Friday, 31 July 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-134

गतांश से आगे....अध्याय 23 भाग 8

(ख)पुण्याहवाचन(विस्तृत विधि)- विस्तृत रुप से पुण्याहवाचन करने के लिए सर्वप्रथम यथाशक्ति पीतल/तांबा/कांसा/मिट्टी का वरुण-कलश स्थापित करे,जिसका आकार कम से कम आधा लीटर जल ग्रहण-योग्य हो।कलश के दांये और बांये एक-एक कटोरी भी रखे, जिसमें पुण्याहवाचन के बीच जल गिराना होगा।दांयी कटोरी का आकार बांयीं की तुलना में कुछ बड़ा होना चाहिए।दांयी कटोरी में पुण्य-जल और वांयी कटोरी में पापजल को गिराना होता है। कलश और दोनों कटोरियों के नीचे कुशा रखनी चाहिए।अभाव में दुर्वा भी व्यवहृत हो सकता है।अब सर्वप्रथम कलश में जल,गंगाजल,चन्दन,पुष्प,दूर्वा,सुपारी,द्रव्य,आदि डाल कर हाथों में अक्षतपुष्पादि लेकर वरुण का आवाहन करें- बरुण प्रार्थना- ॐ पाशपाणे नमस्तुभ्यं पद्मिनीजीवनायक। पुण्याहवाचनं यावत् तावत् त्वं सुस्थिरो भव।।
अब यजमान अपनी दाहिनी ओर पुण्याहवाचक आचार्य/पुरोहित का सांगोपांग वरण (वस्त्र,द्रव्यादि से)करके आसन पर विठावे,जिसका मुंह उत्तर की ओर हो,और स्वयं सपत्निक पूर्वाभिमुख घुटने टेक कर(नीलडाउन),दोनों हाथों में अक्षत,पुष्प, द्रव्यादि लेकर अञ्जलिबद्ध होकर सिर से लगाकर तीन बार प्रणाम करे।

अब आचार्य अपने दाहिने हाथ से उक्त वरुण कलश को उठाकर यजमान की अञ्जलि में स्थापित कर दे।यजमान उस कलश को अपने सिर से लगावे।
अब आचार्य-यजमान में परस्पर निम्नांकित संवाद होंगे- 

यजमान- ॐ दीर्घा नागा नद्यो गिरयस्त्रीणि विष्णुपदानि च।तेनायुः प्रमाणेन पुण्यं पुण्याहं दीर्घमायुरस्तु।।
ब्राह्मण- अस्तु दीर्घमायुः।

यजमान- ॐ त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।अतो धर्माणि धारयन्।। तेनायुःप्रमाणेन पुण्यं पुण्याहं दीर्घमायुरस्तु इति भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- पुण्यं पुण्याहं दीर्घमायुरस्तु।

नोटः- आचार्य-यजमान का यह संवाद इसी भांति दो बार और होना चाहिए।
यजमान- ॐ अपां मध्ये स्थिता देवाः सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम्।ब्राह्मणानां करे न्यस्ताः शिवा आपो भवन्तु नः।।ॐ शिवा आपः सन्तु।।
(ऐसा कहकर यजमान आचार्च के हाथों में बारीबारी से जल,पुष्प,अक्षत,चन्दन,पान,सुपारी,द्रव्य आदि देता जाये और ब्राह्मण क्रमशः उसे स्वीकारते हुए, स्वीकारोक्ति वाक्य कहकर यजमान की मंगल कामना करता जाये,जैसा कि आगे दर्शाया गया है)-

ब्राह्मण-सन्तु शिवा आपः।

यजमान- लक्ष्मीर्वसति पुष्पेषु लक्ष्मीर्वसति पुष्करे।सा मे वसतु वै नित्यं सौमनस्यं सदास्तु मे।।सौमनस्यमस्तु।। (पुष्प दे)

ब्राह्मण- अस्तु सौमनस्यम्।
यजमान- अक्षतं चास्तु मे पुण्यं दीर्घमायुर्यशोबलम्।यद्यच्छ्रेयस्करं लोके 
तत्तदस्तु सदा मम।।अक्षतं चारिष्टं चास्तु।।  (अक्षत दे)

ब्राह्मण-अस्त्वक्षतमरिष्टं च।

यजमान- गन्धाःपान्तु।  (चन्दन दे)

ब्राह्मण- सौमङ्गल्यं चास्तु।

यजमान- अक्षताः पान्तु। (पुनःअक्षत दे)

ब्राह्मण- आयुष्यमस्तु।

यजमान- पुष्पाणि पान्तु। (पुष्प दे)

ब्राह्मण- सौश्रियमस्तु।

यजमान- सफलताम्बूलानि पान्तु। (पान-सुपारी दे)

ब्राह्मण- ऐश्वर्यमस्तु।

यजमान- दक्षिणाः पान्तु।(द्रव्य दक्षिणा दे)

ब्राह्मण- बहुदेयं चास्तु।

यजमान- आपः पान्तु। (पुनः जल दें)

ब्राह्मण- स्वर्चितमस्तु।

यजमान- (हाथ जोड़कर प्रार्थना करे)- दीर्घमायुः शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिः श्रीर्यशो विद्या विनयो वित्तं बहुपुत्रं बहुधनं चायुष्यं चास्तु।

ब्राह्मण- तथास्तु। (कहते हुए आचार्य यजमान के सिर पर कलश का जल छिड़क कर आशीर्वचन बोले)-
ॐ दीर्घमायुः शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु।

यजमान- (पुनः अक्षत लेकर हाथ जोड़कर बोले)- यं कृत्वा सर्ववेदयज्ञक्रियाकरणकर्मारम्भाः शुभाःशोभनाः प्रवर्तन्ते,तमहमोङ्कारमादिं- कृत्वा यजुराशीर्वचनं बहुऋषिमतं समनुज्ञातं भवद्भिरनुज्ञातः पुण्यं पुण्याहं वाचयिष्ये।

