Friday, 30 December 2016

नाड्योपचारतन्त्रम्( The Origin of Accupressure)

गतांश  से आगे...
दशवें अध्याय का शेषांश...
(4) कान—
नाड्योपचार प्रतिबिम्ब-केन्द्र-समूह की परिचय-श्रृंखला में वरीयता क्रम से चौथे स्थान पर है कान। दोनों कान की बनावट एक समान है। वैसे,समान बनावट तो दोनों हथेलियों और तलवों की भी है,किन्तु आन्तरिक दृष्टि से विचार करने पर एक्युप्रेशर विन्दुओं का काफी फर्क है दोनों ओर। जब कि ऐसी बात दोनों कानों के साथ नहीं है। यानी कि दोनों कानों में सभी केन्द्र समान रुप से पाये जाते हैं। इस प्रकार शारीरिक उपखण्ड(जोन)नियम का अपवाद है कान। फलतः कान से सम्बन्धित एक का ही चित्र दिया गया है। चित्रांक 27-क में एक कान के सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों को क्रमांकों में दर्शाया गया है,तो चित्रांक 27 ख में उन्हीं बातों को अंगाकृति के रुप में प्रदर्शित किया गया है,ताकि समझने में सुविधा हो। अंकों एवं अंगों के वर्णन का ढंग पूर्व वर्णित तलवे-तलहथी आदि की तरह ही है। निदान या चिकित्सा-काल में उसी भांति इन केन्द्रों का प्रयोग किया जाता है। हां,ध्यान देने योग्य है कि कुछ क्रमांक अंगों के नाम से हैं,तो कुछ क्रमांक व्याधि विशिष्ट के नाम से। यथा चित्रांक 27 क का क्रमांक 4 उच्च रक्तचाप को दर्शाता है, अर्थात उच्चरक्तदाब की स्थिति में इसका प्रयोग पूर्व कथित विधि से किया जाना चाहिए,जिससे व्याधि में संतुलन-नियंत्रण की स्थिति पैदा होगी। यही कारण है कि विशेषज्ञों ने इसे व्याधि-विशिष्ट संज्ञा प्रदान की है। इसी तरह केन्द्रांक 23 भी है।
            एक अन्य चीज चित्रांक 27 क में देखने को मिल रही है- वह है- मध्य भाग  पर थोड़ी मोटी लकीर,जो अर्द्धवृत्ताकार है,और अंग्रेजी के पांच संयुक्ताक्षरों से युक्त है। वस्तुतः मेरुदण्ड के प्रभाव और उपयोगिता से कान भी अछूता न रह सका। जैसा कि पूर्व वर्णित है—तलवे और तलहथियों में मेरुदण्ड के प्रतिबिम्ब केन्द्रों को प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। उसी भांति यहां कान में भी है। मेरुदण्ड के सभी कशेरुओं से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब केन्द्र अपने पूर्व क्रम से ही (जैसा कि मेरुदण्ड प्रतिबिम्ब केन्द्र तालिका से स्पष्ट है) यहां कान में भी हैं,किन्तु स्थान बहुत ही कम है,अतः सभी 33 विन्दुओं का अलग-अलग विनिश्चय कितना जटिल और सूक्ष्म होगा, इसे प्रयोग-कर्ता सहज ही समझ सकते हैं। अतः इन समस्त विन्दुओं का स्वतन्त्र विवेचन किये बिना, उपखंडीय विभाजन क्रम से सामूहिक ढंग से उपयोग करना ही उचित,आसान और तर्कसंगत होगा। मेरुदण्ड के पांचो उपखंडों का प्रथमाक्षर संकेत यहां दिया हुआ है। यथा-     C-Cervical, T- Thoresic, L-Lumber, S-Sacral, C-Coccyx—इनका उपयोग अनुमानिक विनिश्चय के आधार पर यथाविधि किया जाना चाहिए।
            तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर हम पाते हैं कि अन्य प्रतिबिम्ब केन्द्र समूह(स्विचवोर्ड)से कान-समूह का आकार बहुत ही छोटा है,और अपेक्षाकृत विन्दु ज्यादा हैं। अतः स्वाभाविक है कि प्रत्येक विन्दु को कम घेरदार स्थान मिलेगा। प्रत्येक केन्द्र को प्रायः छोटे सरसो के बराबर ही स्थान मिल पाया है। छोटे से स्थान में बहुत अधिक विन्दु सजे हुये हैं,फलतः उनके विनिश्चय में भी काफी सूक्ष्मता वरतनी पड़ती है। वरीयता क्रम से उत्तरोत्तर सक्रियता होते हुए भी,सरलता के विचार से कर्ण-समूह को चौथा स्थान देने का यही कारण भी है। क्यों कि हम पूर्व में भी कहते रहे हैं कि नाड्योपचार(एक्यूप्रेशर) एक अति सरल चिकित्सा पद्धति है। अतः सक्रियता को वरीयता न देकर,सरलता को महत्त्व दिया गया,ताकि सामान्य जनसुलभ कहा जा सके।
            विगत दस-पन्द्रह वर्षों में चीन में कान से सम्बन्धित एक्यूप्रेशर(एक्यूपंचर)पर काफी अध्ययन हुआ है,जिसके परिणाम स्वरुप इस अति लधु केन्द्र समूह में लगभग 200 से भी अधिक प्रतिबिम्ब केन्द्रों की खोज की गयी है। किन्तु एक ओर स्थान छोटा होने से विन्दु-निश्चय की जटिलता बढ़ती है,तो दूसरी ओर सबके सब विन्दु विशेष महत्त्व के हैं भी नहीं- उपचार की दृष्टि से। अतः उनमें से कुछ खास केन्द्रों के बारे में ही यहां चित्रांक 27 में बतलाया गया है। इसकी तालिका यहां स्पष्ट की जा रही है—
केन्द्रांक
अवयवादि सम्बन्ध
अंग्रेजी नाम
1.
तुण्डीकेरी
Tonsillitis
2.
आन्त्रपुच्छ
Appendix
3.
एड़ी
Heal
4.
उच्च रक्त चाप
Hypertension(HBP)
5.
नितम्ब
Buttock, Hip
6.
घुटना
Knee
7.
मणिबन्ध
Wrist
8.
श्वांस व्याधि
Chronic Asthma
9.
जांघ
Thigh
10.
विशिष्ट वातनाडी
Sciatica Nerve
11.
मूत्रनलिका
Ureter
12.
मूत्राशय
Urine bladder
13.
कूल्हा
Hip
14.
बड़ीआंच
Large Intestine
15.
वृक्क(गुर्दे)
Kidney
16.
छोटीआंत
Small Intestine
17.
मलाशय
Rectum
18.
आमाशय
Stomach
19.
श्वांसप्रणाली
Respiratory System
20.
फेफड़ा
Lungs
21.
मस्तिष्क
Brain
22.
श्वांस नलिका
Trachea
23.
उच्च रक्त चाप
Hypertension(HBP)
24.
नाक के भीतरी भाग
Inner part of Nose
25.
नाक के बाहरी भाग
Outer part of Nose
26.
आँख
Eyes
27.
आँख
Eyes
28.
फेफड़ा
Lungs
29.
अण्डकोश
Testes
30.
कान
Ear
31.
कान
Ear
32.
नीचे का जबड़ा
Jaw lower side
33.
ऊपर का जबड़ा
Jaw upper side
34.
गर्दन
Neck
35.
कंधा
Shoulder
36.
कुहनी
Elbow
37.
उदर(पेट)
Stomach
38.
कुहनी
Elbow
39.
घुटना
Knee
40.
अग्न्याशय
Pancreas
41.
