Wednesday, 8 July 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-124

गतांश से आगे...अध्याय 21 भाग 4

गृहारम्भदिवसीय कृत्यः-
शुभ मुहूर्त के दिन प्रातः कृत्यादि से निवृत्त होकर,प्रस्तावित भूखण्ड पर आचार्य,पुरोहित,इष्टमित्र,परिवार सहित सपत्निक प्रस्थान करे। प्रस्तावित भूमिपूजन के स्थान पर गड्ढे के सामने ही बैठे और इतनी दूरी रहे कि अपने आगे सभी देवताओं की स्थापना-पूजन,हवन,तथा पूजा सामग्री रखने की सुविधा हो।सबसे पहले मांगलिक चिह्न- अष्टदल कमल,स्वस्तिकादि (चौरेठा, कुमकुम,हरिद्राचूर्णादि से) बनावे।आम्रपल्लव वा दोने में मौली,सुपारी,अक्षत रखे जिसमें गणेशाम्बिका का आवाहन-पूजन करना है,तथा उसके समीप ही अन्य पत्तों को सजावे-जिसमें सूर्यादि नवग्रह,गणपत्यादि पंचलोकपाल,इन्द्रादि दशदिक्पाल,गौर्यादि षोडशमातृका,चतुःषष्ठियोगिनीमातृका,पृथ्वी,गंगा,वरुणादि को आहूत कर पूजन करना है।साथ ही एक और पत्तल पर ईंटों को धो-साफ कर सजा ले।एक पत्तल पर राजमिस्त्री के उपकरण (करनी-बसूलि) आदि भी रख ले धो-पोंछ कर।यूँ तो कुआँ,बोरिंग वगैरह के लिए अलग से मुहूर्त विचार करना चाहिए,जोकि युगानुसार अव्यावहारिक और लुप्त होता जा रहा है;किन्तु शिलापूजन के साथ ही यदि विशेषकर गंगा-वरुण पूजन कर दिया जाय तो किंचित क्षम्य हो जाता है।
भूमिपूजन हेतु पवित्र कम्बल आदि आसन(काला नहीं) पर पूर्वाभिमुख बैठे। पूजन कार्य में पत्नी, पति के दांये बैठे।आचार्य द्वारा ग्रन्थि वन्धन क्रिया सम्पन्न करायी जाय-ॐ मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मङ्गलाय तनोहरिः।।- के उच्चारण सहित अक्षत(अक्षत कहते हैं पांच बार प्रक्षालित किया गया अरवा चावल,जो हरिद्राचूर्ण मिश्रित हो),फूल, सुपारी,और द्रव्य लेकर यजमान-पत्नी की चुनरी में डाल कर,गांठ लगाकर, यजमान की चादर से संयुक्त कर देना- ग्रन्थिबन्धन क्रिया कहलाती है। किसी भी सपत्निक कार्य में ग्रन्थिबन्धनक्रिया अनिवार्य है।
तदुपरान्त सर्वप्रथम पूजन कार्यार्थ जलपात्र (कर्मपात्र) स्थापित करे।यथा-तांबे के जलपात्र में फूल,अक्षत,सुपारी,दूर्वा,द्रव्य और आम्रपल्लव वा कुशा डाल कर निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक जल को आलोड़ित करे(चलावे)-
ऊँ गंगे च यमुने चैवगोदावरी सरस्वती,
नर्मदे सिन्धुकावेरी जलेस्मिन्सन्निधौकुरु।।
 अब,क्रमशः तीन कुशाओं की बंटी हुयी पवित्री बायें हाथ की अनामिका अंगुली में और दो कुशाओं की बंटी हुयी पवित्री दायें हाथ की अनामिका अंगुली में धारण करे निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक- ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसवः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेँण सूर्यस्य रश्मिभिः।तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्।। अथवा मात्र ऊँ भूर्भुवःस्वः कह कर पहन लें।(स्त्री को पवित्री धारण करने की आवश्यकता नहीं है,उसे सोने की अंगूठी धारण करनी चाहिए)।पवित्री धारण करने के पश्चात् एक या तीन बार प्राणायाम कर लेना उत्तम होता है।विशेष प्रकार से न कर सके तो बाँयीं नाशापुट से स्वाँस लेकर दाँयीं नाशापुट से छोड़ दे,और पुनः दाँयीं से लेकर वाँयीं से छोड़ दे।यह प्राणायाम की अति संक्षिप्त विधि है।विशेष क्षमता और अभ्यास हो तो अधिक किया जाना चाहिए।
अब,दाहिने और सामने एक-एक दीप प्रज्जवलित कर, जलाक्षतपुष्पद्रव्यादि लेकर विधिवत साक्षी दीप और रक्षा दीप को स्थापित करे- भो दीप! देवरुपस्त्वं कर्म-साक्षी ह्यविघ्नकृत् ,यावत्कर्म समाप्तिःस्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव।प्रसन्नो भव।वरदा भव।
अब,कर्मपात्र से थोड़ा-थोड़ा जल तीन बार ले लेकर ऊँ केशवाय नमः,ऊँ माधवाय नमः,ऊँ नारायणाय नमः कहते हुए तीन आचमन करे,और पुनः चौथी बार जल लेकर ऊँ हृषीकेशाय नमः कहते हुए हाथ धोले।
पुनः जल लेकर विनियोग मन्त्र बोलें- अपसर्पन्त्विति मन्त्रस्य वामदेव ऋषिः, शिवो देवता,अनुष्टुप छन्दः,भूतादिविघ्नोत्सादने विनियोगः।– सामने जल गिरा दें।
अब,अक्षत वा पीला सरसो एवं मौली(एक लच्छी)दोने में, बायें हाथ में लेकर दाहिने हाथ से ढक कर दिग् रक्षा व भूतोत्सादन मन्त्र बोले-
ऊँ गणाधिपं नमस्कृत्य नमस्कृत्य पितामहम्।
विष्णुं रुद्रं श्रियं देवीं वन्दे भक्त्या सरस्वतीम्।।
स्थानाधिपं नमस्कृत्य ग्रहनाथं निशाकरम्।
धरणीगर्भसम्भूतं शशिपुत्रं बृहस्पतिम्।।
दैत्याचार्यं नमस्कृत्य सूर्यपुत्रं महाबलम्।
राहुं केतुं नमस्कृत्य यज्ञारम्भे विशेषतः।।
शक्राद्या देवताः सर्वाः मुनीं चैव तपोधनान्।
गर्गंमुनिं नमस्कृत्य नारदं मुनिसत्तमम्।।
वशिष्ठं मुनिशार्दूलं विश्वामित्रं च गोभिलम्।
व्यासं मुनिं नमस्कृत्य सर्वशास्त्रविशारदम्।।
विद्याधिका ये मुनयः आचार्याश्च तपोधनाः।
तान् सर्वान् प्रणमाम्येवं यक्षरक्षाकरान् सदा।।
अब,इस अभिमन्त्रित अक्षत/सरसो को थोड़ा-थोड़ा ले लेकर मन्त्र निर्देशानुसार विभिन्न दिशाओं में छींटे-
पूर्वे रक्षतु वाराहः आग्नेयां गरुड़ध्वजः। दक्षिणे पद्मनाभस्तु नैऋत्यां मधुसूदनः।। पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः। उत्तरेश्रीपतिःरक्षेत् ईशाने तु महेश्वरः।। ऊर्ध्वं रक्षतु धाता वोऽधोऽनन्तश्च रक्षतु। एवं दशदिशो रक्षेद् वासुदेवो जनार्दनः।। रक्षाहीनं तु यत्स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधृक्। यदत्र संस्थितं भूतस्थानमाश्रित्यसर्वदा। स्थानं त्यक्त्वातु तत्सर्वं यत्रस्थं तत्र गच्छतु। अपक्रामन्तु ते भूता ये भूता भूतले स्थिताः।। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया। अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम्।। सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे।।—शेष बचे अक्षत और मौली को सामने रखकर,तीन बार जोर से ताली बजावे।
अब,आचार्य अपने यजमान को कुमकुमादि तिलक लगावे,तथा थोड़ा सा सिन्दूर मन्त्राभिषिक्त करके यजमान पत्नी के हाथों में देदे,और उसे स्वयं लगा लेने का निर्देश दें।तिलक की महत्ता के सम्बन्ध में शास्त्र-वचन हैं-
ऊर्ध्वपुण्ड्रं मृदा कुर्याद् भस्मना तु त्रिपुण्ड्रकम्।
उभयं चन्दनेनैव अभ्यङ्गोत्सवरात्रिषु।।
ललाटे तिलकं कृत्वा संध्याकर्म समाचरेत्।
अकृत्वा भालतिलकं तस्य कर्म निरर्थकम्।।
पुनः पवित्रीकरण हेतु विनियोग करे- ऊँ अपवित्रःपवित्रोवेत्यस्य वामदेवऋषिः विष्णुर्देवता गायत्री छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।।(कर्मपात्र से कुशा वा कलछी द्वारा जल लेकर भूमि पर गिरावे।
पुनः जल लेकर मन्त्रोच्चारण करते हुए अपने चारो ओर और सभी पूजन सामग्रियों पर भी जल का छिड़काव करे-ऊँ अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु, ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु, ऊँ पुण्डरीकाक्षःपुनातु।।
पुनः विनियोग-ऊँ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसने विनियोगः।।-आसन के सामने जलगिरा,कर पुनः जल लेले और मन्त्रोच्चारण पूर्वक अपने आसन के चारो ओर जल-बन्धन करे-ऊँ पृथ्वी ! त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता।त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम्।।
 तत्पश्चात् जलाक्षतपुष्पपूंगीफलद्रव्यादि लेकर स्वतिवाचन मन्त्रोच्चारण करे-
(आगे विभिन्न मन्त्रों में वैदिकस्वर ह्रस्व एवं दीर्घ ग्वं की कम्प्यूटरफॉन्ट उपलब्धि के अभाव में उसके स्थान पर ~ का ही प्रयोग करना पड़ रहा है। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ)
ऊँ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे।। देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानाँ ~रातिरभि नो निवर्तताम्। देवानां~सक्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे।। तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्। अर्यमणं वरुणँ~सोममश्विनासरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।। तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।। तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना श्रृणुतं धिष्ण्या युवम्।। तमाशानं जगतस्त्स्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिरधातु।। पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः। अग्निजिह्वा मनवः सूरचश्रसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह।। भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाश्रभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा~सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।। शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।। अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।।विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिरजातमदितिर्जनित्वम्।। द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ~ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व~शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।। यतो यतःसमीहसे ततो नो अभयं कुरु।शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः।। सुशान्तिर्भवतु।। ॐ गणानान्त्वा गणपति~हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति~ हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति~हवामहे व्यसो मम। आहमाजानि गर्ब्भध- मात्वमजासि गर्ब्भधम्।। ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन। ससस्त्यस्वकः सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासिनीम्।। ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः। ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ मातृपितृ चरणकमलेभ्यो नमः। ॐ इष्टदेवताभ्यो नमः। ॐ कुलदेवताभ्यो नमः। ॐ ग्रामदेवताभ्यो नमः। ॐवास्तुदेवताभ्यो नमः। ॐ स्थानदेवताभ्यो नमः। ॐसर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।  ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।। ॐसुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।संग्रामे सकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।। शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये।।अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः।।सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये ! शिवे ! सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके ! गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।। सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम्।येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनं हरिः।। तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। विद्याबलं देवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि।। लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषामिन्दवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः।। यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम।। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।। स्मृतेः सकल कल्याणं भाजते यत्र जायते।पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्।। सर्वेष्वारम्भकार्येषु