ब्राह्मण- ‘वाच्यताम्’ – कहते हुए अग्र मन्त्रों का वाचन करे- ॐ द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत।नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत।।सविता त्वा सवानाँ् सुवतामग्निर्गृहपतीनाँ् सोमो वनस्पतीनाम्।बृहस्पतिर्वाच इन्द्रो ज्यैष्ठ्याय रुद्रः पशुभ्यो मित्रः सत्यो वरुणो धर्मपतीनाम्।न तद्रक्षाँ् सि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमजँ् ह्येतत्।यो बिभर्ति दाक्षायणँ् हिरण्यँ् स देवेषु कृणुते दीर्घमायुः स मनुष्येषु कृणुते दीर्घमायुः।उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे।उग्रँ् शर्म महि श्रवः।।उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे।अभि देवाँ देवाँ इयक्षते।

यजमान-व्रतजपनियमतपःस्वाध्यायक्रतुशमदमदयादानविशिष्टानांसर्वेषां- ब्राह्मणानां मनः समाधीयताम्।

ब्राह्मण- समाहितमनसः स्मः।

यजमान- प्रसीदन्तु भवन्तः।

ब्राह्मण- प्रसन्नाः स्मः।
(अब,पुण्याहवाचनकलश के दायें-बायें रखे दो जलपात्र(कटोरी)में से सिर्फ दाहिने पात्र में आम्र पल्लव या दूर्वा से, या सीधे कलश से ही,थोड़ा-थोड़ा जल डालता जाय- कलश से लेलेकर, और ब्राह्मण मन्त्र बोलते जायें।ध्यातव्य है कि बीच-बीच में थोड़ा जल बायें पात्र में भी डालना है।सुविधा के लिए दोनों पात्रों का संकेत दिया जा रहा है।जल डालने में बिलकुल सावधानी वरतें।दायें-बायें के भेद को समझें।दायें में शुद्ध-पवित्र कामना का जल डाल रहे हैं,और बायें में अशुद्ध-पापादि जनित जल क्षेपित किया जा रहा है।यहाँ ऋटि होने का अर्थ ये होगा कि आप कूड़े को तिजोरी में और सोने को कूड़े में स्थान दे रहे हैं।अतः सावधानीपूर्वक पुण्याहवाचन कर्म करें।सामान्यतौर पर अन्य प्रकार की परेशानियों की स्थिति में भी पुण्याहवाचन का कर्म किया जा सकता है।इसके अनेक लाभ हैं।)

दाहिने पात्र में- ॐ शान्तिरस्तु। ॐ पुष्टिरस्तु। ॐ तुष्टिरस्तु। ॐ वृद्धिरस्तु। ॐ अविघ्नमस्तु।ॐ आयुष्यमस्तु।ॐ आरोग्यमस्तु।ॐ शिवमस्तु।ॐ शिवं कर्मास्तु।  ॐ कर्मसमृद्धिरस्तु।ॐधनधान्यसमृद्धिरस्तु। ॐ पुत्रपौत्रसमृद्धि- रस्तु। ॐ इष्टसम्पदस्तु।

बायें पात्र में- ॐ अरिष्टनिरसनमस्तु। ॐ यत्पापंरोगोऽशुभकल्याणं तद् दूरे प्रतिहतमस्तु।

पुनः दाहिने पात्र में- ॐ यच्छ्रेयस्तदस्तु। ॐ उत्तरे कर्मणि निर्विघ्नमस्तु। ॐ उत्तरोत्तरमहरहरभिवद्धिरस्तु। ॐ उत्तरोत्तराः क्रियाः शुभाः शोभनाः सम्पद्यन्ताम्। ॐ तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रग्रहलग्नसम्पदस्तु।ॐ तिथिकरण -मुहूर्तनक्षत्रग्रहलग्नाधिदेवता प्रीयन्ताम्।ॐ तिथिकरणे सुमुहूर्ते सनक्षत्रे सग्रहे साधिदैवतै प्रीयेताम्। ॐ दुर्गापाञ्चाल्यौ प्रीयेताम्। ॐ अग्निपुरोगा विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्। ॐ इन्द्रपुरोगा मरुद्गणाःप्रीयन्ताम्। ॐवशिष्ठपुरोगा ऋषिगणाः प्रीयन्ताम्। ॐ माहेश्वरीपुरोगा उमामातरः प्रीयन्ताम्। ॐ अरुन्धतीपुरोगा एकपत्न्यः प्रीयन्ताम्। ॐ ब्रह्मपुरोगाः सर्वे वेदाः प्रीयन्ताम्। ॐ विष्णुपुरोगा सर्वे देवाः प्रीयन्ताम्। ॐ ऋषयश्छन्दांस्याचार्या वेदा देवा यज्ञाश्च प्रीयन्ताम्। ॐ ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च प्रीयन्ताम्। ॐ श्रीसरस्वत्यौ प्रीयेताम्। ॐ श्रद्धामेधे प्रीयेताम्। ॐ भगवती कात्यायनी प्रीयताम्। ॐ भगवती माहेश्वरी प्रीयताम्। ॐ भगवती ऋद्धिकरी प्रीयताम्। ॐ भगवती वृद्धिकरी प्रीयताम्। ॐ भगवती पुष्टिकरी प्रीयताम्। ॐ भगवती तुष्टिकरी प्रीयेताम्। ॐ भगवन्तौ विघ्नविनायकौ प्रीयेताम्। ॐ सर्वाः कुलदेवताः प्रीयन्ताम्। ॐ सर्वा ग्रामदेवताः प्रीयन्ताम्। ॐ सर्वा इष्टदेवताः प्रीयन्ताम्।

