Wednesday, 16 May 2018

एडल्टडाईपर


एडल्टडाईपर

एडल्टडाईपर जी हां, बिलकुल सही पढ़ा और सुना है आपने । आपसे कहीं गलती नहीं हुयी है और मुझसे भी नहीं । दरअसल मैं इस खोज में हूँ कि क्या किसी कम्पनी ने अभी तक ऐसा डाईपर बनाया है या नहीं, बनाने के बारे में सोचा भी है या नहीं । और यदि नहीं सोचा तो जल्दी ही सोच लेना चाहिए । क्यों कि मैं माननीय प्रधानमंत्री जी से और खास कर रेलमंत्रीजी  से अनुरोध करने जा रहा हूँ कि एडल्टडाईपर बनाना बहुत जरुरी है । और सरकार से मैं आग्रह करुंगा कि एडल्टडाईपर बनाने वाली कम्पनी को यथासम्भव यथोचित सहयोग दे । यहां तक कि मैन्युफैक्चरिंग लाइसेन्स की अनिवार्यता से भी मुक्त रखे इस उद्योग को । जीएसटी के दायरे में तो इसे कतई लाया ही न जाये । बात-बात में सब्सीडी देने का चलन तो हमारे यहां है ही । अतः हो सके तो एडल्टडाईपर बनाने वाली कम्पनी को हन्ड्रेड पर्सेन्ट सब्सीडी देने की अनुशंसा की जाए ।

लगता है अभी तक आप मेरी इस लाज़वाब योजना के बारे में कुछ नहीं समझ पाये । अरे भाई ! बच्चों का पोथड़ा जानते हैं न , वो छोटे बच्चों को पहनाने वाला पैम्पर, जिसे सफ़र के दौरान या कि मॉल-बाजार,पार्टी-सार्टी में घूमने जाते समय आधुनिक मम्मियाँ यूज़ किया करती हैं । पहले वाली माँयें तो बच्चों को मोटे गेंदड़े पर सुलाती थी । रात में दस बार उठ-उठ कर देखती,बदलती थी । पर आजकल की अस्त-व्यस्त मम्मियां जो टीवी सीरियल देखकर या पार्टी-फंक्शन अटेंड कर थकी-मादी रात दो बजे सोती हैं, वो भला कैसे बार-बार बच्चों का पैन्टी चेक करेंगी ? कुछ चतुर मम्मियां इसलिए हमेशा पैंपर में ही बच्चों को कैद रखती हैं , और होशियार कम्पनी वाले भी तरह-तरह के पैम्पर-रिसर्च में भिड़े रहते हैं - घंटे से लेकर चौबीस घंटे वाले ब्लॉटर पैम्पर ।

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि कम्पनी को बहुत मुनाफा होगा इस प्रोडक्ट में । मार्केटिंग की समस्या जरा भी नहीं आयेगी, खास कर, जब तक कि हमारा ये रेल मन्त्रालय चलता रहेगा और ये रेल मन्त्रालय ऐसे ही चलता रहेगा - इसमें जरा भी शक की गुंजाएश है ही नहीं । मन्त्री-संत्री भले आते-जाते रहेंगे, पर मन्त्रालय तो वही रहेगा और उसी रुप में चलता भी रहेगा, सरकारें चाहे किसी की क्यों न हो । बूटेल ट्रेन भले ही आ जाए, बाकी ट्रेनों की रफ़्तार और लेट-लटीफ़ी जारी ही रहना है, क्यों कि चलाने के लिए एलीयन्स तो आयेंगे नहीं ।

मैं अर्थशास्त्र का जानकार तो नहीं हूँ और न एमबीए का ही ज्ञान है । प्रोडक्शन और मार्केटिंग मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं आता । मेरे वश की बात भी नहीं , किन्तु भविष्यवाणी करना मुझे अच्छी तरह आता है और वो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि एडल्टडाईपर का हैवी डिमान्ड होने की सम्भावना है । और सप्लाई यदि कम हुयी तो ब्लैक मार्केटिंग तो होना ही होना है ।  

आप जानते ही होंगे कि हमारे देश में बूढ़ों की संख्या कितनी है , महिलाओं की संख्या कितनी है , रोगियों की संख्या कितनी है, विकलांगों की संख्या कितनी है ।  नहीं मालूम हो तो गूगलबाबा से पूछ लीजियेगा ।  

