमुख नरकाग्नि में पड़ता है। इत्यादि।

    आधुनिक काल में भी शाकद्वीपीय ब्राह्मणों पर यदाकदा शोधकार्य होते रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि आत्मश्लाघा में सिर्फ मगों ने ही ये कार्य किए,बल्कि विभिन्न लोगों ने मगमहिमा को अपने शब्दों-भावों में उजागर करने का प्रयास किया है। विदेशी पर्यटक और इतिहासकारों ने भी अपने अध्ययन का केन्द्र-विन्दु बनाया मगों को।
    पुराणादि की चर्चा तो पिछले प्रसंग में की जा चुकी है। यहां कुछ आधुनिक विद्वानों के संग्रह की नाम-चर्चा करते हैं। किन्तु खेद है कि इनमें कुछ के प्रकाशक के बारे में मुझे जानकारी नहीं मिल पायी है,बस नाम भर है। जिज्ञासुओं को अपने स्तर से इसकी खोज करनी चाहिए। यथा— 
1.मग ब्राह्मण उत्कर्ष— पं.विश्वनाथ शास्त्री, शाकद्वीपीय ब्राह्मण बन्धु  कार्यालय,उदयपुर,राजस्थान-( विक्रमाब्द २०२७)
2.मगदर्शन— पं.गौरीनाथ पाठक,गुमला,झारखंड, (विक्रमाब्द २०५०)
3.मगपरिचय—श्रीनाथ शर्मा,मधुबनी,बिहार
4.शाकद्वीपीय ब्राह्मणोपाख्यान—श्रीकेदारनाथ मिश्र, कुतुबपुर,चेचर, वैशाली,(विक्रमाब्द २०६२).
5.मग सूर्य प्रकाश—कवितेज,जैसलमेर,राजस्थान
6.शाकद्वीपीय ब्राह्मण दर्शन—श्री रामनारायण मिश्र,निखिल शाकद्वीपीय  ब्राह्मण महासंघ,इलाहाबाद, ,(विक्रमाब्द २०६२,खृष्टाब्द २००५).
7.मगतिलक—पं.रामदहिन मिश्र,शाहाबाद,बिहार
8.मगतिलक—पं.श्रीरामधन पाठक, महुआइन, गुरारु, गया, बिहार
9.शाकद्वीपीयमगसंस्कृति—डॉ.गीताराय,तरुण प्रकाशन,लखनऊ (1996ई.)
10.अंशुमाली—श्री श्यामसुन्दर पाण्डेय,इलाहाबाद (1992ई.)
11.विश्वविमर्श—पं.विष्णुदत्त मिश्र,चन्दा,ओबरा, औरंगाबाद, (1970ई.)

                      ---)ऊँ दिवाकराय नमः(---

क्रमशः..

Wednesday, 23 August 2017

शाकद्वीपीय ब्राह्मणःलघुशोध--पुण्यार्कमगदीपिका भाग सात

गतांश से आगे...