त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः।। विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्।वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम्।। वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। ॐ श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः।।- उक्त मन्त्रोच्चारण के पश्चात् हाथ में लिए हुए जलाक्षतादि को सामने गणेशाम्बिका पर चढ़ादे।
  (ध्यातव्य है कि अभी देवावाहन नहीं किया गया है।पूजा की तैयारी क्रम में सामने पत्ते पर या दोने में मौली,सुपारी,अक्षतादि रखकर सजाया भर गया है।)
  अब पुनः जलाक्षतपूगीफलपुष्पद्रव्यादि दाहिने हाथ में लेकर संकल्प बोले(बीच में जहां कहीं भी....या अमुक शब्द आया है वहां आचार्य निर्दिष्ट शब्दों का प्रयोग करना चाहिए-जैसे नगर,ग्राम, संवत्सर,मास, पक्ष,तिथि,दिन,गोत्र आदि, तथा अपने नाम के आगे ब्राह्मणों को शर्मा,क्षत्रियों को वर्मा,वैश्यों को गुप्त और शूद्रों को दास कहना चाहिए,न कि पाठक,मिश्र,चौबे,पांडे आदि।)(निर्णयसिन्धु एवं भविष्यपुराण में संकल्प की महत्ता और औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि- संकल्पेन विना विप्र ! यत्किञ्चित् कुरुते नरः।फलं चाप्यल्पकं तस्य धर्मस्यार्धं क्षयो भवेत्।। तथा च शान्ति मयूख में कहा गया है – मासपक्षतिथीनां च निमित्तानां प्रपूर्वकः।उल्लेखनमकुर्वाणो न तस्य फलभाग्भवेत्।। अतः समुचित फल चाहने वालों को किसी धर्मकार्य में सचेष्ट होकर संकल्प अवश्य करना चाहिए।)
हरि ॐ तत्सत् ॐ विष्णुर्विष्णुविष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे द्वितीययामे तृतीयमुहूर्ते  श्रीश्वेतवारहकल्पे  सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तरगते बौद्धावतारे प्रभवादि षष्टिसंवत्सराणां मध्ये,वैक्रमाब्दे...संवत्सरे श्रीमच्शालिवाहनशाके यथायने सूर्ये यथा ऋतौ च यथा नक्षत्रे यथा-यथा राशि स्थिते ग्रहेषु सत्सु यथा लग्न मुहूर्त योग करणान्वितायाम् एवं ग्रह गुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य पर्वणि वर्तमाने.....नगरे/ग्रामे/ क्षेत्रे....मासे...पक्षे....तिथौ...वासरे...गोत्रः ....शर्मा/वर्मा/ गुप्त/दास नामाऽहम् सपत्नीको मम सभार्यस्य पुत्रपौत्रादिसमस्तकुटुम्बसहितस्य सपरिजनस्य अस्मिन्न गृहनिर्माणार्थं/ गृहेनिवसतो निवसिष्यतश्च समस्त जनस्य चिरकालसुखनिवास- सौमनस्यनैरुज्यदीर्घायुःसकलमनोरथसिध्यर्थं दैहिकदैविकभौतिकतापत्रयाधिव्याधिसर्वोपद्रवसुवर्णरजताद्यष्टविधशल्यभूमिदोष आयवारांशव्ययादीन्यथाभवन-गृहनिर्माणार्थविहितभूमिखनन- वृच्छच्छेदनादि नानाविधहिंसादिदोषपरिहारद्वारा एतद् गृहक्षेत्रफला- वच्छिन्नभूम्यधिष्ठित देवनोपरो पजनितसमस्तदोषनिवृत्तिपूर्वकं वास्तोः समस्तशुभतासिद्धयर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीति- द्वारा शिरव्यादिदेवानां प्रसन्नार्थं श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासोक्तसमस्तशुभताप्राप्त्यर्थं संक्षिप्त सग्रहयज्ञां भूमिपूजन,शिलादिपूजन,गंगापूजन,वरुणपूजन,सगणवास्तु देवता पूजन,संक्षिप्तवास्तुहोम कर्मं च करिष्ये, तङ्गत्वेन स्वस्तिपुण्याहवाचनं कलशनवग्रहमातृकादिपूजनं च करिष्ये, तत्रादौ तन्निर्विघ्नतासिध्यर्थं श्रीगणेशाम्बिकयो पूजनं च करिष्ये।
(नोट-1. ध्यातव्य है कि स्वस्तिवाचन पूर्व में ही कर चुके है,अतः संकल्पवाक्यानुसार पुनः करने का कोई औचित्य नहीं है।संक्षिप्तरुप से कर भी लिया जाय तो कोई हर्ज नहीं।व्यवहार में भी प्रायः यही देखते हैं कि स्वस्तिवाचन से ही कार्यारम्भ करते हैं।मांगलिक कार्यों में बारबार स्वस्ति कामना से इसका वाचन किया जाता है।हाँ, पुण्याहवाचन की क्रिया अभी शेष है।अतः उसकी विधि यथास्थान प्रस्तुत की जायेगी।
2.. .....नान्दीश्राद्धं ततः कुर्यात् पुण्याहं वाचयेत्ततः – पुण्याहवाचन के क्रम की चर्चा इस अध्याय के पूर्व में ही की जाचुकी है।मत्स्यपुराण में इसे नान्दीश्राद्ध के पश्चात् करने का संकेत है।किंचित पूजा पद्यतियों में स्वस्तिवाचन के बाद ही करने की बात आती है,तो कहीं कलशस्थापन के बाद।ध्यातव्य है कि पुण्याहवाचन के लिए वरुण का आवाहन-पूजन अनिवार्य है,जिसके लिए अतिरिक्त कलशादि की आवश्यकता होती है।वित्तानुसार यह कलश धातु या मिट्टी का हो सकता है।साथ ही जल गिराने के लिए दो अलग-अलग पात्र भी तदभांति ही- धातु वा मिट्टी के- अनिवार्य है।यहां मेरा कथन सिर्फ इतना ही है कि सामान्य पूजा में तो नहीं, किन्तु विशेष पूजाकार्य में पुण्याहवाचन कर्म अवश्य किया जाना चाहिए। वास्तुकार्य (भूमिपूजन/गृहप्रवेश)एक विशेष कार्य ही है,अतः इसे अत्यावश्क समझें।
3.पुण्याहवाचन की दो प्रचलित विधियाँ हैं-एक विस्तार से और एक संक्षिप्त।यहाँ संक्षिप्तविधि दी जा रही हैं।विस्तृत विधि आगे गृहप्रवेश प्रकरण में दिया गया है। अस्तु।
पुण्याहवाचन विधि-(बौधायन की संक्षिप्त विधि)-यह मूल रुप से पुरोहित-यजमान संवाद-शैली में है।आचार्य के सम्मुख, अक्षतपुष्पादि हाथों में लेकर सपत्निक यजमान पुण्याहवाचन की कामना से प्रार्थना करे-
यजमान- ब्राह्मं पुण्यं महर्यच्च सृष्ट्युत्पादनकारकम्।वेदवृक्षोद्भवं नित्यं तत्पुण्याहं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः मम सकुम्बस्य  सपरिवारस्य गृहे .....कर्मणः(रिक्तस्थान में भूमिपूजन/गृहप्रवेश शब्द का उच्चारण करे) पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण-  ऊँ पुण्याहं,ऊँ पुण्याहं,ऊँ पुण्याहं।
        ऊँ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः।
        पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा।।
यजमान- पृथिव्यामुद्धृतायां तु यत्कल्याणं पुरा कृतम्।
        ऋषिभिः सिद्धगन्धर्वैस्तत्कल्याणं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः मम   सकुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे .....कर्मणः(रिक्तस्थान में भूमिपूजन/गृहप्रवेश शब्द का उच्चारण करे) कल्याणं भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण- ऊँ कल्याणं,ऊँ कल्याणं,ऊँ कल्याणं। ऊँ यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्याँ् शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च। प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु।
यजमान- सागरस्य तु या ऋद्धिर्महालक्ष्यादिभिः कृता।सम्पूर्णा सुप्रभावा च तां च ऋद्धिं ब्रुवन्तु नः।। भो ब्राह्मणाः मम सकुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे .....कर्मणः (रिक्तस्थान में भूमिपूजन/गृहप्रवेश शब्द का उच्चारण करे) ऋद्धिं भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण- ऊँ कर्म ऋध्यताम्,ऊँ कर्म ऋध्यताम्,ऊँ कर्म ऋध्यताम्।ऊँ सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता अभूम।दिवं पृथिव्याम् अध्याऽरुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्योतिः।
यजमान- स्वस्तिस्तु याऽविनाशाख्या पुण्यकल्याणवृद्धिदा।विनायकप्रिया नित्यं तां च स्वस्तिं ब्रुवन्तु नः। भो ब्राह्मणाः मम सकुम्बस्य सपरिवारस्य गृहे .....कर्मणः (रिक्तस्थान में भूमिपूजन/गृहप्रवेश शब्द का उच्चारण करे) स्वस्तिं भवन्तो ब्रुवन्तु।
ब्राह्मण- ऊँ आयुष्मते स्वस्ति,ऊँ आयुष्मते स्वस्ति,ऊँ आयुष्मते स्वस्ति।ऊँ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिरधातु।।
यजमान- मृकण्डसूनोरायुर्यद्ध्रुवलोमशयोस्तथा।आयुषा तेन संयुक्ता जीवेम शरदः शतम्।।
ब्राह्मण- जीवन्तु भवन्तः,जीवन्तु भवन्तः,जीवन्तु भवन्तः।ऊँ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्र्चक्रा जरसं तनूनाम्।पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।।
यजमान- समुद्रमथनाज्जाता जगदानन्दकारिका।हरिप्रिया च माङ्ल्या तां श्रियं च ब्रुवन्तु नः।।शिवगौरीविवाहे तु या श्रीरामे नृपात्मजे।धनदस्य गृहे या श्रीरस्माकं सास्तु सद्मनि।।
ब्राह्मण- अस्तु श्रीः,अस्तु श्रीः,अस्तु श्रीः।ऊँ मनसः कामनाकूतिं वाचः सत्यमशीय पशूनाँ् रुपमन्नस्य रसो यशःश्रीःश्रयतां मयि स्वाहा।
यजमान- प्रजापतिर्लोकपालो धाता ब्रह्मा च देवराट्।भगवाञ्छाश्वतो नित्यं स नो रक्षतु सर्वतः।।योऽसौ प्रजापतिः पूर्वे यः करे पद्मसम्भवः।पद्मा वै सर्वलोकानां तन्नोऽस्तु प्रजायते।।
तत्पश्चात् हाथ में लिया हुआ अक्षतपुष्पादि सामने छोड़ दे,और बोले- भगवान् प्रजापतिः प्रीयताम्। ब्राह्मण- ॐ प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रुपाणि परि ता बभूव।यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्त्वयममुष्य पितासावस्य पिता वयँ् स्याम पतयो रयीणाँ् स्वाहा।।
आयुष्मते स्वस्तिमते यजमानाय दाशुषे।
कृताः सर्वाशिषः सन्तु ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः।।
या स्वस्तिर्ब्राह्मणो भूता या च देवे व्यवस्थिता।
धर्मराजस्य या पत्नी स्वस्तिः शान्तिः सदा तव।।
देवेन्द्रस्य यथा स्वस्तिस्तथा स्वस्तिर्गुरोर्गृहे।
एकलिंगे यथा स्वस्तिस्तथा स्वस्तिः सदा तव।।
ॐआयुष्मते स्वस्ति, ॐआयुष्मते स्वस्ति, ॐआयुष्मते स्वस्ति।।
ॐ प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम्।येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु।
पुण्याहवाचनकर्मणः समृद्धिरस्तु।।
