Sunday, 27 May 2018

लोकतन्त्र का ECG रिपोर्ट


लोकतन्त्र का ECG रिपोर्ट

         काफ़ी मश़क्कत के बाद किसी तरह हाथ लगा । दरअसल कोई देने को राज़ी ही नहीं हो रहा था । कहता था कि ये आम आदमी के लिए नहीं है । गोपनीय शाखा के भी खासमखास वाले फाइल में छिपा कर रखा गया है इसे ।
  
       किसी सच को उगलवाने के लिए बहुत बार झूठ का सहारा लेना पड़ता है । हमारे यहां खाकी और काली वर्दी वाले इस कला में खास माहिर हैं । हालाकि साक्षरता अभियान के परिणाम स्वरुप आजकल ज्यादातर लोग इस कला में निपुण हो गये हैं । यही कारण है कि झूठ बोलने वालों को भी विशेष सावधान रहना पड़ रहा है आजकल ।

         मैंने भी एक झूठ का सहारा लिया । कहना पड़ा कि वो जो इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ है न, उसके असली वाले रिपोर्ट का बिलकुल असली वाला फोटोकॉपी कहीं से जुगाड़ हो गया है । वस ज़रुरत है जरा मिलान कर लेने की, कि कॉपी ऑरीजिनल वाले का ही है या कहीं इसमें भी घपला हुआ है, जैसा कि हमारे यहां में आये दिन हर जगह होते रहता है । वो वालू में सिमेन्ट वाला घपला हो कि कंक्रीट में कोलतार वाला, वो वोफोर्स वाला मामला हो कि टूजी वाला, चारा वाला मामला हो कि कोयला वाला, सब के सब व्यापमं की तरह व्याप्त हैं हमारे नायाब लोकतन्त्र में ।

 फोटोकॉपी वाली बात कहते ही वो चट राज़ी हो गया और बिलकुल ऑरीजिनल वाला रिपोर्ट कार्ड दिखला दिया । एक बोगदा की शर्त पर असालतन रुप से फाइल सुपुर्द करते हुए , ये चेतावनी भी दिया कि इसे डिसक्लोज़ मत करना, क्योंकि ध्यान रहे- 2019 अब ज्यादा दूर नहीं है । ये असली हालात का पता चल जाये जनता को यदि तो बड़ी फज़िहत होगी ।

        फिर धीरे से मेरे कान में मुंह सटा कर बोला उस भले मानस ने कि पूरी उम्मीद है कि बहुत जल्दी ही  एकदम खतरनाक वाला हार्डअटैक आ सकता है ।

         मैं उस बेवकूफ़ कर्मचारी के होशियार सी लगने वाली चेतावनी को अनसुना करते हुए, चट अपना काम किया और फट वहां से दफा हो गया ।

         रिपोर्ट फाइल काफी मोटी थी । देश ही नहीं परदेश के भी विशेषज्ञों की राय और टिप्पणी टैग थी उस ECG के साथ । सबने लगभग एक सी राय ज़ाहिर की थी— हृदय के चारो वाल्व लगभग नाकामयाब हो गए हैं । एक खास टिप्पणी और लगी हुयी थी – एक वाल्ब तो वाईवर्थ ही डैमेज़ था । और उसी का नतीजा है कि धीरे-धीरे बाकी के भी तीन खराब होते चले गए । पहले ने दूसरे पर अटैक किया जिसका ख़ामियाज़ा तीसरे को भुगतना पड़ा और फिर चौथा भी सरेन्डर कर दिया आहिस्ते-आहिस्ते । तीसरे की हालत तो ऐसी है कि टॉयलेट-वाथरुम जैसा हो गया है । हर समय दरवाजा खुला रखना पड़ता है । न जाने कब किसको शू-शू की तलब हो जाये या कि वोमिट वरदास्त न हो रहा हो । ऐसे में देर-सबेर दरवाजा खटखटाने से बेहतर है कि विदाउट नोकिंट ऐंट्री मिल जाये । एक्सट्रा प्रेशर भी जरुरी नहीं ।

  जैसा कि अभी हाल में भी सबने देखा-सुना-जाना कि रात डेढ़ बजे से भोर के पौने चार बजे तक वासरुम के सभी सफाई कर्मचारी व्यस्त रहे । दरअसल एक दक्षिण भारतीय ज्योतिषी ने ऐलान कर दिया था कि अगले पन्द्रह दिनों तक हो सकता है कि सूर्योदय हो ही नहीं । हालाकि बहुत पहले किसी और युग में भी एक बार ऐसा हो चुका है - एक सती ने सूर्य को ही चाइलेंज कर दिया था । सतियाँ तो प्रायः कुछ अनहोनी ही करती रही हैं पहले भी और अब भी । शुद्ध गृहस्थी वालियों में भले ही वो ताकत आज न हो, किन्तु किसी   बार से ट्रन्च होकर आयी तथाकथिक साध्वी की ताकत का अन्दाज़ा भला मेरे जैसा अदना आदमी क्या लगा पायेगा ! वैसे भी भारतीयों का भोलापन , सीधापन, निरालापन या कि मूर्खपना जग ज़ाहिर है । 

       रिपोर्ट फाइल में एक न्यूट्रिशियन का भी रिपोर्ट अटैच था, जिसमें लिखा हुआ था कि लोकतन्त्र के सेहत के लिए शुरु से ही कुछ खास नियम-संयम का ध्यान रखा गया है, बिलकुल स्वास्थ्य रक्षक भिषकाचार्य बाग्भट्ट के अन्दाज़ में, भले की काम किया गया हो सुश्रुत वाला । शरीर का आकार बेहिसाब बड़ा है, इसलिए वजन हल्का करने के ख्याल से दोनों हाथों को विना ना-नुकुर अलग कर देना जरुरी है । सुरक्षित भविष्य के ख्याल से इसे तत्काल निपटा भी डाला गया ।

 पथ्य-परहेज के तौर पर कुछ और भी नियम-निर्देश मिले उस फाइल में –  आजीवन दो-चार तरह के लाइफ सेविंग ड्रग्स का इस्तेमाल भी बिलकुल जरुरी कहा गया है ।  धर्मनिरपेक्षता की कभी न समझ आने वाली परिभाषा को बार-बार नये-नये तरीके से समझाते रहने की कोशिश करनी है । क्यों कि यही वो असली वाला फार्मूला है जिसे पुराने आका जाते-जाते चेताते गए हैं ।  धर्म रहे न रहे, धार्मिकता रहनी चाहिए, तभी तो धार्मिक उन्माद बना रह सकेगा । उन्माद फीका पड़ता हो यदि तो बीच-बीच में कुछ न कुछ प्रबन्ध करते रहना चाहिए । और इसके लिए  चौथा वाल्व अकेले ही बिलकुल सक्षम है । उसकी कर्तव्यनिष्ठा पर जरा भी सन्देह करना गुनाह जैसा है ।

ऐसी कुछ और बातें अगले अनुच्छेद में भी लिखी गयी थी—
भोजन,वस्त्र,आवास,शिक्षा-अशिक्षा,स्वास्थ-अस्वास्थ से लेकर डिग्री और नौकरी भी बे-दाम मुहैया कराते रहना बहुत जरुरी है । किसी छोटी-बड़ी दुर्घटना के बाद तत्काल खेद व्यक्त करने में जरा भी देर नहीं होनी चाहिए । आँखों का पानी तो पहले ही सूख-मर गया है, अतः इसके लिए लिक्विड अमृतधारा का प्रयोग करते रहना चाहिए ।

मुआवज़ा भी जरुर घोषित कर देना चाहिए । क्यों कि मरने के बाद के भी बहुत तरह के खर्चे होते हैं । और आजीवन जब मुफ्तखोरी में गुजरा है, फिर मरणोत्तर जीवन में घर का आटा क्यों गीला किया जाये ।


और सबसे अन्त में बिलकुल बोल्ड फॉन्ट में लिखा हुआ था— ये ऑल टाइम-एनी टाइम वारन्टी वाला लोकतन्त्र दिया है हमने । जब भी नापसन्द हो, न्यू वर्जन ऑटोअपडेट एवेलेबल है । वस क्लिक करने भर की बात है ।
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Saturday, 26 May 2018