अब बायें पात्र में-  ॐ हताश्च ब्रह्मद्विषः।ॐ हताश्च परिपन्थिनः। ॐ हताश्च कर्मणो विघ्नकर्तारः। ॐ शत्रवः पराभवं यान्तु। ॐ शाम्यन्तु घोराणि। ॐ शाम्यन्तु पापानि।ॐ शाम्यन्त्वीतयः।ॐशाम्यन्तूपद्रवाः।।
अब दाहिने पात्र में- ॐ शुभानि वर्धन्ताम्।ॐ शिवा आपःसन्तु। ॐ शिवा ऋतवः सन्तु। ॐ शिवा ओषधयः सन्तु। ॐ शिवा वनस्पतयः सन्तु। ॐ शिवा अतिथयः सन्तु। ॐ शिवा अग्नयः सन्तु। ॐ शिवा आहुतयः सन्तु। ॐ अहोरात्रे शिवे स्याताम्।
 ॐ निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।।
 ॐ शुक्राङ्गारकबुधबृहस्पतिशनैश्चरराहुकेतुसोमसहिता आदित्यपुरोगाः सर्वे ग्रहाः प्रीयन्ताम्। ॐ भगवान् नारायणः प्रीयताम्।ॐ भगवान् पर्जन्यः प्रीयताम्। ॐ भगवान् स्वामी महासेनः प्रीयताम्। ॐ पुरोऽनुवाक्यया यत्पुण्यं तदस्तु।ॐ याज्यया यत्पुण्यं तदस्तु। ॐ वषट्कारेण यत्पुण्यं तदस्तु। ॐ प्रातः सूर्योदये यत्पुण्यं तदस्तु।।
इसके बाद यजमान कलश को यथास्थान रखदे,और दाहिने पात्र में गिराये गए जल से मार्जन करे(अपने सिर पर आम्रपल्लव से छिड़के।आचार्य मन्त्रोच्चारण करें—ॐ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः।पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा।।)इस कार्य को परिवार के अन्य सदस्यों को भी करना चाहिए।साथ ही पूरे भवन/भूमि पर भी छिड़काव किया जाना चाहिए।दूसरे,यानी बायें पात्र के जल को नापित वा किसी अन्य के द्वारा बाहर कहीं दूर जाकर एकान्त में रखवा देना चाहिए।लोकाचार में प्रायः देखा जाता है कि नापित ही इस कार्य को करता है,और जल बाहर फेंक कर उपयोगी पात्र रख लेता है।साथ ही कुछ विशेष नेग(उपहार)भी मांग करता है,जिसका कि उसे अधिकार है।जहाँ यह कार्य मिट्टी के पात्र से कर रहे हों तो नापित को तद् मूल्यस्वरुप विशेष द्रव्य अवश्य देना चाहिए।ध्यातव्य है कि अलग-अलग कार्यों के अलग-अलग अधिकारी होते हैं,और उनका पारिश्रमिक भी हुआ करता है,ऐसा नहीं कि सब कुछ ब्राह्मण ही ले लें।कर्मकाण्ड में आचार्य,पुरोहित,होता,नापित,कुम्भकार,मालाकार आदि का कार्य विभाजित है।तदनुसार सबका पारिश्रमिक भी शास्त्रकारों ने निर्धारित किया है।)अस्तु।
अब यजमान हाथ जोड़कर ब्राह्मण से प्रार्थना करे,और ब्राह्मण प्रतिवचन कहें-

यजमान- ॐ एतत्कल्याणयुक्तं पुण्यं पुण्याहं वाचयिष्ये।

ब्राह्मण- वाच्यताम्।

यजमान- ॐ ब्राह्यं पुण्यमहर्यच्च सृष्ट्युत्पादनकारकम्।वेदवृक्षोद्भवं नित्यं तत्पुण्याहं ब्रुवन्तु नः।भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य.....कर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।
 (रिक्तस्थानपर कार्योद्येश्य- भूमिपूजन/गृहप्रवेश/अन्यकार्य का उच्चारण करे।एक ही वाक्य तीन बार दोनों को बोलना चाहिए।अन्तिम यानि तीसरी बार में कुछ अतिरिक्त वाक्य भी संलग्न है- इसपर ध्यान दें)

ब्राह्मण- ॐ पुण्याहम्।

यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण- ॐ पुण्याहम्।
यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ..../गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ पुण्याहम्। ॐ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः।पुनन्तु विश्वा  भूतानि जातवेदः पुनीहि मा।

यजमान- पृथिव्यामुद्धृतायां तु यत्कल्याणं पुरा कृतम्।ऋषिभिः सिद्धगन्धर्वैस्तत्कल्याणं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य गृहप्रवेश-वास्तु -शान्ति कर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ कल्याणम्।

यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ कल्याणम्।

यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ कल्याणम्। (ध्यातव्य है कि उक्त संवाद की तीन आवृत्ति हुयी है,यानी एक ही वाक्य उभय पक्ष ने उच्चरित किया है।अब अन्तिम बार के ऊँ कल्याणम् के बाद आगे का मन्त्र भी आचार्य को बोलना चाहिए)- ॐ यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।ब्रह्मराजन्याँ् शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृद्ध्यता- मुपमादो नमतु।

यजमान- ॐ सागरस्य तु या ऋद्धिर्महालक्ष्म्यादिभिः कृता।सम्पूर्णा सुप्रभावा च तामृद्धिं प्रब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणःऋद्धिं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ ऋद्ध्यताम्।
यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य .....कर्मणःऋद्धिं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ ऋद्ध्यताम्।

यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य .....कर्मणःऋद्धिं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ ऋद्ध्यताम्। (पुनः ध्यातव्य है कि उक्त संवाद की तीन आवृत्ति हुयी है,यानी एक ही वाक्य उभय पक्ष ने उच्चरित किया है।अब अन्तिम बार के ऊँ ऋद्ध्यताम् के बाद आगे का मन्त्र भी आचार्य को बोलना चाहिए)- ॐ सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता अभूम।दिवं पृथिव्या अध्याऽरुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्योतिः।।

यजमान- ॐ स्वस्तिस्तु याऽविनाशाख्या पुण्यकल्याणवृद्धिदा।विनायकप्रिया नित्यं तां च स्वस्तिं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु-शान्तिकर्मणःस्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण- ॐ आयुष्मते स्वस्ति।

यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु -शान्ति गृहप्रवेश-वास्तु -शान्ति/कर्मणः स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ आयुष्मते स्वस्ति।
यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ आयुष्मते स्वस्ति।(पुनः एक ही वाक्य की तीन आवृत्ति हुयी है।अन्तिम बार इस मन्त्र को भी आचार्य को बोलना चाहिए)- ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।

यजमान- ॐ समुद्रमथनाज्जाता जगदानन्दकारिका।हरिप्रिया च माङ्गल्या तां श्रियं च ब्रुवन्तु नः। भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः श्रीरस्तु इति भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ अस्तु श्रीः।