      (इस प्रकार संक्षिप्त पुण्याहवाचन विधि सम्पन्न हुयी)
अब पूजन प्रारम्भ करें-(सबसे पहले सामने रखे दोने या आम्रपल्लव पर गणेशाम्बिका पूजन करना चाहिए। पूजन यथोपलब्ध- पंचोपचार,षोडशोपचार.... कुछ भी किया जा सकता है।षोडशोपचार पूजाक्रम अग्रलिखित है-
आवाहनासने पाद्यमर्घ्यमाचमनीयकम्।स्नानं वस्त्रोपवस्त्रं च गन्धमाल्यादिके क्रमात्।।धूपं दीपं च नैवेद्यं ताम्बूलं च प्रदक्षिणम्।पुष्पाञ्जलिं षोडशकमेवं देवार्चने विधिः।। (आवाहन,आसन,पाद्य,अर्घ्य, आचमन,स्नान,वस्त्रोपवस्त्र,यज्ञोपवीत ,चन्दन, पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्य,ताम्बूल, प्रदक्षिणा,और पुष्पाञ्जलि। इसमें अवान्तर उपचार भी समाहित हैं-वस्त्रोपवस्त्र,यज्ञोपवीत,और नैवेद्य के बाद भी आचमन हेतु जल प्रदान करना अनिवार्य है।)
१.(क) ध्यान-(अक्षतपुष्प लेकर गौरी-गणेश का ध्यान करें) गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपकजम्।। नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।
(ख) आवाहन-(पुनः अक्षतपुष्पादि लेकर आवाहन करें)-( आगे यदाकदा इस ~ चिह्न का प्रयोग किया गया है,वस्तुतः इस स्थान पर ग्वँ का उच्चारण होना चाहिए।कम्प्यूटर में इसके लिए वैदिक फॉन्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण ऐसा करना पड़ा है।सीधे ग्वँ लिखना भी वैदिक व्याकरण के अनुसार गलत होगा,इसलिए मैंने इस विशेष चिह्न से संकेत मात्र दे दिया है)
ॐ हे हेरम्ब त्वमेह्येहि अम्बिकात्र्यम्बकात्मज।सिद्धिबुद्धिपते त्र्यक्ष लक्षभालपितुः पितः।। ॐ गणानान्त्वा गणपति~हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति~हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति~हवामहे व्यसो मम।आहमाजानि गर्ब्भधमात्वमजासि गर्ब्भधम्।।ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन। ससस्त्यस्वकः सुभद्रिकाङ्काम्पील- वासिनीम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः गणाधिपतिमावाहयामि। ॐ भूर्भुवःस्वः गौर्यै नमः गौरीमावाहयामि।–कहते हुए हाथ के पुष्पाक्षतादि सामने दोने में रख कर दोनों हाथों को उल्टा एकत्र कर स्थापित भावमुद्रा का प्रदर्शन करे,और पुनः मन्त्रोच्चारण करे-
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टंयज्ञँ्समिमं दधातु।विश्वे देवास इह मादयन्तामोमप्रतिष्ठ।
ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः गणेशाम्बिके इहागच्छतमिह तिष्ठतं मम कृतां पूजां गृह् णीतं मम सकुटुम्बस्य सपरिजनस्य च सर्वात्मना कल्याणं च कुरुतम्।
२.आसन-उक्त मन्त्रोच्चारण के पश्चात् पुनः सूत्र सहित पुष्पाक्षत लेकर आसनार्थ मंत्र बोले-
ॐ विचित्ररत्नखचितं दिव्यास्तरणसंयुतम्।स्वर्णसिंहासनं चारु गृह् णीष्वसुरपूजित।। और आवाहित गणेशाम्बिका पर छोड़े दे।
.पाद्य- आचमनी या आम्रपल्लव से जल लेकर पाद्यमन्त्रोच्चारण करते हुए जल प्रदान करे- ॐसर्वतीर्थसमुदभूतं पाद्यं गन्धादिभिर्युतम्।विघ्नराज!गृहाणेमं भगवन् ! भक्तवत्सलः।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
४.अर्ध्य— चन्दनादि मिश्रित जल पुनः लेकर,मन्त्रोच्चारण पूर्वक अर्घ्य प्रदान करे-
ॐ गणाध्यक्ष! नमस्तेऽस्तु गृहाण करुणाकर,अर्घ्यं च फल संयुक्तं गन्धपुष्पाक्षतैर्युतम्।ॐभूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,हस्तयोर्घ्यं समर्पयामि।
५.आचमन- चन्दनादि मिश्रित जल पुनः लेकर,मन्त्रोच्चारण पूर्वक आचमन प्रदान करे-
ॐविनायक! नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दित।गंगोदकेन देवेश कुरुष्वाचमनं प्रभो। ॐभूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,आचमनीयं समर्पयामि।
६.स्नान-(क)दूध,दही,घी,गूड़ और मधु मिश्रित पंचामृत से एकत्र वा पाँचों चीजों से अलग-अलग स्नान करावे,सुविधा के लिए यहाँ दोनों प्रकार के मन्त्रों की चर्चा कर रहे हैं-
# ऊँ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः एतानि पाद्यार्घ्याचमनीयस्नानीयपुनराचमनीयानि समर्पयामि।–कहते हुए पाद्य,अर्घ्य, आचमन,स्नान,पुनराचमनीय जलार्पण करें।
#.दुग्धस्नान- ऊँ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः।पयश्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्।।
अथवा-  कामधेनुसमुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम्।पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः स्नानार्थं दुग्धं समर्पयामि । (गणेशाम्बिका को दुग्ध चढ़ावे)
#.दधिस्नान- ऊँ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।सुरभि नो मुखा करत्प्रणआयुँ्षि तारिषत्।।
अथवा- पयस्सतु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः दधि स्नानं समर्पयामि।
(दधि से स्नान करावे)
#.घृतस्नान- ऊँ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम। अनुष्वधमा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्।।
अथवा- नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम्।घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,घृतस्नानं समर्पयामि।
(घृतस्नान करावे)
# मधुस्नान- ऊँ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः।माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवँ्रजः।मधु द्यौरस्तु नः पिता।।
अथवा- पुष्परेणुसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु।तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,मधुस्नानं समर्पयामि।।(मधु से स्नान करावें)
#शर्करास्नान- ऊँ अपाँ्रसमुद्वयसँ्सर्ये सन्तँ्समाहितम्।अपाँ्रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तमुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्।
अथवा- इक्षुरससमुद्भूतां शर्करां पुष्टिदां शुभाम्।मलापहारिकां दिव्यां स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,शर्करास्नानं समर्पयामि।
# पञ्चामृत स्नान-ॐ पञ्चामृतं मया नीतं पयो दधि घृतं मधु।शर्कारा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,पञ्चामृतंसमर्पयामि। 
(ख)शुद्धस्नान- अब शुद्धजल से स्नान करावे-मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्।तदिदं कल्पितं देव ! स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिका-भ्यां नमः,शुद्ध स्नानीयं जलं  समर्पयामि।
(ग)स्नानांग आचमन- (स्नान के पश्चात् भी आचमन का विधान है)अतः प्रदान करे-
ॐ सर्वतीर्थसमायुक्तं सुगन्धिनिर्मलं जलम्।आचम्यतां मया दत्तं गृहाण परमेश्वर।ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,स्नानांगाचमनीयं जलं समर्पयामि।
(७)वस्त्रोपवस्त्र- (स्नान के पश्चात् वस्त्र और उपवस्त्र समर्पित करे)-
ॐ शीतवातोष्णसन्त्राणं लज्जाया रक्षणं परम्।देहालङ्कारणं वस्त्रं अतः शान्तिं प्रयच्छ मे। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि।
वस्त्रोपवस्त्र के बाद पुनः आचमनीय जल प्रदान करे- ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,वस्त्रोपवस्त्रान्ते पुनराचमनीयं जलं  समर्पयामि।
(८)उपवीत- अब यज्ञोपवीत समर्पित करे-
ॐ नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्।उपवीतं मया दत्तं गृहाण गणनायक।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाय नमः,उपवीतं समर्पयामि।उपवीत के बाद पुनः आचमनीय जल प्रदान करे- ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाय नमः,उपवीतान्ते पुनराचमनीयं जलं  समर्पयामि।
(९)चन्दनं-(क) श्रीखण्डचन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,चन्दनं समर्पयामि।(श्वेतचंदन समर्पित करें)
(ख) ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,रक्तचन्दनं समर्पयामि।(रक्तचंदन समर्पित करें)
(ग) ॐ कुङ्कुमं कामना  नित्यं कामिनीकामसम्भवम्।कुङ्कुमेनार्चनं देव गृहाण परमेश्वर। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,कुङ्कुमम् समर्पयामि।(कुंकुम समर्पित करें)
(घ) ॐ नानापरिमलैर्द्रव्यैर्निर्मितं चूर्णमुत्तमम्।अबीरनामकंदिव्यं गन्धं चारु प्रगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः नानापरिमलद्रव्याणि च समर्पयामि। (अबीर,हरिद्राचूर्ण इत्यादि विविध सुगन्धित द्रव्य सपर्पित करें)
(ङ) ऊँ सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यसुखवर्धनम्।शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्।।(अथवा- ऊँ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः। घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः।।) ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः सिन्दूरं समर्पयामि। (उक्त दो में से किसी एक मन्त्रोच्चारण पूर्वक सिन्दूर समर्पित करे।ध्यातव्य है कि पुरुष देवता होते हुए भी गणेशजी को सिन्दूर अर्पित किया जाता है।)
(१०) ॐ अक्षताश्च सुरश्रेष्ठाः कुङ्कुमाक्ताः सुशोभनाः।मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः अक्षतान् समर्पयामि।(हरिद्रा मिश्रित अक्षत समर्पित करें)
(११) ॐ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।मयाऽऽहृतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्।
ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः पुष्पं,पुष्पमाल्यांच समर्पयामि।(विविधपुष्प एवं पुष्पमाला समर्पित करें)
(१२) ॐ त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि वन्दितासि सुरैरपि।सौभाग्यं सन्ततिं देहि सर्वकार्यकरी भव।दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक।काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाय नमः दूर्वांदूर्वांकुरान् च समर्पयामि। (गणेशजी को तीन,पांच,सात की संख्या में दूर्वा और तद्अंकुर समर्पित करें)
(१३) बिल्वपत्र- ऊँ  अमृतोद्भवं च श्रीवृक्षं शङ्करस्य सदा प्रियम्।बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्र्वर।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाय नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि।(गणेशजी को बिल्वपत्र समर्पित करें)
(१४) शमीपत्र- ऊँ शमी शमय मे पापं शमी लोहितकंटका।धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः शमीपत्रं समर्पयामि।
(शमी पत्र पांच या ग्यारह की संख्या में अर्पित करें)