(सातवें अध्याय का पहला भाग)



                     .मगोत्पत्ति :: कारण और उत्कर्ष

           जगत  की आदि सृष्टि आदित्य नामधारी ब्रह्मा से हुयी है, जो हिरण्यगर्भ- गुण-युक्त है। उसके एक अवतार—मार्तण्ड ( मृत-अण्ड,निष्क्रिय अण्ड) से मनु हुए, जिनसे मानव-समूह जन्मा—मार्तण्डस्यमनुधीमान् जायतसुतः प्रभूः मनुर्वंशोमानवानां ततोऽयं प्रथितो भवत् । (महाभारत, आदिपर्व अध्याय ७५ श्लोक ११-१४) ।
सृष्टि के आदि में होने के कारण आदित्य नाम सार्थक हुआ।
सर्गादौ तम आसीत् तमसागूढमग्रे । (ऋग्वेद १०-११९)
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्वनदासीत् ...। (यजुः ३३)
ततो रवेरेवादौ प्रादुर्भावः ततो विश्वमिदं सद्यस्तमो नाशात् सुनिर्मलम् । (मार्कण्डेय.पुराण. १०२-११) तथा च— आदित्य संज्ञा मगमत् आदावेव ततोऽभवत् । विश्वस्यास्य महाभाग !  कारणं चाव्ययात्मकम् ।। (मार्कण्डेयपुराण १०२-१४)
तथा च— भावाऽभावौ हि लोकानां आदित्यान्निसृतो पुरा । अविज्ञेयग्रहो विप्र ! दिप्तिमान् सुप्रभो रविः ।। यत्र गच्छन्ति निधनं जायन्ते च पुनःपुनः । क्षणं मुहूर्ता दिवसा निशा पाक्षाश्च कृत्स्नशः ।। (लिङ्गपुराण ६०-९)
आदि सृष्टि में सबसे पहले भूमण्डल का हिरण्यगर्भीय वर्ण का भाग निष्पन्न हुआ, जो शाकद्वीप का मूल वर्ण है—
हिरण्यवर्ण भवन्तदन्तमुदकेशयम्...(ब्रह्मपुराण १-३९)
भूगोलार्द्ध का ऊपर का मुखभाग शाकद्वीप कहलाता है, इसकी चर्चा गत अध्याय में हो चुकी है । विराट पुरुष के मुखभाग से ही ब्राह्मणोत्पत्ति हुयी है— ब्राह्मणस्य मुखमासीद्...(शुक्लययुर्वेद ३१) ये सर्व विदित है । वर्णाश्रम व्यवस्था का आरम्भ शाकद्वीप और प्लक्षद्वीप के सीमांचल में ही हुआ है- यह उपनिषदादि प्रमाणित है । मेरुओं में प्रथम मेरु शाकद्वीप में ही है— शाकद्वीपस्य प्रमुख पर्वतो मेरुः। (वायुपुराण ४९-७७ ), जिसके आसपास अमरावती, वरुणालय,कमलालय आदि सभी दिव्य स्थान हैं। मेरौ रवि रथचक्रं  परिभ्रमति... (श्रीमद्भागवत ) सच पूछें तो शाकद्वीप और पुष्करद्वीप में बहुत भेद नहीं है। हालाकि सप्तद्वीप गणना क्रम में दोनों को भिन्न कहा गया है।
शाकद्वीप की गरिमा और महत्ता का गुणगान वेदोपनिषद, पुराणेतिहासों में भरे पड़े हैं। इनकी कुछ बानगी इन स्थानों पर भी देख सकते हैं— शुक्लययुर्वेद अ.३१, ऐतरेयब्राह्मण- अ.१० खंड ४, तथा वायुपुराण, ब्रह्मपुराण, मार्कण्डेयपुराण, मत्स्यपुराण, श्रीमद्भागवतपुराण स्कन्ध ५अध्याय, २० श्लोक संख्या २४ से २७, देवीभागवत पुराण स्कन्ध ८ अध्याय १३ श्लोक १५ से २५, भविष्य पुराण, भविष्योत्तर पुराण, वामनपुराण इत्यादि।
इन स्थानों में भी शाकद्वीपी-प्रसंग द्रष्टव्य है—
१.     ब्रह्मपुराण अध्याय २०
२.     विष्णुपुराण द्वितीयांश अध्याय ४.
३.     शिवपुराण सन्तकुमार संहिता अध्याय ३.
४.     देवीभागवत अष्टम स्कन्ध अध्याय १३.
५.     मार्कण्डेय पुराण अध्याय ५४-५५.
६.     लिङ्गपुराण पूर्वार्द्ध अध्याय ५३.
७.     वाराहपुराण अध्याय ९०.
८.     स्कन्दपुराण शंकरसंहिता दक्षखंड अध्याय ४०.
९.     गरुड़पुराण पूर्वार्द्ध अध्याय ५४.
१०.ब्रह्माण्डपुराण अध्याय ५६.
११.मत्स्यपुराण अध्याय १४०.