असत्य का वैध व्यापार


असत्य का वैध व्यापार

            सच का व्यापार तो होता ही नहीं है , हां, सच्चाई से व्यापार भले किया जा सकता है, जिसके लिए हमारे यहां जरुरत के मुताबिक कई तरह की विभागीय खानापुरी करनी होती है ।

किन्तु झूठ का व्यापार करना हो और वो भी निहायत वैध रुप से , तो इसके लिए सबसे पहले जरुरी होता है किसी विधि महाविद्यालय की डिग्री । और फिर असत्यव्यापारसंघ की सदस्यता । और इसके साथ ही राहु-केतु-शनि को प्रिय लगने वाला वस्त्रावरण । तथा नामी-गिरामी बनने के लिए दो-चार आलमीरे में भर कर रखी गयी कुछ मोटी-मोटी फालतू की किताबें, जिनका सच्चे मानव मूल्यों से कोई वास्ता नहीं । जिनका पढ़ना उतना जरुरी नहीं है, जितना जरुरी है समय-समय पर उनका प्रदर्शन । और जहां तक समझने की बात है, तो वो तो लिखने वालों को ही सही ढंग से समझ नहीं आया था कभी, फिर पढ़ने वालों को कहां से समझ आयेगा । दरअसल वो लिखा ही इसी हिसाब से गया है कि अर्थ-अनर्थ जो मन हो सो निकाल लो इसमें से । या फिर जूझसे रहो ।

        जैसा कि मैंने सुना है— एक बार एक सिरफिरे डाटा-कलेक्टर को झूठ-फरेब का डाटा जुटाने का धुन सवार हुआ । काफ़ी मशक्कत के बाद जो चार्ट बन कर तैयार हुआ उसमें व्यापार मन्डियों का स्थान तीसरा-चौथा था । सबसे अन्तिम नम्बर पर था शराबखाना और वेश्यालय । जब कि न्यायालय और धर्मालय का स्थान सबसे ऊपर दीख रहा था- बिलकुल शानदार मुकुट की तरह । और इन दोनों में एकदम संघर्षपूर्ण टक्कर की स्थिति थी—दोनों अब्बल दर्ज़े पर जाने को उतावले दीख रहे थे । प्रथम श्रेणी में रखे जाने के लिए दोनों के पास एक तरह के तर्क थे – दोनों का सम्बन्ध सत्य, धर्म और न्याय से है । किन्तु ये हम सभी जानते हैं कि जितना झूठ-फरेब न्यायालय और धर्मालय में है उसका शतांश भी अन्यत्र नहीं है ।
            बात कुछ चौंकाने जैसी लग सकती है, किन्तु चौंकना नहीं चाहिए । चौंकना तो तब चाहिए जब आये दिन अखबारों में ख़बरे पढ़ने को मिलती हैं या टीवी पर समाचार आते हैं ।

            आज भी कुछ वैसा ही हुआ, जो मुझे चौंका गया । ख़बर है कि वौद्ध मन्दिर परिसर में कुछ साल पहले हुए  वम विस्फोट में पांच जनों को दोषी करार दिया गया है । नब्बे से अधिक गवाहियाँ हुयी और अपराध के भरपूर प्रमाणित साक्ष्य उपस्थित किये गये, फिर भी सफाई पक्ष के अधिवक्ता महोदय अपना दलील रखने से बाज नहीं आये—केवल परिस्थिति जन्य साक्ष्य के आधार पर दोषी करार दिया गया है, जबकि चश्मदीद गवाह कोई नहीं है ।

दरअसल अंधा अधिक महत्त्व देता है आँखों को ।

            आये दिन इस तरह की घटनायें देखने-सुनने के हम आदी हो चले हैं । जिस कानून की डोर से अभियोग पक्ष आरोप लगाकर बांधता है, उसी कानून की कैंची से जाल काट कर वचाव पक्ष साफ बचा ले जाता है । बांधने वाले को बहुत मश़क्कत करनी पड़ती है, जबकि कैंची किसी खास रेशे पर चलाने भर से काम निकल जाता है ।

 हमलावर हों या आतंकवादी, या कि बलात्कारी  सबको अपने वचाव में वकील रखने की व्यवस्था है । और मज़े की बात ये है कि बड़े से बड़े वकील मिल भी जाते हैं, जो तरह-तरह की दलीलें पेश करके मानवता के शत्रुओं को बड़े साफगोई से सम्भाल ले जाते हैं ।

            मुझे समझ नहीं आता कि विशुद्ध न्याय के नाम पर अन्याय का ये नाटक चन्द पैसों के लिए क्यों खेला जाता है, जहां सत्य बारबार लज्जित-पराजित होते रहता है और झूठ-अत्याचार सीना ताने अट्टहास करता नज़र आता है ।

            अपने पर लगाये गए आरोप की सफाई में कुछ कहने का हमारा अधिकार जो है, उसे मात्र वकालतनामा पर दस्तख़त करके बड़ी आसानी से हम खरीद लेते हैं । फिर मुझे कुछ कहना नहीं पड़ता, मोटी सी फीस लेकर सफेद चमचमाता हुआ झूठ बोलने वाले वक्ता नहीं अधिवक्ता हमें मिल जाते हैं - ये है हमारी कानूनी व्यवस्था ।

        अपराध को छिपाना, अपराधी का साथ देना, अपराधी को शरण देना, साक्ष्य मिटाना इत्यादि -  हमारे यहां अपराध के दायरे में ही आते हैं, किन्तु अपराधी को सरेआम सफा बचा लेना अपराध के दायरे से बिलकुल बाहर है । अपने वाक् चातुर्य से न्यायाधीश की बोलती बन्द कर दे, वही असली अधिवक्ता है—वाक्येन कीलति - वकील शब्द शायद इसी तरह बना है । अद्भुत है हमारी व्यवस्था - दस्ताना पहन कर मर्डर करने जैसी । तभी को काला चोंगा लपेट कर सफेद-सफेद झूठ बोलने का परमीशन मिल जाता है ।

             
      क्या इस गम्भीर विषय पर हम कभी विचार करने को राज़ी होंगे ? या कि दुष्टनीति को ही चाणक्यनीति और फिरंगियों के पोथड़े को ही सम्माननीय कानून मानने को विवश ही रहेंगे ? कब खुलेंगी हमारी आँखें...कब लिखेंगे हम हमारा संविधान...कब मिलेगी हमें असली वाली आजादी ? कब बन्द होगा असत्य का ये वैध व्यापार ?

            समय हो तो जरा इस पर विचार करें ।

Monday, 21 May 2018

जाम से क्या काम

जाम से क्या काम

जाम से क्या काम ! काम तो ज़ाम से है ।
अब कहीं आप मुझ पर ही ये इलज़ाम न लगा दें । ये मैं नहीं कह रहा हूँ । कहने वाले कोई और हैं । कौन हैं - अब ये भी हमसे मत पूछिये ।

शहर में रहते हैं, आँख-कान है, तो मुझे विश्वास है कि विधाता ने दिमाग भी जरुर दिया होगा । वैसे गया शहर के लिए पुरानी लोकोक्ति तो आपको पता होना ही चाहिए । यहां के पहाड़ बिना पेड़ वाले हैं, नदी बिना पानी वाली और लोग बिना दिमाग वाले ...। बाईचान्स, यदि उन्हीं में से आप भी हों तो मुझसे मांगने की तकलीफ भी मत कीजियेगा । वैसे भी अब बहुत थोड़ा ही बचा है मेरे पास । पहले मेरे पास भी बहुत था, पर अब नाम मात्र का ही रह गया है ।  जो भी था सब खप गया के.पी.रोड के जाम में । मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि शहर वासियों की भी इस दुर्दशा का मुख्य कारण रोड जाम की समस्या ही रही होगी ।  