(१५)अबीरगुलाल- अबीरं च गुलालं च चोवाचन्दनमेव च।अबीरेणार्चितो देव! अतः शान्तिं प्रयच्छमे।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः अबीरंगुलालं च समर्पयामि।(अबीरगुलाल समर्पित करें)
(१६) सुगन्धित तैल-इत्रादि- चम्पकाशोकवकुलमालतीमोगरादिभिः।वासितं स्निग्धताहेतु तैलं चारु प्रगृह्यताम्।।(अथवा - स्नेहं गृहाण सस्नेह लोकेश्वर दयानिधे।भक्त्या दत्तं मया देव स्नेहं ते प्रतिगृह्यताम्।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः सुगन्धित द्रव्यादि समर्पयामि।(विविध सुगन्धित तैल,इत्र आदि समर्पित करें)
(१७)धूप- ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वामः।देवानामसि वह्नितमँ्सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्।।
अथवा- वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं    प्रतिगृह्यताम्। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,धूपमाघ्रापयामि।(देवदार धूप, धूना,गूगल,नागरमोथा अथवा अन्य सुगन्धित अगरुआदि धूप दिखावे।ध्यातव्य है कि वांस की तिल्लियों में लपेट कर बनायी गयी अगरबत्तियों का आजकल चलन है।इसका उपयोग कदापि न करें।प्रायः अगरबत्तियों में लोहवान का प्रयोग होता है,यह भी सर्वथा निषिद्ध है।)
(१८) दीप-ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निःस्वाहा सूर्योज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।     अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा।।ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।।
अथवा- साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
      दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्।।
      भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।
      त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,दीपं दर्शयामि।(दीपक दिखावे,और ऊँ हृषीकेशायनमः कह कर हाथ अवश्य धोले।)
(१९) नैवेद्य-(क)(नैवेद्य को जल प्रोक्षित कर,गन्ध-पुष्पादि से आक्षादित करके,सामने रखकर, चतुष्कोण जल का घेरा लगावे,और मन्त्र बोलते हुए तुलसीदल छोड़े।ध्यातव्य है कि गणेश को तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता,अतः इनके नैवेद्य में पुष्प डाले,शेष सभी देवों के लिए तुलसीपत्र का ही उपयोग होना चाहिए।इसके वगैर प्रसाद अधूरा है।)
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षँ् शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्।ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।ॐ प्राणाय स्वाहा।ॐ अपानाय स्वाहा।ॐ समानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा।ॐ व्यानाय स्वाहा।  ॐअमृतापिधानमसि स्वाहा।
अथवा- शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।आहारं भक्ष्य भोज्यं च नैवेद्यं
प्रतिगृह्यताम्। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,नैवेद्यं निवेदयामि।
नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।(नैवेद्य के बाद आचमनीय जल समर्पित करें)
(ख) अखण्ड ऋतुफल- ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वँ्हसः।। -अखण्ड(बिना कटा हुआ)मौसमी फल-केला, अंगूर,अमरुद,सेव,नारंगी-जो भी उपलब्ध हो,अर्पित करे।किसी भी पूजन कार्य में मूली,गाजर, चुकन्दर आदि का उपयोग न करे।ये सर्वदा त्याज्य कन्द हैं।अज्ञानता वश आजकल लोग धड़ल्ले से प्रयोग कर लेते हैं।किन्तु शक्करकन्द या मिश्रीकन्द उपयोग में लाया जा सकता है।सुथनी(आलू के आकार का एक कन्द विशेष जिस पर छोटे-छोटे रोंये होते हैं)भी उपयोगी कन्द है।
अथवा- इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव।तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि चन्मनि। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,ऋतुफलानि समर्पयामि।
पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि।(पुनः आचमनीय जल समर्पित करें)
(२०) ताम्बूलादि मुखशुद्धि- ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।।
अथवा- पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।एलाचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्।
ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,मुखवासार्थम् एलालवंगपूगीफलसहितं ताम्बूलं समर्पयामि।(पान,सुपारी,लौंग,इलाइची,कपूर आदि युक्त बीडा समर्पित करे।)
(२१) दक्षिणा- ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।सा दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्।–हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,कृतायाः पूजायाः साद्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि। (दक्षिणा स्वरुप यथाशक्ति द्रव्य समर्पित करे)
(२२) आरती-ॐ आ रात्रि पार्थिवँ्रजः पितुरप्रायि धामभिः।दिवः सदाँ् सि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः। (ययु.३४-३२)
अथवा- कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्।आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,आरार्तिकं समर्पयामि। (कपूर की आरती दिखावे,और आरती के बाद थोड़ा जल गिरादे।)
(२३) पुष्पाञ्जलि- ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।।
अथवा- नानासुगन्धि पुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च।पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि। (दोनों हाथ की अंजलिबनाकर पुष्पाञ्जलि समर्पित करें)
(२४) प्रदक्षिणा- (व्यावहारिक रुप में, इस कार्य को प्रायः क्रिया समाप्ति के बाद किया जाता है।वैसे,विधान है गणेशाम्बिकापूजन के पश्चात् भी कर लेने का।प्रदक्षिणा की विधि है- सुविधानुसार देवमूर्ति के चारो ओर दक्षिणावर्ती, वा अपने ही आसन पर खडे-खड़े(घड़ी की सूई की तरह)परिक्रमा करे।परिक्रमा की संख्या अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए अलग-अलग है-यथा- एका चण्ड्या,रवौ सप्त,तिस्रो दद्याद्विनायके,चतस्रः केशवे दद्याच्छिवस्याऽर्धा प्रदक्षिणा। अर्थात् देवी की एक,सूर्य की सात,गणेश की तीन,विष्णु की चार,और शिव की आधी परिक्रमा होनी चाहिए।यहाँ निहितार्थ ये है कि शेष देवों की पांच परिक्रमा की जाय।शिव की आधी परिक्रमा का आशय ये है कि अर्घा का उलंघन नहीं होना चाहिए,यानी अपने स्थान से उठकर अर्घ्यमुख पर्यन्त जाकर वापस लौट आवे- यही आधी प्ररिक्रमा हुयी।)
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे।। ॐ भूर्भुवःस्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,प्रदक्षिणां समर्पयामि।
(२५) प्रार्थना- विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय,लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते।।
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय।
विद्याधराय विकटाय च वामनाय भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते।।
नमस्ते ब्रह्मरुपाय विष्णुरुपाय ते नमः,नमस्ते रुद्ररुपाय करिरुपाय ते नमः।
विश्वरुपस्वरुपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे,भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक।।
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव।।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः।।
कलश-स्थापन 
(गौरीगणेश की पूजा के बाद कलश की स्थापना करनी चाहिए।कलश-प्रमाण-लक्षण के सम्बन्ध में शास्त्रीय वचन है—                                      सौवर्णं राजतं वापि ताम्रं मृन्मयजं तु वा।                                   अकालमव्रणं चैव सर्व लक्षणसंयुतम्।।                   पञ्चाशाङ्गुलवैपुल्यमुत्सेधे षोडशाङ्गुलम्।                                   द्वादशाङ्गुलकं मूलं मुखमष्टाङ्गुलं तथा।। अभिप्राय यह है कि कलश बहुत छोटे आकार का कदापि नहीं होना चाहिए।कम से कम सवा किलो जल ग्रहण-योग्य अवश्य हो।गृहप्रवेशादि विशेष कार्यों में कई कलश हुआ करते हैं,जिनमें प्रधान कलश का आकार अपेक्षाकृत काफि बड़ा होना चाहिए।कम से कम सात या नौ या ग्यारह किलो जलग्रहण योग्य अवश्य हो।श्रद्धा और आर्थिक स्थिति के अनुसार समस्त पूजन-पात्र धातु के ही उपयोग में लाये जायें।कम से कल प्रधान कलश और उसका पूर्णपात्र (ढक्कन)तो धातु निर्मित होही।अभाव में मिट्टी का उपयोग हो सकता है।शास्त्र वचन है- वित्तशाठ्यं न कारयेत- पूजन में धन की कंजूसी न करे। व्यावहारिक रुप में देखा जाता है कि मकान बनाने में तो लोग औकाद लगा देते हैं,किन्तु वास्तुपूजा या अन्य पूजा में घोर कंजूसी वरतते हैं।कलश तांबें या पीतल का हो तो अति उत्तम।कलश के आकार के सम्बन्ध एक और बात का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है कि कलश की ग्रीवा उचित ऊँचाई वाला हो,उदर प्रान्त भी प्रसस्त हो। बेडौल,चपटे,कम गर्दन वाले, ठिगने काठी के कलश का उपयोग सर्वदा वर्जित है।मिट्टी के कलश में पकाते समय का काला धब्बा-दाग आदि कदापि नहीं होना चाहिए।इसे ढकने के लिए कुम्हार रंग-रोगन कर दिया करते हैं। कलश की ग्रीवा में तीन तन्तुओं का वेष्ठन अवश्य करे,साथ ही वक्ष-प्रान्त में स्वस्तिकादि मांगलिक चिह्नों का लेखन भी अनिवार्य है। प्रायः लोग गोबर से गौरी-गणेश की लम्बी पिड़िया बना कर कलश पर चिपका देते हैं। वस्तुतः यह प्रतीक भी मान्य है।आजकल नाना प्रकार के चिह्नों,चित्रकारियों से युक्त कलश भी  बाजार में उपलब्ध हैं,जिनका उपयोग किया जा सकता है।कलश स्थापन के स्थापन पर चौरेठ,हल्दी,कुमकुम,अबीर आदि से मांगलिक चिह्न- स्वस्तिक,अष्टदल आदि भी चित्रित कर देना चाहिए।)
अब, निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करते हुए भूमि का स्पर्श करें।
भूमि का स्पर्श- ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृँ्ह पृथिवीं मा हि ँ् सीः।।
कलश को सप्तधान्य अथवा सुविधानुसार किसी एक धान्य पर स्थापित किया जाना चाहिए। सप्तधान्य के सम्बन्ध में कई शास्त्रीय वचन हैं।यथा-
1.यवधान्यतिलाः कंगु मुद्गचणकश्यामकाः। एतानि सप्तधान्यानि सर्वकार्येषु योजयेत्।।
2.यवगोधूमधान्यानि तिलाः कङ्गुस्तथैव च। श्यामाकाश्चणकश्चैव सप्तधान्यानि संविदुः।।
3.श्यामाकयवगोधूममुद्गमाषप्रियङ्गवः।धान्यानि सप्तसङ्ख्याता व्रीहयः सप्त सूरिभिः।।      