१२.विविध उपपुराण
१३.महाभारत
१४.नैषधादि काव्यादि
महाभारत भीष्मपर्व के ११वें अध्याय में शाकद्वीपी के विषय में महर्षि व्यास कहते हैं – शाकद्वीपंच वक्ष्यामि यथावदिहपार्थिव । क्षीरोदो भरत श्रेष्ठ येन सम्परिवारितः ।। तत्रपुण्या जनपदास्तत्रनम्रियतेजनः । कुतएवहि दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुताहि ते ।। देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरु रुच्यते । गौर-कृष्णश्चवर्णौ द्वौतयोर्वर्णान्तरं नृप ।। धार्मिकाश्च प्रजाराजंश्चत्वारोऽतीवभारत ।। वर्णाः स्वकर्मनिरताः नचस्तेनोऽत्र दृश्यते । मगाश्च मशकाश्चैव मानसामन्दगास्तथा ।। मगा ब्राह्मणभूयिष्ठाः स्वकर्मनिरतानृप । मशकेषुतुराजन्या धार्मिका सर्वकामदाः ।। मानसाश्च महाराज वैश्य धर्मोपजीविनः । शूद्रास्तु मन्दगानित्यं पुरषा धर्मशीलिनः।।   यानी क्षीरसागर से घिरे हुए शाकद्वीप में परम पवित्र जनपदों में अमर लोग निवास करते हैं। दुर्भिक्ष वहां कभी नहीं होता । सभी लोग अति तेजवान हैं, फिर भी अति क्षमाशील हैं। देवता,ऋषि,सिद्ध,गन्धर्वादि से भरा हुआ मेरु पर्वत ब्रह्माण्ड का प्रथम मेरु है । वहां की जनता गौर और श्याम वर्ण वाली है । मग,मशक,मानस और मन्दग नामक चार वर्ण हैं, (भूलोक के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चतुर्वर्ण के समान), जो प्रामादालस्य रहित, अपने-अपने कर्मो में निपुण और सदा रत रहते हैं । इस प्रकार मग ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं।
 श्रीमद्भागवत स्कन्ध ५ अध्याय २० श्लोक संख्या २४ से २८ तक शाकद्वीप वर्णन क्रम में किंचित भिन्न प्रमाण मिलता है। यथा— एवं पुरस्तात्क्षीरोदात्परित (कुछ पुरानी प्रतियों में क्षीरोदकात् पाठ है) उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंशल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परीतो यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महासुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ।। तस्यापि प्रैयव्रत एवाधिपतिर्नाम्ना मेधातिथिः सोऽपि विभज्य सप्त वर्षाणि पुत्रनामानि तेषु स्वात्मजान्परोजवमनोजवपयमानधूम्रानीक चित्ररेफबहुरुपविश्वधारसंज्ञान्निधाप्याधीपतीन् स्वयं भगवत्यनन्त आवेशितमतिस्तपोवनं प्रविवेश ।। एतेषां वर्षमर्यादागिरयो नद्यश्च सप्त सप्तैव ईशान उरुश्रृङ्गो बलभद्रः शतकेसरः सहस्रस्रोतो देवषालो महानस इति अनधाऽऽयुर्दा उभयस्पृष्टिरपराजिता पञ्चपदी सहस्रस्रुतिरनिजधृतिरिति ।। तद्वर्षपुरुषा ऋतव्रतसत्यव्रतदानव्रतानुव्रतनामानो भगवन्तं वाय्वात्मकं प्राणायाम-विधूतरजस्तम सः परमसमाधिना जयन्ते ।। अन्तः प्रविश्य भूतानि यो विभर्त्यात्मकेतुभिः । अन्तर्यामीश्वरः साक्षात्पातु नो यद्रशं स्फुटम् ।।  