हालाकि जाम सिर्फ के.पी.रोड में ही नहीं होता । ये तो हर सड़क की समस्या है । हर शहर की समस्या है । नगर और महानगर की समस्या है । यहां तक कि पर्यवेक्षकों ने अब जाम के आधार पर ही शहर की गति-प्रगति का आंकड़ा जुटाना शुरु कर दिया है । जितना अधिक जाम उतना बड़ा शहर । वोट के चक्कर में नेताओं ने जैसे पहले दलित शब्द पैदा किया, फिर उसके आगे महा शब्द की उपाधि लगायी, उसी तरह से नगर, महानगर, महामहानगर आदि अनेक उपाधियां हो सकती हैं, भले वो मूल के आगे लगे या कि पीछे । वृत्त पर आगे पीछे का कोई महत्व थोड़े जो होता है । ये दुनिया गोल है, ऊपर से खोल है, भीतर से देखो प्यारे बिलकुल पोलमपोल है... कुछ ऐसे ही बोल थे न गीत के । एक समय में ये गीत मुझे पूरा का पूरा याद था, पर वो भी भूल गया के.पी.रोड के जाम में ।  

अब तो बाहर निकलने में भी डर लगता है । पता नहीं कहां कब किस तरह के जाम में फंस जाना पड़े । पांच मिनट का भी काम हो तो दो-तीन घंटे फालतू समय लेकर निकलना पड़ता है । और इतना ही नहीं कुछ नये-नये अन्दाज वाले बहाने भी इज़ाद करने पड़ते हैं ।

आप जानते ही हैं कि आजकल की बीबियां पहले वाली पत्नियां तो रह नहीं गयी हैं । ये टीवी सीरियलों ने उन्हें बहुत होशियार बना दिया है । किसी तरह जाम से निपट कर हांफते-कांपते घर पहुँचने पर वो शरबत-पानी पूछने से पहले ये पूछेंगी कि आपका मोबाइल स्विचऑफ या नॉट रीचेबल क्यों बता रहा था ? कहां लगा दिये इतनी देर ? कहीं पुरानी वाली पड़ोसन तो नहीं मिल गयी मार्केट में...?

  और बी.बी.सी. के पत्रकार की तरह वो सब कुछ दूध का दूध और पानी का पानी करा लेना चाहती है पल भर में ही । उन्हें क्या पता कि शहर का सुहाग लुटा जा रहा है और आगे भी यही दशा रही तो बहुत जल्दी ही उनका भी सुहाग लुट जायेगा ।

  मुझे तो लगता है कि सड़क पर निकलना हो तो एक-आध करोड़ का जीवन बीमा जरुर करा लेना चाहिए । इसके कई वजह हैं । पहली वजह है कि सड़क यात्री को सबसे ज्यादा खतरा है लहरियाकट वाइकरों से । या तो उनके कानों में किसी हाईफाई ब्रांड का ढक्कन लगा होगा या गर्दन टेढ़ी होती है कुछ इमरजेन्सी वार्तालाप में । वैसे उनके लिए हर कॉल इमरजेन्सी ही हुआ करता है । ऐसे में चक्का सड़क के वजाय आपकी टांग पर चढ़ जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या ! वर्तमान चलन के अनुसार पैदल चलने वाले को अधिक सतर्क रहने की जरुरत है, क्यों कि वाहन चालकों को इस जिम्मेवारी से बिलकुल मुक्त कर दिया गया है लोकतन्त्र में । ऐसे में दुर्घटना स्वाभाविक है । अतः वीमा जरुर कराइयें । आखिर बेरोजगारी बहुल देश में इतने वीमा एजेन्ट जो काम कर रहे हैं, उन पर भी तो कुछ रहम कीजिये ।  दूसरी वजह ये है कि दो-चार लाख से तो कुछ होता-जाता नहीं । अब भला दो पैसे में मिलने वाली काजल की डिबिया की कीमत 180 रुपये हो सकती है और उसे खरीदने वालियों की तादात भी कम नहीं है, तो फिर हाथ-पैर टूटने-फूटने पर इलाज़ के लिए डॉक्टर बेचारा दस-बीस लाख मांगता ही है तो क्या बुराई है ! ये भी सोचना होगा कि सबने रिजर्वकोटा से ही एडमीशन नहीं पाया है और न व्यापम से ही । वैसी स्थिति में एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिये कितने खर्च आते हैं आप समझते ही होंगे और नहीं पता हो तो किसी मध्मवर्गीय बाप से पूछ लें । क्यों कि सामान्य कोटे तो भर जाते हैं नेताओं के ईर्दगिर्द रहने वाले से हीं, जब कि नेताजी के अपने बेटे भला देशी महाविद्यालयों में क्यों कर नामांकन लेंगे ।  

  खैर, मैं जरा विषयान्तर हो गया था । पत्रकारों की मानें तो पारा 44-48 चढ़ा हुआ है । हालाकि ये थर्मामीटर वाला पारा भी आजकल कुछ ज्यादा ही चढ़ता है और जाड़े में उतरेगा भी उतनी ही तेजी से । खास कर खबरिया रेकॉर्ड में, क्यों कि उन्हें तो गिनीज़बुक में जल्दी से नाम दर्ज़ कराना होता है न । और इन खबरों को पढ़ कर ए.सी. में बैठे लोगों का पारा चढ़ना तो लाज़िमी है ही ।

  ऐसे चढ़े हुए पारे के मौसम में के.पी.रोड या कि किसी और ही सड़क से आपका वास्ता पड़ गया यदि, तो फिर मरी हुयी नानी भी याद आ जायेगी । और आप भी अल्लाह़ से दुआ करने लगेंगे कि जल्दी ही हमें भी बुला ले अपनी पनाह़ में । भले ही ज़हन्नुम भेज देना, क्यों कि वहां के.पी.रोड जैसा कोई रास्ता तो नहीं होगा न । तुम्हारी यहां वाली ज़न्नत से तो जहन्नुम भला ।

   ये ज़न्नत-ज़हन्नुम वाली बात याद आकर कोई आठ-दस साल पुरानी वाली बात याद आ गयी । शहर में एक नये-नये बड़े साहब आये हुए थे । एकदम ईमानदारी के असली वाले सांचे में ढले हुए । आते ही शहर की दुर्दशा देख उन्हें रोना आ गया । आनन-फ़ानन में पूरे महकमें को बुला लिया । एक सीटीराइड वस की व्यवस्था हुयी । खुद भी सवार हुये, साथ ही मजिस्ट्रेट, वकील, मुन्शी-मोख़तार, यहां तक कि कैमरा-मैन और पत्रकार भी । पीछे से जेसीबी और खाली ट्रैक्टर पर कुछ मजदूर भी । वस दौड़ने लगी - समय-असमय शहर की सड़कों पर ।

  ऐसे में आमलोग तो ज्यादातर दर्शक-दीर्घा में ही रहना पसन्द करते हैं , परन्तु दुकानदारों में हड़कंप मंच गया । क्यों कि व्यापारे वसति लक्ष्मी वाले सिद्धान्त का पालन करते हुए, कोई न कोई व्यापार लेकर सड़क पर बैठ जाना बिलकुल आम बात है । कुछ न मिले तो एक तोता और कुछ लिफाफे लेकर ही बैठ जाइये, वोरा विछाकर । भाग्य बंचवाने के लिए कुछ लोग चले ही आयेंगे । क्यों कि अकर्मण्य लोगों को भाग्य की ज्यादा चिन्ता होती है और संयोग से हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है ।

  नये साहब की नयी करतूत से त्राहि-त्राहि मच गया , खासकर फुटपाथी व्यवसायियों में ।  पता नहीं कब किसके नाम कौन सा परवान चढ़ जाये । सामान्य फाइन तो फटाफट लगने लगा । इतना ही नहीं एफ.आई.आर.से लेकर चार्जशीट तक, यहां तक कि ऑर्डरशीट भी हाथों-हाथ मिलने लगा - बिलकुल नायक फिल्म के अनिल कपूर वाले अन्दाज़ में ।

  ये सब हालात देख कर लगा कि अब असली वाला रामराज आने ही वाला है, इतने दिनों से तो रावण या कि महिषासुर ही शासन कर रहा था । अतिक्रमण की संक्रामक बीमारी जो लम्बे समय से शहर को लीले जा रही थी प्लेग की तरह, वो अचानक गायब होने लगी मानों किसी                   ब्रॉडएस्पेक्ट्रम एन्टीबायोटिक का इज़ाद हो गया हो । रामराज की कल्पना से ही रोमांच होने लगा था । चोर-उच्चकों, जेबकतरों, जूआबाजों और रोमियों का क्या कहना, सब के सब सफेद पायजामा और लम्बावाला कुर्ता पहन कर घूमने लगे थे जुल्फ़ी झाड़कर । किन्तु तोंद वाले सफेशपोशों का ब्लडप्रेशर काफी बढ़ गया था । इधर खाकी वाले अलग परेशान हो रहे थे नये सिरफिरे साहब से ।