यजमान- भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः श्रीरस्तु इति भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ अस्तु श्रीः।

भो ब्राह्मणाः ! मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे करिष्यमाणस्य ...../ गृहप्रवेश-वास्तु -शान्तिकर्मणः श्रीरस्तु इति भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ॐ अस्तु श्रीः।।(पुनः एक ही वाक्य की तीन आवृत्ति हुयी है।अन्तिम बार इस मन्त्र को भी आचार्य को बोलना चाहिए)-ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रुपमश्विनौ व्यात्तम्।इष्णन्निषाणामुम इषाण सर्वलोकम्म इषाण।।

यजमान- ॐ मृकण्डुसूनोरायुर्यद् ध्रुवलोमशयोस्तथा।आयुषा तेन संयुक्ता जीवेम शरदः शतम्।

ब्राह्मण- ॐ शतं जीवन्तु भवन्तः।ॐ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।।

यजमान- ॐ शिवगौरीविवाहे या या श्रीरामे नृपात्मजे।धनदस्य गृहे या 
श्रीरस्माकं सास्तु सद्मनि।।

ब्राह्मण- ॐ अस्तु श्रीः।ॐ मनसः कामनाकूतिं वाचः सत्यमशीय।पशूनाँरुपमन्नस्य
रसो यशः श्रीः श्रयतां मयि स्वाहा।।


यजमान- प्रजापतिर्लोकपालो धाता ब्रह्मा च देवराट्।भगवाञ्छाश्वतो नित्यं नो वै रक्षतु सर्वतः।। (‘नो वै रक्षतु’ के स्थान पर ‘स नो रक्षतु’ पाठ भेद भी मिलता है)

ब्राह्मण- ॐ भगवान् प्रजापतिः प्रीयताम्।ॐ प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रुपाणि परि ता बभूव।यत्कामास्ते जहुमस्तन्नो अस्तुवयँ् स्याम पतयो रयीणाम्।

यजमान-  आयुष्मते स्वस्तिमते यजमानाय दाशुषे।कृताः सर्वाशिषः सन्तु ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः।।देवेन्द्रस्य यथा स्वस्तिस्तथा स्वस्तिर्गुरोर्गृहे।एकलिंगे यथा स्वस्तिस्तथा स्वस्तिः सदा मम।।

ब्राह्मण- ॐ आयुष्मते स्वस्ति।ॐ प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम्।येन विश्वा परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु।।ॐ पुण्याहवाचनसमृद्धिरस्तु।।

यजमान- अस्मिन पुण्याहवाचने न्यूनातिरिक्तोयो विधिरुपविष्टब्राह्मणानां वचनात् श्री महागणपतिप्रसादाच्च परिपूर्णोऽस्तु।
अब यजमान जलाक्षतपुष्पद्रव्यादि लेकर पुण्याहवाचन का विशेष दक्षिणासंकल्प करे—
ॐ अद्य कृतस्य पुण्याहवाचनकर्मणः समृद्ध्यर्थं पुण्याहवाचकेभ्यो ब्राह्मणेभ्य इमां दक्षिणां विभज्य अहं दास्ये।
ब्राह्मण- ॐ स्वस्ति।
(नोट-1.सामान्य कर्मों में पुण्याहवाचन किया जाये तो क्रिया के अन्त में अभिषेक का विधान है।ध्यातव्य है कि भूमिपूजन या गृहप्रवेश के प्रारम्भ में ही यह कार्य किया जाता है,अतः अभिषेक-कार्य क्रियान्त में ही करना व्यावहारिक होगा।
2.अभिषेक के समय पत्नी को बायें बैठ जाना चाहिए,जबकि अन्यान्य पूजाकार्य में दायें बैठना चाहिए।इस सम्बन्ध में शास्त्र वचन हैः- आशीर्वादेऽभिषेकेच पादप्रक्षालने तथा,शयने भोजने चैव पत्नी तूत्तरतो भवेत्।।)
3.इस पुस्तक में अभिषेक पूजनकार्य के अन्त में ही यथास्थान दिया गया है।
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क्रमशः...

Thursday, 30 July 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-133

गतांश से आगे- अध्याय 23 भाग 7

पुण्याहवाचन विधि-

(क)बौधायन की संक्षिप्त विधि-यह मूल रुप से पुरोहित-यजमान संवाद-शैली में है।आचार्य के सम्मुख, अक्षतपुष्पादि हाथों में लेकर सपत्निक यजमान पुण्याहवाचन की कामना से प्रार्थना करे-
यजमान- ब्राह्मं पुण्यं महर्यच्च सृष्ट्युत्पादनकारकम्।वेदवृक्षोद्भवं नित्यं तत्पुण्याहं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः मम सकुम्बस्य  सपरिवारस्य गृहे .....कर्मणः(रिक्तस्थान में भूमिपूजन/गृहप्रवेश शब्द का उच्चारण करे) पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण-  ऊँ पुण्याहं,ऊँ पुण्याहं,ऊँ पुण्याहं।
        ऊँ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः।
        पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा।।
यजमान- पृथिव्यामुद्धृतायां तु यत्कल्याणं पुरा कृतम्।
        ऋषिभिः सिद्धगन्धर्वैस्तत्कल्याणं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः मम   सकुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे .....कर्मणः(रिक्तस्थान में भूमिपूजन/गृहप्रवेश शब्द का उच्चारण करे) कल्याणं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ऊँ कल्याणं,ऊँ कल्याणं,ऊँ कल्याणं।ऊँ यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।ब्रह्मराजन्याभ्याँ् शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च।प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु।
यजमान- सागरस्य तु या ऋद्धिर्महालक्ष्यादिभिः कृता।सम्पूर्णा सुप्रभावा च तां च ऋद्धिं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः मम सकुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे ऋद्धिं भवन्तो ब्रुवन्तु।

ब्राह्मण- ऊँ कर्म ऋध्यताम्,ऊँ कर्म ऋध्यताम्,ऊँ कर्म ऋध्यताम्।ऊँ सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता अभूम।दिवं पृथिव्याम् अध्याऽरुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्योतिः।