यानी क्षीरसमुद्र से आगे उसके चारो ओर बत्तीस लाख योजन विस्तार वाला शाकद्वीप है, जो अपने ही आकार तुल्य मट्ठे के समुद्र से घिरा हुआ है। इसमें साध्य, गन्धर्वादि द्वारा रक्षित शाक का विशाल वृक्ष है, जो इसके नाम का कारण है।
आधुनिक विचारक,जिन्होंने वेदोपनिषदादि रुपी उदधि में डुबकी लगाना तो दूर, कभी झांका-देखा भी नहीं है, शाक शब्द से सखुआ,साल, या इसी भांति का कोई वृक्ष - अर्थ निकलते हैं। जबकि इस नामकरण का विशेष कारण है । क्या सखुआ का पेड़ भी किसी को इतना आह्लादित कर सकता है- सोचने वाली बात है। सखुआ — देवदार तो है नहीं । सखुआ में सुगन्ध कहां है ? हां, हरीतिमा है, जिसका आनन्द आँखें ले सकती हैं।  
शाकश्चात्र महावृक्षः साध्य गन्धर्व सेवितः । यत्पत्र वात संस्पर्शात् आह्लादो जायते परः ।। (ब्रह्मपुराण १८-१४) किंचित शब्द भेद युक्त यही श्लोक विष्णु पुराण २-१-४-६३ में भी है।
सुनने में थोड़ा अटपटा लग सकता है,किन्तु ज्ञातव्य है शाकद्वीप का मूलनाम साध्यद्वीप ही है। श्रौत धर्मारम्भादपि प्रागेव साध्य संज्ञित नर-नरायण धर्म कुबेर विरंचि शिवादि देवानां साध्यर्षीणाञ्च निवासादयं साध्यद्वीप इति। (विश्वविमर्श पृ.१९४) अर्थात् वैदिक युगारम्भ के नर-नारायणादि देवों तथा साध्य ऋषियों का निवास स्थान यह साध्यद्वीप ही है,जो कालान्तर में आद्य महालक्ष्मी(शाकम्भरी)की लीला से साध्य से शाक हो गया । भविष्यपुराण १२५-१६ तथा देवीभागवत ८-७ में द्वादश साध्यों की चर्चा है— नर,नरायण,ब्रह्मा(मन), वरुण(प्राण), अग्नि(वृत्ति), मनु, सोम, धर्म, यम, वायु, कुबेर एवं शिव । ब्रह्मपुराण, वायुपुराण,मार्कण्डेयपुराण आदि में भी इन्हीं नामों को गिनाया गया है।
यथा—  मनोऽनुगन्ता प्राणश्च नरोनारायणस्तथा । वृत्तिलम्बो मनुश्चैव सोमो धर्मश्च वीर्यवान् । वित्तस्वामी प्रभुश्चैव साध्याः द्वादश कीर्तिताः ।।
वेद से पुराणकाल तक की, क्रमिक रुप से शब्दों की परिवर्तनात्मक रहस्यमय यात्रा पर जिन्होंने विचार किया है, उन्हें इस परिवर्तन पर जरा भी आश्चर्य नहीं होगा । जैसे - वैदिक काल का शब्द बलग > बल्ग > बगला हो गया, पुराण काल आते-आते । शत्रु की जिह्वा पर लगाम लगाने वाली इन्हीं भगवती का आधुनिक नाम बगला है। बल्ग शब्दो वेदब्राह्मणपुराणादिषु क्रमशः बलग,बल्ग,बगला रुपमाप । (विश्वविमर्श-पं. विष्णु दत्त मिश्र)
रक्षोहणं वलग हनम् । (ययु -३५) कृत्यां बल्गां निखनति (शतपथब्राह्मण ३-५-४-५) मातः श्री बगलामुखि ! (शाक्तप्रमोद,ब्रह्मयामलादि)
शब्दों के इस रहस्यमय परिवर्तनशील यात्रा को समझने के लिए थोड़ा अप्रासंगिक हो रहे हैं—वैदिक शब्दानां प्रचलित परिवर्तने नियन्त्रण रुप संस्कार एव । ततोहि पाणिनिः— प्रचलित शब्दानां भाषा तत्पुरोवर्ति शब्दानां छन्दं इत्युक्तवान् । मयड्वैतयोर्भाषायाम् । (४-८-१४३) भाषायां सदवसु श्रवः । (३-२-१०८) छन्दस्युभयथा । (६-४-८६) तदनुसरन् वररुचिः प्रत्यये भाषायां नित्यम् । ङ्यापोः संज्ञा छन्दसोर्वहुलम् । भाषायां छन्दसि इति द्वैविध्यं शब्दानां परिवर्तनशीलतां व्यनक्ति । तथैव वैदिक साध्यद्वीपो हि हेतु भूयस्त्वात्- शाकद्वीप इति ।