  बेचारा नगरनिगम, जैसा कि आप जानते ही हैं, उसकी भला क्या भूमिका हो सकती है इसमें ! वैसे भी उसके अधीनस्थों को तो कम पड़ जाते हैं साल के तीन सौ पैंसठ दिन । विधाता ने कुछ और दिन दिये होते पूरे साल को, तो ये बेचारे अपनी मांगें लेकर सड़कों पर और अधिक समय दे पाते ।
  और जब नगरनिगम ही उदासीनता ब्रांड कफ़न ओढ़े हुए हो, फिर अन्य प्रशासन को क्या पड़ी है ! खैनी, वीड़ी, सिगरेट से लेकर बाकी के जेब खर्चे भी तो इसी से चलाने होते हैं । मैडमों के प्यूटीपार्लर का भारी खर्चा अलग से । मंहगाई तो कमर तोड़े हुए है । अब भला उपरी आमदनी न हो कुछ तो आंखिर सरकारी महकमें में आने से फ़ायदा ही क्या हुआ ? कभी कभार मीडिया वालों को भी चाय-वाय पिलाना ही पड़ जाता है, नहीं तो वो अष्टम स्वर आलापने लगेंगे ।

   आप जानते ही हैं कि बेरोजगारी शैतान की आँत की तरह दिन-दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है । याद आती है वो भले-चंगे जमाने की बात जब बिना टिकट सफ़र करते पकड़े जाने की सजा होती थी नशबन्दी । ड्यूटी से गैरहाज़िर रहने की सजा होती थी नशबन्दी...यानी हर मर्ज़ की एक दवा । किन्तु पुरानी वाली मैडम के लाख तिगड़म के बावजूद जनसंख्या वृद्धि के रफ्तार में कोई खास कमी थोड़े जो आयी है । और ये तो बिलकुल तय बात है कि जो बच्चे आज पैदा हुए हैं, आने वाले समय में बड़े होकर रोजगार खोजने निकलेंगे ही । विकास का जितना शोर है, उसका चौथाई भी हो जाता तो कल्याण होता । ऐसी स्थिति में बेकारी के मारे, पढ़े-बेपढ़े कुछ तो झुरमुटों में या नदी किनारे बावन पत्ते खेलने में लग जायेंगे और कुछ पहाड़ों-जंगलों की ओर रुख करेंगे - पाटी-साटी ज्वायन करके । और उन्हीं में से कुछ थोड़े लोग सड़क किनारे छकड़ा लगायेंगे । लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शासन-प्रशासन की मदद मिल ही जानी है । ऐसे में किसी सड़क पर दुकानों के आगे दोनों ओर से दो-चार-छः लेयर तम्बु या कि छकड़े लग ही जाते हैं तो आश्चर्य क्या ! इतना तो तय है कि फुटपाथी दुकानदार संघ की सदस्यता ले लेने पर किसकी श़ामत आयी है जो हटा दे सड़क से ! वैसे भी लोकतन्त्र में चौक, चौराहा, सड़क आदि सार्वजनिक सम्पत्ति के दायरे में आते हैं और इस पर उसका ही अधिकार होता है जिसके वो सामने पड़ता है । वो उसे घर-आंगन की तरह इस्तेमाल करे या कि गिल्ली-डंडा खेलने के लिए या कि छकड़ा लगाने में - प्रशासन कौन होता है टांग अड़ाने वाला ? अब भला बच्चे पैदा हुए हैं तो खेलने-खाने कहां जायेंगे ? बेचारे इन बेरोजगारों पर कुछ तो रहम करना ही होगा न ।

   खैर, कुल मिलाकर परिणाम ये हुआ कि मेरी कल्पना वाला रामराज उसी तरह आज तक नहीं आ पाया जैसे कि रामभक्तों की कल्पना वाला राममन्दिर । सोचने वाली बात है कि राममन्दिर यदि बन ही जायेगा तो फिर अगली चुनाव में कोई नया मुद्दा ढूढ़ना पड़ जायेगा न । इसी तरह शहर की सड़कों पर रामराज उतर जायेगा- ये सारी सड़कें अतिक्रमण-मुक्त हो जायेंगी, तो फिर नगरनिगम के साथ-साथ खाकी और खादी वालों का ज़ाम का खर्चा कहां से आयेगा ! अब भला अपने वेतन के पैसे से कोई ज़ाम ढ़ालता है ! केवल वेतन के पैसे पर निर्भर रहने वाले की जिन्दगी तो रोटी-सब्जी या कि दाल-चावल की जोड़ी सम्भालने में ही चुक जाती है । उसे भला ज़ाम से क्या काम ! ज़ाम से काम हुआ करता है बड़े लोगों का । और बड़ा बना जाता है इधर-उधर हाथ-पांव मार कर, मुंह-गाल बजाकर , न कि पसीना बहाकर । और ये बात यदि अभी तक नहीं समझे, तो अब कब समझेंगे ? सठियाने वाली उमर भी साठ ही साल कहा गया है । अब तो बहुत आगे निकल गए ।
   खैर, चिन्ता न करें । जाम जारी रहे । काम जारी रहे । ज़ाम भी जारी रहे ।
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Saturday, 19 May 2018

लोकतन्त्र के डगमग पाये

लोकतन्त्र के डगमग पाये

         ये बताने की जरुरत नहीं है कि लोकतन्त्र नामधारी जीव / अजीव चौपाया है ।        विधाता(इसे बनाने वाले) ने तो इसका सृजन किया था- दस लक्षणों वाले धर्म के स्वरुप वृषभ के अनुरुप ही, किन्तु थोड़े ही दिनों में खूंखार भैंसा मार्का जीव बनकर रह गया ये ।    

    पुरानी पीढ़ी तो जानती-मानती थी इन बातों को, किन्तु नयी पीढ़ी जो देखने-जानने, पढ़ने-गुनने में उतना विश्वास नहीं रखती, जितना बिन समझे-बूझे,आलोचना (शिकायत के अर्थ में) करने में विश्वास रखती है ।

    ये मैं बिलकुल दावे के साथ इसलिए कह सकता हूँ, क्यों कि यदि किसी ने मनोयोग पूर्वक मनु का वो संविधान पढ़ा-समझा होता, तो आज उनकी मनुस्मृति की ये दुर्गति न होती । उस अद्भुत समाजशास्त्र की इस कदर धज्जियां न उड़ायी जाती ।

        चौपाये वृषभ रुपी धर्म या कहें धर्म रुपी वृषभ में मनुस्मृतिकार ने ये दस लक्षण (गुण) कहे हैं । यथा—  धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ मनुस्मृति ६।९२ ॥ ( धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध) । उक्त दस शब्दों की विस्तृत व्याख्या हो सकती है,जोकि यहां मेरा उद्देश्य  नहीं है । अतः मूल विषय पर आते हैं ।

          इन बातों और गुणों का ध्यान रखते हुए ही लोकतन्त्र के सम्यक् संचालन के नियम बनाये गए थे,किन्तु कुछ त्रुटियां रह गयी थी,जिसका नतीजा हुआ कि चन्द दिनों में ही इस व्यवस्था की ऐसी दुर्गति हो गयी ।

          मैं ये कहने की धृष्टता या कि उदण्डता नहीं कर सकता कि बनाने बालों ने गलती की थी । बनाने वालों में कई अतिप्रबुद्ध विचारक भी थे- इसमें कोई दो राय नहीं । बनाया तो खूब सोच-विचार कर, किन्तु बनाते समय की कुछ विवशता ऐसी थी, जिसका दुष्परिणाम शनैः-शनैः सामने आने लगा । और बहुत जल्द ही हमारा पावन लोकतन्त्र एक सुव्यवस्थित तन्त्र न रह कर, महज़ तमाशा बन कर रह गया—मूर्खतन्त्र,अराजकतन्त्र,भीड़तन्त्र...। मज़बूरियों के बीच बनाया गया नियम, तात्कालिक परिस्थिति को मद्देनज़र रखते हुए लिए गए निर्णय – ऐसा नहीं कह सकते कि सब गलत ही थे, किन्तु चन्द लोगों के निजी स्वार्थ के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुयी ।

          मैं ये नहीं कहता कि बाप बहुत योग्य था,बिलकुल दूध का धोया हुआ,किन्तु दो अति महत्त्वाकांक्षी वेटे जब आपस में जूझने लगें - एक माँ को लेकर,तो क्या बुढ़ापे में बाप दूसरी शादी रचाये? और यदि शादी रचा भी ले तो क्या सही में वो नयी वाली उन दोनों की सगी माँ कही जा सकेगी ?