प्लीहा
Spleen
42.
यकृत
Liver
43.
दांत
Teeth
44.
ललाट
Four head
45.
जीभ
Tung
46.
मानसिक व्याधियां
Mantel Disease
47.
गर्भाशय एवं अंडाशय
Uterus & Ovaries
48.
मोटापा
Fatness
49.
हृदय
Heart
50.C
ग्रीवा कशेरु
Cervical Vertebra
51.T
पृष्ठ कशेरु
Thoracic Vertebra
52.L
कटि कशेरु
Lumber Vertebra
53.S
त्रिकास्थि कशेरु
Sacral  Vertebra
54.C
गुदास्थि कशेरु
Coccyx Vertebra

नोटः- 1) केन्द्रांक 46,47,48 का स्थान वही है,जो चित्रांक 27 में दर्शाया गया है। किन्तु प्रयोग में देखा गया है कि ये तीनों केन्द्र कान के पिछले भाग में सक्रिय हैं। अतः उपचार पीछे की ओर से ही करना चाहिए।
2)केन्द्रांक 1 को इस तालिका में टॉन्सिल के लिए बतलाया गया है,किन्तु मणिभाई जी का कथन है कि इस केन्द्र को वंशानुगत दमे के रोगियों में अवश्य प्रयोग करे। आशातीत लाभ होगा।

कान के सम्बन्ध में कुछ और भी महत्त्वपूर्ण बातें हैं,जिनका वर्णन यहां कदापि अप्रासंगिक न होगा। जैसा कि पूर्व में कहा गया है—मेरुदण्ड अपने आप में पूर्ण स्वतन्त्र है एवं सर्वांग उपयोगी एक्यूप्रेशर प्रतिबिम्ब केन्द्र समूह है। लोकप्रियता की दृष्टि से तलवे और तलहथी का स्थान उससे भी बढ़ कर है। स्वतन्त्र उपयोगिता भी इनकी काफी है।जिसके परिणाम स्वरुप इसे स्वतन्त्र चिकित्सा विधा (रिफ्लेक्सोलॉजी)का नाम दे दिया गया। कुछ इसी तर्ज पर विगत कुछ वर्षों से फ्रांस के डॉ.रेनी वार्डियल का ध्यान एक्यूप्रेशर की ओर आकृष्ट हुआ,और गहन अध्ययन-मनन के बाद उन्होंने निश्चय किया कि ‘कर्ण एक्युपंक्चर’ की तुलना में ‘कर्ण एक्यूप्रेशर’ अधिक प्रभावशाली,सरल,एवं दुष्प्रभाव रहित है। अतः इसका(इन विन्दुओं का) प्रयोग दाब-प्रक्रिया के रुप ही किया जाना चाहिए,न कि छिद्र-प्रक्रिया के रुप में। इसी क्रम में सन् 1950 में फ्रांस के ही न्यूरोसर्जन डॉ.पॉलनॉजियर ने कर्ण एक्यूप्रेशर—Auricular Therapy के नये नामकरण से विभूषित करते हुए अपने आप में पूर्ण और स्वतन्त्र चिकित्सा पद्धति के रुप में घोषित-प्रतिष्ठित किया। फ्रान्सीसी चिकित्साविदों के इस प्रकार के दावे और घोषणाओं से कान के एक्यूप्रेशरीय उपयोग की महत्ता और भी बढ़ जाती है।


कान के सम्बन्ध में कुछ और चर्चा करने से पूर्व तत्सम्बन्धित कुछ चित्रों का अवलोकन कर लें,जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है,तथा क्रमांकों की तालिका भी प्रस्तुत की गयी है।  यथा—चित्रांक 27 क-ख-