यजमान- स्वस्तिस्तु याऽविनाशाख्या पुण्यकल्याणवृद्धिदा।विनायकप्रिया नित्यं तां च स्वस्तिं ब्रुवन्तु नः। भो ब्राह्मणाः मम सकुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे  स्वस्तिं भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण- ऊँ आयुष्मते स्वस्ति,ऊँ आयुष्मते स्वस्ति,ऊँ आयुष्मते स्वस्ति।ऊँ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिरधातु।।
यजमान- मृकण्डसूनोरायुर्यद्ध्रुवलोमशयोस्तथा।आयुषा तेन संयुक्ता जीवेम शरदः शतम्।।

ब्राह्मण- जीवन्तु भवन्तः,जीवन्तु भवन्तः,जीवन्तु भवन्तः।ऊँ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्र्चक्रा जरसं तनूनाम्।पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।।

यजमान- समुद्रमथनाज्जाता जगदानन्दकारिका।हरिप्रिया च माङ्ल्या तां श्रियं च ब्रुवन्तु नः।।शिवगौरीविवाहे तु या श्रीरामे नृपात्मजे।धनदस्य गृहे या श्रीरस्माकं सास्तु सद्मनि।।

ब्राह्मण- अस्तु श्रीः,अस्तु श्रीः,अस्तु श्रीः।  ऊँ मनसः कामनाकूतिं वाचः सत्यमशीय पशूनाàरुपमन्नस्य रसो यशःश्रीःश्रयतां मयि स्वाहा।

यजमान- प्रजापतिर्लोकपालो धाता ब्रह्मा च देवराट्।भगवाञ्छाश्वतो नित्यं स नो रक्षतु सर्वतः।।योऽसौ प्रजापतिः पूर्वे यः करे पद्मसम्भवः।पद्मा वै सर्वलोकानां तन्नोऽस्तु प्रजायते।।
तत्पश्चात् हाथ में लिया हुआ अक्षतपुष्पादि सामने छोड़ दे,और बोले- भगवान् प्रजापतिः प्रीयताम्।

ब्राह्मण- ॐ प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रुपाणि परि ता बभूव।यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्त्वयममुष्य पितासावस्य पिता वयँ् स्याम पतयो रयीणाँ् स्वाहा।। आयुष्मते स्वस्तिमते यजमानाय दाशुषे।
कृताः सर्वाशिषः सन्तु ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः।। 
या स्वस्तिर्ब्राह्मणो भूता या च देवे व्यवस्थिता।
धर्मराजस्य या पत्नी स्वस्तिः शान्तिः सदा तव।।
देवेन्द्रस्य यथा स्वस्तिस्तथा स्वस्तिर्गुरोर्गृहे।
 एकलिंगे यथा स्वस्तिस्तथा स्वस्तिः सदा तव।। 
ॐआयुष्मते स्वस्ति, ॐआयुष्मते स्वस्ति, ॐ आयुष्मते स्वस्ति।। 
ॐ प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम्।
येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु। 
पुण्याहवाचनकर्मणः समृद्धिरस्तु।।
          
        (इस प्रकार संक्षिप्त पुण्याहवाचन विधि सम्पन्न हुयी)

क्रमशः...