अब भला बूढ़े हैं तो उन्हें तो प्रॉस्टेट प्राब्लम होना ही होना है । अखबार पढ़ते होंगे, टीवी देखते होंगे तो ये भी पता होगा ही कि मधुमेह की बीमारी जंगल के आग की तरह फैल रही है । मधुमेही को बार-बार यूरीनॉल की जरुरत पड़ती ही है क्यों वो वेचारा देर तक बेग रोक नहीं सकता । प्रॉस्टेट के रोगी की भी यही दशा होती है । और करीब-करीब यही हाल गर्भिणी महिलाओं  का भी होता है । बेचारी चाह कर भी बेग रोक नहीं पाती । यदि बार-बार रोकने की कोशिश करती हैं, तो महिला शरीरशास्त्रियों का कहना है कि उनके अन्दरुनी भाग में भयानक इन्फेक्शन होने का खतरा रहता है ।  अतः किसी भी हाल में बेग रोकना नहीं चाहिए ।

अब जरा सोचिये- आप बहुत जिम्मेवार नागरिक हैं । हालाकि बहुत जिम्मेवार होना आजकल के लिए बिलकुल बेवकूफ होने जैसा भी है । खैर, छोटे से छोटे नियम-कानून का किसी भी हाल में उलंघन करना आप नहीं चाहते । स्वच्छ भारत अभियान में आपको पूरी आस्था है । आप हर हाल में इसका पालन करना चाहते हैं ।

किन्तु....?

ईएमयू,डीएमयू,मेमू आदि तरह-तरह की रेलगाड़ियां चलायी जा रही हैं, जिन्हें बनाने वाले ईंजीनियर ने तो हर बॉगी में दो-दो टॉयलेट बनाया था, किन्तु हमारी वर्तमान रेल-व्यवस्था को ये रास नहीं आया । टॉयलेटों के गेट को वाकायदा वेल्ड कर दिया गया । ये नये डिज़ाइन वाले डब्बे दौड़ रहे हैं चार से आठ घंटे के सफ़र वाले सवारियों को लेकर । हर छोटे-बड़े स्टेशन ही नहीं कदम-कदम पर बने हॉल्टों पर भी रुकना है । इतना ही नहीं किसी भलेमानस के घर-दरवाजे,खेत-खलियान के सामने भी रुकना ही पड़ता है- रात-बिरात,दिन-दुपहरिया ।

रेलवे प्लेटफॉर्म की व्यवस्था से तो आप वाकिफ़ ही होंगे । एक नम्बर को छोड़कर बाकी के प्लेटफॉर्मों पर टॉयलेट जरुरी ही नहीं समझा जाता । कहीं होता भी है तो समझना मुश्किल कि ये पेसाबखाना है कि पैखाना । अब भला किसी को जल्दवाजी होगी तो इस गम्भीर दार्शनिक भेद के पचरे में क्यों पड़ने जायेगा ?  चट अपना बजन हल्का किया और आगे बढ़ा ।  
सड़क-बाजार की भी यही दशा है । पांच किलोमीटर पर भी कहीं कुछ दीख गयी व्यवस्था तो नगर निगम की भलमनसी और उदारता मानें । खाली जगह को गंदा होने से बचाने के लिए भले ही स्लोगन लिख दें - यहां गदहा मूतता है या कि यहां पेसाब करना सख्त मना है , पर इससे क्या फ़र्क पड़ना है ? जिसे जल्दवाजी होगी, अपना काम निपटायेगा ही ।

  स्वच्छ भारत अभियान के तहत तरह-तरह की सह-योजनायें भी बनायी गयी,चलायी गयी । नगरनिगमों द्वारा प्लास्टिक और स्टीट के बड़े-बड़े कॉन्टेनर खरीदे गए । अब इतने सुन्दर कॉन्टेनरों में भला कौन बेवकूफ पार्षद होगा जो घर का चावल-आटा धरने के वजाय सड़क का कूड़ा डलवायेगा ? हालाकि फोटो खिंचवाने के लिए कुछ कॉन्टेनर जहां-तहां लगा दिये गए, कुछ हरे-पीले-लाल डब्बें यहां-वहां घरों में बांट-बूट भी दिये गए ।

हां, तो हम बात कर रहे थे एडल्ट डाईपर की । मुझे लगता है कि ये सुविधा मिल जाती तो जनता को काफी राहत मिलती – रेल के सफ़र में भी और शहर-बाजार में भी ।
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