Tuesday, 14 July 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-127

गतांश से आगे....

अध्याय २३—गृहप्रवेश-पद्धति  
         गृहप्रवेश की पद्धति प्रारम्भ करने से पूर्व ‘गृहप्रवेश’ शब्द पुनर्विचारणीय है। इस सम्बन्ध में कुछ प्रारम्भिक बातों की चर्चा मुहूर्तप्रकरण में भी की जाचुकी है।यहाँ इसके क्रियात्मक पक्ष पर ध्यानाकर्षण चाहता हूँ,जिन पर प्राय़ः चर्चा होती है—वैधिक मतान्तर (वैदिक नहीं) —यानी पहले क्या और क्यों? विदित है कि कोई भी मुहूर्त मात्र दो-सवादो घंटे का ही होता है,जब कि गृहप्रवेश का विधिवत कर्मकाण्ड (पूर्व तैयारी के अतिरिक्त) छः से आठ घंटों का है।प्रश्न यह है कि उक्त गृहप्रवेश-चयनित-मुहूर्त में कार्य क्या करें—सीधे प्रवेश कर जायें और दीर्घ कर्मकाण्ड शान्ति पूर्वक करें या कि सुविधानुसार (पूर्व दिन वा स्थितिनुसार उसी दिन) कर्मकाण्ड सम्पन्न करें,और फिर जैसे ही मुहूर्त आये,पुनः घर से बाहर निकल कर विधिवत प्रवेश करें? इस प्रश्न के अन्तः में एक मूल प्रश्न और छिपा है कि वास्तुपूजा प्रवेश के पहले या प्रवेश के बाद? जिसका उत्तर, अपने-अपने अन्दाज में प्रायः मिला करता है।परिणामतः आम आदमी उलझ कर रह जाता है।
कुछ ऐसा ही प्रश्न शिलान्यास के समय भी उठता है- मात्र सवादो घंटे के मुहूर्त में लम्बी पूजा-प्रक्रिया(दो-ढाई घंटे की) करने के बाद,पांच-सात फीट गड्ढा खोदकर शिलास्थापित करना कैसे हो सकता है? इसका समुचित उत्तर, या कहूँ अपनी राय व्यक्त कर चुका हूँ-शिलान्यास-पद्धति पर चर्चा के क्रम में ही। यहाँ भी कुछ वैसा ही उत्तर होगा मेरा। यह सही है कि भूमि क्रय से लेकर भवन निर्माण तक, सैंकड़ों बार गृहस्वामी(स्वयं या परिवार सहित भी)उस स्थान पर आ-जा चुका होता है।कभी ठहर कर रात्रि विश्राम,और भोजन भी करता है,मूत्र-पुरीष भी त्याग करता ही है।तो क्या निर्माणाधीन भवन को भी निर्मित भवन मान लिया जाय?
  सीधी सी बात है- लम्बी प्रक्रिया के बाद भवन ‘भवन’ कहलाता है।जब पूर्णरुपेण  भवन तैयार हो जाय,तब स्थायी वासत्व हेतु,भावी सुखशान्ति की कामना से प्रवेश, और प्रवेशजनित वास्तुपूजन का औचित्य है।मत्स्यादि पुराणों में बार-बार(कईबार) वास्तुपूजा की बात कही गयी है।सूत्रस्थापन(लेआउट),शिलान्यास,मुख्यद्वार स्थापन, छज्जावितान,आदि के पश्चात् अब, गृहप्रवेश की बात हो रही है;और आगे भी प्रतिवर्ष नहीं तो कम से कम बारह वर्षों पर तो अवश्य वास्तुशान्ति-पूजा करनी चाहिए—ऐसा ऋषियों का मत है।(गृहप्रवेश और वास्तुशान्तिकर्म में आंशिक भेद है। सभी पूजन-विधान वही होंगे,अन्तर सिर्फ प्रारम्भिक प्रवेशादि क्रियाओं में है।)
  अतः शुभ मुहूर्त में विधिवत प्रवेश का कार्य करना ही उचित प्रतीत हो रहा है।क्यों कि मुहूर्त गृहप्रवेश हेतु ही विचार किया गया है।इसका यह अर्थ भी नहीं कि  प्रवेश हो ही गया तो अब वास्तुपूजा किसलिए और क्यों।

क्रमशः .......

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