Tuesday, 28 July 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-132

गतांश से आगे...अध्याय 23 भाग 6

उक्त मन्त्रोच्चारण के पश्चात् हाथ में लिए हुए पुष्पाक्षतादि को गणेशाम्बिका पर चढ़ादे।(ध्यातव्य है कि अभी देवावाहन नहीं किया गया है।पूजा की तैयारी क्रम में सामने पत्ते पर या दोने में मौली,सुपारी,अक्षतादि रखकर सजाया भर गया है।)
अब पुनः जलाक्षतपूगीफलपुष्पद्रव्यादि दाहिने हाथ में लेकर संकल्प बोले(बीच में जहां कहीं भी....या अमुक शब्द आया है वहां आचार्य निर्दिष्ट शब्दों का प्रयोग करना चाहिए-जैसे नगर,ग्राम, संवत्सर,मास,पक्ष,तिथि,दिन,गोत्र आदि।तथा अपने नाम के आगे ब्राह्मणों को शर्मा,क्षत्रियों को वर्मा,वैश्यों को गुप्त और शूद्रों को दास कहना चाहिए,न कि पाठक,मिश्र,चौबे,पांडे आदि।)(निर्णयसिन्धु एवं भविष्यपुराण में संकल्प की महत्ता और औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि- संकल्पेन विना विप्र ! यत्किञ्चित् कुरुते नरः।फलं चाप्यल्पकं तस्य धर्मस्यार्धं क्षयो भवेत्।। तथा च शान्ति मयूख में कहा गया है – मासपक्षतिथीनां च निमित्तानां प्रपूर्वकः।उल्लेखनमकुर्वाणो न तस्य फलभाग्भवेत्।। अतः समुचित फल चाहने वालों को किसी धर्मकार्य में सचेष्ट होकर संकल्प अवश्य करना चाहिए।)
हरि ॐ तत्सत् ॐ विष्णुर्विष्णुविष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे द्वितीययामे तृतीयमुहूर्ते  श्रीश्वेतवारहकल्पे  सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तरगते बौद्धावतारे प्रभवादि षष्टिसंवत्सराणां मध्ये,वैक्रमाब्दे...संवत्सरे श्रीमच्शालिवाहनशाके यथायने सूर्ये यथा ऋतौ च यथा नक्षत्रे यथा-यथा राशि स्थिते ग्रहेषु सत्सु यथा लग्न मुहूर्त योग करणान्वितायाम् एवं ग्रह गुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य पर्वणि वर्तमाने.....नगरे/ग्रामे/क्षेत्रे.... मासे...पक्षे.... तिथौ...वासरे...गोत्रः ....शर्मा/वर्मा/ गुप्त/दास नामाऽहम् सपत्नीको मम सभार्यस्य पुत्रपौत्रादिसमस्तकुटुम्बसहितस्य सपरिजनस्य अस्मिन्न नूतने(क्रीते पुनरुद्धृते वा) गृहे निवसतो निवसिष्यतश्च समस्त जनस्य चिरकालसुखनिवास- सौमनस्यनैरुज्यदीर्घायुः सकलमनोरथसिध्यर्थं दैहिकदैविकभौतिकतापत्रयाधिव्याधि सर्वोपद्रवसुवर्णरजताद्यष्टविधशल्य- भूमिदोषआयवारांशव्ययादीन्यथाभवन-गृह  निर्माणार्थविहितभूमिखनन- वृच्छच्छेदनादिनानाविधहिंसादिदोषपरिहारद्वारा एतद् गृहक्षेत्रफलावच्छिन्न- भूम्यधिष्ठितदेवनोपरोपजनित समस्तदोषनिवृत्तिपूर्वकं वास्तोः समस्तशुभतासिद्धयर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीतिद्वारा शिरव्यादिदेवानां प्रसन्नार्थं श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासोक्तसमस्तशुभताप्राप्त्यर्थं सग्रहयज्ञां वास्तुपूजन/ वास्तुशान्ति, गृहप्रवेशाख्यं कर्मं च करिष्ये, तङ्गत्वेन स्वस्तिपुण्याहवाचनं प्रधानकलश, रुद्रकलश,वास्तुकलशादि स्थापन-पूजनं,विविध मातृकादिपूजनं वसोर्धारापूजनमायुष्यमन्त्र जपं सांकल्पिकमाभ्युदयिकश्राद्धमाचार्यादिवरणं च करिष्ये,तत्रादौ तन्निर्विघ्नतासिध्यर्थं श्रीगणेशाम्बिकयो पूजनं च करिष्ये।
(नोट-1. इस चिह्न / का ध्यान रखते हुए आवश्यकतानुसार वाक्यान्तर प्रयोग करना चाहिए,सुविधा के लिए संकल्प एकत्र दिया गया है।
 2. ध्यातव्य है कि स्वस्तिवाचन पूर्व में ही कर चुके है,अतः संकल्पवाक्यानुसार पुनः करने का कोई औचित्य नहीं है।संक्षिप्तरुप से कर भी लिया जाय तो कोई हर्ज नहीं।व्यवहार में भी प्रायः यही देखते हैं कि स्वस्तिवाचन से ही कार्यारम्भ करते हैं।मांगलिक कार्यों में बारबार स्वस्ति कामना से इसका वाचन किया जाता है।हाँ, पुण्याहवाचन की क्रिया अभी शेष है।अतः उसकी विधि यथास्थान प्रस्तुत की जायेगी।
3. .....नान्दीश्राद्धं ततः कुर्यात् पुण्याहं वाचयेत्ततः – पुण्याहवाचन के क्रम की चर्चा इस अध्याय के पूर्व में ही की जाचुकी है।मत्स्यपुराण में इसे नान्दीश्राद्ध के पश्चात् करने का संकेत है।किंचित पूजा पद्यतियों में स्वस्तिवाचन के बाद ही करने की बात आती है,तो कहीं कलशस्थापन के बाद।ध्यातव्य है कि पुण्याहवाचन के लिए वरुण का आवाहन-पूजन अनिवार्य है,जिसके लिए अतिरिक्त कलशादि की आवश्यकता होती है।वित्तानुसार यह कलश धातु या मिट्टी का हो सकता है।साथ ही जल गिराने के लिए दो अलग-अलग पात्र भी तदभांति ही- धातु वा मिट्टी के- अनिवार्य है।यहां मेरा कथन सिर्फ इतना ही है कि सामान्य पूजा में तो नहीं, किन्तु विशेष पूजाकार्य में पुण्याहवाचन कर्म अवश्य किया जाना चाहिए। वास्तुकार्य (भूमिपूजन/गृहप्रवेश)एक विशेष कार्य ही है,अतः इसे अत्यावश्क ही समझें।

4.पुण्याहवाचन की दो प्रचलित विधियाँ हैं-एक विस्तार से और एक संक्षिप्त।यहाँ दोनों विधियाँ दी जा रही हैं।सुविधानुसार उपयोग किया जाना चाहिए। अस्तु।

क्रमशः...

Sunday, 26 July 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा- 131

गतांश से आगे...अध्याय 23 भाग 5

अब,आचार्य और सपत्निक यजमान भी चित्र में दर्शाये गये स्थान पर अपना आसन लगालें।हालाकि यजमान को आवश्यकतानुसार उठ-उठ कर विभिन्न पूजा-स्थलों(वेदियों) पर जाना पड़ता है।ध्यातव्य है कि पूजा मंडप के अन्दर आसन छोड़ कर बार-बार उठने/जाने पर ‘आसन-त्याग’ का सामान्य दोष लागू नहीं होता। पूजन कार्य में पत्नी, पति के दांये बैठे।इस सम्बन्ध में शास्त्रादेश है-  आशीर्वादेऽभिषेकेच पादप्रक्षालने तथा,शयने भोजने चैव पत्नी तूत्तरतो भवेत्।।
अब,आचार्य द्वारा ग्रन्थि वन्धन क्रिया सम्पन्न करायी जाय-ॐ मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मङ्गलाय तनोहरिः।।-के उच्चारण सहित अक्षत(अक्षत कहते हैं पांच बार प्रक्षालित किया गया अरवा चावल,जो हरिद्राचूर्ण मिश्रित हो),फूल,सुपारी,और द्रव्य लेकर यजमान-पत्नी की चुनरी में डाल कर,गांठ लगाकर,यजमान की चादर से संयुक्त कर देना- ग्रन्थिबन्धन क्रिया कहलाती है। किसी भी सपत्निक कार्य में ग्रन्थिबन्धनक्रिया अनिवार्य है। ग्रन्थि बन्धन की यह क्रिया पुराने घर से निकलते समय ही किया जाना चाहिए था; किन्तु रास्ते की व्यावहारिक असुविधा को ध्यान में रखकर,इसे यहाँ करने की बात की जा रही है।हाँ,भवन के द्वार पर आकर गोपूजन के पूर्व कर लिया जा सकता है।(ग्रन्थिबन्धन से सम्बन्धित एक खास बात पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ— प्रायः लोगों को पूजन कार्य में देखा जाता है कि पति कोई कार्य कर रहा होता है,तो पत्नी अपने हाथ से पति के हाथ को पकड़े रहती है,या फिर पुरुष हवन कर रहा होता है, उस समय आहुति डालते वक्त वायें हाथ से अपने ही दायें हाथ को छूये रहता है- ये दोनों ही कार्य अति मूर्खतापूर्ण है।ग्रन्थि बन्धन युक्त पत्नी का पति के शरीर का स्पर्श किये रहने का कोई प्रयोजन या औचित्य नहीं है,इसी भांति दाहिने हाथ से हवन कुण्ड में आहुति प्रदान करते समय,या कुछ अन्य कार्य करते समय वायें हाथ से स्पर्शित किये रहना भी व्यर्थ और अविधिक, अविवेकपूर्ण ही है।पत्नी की भूमिका पूजन कार्य में हर तरह का सहयोग करना है,जितना वह सहजता से कर सके।जीवनरथ के दो चक्के मिल कर धर्मकार्य में संलग्न हैं। ग्रन्थि बन्धन के पश्चात् किसी एक के द्वारा भी किया गया कार्य दूसरे के द्वारा किया गया ही माना जायेगा। इसमें जरा भी संशय नहीं है।एक और बात का ध्यान रखना चाहिए—सपत्निक कर्म का विशेष महत्त्व है।जिसकी पत्नी जीवित हो उस पुरुष को कोई भी ऐसा कार्य अकेले,नहीं करना चाहिए, और यही नियम पत्नी के लिये भी मान्य है।हाँ,विधवा,विधुर,परित्यक्ता आदि के लिए बात अलग होगी।)
अब, पूजन कार्यार्थ जलपात्र (कर्मपात्र) स्थापित करे।यथा—तांबे के जलपात्र में फूल,अक्षत,सुपारी,दूर्वा,द्रव्य और आम्रपल्लव वा कुशा डाल कर निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक जल को आलोड़ित करे(चलावे)-