 कर्ण-एक्यूप्रेशर(एक्युपंक्चर)के सम्बन्ध में गहनता से विचार करने पर,ऐसी कई बातें स्पष्ट होती हैं,जो जाने-अनजाने रुप में पारम्परिक रुप से व्यवहार में चली आ रही हैं। स्त्रियों का (कहीं-कहीं पुरुषों का भी) कान छेदवा कर आभूषण धारण करना आज भी लोकपरम्परा में व्यापक रुप से है। कान का इतना अधिक महत्त्व है कि अति प्रधान षोडश वैदिक संस्कारों में कर्णवेध-संस्कार भी एक है। वैदिक-संस्कार के इस प्रमाण से इसकी ऐतिहासिकता स्पष्ट है,भले ही आज हम इसे महत्त्वहीन मान बैठे हैं। इधर कुछ दिनों से ये रुप बदलकर पुनः चलन में आ गया है—स्त्रियां तो निश्चित रुप से कान छेदवाती ही हैं,इधर पुरुष भी एक कान छेदवाकर उसमें आभूषण पहनने लगे हैं। वैदिक संस्कारों में एक प्रधान संस्कार है—यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार,जो सामाजिक रीति-कुरीति का शिकार होकर,मात्र द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) तक ही सीमित कर दिया गया। आगे चल कर कुछ लोगों ने स्वेच्छा से इसे महत्त्वहीन भी करार दे दिया। इस संस्कार की कर्मकाण्डीय, पौराणिक, वैदिक, यौगिक महत्ता तो सर्वोपरि है ही,किन्तु इसके व्यावहारिक उपयोग (प्रयोग) पर यदि ध्यान दिया जाय,तो वहां भी कर्ण-एक्यूप्रेशर का सिद्धान्त (प्रयोग) झलकता है। शौचकाल में (मल-मूत्र-विरेचन से पूर्व) कान की जड़ को खास ढंग से यज्ञोपवीत-सूत्र से वेष्ठित(लपेट)कर लेना,एक्यूप्रेशर की पूर्व परम्परा को ही ईंगित करता है,साथ ही पूरे शरीर में कान की विशेष महत्ता को भी प्रमाणित करता है। यहां ये सामान्य जिज्ञासा हो सकती है कि आंखिर कान ही क्यों ? मल-मूत्र-त्याग के समय शरीर के अन्य अंग- हाथ,पैर,नाक आदि को क्यों नहीं बांधा गया ? इसका कारण स्पष्ट है—एक्यूप्रेशरीय कारण। विदित हो कि कान पूरे शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। ध्यान देने की बात है कि कान की बनावट ठीक वैसी ही है,जैसा कि गर्भगत बालक की होती है। आँख,नाक आदि में ये विशेषता नहीं है। कान को बांध(सुरक्षित)कर लिया,यानी पूरा शरीर रक्षित हो गया। यहां मुख्य बात यह है कि कानों की जड़ में उस खास भाग में जहाँ जनेऊ लपेटते हैं,एक्यूप्रेशर के विशिष्ट प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं,जिन पर लागातार दबाव की अपेक्षा रहती है- शौचकाल में। इसका सम्बन्ध मस्तिष्क एवं उत्सर्जन प्रणाली से है। ज्ञातव्य है कि कुछ खास तरह की वातव्याधियों का प्रकोप (अटैक) खास कर शौचकाल में ही होता है। आपने प्रायः सुना होगा कि शौचकाल में लकवा मार दिया,वेहोशी आगयी,ब्रेन हैमरेज हो गया...आदि। इस काल में जनेऊ द्वारा कान की जड़ों को बांध रखना सुरक्षा का अद्भुत प्रयोग है।
           कान की महत्ता का एक और उदाहरण ध्यान देने योग्य है—बच्चे कुछ गलती करते हैं,तो हम चट उसका कान उमेठ देते हैं। यहां भी परम्परा का वही प्रश्न उठता है—आंखिर कान ही क्यों ? दुनिया के किसी कोने में नाक उमेठने की परम्परा नहीं है,और न कोई अन्य अंग उमेठ कर बड़े (अभिभावक) अपना आक्रोश बच्चों पर व्यक्त करते हैं। सच पूछा जाय तो यहां भी नाड्योपचार का गुप्त सिद्धान्त ही छिपा हुआ है लोकपरम्पराओं में। भले ही उसकी व्यावहारिकता दिनोंदिन बदलाव पूर्वक विकृत होती गयी,और मूल उद्देश्य गुम होता गया। कान उमेठना क्रोध प्रकट करने की व्यावहारिक मुद्रा बन गयी।