    नहीं न । ऐसी विकट परिस्थिति में बाप ने निर्णय लिया,भले ही वो बिलकुल बेवकूफी वाला निर्णय था- माँ को ही काटने-बांटने वाला निर्णय । ऐसी ही कुछ विषम परिस्थिति महात्मा भीष्म के सामने भी आयी थी । अनिर्णय की विवशता में ही निर्णय लिया था उन्होंने - हस्तिनापुर के विभाजन का । किन्तु परिणाम क्या हुआ - दुनिया जानती है ।

  फिरंगियों की कुटिल चाल को या तो बूढ़े वाप ने सच में नहीं भांपा या फिर दो जवान जुझारु वेटों की भोंड़ी महत्त्वाकांक्षा ने उसे मज़बूर कर दिया । सत्य-असत्य का इतिहास बहुत घालमेल वाला है । इतिहास वैसे भी बहुत प्रमाणिक नहीं हो सकता । वह अक्षरसः सत्य कदापि नहीं हो सकता । इतिहास तो इतिहास लिखने वाले की मानसिकता का शब्दचित्र मात्र हुआ करता है ।  अब ऐसा तो नहीं है कि कोई महर्षि व्यास - त्रिकालदर्शी व्यास, निष्पक्ष व्यास इतिहास लिखने बैठे हैं, जिसे हर हाल में मान ही लेना चाहिए ।
  खैर, ढुलमुल इतिहास से बाहर आकर वर्तमान के आइने में अपने लोकतन्त्र की छवि को निहारने का प्रयास करते हैं ; किन्तु हां,वर्तमान के अवलोकन की सुचारुता-सुस्पष्टता के लिए बीच-बीच में भूत का झलक भी लेते जाना होगा, तभी ठीक से कुछ समझा जा सकेगा ।

  संसार के कई प्रमुख नियमों और संविधानों के मनन-चिन्तन,अनुशीलन करने के पश्चात् अपना नया संविधान बनाया गया था । अब कोई आलोचक इसे विविध संविधानों की कतरन वाला गेंदड़ा कह दे तो बात अलग है । वैसे भी गेंदड़ा को गुलदस्ता तो कहा नहीं जा सकता । 
 एक खाश़ियत है हमारे लोकतन्त्र की - इसमें कहने-बोलने, चीखने-चिल्लाने, उत्पात मचाने, यहां तक कि गाली देने तक की पूरी स्वतन्त्रता है न ! समय-समय पर गाली देते रहो, और ये भी कहते रहो कि हमें बोलने की आजादी नहीं मिल रही है... लोकतन्त्र का हनन हो रहा है...मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है...।

  आप जानते ही हैं कि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता—इन चार सृदृढ़ स्तम्भों के सहारे हमारा लोकतन्त्र खड़ा है । मेज के इन चार पायों को यदि डायगोनल रखें तो कहना उचित होगा कि धरातल के ईशान कोण पर न्यायपालिका और नैर्ऋत्यकोण पर पत्रकारिता है, तथा अग्निकोण पर विधायिका और वायुकोण पर कार्यपालिका का स्थान है ।

    इन्हीं बातों को अब जरा दूसरे ढंग से स्पष्ट करते हैं । हमारा भारतीय वास्तुशास्त्र कहता है कि ईशानकोण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण,मर्यादित और पवित्र होना चाहिए ,क्यों कि वास्तुपुरुष का ये शीर्ष भाग है । इससे ठीक तिरछे यानी नैर्ऋत्य कोण को सबसे सुदृढ़ (मजबूत) होना चाहिए , क्यों वो पृथ्वीतत्त्व है और उसमें बाकी के सभी तत्त्व समाहित से  हैं । वह मालिक नहीं है । हुकूमत करना उसका काम नहीं है,परन्तु सब पर उसकी पैनी नज़र होनी चाहिए । अपने मूल कर्तव्य के साथ अन्य सबके क्रिया-कलापों का मूल्यांकन करते रहना चाहिए । अब दूसरी ओर देखें,जहां अग्निकोण है । इसे बिलकुल जागृत,यानी चैतन्य होना चाहिए , क्यों कि शरीर में अग्नि यानी ऊर्जा का प्रधान स्रोत ही सुदृढ़ नहीं रहेगा, तो शरीर मृत हो जायेगा । इस अग्नि को अपने कार्य में अनुकूलता मिले ताकि वो अपना कर्तव्य-निर्वहण सम्यक रुप से कर सके, इसके लिए वायुतत्त्व की चैतन्यता, जागरुकता, तत्परता अति आवश्यक है । क्यों कि ये यदि लुंजपुंज हो गया तो सब गड़बड़ हो जायेगा ।

    ये चारों स्तम्भ(पीलर)अपने-अपने स्थान पर समानधर्मी हैं,समानकर्मी भी, समान उत्तरदायी तो हैं ही । किसी एक पाये को कमजोर कर देंगे यदि तो मेज की सुदृढ़ता पर आँच आयेगी ही - इसमें कोई दो मत नहीं हो सकता । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि ये चारों अपने आप में स्वतन्त्र हैं (स्वच्छन्द नहीं),फिर भी एक दूसरे के परिपूरक भी हैं ।

    पिछले दिनों में हमारे पवित्र ईशान(न्यायपालिका)की मर्यादा भंग हुयी है । इसके लिए कुछ तो वह स्वयं भी जिम्मेवार है और काफी हद तक अग्नि (विधायिका) का योगदान भी रहा है । न्यायपालिका की स्वतन्त्रता पर हावी होने का हर सम्भव प्रयास विधायिका सदा करती रही है । क्यों कि उसे लगने लगा है कि वही सर्वश्रेष्ठ है । वही असली मालिक है लोकतन्त्र का । वह भूल गया है कि उसकी भूमिका एक सहयोगी अंग मात्र की है । वह शरीर नहीं है । विधायिका का ये भ्रामक अहंकार ही लोकतन्त्र के सर्वनाश का कारण बन रहा है ।

   इस अहंकार की उत्पत्ति का मूल कारण है अशिक्षा - अज्ञान । जरा खुल कर कहें तो कह सकते हैं कि अयोग्य व्यक्तियों का विधायिका में प्रवेश । विधायिका में प्रवेश के लिए किसी योग्यता प्रमाणपत्र की अनिवार्यता पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया, जब कि ये बहुत ही जरुरी था । सर्वाधिक अनिवार्य शर्त होना चाहिए था योग्यता ।  क्या तुक है कि नियम पालन करने वाले के लिए विशेष योग्यता अत्यावश्यक हैं और नियम बनाने वाले के लिए कुछ नहीं ! कितनी हास्यस्पद है ये बात ! कितनी विचारणीय है ये बात !