वर्तमान में हम जिसे संस्कृत भाषा कहते हैं,वस्तुतः वह शनैःशनैः संस्कारित होकर अपने इस कलेवर में दर्शित हुआ है । हमारी हिन्दी भाषा के साथ भी कुछ ऐसी ही बात है। भाषा हमेशा परिवर्तनशील है। प्रवहमाण है।  शब्दों के उच्चारणादि पर परिवेशादि का प्रखर प्रभाव पड़ता है और समय-समय पर इसमें आयी विकृतियों का समाधान करना पड़ता है। वैदिक काल से चले आ रहे शब्दों में निरन्तर परिवर्तन देख कर,उनपर नियन्त्रण की आवश्यकता प्रतीत हुयी। और तब उसे ऋषियों ने संस्कारित किया । (अब यहां संस्कार को दोष-निवारण अर्थ में न ले लें। मानकता अर्थ में लेना उचित होगा)। वैदिक शब्दों का नियन्त्रण रुपी संस्कार ही तत् भाषा के संस्कृत नामकरण का कारण बना। आचार्य पाणिनि ने  प्रचलित शब्दों को भाषा तथा उसके परिवर्तित शब्दों को छन्दस कहा है,जो कि अष्टाध्यायी के सूत्रांकन से स्पष्ट हो जाता है। आगे वररुचि ने भी इसका अनुसरण किया । या कहें इसे प्रमाणित किया है । साध्यद्वीप से  शाकद्वीप तक की शब्दयात्रा भी इसी क्रम में हुयी है।
शाकद्वीप नामकरण के पीछे भगवती शाकम्भरी का योगदान है। निखिल शक्ति बीजभूतेयं शाकम्भरी दुर्गमदैत्यार्त देवैः स्तुता प्रादुर्भवति । दुर्गम दैत्य से विकल, भूखे-प्यासे देवगणों की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवती शाकम्भरी अवतरित हुयी, उनके पालनार्थ-रक्षणार्थ ।
शाकम्भरी नीलवर्णा नीलोत्पल विलोचना । मुष्टीं शिलीमुखाऽपूर्णं कमले कमलाऽलया । पुष्प पल्लव मूलादि फलाढ्यं शाकसञ्चयम्। कार्मुकं च स्फुरत्कान्ति विभर्ति परमेश्वरी ।। (मूर्तिरहस्य) कुछ ऐसी ही भावाभिव्यक्ति देवीभागवत -२८ में भी है। साध्य को शाक,और साध्यद्वीप को शाकद्वीप रुप से ख्यात होना इन्हीं भगवती का कृपा-प्रसाद है। वस्तुतः ये और कोई नहीं आद्यलक्ष्मी- महालक्ष्मी-महामाया ही हैं। भूखे-प्यासे,रोते-विलखते,संतप्त-आतुर का पालन आखिर कौन करेगा इनके सिवा ? उसी समय— जब ये अवतरित हुयी,इनके शरीर से कालिका,तारिणी,वाला,त्रिपुरा, भैरवी,वगला,मातंगी,त्रिपुरसुन्दरी,कामाक्षी,तुलजा,जेमिनी,मोहिनी,छिन्नमस्ता,गुह्य- काली आदि अन्यान्य सहस्र नेत्रोंवाली देवी स्वरुप अवतरित हुयीं। यही शाकम्भरी देवी शताक्षी दुर्गा भी कही गयी हैं।
यथा— ततो देवी शरीरातु निर्गतास्तीव्र शक्तयः । कालिका तारिणी बाला त्रिपुरा भैरवी तथा ।। बगला चैव मातंगी तथा त्रिपुरसुन्दरी । कामाक्षी तुलजा देवी जेमिनी मोहिनी तथा ।। छिन्नमस्ता गुह्यकाली दशवाहुं सहस्रका ।। (देवीभागवत ७-२८)