बात दरअसल ये है कि बच्चे में गलती या विस्मृति के सुधार के लिए कान के स्पर्श की परम्परा थी,जो आगे चल कर (विकृत होकर) उमेठने और ताड़ित करने की परम्परा बन गयी। कान के स्पर्श की एक खास मुद्रा है,जो नाड्योपचार से सम्बन्धित है। कान को स्पर्श (उमेठने) करने का तरीका ये है कि उमेठने वाले का अंगूठा कान पर इस प्रकार पड़े कि केन्द्रांक 21 (चित्रांक 27 क) पर दबाव पड़ सके। इस मुद्रा में प्रयोगकर्ता की शेष अंगुलियां कान के पिछले भाग में केन्द्रांक 46(चित्रांक 27 क)  पर भी साथ-साथ दबाव डालेगी। दोनों क्रमांकों-21 और 46 का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है। अब यदि इस बात को ध्यान में रखते हुए सही तरीके से कान को उमेठा जाय,यानी जोर से असरदार दबाव डाला जाय तो स्वाभाविक है कि बच्चे का मानसिक विकास होगा,स्मरण शक्ति बढ़ेगी,तथा चुंकि इसका प्रभाव पीयूष एवं चेतना ग्रन्थि (Pituitary & Pineal Glands) पर पड़ता है,इस कारण बच्चे में उदण्डता और उच्छृंखलता का विकार कम होने लगता है। वस्तुतः कान उमेठना एक गहन और रहस्यमय यौगिक प्रक्रिया है, जिसका सही तरीके से पालन होना चाहिए,न कि विकृत रुप से,अन्यथा लाभ का सिद्धान्त (परम्परा) हानि के परिणाम में बदल जायेगा। ज्ञातव्य है कि परिवर्तित रुप से यह परम्परा जापान में आज भी है। वहां लोगों की धारणा है (भारत में भी ये मान्य है) कि बड़े और लम्बे कान वाले लोग दीर्घजीवी और यशस्वी होते हैं। अतः आदतन प्रायः माता-पिता दुलार से अपने बच्चों का कान खींचते और उमेठते हैं,ताकि कान लम्बा होजाय।
कान की महत्ता का और भी कारण है। शरीर को चलते-फिरते समय संतुलित रखने में कान का काफी सहयोग मिलता है—इस बात से प्रायः लोग अवगत हैं,किन्तु आकार की दृष्टि से कान की जो विशेषता और महत्ता है,उस पर बहुत कम ही लोगों का ध्यान गया होगा। वस्तुतः कान(बाहरी आकृति)मानवी गर्भ की लघु प्रतिकृति ही तो है। इसका आकार ठीक वैसा ही है,जैसी स्थिति गर्भगत बालक की होती है। इसे चित्रांक 27 ग द्वारा स्पष्ट किया गया है।

गर्भ में बालक उल्टा स्थित होता है-सिर नीचे की ओर रहता है और हाथ-पांव मुड़-चिमुड़ कर ऊपर सिमटा हुआ रहता है। कान की बाहरी बनावट पर गौर करेंगें तो स्थिति ठीक वैसी ही मिलेगी—कान का लोव (ललरी) सिर का प्रतिनिधित्व करता है,बाहरी किनारा शरीर के बाहरी भाग का,जिसके भीतर परतदार भाग मुड़े-तुड़े,सिमटे-सिकुड़े अन्यान्य अंगों का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है। इस प्रकार पूरा कान पूरे शरीर का प्रतिनिधित्व करता है।