जौ,धान,तिल,कँगुनी,मूंग,चना और सांवा- ये सात अन्न कहे गये हैं।दूसरे और तीसरे श्लोक में क्रमशः गेहूँ और उड़द को भी ग्रहण किया गया है।उपलब्धि और सुविधानुसार इनमें किसी को ग्रहण किया जा सकता है।युगानुसार इनमें कंगुनी और सांवा सुलभ प्राप्त नहीं हैं।इसके स्थान पर दुकानदार कुछ-के कुछ अन्न डाल देते हैं।गलत धान्य के प्रयोग से कहीं अच्छा है कि सुलभ प्राप्त जौ अथवा धान का प्रयोग किया जाय।अभाव में गेहूँ या सिर्फ रंगीन चावल  का प्रयोग भी किया जा सकता है।निम्नांकित मन्त्रों में किसी एक का उच्चारण करते हुए भूमि पर सप्तधान्यादि विखेरे-
धान्यप्रक्षेप(विकिरण)- (क) ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वो दानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।।
अथवा (ख) ॐ ओषधयः समवन्दत सोमेन सह राज्ञा।यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तँ् राजान्पारयामसि।।
कलश-स्थापन- ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः।पुनरुर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।। (इस मन्त्र के साथ कलश को स्थापित कर दें,और आगे क्रमशः कहे गये मन्त्रों के उच्चारण सहित एक-एक कर सभी वस्तुयें कलश में डालते जायें)
कलश में जल- ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद।।
कलश में चन्दन- ॐ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्चत।।
कलश में सर्वौषधि- ॐ या ओषधीः पूर्वाजातादेवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।मनै नु बभ्रूणामह ँ्शतं धामानि सप्त च।। (सर्वौषधि के सम्बन्ध में कहा गया है-
मुरा माँसी वचा कुष्ठं शैलेयं रजनीद्वयम् । सठी चम्पकमुस्ता च सर्वौषधिगणः स्मृतः।।
अग्निपुराण १७७-१७ के अनुसार मुरामांसी,जटामांसी,वच,कुठ,शिलाजीत, हल्दी,दारुहल्दी, सठी, चम्पक और नागरमोथा-इन दस ओषधियों को ग्रहण किया गया है।अन्यत्र एक प्रमाण में कहा गया है-
कुष्ठं मांसी हरिद्रे द्वे मुरा शैलेय चन्दनम्।वचा चम्पक मुस्ता च सर्व्वौषध्यो दश स्मृताः।।
यानी कुठ,जटामांसी,हल्दी,दारुहल्दी,मुरामांसी,शिलाजीत,श्वेत चन्दन,वच, चम्पा,और नागरमोथा इन दस औषधियों को ही सर्वौषधि कहा गया है। एक अन्य सूची में ऊपरोक्त सभी द्रव्य तो यथावत हैं,किन्तु चम्पक के स्थान पर आंवला लिया गया है।जटामांसी के सम्बन्ध में ज्ञातव्य है कि कहीं-कहीं इसके नाम पर छड़ीला दे दिया जाता है,जबकि असली जटामांसी ठीक जटा की तरह,और अति तीक्ष्ण गंधी होता है।अतः उसे ही प्रयोग करना चाहिए। सर्वौषधीनां दुष्प्राप्तौ क्षिपेदेकां शतावरीम्  अथवा सर्वाभावे शतावरी- यानी सर्वौषधी के अभाव में सिर्फ शतावरी का प्रयोग किया जा सकता है।शतावरी जड़ी-बूटी की दुकानों में सुलभ प्राप्य है।)
कलश में दूर्वा- ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च।।
कलश में पञ्चपल्लव- ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्।। (प़ञ्चपल्लव के सम्बन्ध में शास्त्र वचन है- न्योग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः चूतप्लक्षस्तथैव च – अर्थात बरगद,गूलर,पीपल,आम और पाकड़ इन  पांच प्रकार के पल्लवों को कलश में डालना चाहिए।सामान्य संक्षिप्त पूजा में तो सिर्फ आम के पल्लव से काम चल जाता है,किन्तु विशेष पूजा में पांचों अनिवार्य हैं।)
कलश में कुशा- ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्।।
कलश में सप्तमृत्तिका- ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी।यच्छा नः शर्म सप्रथा।। अथवा  ॐउधृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्।।(सप्तमृत्तिका के सम्बन्ध में शास्त्र वचन है—
अश्वस्थानाद्गजस्थानाद्वल्मीकात्सङ्गमाद्ध्रदात्। राजद्वाराच्च गोष्ठाच्च मृदमानीय निक्षिपेत्।। अर्थात् घुड़साल,हाथीसाल,दीमक की बॉबी,नदियों के संगम,तालाब,राजद्वार, और गोशाला- इन सात स्थानों की मिट्टी को कलश में डालने का विधान है।युगानुसार ये अलभ्य या दुर्लभ नहीं हैं,फिर भी सुलभ भी नहीं कहे जा सकते।इनके स्थान पर दुकानदार जो सो दे दे,इससे अच्छा है- इनमें जो भी सुलभ प्राप्य हो,उसी का प्रयोग किया जाय। कहीं-कहीं वेश्यालय की मिट्टी को भी पूजाकार्य में पवित्र माना गया है। अपने आप में इसका भी विशिष्ट स्थान है।)
कलश में सुपारी- ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।बृहस्पतिप्रसू-तास्ता नो मुञ्चन्त्वँ्हसः।।
कलश में पञ्चरत्न- ॐ परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्।दधद्रत्नानि दाशुषे।।
(पञ्चरत्न के सम्बन्ध में शास्त्र वचन है- 1.कनकं कुलिशं मुक्ता पद्मरागं च नीलकम्।एतानि पञ्चरत्नानि सर्वकार्येषु योजयेत्।। अर्थात् सोना,हीरा,मोती,पद्मराग, और नीलम- ये पंचरत्न कहे गये हैं।
2.वज्रमौक्तिकवैदूर्यं प्रवालं चन्द्रनीलकम्।अलाभे सर्वरत्नानां हेम सर्वत्र योजयेत्।। अर्थात् हीरा,मोती,वैदूर्य(विल्लौर),मूंगा,नीलम ये पांच रत्न हैं।इन सबके अभाव में सोने का प्रयोग करना चाहिए।
3.माणिक्यं मौक्तिकं हेमं प्रवालं रजतादिकम्।पञ्चरत्नाङ्गमित्येतत् सर्वं शान्तिकरं परम्।। अर्थात् माणिक्य,मोती,मूंगा,सोना,चाँदी ये पांच रत्न कहे गये हैं,जिनका उपयोग सभी प्रकार के शान्तिकर्मों में किया जाता है।विभिन्न पूजापाठ,यज्ञादि में इनका प्रयोग होता है।आजकल इनके नाम पर कृत्रिम रत्नों की पुड़िया दुकानदार थमा देता है,और अज्ञानता या मूढ़ता वस लोग ले लेते हैं।यदि श्रद्धा और औकाद हो तो रत्नों की दुकान से असली रत्न लें।नकली के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं है।)
कलश में द्रव्य- ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
उपरोक्त पदार्थ का कलश में प्रक्षेपण करने के पश्चात् कलश को वस्त्रालंकृत करे,निम्नाकित मन्त्रोच्चारण करते हुए-
कलश पर वस्त्र-  ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरुथमाऽसदत्स्वः।वासो अग्ने विश्वरूपँ् सं व्ययस्व विभावसो।।
कलश पर पूर्णपात्र- ॐ पूर्णादर्वी परा पत सुपूर्णा पुनरा पत।वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जँ्शतक्रतो।। (कलश के ऊपर ढक्कन में अक्षतादि भर कर रखे।ध्यातव्य है कि यह पात्र पूर्ण हो,ऐसा नहीं कि आधेकिलो चावल की क्षमता वाले ढक्कन में मुट्ठी भर चावल मात्र रख दिया जाय,जैसा कि प्रायः लोग अज्ञानता में किया करते हैं।)
अब, पूर्णपात्र रखने के पश्चात्, निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक उसके ऊपर वस्त्रवेष्ठित जलदार नारियल(अभाव में सूखा गड़ीगोला)रखे।मुख्य कलश के अतिरिक्त सहायक कलशों पर भी ऐसा ही किया जाता है,किन्तु अभाव में वहाँ सुपारी भी रख सकते हैं।पूर्णपात्र रिक्त नहीं रहना चाहिए।अज्ञनता में प्रायः कलश के ऊपर दीपक रख दिया जाता है।)
कलश पर नारियल-  ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसू-तास्ता नो मुञ्चन्त्वँ्हसः।।(इस मन्त्र के उच्चारण पूर्वक कलश पर वस्त्र- वेष्ठित जलदार नारियल रखना चाहिए।जलदार नारियल के स्थान पर सूखा गडीगोला भी रखा जा सकता है।अभाव में या सामान्य पूजा में सुपारी भी रख दिया जाता है।कहीं-कहीं इस पर लोग दीपक रख दिया करते हैं,जो उचित नहीं प्रतीत होता।दीपक का अलग स्थान है।)
अब, अक्षत-पुष्पादि लेकर कलश में देवी-देवताओं का आवाहन करना चाहिए,जिसके लिए निम्नांकित मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए-
ॐ तत्त्वा यामि ब्राह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः।अडेहमानो वरुणेह बोध्वुरुशँ्स मा न आयुः प्रमोषी।।अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि।ॐ भूर्भुवः स्वः भो वरुण ! इहागच्छ,इह तिष्ठ,स्थापयामि, पूजयामि,मम पूजां गृहाण।ॐ अपां पतये वरुणाय नमः। कहकर पूर्व ग्रहित अक्षत  पुष्पादि कलश के समीप छोड़ दे,और पुनः अक्षतपुष्पादि ग्रहण करके मन्त्र बोले-
ॐ कला कलाहि देवानां दानवानां कलाःकलाः।सङ्गृह्य निर्मितो यस्मात् कलशस्तेन कथ्यते।। कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।मूले त्वस्य स्थिरो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तदीपा वसुन्धरा।अर्जुनी गोमती चैव चन्द्रभागा सरस्वती।। कावेरी कृष्णवेणा च गंगा चैव महानदी।तापी गोदावरी चैव माहेन्द्री नर्मदा तथा।।नदाश्र्च विविधा जाता नद्यः सर्वास्तथाऽपराः।पृथिव्यां यानि तीर्थानि कलशस्थानि तानि वै।।सर्व समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः। आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारकाः।।ऋग्वेदोऽथ ययुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः। अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।।गायत्री चात्र सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा।। आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकार- काः ।। (अक्षतपुष्पादि को कलश के समीप छोड दें। ध्यातव्य है कि अब तक वस्त्र,चन्दन,पुष्प,पल्लवादि सामग्रियाँ पूजन-कलश तैयार करने के निमित्त व्यवहृत हुयी हैं,कलश की पूजा अभी शेष है।अतः कलश-प्राणप्रतिष्ठा हेतु पुनः अक्षतपुष्पादि ग्रहण करें,और निम्नांकित मन्त्रोच्चारण करके,अक्षतपुष्पादि को कलश के समीप रख दें।)-
मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञँ्समिमं दधातु। विश्वेदेवा स इह मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ।कलशे वरुणाद्यावाहितदेवताः सुप्रतिष्ठिता वरदाभवन्तु।ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः।
अथवा- ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च।अस्यै देवत्वमर्चायै मामेहति न कश्चन।। अस्मिन कलशे विष्ण्वाद्यावाहितदेवाः सुप्रतिष्ठता वरदा भवन्तु ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणाद्यावाहितेभ्यो विष्ण्वाद्यावाहितेभ्यो देवेभ्यो नमः।।
अब षोडशोपचार पूजन करे-
ध्यान- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,ध्यानार्थे पुष्पं समर्पयामि।
आसन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि।
पाद्य- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
अर्घ्य- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,हस्तयोर्घ्यं समर्पयामि।