   किन्तु प्रारम्भ में इस बात (नियम) को बिलकुल नज़रअन्दाज किया गया । स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना और बात है,जब कि विधायिका चलाना बिलकुल और बात । ये ठीक है कि नियम-कानून बनाने के लिए अनुभवियों और विशेषज्ञों की पूरी टीम होती है, किन्तु उस योग्य टीम का हैंडलिंग तो अयोग्य के हाथ में होता है न ! बीमार घोड़े और अनएक्सपर्ट ड्राईवर से सुरक्षित यात्रा की आशा कैसे रखी जा सकती है ? वो कहीं भी दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है । औरों को भी क्षतिग्रस्त कर सकता है ।

    योग्यता के मामले में सिर्फ शैक्षणिक योग्यता की ही बात नहीं है, चारित्रिक योग्यता उससे भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है, जिसका कि हमारी विधायिका में निरन्तर अभाव होता जा रहा है । शैक्षणिक योग्यता को तो कार्यानुभव से क़ायल किया भी जा सकता है,परन्तु चारित्रिक योग्यता का तो कोई विकल्प हो ही नहीं सकता । वो तो बिलकुल निजी मामला है ।  शैक्षणिक योग्यता कभी भी हासिल की जा सकती है, किन्तु चारित्रिक योग्यता कहीं बाहर से आने वाली चीज नहीं है । इसे एडॉप्ट नहीं किया जा सकता और न हायर ही किया जा सकता है । परचेज का तो सवाल ही नहीं । 

   अशिक्षा और अज्ञानता से ही मूर्खता की उत्पत्ति होती है । मूर्खता जड़ता लाती है । जड़ता में उज्जड्डता पनपती है और सब मिलकर कारण बनता है सर्वनाश का । मूर्ख के सामने, ज़ाहिल के सामने नीति, धर्म, नियम, कानून का कुछ मायने नहीं रह जाता । मानवता भी तुरन्त दानवता में बदल जाती है । हुक़ूमत की ताकत हाथ आते ही निरंकुशता, स्वच्छन्दता सब हावी होने लगता है, क्यों कि ये सब अज्ञानता परिवार के ही सदस्य हैं । और कुल मिलाकर परिणाम ये होता है कि लोक या कि राष्ट्र गौण हो जाता है । मुख्य बन जाता है व्यक्तिगत स्वार्थ, व्यक्तिगत सुखोपभोग, व्यक्तिगत सुरक्षा । अहंकारी, मदकारी विधायिका विसार चुकी है कि वह लोकप्रतिनिधि बन कर प्रस्तुत हुआ है । लोकसेवा ही उसका एक और एक मात्र कर्तव्य है । यही उसका अथ और इति है ।  परन्तु विडम्बना ये है कि सेवक अपने को शासक समझ लिया है और लोक – जो असली मालिक है, हासिये पर चला गया है । नौकर के लिए सारी सुरक्षा व्यवस्था है, सारी सुखसुविधायें हैं और मालिक भूखे मरे,फटेहाल रहे,बीमार रहे,असुरक्षित रहे- इससे उसे कोई मतलब नहीं । चुंकि विधान बनाना उसके हाथ में है, इसलिए वे सारे विधान जो उसके अनुकूल हों,उसने बना रखे हैं । इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ तो तरह-तरह के हथकंठे भी अपना लिए हैं इसने । मालिक की कमजोरी को भुनाने की अच्छी कला सीख ली है नौकर ने । वो पुरानी कहानी पूरी तरह चरितार्थ होती है हमारे लोकतन्त्र पर,जो कि एक राजा ने एक बन्दर को नौकर रख छोड़ा था, जिसने राजा की नाक पर बैठी मक्खी को उड़ाने के उपक्रम में राजा की नाक ही काट डाली । राजा की नाक रहे या कटे, बन्दर को इससे क्या मतलब ? वह तो तथाकथित अपनी ड्यूटी कर रहा है ।

   अतः विधायिका के इस मूलभूत विकार को यथाशीघ्र दूर करना होगा । प्रवेश के अधिकार से पूर्व हमें सुनिश्चित करना होगा कि व्यक्ति विधायिका के योग्य है भी या नहीं । चारित्रिक रुप से पतित,कलंकित व्यक्ति को कदापि विधायिका का सदस्य नहीं बनने देना होगा । सीधी सी बात है ज्ञानी पत्थर भी मारेगा तो विचार पूर्वक और अज्ञानी फूल भी बरसायेगा तो मूर्खता पूर्वक ही ।  सत्ता का मद ज्ञानी को भी अविवेकी बना दे सकता है, फिर अज्ञानी के लिए क्या कहना ।

   विधायिका निर्मित विधान के अनुपालन का दायित्व है कार्यपालिका पर । योग्यता की बात यहां सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और सर्वसम्मत स्वीकृत भी है । शैक्षणिक योग्यता है भी यहीं घुटने टेके । बैद्धिक चेतना का उत्कृष्ठ वर्ग यहीं हुआ करता है – बिलकुल दूध से छंटे मलाई की तरह । किन्तु पिछले दिनों में इसकी गुणवत्ता में भी निरन्तर गिरावट आयी है । अयोग्यता यहां भी हावी हुयी है । चारित्रिक पतन यहां भी भरपूर हुआ है । और सबसे बड़ी दुःखद बात ये है कि एक नौकर दूसरे नौकर को अपना निजी नौकर मान बैठा है । हमारी कार्यपालिका विधायिका के हाथों की कठपुतली बनकर रह गयी है । इसकी व्यैयक्तिक स्वतन्त्रता का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया है । ख़ैरियत है कि इसमें निरंकुशता नहीं आयी है ।
  और इन सारी विकृतियों को दूर करने में अहम भूमिका होती है पत्रकारिता की । पिछले दिनों में इसकी साख पर भी भारी वट्टा लगा है । हालाकि यहां भी वही अयोग्यता वाली बात है । हां,फर्क सिर्फ इतना है कि वहां विधायिका में शैक्षणिक और चारित्रिक दोनों प्रकार के अयोग्यता की भरमार है , तो यहां चारित्रिक अयोग्यता की । निहित स्वार्थ के कारण कर्तव्य-पथ से बिलकुल विमुख सा हो गया है ये पाया । सत्य और ईमानदारी से कोशों दूर होता चला गया है निरन्तर । जिसे बिलकुल निष्पक्ष होना चाहिए था,जिसे सबको खरी-खोटी सुनाने का अधिकार था,जिसने दूध का दूध और पानी का पानी करने का संकल्प लिया था,वो भी किसी न किसी पक्ष का शिकार हो गया है । किसी खास के पिंजरे में बन्द तोता बन गया है ।

  सोचने वाली बात है- न्याय यदि बिकने लगे,मुंह देखी करने लगे,किसी के दबाव में आकर सही को गलत और गलत को सही साबित करने लगे,उसे भी अपनी कुर्सी की चिन्ता सताने लगे तो क्या गति होगी लोकतन्त्र की ! ठीक यही बात पत्रकारिता पर भी शतशः लागू होती है ।

   कुल मिलाकर विचार करें तो दावे के साथ कह सकते हैं कि लोकतन्त्र के चारों पाये दुर्बल हो गए हैं । बीमार हो गए हैं । जिसमें एक पाया तो बिलकुल सड़ गया है । उसका ट्रान्सप्लान्टेशन यथाशीघ्र अनिवार्य है, अन्यथा शेष अंगों में भी गैन्ग्रीन होने की पूरी आशंका है ।  साधारण दवा से ठीक होने लायक स्थिति बिलकुल नहीं है । प्लास्टिक सर्जरी से भी काम चलने को नहीं है। केश मेजर ऑपरेशन वाला है । किन्त विडम्बना ये है कि  सुव्यवस्थित ऑपरेशन थियेटर का भी अभाव है । अतः उचित है कि किसी प्राकृतिक आरोग्यशाला में पंचकर्म चिकित्सा के लिए तत्काल भर्ती करा दिया जाए । अस्तु ।
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Thursday, 17 May 2018