        वस्तुतः कान हमारे शरीर का प्रतिनिधि ही है—यौगिक दृष्टि से,साथ ही एक्युप्रेशरीय दृष्टि से भी। शरीर के समस्त स्नायुतन्त्र (लगभग सभी अंगों से सम्बन्धित) के एक न एक छोर कान में अवश्य पहुंचता है,और वह कान के जिस भाग पर आकर मिलता है,वहाँ एक सूक्ष्म केन्द्र का निर्माण करता है,यानी वह स्थल ही एक्यूप्रेशर प्रतिबिम्ब केन्द्र बनता है। कान के इसी महत्त्व और गुण के कारण फ्रान्सीसी विशेषज्ञों का कर्ण-एक्युप्रेशर-सिद्धान्त(Auricular Therapy )  इतना विकसित और प्रचलित हुआ। इन विशेषज्ञों द्वारा कुछ विशिष्ट प्रतिबिम्ब केन्द्रों की खोज की गयी है। विशिष्टता का दो कारण है—एक तो इन केन्द्रों की संवेदनशीलता विशेष रुप से है,और दूसरा यह कि चीनी विशेषज्ञों द्वारा अन्वेषित केन्द्रों की भीड़ से काफी हट कर,अति संक्षिप्त रुप से पूरे कान को कुछ खास भागों में बांट दिया गया है। इन विभाजित खंडों का सम्बन्ध अवयव विशिष्ट से है,जिन पर पूर्व निर्दिष्ट विधि से ही दाब उपचार किया जाता है। इसे नीचे की तालिका में स्पष्ट किया जा रहा है—
S.N.
Division
Organ
1
Lobe
Face
2
Antitragi’s
Head
3
Helix limb
Digestive system
4
Anti Helix
Up to Neck(whole body)
5
Upper Anti Helix
Leg
6
Lower Anti Helix
Hip
7
Triangular fassa
Penice,Vegina,Anus
8
Acapha
Hand
9
Tragus
Neck
10
Upper corner of Tragus
Mouth
11
Inter tragic notch
Endocrine glands
12
Cimba concha
Lower part of Abdomen
13
Kewam concha
Chest
14
Anti Helix toward Concha
Spine
15
Helix
Liver
16
Back of ear
Backside of body
    
           हालांकि उपर्युक्त तालिका में निर्दिष्ट प्रतिबिम्ब केन्द्र व्यावहारिक रुप से सक्रिय अवयव हैं, किन्तु विभाजन और विनिश्चय की प्रक्रिया अपूर्ण सी है। फिर भी व्यवहार-योग्य है। उक्त तालिका के क्रमांकों को चित्रांक 27 ग के क्रमांकों द्वारा स्पष्ट किया गया है। कान से सम्बन्धित पूर्व तालिका (चित्रांक 27 क) के साथ इसका भी समन्वय कर देने से कर्ण एक्यूप्रेशर की पर्याप्त जानकारी हो जाती है।
            उक्त क्रम से कान के प्रतिबिम्ब केन्द्रों में यथासम्भव मुख्य-मुख्य केन्द्रों का अलग-अलग दो तालिका में वर्णन किया गया। व्यवहार काल में विशेज्ञ रुप से इन सभी पर सावधानी वरतनी चाहिए,क्यों कि लगभग सभी केन्द्र काफी संवेदनशील हैं। विशेषकर अति भाउक और संवेदनशील व्यक्तियों के उपचार काल में अधिक सावधान रहने की जरुरत है। हालांकि पहले भी कहा जा चुका है कि एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का कोई विशेष प्रतिप्रभाव (side effect)नहीं है,फिर भी एहतियात के तौर पर ध्यान रखा जाना चाहिए।

क्रमश....