स्नान- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,स्नानीयं जलं समर्पयामि।
स्नानाङ्ग आचमन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,स्नानान्ते आचमनीयं जलं  समर्पयामि।    
पञ्चामृत-स्नान- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि।
गन्धोदक-स्नान- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,गन्धोदक स्नानं समर्पयामि।(चन्दन मिश्रित जल से स्नान करावे)
              
शुद्धोदक स्नान- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। (शुद्धजल से स्नान करावे)
आचमन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,आचमनीयं जलं समर्पयामि।
वस्त्र-उपवस्त्र- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि। (ध्यातव्य है कि भूमिपूजन में एक ही कलश है,और विशिष्ट देवता इसी पर आवाहित हैं,अतः स्त्री-पुरुष  विशेष वस्त्र की व्यवस्था होनी चाहिए,न कि सिर्फ सूत चढ़ाकर काम चलालें।)
आचमन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं  समर्पयामि।
यज्ञोपवीत- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,यज्ञोपवीतं समर्पयामि।
आचमन-ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं
       समर्पयामि।
आचमन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,आचमनीयं जलं समर्पयामि।
चन्दन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,चन्दनं समर्पयामि।
रक्तचन्दन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,रक्तचन्दनं समर्पयामि।
हल्दीचूर्ण- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,हरिद्राचूर्णं समर्पयामि।
रोली- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,कुमकुमं समर्पयामि।
अबीर-गुलाल- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,अबीरंगुलालं च समर्पयामि।
सिन्दूर- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,सिन्दूरं समर्पयामि।(यहाँ ‘देवता’ और ‘सिन्दूर’ शब्द से भ्रमित न हों,सिन्दूर चढ़ावें।ध्यातव्य है कि कलश पर सभी उपस्थित हैं।)
अक्षत- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,अक्षतं समर्पयामि।
पुष्प-पुष्पमाला- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,पुष्पं-पुष्पमाल्यां च समर्पयामि।
तुलसी- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,तुलसीपत्रं समर्पयामि।
शमीपत्र- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,शमीपत्रं समर्पयामि।
विल्वपत्र- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,विल्वपत्रं समर्पयामि।
दूर्वा- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,दूर्वां समर्पयामि।
नानापरिमल द्रव्य,सौभाग्यद्रव्य - ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,नानापरिमल द्रव्याणि सौभाग्यद्रव्याणि च समर्पयामि।  (इत्र,सुगन्धित तेल,आलता,सिन्दूर,अन्य श्रृंगार प्रसाधन समर्पित करें)
धूप- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,धूपमाघ्रापयामि
दीप- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,धूपं दर्शयामि।(दीप दिखाकर हाथ धो लें)
नैवेद्य- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,नैवेद्यं निवेदयामि।
मध्यपानीय-ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,मध्यपानीयं समर्पयामि।
अखण्ड ऋतुफलं-ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,अखण्ड ऋतुफलं समर्पयामि। (विविधप्रकार के उपलब्ध मौसमी फल- केला,सेव,अमरुद आदि बिना काटे हुए चढ़ावें।इस सम्बन्ध में गणेशपूजन क्रम में बतलायी गयी बातों का ध्यान रखें)
आचमन- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ताम्बूलपूगीफलएलालवंगकर्पूरादि-(मुखशुद्धि)- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,   मुखशुद्ध्यर्थं ताम्बूलंपूगीफलंएलालवंगकर्पूरादि समर्पयामि।
दक्षिणा- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,दक्षिणाद्रव्यं समर्पयामि।
आरती-ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,आरार्तिकं समर्पयामि।
पुष्पाञ्जलि- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
प्रदक्षिणा- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,प्रदक्षिणां समर्पयामि।
अब,हाथों में अक्षत-पुष्प लेकर प्रार्थना करें-
प्रार्थना- देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ।उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम्।। त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्व त्वयि स्थिताः।त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।। शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः। आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदवाः सपैतृकाः।। त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः। त्वत्प्रसादादिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव।। सानिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा।। नमो नमस्ते स्फटिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमङ्गलाय।सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते।।ॐ अपां पतये वरुणाय नमः।।
नमस्कार- ॐ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः,प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।
(सादर नमस्कार पूर्वक,प्रार्थना-पूर्व हाथ में लिए गये अक्षतपुष्पादि को समर्पित करदें)
अब पुनः अक्षतपुष्पादि लेकर निम्नांकित वाक्योच्चारण पूर्वक अबतक किए गये पूजन कर्म को समर्पित करे- कृतेन अनेन पूजनेन कलशे वरुणाद्यावाहितदेवताः प्रीयन्तां न मम।
                          ---()()---
नोटः-यहाँ तक की क्रिया सम्पन्न करने के बाद,अब पद्धति के प्रारम्भ में दर्शाये गये चित्रानुसार क्रमांक तीन के समीप एकत्र रुप से सूर्यादिनवग्रह,गणपत्यादि, पंचलोकपाल, इन्द्रादि दशदिक्पाल,गौर्यादि षोडशमातृका,चतुःषष्टियोगिनी का आवाहन-पूजन संक्षिप्त रुप से कर लेना चाहिए।भूमिपूजन(शिलान्यास) के समय में इतना ही पर्याप्त है।यहाँ नान्दीश्राद्ध,वसोर्धारा पूजन, वास्तुवेदी स्थापन-पूजन आदि विशेष क्रियायें आवश्यक नहीं हैं,किन्तु चक्र-क्रमांक चार से आठ तक की क्रियायें- गंगा,वरुण,विश्वकर्मा,शिलादि पूजन के साथ-साथ अग्नि-स्थापन-पूजन, होमादि आवश्यक है।इन सबके बाद कलश पर ही गणसहित वास्तुदेवता(नाग,नागिन,कछुआ, मछली, गिरगिट) को स्थापित कर आवाहन पूजन विधिवत कर लेना चाहिए।कलश पूजन के बाद ही आचार्य-पूजन का भी विधान है।इसे कहीं मातृकादि पूजन के बाद करते हैं,तो कहीं पहले ही।यथाशक्ति वस्त्र,द्रव्यादि से आचार्य-पूजन अवश्य करें।आचार्य के अतिरिक्त कुलपुरोहित, वृतेश्वर आदि उपस्थित हों तो उनकी भी यथारीति पूजन अवश्य करें,अन्यथा प्रत्यवाय-दोष का भागी होना पड़ता है।यहाँ आचार्य-पूजन की अति संक्षिप्त विधि प्रस्तुत है।
आचार्य-पूजन- ॐ अद्य करिष्यमाण भूमिपूजनकर्माङ्गतया विहितमाचार्यादीनां पूजनपूर्वकं वरणं च करिष्ये – जलाक्षतपुष्पादि लेकर संक्षिप्त संकल्प-वाक्य-उच्चारण करते हुए कलश के समीप छोड़ दें।अब सर्वप्रथम आचार्य का पाद प्रक्षालन करे।ललाट पर कुमकुम- तिलक लगावे।तत्पश्चात वरणार्थ व्यवस्थित वस्त्र,द्रव्यादि सहित जलाक्षतपुष्पादि लेकर बोले-
ॐ अद्य अस्मिन् भूमिपूजन कर्मणि एभिः (सवस्त्र)वरणद्रव्यैः अमुक गोत्रं अमुक शर्माणं ब्राह्मणं त्वामहं वृणे। - और आचार्य के चरणों में अर्पित करे।प्रत्युत्तर में आचार्य द्रव्यादि ग्रहण करते हुए- ‘वृतोऽस्मि’ बोलें।
नवग्रहादिसहित अन्यान्य पूजन
अब,पुनः अक्षत और पुष्प लेकर सामने रखे पत्रावली वा दोने में अग्रलिखित मन्त्रोच्चारण पूर्वक छोड़े- ॐ सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः, ॐ गणपत्यादि पंचलोकपालेभ्यो नमः,ॐ इन्द्रादि दशदिक्पालेभ्यो नमः,ॐ गौर्यादि षोडशमातृकेभ्यो नमः,ॐ चतुःषष्टियोगिनी भ्यो नमः युष्मान् अहम् आवाहयामि,स्थापयामि,पूजयामि च।
अब एक तन्त्र से, सभी आवाहित देवी-देवताओं का सामान्य नाम मन्त्र से षोडशोपचार पूजन करें-
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः पाद्यं,अर्घ्यं,आचमनीयं,स्नानीयं जलं समर्पयामि।- कहते हुए चार बार जल छोड़े।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः स्नानार्थं पञ्चामृतं समर्पयामि।- कहते हुए पंचामृत चढ़ावे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः शुद्ध स्नानीयं जलं समर्पयामि।- कहते हुए जल चढ़ावे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि- कहते हुए वस्त्र-उपवस्त्र चढ़ावे।
ॐ आवाहित सर्वेदेवेभ्यो नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि- कहते हुए देवताओं के निमित्त यज्ञोपवीत चढ़ावे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः वस्त्रोपवस्त्रान्ते,उपवीतान्ते च आचमनीयं जलं समर्पयामि- वस्त्रादि के उपरान्त आचमन हेतु जल चढ़ावे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः चन्दनं समर्पयामि- चन्दन चढ़ावे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः रक्त चन्दनं समर्पयामि- रक्तचन्दन चढ़ावे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः नानापरिमल द्रव्याणि समर्पयामि- सुगन्धित द्रव्यादि समर्पित करे।
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः सिन्दूरं समर्पयामि। (सिन्दूर चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः कुमकुमं समर्पयामि।(कुमकुम चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः अबीरंगुलालं च समर्पयामि।(अबीरगुलाल चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः अक्षतं समर्पयामि(हल्दी से रंगा हुआ चावल चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः पुष्पंपुष्माल्यां च समर्पयामि।(फूल और माला चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः दूर्वां समर्पयामि।(दूर्वा और दूर्वांकुर चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः शमीपत्रं समर्पयामि।(शमीपत्र चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः विल्वपत्रं समर्पयामि।(विल्वपत्र चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः तुलसीपत्रं समर्पयामि।(तलसीपत्र चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः धूपमाघ्रापयामि।( देवदार धूप जलावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः दीपं दर्शयामि।( दीपक दिखावें)      