शाकम्भरी शब्द पर जरा विचार करें(गौर करें)शाकम् भरी—शाक को भरने वाली(द्वितीया विभक्ति),जब कि भाव है- उदरम् भरी—उदर को भरने वाली। यहां इस अर्थ से प्रत्यक्षतः अर्थदोष दीख रहा है। अतः शाक से भरण करने वाली के लिए शाकम्भरी शब्द का प्रयोग कैसे हो सकता है? वस्तुतः यहां शाकद्वीपम्भरी है। शाकद्वीपियों ( निवासियों) का भरण किया जिसने । एक अन्य उदाहरण से इसे स्पष्ट करें—रघुकुलनन्दन – रघुनन्दन में मध्यपद(कुल)का लोप हो गया,उसी भांति शाकद्वीपम्भरी में द्वीप पद का लोप हो गया बहुव्रीहि समास होकर। और शाक का अर्थ सिर्फ साग न समझा जाए, प्रत्युत नीवार,सांवां आदि विविध खाद्य वनस्पति अर्थ वोधक है। कार्तिकमास के शुक्ल पक्ष में होने वाले शाकसप्तमीव्रत(विष्णु के निमित्त)में वस्तुतः इन्हीं शाकम्भरी देवी(महालक्ष्मी)की उपासना है। भाद्रशुक्लपञ्चमी को ऋषिपञ्चमी व्रत करते हैं,जिसमें सप्तऋषियों की उपासना होती है,उसमें शाकान्न (सांवां,टांगुन,कंगुनी आदि अन्नों) से प्रसाद निर्मित करते हैं। ध्रुव ने इन्हीं शाकान्नों का सेवन कर तपस्या करते हुए ध्रुवपद प्राप्त किया था। समयानुसार ये विविध अन्न आजकल लुप्त होते जारहे हैं- सभ्यता के विकास में। हम इनका नाम-रुप सब विसार बैठे हैं। प्रयोग तो बहुत दूर की बात है। किसी भी शुभकार्य में शाक(साग)की अनिवार्यता के पीछे भी यही कारण है। यहां तक की शाकश्राद्ध का भी महत्त्व है।
 शाकद्वीप नामकरण की सार्थकता के पश्चात् अब मूल विषय पर आते हैं। 
            ऐतरेय ब्राह्मण(१०-४) का एक प्रसंग है - देवासुरा वा एषु लोके समयतन्त ते वै देवाः सद एवाऽऽयतनम् कुर्वत तान्सदसोऽ जयक्ष्त आग्रीघ्नं संप्रापद्यन्त ते ततो न पराजयन्त तस्मादाग्रीघ्न उपवसन्ति....।
पुरातन काल में देवासुर संग्राम के क्रम में शाकद्वीप के निवासी- विशेष कर मग,मृग,भोजकादि ब्राह्मण, तथा वृहस्पति, सूर्य, विष्णु आदि ने सहस्रों वर्ष तक युद्ध किया। बाद में इसी क्षीरसागर का देवासुर द्वारा संयुक्तरुप से मंथन भी हुआ— क्रियताममृतोद्योगं मध्यतांक्षीर वारिधि...(मत्स्यपुराण अ. १४९)। यद्यपि इस संग्राम में देवपक्ष विजयी हुआ, किन्तु दीर्घकाल तक युद्धरत शाकद्वीपीय जन अति क्षुब्ध हो गए इस घटना से । उस काल में राजा प्रियव्रत शाकद्वीप में ही निवास कर रहे थे । उन्होंने अपने सात पुत्रों में द्वीपाधिकार विभाजित किया । बड़े पुत्र न्यग्रोध को जम्बूद्वीप का कार्यभार सौंपा, तथा छोटे पुत्र को अपने समीप रखते हुए शाकद्वीप की व्यवस्था सौंपी । भ्रातृ-प्रीति वश द्वीपान्तर यात्रायें होती रही । इस प्रकार शाकद्वीप से जम्बूद्वीप में आवागमन होता रहा ।
देवासुर संग्राम में मगों के कुशल नेतृत्व और शत्रुंजयी दक्षता के कारण इनके लिए मृग संज्ञा भी प्रचलित है । ये अमृतविद्या,मन्त्रविद्या,आयुर्विज्ञान,तन्त्र,नीति, योगक्रियादि में विशेष निपुण हैं । मृग जाति का वर्णन वेदत्रयी के अतिरिक्त तैत्तरीय संहिता में लगभग समान शब्दावलियों में  हुआ है । मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आजगन्थाः परस्याः सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं विशत्रुन्ता ढिविमृधोनुदस्व....। अर्थात् योगनिष्ठ मृग (शाकद्वीपीय ब्राह्मण) भयानक वीर हैं । ये कुचर (पृथ्वी पर घूमने वाले) , गिरिकन्दराओं में रहने वाले दुष्टों का लोकशान्ति और कल्याण के लिए अपने योगैश्वर्य की अमोघ शक्ति से वा मन्त्र शक्ति से संहार करते हैं। ध्यातव्य है कि ये शस्त्रास्त्र-युद्ध नहीं करते थे। इसकी इन्हें आवश्यकता ही नहीं थी।