चुनावी हिंसाःलोकतन्त्र पर कुठाराघात


चुनावी हिंसाःलोकतन्त्र पर कुठाराघात

कहने को तो हमारे यहां लोकतन्त्र है, किन्तु विचार करने पर बहुत कम ही लक्षण मिलता है लोकतन्त्र का । भले ही लेबल ख़ालिस लोकतन्त्र वाला है, किन्तु भीतर में  ख़ालिसपना वाला खाना ख़ाली है लगभग ।
हम इस बात का दावा भी नहीं कर सकते कि ये सब नया हो रहा है । दरअसल बीमारी बिलकुल पुरानी है, जिसका संक्रमण  दिनों दिन बढ़ते जा रहा है और बहुत तेजी से बढ़ रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं ।
किसी प्रबल प्रतिद्वन्द्वी को रास्ते से हटा देने का चलन बिलकुल पुराना है - लोकतन्त्र की स्थापना से भी पुराना । समय-समय पर इसकी आवृत्ति भी होते रही है ।  सुभाष और शास्त्री इसके दो ज्वलन्त उदाहरण हैं । और दोनों घटनायें अभी भी रहस्य के गर्भ में ही हैं, भले ही समय-समय पर जनता में कुछ चूरन-चटनी सी बांट दी जाती हैं - इनसे जुड़ी बातें ।
घटना के प्रति खेद व्यक्त कर देना और जांच कमीटी का तत्क्षण गठन कर देना भी पुराना ट्रेन्ड है । इधर कुछ दिनों से एक नया तरीका भी अख़तियार कर लिया गया है - मुआवज़ा – करारोपण द्वारा संचित धन का अज़ीबोगरीब उपयोग । और ये मुआवज़ा लेने वाले लोग तो और भी अज़ीब हैं हमारे लोकतान्त्रिक समुदाय में । धन्य है हमारा लोकतन्त्र और धन्य हैं इसके रहनुमा ।
अहिंसा परमो धर्मः – इस आधे-अधूरे नीति-वचन को जनमानस में बड़ी कलाबाज़ी से परोस कर धर्म की अद्भुत परिभाषा समझायी गयी है पिछले कई दशकों में । पूरा नीति-वचन तो शायद ही पता हो किसी को । पूरा जानने का प्रयास भी शायद ही किसी ने किया हो ।  
 खेद है कि ऐसे स्लोगन वाले देश में बिना हिंसा के चुनाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती । बंगाल का पंचायती चुनाव और उस बीच हुये वारदात इसके ताज़े नमूने हैं । सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या यही हमारा लोकतन्त्र है ?
            रेखागणित का सिद्धान्त है कि किसी लकीर को बिना छेड़छाड़ किये उसके नजदीक एक दूसरी लकीर खींच दो, जो उस पहले वाली से बड़ी हो । स्वाभाविक है कि वो पहले वाली लकीर छोटी दीखने लग जायेगी ।
किन्तु दुःखद दशा ये है कि इस छोटे से सिद्धान्त को हमारे बड़े-बड़े नेता समझ नहीं पा रहे हैं या समझना जरुरी नहीं समझ रहे हैं । वो सिर्फ एक ही तरीका जानते हैं - पहली वाली लकीर को काटना-छांटना-मिटाना । अपना कद बड़ा करने की कोशिश वे कदापि नहीं करते हैं । अगले वाले का कद छोटा करने का हर तिगड़म करने में ही मश़गूल रहते हैं, जो कि बड़ी शर्मनाक और भविष्य के लिए चिन्ताजनक बात है । कभी कुछ अच्छे काम करने जैसा दिखाना भी चाहते हैं, तो वैचारिक दिवालियापन ऐसा है कि उनकी प्रस्तुति सर्कश के जोकर से जरा भी भिन्न नहीं होती ।  
 हमारे पावन लोकतन्त्र पर अनेक तरह से प्रहार निरन्तर हो रहे हैं । वोट पाने के लिए तरह-तरह के घृणित और हास्यास्पद हथकंडे अपनाये जा रहे हैं । एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई भी कोरकसर नहीं छोड़ा जा रहा है । सामने वाले की गलतियां दिखाने में ही हमारा सारा समय चूक जा रहा है । इसे ही हम लोकतन्त्र की सेवा समझ ले रहे हैं । केवल वाक्-वाण से भी सन्तोष नहीं हो रहा है, और अन्ततः हत्या पर उतारु हो जा रहे हैं । सब्ज़बाग, झूठ, फ़रेब, मक्कारी और हिंसा पर ही आकर ठहर गया है हमारा लोकतन्त्र ।
            आये दिन राजनैतिक और चुनावी हत्यायें काफी तेजी से बढ़ रही हैं । मुझे लगता है इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है समाज के सबसे अयोग्य व्यक्ति का राजनीति में प्रवेश तथा जिम्मेवार पदों पर गैरजिम्मेवार और अयोग्य व्यक्तियों का आसीन होना । हालाकि शिक्षा, कला, अभियन्त्रणा आदि विभिन्न क्षेत्रों से भी लोगों का आना हुआ है , पर अपराधी प्रवृति वालों का वर्चश्व रहने के कारण लोकतन्त्र की गरिमा को प्रायः ठेंस ही पहुँची है ।  
            क्या ही अच्छा होता , नियमों और शर्तों में आमूलचूल परिवर्तन करके एक सुदृढ़ स्वस्थ व्यवस्था और परम्परा का श्रीगणेश होता, जिसमें आपराधिक मामलों के इतिहास और वर्तमान वालों का सर्वथा-सर्वदा प्रवेश निषेध होता लोकतन्त्रान्त्रिक व्यवस्था में । चुनाव आयोग इतना शख़्त होता कि ऐसे लोगों को कदापि नामांकन का मौका न मिलता । सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेता और चुनाव पूर्व में बिलकुल राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति बहाल होती, बल्कि उससे भी कठोर  । अनाप-सनाप चुनावी खर्चे पर कठोर नियन्त्रण का प्रावधान होना चाहिए । चुनाव के नाम पर चन्दा लेने और देने की परम्परा पर ही रोक लगनी चाहिए । कालेधन वाला चन्दा मिलना बन्द हो जाये यदि तो फ़ालतू खर्चे अपने आप कम हो जायेंगे ।  हत्या जैसा कुकृत्य तो बहुत बड़ी बात है, सामान्य मार-पीट, कहा-सुनी जैसी घटना भी यदि किसी प्रत्यासी या उसके कार्यकर्ता द्वारा प्रमाणित हो तो अविलम्ब उसे निरस्त किया जाना चाहिए । उसकी विजय को अमान्य करार दिया जाना चाहिए । और सिर्फ आगामी ही नहीं,बल्कि आजीवन अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए । निर्णय और न्याय की प्रक्रिया त्वरित, सहज और पारदर्शी हो । इस बात का भी सुनिश्चय हो कि प्रत्यासी को निलम्बित करने हेतु मिथ्या आरोप तो नहीं है । क्यों कि पूरी सम्भावना होगी - इस नियम के दुरुपयोग का, जैसा कि हमारे यहां किसी अन्य कानूनों के साथ हुआ करता है ।
वैसे भी बात-बात में हम सेना का प्रायः दुरुपयोग ही करते हैं । अदनों काम में सेना को लगा देते हैं । तो क्यों न लोकतन्त्र की मर्यादा की रक्षा के लिए सेना का उपयोग किया जाय । चुनाव प्रक्रिया का आधुनिकीकरण हुआ है, फिर भी अभी बहुत कुछ सुधार की अपेक्षा है । ई.वी.एम. के आने से काफी सुविधा हुयी है । आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए ऐसी व्यवस्था होती कि घर बैठे ही जनता वोट दे दे ।
    इसका प्रत्यक्ष लाभ ये होता कि चुनाव के दौरान होने वाली विविध दुर्घटनायें रुकती और व्यवस्था जनित भारी व्यय-भार से भी राष्ट्रीय धन को मुक्ति मिलती ।
      किन्तु ये सब करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है । नियम बनाने और फिर उसका सही अनुपालन कराने वाले योग्य व्यक्ति की आवश्यकता है । और इन सबके लिए सर्वाधिक आवश्यकता है नैतिक-शिक्षा और संस्कार की , जिसकी आपूर्ति वर्तमान शिक्षा-नीति और व्यवस्था में कदापि सम्भव नहीं । अस्तु ।