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।(विविध प्रसाद-मिष्टान्न,पंचमेवादि चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः मध्य पानीयं समर्पयामि। (जल चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः अखण्ड ऋतुफलं समर्पयामि।(विविध मौसमी फल चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।(जल चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः मुख शुध्यर्थं ताम्बूलंपूगीफलंएलालवंगकर्पूरादि( समर्पयामि। (मुखशुद्धि के निमित्त पानसुपारीलौंगइलाइचीकपूर मिश्रित पान का वीड़ा निवेदित करे)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः दक्षिणाद्रव्यं समर्पयामि।(यथाशक्ति दक्षिणा चढ़ावें)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः आरार्तिकं समर्पयामि।(कपूर की आरती दिखावे)
ॐ आवाहित देवीदेवताभ्यो नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।(अंजलीभर कर पुष्पांजलि दें)
(इस प्रकार आंगिक पूजा सम्पन्न हो जाने पर,शिलान्यास(भूमिपूजन)क्रम में अब बारी-बारी से अथवा एकतन्त्र से पृथ्वी,वरुण,गंगा,विश्वकर्मा,और इष्टिका(शिला),तथा नौ वा ग्यारह अंगुल लंबा खैर का खूटा,जो कलाई के समान मोटा भी हो की पूजा करें।इस खदिरशंकु को शिला के पास ही अलग पत्तल पर रख दें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः,ॐ खदिरस्तम्भाय नमः आवाहयामि,प्रतिष्ठापयामि,पूजयामि च। (कहते हुए सामने शिलान्यास हेतु खोदे गये गड्ढे में,सामने रखे गये दोने में,एक पत्तल पर रखे गये उपकरण- करनी,वसूला, कुदाल,फावड़ा,खंती,हथौड़ा आदि,तथा एक अन्य पत्तल पर रखे गये प्रक्षालित शिला(अथवा ईंट) पर अक्षत-पुष्प छिड़ककर, हाथजोड़कर प्रणाम करे,और आवाहन मुद्रा(अधोमुख दोनों हथेलियाँ) का प्रदर्शन करे।)
पुनः ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं स्नानीयं जलं समर्पयामि (कहते हुए चार बार जल छोड़े- उक्त पांचों स्थानों पर)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः स्नानार्थं पंचामृतं समर्पयामि (कहते हुए पांचो स्थानों पर पंचामृत चढ़ावे)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः शुद्ध स्नानीयं जलं समर्पयामि ( पुनः जलार्पण करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः वस्त्रंउपवस्त्रं च समर्पयामि  (वस्त्रोपवस्त्र के निमित्त क्रमशः पांचों स्थानों पर पीले वस्त्र और मौली अपर्पित करें)
ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि (वरुण और विश्वकर्मा को यज्ञोपवीत अर्पित करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः वस्त्रोपवस्त्र,यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि (पुनः पांचो स्थानों पर आचमन हेतु जल चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ इष्टिकायै नमः सिन्दूरं समर्पयामि (इन तीन देवियों को सिन्दूर चढ़ावे- पुष्प अथवा आम के पत्ते से)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः चन्दनंरक्तचन्दनं च समर्पयामि ( पांचो स्थानों पर चन्दन और रक्त चन्दन अर्पित करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः कुमकुमं समर्पयामि(कुमकुम चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः नानापरिमल द्रव्याणि समर्पयामि(विविध सुगन्धित द्रव्य- इत्र,सुगन्धित तैल आदि चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः अबीरंगुलालं च समर्पयामि( अबीरगुलाल चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः पुष्पंपुष्पमाल्यां च समर्पयामि(रंगीन सुगन्धित फूल और माला चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः दूर्वांदुर्वांकुरांन च समर्पयामि(दूब और दूब का अंकुर चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः शमीपत्रं,विल्वपत्रं च समर्पयामि(शमीपत्र, विल्वपत्र चढ़ावें,तथा विश्वकर्मा और वरुण को तुलसी पत्र भी चढ़ावे- ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः बोलकर)      ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः अक्षतं समर्पयामि (हल्दी से रंगा हुआ चावल चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः धूपं आघ्रापयामि (धूप दिखावे)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः दीपं दर्शयामि (दीप दिखलाकर हाथ धो लें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः नैवेद्यं निवेदयामि( पांचो स्थानों पर अलग-अलग दोनों में लड्डू,पेड़ा, पंचमेवादि प्रसाद हेतु अर्पित करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः मध्य पानीयं समर्पयामि( पांचो स्थानों पर पुनः जल चढ़ावे)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः अखण्ड ऋतुफलं समर्पयामि( पांचो स्थानों पर बिना कटा हुआ फल- केला,अंगूर,सेव,नासपाती,संतरा,अमरुद- जो भी उपलब्ध हो अर्पित करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
( पांचो स्थानों पर नैवेद्य के अन्त में आचमन हेतु जल चढ़ावें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः मुखशुध्यर्थं ताम्बूलंपूगीफलंएलालवंग- कर्पूरादि समर्पयामि(पांचों स्थानों पर सुपारीलौंगइलाइची और कपूर मिश्रित पानका बीड़ा समर्पित करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः दक्षिणाद्रव्यं समर्पयामि (पांचों स्थानों पर दक्षिणाद्रव्य प्रदान करें)
ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ गंगायै नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ विश्वकर्मणे नमः, ॐ इष्टिकायै नमः ॐ खदिरस्तम्भाय नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि (पांचों स्थानों पर पुष्पपंखुड़ियां समर्पित करें)
इस प्रकार आंगिक पूजा का दूसरा खण्ड सम्पन्न हुआ।अब मूल कार्य- वास्तुपुरुष का गण सहित पूजन करें।पूर्वस्थापित कलश पर ही नाग-नागिन-कछुआ-मछली आदि को रख कर पूर्व विधि से पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें।सर्वप्रथम प्राण-प्रतिष्ठा हेतु विनियोग करना चाहिए।इसके लिए दाहिने हाथ में जल लें और मंत्रोच्चारण पूर्वक कलश के समीप छोड दें-
ॐ अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः ऋग्यजुः सामानिच्छन्दांसि क्रियामयवपुः प्राणाख्या देवता  आं बीजं,ह्रीँ शक्तिः, क्रौं कीलकं देवप्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः।
अब अपने अंगों में न्यास करें- ॐ ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि। ऋग्यजुःसामच्छन्दोभ्यो नमो मुखे।प्राणाख्यादेवतायैः नमः हृदि। आं बीजाय नमो गुह्ये।ह्रीँ शक्तये नमः पादयोः।क्रौं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे। (इनका क्रमशः उच्चारण करते हुए शिर,मुख,हृदय,गुदा स्थान,पैर,और सर्वांग का स्पर्श करें)
अब दोनों हाथों से  गण सहित वास्तुपुरुष को ढकते हुए अग्रलिखित मन्त्रों का उच्चारण करे-
ॐ आँ ह्रीँ क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं वास्तुदेवस्य प्राणाः इह प्राणाः। ॐ आँ ह्रीँ क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं वास्तुदेवस्य जीव इह स्थितः। ॐ आँ ह्रीँ क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं वास्तुदेवस्य सर्वेन्द्रियाणि वाङ्गमनस्त्वक्चक्षुःश्रोत्रघ्राणजिह्वापाणिपादपायूषस्थानानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।।- मन्त्रोच्चारण के पश्चात् पुष्प समर्पित करें।
अब इस प्रतिष्ठित सगणवास्तुदेवता का पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें।
 ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः पाद्यंअर्घ्यंआचमनीयंस्नानीयं जलं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के पाद्यअर्घ्यआचमनस्नान निमित्त चार बार जल चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः पञ्चामृतं समर्पयामि।(वास्तुदेवता को पंचामृत चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः शुद्धस्नानीयं जलं समर्पयामि।(वास्तुदेवता को जल चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि।(वास्तुदेवता को पीले वस्त्र चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि।(वास्तुदेवता को जनेऊ चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः वस्त्रोपवस्त्रान्ते,यज्ञोपवीतान्ते च आचमनीयं जलं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त वस्त्र,उपवस्त्र,यज्ञोपवीत के बाद आचमन हेतु जल चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः चन्दनंरक्तचन्दनं च समर्पयामि।(वास्तुदेवता को चन्दन और रक्त चन्दन चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः कुमकुमं समर्पयामि।(वास्तुदेवता को रोली चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः सिन्दूरं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त सिन्दूर चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः नानापरिमल द्रव्याणि समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त विविध सुगन्धित द्रव्य- इत्र,तैलादि समर्पित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः अक्षतं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त अक्षत चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः पुष्पंपुष्पमाल्यां च समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त रंगीन फूल और सुगन्धित फूलों की माला अर्पित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः दूर्वांदुर्वांकुरां च समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त दूब और उसका अंकुर अर्पित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः शमीपत्रं,विल्वपत्रं,तुलसी पत्रं च समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त शमीपत्र,विल्वपत्र,तुलसीपत्रादि अर्पित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः धूपं आघ्रापयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त सुगन्धित धूप जलावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः दीपं दर्शयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त दीप दिखावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः नैवेद्यं निवेदयामि। (वास्तुदेवता के निमित्त धान का लावा,जौ का सत्तू अत्यावश्यक नैवेद्य है,साथ ही लड्डू,पेड़ा आदि अन्य उपलब्ध प्रसाद भी अर्पित करें)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः मध्य पानीयं जलं समर्पयामि। (जल चढ़ावे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः अखण्ड ऋतुफलं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त बिना कटा हुआ विविध फल अर्पित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त आचमन जल निवेदित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः मुखशुध्यर्थं ताम्बूलंपूगीफलंएलालवंगकर्पूरादि समर्पयामि। (वास्तुदेवता के निमित्त पान,सुपारी,लौंग,इलाइची,कपूर अर्पित करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः दक्षिणाद्रव्यं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त दक्षिणाद्रव्य प्रदान करे)