ऊँ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदे सिन्धुकावेरी जलेस्मिन्सन्नि- धौकुरु।।
    अब,क्रमशः तीन कुशाओं की बंटी हुयी पवित्री बायें हाथ की अनामिका अंगुली में और दो कुशाओं की बंटी हुयी पवित्री दायें हाथ की अनामिका अंगुली में धारण करें निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक- ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसवः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेँण सूर्यस्य रश्मिभिः।तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्।। अथवा मात्र ऊँ भूर्भुवःस्वः कह कर पहन लें।(स्त्री को पवित्री धारण करने की आवश्यकता नहीं है,उसे सोने की अंगूठी धारण करनी चाहिए)।पवित्री धारण करने के पश्चात् एक या तीन बार प्राणायाम कर लेना उत्तम होता है।विशेष प्रकार से न कर सके तो बाँयीं नाशापुट से स्वाँस लेकर दाँयीं नाशापुट से छोड़ दे,और पुनः दाँयीं से लेकर वाँयीं से छोड़ दे।यह प्राणायाम की अति संक्षिप्त विधि है।विशेष क्षमता और अभ्यास हो तो अधिक भी किया जा सकता है।

    अब,दाहिने और सामने एक-एक दीप प्रज्जवलित कर, जलाक्षतपुष्पद्रव्यादि लेकर विधिवत साक्षी दीप और रक्षा दीप को स्थापित करे- भो दीप! देवरुपस्त्वं कर्म-साक्षी ह्यविघ्नकृत् ,यावत्कर्म समाप्तिःस्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव।प्रसन्नो भव।वरदा भव। (सामने या दायीं ओर साक्षीदीप घी का, और बायीं और रक्षादीप तिलतैल का होना चाहिए।अज्ञानवश लोग तिल तैल के स्थान पर सरसो का तेल प्रयोग कर लेते हैं,जो कि अनुचित है।तिलतेल के अभाव में घी का प्रयोग किया जा सकता है,किन्तु सरसो तेल कदापि नहीं।)

अब,कर्मपात्र से थोड़ा-थोड़ा जल तीन बार ले लेकर ॐ केशवाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः कहते हुए तीन आचमन करे,और पुनः चौथी बार जल लेकर ॐ हृषीकेशाय नमः कहते हुए हाथ धोले।

पुनः जल लेकर विनियोग मन्त्र बोलें- अपसर्पन्त्विति मन्त्रस्य वामदेव ऋषिः, शिवो देवता,अनुष्टुप छन्दः,भूतादिविघ्नोत्सादने विनियोगः।– सामने जल गिरा दें।

अब,अक्षत वा पीला सरसो एवं मौली(एक लच्छी)दोने में, बायें हाथ में लेकर दाहिने हाथ से ढक कर दिग् रक्षा व भूतोत्सादन मन्त्र बोले-