Wednesday, 16 May 2018

एडल्टडाईपर


एडल्टडाईपर

एडल्टडाईपर जी हां, बिलकुल सही पढ़ा और सुना है आपने । आपसे कहीं गलती नहीं हुयी है और मुझसे भी नहीं । दरअसल मैं इस खोज में हूँ कि क्या किसी कम्पनी ने अभी तक ऐसा डाईपर बनाया है या नहीं, बनाने के बारे में सोचा भी है या नहीं । और यदि नहीं सोचा तो जल्दी ही सोच लेना चाहिए । क्यों कि मैं माननीय प्रधानमंत्री जी से और खास कर रेलमंत्रीजी  से अनुरोध करने जा रहा हूँ कि एडल्टडाईपर बनाना बहुत जरुरी है । और सरकार से मैं आग्रह करुंगा कि एडल्टडाईपर बनाने वाली कम्पनी को यथासम्भव यथोचित सहयोग दे । यहां तक कि मैन्युफैक्चरिंग लाइसेन्स की अनिवार्यता से भी मुक्त रखे इस उद्योग को । जीएसटी के दायरे में तो इसे कतई लाया ही न जाये । बात-बात में सब्सीडी देने का चलन तो हमारे यहां है ही । अतः हो सके तो एडल्टडाईपर बनाने वाली कम्पनी को हन्ड्रेड पर्सेन्ट सब्सीडी देने की अनुशंसा की जाए ।

लगता है अभी तक आप मेरी इस लाज़वाब योजना के बारे में कुछ नहीं समझ पाये । अरे भाई ! बच्चों का पोथड़ा जानते हैं न , वो छोटे बच्चों को पहनाने वाला पैम्पर, जिसे सफ़र के दौरान या कि मॉल-बाजार,पार्टी-सार्टी में घूमने जाते समय आधुनिक मम्मियाँ यूज़ किया करती हैं । पहले वाली माँयें तो बच्चों को मोटे गेंदड़े पर सुलाती थी । रात में दस बार उठ-उठ कर देखती,बदलती थी । पर आजकल की अस्त-व्यस्त मम्मियां जो टीवी सीरियल देखकर या पार्टी-फंक्शन अटेंड कर थकी-मादी रात दो बजे सोती हैं, वो भला कैसे बार-बार बच्चों का पैन्टी चेक करेंगी ? कुछ चतुर मम्मियां इसलिए हमेशा पैंपर में ही बच्चों को कैद रखती हैं , और होशियार कम्पनी वाले भी तरह-तरह के पैम्पर-रिसर्च में भिड़े रहते हैं - घंटे से लेकर चौबीस घंटे वाले ब्लॉटर पैम्पर ।

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि कम्पनी को बहुत मुनाफा होगा इस प्रोडक्ट में । मार्केटिंग की समस्या जरा भी नहीं आयेगी, खास कर, जब तक कि हमारा ये रेल मन्त्रालय चलता रहेगा और ये रेल मन्त्रालय ऐसे ही चलता रहेगा - इसमें जरा भी शक की गुंजाएश है ही नहीं । मन्त्री-संत्री भले आते-जाते रहेंगे, पर मन्त्रालय तो वही रहेगा और उसी रुप में चलता भी रहेगा, सरकारें चाहे किसी की क्यों न हो । बूटेल ट्रेन भले ही आ जाए, बाकी ट्रेनों की रफ़्तार और लेट-लटीफ़ी जारी ही रहना है, क्यों कि चलाने के लिए एलीयन्स तो आयेंगे नहीं ।

मैं अर्थशास्त्र का जानकार तो नहीं हूँ और न एमबीए का ही ज्ञान है । प्रोडक्शन और मार्केटिंग मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं आता । मेरे वश की बात भी नहीं , किन्तु भविष्यवाणी करना मुझे अच्छी तरह आता है और वो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि एडल्टडाईपर का हैवी डिमान्ड होने की सम्भावना है । और सप्लाई यदि कम हुयी तो ब्लैक मार्केटिंग तो होना ही होना है ।  

आप जानते ही होंगे कि हमारे देश में बूढ़ों की संख्या कितनी है , महिलाओं की संख्या कितनी है , रोगियों की संख्या कितनी है, विकलांगों की संख्या कितनी है ।  नहीं मालूम हो तो गूगलबाबा से पूछ लीजियेगा ।  

अब भला बूढ़े हैं तो उन्हें तो प्रॉस्टेट प्राब्लम होना ही होना है । अखबार पढ़ते होंगे, टीवी देखते होंगे तो ये भी पता होगा ही कि मधुमेह की बीमारी जंगल के आग की तरह फैल रही है । मधुमेही को बार-बार यूरीनॉल की जरुरत पड़ती ही है क्यों वो वेचारा देर तक बेग रोक नहीं सकता । प्रॉस्टेट के रोगी की भी यही दशा होती है । और करीब-करीब यही हाल गर्भिणी महिलाओं  का भी होता है । बेचारी चाह कर भी बेग रोक नहीं पाती । यदि बार-बार रोकने की कोशिश करती हैं, तो महिला शरीरशास्त्रियों का कहना है कि उनके अन्दरुनी भाग में भयानक इन्फेक्शन होने का खतरा रहता है ।  अतः किसी भी हाल में बेग रोकना नहीं चाहिए ।

अब जरा सोचिये- आप बहुत जिम्मेवार नागरिक हैं । हालाकि बहुत जिम्मेवार होना आजकल के लिए बिलकुल बेवकूफ होने जैसा भी है । खैर, छोटे से छोटे नियम-कानून का किसी भी हाल में उलंघन करना आप नहीं चाहते । स्वच्छ भारत अभियान में आपको पूरी आस्था है । आप हर हाल में इसका पालन करना चाहते हैं ।

किन्तु....?

ईएमयू,डीएमयू,मेमू आदि तरह-तरह की रेलगाड़ियां चलायी जा रही हैं, जिन्हें बनाने वाले ईंजीनियर ने तो हर बॉगी में दो-दो टॉयलेट बनाया था, किन्तु हमारी वर्तमान रेल-व्यवस्था को ये रास नहीं आया । टॉयलेटों के गेट को वाकायदा वेल्ड कर दिया गया । ये नये डिज़ाइन वाले डब्बे दौड़ रहे हैं चार से आठ घंटे के सफ़र वाले सवारियों को लेकर । हर छोटे-बड़े स्टेशन ही नहीं कदम-कदम पर बने हॉल्टों पर भी रुकना है । इतना ही नहीं किसी भलेमानस के घर-दरवाजे,खेत-खलियान के सामने भी रुकना ही पड़ता है- रात-बिरात,दिन-दुपहरिया ।

रेलवे प्लेटफॉर्म की व्यवस्था से तो आप वाकिफ़ ही होंगे । एक नम्बर को छोड़कर बाकी के प्लेटफॉर्मों पर टॉयलेट जरुरी ही नहीं समझा जाता । कहीं होता भी है तो समझना मुश्किल कि ये पेसाबखाना है कि पैखाना । अब भला किसी को जल्दवाजी होगी तो इस गम्भीर दार्शनिक भेद के पचरे में क्यों पड़ने जायेगा ?  चट अपना बजन हल्का किया और आगे बढ़ा ।  
सड़क-बाजार की भी यही दशा है । पांच किलोमीटर पर भी कहीं कुछ दीख गयी व्यवस्था तो नगर निगम की भलमनसी और उदारता मानें । खाली जगह को गंदा होने से बचाने के लिए भले ही स्लोगन लिख दें - यहां गदहा मूतता है या कि यहां पेसाब करना सख्त मना है , पर इससे क्या फ़र्क पड़ना है ? जिसे जल्दवाजी होगी, अपना काम निपटायेगा ही ।

  स्वच्छ भारत अभियान के तहत तरह-तरह की सह-योजनायें भी बनायी गयी,चलायी गयी । नगरनिगमों द्वारा प्लास्टिक और स्टीट के बड़े-बड़े कॉन्टेनर खरीदे गए । अब इतने सुन्दर कॉन्टेनरों में भला कौन बेवकूफ पार्षद होगा जो घर का चावल-आटा धरने के वजाय सड़क का कूड़ा डलवायेगा ? हालाकि फोटो खिंचवाने के लिए कुछ कॉन्टेनर जहां-तहां लगा दिये गए, कुछ हरे-पीले-लाल डब्बें यहां-वहां घरों में बांट-बूट भी दिये गए ।

हां, तो हम बात कर रहे थे एडल्ट डाईपर की । मुझे लगता है कि ये सुविधा मिल जाती तो जनता को काफी राहत मिलती – रेल के सफ़र में भी और शहर-बाजार में भी ।
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