ॐ सगणवास्तुदेवाय नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।(वास्तुदेवता के निमित्त दोनों हाथों की अजलि में पुष्पपंखुड़ियां भर कर पुष्पांजलि प्रदान करे)
इस प्रकार शिलान्यास-पूजन-कार्य सम्पन्न हुआ।अब,शिल्पी(कारीगर)को सामने बुलाकर दही,अक्षत,हल्दी से तिलक लगावे, तथा खैर की खूँटी और हथौड़े को उठाकर उसे समर्पित करे,और पूजित गड्ढे में प्रवेश कर,उसके मध्य में खूँटी को गाड़ने का आदेश दे।खूँटी गड़ जाने के पश्चात् कलश पर से पूजित वास्तु मूर्तियों को एकत्र कर तांम्रपात्र (छोटी लोटनी)में रखकर ढक्कन लगाकर,अपने माथे से श्रद्धा पूर्वक स्पर्श कराते हुए शिल्पी के हाथों में समर्पित कर दे,जिसे वह गाड़ी गयी खूँटी पर आदर पूर्वक स्थापित कर दे।पात्र के समीप ही पुनः धान का लावा,जौ का सत्तू और नदी का शैवाल भी एक पत्ते पर रख कर थोड़ा जल गिरा दे।अब बारी-बारी से एक-एक शिला उठा कर क्रमशः निर्दिष्ट विधि से (नीचे दिये गये चित्रानुसार) स्थापित करता जाय।  सर्वप्रथम दक्षिण दिशा में शिला स्थापित करे,फिर पश्चिम,उत्तर,पूर्व और पांचवी शिला को अग्नि-वायुकोण को मिलाते हुए(यानी तिरछे)रखे।सभी शिलाओं को स्थापित करने के बाद यथेष्ठ मात्रा में सीमेंट-बालू से मजबूती पूर्वक ढक दे।अब जलदार नारियल के गोले को (संक्षिप्त रुप से पूजित कर)प्रणाम करके समीप किसी शिला पर इस प्रकार फोड़े कि एक ही प्रहार में खण्डित हो जाय और तत्गर्भोदक भी नष्ट न हो।नारिकेल जल को न्यासित शिला पर आदरपूर्वक गिरावे।आगे निर्माण का मुख्य स्तम्भ (पीलर) इसी पर खड़ा किया जा सकता है,अथवा सुविधानुसार (शिल्पी की राय से)इसके आसपास भी रखा जा सकता है।  

अब सुविधानुसार सामने वा शिलान्यास-गर्त के अग्निकोण में छोटी सी वालुका वेदी पर संक्षिप्त रुप सें अग्नि-स्थापन,पूजन कर,संक्षिप्त रीति से ही होम भी सम्पन्न करें।यहाँ पञ्चभू संस्कार और कुशकण्डिकादि की चर्चा नहीं की जारही है;किन्तु विशेष होमकर्म में इन्हें अवश्य करना चाहिए।इसकी चर्चा गृहप्रवेशप्रसंग में की जायेगी।शिलान्यास क्रम के संक्षिप्त विधान में वेदी के अग्निकोण में थोड़ा सा कपूर और देवदारधूप रख कर अग्नि प्रज्जवलित कर लें,और हाथों में पुष्पाक्षत लेकर निम्नांकित मन्त्रोच्चारण करें-
ॐ मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा।
पितृणां च नमस्तुभ्यं विष्णवे पावकात्मने।।
रक्तमाल्याम्बरधरं रक्तपद्मासनस्थितम्।
रौद्रवागीश्वरीरुपं वह्निमावाहयाम्यहम्।।
ॐ पावकाग्नये नमः आवाहयामि,प्रतिष्ठापयामि,पूजयामि च। (अक्षतपुष्प अग्निवेदी पर छोड़कर, आवाहन और प्रतिष्ठामुद्रा का प्रदर्शन करें।दोनों हथेलियों को एकत्र कर सीधा प्रदर्शन आवाहन,और विपरीत प्रदर्शन प्रतिष्ठामुद्रा कहलाती है।)
पावकाग्नये नमः पाद्यंअर्घ्यंआचमनीयंस्नानीयं जलं समर्पयामि। (ध्यातव्य है कि अग्नि में जल और सिन्दूर नहीं डालना चाहिए।अतः प्रज्ज्वलित अग्नि से बाहर ही,वेदी पर चार बार जल गिरावे।)
पावकाग्नये नमः स्नानार्थं पञ्चामृतं समर्पयामि। (अग्नि में पंचामृत डालें)
पावकाग्नये नमः शुद्ध स्नानीयंजलं समर्पयामि।(अग्नि से बाहर वेदी पर जल डालें)
पावकाग्नये नमः वस्त्रोपवस्त्रोपवीतं समर्पयामि।(अग्नि में रक्तसूत्र- मौली के तीन टुकड़े डालें)
पावकाग्नये नमः वस्त्रोपवस्त्रोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।(अग्नि से बाहर वेदी पर जल डालें)
पावकाग्नये नमः चन्दनंरक्तचन्दनं च समर्पयामि।(अग्नि में दोनों प्रकार के चन्दन डालें)
पावकाग्नये नमः कुमकुमं समर्पयामि।(अग्नि में रोली डालें)
पावकाग्नये नमः परिमलद्रव्याणि समर्पयामि।(अग्नि में सुगन्धित द्रव्य डालें)
पावकाग्नये नमः अक्षतं समर्पयामि।(अग्नि में अक्षत डालें)
पावकाग्नये नमः अबीरंगुलालं च समर्पयामि।(अग्नि में अबीरगुलाल डालें)
पावकाग्नये नमः पुष्पंपुष्पमाल्यां च समर्पयामि।(अग्नि में रक्तपुष्प डालें)
पावकाग्नये नमः दुर्वादुर्वांकुरां च समर्पयामि।(अग्नि में तीन या पांच दुर्वा डालें)
पावकाग्नये नमः शमीपत्रंविल्वपत्रंतुलसीपत्रं च समर्पयामि।(अग्नि के निमित्त प्रदान करें)
पावकाग्नये नमः धूपं आघ्रापयामि।(अग्नि में घृतमिश्रित देवदार,धूना,गूगल आदि प्रक्षेपित करें)
पावकाग्नये नमः दीपं दर्शयामि।(प्रज्ज्वलित अग्नि के समक्ष वेदी पर ही दीप स्थापित करें,और हाथ धोलें)
पावकाग्नये नमः नैवेद्यं निवेदयामि।(अग्नि को विविध नैवेद्य अर्पित करें)
पावकाग्नये नमः मध्य पानीयं समर्पयामि। (अग्नि के बाहर वेदी पर जल डालें)
पावकाग्नये नमः ऋतुफलं समर्पयामि।(अग्नि में उपलब्ध ऋतुफल डालें)
पावकाग्नये नमः नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।(अग्नि के बाहर वेदी पर जल डालें)
पावकाग्नये नमः मुखशुध्यर्थं ताम्बूलंपूगीफलंएलालवंगकर्पूरादि समर्पयामि। (अग्नि के निमित्त सुपारीलौंगइलाइचीकपूर मिश्रित पान का बीड़ा अर्पित करें)
पावकाग्नये नमः दक्षिणाद्रव्यं  समर्पयामि।(अग्नि के बाहर बेदी पर दक्षिणास्वरुप द्रव्य प्रदान करें,और हाथ में अक्षतपुष्प लेकर प्रार्थना करें-
प्रार्थनाः- अग्ने शाण्डिल्यगोत्र मेषध्वज मम सम्मुखो भव। प्रसन्नो भव। वरदा भव।
अब एक पात्र में यथेष्ट मात्रा में(करीब दोसौ ग्राम) घी लेकर उसमें आम का एक पत्ता डाल कर,प्रज्ज्वलित अग्नि पर दक्षिणावर्त(clockwise) तीन बार घुमाकर वेदी के समीप रख दें,और आम्रपल्लव से ही थोड़ा-थोड़ा घी लेकर अग्रलिखित मन्त्रोच्चारण पूर्वक अग्नि में आहुति डालें।आचार्य के मन्त्रोच्चारण के पश्चात् यजमान भी साथ में स्वाहा अवश्य बोलते जायें।
ॐ प्रजापतये स्वाहा,इदं प्रजापतये न मम।ॐ भूःस्वाहा,इदं अग्नये न मम।ॐ भुवः स्वाहा,इदं वायवे न मम।ॐ वँ स्वाहा,इदं सुपर्णाय न मम।ॐ अग्नये स्वाहा,इदं अग्नये न मम। (वेदी पर थोड़ा जल गिरा दे।वस्तुतः यह मध्यपानीयस्वरुप है)
ॐ सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः स्वाहा।ॐ गणपत्यादि पञ्चलोकपालेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ इन्द्रादि दशदिक्पालेभ्यो नमः स्वाहा।ॐ गौर्यादिषोडशमातृकेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ चतुःषष्टियोगिनीमातृकेभ्यो नमः स्वाहा।ॐ सर्वेभ्योदेवेभ्यो नमः स्वाहा। (पुनः वेदी पर थोड़ा जल गिरा दे।)
अब निम्नांकित मन्त्रोच्चारण पूर्वक कम से कम सताइस और अधिक से अधिक एकसौआठ आहुति प्रदान करेः-
ॐ वास्तोष्पतये नमः स्वाहा।
 (नोटः- ध्यातव्य है कि शिलान्यास के समय हवन के अन्त में पूर्णाहुति प्रदान नहीं करना चाहिए। किंचित ऋषिमत से प्रदान करने की भी अनुशंसा है।)
अब उड़द,दही और हरिद्राचूर्ण को मिश्रित करके अलग-अलग दो दोनों में रखे। दोनों में एक-एक प्रज्ज्वलित दीप भी रख दे,और अक्षतपुष्पजलादि लेकर,मन्त्रोच्चारण पूर्वक एक दोने को हवन-वेदी के पास ही सुविधानुसार रखदे,तथा दूसरे दोने को नापित या अन्य के द्वारा वास्तुमण्डल से बाहर एकान्त में रखवा दे।   
(१)    ॐ सूर्यादिनवग्रहेभ्यः साङ्गेभ्यः सपरिवारेभ्यःसायुधेभ्यः सशक्तिकेभ्यः अधिदेवता- प्रत्यधिदेवता-गणपत्यादिपञ्चलोकपाल-इन्द्रादिदशदिक्पाल-वास्तोष्पतिसहितेभ्यः एतं सदीपं दधिमाषबलिं समर्पयामि।भो भो सूर्यादिनवग्रहाः साङ्गाः सपरिवाराः सायुधाः सशक्तिकाः अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता-गणपत्यादिपञ्चलोकपाल-इन्द्रादिदशदिक्पाल-वास्तोष्पतिसहिताः मम सकुम्बस्य सपरिवारस्य आयुःकर्तारः क्षेम कर्तारः शान्तिकर्तारः पुष्टि कर्तारः तुष्टिकर्तारः कल्याणकर्तारः वरदा भवत।
(२)   ॐ क्षें क्षेत्रपालाय साङ्गाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिकाय मारीगण-भैरव-राक्षस-कूष्माण्ड-वेताल-भूत-प्रेत-पिशाच-पिशाचिनी-डाकिनी-शाकिनी गण सहिताय एष सदीपं दधिमाषबलिं समर्पयामि।भो भो क्षेत्रपाल ! एनं सदीपं बलिं गृहाण गृहाण।मम सकुम्बस्य सपरिवारस्य आयुःकर्ता क्षेम कर्ता शान्तिकर्ता पुष्टिकर्ता तुष्टिकर्ता स्थिरकर्ता कल्याणकर्ता वरदा भव।
अब, अक्षतपुष्पद्रव्यजलादि लेकर कार्यसमापन दक्षिणा संकल्प करें –
ॐ अद्य कृत पूजनहोमादि सांगतासिध्यर्थं यथाशक्ति दक्षिणाद्रव्यं .....नाम गोत्राय ब्राह्मणाय दातुमहमुत्सृजे।
विसर्जनः- ध्यातव्य है कि नागनागिन आदि तो शिलासहित गर्त में रखे जा चुके हैं,शेष गणेशादि देवों का विसर्जन करें, अक्षतपुष्पादि लेकर-गच्छ गच्छ सुरक्षेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।यत्र ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ हुताशन।।यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च।।
क्षमाप्रार्थनाः- रूपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषो जहि।पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे।।आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।।मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।
             
                  ---)इति शिलान्यासपद्धतिः(---

क्रमशः..

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