गणाधिपं नमस्कृत्य नमस्कृत्य पितामहम्।विष्णुं रुद्रं श्रियं देवीं वन्दे भक्त्या सरस्वतीम्।। स्थानाधिपं नमस्कृत्य ग्रहनाथं निशाकरम्।धरणीगर्भसम्भूतं शशिपुत्रं बृहस्पतिम्।। दैत्याचार्यं नमस्कृत्य सूर्यपुत्रं महाबलम्।राहुं केतुं नमस्कृत्य यज्ञारम्भे विशेषतः।। शक्राद्या देवताः सर्वाः मुनीं चैव तपोधनान्।गर्गंमुनिं नमस्कृत्य नारदं मुनिसत्तमम्।। वशिष्ठं मुनिशार्दूलं विश्वामित्रं च गोभिलम्। व्यासं मुनिं नमस्कृत्य सर्वशास्त्रविशारदम्।। विद्याधिका ये मुनयः आचार्याश्च तपोधनाः। तान् सर्वान् प्रणमाम्येवं यक्षरक्षाकरान् सदा।।
अब,इस अभिमन्त्रित अक्षत/सरसो को थोड़ा-थोड़ा ले-लेकर आचार्य के निर्देशानुसार विभिन्न दिशाओं में छींटे—
पूर्वे रक्षतु वाराहः आग्नेयां गरुड़ध्वजः।दक्षिणे पद्मनाभस्तु नैऋत्यां मधुसूदनः।।
पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः।उत्तरेश्रीपतिःरक्षेत् ईशाने तु महेश्वरः।।
ऊर्ध्वं रक्षतु धाता वोऽधोऽनन्तश्च रक्षतु।एवं दशदिशो रक्षेद् वासुदेवो जनार्दनः।।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधृक्।यदत्र संस्थितं भूतस्थानमाश्रित्यसर्वदा। स्थानं त्यक्त्वातु तत्सर्वं यत्रस्थं तत्र गच्छतु।अपक्रामन्तु ते भूता ये भूता भूतले स्थिताः।।ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया।अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम्।।सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे।।-शेष बचे अक्षत और मौली को सामने रखकर, तीन बार जोर से ताली बजावे।
अब,आचार्य अपने यजमान को कुमकुमादि तिलक लगावे,तथा थोड़ा सा सिन्दूर गौर्यैः नमः से मन्त्राभिषिक्त करके यजमान पत्नी के हाथों में दे दे,और उसे स्वयं लगा लेने का निर्देश दें।तिलक की महत्ता के सम्बन्ध में शास्त्र-वचन हैं-
ऊर्ध्वपुण्ड्रं मृदा कुर्याद् भस्मना तु त्रिपुण्ड्रकम्।
उभयं चन्दनेनैव अभ्यङ्गोत्सवरात्रिषु।।
ललाटे तिलकं कृत्वा संध्याकर्म समाचरेत्।
अकृत्वा भालतिलकं तस्य कर्म निरर्थकम्।। (तिलक के सम्बन्ध में भी एक अविवेक पूर्ण चलन की ओर ध्यान दिलाना उचित प्रतीत हो रहा है—ब्राह्मण जब किसी यजमान को तिलक लगाने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है,तो उस समय यजमान अपना दाहिना हाथ अपने सिर के पीछे कर लेता है- वस्तुतः यह भी एक प्रकार की अज्ञानता का ही सूचक है।योग के गहन ज्ञान रखने वाले इस रहस्य(औचित्य-अनौचित्य) को सहज समझ सकते हैं।आम व्यक्ति के सिर्फ इतना ही सुझाव है कि तिलक लगवाने हेतु दोनों हाथों को जोड़कर, नम्रता पूर्वक गर्दन थोड़ा आगे झुका दे,वस।)
तिलक वन्दन के बाद,पवित्रीकरण हेतु विनियोग करे- ऊँ अपवित्रःपवित्रोवेत्यस्य वामदेवऋषिः विष्णुर्देवता गायत्री छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।।(कर्मपात्र से कुशा वा कलछी द्वारा जल लेकर भूमि पर गिरावे।)
पुनः जल लेकर मन्त्रोच्चारण करते हुए अपने चारो ओर, और सभी पूजन सामग्रियों पर भी जल का छिड़काव करे- अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।। पुण्डरीकाक्षःपुनातु, ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु,  पुण्डरीकाक्षःपुनातु।। (पुष्प पर जल न छिड़के,ध्यातव्य है कि सभी वस्तुयें जलसिंचन से पवित्र होती हैं,किन्तु पुष्प अपवित्र हो जाता है।)
पुनः विनियोग- पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसने विनियोगः।।-आसन के सामने जलगिरा,कर पुनः जल ले ले और मन्त्रोच्चारण पूर्वक अपने आसन के चारो ओर जल-बन्धन करे- पृथ्वी ! त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता।त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम्।।
 तत्पश्चात् जलाक्षतपुष्पपूंगीफलद्रव्यादि लेकर स्वतिवाचन मन्त्रोच्चारण करे।इस कार्य में वहाँ उपस्थित अन्य ब्राह्मण भी सहयोग करें,यानी मन्त्रोच्चारण एक साथ करें।सामूहिक स्वस्तिवाचन का अधिक महत्त्व है।
(आगे विभिन्न मन्त्रों में वैदिकस्वर ह्रस्व एवं दीर्घ ग्वं की कम्प्यूटरफॉन्ट उपलब्धि के अभाव में उसके स्थान पर ~ का ही प्रयोग करना पड़ रहा है। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ)
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे।। देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानाXरातिरभि नो निवर्तताम्। देवानाXसक्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे।। तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्। अर्यमणं वरुणàसोममश्विनासरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ।। तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।         तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना श्रृणुतं धिष्ण्या युवम्।। तमाशानं जगतस्त्स्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये।।        

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिरधातु।। पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः। अग्निजिह्वा मनवः सूरचश्रसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह।। भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाश्रभिर्यजत्राः।     स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाä सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।। शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।। अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।।  विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिरजातमदितर्जनित्वम् ।। द्यौः शान्तिरन्तरिक्षäशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वäशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।। यतो यतःसमीहसे ततो नो अभयं कुरु । शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः।। सुशान्तिर्भवतु।।              

ॐ गणानान्त्वा गणपतिàहवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपतिàहवामहे निधीनान्त्वा निधिपतिàहवामहे व्यसो मम। आहमाजानि गर्ब्भधमात्वमजासि गर्ब्भधम्।।  ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन। ससस्त्यस्वकः सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासिनीम्।। ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः। ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः। ॐ इष्टदेवताभ्यो नमः। ॐ कुलदेवताभ्यो नमः। ॐ ग्रामदेवताभ्यो नमः। ॐवास्तुदेवताभ्यो नमः। ॐ स्थानदेवताभ्यो नमः। ॐसर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।  ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।। ॐसुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।संग्रामे सकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।। शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये।। अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः।सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः।।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये ! शिवे ! सर्वार्थसाधिके।शरण्ये त्र्यम्बके ! गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम्।येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनं हरिः।।तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव।विद्याबलं देवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि।।लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।येषामिन्दवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः।।यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम।। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। स्मृतेः सकलकल्याणं भाजते यत्र जायते। पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्।।सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः।। विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्। वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम्।। वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।ॐ श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः।।
 
उक्त मन्त्रोच्चारण के पश्चात् हाथ में लिए हुए पुष्पाक्षतादि को गणेशाम्बिका पर चढ़ादे।(ध्यातव्य है कि अभी देवावाहन नहीं किया गया है।पूजा की तैयारी क्रम में सामने पत्ते पर या दोने में मौली,सुपारी,अक्षतादि रखकर सजाया भर गया है।)

क्रमशः...