इससे किंचित भिन्न अर्थ करते हुए निरुक्तभाष्य अध्याय १ खंड २० में यास्क ने इन मन्त्रों का विष्णु और सूर्य के अर्थ में प्रयोग किया है—कुचरः गरिष्ठा भीमः मृगः न... गिरिकन्दराओं में रहने वाले पशु आदि, जो पृथ्वी पर निरंकुश घूमते हैं, ऐसे लोगों के लिए रुद्र के समान संहारक हैं। एक वैदिक मन्त्र में जनता के नेता के अर्थ में भी मृग और मग का प्रयोग हुआ है। (ऋ.वे.१०-३६-२२,अ.वे.२०-१-६) ये प्रसंग भी यास्क भूमिका में उपलब्ध है । सूर्य सदा शाकद्वीप के छठी काष्ठा से उदित होकर, भ्रमण करते हुए संध्याकाल में उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रवेश करते हैं- शाकद्वीपस्य षष्ठस्या उत्तरान्तो दितश्चरणः...। (वायुपुराण-५)
मगाः ब्राह्मण भूयिष्ठाः ”- इस वाक्यांश का उद्धरण ब्रह्मपुराण अ.२०, विष्णु पुराण अ. २-४,भविष्यपुराण अ.३६, साम्बपुराण अ.२५, पद्मपुराण स्वर्ग खंडादि में भी विशद रुप से मिलता है । भविष्य पुराण ब्रा.प.अ.११९ में कहा गया है – सृजामि प्रथमं वर्णं मगसंज्ञं मनूपमम्...। सूर्य के तेज से मग नामक अनुपम वर्ण का सर्वप्रथम सृजन किया। अथर्ववेद ९-१०-१५ में कहा गया है- यदामागन् प्रथमजा ऋतस्यादित वाचो अश्नुवै भागअस्याः – आदि मानव मग आदि वाणी वोलने वाले, यज्ञ के आदि मन्त्र-वाचक और यज्ञ-भाग-भोगी हैं।
शाकद्वीप के अन्तर्गत ही उत्तरभाग में श्वेतद्वीप है । यहीं क्षीरसागर में शेष-शैय्या पर चतुर्भुज नारायण विराजते हैं—
शाकद्वीप समावृत्य क्षीरोदः सागरः स्थितः स्वेतद्वीपज्यतन्मध्ये नारायण परायणाः । श्वेतास्तत्रनरानित्यं  जायन्ते विष्णुतत्पराः ।। नारायण समा सर्वे नारायण परायणाः । ध्यायन्ति तत्परं ब्रह्म वासुदेवं सनातनम् ।। (कूर्मपुराण-४९)
अहंकार और उपेक्षारहित शाकद्वीपीय ब्राह्मण यहां पद्मनाभ अच्युत और भगवती रमा के समक्ष सदा सामगान करते रहते हैं ।
तेधे तोयाब्धे रुत्तरं कूलं श्वेतद्वीप मिहोच्यते । संन्दर्शनाय योगीन्द्र सनकादि महात्मनाम् ।। साध्या मरुद्णाश्चैव सेवन्ते नित्य देवताः ।। सनकश्च सनन्दनश्च तृतीयश्च सनातनः । सनत्कुमारोजतश्चवोढुः पंचशिखस्तथा ।। सप्रेते ब्रह्मणः पुत्रा योगिनः सुमहौजसः । नरनारायणाद्यश्च श्वेतद्वीपे वसन्ति ते ।। श्वेतद्वीपे महायोगी सेविते हेय वर्जिते । नानाराजमयूखैस्तुच्छादिते दुग्धवारिधौ ।। (पद्म पु. ६ उ.खं. २५९)।

  ऐसे ही भावार्थ पूर्ण  प्रसंग श्रीमद्भागवतादि अन्य पुराणों में 

 भी है। 

क्रमशः...